खाड़ी संकट: रईस ग्राहक टाल रहे महंगी कारों की खरीदारी:देश में बिकीं रिकॉर्ड 47 लाख कारें, पर लग्जरी सेगमेंट की हिस्सेदारी महज 1%

देश में वित्त वर्ष 2025-26 में कारों की बिक्री 13% बढ़कर रिकॉर्ड 47 लाख रही, लेकिन लग्जरी कारों की हिस्सेदारी 1% ही है। बीएमडब्ल्यू इंडिया के प्रेसिडेंट हरदीप सिंह बरार के मुताबिक पश्चिम एशिया तनाव ने खरीदारों के सेंटिमेंट को प्रभावित किया है, जिससे वे बड़ी खरीदारी टाल रहे हैं। मर्सिडीज-बेंज इंडिया के एमडी व सीईओ संतोष अय्यर ने भी माना कि वैश्विक हालात के कारण इस साल लग्जरी मार्केट फ्लैट रह सकता है। हालांकि मर्सिडीज-बेंज इंडिया ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 19,363 यूनिट्स की बिक्री की, जो किसी एक वित्त वर्ष का सबसे शानदार प्रदर्शन है। इससे पिछले साल 18,928 यूनिट्स बेची थी। मर्सिडीज की इस कामयाबी के पीछे सबसे बड़ा हाथ ‘टॉप-एंड लग्जरी’ सेगमेंट का रहा। अमीर ग्राहकों की बढ़ती पसंद के चलते इस सेगमेंट में वित्त वर्ष 2025-26 में 16% की वृद्धि देखी गई, जबकि साल मार्च तिमाही में यह उछाल 25% तक जा पहुंचा। लग्जरी कारों में ईवी की मांग 83% बढ़ी ईंधन की कीमतें बढ़ने के डर से ग्राहक तेजी से इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (ईवी) की ओर बढ़ रहे हैं। जनवरी-मार्च में बीएमडब्ल्यू की इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री 83% उछाल के साथ 1,185 तक पहुंच गई। अब कंपनी की कुल बिक्री में ईवी की हिस्सेदारी 26% है। मर्सिडीज की 1.4 करोड़ रुपए से महंगी इलेक्ट्रिक कारों की मांग भी 85% बढ़ी है। मर्सिडीज की इस कामयाबी के पीछे सबसे बड़ा हाथ ‘टॉप-एंड लग्जरी’ सेगमेंट का रहा। अमीर ग्राहकों की बढ़ती पसंद के चलते इस सेगमेंट में वित्त वर्ष 2025-26 में 16% की वृद्धि देखी गई, जबकि साल मार्च तिमाही में यह उछाल 25% तक जा पहुंचा।
Work begins on Sunny’s ‘Border 3’, Sunny Deol, Border 3

अमित कर्ण. मुंबई4 मिनट पहले कॉपी लिंक सनी की ‘बॉर्डर 3’ को 2027 का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट माना जा रहा है। यह सनी की देशभक्ति वाली इमेज को एक बार फिर बड़े स्तर पर स्थापित करेगा। – फाइल फोटो सनी देओल और वरुण धवन स्टारर ‘बॉर्डर 2’ की सफलता के बाद अब जेपी फिल्म्स ने आने वाले वर्षों के लिए बड़ा रोडमैप तैयार कर लिया है। 362 करोड़ के घरेलू कलेक्शन के साथ फिल्म ने यह साबित कर दिया कि देशभक्ति और रियल-लाइफ हीरोइज्म का क्रेज आज भी दर्शकों के बीच बरकरार है। इसी सफलता को आगे बढ़ाते हुए निर्माता निधि दत्ता ने एक मेगा प्लान तैयार किया है, जिसके केंद्र में सनी को रखा गया है। ‘बॉर्डर 3’ पर काम शुरू हो चुका है। सनी ही मुख्य चेहरा बने रहेंगे। ‘बॉर्डर 3’ से सनी की देशभक्ति की इमेज फिर मजबूत होगी सनी की ‘बॉर्डर 3’ को 2027 का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट माना जा रहा है। यह सनी की देशभक्ति वाली इमेज को एक बार फिर बड़े स्तर पर स्थापित करेगा। वहीं नितेश तिवारी की ‘रामायणम्’ में सनी का ‘हनुमान’ के रूप में नजर आना उनके करियर का एक नया और दिलचस्प अध्याय होगा। वह फिल्म के दोनों पार्ट्स में नजर आएंगे। वायुसेना पर एक नई फिल्म भी शुरू करेगा जेपी फिल्म्स जेपी फिल्म्स अब अपने पारंपरिक वॉर जोन से बाहर निकलते हुए एक बड़े बजट की फैंटेसी एडवेंचर फ्रेंचाइज पर भी काम कर रहा है। यह प्रोजेक्ट स्टूडियो के लिए एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इसकी कहानी और राइटिंग प्रोसेस में खुद निधि शामिल हैं और यह देश की कई लोकेशंस में शूट होगी। चर्चा है कि इस प्रोजेक्ट में भी सनी का कैमियो हो सकता है। जेपी फिल्म्स भारतीय वायुसेना पर भी एक नई फिल्म भी शुरू करने जा रहा है। करियर को काफी रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं सनी ‘गदर 2’ की जबरदस्त सफलता के बाद सनी ने अपने करियर की दिशा को काफी रणनीतिक तरीके से आगे बढ़ाया है। अब उनका फोकस ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर है, जो उन्हें सिर्फ स्टार ही नहीं, बल्कि बॉक्स ऑफिस का मजबूत पिलर भी बनाए रखें। 2027 तक सनी के पास कई फिल्में हैं जो 1000 करोड़ क्लब तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं। इस लाइनअप में ‘सफर’ नाम की एक इमोशनल ड्रामा है, जिसकी शूटिंग पूरी हो चुकी है। निधि दत्ता पर भी है विरासत को आगे ले जाने की चुनौती निधि ने ‘पलटन’ और ‘घुड़चढ़ी’ जैसी फिल्मों के जरिए अपनी पहचान बनाई है। अब उनके कंधों पर ‘बॉर्डर’ जैसी विरासत को आगे ले जाने का मौका है। ‘बॉर्डर 2′ ने यह साबित किया कि बड़े परदे पर सनी का गुस्सा आज भी दर्शक जुटा सकता है। बता दें कि एक तरफ सनी जहां ‘बॉर्डर 3′ और एयर फोर्स ड्रामा में देशभक्ति का जज्बा जगाएंगे, वहीं ‘फैंटेसी एडवेंचर’ के जरिए अलग अवतार में दिखेंगे। जेपी फिल्म्स की ओर से अगले कुछ महीनों में ‘बॉर्डर 3′ की आधिकारिक कास्टिंग अनाउंस होगी। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
पहली बार असंगठित निर्माण क्षेत्र का विश्लेषण:करीब एक करोड़ परिवारों ने अपने घर खुद बनाए, 75% मकान गांवों में बने

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एनएसओ) ने एक तकनीकी रिपोर्ट जारी की है जिसमें गैर-पंजीकृत (अन-इनकॉरपोरेटेड) निर्माण एजेंसियों और परिवारों द्वारा बीते साल भर में किए गए कंस्ट्रक्शन पर एक पायलट अध्ययन के प्रमुख नतीजे बताए गए हैं। एनएसओ के अनुसार देश में अन-इनकॉरपोरेटेड कंस्ट्रक्शन में मुख्य गतिविधि करीब 1 करोड़ (सही संख्या 98.5 लाख) परिवारों द्वारा खुद के रहने के लिए खुद बनवाए जा रहे मकानों की वजह से है। कंस्ट्रक्शन में लगीं अन-इनकॉरपोरेटेड एजेंसियों की संख्या करीब 11 लाख थी। महाराष्ट्र (1.3 लाख), केरल (94,000) और कर्नाटक (90,000) में गैर-पंजीकृत निर्माण एजेंसियों की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश (13.8 लाख), ओडिशा (7.6 लाख) और महाराष्ट्र (7.5 लाख) घरेलू स्तर पर निर्माण में आगे थे। 97% परिवारों को खुद की आय पर ज्यादा भरोसा रिपोर्ट के मुताबिक 97% परिवारों ने निर्माण के लिए अपनी आय पर भरोसा किया। उन्होंने कुल खर्च का करीब 77% अपने पास से लगाया। 21% परिवारों ने लागत का करीब 17% संस्थागत कर्ज लिया। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों (23%) की भागीदारी शहरी (13%) की तुलना में अधिक थी। ये औपचारिक ऋण तक पहुंच में सुधार का संकेत है। निर्माण लागत में 75% हिस्सा मटेरियल का था। लेबर कॉस्ट करीब 22% थी। ईंट, सीमेंट, स्टील जैसी सामग्रियों का कुल मटेरियल कॉस्ट में 60% हिस्सा था। घरेलू निर्माण खर्च का तीन-चौथाई मटेरियल पर मद – घरेलू – संस्थान ईंट – 20.7% – 13.3% लोहा और स्टील – 20.6% – 16.4% सीमेंट/उत्पाद – 19.4% – 19.6% लकड़ी – 6.7% – 7.3% प्लास्टिक उत्पाद – 4.1% – 4.7% पेंट, वार्निश आदि – 5.6% – 10.7% सेनिटरी वेयर – 3.1% – 2.0% अन्य खर्च – 19.8% – 26.0% शहरों के बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में निर्माण अधिक जुलाई से दिसंबर 2025 तक हुए इस अध्ययन में पाया गया है कि निर्माण गतिविधियों में ग्रामीण क्षेत्रों का दबदबा है। ग्रामीण क्षेत्रों में 6.5 लाख गैर-पंजीकृत एजेंसी निर्माण कार्यों में संलग्न थीं। शहरी इलाकों में ये संख्या करीब 3.7 लाख थी। घरेलू निर्माण में 75.1 लाख ग्रामीण इलाकों में हुए, शहरों में करीब 23.4 लाख निर्माण हुए।
अमेरिका के 60 मेडिकल संस्थानों में ‘पाक-कला’ कोर्स में:सिर्फ डाइट नहीं बदलेंगे डॉक्टर, खाना बनाने का तरीका बताकर भी बीमारी दूर करेंगे

लॉरेन एस्टेस के हाथ बहुत सधे हुए हैं। टफ्ट्स मेडिकल स्कूल की यह छात्रा जब सुआ की पत्तियों को काटती है, तो एकाग्रता वैसी ही होती है जैसी सर्जन की ऑपरेशन थिएटर में। लॉरेन का सपना एक दिन बच्चों की सुरक्षित डिलीवरी कराना है, पर अभी प्राथमिकता कुछ और है… बेहतरीन ‘छोले’ बनाना। लॉरेन अकेली नहीं है। साथ में 14 और छात्र-जो भविष्य के डॉक्टर, डेंटिस्ट व डाइटिशियन हैं, इन दिनों रसोई में पसीना बहा रहे हैं। यह आम कुकिंग क्लास नहीं है, बल्कि टफ्ट्स यूनिवर्सिटी का ‘कलिनरी मेडिसिन’ कोर्स है। अमेरिका के 60 से ज्यादा मेडिकल संस्थानों में यह पाठ्यक्रम अपनाया जा रहा है, जहां डॉक्टरों को किताबी पोषण ही नहीं, बल्कि रसोई साक्षरता भी सिखाई जा रही है। इसका मुख्य विचार ‘फूड इज मेडिसिन’ (भोजन ही औषधि है) अभियान को बढ़ावा देना है, ताकि डॉक्टर सिर्फ डाइट बदलने की सलाह ही न दें, बल्कि उन्हें यह भी समझा सकें कि स्वस्थ भोजन कैसे बनाएं। यानी सिर्फ ये बताना काफी नहीं है कि खाना सेहत के लिए अच्छा है। उन्हें सीखना होगा कि डायबिटीज, किडनी व दिल के रोगों में कौन सी सब्जी दवा की तरह काम कर सकती है। रिटायर्ड पुलिस अफसर चक सेल्फ इस बदलाव के बड़े गवाह हैं। 4 साल पहले उन्हें डायबिटीज व दिल की बीमारी ने इस कदर जकड़ा था कि पैर काटने तक की नौबत आ गई थी। इंसुलिन इंजेक्शन जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे। डॉक्टर ने दवाइयों के साथ-साथ ‘मेडिकली टेलर्ड भोजन’ का पर्चा लिखा। चक बताते हैं,‘डॉक्टर्स ने मुझे वह खिलाया जो हमारे पूर्वज खाते थे- बीन्स, दालें, मोटा अनाज।’ नतीजे चमत्कारिक थे। चक का वजन घटा, शुगर लेवल सुधरा और दवाइयां कम हो गई। वे कहते हैं, भोजन ने मुझे फिर से जीना सिखाया।’ यह बदलाव डॉक्टरों को भी बदल रहा है। शेफ मिशेल निशन कहते हैं,‘कई डॉक्टर ‘टॉप शेफ’ जैसे कुकिंग शो के दीवाने हो गए हैं।’ जब एक डॉक्टर करछुल थामता है, तो वह इलाज की नई परिभाषा लिखता है, जहां स्वास्थ्य की नींव अस्पताल के बेड पर नहीं, बल्कि रसोई में रखी जाती है। यह पहल ऐसी मेडिकल व्यवस्था की शुरुआत है, जहां डॉक्टर सिर्फ,‘बीमारी का इलाज’ नहीं, बल्कि ‘पूर्ण स्वास्थ्य का निर्माण’ करेंगे। जैसे इन दिनों लॉरेन प्रोजेक्ट के लिए हैती की गर्भवती महिला के लिए भिंडी और मसूर की दाल मिलाकर कुछ नया रच रही हैं जो उसकी सांस्कृतिक पसंद के करीब हो और साथ ही भ्रूण के विकास के लिए जरूरी तत्वों से भरपूर भी हो। शोध भी यही बताते हैं कि यदि डॉक्टर खुद खाना पकाने के बारे में जानते हैं, तो वे इलाज में भोजन को प्रभावी उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने को लेकर आश्वस्त होते हैं। सलाह काफी नहीं, पूरी जानकारी होना जरूरी कलिनरी मेडिसिन कोर्स की डायरेक्टर नादिन तासाबेजी कहती हैं,‘मरीज को प्रोटीन खाने की सलाह देना काफी नहीं है। डॉक्टर को उस वस्तु के दाम, पकाने में लगने वाला समय और वह मरीज के स्वाद व परंपरा की अनुसार हैं भी या नहीं… पता होना चाहिए।’
एफ-1 टीम मर्सिडीज के बॉस का फलसफा:प्यार करने के लिए कोई अपना हो, कोई सार्थक काम हो और पूरा करने के लिए सपना हो

फॉर्मूला-1 की दुनिया में मर्सिडीज टीम के बॉस और सीईओ टोटो वोल्फ की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। 2014 से 2020 तक लगातार सात ड्राइवर्स चैम्पियनशिप जीतने वाली उनकी टीम 2026 में फिर टॉप पर है। सफलता के शिखर पर बैठे वोल्फ मानते हैं कि एक खुशहाल और संतुष्ट जीवन के लिए तीन चीजें सबसे ज्यादा जरूरी हैं- प्यार करने के लिए कोई अपना हो, करने के लिए कोई सार्थक काम हो और पूरा करने के लिए कोई सपना हो। खाली बैठना इंसान को नकारात्मकता की ओर ले जाता है और बिना सपनों के इंसान कितनी भी बड़ी कामयाबी हासिल कर ले, वह डिप्रेशन का शिकार हो सकता है। छह बिलियन डॉलर (लगभग 55 हजार करोड़ रुपए) का साम्राज्य चलाने वाले वोल्फ का मानना है कि फॉर्मूला वन सिर्फ मशीनों और डेटा का खेल नहीं है, बल्कि यह इंसानी जज्बातों से गहराई से जुड़ा है। उनका तर्क है कि फैसले डेटा नहीं, बल्कि इंसान लेते हैं। उनकी इस गहरी मानवीय सोच और मजबूत लीडरशिप के पीछे बचपन का कड़ा संघर्ष है। पिता की गंभीर बीमारी के बाद 8-9 साल की उम्र में ही उन पर छोटी बहन की जिम्मेदारी आ गई। आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने उन्हें एक प्राइवेट स्कूल में भेजा था, लेकिन फीस न भर पाने के कारण अक्सर उन्हें और बहन को क्लास से बाहर कर दिया जाता था। उस दर्दनाक अपमान ने उनके अंदर खुद को साबित करने की एक जिद पैदा की। इसी संघर्ष ने उन्हें सिखाया कि अपने कर्मचारियों व परिवार को एक सुरक्षित माहौल कैसे देना है। वोल्फ खुद को माइक्रोमैनेजर कहते हैं, लेकिन उनका तरीका कर्मचारियों पर दबाव बनाने का नहीं है। माइक्रोमैनेजमेंट का मतलब हर काम खुद करना नहीं, बल्कि यह जानना है कि कंपनी के हर हिस्से में क्या चल रहा है। वे टीम को फैसले लेने की पूरी आजादी और गलतियों से सीखने का मौका देते हैं। वे उम्मीदवारों को उनकी तकनीकी काबलियत से ज्यादा ईमानदारी और विनम्रता के आधार पर चुनते हैं। हालांकि, वे ऑफिस पॉलिटिक्स बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते। टीम के ड्राइवर्स को संभालने में भी वोल्फ काफी व्यावहारिक हैं। वे मानते हैं कि ड्राइवर्स पर बचपन से ही रेस जीतने का भारी दबाव होता है। जब अन्य टीमें युवा ड्राइवर्स को कुछ गलतियां करने पर ही बाहर का रास्ता दिखा देती हैं, तब वोल्फ ने 18 साल के किमी एंटोनेली पर भरोसा जताया। किमी इस साल नंबर-1 पर हैं। वोल्फ सख्त फैसले लेने से भी नहीं हिचकिचाते। वे कहते हैं कि ट्रैक पर जी-जान से रेस करो, लेकिन अपनी ही टीम के साथी की कार से मत टकराओ। 2016 में जब मर्सिडीज के लुईस हैमिल्टन और निको रोसबर्ग आपस में टकरा गए थे, तो वोल्फ ने उन्हें सस्पेंड करने का ईमेल भेज दिया था। उन्होंने दोनों को फटकार लगाते हुए कहा कि फैक्ट्री में काम करने वाले 2500 कर्मचारी का भविष्य तुम्हारे प्रदर्शन पर टिका है। ड्राइवर्स की आपसी दुश्मनी का खामियाजा कर्मचारी नहीं भुगत सकते। इस सख्त चेतावनी ने टीम का माहौल हमेशा के लिए बदल दिया।
The first 30 seconds of an interview are the most important, start strong; 65% of candidates are rejected due to poor body language.

Hindi News Career The First 30 Seconds Of An Interview Are The Most Important, Start Strong; 65% Of Candidates Are Rejected Due To Poor Body Language. नई दिल्ली46 मिनट पहले कॉपी लिंक इंटरव्यू को एकतरफा सवाल-जवाब के बजाय एक सामान्य बातचीत की तरह लेना चाहिए। – सिम्बॉलिक इमेज एआई के दौर में किसी भी नौकरी के लिए परफेक्ट रेज्यूमे बनाना आसान हो गया है, लेकिन इंटरव्यू क्रैक करना अब भी असली परीक्षा है। Market.biz के आंकड़े बताते हैं कि 65% इंटरव्यूअर्स उन उम्मीदवारों को तुरंत रिजेक्ट कर देते हैं, जिनकी बॉडी लैंग्वेज सही नहीं होती। वहीं 33% रिक्रूटर्स इंटरव्यू के पहले 90 सेकेंड में ही फैसला कर लेते हैं। हार्वर्ड की रिसर्च भी कहती है कि पहले 30 सेकेंड में ही आपकी छवि बन जाती है। ऐसे में जानते हैं इंटरव्यू क्रैक करने की जरूरी टिप्स। इंटरव्यू क्रैक करने के 4 गोल्डन रूल 1. 30 सेकेंड रूल अपनाएं इंटरव्यू में शुरू के 30 सेकेंड सबसे जरूरी होते हैं। ऐसे में शुरुआत मजबूत होना जरूरी है… आत्मविश्वास भरा परिचय दें, बॉडी लैंग्वेज संतुलित रखें और अपने जवाब स्पष्ट व सीधे रखें। 2. कंपनी की जानकारी रखें कंपनी का काम और उसका कल्चर समझना चाहिए, जिस रोल के लिए जा रहे हैं उसकी जरूरतों को जानना चाहिए और इंडस्ट्री में क्या ट्रेंड चल रहा है इस पर भी जानकारी होनी चाहिए। 3. डेटा नहीं, ‘कहानी’ सुनाएं डेटा से ज्यादा लोग कहानियों से जुड़ते हैं, इसलिए इंटरव्यू में अपने अनुभव को कहानी की तरह पेश करें… पहले से 2-3 मजबूत उदाहरण तैयार रखें। 4. इंटरव्यू को सामान्य बातचीत जैसा बनाएं इंटरव्यू को एकतरफा सवाल-जवाब के बजाय एक सामान्य बातचीत की तरह लें। इंटरव्यूअर की बात ध्यान से सुनें और बीच-बीच में उनसे जुड़े सवाल भी पूछें, जैसे टीम कैसे काम करती है या इस भूमिका में रोजाना क्या जिम्मेदारियां होंगी। इंटरव्यू में पूछ जाने वाले जरूरी सवाल Q. पांच साल बाद आप खुद को कहां देखते हैं? भले यह सवाल पुराना लगे, लेकिन इंटरव्यूअर इससे आपकी सीखने कीइच्छा और ग्रोथ माइंडसेट समझना चाहता है। इसलिए यह बताएं किआप आगे क्या सीखना चाहते हैं और अपनी स्किल्स को कैसे बेहतर करेंगे… अगर आपका उत्तर बुलेट पॉइंट्स में होगा तो बेहतर है। Q. सबसे पहला सवाल… अपने बारे में बताएं? यह सवाल आसान लगता है, लेकिन कई लोग यहीं अटक जाते हैं। अक्सर उम्मीदवार पर्सनल लाइफ बताने लगते हैं या बिना स्ट्रक्चर के बात करते हैं। सही तरीका यह है कि जवाब में अपने काम, स्किल और अनुभव पर फोकस रखें, अपनी प्रोफेशनल जर्नी को छोटे और साफ तरीके से बताएं और किसी एक उपलब्धि का उदाहरण जरूर जोड़ें। Q. आपकी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है? यहां सबसे ज्यादा गलती होती है। ” मैं बहुत मेहनती हूं” या ” मैं परफेक्शनिस्टहूं” जैसे जवाब नकली लगते हैं। बेहतर है कि आप अपनी एक छोटी, असलीकमजोरी बताएं और साथ में यह भी समझाएं कि उसे सुधारने के लिए क्याकर रहे हैं। यानी फोकस सिर्फ कमजोरी पर नहीं होना चाहिए, बल्कि सीखने और सुधारने की सोच पर होना चाहिए। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
दृष्टिहीनों के साथ भारत घूमने वाले जर्नलिस्ट के अनुभव:नजारे नहीं, एहसास… देखने वालों के लिए सफर ‘फिल्म’ है, पर अंधेरों के लिए ‘खुलती किताब’

‘हम में से ज्यादातर लोगों के लिए यात्रा का मतलब ‘नजारे देखना’ होता है। हम दर्शनीय स्थलों पर जाते हैं, तस्वीरें खींचते हैं और ऐसे होटल ढूंढ़ते हैं जहां से बाहर की खूबसूरती दिखे। लेकिन आपने कभी सोचा है कि दृष्टिहीन यात्री के लिए दुनिया कैसी होगी? इसी का जवाब खोजने के लिए मैं उत्तर भारत के ‘गोल्डन ट्रायंगल’ की 10 दिनों की यात्रा पर निकला। यह मौका ब्रिटिश कंपनी ट्रैवलआइज ने दिया था, जो सामान्य लोगों को दृष्टिहीनों के साथ सफर की पहल करती है। सूर्योदय के समय मैं ल्यूक के साथ ताजमहल में था। उसका हाथ मेरी बांह पर था और सफेद छड़ी से वह जमीन को टटोल रहा था। जैसे ही आगे बढ़े, पैरों के नीचे का अहसास बदल गया- खुरदरे बलुआ पत्थर से ठंडे, चिकने संगमरमर तक। मैंने उसका हाथ दीवारों पर रखा, जहां उसकी अंगुलियां नक्काशी व कीमती पत्थरों को महसूस कर रही थीं। ल्यूक ने 18 साल की उम्र में बीमारी के कारण दृष्टि खो दी थी। उसने मुस्कुराते हुए कहा,‘मुझे कुछ बहुत भव्य और शानदार होने का अहसास हो रहा है।’ गुंबद के नीचे पर्यटकों की आवाजें मधुर गूंज में बदल गईं। ल्यूक ने सिर ऊपर उठाकर कहा,‘जैसे हम किसी बड़े स्पीकर के अंदर खड़े हों।’ उस पल मैंने भी आंखें बंद कीं और पहली बार उस शांति व गूंज को सुना, जिसे मैं अक्सर अनदेखा कर देता था। इस यात्रा का उद्देश्य दृश्य देखना नहीं, बल्कि ‘अनुभूति’ था। पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में मेरा साथ डेनियल ने दिया। मसालों, डीजल की तेज गंध के बीच डेनियल ने बताया कि दृष्टिहीन आवाजों व हवा के बहाव से दुनिया का नक्शा बुनते हैं। जब एक इंद्रिय कम होती है, तो बाकी इंद्रियां उसकी भरपाई और तीव्रता से करने लगती हैं। यह अनुभव अद्भुत था, जहां अभाव ही दृष्टि बन गया। छोटी-छोटी चीजें शब्दों के जरिए स्मृति में बसने लगीं… सफर में मेरी अगली साथी सिएटल की कैंडी थीं। उन्हें नजारों से ज्यादा भारत को समझना पसंद था। मैंने उन्हें बताया कि सड़क किनारे नाई कैसे काम करते हैं, लोग फुटपाथ पर कैसे सोते हैं और दुकानों पर स्नैक्स कैसे सजे रहते हैं। इस दौरान मेरी अवलोकन क्षमता भी बढ़ी। मैंने घड़ी की दिशा से उन्हें थाली में रखे खाने की स्थिति समझाई। छोटी-छोटी चीजें अब शब्दों के जरिए स्मृति में बसने लगीं। रणथंभौर में बाघ नहीं दिखा, लेकिन कैंडी के लिए जंगल का अनुभव ही काफी था। बूंदी में आंखें बंद कर ऑटो की सवारी ने एहसास बदल दिया। इस पहल की शुरुआत अमर लतीफ ने की, जिन्होंने बताया- दृष्टिहीनों के लिए सफर किताब, और देखने वालों के लिए फिल्म जैसा होता है।
एनजीटी में पेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों से खुलासा:मप्र में 1640 अस्पताल-लैब बिना अनुमति… इनमें 530 ग्वालियर में संचालित, भोपाल-जबलपुर में 0

मध्य प्रदेश में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बिना संचालित अस्पताल, क्लीनिक और पैथोलॉजी लैब की संख्या 1640 है। इनमें ग्वालियर में सबसे ज्यादा 530 हेल्थ फैसिलिटी बिना अनुमति संचालित हो रही हैं। जबकि भोपाल और जबलपुर में एक भी ऐसा अस्पताल या क्लीनिक नहीं है, जिसके पास बोर्ड की अनुमति न हो। प्रदेश में सबसे ज्यादा हेल्थ केयर फैसिलिटी इंदौर में हैं। यहां 44 संस्थान बिना अनुमति संचालित हो रहे हैं। यह जानकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में पेश की है। नोट: ये आंकड़ा 2024 का है। इसमें प्रदेश की कुल हेल्थ केयर फैसिलिटी की संख्या 12261 बताई गई है। कार्रवाई के दावे, पर समस्या बरकरार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एनजीटी में दो तरह का डेटा पेश किया है। एक डेटा 2024 का है, जिसमें बिना अनुमति (ऑथोराइजेशन) संचालित फैसिलिटी की संख्या 1640 बताई है। जबकि दूसरा डेटा 2016 का है, जिसमें फरवरी महीने इनकी संख्या 1196 पहुंची और वर्तमान में घटकर 845 पर पहुंच गई है। प्रभावी कार्रवाई के दावे के बावजूद बोर्ड ने एनजीटी से अनुरोध किया है कि सीएमएचओ को निर्देश दें, ताकि बिना अनुमति चल रहे संस्थाओं के रजिस्ट्रेशन निरस्त करें। दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर पर एनजीटी ने लिया था संज्ञान ग्वालियर क्षेत्रीय कार्यालय की ओर से बताया गया है कि 9 फैसिलिटी को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं, जबकि 391 को नोटिस जारी किया गया है। एनजीटी ने दैनिक भास्कर की उस खबर पर संज्ञान लिया था, जिसमें मेडिकल वेस्ट खुले में फेंके जाने का खुलासा हुआ था। इसके बाद से मामला एनजीटी में विचाराधीन है।
होंडा-निसान घाटे की ओर बढ़ रही:ट्रम्प टैरिफ और चीनी कारों से जापानी ऑटो इंडस्ट्री खतरे में

पिछले माह होंडा के चीफ मिबे तोशिहिरो नेएक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि कंपनी 1957 के बाद पहली बार घाटा उठाने की ओर बढ़ रही है। उन्होंने नाकामी की जिम्मेदारी लेते हुए अपनी और अपने डिप्टी की तनख्वाह में 30% कटौती की जानकारी दी। हालांकि होंडा गंभीर मुश्किलों का सामना कर रही अकेली जापानी कार कंपनी नहीं है। पिछले सप्ताह मिबेने आगाह किया कि जापान की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। अमेरिका में आयातित कारों पर 25% टैरिफ से इंडस्ट्री का मुनाफा घटा है। सबसे अधिक असर चीनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने डाला है। बिक्री के हिसाब से दुनिया की छठी बड़ी कंपनी निसान में लगातार दूसरे साल कटौती चल रही है। 2028 तक सात फैक्ट्रियां बंद करने की योजना है। 2019 में दुनियाभर में कारों की बिक्री में जापानी कार कंपनियों का हिस्सा 31% था। यह पिछले साल गिरकर 26% हो गया। वहीं दक्षिण पूर्व एशिया में मार्केट शेयर 2023 के 68% से गिरकर 2025 में 57% रह गया। पड़ोस में बढ़ रही ईवी पिछले साल ग्लोबल कार मार्केट में हाईब्रिड सहित 26% इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री हुई थी। यह 2019 से 3% अधिक है। जापान के पड़ोस में बिक्री अधिक है। पिछले साल एशिया में बिकी एक तिहाई कारें इलेक्ट्रिक हैं।
होंडा-निसान घाटे की ओर बढ़ रही:ट्रम्प टैरिफ और चीनी कारों से जापानी ऑटो इंडस्ट्री खतरे में

पिछले माह होंडा के चीफ मिबे तोशिहिरो नेएक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि कंपनी 1957 के बाद पहली बार घाटा उठाने की ओर बढ़ रही है। उन्होंने नाकामी की जिम्मेदारी लेते हुए अपनी और अपने डिप्टी की तनख्वाह में 30% कटौती की जानकारी दी। हालांकि होंडा गंभीर मुश्किलों का सामना कर रही अकेली जापानी कार कंपनी नहीं है। पिछले सप्ताह मिबेने आगाह किया कि जापान की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। अमेरिका में आयातित कारों पर 25% टैरिफ से इंडस्ट्री का मुनाफा घटा है। सबसे अधिक असर चीनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने डाला है। बिक्री के हिसाब से दुनिया की छठी बड़ी कंपनी निसान में लगातार दूसरे साल कटौती चल रही है। 2028 तक सात फैक्ट्रियां बंद करने की योजना है। 2019 में दुनियाभर में कारों की बिक्री में जापानी कार कंपनियों का हिस्सा 31% था। यह पिछले साल गिरकर 26% हो गया। वहीं दक्षिण पूर्व एशिया में मार्केट शेयर 2023 के 68% से गिरकर 2025 में 57% रह गया। पड़ोस में बढ़ रही ईवी पिछले साल ग्लोबल कार मार्केट में हाईब्रिड सहित 26% इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री हुई थी। यह 2019 से 3% अधिक है। जापान के पड़ोस में बिक्री अधिक है। पिछले साल एशिया में बिकी एक तिहाई कारें इलेक्ट्रिक हैं।









