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Sabarimala Women Entry Verdict LIVE Update; Supreme Court CJI | Kerala Hindu Beliefs

Sabarimala Women Entry Verdict LIVE Update; Supreme Court CJI | Kerala Hindu Beliefs

Hindi News National Sabarimala Women Entry Verdict LIVE Update; Supreme Court CJI | Kerala Hindu Beliefs Ayyappan Temple नई दिल्ली8 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री और धार्मिक भेदभाव से जुड़े मामले में बुधवार की सुनवाई शुरू हो चुकी है। इससे पहले छठे दिन की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि अगर राज्य सामाजिक सुधार या जनहित के नाम पर किसी धार्मिक प्रथा या रिवाज पर रोक लगाता है, तो उसकी जांच कोर्ट कर सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही ज्यूडिशियल रिव्यू को लेकर उसकी कुछ सीमाएं हैं, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि कोर्ट के पास कोई अधिकार ही नहीं है। आज फैसला आने की संभावना सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक बेंच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है। इसके साथ धार्मिक आस्था के 66 मामले और जुड़े हैं। फैसला आने की संभावना है, या फिर कोर्ट इसे रिजर्व भी रख सकता है। केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है। 7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। पिछले 5 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए… 7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत 8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा 9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा 15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता 17 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी 21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं सबरीमाला केस से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट में पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं… लाइव अपडेट्स 8 मिनट पहले कॉपी लिंक एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- दो लोग एक ही धर्म को बिल्कुल एक ही तरीके से नहीं मान सकते एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- आर्टिकल 25(1) में इस्तेमाल किए गए शब्दों को व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें व्यक्ति की अपनी मर्जी शामिल है। यहां तक कि धर्म चुनने और उसके आचरण की सीमा तय करने के मामलों में भी। कोई भी दो लोग एक ही धर्म को बिल्कुल एक ही तरीके से नहीं मान सकते, भले ही वे एक ही धर्म के हों; फिर भी, उन दोनों को अपनी मर्जी के मुताबिक धर्म का आचरण करने की पूरी आजादी है। यह आजादी आर्टिकल 25 के तहत सुरक्षित है। 14 मिनट पहले कॉपी लिंक एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- हर धर्म का अपना एक दर्शन और सिद्धांत होता है एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- इस लिहाज से, आर्टिकल 25(1) एक बुनियादी अधिकार है जिसका दायरा काफी बड़ा है। अंतरात्मा को धर्म के अधिकार से अलग करके देखना भी जरूरी है। अंतरात्मा को अलग और स्वतंत्र शक्ति के तौर पर देखा जा सकता है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति धार्मिक दर्शन और सच्चाइयों को अपने अंदर उतारता है। हर धर्म का अपना एक दर्शन, सिद्धांत, और तौर-तरीके होते हैं जिनके जरिए उन सिद्धांतों को अमल में लाया जाता है। विश्वास और आचरण की सीमा भी व्यक्ति पर ही छोड़ दी जाती है, जो उस धर्म के सिद्धांतों पर निर्भर करती है। 16 मिनट पहले कॉपी लिंक एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- आर्टिकल 25 के तहत व्यक्तियों को आजादी मिली एडवोकेट सुब्रमण्यम: आर्टिकल 25 के तहत व्यक्तियों को आज़ादी मिली हुई है। अब, जब हम “प्रोफ़ेस” (मानने) शब्द पर आते हैं, तो इसका मतलब निजी तौर पर मानना और सार्वजनिक तौर पर मानना ​​भी हो सकता है। यह धार्मिक आजादी का ही एक हिस्सा है। अगला शब्द है “प्रैक्टिस” (पालन करना)। प्रैक्टिस निजी तौर पर भी की जा सकती है, और इसे दूसरी जगहों पर भी किया जा सकता है। और फिर धर्म का “प्रचार” करने का अधिकार भी है। अगर किसी व्यक्ति के पास काफी ज्ञान और विद्वत्ता है और वह अपने विश्वास या धर्म के बारे में अपनी समझ दूसरों के साथ बांटना चाहता है, तो वह निश्चित रूप से उसका प्रचार कर सकता है। वह लेक्चर दे सकता है, वह बोल सकता है; आर्टिकल 25(1) के तहत उसे यह आजादी मिली हुई है। यह सब सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता में आता है; क्योंकि जब आप इन अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको बाकी लोगों के अधिकारों का भी ध्यान रखना चाहिए, उनके पास भी इसी तरह की अधिकारों के इस्तेमाल की आजादी है। 32 मिनट पहले कॉपी लिंक 7वें दिन की सुनवाई शुरू, गोपाल सुब्रण्यम ने दलीलें रखीं एडवोकेट सुब्रमण्यम: आर्टिकल 25 धार्मिक स्वतंत्रता का विस्तार है, क्योंकि यह धार्मिक स्वतंत्रता के कई पहलुओं से संबंधित है। इसकी अवधारणा क्या है? यह किसी व्यक्ति की वह निजी यात्रा है, जिसके तहत वह किसी दर्शन को धार्मिक दर्शन के रूप में स्वीकार करता है। इसमें किसी फैसले में दिखाई देने वाले पहलुओं से कहीं अधिक घटक शामिल हैं। इसके चार पहलू हैं, जो सभी अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता में शामिल हैं- 1. धर्म की दार्शनिक सामग्री 2. उस दर्शन की सहायता से जुड़ी प्रथाएं 3. पूजा का अधिकार 4. आस्था का विस्तार ये सभी आर्टिकल 25 के तहत ‘धर्म’ शब्द के तहत संरक्षित हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हो सकता है कि आप उस सिद्धांत की प्रथाओं को न अपनाएं, या हो सकता है कि आप वास्तव में बाहरी पूजा-पाठ में भी शामिल न हों। लेकिन यह एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

Tamil Nadu Road Accident Photos; Kerala Tourist

Tamil Nadu Road Accident Photos; Kerala Tourist

6 घंटे पहले कॉपी लिंक तमिलनाडु के वलपरई में शुक्रवार को सड़क हादसे में 9 लोगों की मौत हो गई, जबकि 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। हादसा तब हुआ, जब टेम्पो ट्रैवलर अनियंत्रित होकर हेयरपिन मोड़ से फिसलकर खाई में गिर गया। पुलिस के मुताबिक, गाड़ी केरलम के पेरिंथलमन्ना से आए 13 पर्यटकों को लेकर वलपरई से लौट रहा था। 13वें हेयरपिन मोड़ पर संतुलन बिगड़ा और वाहन फिसलकर 9वें हेयरपिन मोड़ तक गिर गया हादसे में 1 पुरुष और 8 महिलाओं की मौके पर ही मौत हो गई। घायलों को रेस्क्यू कर एंबुलेंस से पोलाची के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। क्या होता है हेयरपिन मोड़ हेयरपिन मोड़ कि तस्वीर। जब किसी ऊंचे पहाड़ पर चढ़ना होता है, तो सीधी सड़क बनाना मुमकिन नहीं होता । इसलिए, ऊंचाई पर धीरे-धीरे चढ़ने के लिए सड़क को सांप की तरह घुमावदार बनाया जाता है। जहां सड़क एकदम से मुड़कर वापस उसी दिशा के समानांतर हो जाती है, उसे ही हेयरपिन मोड़ कहते हैं। भारत में कोल्ली हिल्स (तमिलनाडु), सिल्क रूट (सिक्किम), मनाली-लेह हाईवे (हिमाचल प्रदेश) और नैनीताल (उत्तराखंड) में में प्रमुख और चर्चित हेयरपिन मोड़ हैं। प्रधानमंत्री ने दुख जताया पीएम मोदी ने X पर पोस्ट किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हादसे पर दुख जताया जताते हुए X पर पोस्ट किया। उन्होंने कहा कि इस दुर्घटना से वे बेहद दुखी हैं और मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की है। वहीं, केरलम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने भी हादसे पर शोक जताया है। उन्होंने अधिकारियों को घायलों के बेहतर इलाज के निर्देश दिए हैं और मृतकों के परिजनों को हर संभव सहायता का आश्वासन दिया है। ————————————— ये खबर भी पढ़ें… प्रयागराज में सड़क हादसे में युवक की मौत:दो अन्य गंभीर घायल, डंफर चालक फरार बहादुरपुर क्षेत्र के सहसों बायपास के पास शुक्रवार को एक सड़क हादसे में एक युवक की मौके पर मौत हो गई। इस घटना में दो अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

Kerala Sabarimala Temple Women Entry Ban LIVE Update; Supreme Court TDB

Sabarimala Temple Women Entry | SC Hearing on Hindu Faith vs Rights

Hindi News National Kerala Sabarimala Temple Women Entry Ban LIVE Update; Supreme Court TDB | Hindu Beliefs नई दिल्ली12 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री की इजाजत दी थी। इस फैसले के लिए याचिकाओं पर अब सुनवाई हो रही है। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 5वें दिन की सुनवाई शुरू हो गई है। 9 जजों की बेंच ने 15 अप्रैल को पिछली सुनवाई में कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना सबसे मुश्किल कामों में से एक है। साथ ही यह भी कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। वहीं मंदिर प्रशासन त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने कहा कि सबरीमाला कोई खिलौने की दुकान या रेस्टोरेंट का मामला नहीं है। यहां के देवता ब्रह्मचारी हैं। भारत में अयप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं। अगर महिलाओं को दर्शन करना है, तो वहां जाएं। उन्हें इसी खास मंदिर में क्यों आना है। केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है। 7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। पिछले 4 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए… 7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत 8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा 9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा 15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता सबरीमाला केस से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट में पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं… लाइव अपडेट्स 14 मिनट पहले कॉपी लिंक सबरीमाला में एक ही संप्रदाय भगवान अयप्पा का एडवोकेट वेंकटेश: मैं नियमित रूप से सबरीमाला जाता हूं। पारंपरिक हिंदू धर्म में, किसी भी तीर्थयात्रा के दौरान, सभी जातियों और समुदायों के बीच के भेद मिट जाते हैं। सभी लोग एक समान ‘वर्ग’ का हिस्सा बन जाते हैं। जब हम सबरीमाला जाते हैं, तो वहां कोई जाति/वर्ग नहीं होता; वहां केवल एक ही चीज होती है जो सबको एक साथ रखती है,वह है भगवान अयप्पा का संप्रदाय, जिसमें सभी तरह के भक्त शामिल होते हैं। ‘संप्रदाय’ शब्द हिंदुओं के सभी वर्गों के आपसी मेल-जोल के लिए इस्तेमाल होता है। यह व्यवस्था स्थिर-जड़ नहीं होनी चाहिए। इसका मतलब है कि हिंदुओं के किसी भी वर्ग को मंदिर में जाने की परमिशन है; लेकिन जब आर्टिकल 26(b) की बात आती है, तो यह अधिकार केवल अपने इंटरनल मैनेजमेंट तक ही सीमित होता है। इसे ऐसे समझते हैं कि कई लोग सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही देखने आते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मामलों का प्रशासनिक प्रबंधन और संचालन असल में रजिस्ट्रार ही करता है। जो कोई भी वहां जाता है, वह आर्टिकल 26(b) के आधार पर यह दावा नहीं कर सकता कि वह सुप्रीम कोर्ट के मामलों को मैनेज करेगा। 19 मिनट पहले कॉपी लिंक ऐसी नीति बनाई जाए जिससे दान को भी आर्टिक 25(2)(a) का संरक्षण मिले एड. वेंकटेश: एक और उदाहरण लेते हैं, दान। दान अपने आप में एक धर्मनिरपेक्ष कार्य हो सकता है। लेकिन धार्मिक दान धर्म के दायरे में आता है और उसमें किसी तरह का दखल नहीं दिया जाना चाहिए। अब यह हो रहा है कि हमने धार्मिक दान के दायरे को बढ़ाकर उसे दान के दायरे में ला दिया है। फिर हम कहते हैं कि यह एक धर्मनिरपेक्ष कार्य है और उसमें दखलअंदाजी शुरू कर देते हैं। इसलिए एक ऐसी न्यायिक नीति बनाई जानी चाहिए कि एक बार जब कोई मामला धर्म के क्षेत्र में आ जाए तो दान-पुण्य को भी उसके मूल स्वरूप में, आर्टिकल 25(2)(a) के तहत संरक्षण मिले। 45 मिनट पहले कॉपी लिंक सरकार का धर्म की बाहरी चीजों पर कंट्रोल, मान्यताएं-प्रथाएं तय नहीं कर सकती एडवोकेट वेंकटेश: मुझे आर्टिकल 25(1) से कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि यह हर व्यक्ति को अपनी धार्मिक आस्था मानने की आजादी देता है। लेकिन अनुच्छेद 25(2)(a) का मतलब सिर्फ इतना है कि सरकार उन चीजों को नियंत्रित कर सकती है जो धर्म से जुड़ी तो हैं, लेकिन असल में आर्थिक, सामाजिक या प्रशासनिक (यानी गैर-धार्मिक) गतिविधियां हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सरकार धर्म के मूल हिस्से (कोर प्रैक्टिस) में दखल दे सकती है। अगर कोई कानून यह कहकर दखल देता है कि वह व्यवस्था सुधार रहा है, लेकिन असल में यह तय करने लगता है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा “जरूरी” है और कौन-सी नहीं, और इससे लोगों की धार्मिक आजादी कम होती है, तो यह अनुच्छेद 13(2) का उल्लंघन माना जाएगा, यानी ऐसा कानून गलत होगा। लेकिन हमने जो किया, उससे पूरा सिद्धांत ही उलट गया है। हमने धार्मिक कानून को धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं के साथ जोड़कर पढ़ना शुरू कर दिया, फिर धार्मिक प्रथाओं को एक दायरे में सीमित कर दिया है और धर्मनिरपेक्ष प्रथाओं में दखल देने का रास्ता खोल दिया है। 54 मिनट पहले कॉपी लिंक धर्म और राज्य का एक-दूसरे के काम में दखल होता है, यही टकराव स्पष्ट हो एडवोकेट वेंकटेश: एक ओर तो हम यह दावा करते हैं कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं, क्योंकि हम धार्मिक मामलों में कोई दखल नहीं देते। वहीं दूसरी ओर, हम यह भी अपेक्षा करते हैं कि राज्य के ‘धर्मनिरपेक्ष पहलुओं’ के दायरे में धर्म का कोई, दखल नहीं होना चाहिए। इन दोनों के बीच कुछ न कुछ ‘टकराव’ और ‘अतिव्याप्ति’ (इंटरनसेक्शन) तो जरूर है। इस दुनिया में कोई भी चीज पूरी तरह ‘निरपेक्ष’ नहीं होती। लेकिन फिर भी यह टकराव और अतिव्याप्ति बहुत कम होनी चाहिए। बेहद छोटी और

Kerala Sabarimala Temple Women Entry Case; Supreme Court

Kerala Sabarimala Temple Women Entry Case; Supreme Court

Hindi News National Kerala Sabarimala Temple Women Entry Case; Supreme Court | Hindu Beliefs नई दिल्ली2 घंटे पहले कॉपी लिंक केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री और धर्मस्थलों पर भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को चौथे दिन सुनवाई होगी। 14 अप्रैल से 16 अप्रैल के दौरान सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री के समर्थन में दलीलें रखी जाएंगी। इससे पहले 7 से 9 अप्रैल तक सुनवाई के दौरान महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखी गईं। केंद्र सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने कहा था कि मंदिरों और मठों में एंट्री का अधिकार सभी लोगों को होना चाहिए। किसी एक संप्रदाय को बाहर रखना हिंदू धर्म पर नकारात्मक असर डालेगा। इससे समाज बंटेगा। केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर बैन लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे भेदभावपूर्ण बताते हुए बैन हटा दिया। इसके बाद दायर पुनर्विचार याचिकाओं के आधार पर 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न तय किए गए हैं, जिन पर अब बहस हो रही है। सुप्रीम कोर्ट में 3 सुनवाई में अब तक क्या हुआ 7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता: महिलाओं की मंदिर में एंट्री पर 2018 का फैसला गलत तरीके से लिया गया। उन्हें मंदिर में न जाने देना उनका अपमान करना नहीं है। भारत में उन्हें पूजा जाता है। हमें इस बात पर ऐतराज है कि मंदिर की इस परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (छुआछूत या अनुच्छेद 17) कहा गया। छुआछूत जाति के आधार पर होती थी, यह मामला उससे अलग है। जैसे हम मस्जिद, मजार या गुरुद्वारे में जाते समय सिर ढंकते हैं, वैसे ही सबरीमाला की भी एक अनोखी परंपरा है, जिसका सम्मान होना चाहिए। ये धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का मुद्दा है, जो न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है। पूरी खबर पढ़ें… 8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के सबरीमाला मंदिर की परंपराओं को कैसे चुनौती दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर 7 सवाल तय किए हैं। इनमें से एक सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, उस ‘धार्मिक संप्रदाय या समूह’ की किसी प्रथा को जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से चुनौती दे सकता है। पूरी खबर पढ़ें… 9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला केस की सुनवाई के दौरान मंदिरों के रीति-रिवाजों का जिक्र हुआ। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि मंदिरों में सिर्फ खास समुदाय की एंट्री और बाहरी लोगों की मनाही से समाज बंटेगा। यह हिंदु धर्म के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि मान लीजिए (सबरीमाला केस को छोड़कर), अगर यह कहा जाए कि सिर्फ गौड़ सारस्वत लोग ही एक मंदिर में आएं या कांची मठ के लोग सिर्फ कांची ही जाएं, दूसरे मठ (जैसे शृंगेरी) न जाएं तो यह ठीक नहीं होगा। बल्कि जितने ज्यादा लोग अलग-अलग मंदिरों और मठों में जाएंगे, उतना ही धर्म मजबूत बनेगा। पूरी खबर पढ़ें… सबरीमाला मामले पर सुनवाई करने वाले 9 जजों के नाम सबरीमाला सहित 5 मामले, जिन पर SC फैसला करेगा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है? दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

BJP Manifesto Bengal | narendra Modi, rahul gandhi, Assam, Kerala, Puducherry Voting

BJP Manifesto Bengal | narendra Modi, rahul gandhi, Assam, Kerala, Puducherry Voting

Hindi News National BJP Manifesto Bengal | Narendra Modi, Rahul Gandhi, Assam, Kerala, Puducherry Voting कोलकाता/चेन्नई11 मिनट पहले कॉपी लिंक भाजपा, कांग्रेस और टीएमसी समेत अन्य दल अब बंगाल और तमिलनाडु में अपने प्रचार अभियान को और तेज करने जा रहे हैं। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के तहत गुरुवार को असम, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में वोटिंग हुई। बंगाल में वोटिंग दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होगा जबकि तमिलनाडु में सभी सीटों पर 23 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे। भाजपा आज पश्चिम बंगाल के लिए अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करेगी। इस दौरान गृह मंत्री अमित शाह भी मौजूद रहेंगे। इसके अलावा शाह पश्चिमी मेदिनीपुर में जनसभा और खड़गपुर में रोड शो करेंगे। वहीं पीएम नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल में तीन बड़ी चुनावी रैलियां कीं। उन्होंने हल्दिया, आसनसोल और बीरभूम में जनसभा की। पीएम मोदी ने भाजपा की 6 गारंटी दीं। साथ ही कहा- मैं आपको एक और गारंटी भी देता हूं कि अब तक जिन्होंने प. बंगाल को लूटा है, उन सबका हिसाब होगा। पीएम मोदी की बंगाल में 6 गारंटियां भय के माहौल में आज लोगों को बार-बार कानून से मदद मांगनी पड़ती है। लेकिन हमारी सरकार में आपको न्याय मिलेगा। सरकारी सिस्टम जनता के लिए जवाबदेह होगा। घोटाले, दुष्कर्म हर क्राइम की फाइल खुलेगी। जिसने भी करप्शन किया है, उसकी जगह जेल में होगी। मंत्री हो या संत्री, जनता का पैसा नहीं खाने देंगे। जो शरणार्थी हैं, उन्हें सम्मान मिलेगा, जो घुसपैठी हैं, उन्हें खदेड़ा जाएगा। सभी सरकारी कर्मचारियों को इस निर्मम सरकार ने भयभीत करके रखा है। मोदी सरकार आपके साथ खड़ी है। सरकार बनते ही यहां 7वां पे कमीशन लागू करवाएंगे। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

विधानसभा चुनाव 2026: केरल-असम और पुडुचेरी में जोरदार वोट, मुख्य चुनाव आयुक्त बोले- दुनिया के लिए लोकतंत्र का उदाहरण

विधानसभा चुनाव 2026: केरल-असम और पुडुचेरी में जोरदार वोट, मुख्य चुनाव आयुक्त बोले- दुनिया के लिए लोकतंत्र का उदाहरण

देश के दो राज्यों असम, केरलम और साथ में केंद्र प्रदेश पुडुचेरी में चल रहे विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर 9 अप्रैल 2026 यानी गुरुवार को चल रही क्रिसमस शाम 6 बजे तक है। अबाबोर पेटी में कई धुरंधरों की किस्मत कैद हो गई है। चुनाव आयोग ने नासिक और वीवीपेट सील करना शुरू कर दिया है। चुनाव आयोग के मुताबिक शाम 5 बजे तक असम में 84.42%, केरलम में 75.01% और पुडुचेरी में 86.92% वोटिंग हुई। पुड्डुचेरी में सीएम रंगास्वामी ने वोट डाला, केरल में रक्षा मंत्री ने एके एंटनी वोट डाला। इसके अलावा असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कामाख्या मंदिर में पूजा की, अपनी पत्नी के साथ जालुक बाबा में वोट डाला. अब सभी को 4 मई का इंतजार है, जब राज्यों के चुनाव नतीजे सामने आएंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि 2026 के चुनाव को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि असम, केरल और पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनाव न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक उदाहरण हैं। उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग की ओर से प्रदर्शित राज्यों के सभी जिलों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी और कहा कि यह लोकतांत्रिक भागीदारी एक शानदार है। सीईसी ने अपने संदेश में “चुनाव का पर्व, लोकतंत्र का गौरव” का उल्लेख करते हुए नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और लोकतंत्र के प्रति उनके प्रतीक चिन्ह का उल्लेख किया। असम की इन पर नजर अगर असम की बात करें तो यहां 3 बड़े दर्शन, जिनपर सभी के संबंध हैं। इनकी पहली तिमाही जलुक बबंरी विधानसभा है. यहां बीजेपी के उम्मीदवार और असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा मैदान में हैं. उनके खिलाफ बिदिशा नियोग कांग्रेस से मैदान में उतरे हैं। यहां लगातार पांच बार से हिमंत चुनाव जीत रहे हैं। यह बीजेपी का गढ़ माना जाता है. दिसपुर बीजेपी के उम्मीदवार प्रद्युत बोर्डोलोइ इलिनोइस मैदान में हैं. यहां से कांग्रेस ने मीरा बोरठाठाकुर को टाउनशिप मैदान में उतारा है। यह कांग्रेस की पारंपरिक सीट चल रही है, लेकिन गुटसी उद्योग की कंपनी है। असम की तीसरी सीट जोरहाट पर भी सभी के परस्पर विरोधी हैं। यहां से हितेंद्र नाथ गोस्वामी बीजेपी से चुनावी लड़ाई लड़ रहे हैं. तो गौरव गोई कांग्रेस से इलिनोइस मैदान में हैं। गोगोई पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। केरल की इन प्रवेश द्वार पर नजर केरल की दो बड़ी परियोजनाएं हैं, जिनपर सभी के परस्पर विरोधी हैं। नेमोम सीट सेबीजा पार्टिसिपेंट्स राजीव गांधी सचिवालय मैदान में हैं। उनके खिलाफ वी. शिवनकुट्टी सी.पी.आई.एम. से चुनावी मैदान में हैं। धर्मदम सीट बीजेपी के सीके पद्मनाभन टाउनशिप मैदान में हैं। सी.पी.पी. उम्मीदवार पिनाराई विजयनगरम मैदान में हैं। पुड्डुचेरी में बीजेपी डबल एकजुटता गठबंधन सरकार? अगर पुड्डुचेरी की करें तो यहां 30 प्रमुख जगहें हैं। यहां 20 डेवलपर्स के 294 उम्मीदवार मैदान में हैं। सभी की किस्मत का स्टॉक और वीवीपेट में कैद हो गया है। पुद्दचेरी की राजनीति में हमेशा से गठबंधन कायम है। यहां कभी बीजेपी भारी रही तो कभी कांग्रेस ने अपना स्टार्टअप बनाया। यहां उद्योग संघ और पेट्रोकेमिकल इंजीनियर्स गबंधन की सरकार है। उनके पास कुल 16 सीटें हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस बार बीजेपी गठबंधन इस चुनाव में अपनी जीत को दोहराएगा। यह भी पढ़ें: त्रिशूर में वोट देने की कतार में 62 साल का वोट पाना, मतदान करना ही हुई मौत (टैग्सटूट्रांसलेट)असम(टी)केरल(टी)पुडुचेरी(टी)असम विधानसभा चुनाव 2026(टी)केरल विधानसभा चुनाव 2026(टी)पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026(टी)ताजा समाचार अपडेट(टी)ब्रेकिंग न्यूज(टी)बड़ी खबर(टी)हिंदी समाचार(टी)चुनाव समाचार(टी)असम(टी)केरल(टी)पुडुचेरी(टी)असम विधानसभा चुनाव 2026(टी)केरल विधानसभा चुनाव 2026(टी)पुडुचेरी विधानसभा चुनाव 2026(टी)ताजा समाचार अपडेट(टी)ब्रेकिंग न्यूज(टी)बड़ी खबर(टी)हिंदी समाचार(टी)चुनाव समाचार

विधानसभा चुनाव 2026: सुबह 9 बजे तक असम में 17.87 प्रतिशत, केरल में 16.23 प्रतिशत और पुडुचेरी में 17.41 प्रतिशत मतदान

विधानसभा चुनाव 2026: सुबह 9 बजे तक असम में 17.87 प्रतिशत, केरल में 16.23 प्रतिशत और पुडुचेरी में 17.41 प्रतिशत मतदान

विधानसभा चुनाव 2026: केरल, असम और पुडुचेरी में चुनावों के लिए मतदान सुबह 7 बजे से जारी है। शुरुआती दो घंटों में असम और पुडुचेरी के चॉकलेट केरल में कम वोटिंग दर्ज की गई है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, असम में सुबह 9 बजे से 17.87 बजे तक प्रतिशत मतदान हुआ। वहीं, शुरुआती दो घंटे में पुडुचेरी में 17.41 प्रतिशत और केरल में 16.23 प्रतिशत वोट पड़े हैं। असम के माजुली जिले में सबसे अधिक 20.03 प्रतिशत, मोरीगांव जिले में 19.96 प्रतिशत, दरांग में 19.74 प्रतिशत, गोलपारा में 19.66 प्रतिशत और जोरहाट में 19.01 प्रतिशत मतदान हुआ है। सुबह 9 बजे तक असम के कामरूप जिले में सबसे कम 15.36 प्रतिशत वोट गिरे। वहीं, सुबह 9 बजे तक केरल के एर्नाकुलम जिले में सबसे अधिक 17.80 प्रतिशत और कासरगोड जिले में सबसे कम 15.08 प्रतिशत मतदान हुआ है। बता दें कि केरल में 883 अभ्यर्थी मैदान में हैं, यानी प्रति सीट औसत छह से सात प्रतिशत अपनी-अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। यहां की संख्या 27 लाख है, जो 30,000 से भी ज्यादा पॅालिटेशन विज्ञापन में उतारे गए हैं। चार क्षेत्र- पुडुचेरी, करेकल, माहे और यनम से सामूहिक बाने केंद्र संयुक्त प्रदेश पुडुचेरी में कुल 9.50 लाख से ज्यादा वोटर हैं। इनमें से 24,919 मतदाता पहली बार वोट डालेंगे। कुल 294 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं. असम विधानसभा चुनाव में कुल 722 अभ्यर्थी मैदान में हैं, जिनमें 59 महिलाएं शामिल हैं। असम में लगभग 25.05 मिलियन पंजीकृत धारक हैं जो इन नामांकनों में भाग लेने के योग्य हैं। राज्य ने वोटिंग प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए 31,490 वोटिंग सेंटर बनाए हैं। 126 सदस्यीय असम विधानसभा के लिए यह चुनाव बेहद अहम है, जिसमें बीजेपी अपनी सत्ता बरकरार रखने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस की सरकार में वापसी की उम्मीद है। इस चुनाव 2023 में इस आगामी राज्य में परिसीमन के बाद पहला चुनाव होगा। केरल के 140 खण्डों में तीन गठबंधनों के बीच मुकाबला है, जिसमें एल एफसी, यू एफसी और एसईआर चरण- प्रमुख हैं। केरल के लेफ्ट फ्रंट में लगातार पांच बार सत्ता में आने का लक्ष्य लेकर चल रही है। हालाँकि, इस बार सामने आए एल इफ़ेक्ट के नेतृत्व वाले एल फ़्लैक की सत्ता को बरकरार रखने की चुनौती है, क्योंकि कांग्रेस नेट यू फ़्लेक्ट और बीजेपी नेट के नेतृत्व वाले उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं। पुडुचेरी में 30 सीटों के लिए मतदान हो रहा है। इस केंद्र शासित प्रदेश में अभी ‘ऑल इंडिया चिनैप कांग्रेस’ (एआईएनआरसी) के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में है, जिसके कमांडर मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के हाथों में है और जिसे भाजपा का समर्थन प्राप्त है। (टैग्सटूट्रांसलेट)असम(टी)इलेक्शन(टी)कराइकल(टी)केरल(टी)माहे(टी)विधानसभा(टी)यनम(टी)पुड्डुचेरी(टी)मोरिगंव(टी)9 अप्रैल चुनाव(टी)विधानसभा चुनाव(टी)असम चुनाव(टी)यनम(टी)माहे(टी)माहे(टी)केरल चुनाव 2026(टी)चुनाव 2026(टी)असम चुनाव 2026(टी)असम(टी)चुनाव(टी)कराईकल(टी)केरल(टी)माहे(टी)विधान सभा(टी)यनम(टी)पुद्दुचेरी(टी)मोरीगांव(टी)9 अप्रैल चुनाव(टी)विधानसभाचुनाव(टी)असम चुनाव(टी)मध्यप्रदेश

Mallikarjun Kharge Apologizes Over Gujarati Statement

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Hindi News National Mallikarjun Kharge Apologizes Over Gujarati Statement | BJP Demands Reply 2 मिनट पहले कॉपी लिंक केरल के इडुक्की में रविवार को मल्लिकार्जुन खड़गे ने चुनावी सभा की थी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुधवार को गुजरातियों से जुड़े विवादित बयान पर खेद जताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि मेरे बयान को जानबूझकर गलत तरीके से पेश किया गया। मैं शब्दों पर खेद व्यक्त करता हूं। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, खड़गे ने रविवार को केरल के इडुक्की में कहा था कि राज्य के लोग ‘पढ़े-लिखे और समझदार’ हैं और उन्हें गुमराह नहीं किया जा सकता, जबकि गुजरात और कुछ अन्य जगहों के लोग ‘अनपढ़’ हैं। उधर, गुजराती समुदाय के लोगों ने खड़गे के बयान को लेकर आज दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया। खड़गे के खिलाफ नारेबाजी की और मांफी मांगने की अपील की। दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय के बाहर बुधवार को गुजराती समुदाय के लोगों ने प्रदर्शन किया। BJP बोली- राहुल, सोनिया जवाब दें BJP के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस नेतृत्व से इस पर जवाब मांगा। उन्होंने राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से पूछा कि क्या वे खड़गे के बयान से सहमत हैं। प्रसाद ने कहा, “क्या वे इस बयान से सहमत हैं? अगर राहुल गांधी में समझ है तो उन्हें इस टिप्पणी से दूरी बनानी चाहिए, इसकी निंदा करनी चाहिए और माफी की मांग करनी चाहिए।’ गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि खड़गे को माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने साढ़े छह करोड़ गुजरातियों का अपमान ही नहीं किया है, बल्कि महात्मा गांधी और सरदार पटेल की पवित्र भूमि के गौरव को भी ठेस पहुंचाई है। खड़गे के इन बयानों पर विवाद हो चुका है… 8 जुलाई, 2025- खड़गे का ने कहा बीजेपी ने मुर्मू और कोविंद को राष्ट्रपति तो बनाया, पर क्या इसलिए कि वह हमारी जमीन, जंगल और पानी छीन सकें? उन्होंने यह सब आदिवासियों की जमीन हड़पने के लिए किया है। BJP बोली बयान बेहद अपमानजनक और आदिवासी-दलित विरोधी है। खड़गे बिना शर्त माफी मांगे। 6 मई, 2025- खड़गे ने कहा पीएम मोदी को हमले से तीन दिन पहले ही इंटेलिजेंस रिपोर्ट मिल गई थी, इसीलिए उन्होंने अपना कश्मीर दौरा रद्द कर दिया। लेकिन आम जनता को कोई चेतावनी क्यों नहीं दी गई? BJP बोली बयान पूरी तरह गैर-जिम्मेदाराना है और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। खड़गे को माफी मांगनी चाहिए। 20 मई, 2025- खड़गे ने कहा ऑपरेशन सिंदूर कोई बड़ी बात नहीं। यह तो एक छुटपुट युद्ध है। BJP बोली ये भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान का अपमान है। खड़गे को हमारे वीर जवानों से माफी मांगनी चाहिए। चुनाव के बीच बयान कांग्रेस के लिए मुसीबत बना पांच राज्यों के चुनाव के साथ जब गुजरात में स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं तब यह बयान कांग्रेस के लिए मुसीबत बनता हुआ दिख रहा है। दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन तक ने विरोध दर्ज किया है। गौरतलब है कि गुजरात में 15 महानगरपालिकाओं, 84 नगरपालिकाओं, 34 जिला पंचायतों और 260 तालुका पंचायतों में 26 अप्रैल को मतदान होगा। 28 अप्रैल को चुनाव परिणाम आएगा। चुनाव की घोषणा के साथ ही आचार संहिता लागू हो गई है। राजनीतिक दलों का चुनाव प्रचार भी शुरू हो गया है। अब बीजेपी ने खरगे के बयान को चुनावी मुद्दा बना लिया है। —————————— ये खबर भी पढें… TMC का आरोप- चुनाव आयोग ने 5 मिनट में भगाया:SIR पर आपत्ति जताने गए थे पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और चुनाव आयोग आमने-सामने आ गए हैं। सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के नेतृत्व में TMC का प्रतिनिधि मंडल बुधवार सुबह दिल्ली में चुनाव आयोग से मिलने पहुंचा। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

Supreme Court Hearing Update; Sabarimala Women Entry

Supreme Court Hearing Update; Sabarimala Women Entry

Hindi News National Supreme Court Hearing Update; Sabarimala Women Entry | Parsi Women Rights, Dawoodi Bohra Khatna नई दिल्ली2 घंटे पहले कॉपी लिंक धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच आज लगातार दूसरे दिन सुनवाई करेगी। मंगलवार को पहले दिन 5 घंटे की सुनवाई में केंद्र ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने का समर्थन किया। सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- मंदिर में महिलाओं को न जाने देना उनका अपमान करना नहीं है। भारत में उन्हें पूजा जाता है। हमें इस बात पर ऐतराज है कि मंदिर की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (छुआछूत या अनुच्छेद 17) कहा गया। छुआछूत जाति के आधार पर होती थी, यह मामला उससे अलग है। उन्होंने आगे कहा- जैसे हम मस्जिद, मजार या गुरुद्वारे में जाते समय सिर ढंकते हैं, वैसे ही सबरीमाला की भी एक अलग परंपरा है और इसका सम्मान होना चाहिए। ये धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का मुद्दा है, जो कोर्ट के दायरे से बाहर है। इस पर बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर किसी महिला को उसके मासिक धर्म की वजह से मंदिर में घुसने से रोका जाता है, तो क्या वह ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान में छुआछूत को पूरी तरह खत्म किया गया है। SC बोला- भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता सरकार: महिलाओं की मंदिर में एंट्री पर 2018 का फैसला गलत तरीके से लिया गया। सभी धर्मों की परंपराओं का सम्मान जरूरी है। सिर ढकने जैसे नियम अधिकारों का हनन नहीं हैं। जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है। संविधान का नियम हर दिन के लिए एक समान होना चाहिए। सरकार: सबरीमाला की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (अनुच्छेद 17) कहना गलत है। छुआछूत जाति आधारित थी, यह मामला उससे अलग है। जस्टिस नागरत्ना: क्या मासिक धर्म के आधार पर प्रवेश रोकना क्या ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान ने छुआछूत को पूरी तरह समाप्त किया है। सरकार: कोर्ट को धार्मिक प्रथाओं की आधुनिकता या वैज्ञानिकता तय नहीं करनी चाहिए। केवल वही प्रथाएं रद्द हों जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है, लेकिन भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे। सबरीमाला सहित 5 मामले, जिनपर SC फैसला करेगा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने 7 संवैधानिक सवाल तय किए, जिन पर बहस होगी- अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरा क्या है? अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच संतुलन कैसे तय होगा? क्या अनुच्छेद 26 के तहत मिलने वाले अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं या उनके अधीन आते हैं? ‘नैतिकता’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की परिभाषा क्या है और इनमें क्या अंतर है? धार्मिक प्रथाओं में कोर्ट के हस्तक्षेप या न्यायिक समीक्षा की सीमा कहां तक होनी चाहिए? अनुच्छेद 25(2)(b) में ‘हिंदुओं के वर्ग’ (class of Hindus) का अर्थ किस रूप में समझा जाए? क्या कोई व्यक्ति, जो उस धर्म का अनुयायी नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के जरिए किसी धार्मिक परंपरा को चुनौती दे सकता है? सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पहले बैन थी। वजह पीरियड्स और भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत को माना गया। इसी नियम को लेकर विवाद शुरू हुआ। 1990 में मामला उठा, बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में कोर्ट ने नोटिस जारी किया। 2008 में केस 3 जजों की बेंच को गया। 2016 में सुनवाई शुरू हुई। 2017 में मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया। 2018 में 4-1 बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की अनुमति मिली। कोर्ट ने प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया। विरोध के बीच बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया। 2019 में मामला 9 जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया गया। बाद में दूसरे धर्मों से जुड़े महिला प्रवेश मामलों को भी इसमें जोड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी

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Hindi News National Supreme Court Hearing Update; Sabarimala Women Entry | Parsi Women Rights, Dawoodi Bohra Khatna नई दिल्ली11 मिनट पहले कॉपी लिंक धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच आज लगातार दूसरे दिन सुनवाई करेगी। मंगलवार को पहले दिन 5 घंटे की सुनवाई में केंद्र ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने का समर्थन किया। सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- मंदिर में महिलाओं को न जाने देना उनका अपमान करना नहीं है। भारत में उन्हें पूजा जाता है। हमें इस बात पर ऐतराज है कि मंदिर की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (छुआछूत या अनुच्छेद 17) कहा गया। छुआछूत जाति के आधार पर होती थी, यह मामला उससे अलग है। उन्होंने आगे कहा- जैसे हम मस्जिद, मजार या गुरुद्वारे में जाते समय सिर ढंकते हैं, वैसे ही सबरीमाला की भी एक अलग परंपरा है और इसका सम्मान होना चाहिए। ये धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का मुद्दा है, जो कोर्ट के दायरे से बाहर है। इस पर बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर किसी महिला को उसके मासिक धर्म की वजह से मंदिर में घुसने से रोका जाता है, तो क्या वह ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान में छुआछूत को पूरी तरह खत्म किया गया है। SC बोला- भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता सरकार: महिलाओं की मंदिर में एंट्री पर 2018 का फैसला गलत तरीके से लिया गया। सभी धर्मों की परंपराओं का सम्मान जरूरी है। सिर ढकने जैसे नियम अधिकारों का हनन नहीं हैं। जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है। संविधान का नियम हर दिन के लिए एक समान होना चाहिए। सरकार: सबरीमाला की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (अनुच्छेद 17) कहना गलत है। छुआछूत जाति आधारित थी, यह मामला उससे अलग है। जस्टिस नागरत्ना: क्या मासिक धर्म के आधार पर प्रवेश रोकना क्या ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान ने छुआछूत को पूरी तरह समाप्त किया है। सरकार: कोर्ट को धार्मिक प्रथाओं की आधुनिकता या वैज्ञानिकता तय नहीं करनी चाहिए। केवल वही प्रथाएं रद्द हों जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है, लेकिन भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे। सबरीमाला सहित 5 मामले, जिनपर SC फैसला करेगा सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने 7 संवैधानिक सवाल तय किए, जिन पर बहस होगी- अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरा क्या है? अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच संतुलन कैसे तय होगा? क्या अनुच्छेद 26 के तहत मिलने वाले अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं या उनके अधीन आते हैं? ‘नैतिकता’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की परिभाषा क्या है और इनमें क्या अंतर है? धार्मिक प्रथाओं में कोर्ट के हस्तक्षेप या न्यायिक समीक्षा की सीमा कहां तक होनी चाहिए? अनुच्छेद 25(2)(b) में ‘हिंदुओं के वर्ग’ (class of Hindus) का अर्थ किस रूप में समझा जाए? क्या कोई व्यक्ति, जो उस धर्म का अनुयायी नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के जरिए किसी धार्मिक परंपरा को चुनौती दे सकता है? सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पहले बैन थी। वजह पीरियड्स और भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत को माना गया। इसी नियम को लेकर विवाद शुरू हुआ। 1990 में मामला उठा, बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में कोर्ट ने नोटिस जारी किया। 2008 में केस 3 जजों की बेंच को गया। 2016 में सुनवाई शुरू हुई। 2017 में मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया। 2018 में 4-1 बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की अनुमति मिली। कोर्ट ने प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया। विरोध के बीच बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया। 2019 में मामला 9 जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया गया। बाद में दूसरे धर्मों से जुड़े महिला प्रवेश मामलों को भी इसमें जोड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी