Wednesday, 16 Sep 2026 | 09:51 PM

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पाकिस्तान में पेट्रोल 35 पैसे सस्ता, डीजल 5.71 रुपया महंगा:पेट्रोल 315.80 और डीजल 360.06 रुपया लीटर मिल रहा, नई कीमतें 21 जुलाई से लागू

पाकिस्तान में पेट्रोल 35 पैसे सस्ता, डीजल 5.71 रुपया महंगा:पेट्रोल 315.80 और डीजल 360.06 रुपया लीटर मिल रहा, नई कीमतें 21 जुलाई से लागू

पाकिस्तानी सरकार ने पेट्रोल के दाम में 35 पैसे प्रति लीटर की कटौती की है, जबकि हाई-स्पीड डीजल (HSD) की कीमत 5.71 रुपया लीटर बढ़ा दी है। नई दरें 21 जुलाई से लागू हो गई हैं। दामों में इस बदलाव के बाद अब बाजार में पेट्रोल की नई कीमत 315.80 रुपया लीटर और हाई-स्पीड डीजल की कीमत 360.06 रुपया प्रति लीटर हो गई है। भारत और पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल की कीमतें नोट: ₹- भारतीय रुपया, पाकिस्तान में भारतीय रुपए की वेल्यू 2.89 पाकिस्तानी रुपया के बराबर है। अप्रैल के रिकॉर्ड हाई से कम हैं मौजूदा दरें ईंधन की मौजूदा कीमतें इस साल अप्रैल में बने अपने ऑल-टाइम हाई से अब भी काफी नीचे हैं: अब हफ्ते की जगह रोजाना तय हो रहे पेट्रोल डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों में आ रहे तेज उतार-चढ़ाव को देखते हुए सरकार ने बड़ा नीतिगत बदलाव किया है। पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने घोषणा की है कि अब देश में फ्यूल रेट्स हफ्ते के बजाय रोजाना आधार पर तय किए जाएंगे। डीलर्स एसोसिएशन ने फैसले का विरोध किया सरकार के रोजाना रेट तय करने के फैसले का ऑल पाकिस्तान डीलर्स एसोसिएशन ने कड़ा विरोध किया है। एसोसिएशन ने इस व्यवस्था को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि वे इस फैसले के खिलाफ इसी हफ्ते विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। मिडिल क्लास और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर पेट्रोल की कीमतों में बदलाव का सीधा असर देश के मिडिल और लोअर-मिडिल क्लास पर पड़ता है, क्योंकि इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से प्राइवेट गाड़ियों, छोटी कारों, ऑटो रिक्शा और टू-व्हीलर्स में होता है। वहीं, डीजल महंगा होने से पूरे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा है, क्योंकि इसका इस्तेमाल भारी कमर्शियल वाहनों (ट्रकों-बसों), पावर प्लांट्स और बड़े जनरेटरों में होता है। पाकिस्तान में हर महीने करीब 7 से 8 लाख टन पेट्रोल और डीजल की भारी-भरकम बिक्री होती है, जबकि केरोसिन (मिट्टी के तेल) की मासिक मांग सिर्फ 10 हजार टन ही है। यही वजह है कि पेट्रोल-डीजल सरकार के लिए रेवेन्यू जुटाने का सबसे बड़ा जरिया बने हुए हैं।

कॉकरोच हटाने के टिप्स: बारिश में घर के कोने-कोने से निकल रहे हैं कॉकरोच, यहां पाने के लिए काम आएगा ये देसी जुगाड़

कॉकरोच हटाने के उपाय

20 जुलाई 2026 को 23:05 IST पर अपडेट किया गया बरसात के मौसम में कॉकरोच से कैसे छुटकारा पाएं: बरसात के मौसम में कॉकरोच की समस्या से बचने के लिए आपकी रसोई में मौजूद 5 शानदार और असरदार देसी जुगाड़ यहां दिए गए हैं। अनुसरण करना : लौंग की तेज महक:बारिश में कॉकरोच से संबंधित हैं? अपनी रसोई की दराजों, प्राचीन काल और जनजातियों में कुछ लौंग की दराजें। इसकी तेज महक से कॉकरोच तुरंत दूर भागते हैं। छवि: फ्रीपिक बोरिक एसिड का रामबाण इलाज: बोरिक एसिड कॉकरोच भगने की सबसे अचूक सब्जी है। रात को सोने से पहले किचन के सिंक, डस्टबिन और नाक के पास थोड़ा सा बोरिक पाउडर छिड़कें। कॉकरोच गायब हो जाएगा। छवि: फ्रीपिक हल्दी का जादू: हल्दी सिर्फ खाने में ही नहीं, कॉकरोच भागने में भी काम आती है। रात को सोने से पहले किचन के किशोर और सिंक के पास थोड़ा सा हल्दी पाउडर छिड़कें। कॉकरोच पास नहीं आएगा। छवि: फ्रीपिक नीम का प्रभावशाली प्रभाव: नीम की तेज़ गंध कॉकरोच को बिल्कुल पसंद नहीं है। पानी में छोटा सा नीम का तेल एक बड़ा सितारा या ताजी दोस्त नाव में रख दें। यह बिल्कुल सुरक्षित जुगाड़ है। छवि: फ्रीपिक तेज़पत्ता का स्मोक या पाउडर: तेजपत्ता हर भारतीय रसोई में होता है। इसका गंध कॉकरोच बिल्कुल पसंद नहीं है। कुछ तेजपत्तों को पीसकर पाउडर बनाएं और देशी में डालें। यह एक बेहद सुरक्षित जुगाड़ है। छवि: फ्रीपिक घर में आपकी साफ-सफाई और बारिश में ज्यादा देर तक पानी न दिखाई देना। साथ ही, रामबाण को भी नहीं मिला। ऐसा करने से घर पर रहेंगे और कॉकरोच भी नहीं आएंगे। छवि: एआई द्वारा प्रकाशित: समृद्धि ब्रेजा प्रकाशित 20 जुलाई 2026 23:05 IST पर

यूक्रेन में शिप पर हमला, 4 भारतीयों की मौत:भारत ने कहा- कारोबारी जहाजों को निशाना बनाना निंदनीय; यूक्रेन बोला- रूसी मिसाइलों से हमला हुआ

यूक्रेन में शिप पर हमला, 4 भारतीयों की मौत:भारत ने कहा- कारोबारी जहाजों को निशाना बनाना निंदनीय; यूक्रेन बोला- रूसी मिसाइलों से हमला हुआ

यूक्रेन के ओडेसा पोर्ट से रवाना हुए कार्गो जहाज ‘MV गोल्डन लियो’ पर रविवार को हुए हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत हो गई। एक भारतीय गंभीर रूप से घायल है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है। भारत सरकार ने सोमवार को इसकी पुष्टि करते हुए हमले की कड़ी निंदा की और कहा कि कारोबारी जहाजों और निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाना पूरी तरह निंदनीय है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारतीय दूतावास लगातार यूक्रेनी अधिकारियों के संपर्क में है और प्रभावित लोगों की हरसंभव मदद की जा रही है। उधर, यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक, गोल्डन लियो जहाज ओडेसा से मक्का लेकर रवाना हुआ था। पोर्ट से निकलने के कुछ देर बाद उस पर तीन रूसी क्रूज मिसाइलों से हमला किया गया। यूक्रेन की नौसेना ने कहा कि हमले के बाद जहाज में आग लग गई। रॉयटर्स के मुताबिक, समुद्र में जहाज से घना धुआं उठता देखा गया, जिसकी बाद में पहचान हुई। जहाज पर कुल 17 क्रू मेंबर सवार थे, जिनमें 5 भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के मुताबिक, 19 जुलाई की शाम अफ्रीकी देश गिनी-बिसाऊ के झंडे वाले इस जहाज पर हमला हुआ। उस समय जहाज पर कुल 17 क्रू मेंबर थे, जिनमें पांच भारतीय शामिल थे। विदेश मंत्रालय ने मारे गए भारतीयों के परिवारों के प्रति संवेदना जताई और घायल भारतीय के जल्द स्वस्थ होने की कामना की। मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, भारत ऐसे हमलों की निंदा करता है। कारोबारी जहाजों और निर्दोष नागरिक क्रू को निशाना बनाना या समुद्री व्यापार और नेविगेशन की आजादी में बाधा डालना निंदनीय है और इससे बचा जाना चाहिए। वहीं, यूक्रेन के समुद्री बंदरगाह प्राधिकरण के मुताबिक घटना के बाद पूरी रात सर्च और रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। हमले में नौ क्रू मेंबर और एक समुद्री पायलट की मौत हुई, जबकि 17 में से आठ क्रू मेंबर को सुरक्षित बचा लिया गया। खबर लगातार अपडेट हो रही है…

संसद में सरकार बोली- E20 पेट्रोल से इंजन खराब नहीं:23 करोड़ गाड़ियां बिना परेशानी चल रहीं, पुरानी गाड़ियों का माइलेज मामूली गिरा

संसद में सरकार बोली- E20 पेट्रोल से इंजन खराब नहीं:23 करोड़ गाड़ियां बिना परेशानी चल रहीं, पुरानी गाड़ियों का माइलेज मामूली गिरा

देश में 20% एथेनॉल मिला पेट्रोल यानी E20 फ्यूल से गाड़ियों के इंजन खराब होने या उनके अचानक बंद होने की कोई पुख्ता रिपोर्ट नहीं है। सरकार ने आज यानी 20 जुलाई को राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने बताया कि देश भर में चल रहे 23 करोड़ से ज्यादा गाड़ियों के चलाने के अनुभवों और कई वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि E20 फ्यूल से इंजन को नुकसान पहुंचने का कोई प्रमाण नहीं मिला है। 20 करोड़ टू-व्हीलर्स और 3 करोड़ कारें बिना किसी शिकायत के चल रहीं राज्यसभा में जानकारी देते हुए मंत्री सुरेश गोपी ने कहा कि देश में 20 करोड़ से ज्यादा टू-व्हीलर्स और 3 करोड़ से अधिक पेट्रोल कारें वर्तमान में एथेनॉल मिश्रित ईंधन यानी पर चल रही हैं। इनमें एक बड़ी संख्या उन पुराने वाहनों की भी है, जिन्हें E20 सर्टिफिकेशन मिलने से पहले मैन्युफैक्चर किया गया था। इन सभी गाड़ियों के डेटा और सर्विस रिकॉर्ड देखने के बाद भी इथेनॉल ब्लेंडिंग के कारण इंजन फेल होने या किसी बड़े व्हीकल ब्रेकडाउन की कोई पुख्ता पुष्टि नहीं हुई है। बिना सोचे-समझे नहीं किया बदलाव सरकार ने सदन में बताया कि देश को E20 फ्यूल की तरफ ले जाने का फैसला अचानक नहीं हुआ है। यह पूरी तरह से चरणबद्ध और वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित रहा है। साल 2013-14 में जहां पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग सिर्फ 1.53% थी, उसे साइंटिफिकली और सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ हर स्तर पर विचार-विमर्श के बाद ही साल 2025-26 तक बढ़ाकर 20% (E20) किया गया है। ऑटोमोबाइल कंपनियों के सर्विस डेटा से भी पुष्टि मंत्रालय द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश की एक प्रमुख फोर-व्हीलर निर्माता कंपनी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान कुल 2.84 करोड़ वाहनों की सर्विसिंग की। चौंकाने वाली बात यह है कि इन गाड़ियों में 1.5 करोड़ ऐसे पुराने वाहन शामिल थे जो नॉन-E20 सर्टिफाइड थे यानी जिन्हें E20 फ्यूल के हिसाब से नहीं बनाया गया था। इसके बावजूद कंपनी के सर्विस रिकॉर्ड में E20 फ्यूल की वजह से गाड़ी को किसी भी तरह का नुकसान होने की एक भी रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई। इसी तरह, देश की एक प्रमुख टू-व्हीलर निर्माता कंपनी के बड़े सर्विस डेटा में भी पहले के फ्यूल ब्लेंड की तुलना में E20 पर चलने वाले वाहनों में खराबी की कोई अलग घटना सामने नहीं आई है। माइलेज पर असर: पुरानी गाड़ियों में 3 से 5% की कमी संभव, पर मिलेंगे ये 4 बड़े फायदे फ्यूल एफिशिएंसी (माइलेज) के सवाल पर सरकार ने साफ किया कि किसी भी गाड़ी का माइलेज ड्राइविंग कंडीशन, ड्राइवर की आदतों और गाड़ी के मेंटेनेंस पर निर्भर करता है। हालांकि, सरकार ने स्वीकार किया कि E10 (10% इथेनॉल) के लिए डिजाइन की गई कुछ पुरानी गाड़ियों में माइलेज में करीब 3% से 5% तक की मामूली कमी आ सकती है। लेकिन इसके बदले E20 फ्यूल वाहन और पर्यावरण को कई फायदे देता है: फिलहाल 20% से ज्यादा ब्लेंडिंग का कोई फैसला नहीं राज्यसभा में जब मंत्री से पूछा गया कि क्या भविष्य में इथेनॉल ब्लेंडिंग को 20% से आगे बढ़ाया जाएगा, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया गया है। आगे का कोई भी फैसला ऑटोमोबाइल निर्माताओं, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और रिसर्च संस्थानों के साथ गहन तकनीकी स्टडी के बाद ही लिया जाएगा।

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी का काम करने वाले 56 वर्षीय वांग जिबिंग को देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों में से एक लू शुन साहित्य पुरस्कार मिला है। उनकी कविता संग्रह ‘लो फ्लाइट’ को यह सम्मान दिया गया है। इस किताब की कई कविताएं उन्होंने फूड डिलीवरी के बीच मिले खाली समय में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लिखी थीं। वांग 2019 के आसपास फूड डिलीवरी राइडर बने थे। उनकी कविताएं सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुए। उनकी नई किताब ‘लो फ्लाइट’ डिलीवरी राइडर्स की रोजमर्रा की परेशानियों, संघर्ष और जीवन पर आधारित है। यह किताब उन्होंने 2024 में प्रकाशित की थी। इसके लिए उन्होंने करीब 200 डिलीवरी राइडर्स से बातचीत की और उनके अनुभवों को अपनी कविताओं में दर्ज किया। उनकी एक कविता की पंक्ति है, “किसने कहा कि पंख फैलाने का मतलब सिर्फ ऊंची उड़ान भरना है? नीचे उड़ना भी उड़ान ही है।” वांग का जन्म चीन के जियांगसू प्रांत में हुआ था। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें 14 साल की उम्र में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने निर्माण मजदूर, कबाड़ बीनने वाले और सड़क किनारे सामान बेचने जैसे कई छोटे-मोटे काम किए। बाद में वे फूड डिलीवरी राइडर बन गए। हालांकि, पढ़ने-लिखने का उनका शौक कभी खत्म नहीं हुआ। एक कविता से मिली पहचान 2022 में उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। यह कविता 2019 की एक घटना से प्रेरित थी। उस समय वह जियांगसू के कुनशान शहर में फूड डिलीवरी का काम कर रहे थे। एक ग्राहक ने गलत पता दर्ज कर दिया था। सही घर ढूंढने के लिए वांग को तीन रिहायशी इमारतों में भटकना पड़ा और 18 मंजिल तक सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं। जब वह आखिरकार खाना लेकर पहुंचे तो ग्राहक ने देर होने पर उन्हें डांट दिया। घर लौटते समय उन्होंने अपनी नाराजगी और दर्द को शब्दों में ढाल दिया। इसी से उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ जन्मी। यह कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। यही से उनके साहित्यिक सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद 2023 में उनका पहला कविता संग्रह ‘मैन इन ए हरी: पोएम्स ऑफ ए फूड डिलीवरी राइडर’ प्रकाशित हुआ। पुरस्कार मिलने के बाद भी नौकरी नहीं छोड़ेंगे पुरस्कार जीतने के बाद वांग ने सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स से कहा कि पुरस्कार मिलने की खबर आने तक वे बेहद घबराए हुए थे। उन्होंने बताया कि मीडिया का बढ़ता ध्यान उनके लिए मानसिक दबाव भी लेकर आया। उन्होंने साफ किया कि पुरस्कार मिलने के बावजूद वे अपनी नौकरी नहीं छोड़ेंगे। उनका कहना है कि वे 60 साल की उम्र तक फूड डिलीवरी का काम जारी रखना चाहते हैं। वांग ने कहा, अब मुझे जीवनयापन के लिए इस नौकरी की जरूरत नहीं है, लेकिन मुझे यह काम पसंद है। इससे मैं सक्रिय और फिट रहता हूं। मैं जमीन से जुड़ी जिंदगी जीना चाहता हूं और यह पुरस्कार मुझे नहीं बदलेगा। चीन में बढ़ रही है मजदूर लेखकों की पहचान वांग जिबिंग उन ब्लू-कॉलर कामगारों की नई पीढ़ी का हिस्सा हैं, जिन्हें हाल के कुछ साल में उनके साहित्यिक लेखन के लिए पहचान मिली है। उनकी रचनाएं चीन की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी में काम करने वाले लाखों लोगों के संघर्ष, दबाव और जीवन की सच्चाई को सामने लाती हैं। साल 2023 में पूर्व डिलीवरी कर्मी हू आनयान की आत्मकथा ‘आई डिलीवर पार्सल्स इन बीजिंग’ प्रकाशित हुई थी। यह किताब चीन में बेस्टसेलर बनी और विदेशों में भी चर्चा का विषय रही। पिछले साल इसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। इसी तरह 2017 में प्रवासी मजदूर फान यूसु का आत्मकथात्मक लेख ‘आई एम फान यूसु’ चीन में इंटरनेट पर जबरदस्त वायरल हुआ था। इसे इतनी बड़ी प्रतिक्रिया मिली कि लगातार मीडिया की भीड़ से बचने के लिए फान को कुछ समय के लिए अपना घर तक छोड़ना पड़ा। लू शुन पुरस्कार चीन का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान वांग जिबिंग को जिस लू शुन साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, उसका नाम चीन के महान साहित्यकार लू शुन के नाम पर रखा गया है। उन्हें 20वीं सदी के चीन का सबसे प्रभावशाली लेखक माना जाता है। उन्होंने अपने व्यंग्यात्मक उपन्यासों और कहानियों के जरिए पारंपरिक चीनी समाज की कमियों और सामाजिक बुराइयों पर हमला बोला। लू शुन साहित्य पुरस्कार का आयोजन चाइना राइटर्स एसोसिएशन करता है। यह पुरस्कार हर चार साल में दिया जाता है और इसे चीन के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत समकालीन चीनी साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं को सम्मानित करने के लिए की गई थी। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, यह पुरस्कार लंबे समय से चीन के मुख्यधारा के साहित्य का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता रहा है और साहित्य जगत में इसका खास महत्व है।

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी का काम करने वाले 56 वर्षीय वांग जिबिंग को देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों में से एक लू शुन साहित्य पुरस्कार मिला है। उनकी कविता संग्रह ‘लो फ्लाइट’ को यह सम्मान दिया गया है। इस किताब की कई कविताएं उन्होंने फूड डिलीवरी के बीच मिले खाली समय में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लिखी थीं। वांग 2019 के आसपास फूड डिलीवरी राइडर बने थे। उनकी कविताएं सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुए। उनकी नई किताब ‘लो फ्लाइट’ डिलीवरी राइडर्स की रोजमर्रा की परेशानियों, संघर्ष और जीवन पर आधारित है। यह किताब उन्होंने 2024 में प्रकाशित की थी। इसके लिए उन्होंने करीब 200 डिलीवरी राइडर्स से बातचीत की और उनके अनुभवों को अपनी कविताओं में दर्ज किया। उनकी एक कविता की पंक्ति है, “किसने कहा कि पंख फैलाने का मतलब सिर्फ ऊंची उड़ान भरना है? नीचे उड़ना भी उड़ान ही है।” वांग का जन्म चीन के जियांगसू प्रांत में हुआ था। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें 14 साल की उम्र में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने निर्माण मजदूर, कबाड़ बीनने वाले और सड़क किनारे सामान बेचने जैसे कई छोटे-मोटे काम किए। बाद में वे फूड डिलीवरी राइडर बन गए। हालांकि, पढ़ने-लिखने का उनका शौक कभी खत्म नहीं हुआ। एक कविता से मिली पहचान 2022 में उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। यह कविता 2019 की एक घटना से प्रेरित थी। उस समय वह जियांगसू के कुनशान शहर में फूड डिलीवरी का काम कर रहे थे। एक ग्राहक ने गलत पता दर्ज कर दिया था। सही घर ढूंढने के लिए वांग को तीन रिहायशी इमारतों में भटकना पड़ा और 18 मंजिल तक सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं। जब वह आखिरकार खाना लेकर पहुंचे तो ग्राहक ने देर होने पर उन्हें डांट दिया। घर लौटते समय उन्होंने अपनी नाराजगी और दर्द को शब्दों में ढाल दिया। इसी से उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ जन्मी। यह कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। यही से उनके साहित्यिक सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद 2023 में उनका पहला कविता संग्रह ‘मैन इन ए हरी: पोएम्स ऑफ ए फूड डिलीवरी राइडर’ प्रकाशित हुआ। इस किताब की एक कविता में वह लिखते हैं, सड़क पर दौड़ता हर आम इंसान अपने हाथ में एक छोटी-सी रोशनी लिए चलता है। यही रोशनी पहले हमें रास्ता दिखाती है और फिर धीरे-धीरे पूरी दुनिया को रोशन कर देती है। 6 हजार से ज्यादा कविताएं लिख चुके वांग अब तक वह 6 हजार से अधिक कविताएं लिख चुके हैं। उनकी कई रचनाएं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वांग कहते हैं, “लोग शायद मुझे याद न रखें, लेकिन उन्हें तेज रफ्तार से गुजरता एक फूड डिलीवरी राइडर जरूर याद रहता है।” यही सोच उन्हें लाखों डिलीवरी कर्मियों की जिंदगी पर किताब लिखने की प्रेरणा बनी। वांग का कहना है, मैं चाहता हूं कि इस किताब को पढ़ने के बाद लोग डिलीवरी राइडर्स के प्रति ज्यादा समझदारी और धैर्य दिखाएं, ताकि उनके साथ होने वाले विवाद कम हों। पुरस्कार मिलने के बाद भी नौकरी नहीं छोड़ेंगे पुरस्कार जीतने के बाद वांग ने सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स से कहा कि पुरस्कार मिलने की खबर आने तक वे बेहद घबराए हुए थे। उन्होंने बताया कि मीडिया का बढ़ता ध्यान उनके लिए मानसिक दबाव भी लेकर आया। उन्होंने साफ किया कि पुरस्कार मिलने के बावजूद वे अपनी नौकरी नहीं छोड़ेंगे। उनका कहना है कि वे 60 साल की उम्र तक फूड डिलीवरी का काम जारी रखना चाहते हैं। वांग ने कहा, अब मुझे जीवनयापन के लिए इस नौकरी की जरूरत नहीं है, लेकिन मुझे यह काम पसंद है। इससे मैं सक्रिय और फिट रहता हूं। मैं जमीन से जुड़ी जिंदगी जीना चाहता हूं और यह पुरस्कार मुझे नहीं बदलेगा। चीन में बढ़ रही है मजदूर लेखकों की पहचान वांग जिबिंग उन ब्लू-कॉलर कामगारों की नई पीढ़ी का हिस्सा हैं, जिन्हें हाल के कुछ साल में उनके साहित्यिक लेखन के लिए पहचान मिली है। उनकी रचनाएं चीन की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी में काम करने वाले लाखों लोगों के संघर्ष, दबाव और जीवन की सच्चाई को सामने लाती हैं। साल 2023 में पूर्व डिलीवरी कर्मी हू आनयान की आत्मकथा ‘आई डिलीवर पार्सल्स इन बीजिंग’ प्रकाशित हुई थी। यह किताब चीन में बेस्टसेलर बनी और विदेशों में भी चर्चा का विषय रही। पिछले साल इसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। इसी तरह 2017 में प्रवासी मजदूर फान यूसु का आत्मकथात्मक लेख ‘आई एम फान यूसु’ चीन में इंटरनेट पर जबरदस्त वायरल हुआ था। इसे इतनी बड़ी प्रतिक्रिया मिली कि लगातार मीडिया की भीड़ से बचने के लिए फान को कुछ समय के लिए अपना घर तक छोड़ना पड़ा। लू शुन चीन का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान वांग जिबिंग को जिस लू शुन साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, उसका नाम चीन के महान साहित्यकार लू शुन के नाम पर रखा गया है। उन्हें 20वीं सदी के चीन का सबसे प्रभावशाली लेखक माना जाता है। उन्होंने अपने व्यंग्यात्मक उपन्यासों और कहानियों के जरिए पारंपरिक चीनी समाज की कमियों और सामाजिक बुराइयों पर हमला बोला। लू शुन साहित्य पुरस्कार का आयोजन चाइना राइटर्स एसोसिएशन करता है। यह पुरस्कार हर चार साल में दिया जाता है और इसे चीन के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत समकालीन चीनी साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं को सम्मानित करने के लिए की गई थी। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, यह पुरस्कार लंबे समय से चीन के मुख्यधारा के साहित्य का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता रहा है और साहित्य जगत में इसका खास महत्व है।

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

दिवंगत शायर निदा फाजली के जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘मैं निदा’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट आर्ट्स एंड कल्चर फिल्म’ का पुरस्कार मिला है। इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माता अतुल गंगवार पिछले करीब ढाई दशक तक निदा फाजली के बेहद करीब रहे। उन्होंने सिर्फ उनके साथ काम ही नहीं किया, बल्कि उनकी निजी जिंदगी, संघर्ष, रिश्तों और सोच को भी बहुत करीब से देखा। दैनिक भास्कर से बातचीत में अतुल गंगवार ने निदा फाजली की निजी जिंदगी, पाकिस्तान में बसे परिवार, पिता से जुड़ा दर्द, जगजीत सिंह के साथ उनकी दोस्ती और उनकी जिंदगी के कई अनसुने किस्से शेयर किए। सवाल: निदा फाजली से आपकी पहली मुलाकात कब हुई थी? जवाब: पहली मुलाकात 1998 में हुई थी। हम ‘अदबी कॉकटेल’ नाम का एक शो बना रहे थे और उसके लेखक निदा साहब थे। उसी दौरान उन्होंने हमारी मुलाकात तलत अजीज साहब, मुकरी साहब (मोहम्मद उमर मुकरी) और कई बड़े कलाकारों से कराई। वहीं से हमारा रिश्ता शुरू हुआ, जो सालों तक चलता रहा। सवाल: आखिर कब लगा कि निदा फाजली की जिंदगी पर डॉक्यूमेंट्री बननी चाहिए? जवाब: उनके साथ काम करते-करते एहसास हुआ कि वह सिर्फ बड़े शायर नहीं, बल्कि बहुत बड़े इंसान भी थे। उनके जरिए मैं जॉनी वॉकर, टुनटुन, हसन कमाल, जावेद सिद्दीकी, राकेश बेदी और कई दिग्गजों से मिला। उन्होंने मुझे जिंदगी को देखने का नजरिया दिया। तभी लगा कि उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए। सवाल: निदा फाजली के परिवार का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया था। क्या वह इस दर्द के बारे में आपसे बात करते थे? जवाब: निजी तौर पर वह इस बारे में बहुत कम बात करते थे, लेकिन जो कहना होता था, वह अपनी शायरी में कह देते थे। अपने पिता के इंतकाल के बाद, जब वह उनके जनाजे में शामिल नहीं हो पाए, तब उन्होंने मशहूर नज्म ‘तुम्हारी कब्र पर मैं फातिहा पढ़ने नहीं आया’ लिखी। उसमें उनका पूरा दर्द दिखाई देता है। सवाल: निदा फाजली अपनी मां और पिता को किस तरह याद करते थे? जवाब: मां के लिए उन्होंने लिखा- ‘बेसन की सोंधी रोटी पे खट्टी चटनी जैसी मां।’ पिता के लिए उनकी नज्म आज भी पढ़िए तो आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन बातचीत में वह कभी अतीत में नहीं जीते थे। उनका पूरा ध्यान वर्तमान और भविष्य पर रहता था। सवाल: निदा फाजली के साथ जुड़ा कोई ऐसा किस्सा जो आज भी याद हो? जवाब: एक बार मैं उनके घर गया तो उनके हाथ में चोट लगी थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” हंसते हुए बोले, “मुशायरे में थक गया था। मंच पर पीछे टेंट समझकर टिक गया। पता चला पीछे कुछ नहीं था और सीधे नीचे गिर गया।” सबसे बड़ी बात यह थी कि वह खुद पर भी खुलकर हंस सकते थे। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह से जुड़ा कोई खास किस्सा जो आपको आज भी याद हो? जवाब: एक बार मुझे किसी बच्ची के लिए रिकमेंडेशन लेटर चाहिए था। निदा साहब ने एयरपोर्ट बुलाया। वहां जगजीत सिंह और के एस चित्रा भी मौजूद थे। मेरे पास खाली कागज था। निदा साहब ने वहीं तुरंत अपने हाथ से रिकमेंडेशन लिख दिया और जगजीत सिंह से उस पर साइन करवा दिए। उनकी हाजिरजवाबी और समझ कमाल की थी। एक बार का किस्सा मुझे बहुत अच्छे से याद है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के मेरे एक प्रोफेसर थे। उनकी भतीजी के कुछ डॉक्यूमेंट्स पर साइन कराने थे। एक तरह का एप्रिसिएशन उनके लिए कि वो बच्ची बहुत अच्छा गाती है। तो मैंने निदा साहब से बात की। वो बोले, “मैं दिल्ली आ रहा हूं, तो तुम एयरपोर्ट मुझसे मिलने आ जाओ।” मैं वहां पहुंचा तो देखा कि साथ में जगजीत सिंह जी, चित्रा जी और निदा साहब तो थे ही। मैंने उनसे कहा, “जी, वो चिट्ठी चाहिए आपसे।” वो बोले, “लाओ।” मैं वहीं पास के एक काउंटर से कागज लेकर आया। उनके पास पहुंचा तो फिर उन्होंने जगजीत सिंह जी से कहा, “चलो, इस पर साइन कर दो।” कागज ब्लैंक था। चित्रा जी पीछे खड़ी थीं। जगजीत सिंह जी ने पीछे मुड़कर देखा तो चित्रा जी देख रही थीं कि भई, ये ब्लैंक पेपर पर साइन तो नहीं कर रहे। ब्लैंक पेपर पर साइन करना बड़ी बात है। निदा साहब समझ गए। उन्होंने खट से अपने हाथ से एक एप्रिसिएशन लेटर लिखा और फिर उस पर जगजीत सिंह जी के साइन करवा दिए। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह की दोस्ती कैसी थी? जवाब: दोनों का रिश्ता सिर्फ प्रोफेशनल नहीं, बहुत व्यक्तिगत भी था। जगजीत सिंह की सबसे चर्चित एल्बम ‘इनसाइट’ में निदा साहब की लिखी गजलें थीं। दोनों अक्सर साथ बैठते थे। हारमोनियम निकलता था और वहीं बैठकर नई गजलें तैयार होती थीं। सवाल: क्या निदा फाजली और जगजीत सिंह के बीच कभी मजेदार नोकझोंक भी होती थी? जवाब: एक बार हमारे एक परिचित को जगजीत सिंह का शो कराना था। मैंने निदा साहब से कहा कि आप बात कर देंगे तो शायद फीस कम हो जाएगी। उन्होंने हंसते हुए कहा, “मेरा नाम मत लेना। अगर मेरा नाम लिया तो वो तुम्हें डिस्काउंट नहीं देगा, उल्टा मुझे किसी मुशायरे में मुफ्त में पढ़ने बुला लेगा।” बाद में हुआ यह कि जगजीत सिंह ने अपनी फीस तो पूरी रखी, लेकिन पूरे शो की स्पॉन्सरशिप ही करवा दी। यानी आयोजकों पर कोई बोझ नहीं पड़ा। यही दोनों की दोस्ती थी। सवाल: डॉक्यूमेंट्री बनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? जवाब: सबसे बड़ी चुनौती थी सालों की यादों और फुटेज को समेटना। दूसरी चुनौती यह थी कि लेखकों को फिल्म इंडस्ट्री उतना याद नहीं रखती, जितना अभिनेता या निर्देशक को रखती है। लेकिन जिन लोगों ने सच में निदा साहब को जाना था, उन्होंने हमारी हर संभव मदद की। सवाल: क्या किसी कलाकार ने भी इस सफर में मदद की? जवाब: जी हां। सिंगर शान ने बिना किसी हिचकिचाहट के इंटरव्यू दिया। उनके पिता मानस मुखर्जी, निदा साहब के बहुत अच्छे दोस्त थे। उन्होंने अपने पिता और निदा साहब के रिश्ते पर खुलकर बात की। इससे डॉक्यूमेंट्री और समृद्ध हुई। सवाल: पाकिस्तान में निदा फाजली की एक शायरी पर काफी विवाद हुआ था। जवाब: जी। उन्होंने पढ़ा था- ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें,

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

दिवंगत शायर निदा फाजली के जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘मैं निदा’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट आर्ट्स एंड कल्चर फिल्म’ का पुरस्कार मिला है। इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माता अतुल गंगवार पिछले करीब ढाई दशक तक निदा फाजली के बेहद करीब रहे। उन्होंने सिर्फ उनके साथ काम ही नहीं किया, बल्कि उनकी निजी जिंदगी, संघर्ष, रिश्तों और सोच को भी बहुत करीब से देखा। दैनिक भास्कर से बातचीत में अतुल गंगवार ने निदा फाजली की निजी जिंदगी, पाकिस्तान में बसे परिवार, पिता से जुड़ा दर्द, जगजीत सिंह के साथ उनकी दोस्ती और उनकी जिंदगी के कई अनसुने किस्से शेयर किए। सवाल: निदा फाजली से आपकी पहली मुलाकात कब हुई थी? जवाब: पहली मुलाकात 1998 में हुई थी। हम ‘अदबी कॉकटेल’ नाम का एक शो बना रहे थे और उसके लेखक निदा साहब थे। उसी दौरान उन्होंने हमारी मुलाकात तलत अजीज साहब, मुकरी साहब (मोहम्मद उमर मुकरी) और कई बड़े कलाकारों से कराई। वहीं से हमारा रिश्ता शुरू हुआ, जो सालों तक चलता रहा। सवाल: आखिर कब लगा कि निदा फाजली की जिंदगी पर डॉक्यूमेंट्री बननी चाहिए? जवाब: उनके साथ काम करते-करते एहसास हुआ कि वह सिर्फ बड़े शायर नहीं, बल्कि बहुत बड़े इंसान भी थे। उनके जरिए मैं जॉनी वॉकर, टुनटुन, हसन कमाल, जावेद सिद्दीकी, राकेश बेदी और कई दिग्गजों से मिला। उन्होंने मुझे जिंदगी को देखने का नजरिया दिया। तभी लगा कि उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए। सवाल: निदा फाजली के परिवार का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया था। क्या वह इस दर्द के बारे में आपसे बात करते थे? जवाब: निजी तौर पर वह इस बारे में बहुत कम बात करते थे, लेकिन जो कहना होता था, वह अपनी शायरी में कह देते थे। अपने पिता के इंतकाल के बाद, जब वह उनके जनाजे में शामिल नहीं हो पाए, तब उन्होंने मशहूर नज्म ‘तुम्हारी कब्र पर मैं फातिहा पढ़ने नहीं आया’ लिखी। उसमें उनका पूरा दर्द दिखाई देता है। सवाल: निदा फाजली अपनी मां और पिता को किस तरह याद करते थे? जवाब: मां के लिए उन्होंने लिखा- ‘बेसन की सोंधी रोटी पे खट्टी चटनी जैसी मां।’ पिता के लिए उनकी नज्म आज भी पढ़िए तो आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन बातचीत में वह कभी अतीत में नहीं जीते थे। उनका पूरा ध्यान वर्तमान और भविष्य पर रहता था। सवाल: निदा फाजली के साथ जुड़ा कोई ऐसा किस्सा जो आज भी याद हो? जवाब: एक बार मैं उनके घर गया तो उनके हाथ में चोट लगी थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” हंसते हुए बोले, “मुशायरे में थक गया था। मंच पर पीछे टेंट समझकर टिक गया। पता चला पीछे कुछ नहीं था और सीधे नीचे गिर गया।” सबसे बड़ी बात यह थी कि वह खुद पर भी खुलकर हंस सकते थे। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह से जुड़ा कोई खास किस्सा जो आपको आज भी याद हो? जवाब: एक बार मुझे किसी बच्ची के लिए रिकमेंडेशन लेटर चाहिए था। निदा साहब ने एयरपोर्ट बुलाया। वहां जगजीत सिंह और के एस चित्रा भी मौजूद थे। मेरे पास खाली कागज था। निदा साहब ने वहीं तुरंत अपने हाथ से रिकमेंडेशन लिख दिया और जगजीत सिंह से उस पर साइन करवा दिए। उनकी हाजिरजवाबी और समझ कमाल की थी। एक बार का किस्सा मुझे बहुत अच्छे से याद है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के मेरे एक प्रोफेसर थे। उनकी भतीजी के कुछ डॉक्यूमेंट्स पर साइन कराने थे। एक तरह का एप्रिसिएशन उनके लिए कि वो बच्ची बहुत अच्छा गाती है। तो मैंने निदा साहब से बात की। वो बोले, “मैं दिल्ली आ रहा हूं, तो तुम एयरपोर्ट मुझसे मिलने आ जाओ।” मैं वहां पहुंचा तो देखा कि साथ में जगजीत सिंह जी, चित्रा जी और निदा साहब तो थे ही। मैंने उनसे कहा, “जी, वो चिट्ठी चाहिए आपसे।” वो बोले, “लाओ।” मैं वहीं पास के एक काउंटर से कागज लेकर आया। उनके पास पहुंचा तो फिर उन्होंने जगजीत सिंह जी से कहा, “चलो, इस पर साइन कर दो।” कागज ब्लैंक था। चित्रा जी पीछे खड़ी थीं। जगजीत सिंह जी ने पीछे मुड़कर देखा तो चित्रा जी देख रही थीं कि भई, ये ब्लैंक पेपर पर साइन तो नहीं कर रहे। ब्लैंक पेपर पर साइन करना बड़ी बात है। निदा साहब समझ गए। उन्होंने खट से अपने हाथ से एक एप्रिसिएशन लेटर लिखा और फिर उस पर जगजीत सिंह जी के साइन करवा दिए। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह की दोस्ती कैसी थी? जवाब: दोनों का रिश्ता सिर्फ प्रोफेशनल नहीं, बहुत व्यक्तिगत भी था। जगजीत सिंह की सबसे चर्चित एल्बम ‘इनसाइट’ में निदा साहब की लिखी गजलें थीं। दोनों अक्सर साथ बैठते थे। हारमोनियम निकलता था और वहीं बैठकर नई गजलें तैयार होती थीं। सवाल: क्या निदा फाजली और जगजीत सिंह के बीच कभी मजेदार नोकझोंक भी होती थी? जवाब: एक बार हमारे एक परिचित को जगजीत सिंह का शो कराना था। मैंने निदा साहब से कहा कि आप बात कर देंगे तो शायद फीस कम हो जाएगी। उन्होंने हंसते हुए कहा, “मेरा नाम मत लेना। अगर मेरा नाम लिया तो वो तुम्हें डिस्काउंट नहीं देगा, उल्टा मुझे किसी मुशायरे में मुफ्त में पढ़ने बुला लेगा।” बाद में हुआ यह कि जगजीत सिंह ने अपनी फीस तो पूरी रखी, लेकिन पूरे शो की स्पॉन्सरशिप ही करवा दी। यानी आयोजकों पर कोई बोझ नहीं पड़ा। यही दोनों की दोस्ती थी। सवाल: डॉक्यूमेंट्री बनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? जवाब: सबसे बड़ी चुनौती थी सालों की यादों और फुटेज को समेटना। दूसरी चुनौती यह थी कि लेखकों को फिल्म इंडस्ट्री उतना याद नहीं रखती, जितना अभिनेता या निर्देशक को रखती है। लेकिन जिन लोगों ने सच में निदा साहब को जाना था, उन्होंने हमारी हर संभव मदद की। सवाल: क्या किसी कलाकार ने भी इस सफर में मदद की? जवाब: जी हां। सिंगर शान ने बिना किसी हिचकिचाहट के इंटरव्यू दिया। उनके पिता मानस मुखर्जी, निदा साहब के बहुत अच्छे दोस्त थे। उन्होंने अपने पिता और निदा साहब के रिश्ते पर खुलकर बात की। इससे डॉक्यूमेंट्री और समृद्ध हुई। सवाल: पाकिस्तान में निदा फाजली की एक शायरी पर काफी विवाद हुआ था। जवाब: जी। उन्होंने पढ़ा था- ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें,

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा; ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं जेडी वेंस

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा; ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं जेडी वेंस

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और उनकी पत्नी उषा वेंस के घर चौथे बच्चे का जन्म हुआ है। 19 जुलाई की सुबह उनके बेटे एलेक नील वेंस का जन्म हुआ। इसके साथ ही 150 साल से ज्यादा पुराना एक रिकॉर्ड भी टूट गया। वेंस 1870 के बाद ऐसे पहले मौजूदा अमेरिकी उपराष्ट्रपति बन गए हैं, जिनके कार्यकाल के दौरान उनके घर बच्चे का जन्म हुआ है। टाइम मैगजीन के मुताबिक, इससे पहले ऐसा 1870 में हुआ था। उस समय राष्ट्रपति यूलिसिस एस. ग्रांट के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति शायलर कोलफैक्स की पत्नी एलेन कोलफैक्स ने बेटे शायलर कोलफैक्स को जन्म दिया था। जेडी वेंस ने सोशल मीडिया पर चौथे बच्चे की खुशखबरी साझा करते हुए लिखा, उषा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। हमारे तीनों बच्चे अपने छोटे भाई से मिलकर बेहद खुश हैं। एलेक नील वेंस, जेडी और उषा वेंस की चौथी संतान हैं। उनसे पहले उनके तीन बच्चे इवान (9 वर्ष), विवेक (6 वर्ष) और मिराबेल (4 वर्ष) हैं। भारतीय मूल की हैं उषा वेंस उषा वेंस का जन्म और पालन-पोषण कैलिफोर्निया के सैन डिएगो में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे। उनके पिता मैकेनिकल इंजीनियर हैं, जबकि मां मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट हैं। उषा और जेडी वेंस की मुलाकात 2010 में येल लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान हुई थी। बाद में दोनों ने शादी की। ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं वेंस जेडी वेंस ट्रम्प सरकार के उन प्रमुख नेताओं में रहे हैं, जो अमेरिका में जन्मदर बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं। अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब में उन्होंने लिखा है कि उषा शुरुआत में चौथा बच्चा नहीं चाहती थीं, लेकिन बाद में उन्होंने अपना फैसला बदल लिया।

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा हुआ; ज्यादा बच्चों के पक्षधर हैं वेंस

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा; ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं जेडी वेंस

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और उनकी पत्नी उषा वेंस के घर चौथे बच्चे का जन्म हुआ है। 19 जुलाई की सुबह उनके बेटे एलेक नील वेंस का जन्म हुआ। 150 साल से ज्यादा समय बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी मौजूदा अमेरिकी उपराष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान उनके घर बच्चे का जन्म हुआ है। टाइम मैगजीन के मुताबिक, इससे पहले ऐसा 1870 में हुआ था। उस समय राष्ट्रपति यूलिसिस एस. ग्रांट के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति शायलर कोलफैक्स की पत्नी एलेन कोलफैक्स ने बेटे शायलर कोलफैक्स को जन्म दिया था। जेडी वेंस ने सोशल मीडिया पर चौथे बच्चे की खुशखबरी साझा करते हुए लिखा, उषा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। हमारे तीनों बच्चे अपने छोटे भाई से मिलकर बेहद खुश हैं। एलेक नील वेंस, जेडी और उषा वेंस की चौथी संतान हैं। उनसे पहले उनके तीन बच्चे इवान (9 वर्ष), विवेक (6 वर्ष) और मिराबेल (4 वर्ष) हैं। भारतीय मूल की हैं उषा वेंस उषा वेंस का जन्म और पालन-पोषण कैलिफोर्निया के सैन डिएगो में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे। उनके पिता मैकेनिकल इंजीनियर हैं, जबकि मां मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट हैं। उषा और जेडी वेंस की मुलाकात 2010 में येल लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान हुई थी। बाद में दोनों ने शादी की। ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं वेंस जेडी वेंस ट्रम्प सरकार के उन प्रमुख नेताओं में रहे हैं, जो अमेरिका में जन्मदर बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिका में गिरती जन्मदर भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है। इसी वजह से उन्होंने टैक्स छूट, परिवारों के लिए आर्थिक मदद और बच्चों वाले परिवारों को अधिक समर्थन देने जैसी नीतियों की पैरवी की है। अपनी हाल ही में रिलीज हुई किताब कम्युनियन में वेंस ने अपनी निजी जिंदगी का भी जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि वे कई साल से पत्नी उषा वेंस से चौथा बच्चा करने की बात कहते रहे, लेकिन उषा का मानना था कि तीन बच्चों के बाद उनका परिवार पूरा हो चुका है। सार्वजनिक जीवन में आने के बाद वह चौथा बच्चा नहीं चाहती थीं। चौथे बच्चे के लिए उषा को मनाया इस साल मिशिगन में व्हाइट हाउस के एक कार्यक्रम में जेडी वेंस ने मजाकिया अंदाज में बताया था कि उन्होंने उषा को चौथे बच्चे के लिए कैसे राजी किया। उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने से पहले उन्होंने उषा से कहा था, “मैं चौथा बच्चा चाहता हूं।” इस पर उषा ने जवाब दिया, “ठीक है, लेकिन तुम्हें अमेरिका का उपराष्ट्रपति बनना है या चौथा बच्चा चाहिए, दोनों एक साथ नहीं मिल सकते।” वेंस ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं अपनी बात मनवाने में काफी अच्छा हूं, क्योंकि आज मेरे पास दोनों हैं।” वेंस के मुताबिक, यह सोच तब बदली जब 2025 में उनके करीबी दोस्त और एक्टिविस्ट चार्ली किर्क की हत्या हो गई। अंतिम संस्कार के दौरान उषा की मुलाकात चार्ली किर्क की पत्नी एरिका किर्क से हुई। वेंस लिखते हैं कि एरिका ने रोते हुए उषा से कहा कि उन्हें अफसोस है कि उनके और चार्ली के केवल दो ही बच्चे थे। इस बातचीत का उषा पर गहरा असर पड़ा और कुछ समय बाद उन्होंने चौथे बच्चे के लिए हामी भर दी। भारतीय मूल के ससुराल वालों की कर चुके हैं तारीफ जेडी वेंस कई बार अपने भारतीय मूल के ससुराल वालों की खुलकर तारीफ कर चुके हैं। इस साल एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि उनके सास-ससुर इस बात का उदाहरण हैं कि प्रवासियों ने अमेरिका को किस तरह समृद्ध बनाया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिकी नागरिक बनने के बाद देश के हितों को सबसे पहले रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी होती है। उन्होंने कहा था, “मैं भारत से आए प्रवासियों की बेटी से विवाहित हूं। मुझे अपने सास-ससुर से बहुत प्यार है। वे शानदार लोग हैं और उन्होंने अमेरिका के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।”