‘बीजेपी सत्ता में ऐ तो हमलावर…’, ममता सरकार ने भड़के तंज, कहा- हिंसा करने वालों पर मोदी करेंगे एक्शन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में मतुआ और नामशूद्र दल के सहयोगियों पर भाजपा का रुख स्पष्ट करते हुए अपना वादा निभाया है। पूर्व बर्धमान जिले के कटवा में एक रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने नागरिकता के लिए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) लागू किया है। उन्होंने कहा, ”मैं मतुआ और नामशूद्र समुदाय से चाहता हूं कि वे देश के संविधान की रक्षा करें. उन्होंने कहा कि मोदी ने वोटुआ, नामशूद्र और सभी नामशूद्र आदिवासियों को शांति मिल सके, इसके लिए वहां का गणतंत्र कानून बनाया.” पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों का आरोप प्रधानमंत्री ने कहा, ”भाजपा सरकार बनी हुई है तो सभी पात्र यात्रियों को नागरिकता देने की प्रक्रिया में तेजी आएगी।” दक्षिण बंगाल के कई सजावटी में विस्तारित मतुआ समुदाय के मुसलमानों को एक प्रभावशाली वर्ग माना जाता है और नागरिकता का समुदाय लंबे समय से राजनीतिक रूप से प्रेरित है। मोदी ने अवैध घुसपैठियों के मुद्दे पर तेज हमला करते हुए कहा कि भाजपा सत्ता में है तो घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल में ले जाना चाहती है। उन्होंने कहा, “अब जाने का समय आ गया है और घुसपैठियों को अपना सामान बांधना शुरू कर देना चाहिए। जो लोग घुसपैठियों की मदद कर रहे हैं, उन्हें भी नहीं बचाया जाएगा।” बंगाल में भय का माहौल-मोदी बंगाल सरकार पर पीएम मोदी ने कहा कि 15 साल के शासन में सीएम ममता बनर्जी का जन्म हुआ है. यह इलेक्शन डेमोक्रेसी डार को ख़त्म करने के लिए है। मोदी ने परमाणु के भय से मुक्ति और भाजपा के विश्वास से अभिन्न पश्चिम बंगाल का आह्वान करते हुए कहा कि ऐसा बदलाव एक विकसित पश्चिम बंगाल के निर्माण की दिशा में पहला कदम होगा। आलू किसानों को लेकर क्या कहा प्रधानमंत्री ने कहा, ”भाजपा, वैष्णव कांग्रेस की ‘निर्मम सरकार’ के श्वेतपत्र जारी करने वाली है। उन्होंने कहा, ”हम पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।” प्रधानमंत्री ने कहा, ”पश्चिम बंगाल में अगर भाजपा की सरकार बनी तो पहली कैबिनेट बैठक में आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना लागू की जाएगी।” बता दें कि पश्चिम बंगाल की 294 रांची विधानसभा के चरण 2 चरण 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को होंगे। तीसरी 4 मई को की जाएगी. ये भी पढ़ें ‘बंगला में घुसपैठ के लिए टीएमसी जिम्मेदार’, अमित शाह ने भड़के अभिषेक बनर्जी पर तंज कसते हुए शेख हसीना को लेकर क्या कहा?
‘परफेक्ट मां’ बनने का प्रेशर:देश की 22% माताएं डिप्रेशन में, हर समय खुश रहने का दबाव खतरनाक

भारत में मां बनना अब पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया है। आंकड़ों के अनुसार मातृ मृत्यु दर में गिरावट आई है। 2014-16 में जहां एक लाख जन्म पर 130 मौतें होती थीं, जो कि अब घटकर 88 पर आ गई हैं। 89 प्रतिशत से ज्यादा डिलीवरी अब अस्पतालों में हो रही हैं। लेकिन क्या एक मां मानसिक रूप से भी उतनी ही स्वस्थ हैं, जितनी शारीरिक रूप से? नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, अमेरिका के मुताबिक भारत में लगभग 22 फीसदी महिलाएं गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के बाद गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि मां की शारीरिक सुरक्षा के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी है। ‘नेशनल सेफ मदरहुड डे’ (11 अप्रैल) पर यह समझना जरूरी है कि सुरक्षित मातृत्व, स्वस्थ बच्चे के जन्म के साथ ही मां की मानसिक सेहत से भी जुड़ा है। आइए मेडिकल तथ्यों के नजरिए से समझते हैं मातृत्व का वह अनदेखा पहलू, जिस पर समाज आज भी बात नहीं करता। जानते हैं महिलाओं की मानसिक स्थिति से जुड़े खतरों के 4 संकेत और उनसे निपटने के उपाय भास्कर एक्सपर्ट तीन विशेषज्ञों से जानें सेफ मदरहुड के सही मायने, डॉ. सुनीला खंडेलवाल(स्त्री और प्रसूती रोग विशेषज्ञ), डॉ. स्मिता वैद कंसल्टेंट गाइनी और रोबोटिक सर्जन, डॉ. स्तुति कैलिफोर्निया (बर्कले यूनि. में एसोसिएट प्रोफेसर) 1. पॉजिटिव टॉक्सिसिटी – 23 फीसदी माताएं प्रभावित प्रेगनेंसी में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रॉन का उतार-चढ़ाव दिमाग पर असर डालता है, जिससे और एंग्जायटी बढ़ती है। जबरदस्ती खुश रहने के दबाव में नई मां असली भावनाएं दबा देती हैं, जिससे चिंता, थकान, इमोशनल डिस्कनेक्ट महसूस होता है। 14-23% महिलाएं क्लीनिकल एंग्जायटी से प्रभावित होती हैं। एक्सपर्ट टिप – गर्भवती महिला पर ‘हर वक्त खुश रहने’ का दबाव न डालें। एंग्जायटी ज्यादा हो तो गाइनेकोलॉजिस्ट के साथ मनोवैज्ञानिक की भी मदद लें। 2. टोकोफोबिया – 14 से 16.5% महिलाओं में डिलीवरी का डर करीब 14-16% महिलाएं टोकोफोबिया यानी डिलीवरी के डर से जूझती हैं। यह डर पिछले खराब अनुभव या लेबर पेन के कारण हो सकता है। ऐसे में कई महिलाएं सी-सेक्शन चुनती हैं। परिवार का कम सपोर्ट, अनप्लान्ड प्रेग्नेंसी, लड़का होने का दबाव और 35 साल की उम्र के बाद तनाव और बढ़ जाता है। एक्सपर्ट टिप – डॉक्टर से डिलीवरी की प्रक्रिया और पेन मैनेजमेंट पर बात करें। एंटीनेटल क्लासेस, काउंसलिंग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज से डर कम किया जा सकता है। 3. ब्रेस्टफीडिंग न करा पाना – मां के लिए तनाव का बड़ा कारण शिशु के लिए पहले 6 महीने केवल स्तनपान की सलाह दी जाती है। लेकिन डिलीवरी के बाद कई महिलाएं चाहकर भी ब्रेस्टफीडिंग नहीं करा पाती। इसके पीछे अच्छी डाइट की कमी, पीसीओएस, थायरॉयड, डायबिटीज, ब्रेस्ट सर्जरी, प्रोलैक्टिन हॉर्मोन की कमी, तनाव, डिलीवरी के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग जैसे मेडिकल कारण हो सकते हैं। साथ ही डिलीवरी के बाद कम पानी पीना भी इसकी एक बड़ी वजह है। एक्सपर्ट टिप – ब्रेस्टीफीडिंग में दिक्कत हो, तो फॉर्मूला फीडिंग एक विकल्प है। बस, बच्चा भूखा नहीं रहना चाहिए। इसकी मात्रा और देने का तरीका पीडियाट्रिशियन से डिस्कस कर लें। 4. प्रेगनेंसी के बाद डिप्रेशन – नवजात से दूरी और अलगाव डिलीवरी के बाद करीब 70-80% मांएं मानसिक अस्थिरता से गुजरती हैं, जिसे ‘बेबी ब्लूज’ कहा जाता है। इसमें शुरुआती 2-3 दिनों तक थकान, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन रहता है, जो आमतौर पर 1-2 हफ्तों में ठीक हो जाता है। लेकिन अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) हो सकता है, जो करीब 15-20% महिलाओं में देखा जाता है। इसमें उदासी, तनाव, नींद और भूख में बदलाव, बच्चे से दूरी, परिवार और दोस्तों से अलगाव जैसे लक्षण होते हैं। गंभीर स्थिति में मां खुद को या बच्चे को नुकसान भी पहुंचा सकती है। एक्सपर्ट के अनुसार, अमेरिका में PPD के मामले ज्यादा देखे जाते हैं, क्योंकि वहां न्यूक्लियर फैमिली, देर से शादी और देर से मां बनने का ट्रेंड है। PPD के लक्षण अक्सर 6-8 हफ्तों बाद सामने आते हैं, जिनका इलाज काउंसलिंग, दवाइयों और बॉडी-माइंड थेरेपी से किया जाता है। एक्सपर्ट टिप – इसका सबसे बड़ा फैक्टर सोशल सपोर्ट की कमी है। इसलिए मां के लिए परिवार का साथ बहुत जरूरी है। अगर इनमें से कोई लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
बेटी के निकाह का कार्ड बांटकर लौट रहा था दंपती:खंडवा में बाइक से टकराया जंगली जानवर, पत्नी की मौत; 13 अप्रैल को होनी थी शादी

खंडवा जिले में शुक्रवार को बेटी के निकाह का निमंत्रण कार्ड बांटकर लौट रहे दंपती की बाइक से एक जंगली जानवर टकरा गया, जिससे 40 वर्षीय पत्नी की मौके पर ही मौत हो गई और 45 वर्षीय पति गंभीर रूप से घायल हो गया। वर्तमान में घायल पति का जिला अस्पताल में इलाज जारी है, वहीं पुलिस ने शनिवार को जिला अस्पताल में पत्नी के शव का पोस्टमार्टम कराया है और हादसे के बाद परिवार ने 13 अप्रैल को होने वाली शादी को फिलहाल निरस्त कर दिया है। शेखपुरा से लौटते समय रास्ते में हुआ हादसा पुलिस के अनुसार, चारखेड़ा निवासी अयूब खान (45) अपनी पत्नी बिलकिस (40) के साथ शुक्रवार को रिश्तेदारों के घर शेखपुरा क्षेत्र में बेटी के निकाह का कार्ड देने गए थे। वापसी के दौरान अचानक सड़क पार कर रहे एक जंगली जानवर से उनकी बाइक टकरा गई। टक्कर इतनी जोरदार थी कि दोनों बाइक समेत सड़क पर गिर पड़े। हादसे में बिलकिस के सिर में गंभीर चोट आई, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। वहीं अयूब खान घायल हो गए, जिन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। 13 को था बेटी का निकाह, परिवार ने निरस्त की तारीख परिजनों के मुताबिक, अयूब खान की बेटी का निकाह 13 अप्रैल को तय था और घर में शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। पूरा परिवार निमंत्रण बांटने में जुटा हुआ था, लेकिन इस हादसे ने सारी खुशियों को गम में बदल दिया। रिश्तेदार शेख करीम ने बताया कि इस दुखद घटना के बाद परिवार ने फिलहाल निकाह की तारीख को निरस्त कर दिया है। हादसे के बाद पूरे गांव में शोक का माहौल है।
मधुबाला की बायोपिक में धुरंधर फेम एक्ट्रेस की चर्चा:दावा- लीड रोल में सारा अर्जुन नजर आ सकती हैं, आधिकारिक घोषणा बाकी

हिंदी सिनेमा की खूबसूरत अदाकाराओं में गिनी जाने वाली मधुबाला की बायोपिक को लेकर लगातार चर्चाएं हो रही हैं। फिल्म में उनकी भूमिका कौन निभाएगा, इसे लेकर नए नाम सामने आ रहे हैं। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, लीड रोल के लिए सारा अर्जुन का नाम सबसे आगे है। फिल्म को संजय लीला भंसाली प्रोड्यूस करेंगे, जबकि निर्देशन जसमीत के रीन करेंगे। सारा अर्जुन इन दिनों अपनी फिल्म धुरंधर को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया है। इसी के बाद उनके करियर को नया मोड़ मिला और अब उन्हें मधुबाला जैसी आइकॉनिक शख्सियत निभाने का मौका मिल सकता है। टाइम्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म फिलहाल प्री-प्रोडक्शन स्टेज में है। 2026 के आखिर तक इसकी शूटिंग शुरू हो सकती है। फिल्म 50-60 के दशक के गोल्डन एरा को बड़े स्तर पर दिखाएगी। इसमें मधुबाला की फिल्मों के साथ उनकी निजी जिंदगी, खासकर रिश्ते, संघर्ष और कम उम्र में हुई मौत को विस्तार से दिखाया जाएगा। इस किरदार के लिए सारा अर्जुन को खास तैयारी करनी होगी। वह लुक टेस्ट, डायलॉग डिलीवरी और बॉडी लैंग्वेज पर काम करेंगी, ताकि मधुबाला की ग्रेस और स्क्रीन प्रेजेंस को सही तरीके से पर्दे पर उतार सकें। मधुबाला की बायोपिक के लिए पिछले कुछ समय में कई बड़ी एक्ट्रेसेस के नाम सामने आए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में कियारा आडवाणी का नाम जोड़ा गया था। हाल ही में अनीत पड्डा को लेकर भी खबरें आई थीं कि वह इस रोल के लिए चुनी जा सकती हैं। अब ताजा रिपोर्ट्स में सारा अर्जुन का नाम सबसे मजबूत दावेदार के तौर पर सामने आया है। अगर कास्टिंग फाइनल होती है, तो यह उनके करियर का बड़ा ब्रेक साबित हो सकता है। दर्शकों को हिंदी सिनेमा के ग्लैमरस और रहस्यमयी दौर को करीब से देखने का मौका मिलेगा। हालांकि, आधिकारिक घोषणा अभी बाकी है।
सिंगरौली में पत्रकार विकास दुबे छेड़छाड़ मामले में गिरफ्तार:गिरफ्तारी से पहले मारपीट का आरोप, अज्ञात पर केस दर्ज

सिंगरौली जिले में भाजपा की एक महिला पदाधिकारी से छेड़छाड़ और मानसिक प्रताड़ना के मामले में नया मोड़ आया है। विंध्यनगर थाना पुलिस ने इस मामले में आरोपी पत्रकार विकास दुबे को बीती रात गिरफ्तार कर लिया। महिला पदाधिकारी की शिकायत पर विकास दुबे के खिलाफ पहले ही गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उन्हें हिरासत में लिया। गिरफ्तारी से पहले पत्रकार विकास दुबे ने खुद को पीड़ित बताया। उन्होंने दावा किया कि तीन अज्ञात लोगों ने उनके साथ मारपीट की है। दुबे ने अपने शरीर पर चोट के निशान भी दिखाए और आरोप लगाया कि यह हमला महिला नेत्री की साजिश का हिस्सा था। मारपीट मामले की जांच शुरू विंध्यनगर थाना प्रभारी अर्चना द्विवेदी ने बताया कि महिला नेत्री द्वारा दर्ज कराए गए प्रकरण में गंभीर धाराएं लागू होने के कारण आरोपी को गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि विकास दुबे की मारपीट की शिकायत पर अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट का आरोप महिला पदाधिकारी ने आरोप लगाया था कि विकास दुबे पिछले एक महीने से सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट कर मानसिक रूप से परेशान कर रहे थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक दिन दुबे ने कथित तौर पर अश्लील हरकत की थी। फिलहाल, पुलिस दोनों मामलों की जांच कर रही है। एक तरफ छेड़छाड़ और प्रताड़ना के आरोपों की पड़ताल की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ पत्रकार विकास दुबे के साथ हुई मारपीट के मामले में भी सच्चाई सामने लाने के प्रयास जारी हैं। अपनी चोट दिखाता घायल विकास
थर्मस में रखी चाय कितनी देर तक सही रहती है, जानिये इसको कब तक पीना है फायदेमंद?

सुबह के समय चाय बनाकर थर्मस में रख लेना आजकल काफी आम बात हो गई है. ऑफिस, यात्रा या लंबे समय तक गर्म चाय चाहिए हो, तो थर्मस बहुत ही काम आता है. लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि थर्मस में रखी चाय कितनी देर तक पीने लायक रहती है और क्या लंबे समय तक रखी चाय नुकसानदायक भी हो सकती है. आइए इस बात को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं. थर्मस में चाय कितनी देर तक सही रहती है?अगर चाय को ताज़ा बनाकर अच्छे क्वालिटी वाले साफ थर्मस में रखा गया है, तो: 2 से 4 घंटे तक चाय स्वाद और सेहत, दोनों के लिहाज से ठीक रहती है.6 घंटे तक चाय सुरक्षित तो रहती है, लेकिन उसका स्वाद, खुशबू और ताजगी कम हो सकती है.8 घंटे या उससे ज्यादा समय तक रखी चाय पीने की सलाह नहीं दी जाती, खासकर अगर उसमें दूध मिला हो.क्योंकि दूध वाली चाय में बैक्टीरिया जल्दी पनप सकते हैं, खासकर अगर थर्मस पूरी तरह साफ न हो. थर्मस में चाय रखने के फायदे 1. लंबे समय तक गर्म रहती हैथर्मस की इंसुलेशन तकनीक चाय को कई घंटों तक गर्म बनाए रखती है. 2. समय की बचतबार‑बार चाय बनाने की जरूरत नहीं पड़ती, खासकर ऑफिस या यात्रा के दौरान. 3. ईंधन की बचतगैस या बिजली की खपत कम होती है. 4. बाहर की चाय से बचावघर की बनी चाय ज्यादा साफ‑सुथरी और सुरक्षित होती है. थर्मस में चाय रखने के नुकसान 1. स्वाद और खुशबू में कमीलंबे समय तक रखने से चाय बासी‑सी लगने लगती है. 2. सेहत को नुकसानदूध वाली चाय देर तक रखने से उसमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं, जिससे गैस, एसिडिटी या फूड पॉइजनिंग का खतरा होता है. 3. पोषक तत्वों में कमीचाय में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स समय के साथ कम हो जाते हैं. 4. थर्मस साफ न हो तो खतराअच्छी तरह साफ न किया गया थर्मस पुराने बैक्टीरिया को बढ़ावा दे सकता है. सुरक्षित रखने के जरूरी टिप्स हमेशा उबाल कर ताज़ी चाय ही थर्मस में डालें.थर्मस को रोज़ाना अच्छी तरह धोकर सुखाएं.कोशिश करें कि 4 घंटे के अंदर चाय खत्म कर लें.अगर ज्यादा देर के लिए रखना हो, तो बिना दूध की चाय बेहतर रहती है. थर्मस में चाय रखना सुविधाजनक जरूर है, लेकिन इसे ज्यादा देर तक रखना सही नहीं. सेहत और स्वाद दोनों को ध्यान में रखते हुए सीमित समय में ही थर्मस वाली चाय का सेवन करना बेहतर होता है.
Sikars Education Capital, NEET Rank-1

11 मिनट पहले कॉपी लिंक राजस्थान का शेखावाटी अंचल और विशेषकर सीकर शहर आज पूरे देश में शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र के रूप में पहचाना जाता है। रेत के धोरों से निकलकर देश की ‘एजुकेशन कैपिटल’ बनने तक के इस सफर में सबसे अहम भूमिका निभाई है गुरुकृपा करियर इंस्टीट्यूट (GCI) ने। साल 2007 में एक साधारण संकल्प और असाधारण जिद्द के साथ शुरू हुआ गुरुकृपा, आज देश के लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों के अटूट विश्वास का दूसरा नाम बन चुका है। अपने पहले ही बैच (2008) में मात्र 250 में से 85 विद्यार्थियों को डॉक्टर बनाने वाले गुरुकृपा ने बीते लगभग दो दशक में सफलता के ऐसे शानदार कीर्तिमान रचे हैं, जिन्होंने सीकर को राष्ट्रीय पटल पर मजबूती से स्थापित कर दिया है। मेडिकल (NEET) में गुरुकृपा का ऐतिहासिक और एकतरफा दबदबा गुरुकृपा ने सफलता को केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि हर साल दोहराई जाने वाली एक परंपरा बना दिया है। बीते 5 वर्षों में ही गुरुकृपा ने अपनी मौन तपस्या से देश को 10,000 से अधिक बेहतरीन डॉक्टर्स दिए हैं। इसके प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं: · लगातार दूसरे साल All India Topper:- साल 2024 में गुरुकृपा के होनहार छात्र ‘सौरव’ ने 720 में से पूरे 720 अंक का जादुई आंकड़ा छूकर All India Rank-1 पर कब्जा जमाया। इसके बाद, NEET 2025 के इतिहास के सबसे कठिन माने जाने वाले पेपर में भी गुरुकृपा के ‘महेश’ ने अपने अचूक संकल्प से All India Rank-1 हासिल कर इस ऐतिहासिक जीत को एक अटूट परंपरा में बदल दिया। · प्रतिभाओं और उनके संघर्ष का ऐतिहासिक सम्मान:- सफलता केवल विद्यार्थी की नहीं, बल्कि पूरे परिवार के त्याग का परिणाम होती है। गुरुकृपा में हम इसे ‘सम्मान’ का रूप देते हैं। इसी भावना के तहत 2024 में टॉपर ‘सौरव’ को 51 लाख रुपये नकद पुरस्कार से नवाजा गया। वहीं, 2025 में टॉपर ‘महेश’ को 51 लाख रुपये नकद के साथ-साथ उनके माता-पिता के महान संघर्ष को नमन करते हुए एक शानदार कार भी भेंट की गई। · NEET 2025 में छप्परफाड़ सिलेक्शंस:- कठिन पेपर के बावजूद केवल क्लासरूम प्रोग्राम से 2711 से ज्यादा GCIians ने विभिन्न सरकारी मेडिकल कॉलेजों और AIIMS में अपनी जगह पक्की कर गुरुकृपा का परचम लहराया। आज देशभर के एम्स (AIIMS) संस्थानों की लगभग 200 सीटों पर गुरुकृपा के होनहारों ने अपना एकतरफा दबदबा कायम किया हुआ है। AIIMS दिल्ली में गुरुकृपा की बेटियों का परचम:- देश के सर्वोच्च मेडिकल संस्थान AIIMS दिल्ली की लगभग 125 सीटों में से 14 पर गुरुकृपा के सितारों ने कदम रखा है। इससे भी अधिक गौरव की बात यह है कि एम्स दिल्ली में देशभर से चयनित कुल 19 छात्राओं में से 4 बेटियां अकेले गुरुकृपा परिवार से हैं। यानी देश की शीर्ष मेडिकल प्रतिभाओं में लगभग 25% सीटों पर सीकर की संस्था की बेटियों ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। · फाउंडेशन के साथ मेडिकल कॉलेजों का सीधा टिकट:- साल 2025 में 315 GCIians ने 12वीं बोर्ड परीक्षाओं (फाउंडेशन कोर्स) के साथ ही बिना कोई साल ड्रॉप किए सीधे मेडिकल कॉलेजों में अपनी सीट पक्की कर ली, जो गुरुकृपा के मजबूत बेसिक एजुकेशन सिस्टम को दर्शाता है। JEE (इंजीनियरिंग) में भी गुरुकृपा के सितारों की चमक मेडिकल के साथ-साथ इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी गुरुकृपा के परिणाम अपने पहले ही बैच से शानदार रहे हैं। 2008 में गुरुकृपा पहले बैच के छात्र लालचंद बिस्सू ने IIT-JEE में सफलता हासिल की (जो आज भारत के मशहूर प्लेटफार्म ‘KUKU Fm’ के फाउंडर हैं), लालचंद बिस्सू के बाद 8200 से अधिक GCLians ने विभिन्न IITs, NITs एवं IIITs में पढ़कर देश-दुनिया में कोई टॉप MNCs में बड़े पदों पर हैं, तो किसी ने अपनी कंपनी खड़ी कर दी है। · JEE Academy की शानदार शुरुआत और अपार सफलता:- इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों को एक तनावमुक्त और विश्वस्तरीय माहौल देने के लिए 2024 में एक अत्याधुनिक और पूर्णतः समर्पित ‘JEE Academy’ की नींव रखी गई। बेहतरीन फैकल्टी और रिसर्च-बेस्ड मटेरियल के दम पर पहले ही साल (2024) में 48 विद्यार्थियों ने देश की टॉप IITs, NITs और IIITs में जगह बनाई। · 2025 में दोगुने सिलेक्शंस का नया रिकॉर्ड:- महज एक साल के भीतर ही सफलता का यह आंकड़ा दोगुना हो गया। 2025 में कुल 104 होनहारों ने देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश पाया। अतुलनीय इंफ्रास्ट्रक्चर और ‘Unmatched Personal Care’ गुरुकृपा की सबसे बड़ी ताकत उसकी ‘Unmatched Academics’ और 2000 से अधिक अनुभवी व श्रेष्ठ गुरुओं की मजबूत फ़ौज है। यहाँ कोई भी बच्चा भीड़ का हिस्सा या सिर्फ एक रोल नंबर नहीं है, बल्कि वह गुरुकृपा परिवार का एक अभिन्न सदस्य है। · एक कमरे से लेकर विशाल सुरक्षित आवासीय परिसरों तक का सफर:- 2008 में किराए के कमरे से शुरू हुआ यह सफर आज G1 से लेकर G13 तक की विशाल और आधुनिक इमारतों में तब्दील हो चुका है। ये केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं हैं, बल्कि बच्चों के लिए घर से दूर एक ‘सुरक्षित घर’ हैं, जहाँ उनकी हर जरूरत का ख्याल रखा जाता है। · स्वास्थ्य सर्वोपरि:- अभिभावक जब अपने बच्चों को दूर भेजते हैं, तो सबसे बड़ी चिंता उनके स्वास्थ्य की होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने स्वयं का ‘गुरुकृपा हॉस्पिटल’ स्थापित किया है। यहाँ 24 घंटे मेडिकल सुविधा उपलब्ध है ताकि कोई भी बच्चा अपनी पढ़ाई के दौरान स्वास्थ्य समस्याओं से परेशान न हो। · तनाव-मुक्त माहौल और डिप्रेशन से बचाव:- रात-रात भर चलने वाले डाउट काउंटर्स, हॉस्टल वार्डन का पारिवारिक अपनापन, और हर कदम पर मिलने वाली मेंटरशिप बच्चों को डिप्रेशन और तनाव से कोसों दूर रखती है। यहाँ बच्चों के सपनों को सिर्फ पंख ही नहीं, हौसलों का विशाल आसमान दिया जाता है। · बचपन से ही संस्कारों और स्कूली शिक्षा की मजबूत नींव:- शिक्षा और संस्कारों की नींव बचपन से ही मजबूत होनी चाहिए। इसी सोच के साथ 2020 में झुंझुनू (घोड़ीवारा) और 2023 में सीकर (बावड़ी) व सीकर (सेवद बड़ी) में ‘गुरुकृपा पब्लिक स्कूल’ की शुरुआत की गई, ताकि बच्चे शुरू से ही एक सही, सुरक्षित और अनुशासित माहौल में ढल सकें। देशभर में बढ़ रहा विश्वास: 2026 में आ गया है ‘गुरुकृपा लर्निंग पार्क’ · विस्तार और नए सेंटर्स:- गुरुकृपा पर देशभर के अभिभावकों का यह
3,000 रुपये बनाम 1,500 रुपये का कल्याण युद्ध: क्या बीजेपी बंगाल में ममता दीदी को ‘आउट’ करने की कोशिश कर रही है? | चुनाव समाचार

आखरी अपडेट:11 अप्रैल, 2026, 13:48 IST भाजपा का बंगाल घोषणापत्र एक स्पष्ट संकेत है कि विचारधारा माहौल तय कर सकती है, लेकिन चुनाव रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था पर जीते जा रहे हैं 2026 के घोषणापत्र से पता चलता है कि भाजपा अब ममता बनर्जी की कल्याण राजनीति को बदलने की कोशिश नहीं कर रही है; वह इसे दोहराने और उससे आगे निकलने की कोशिश कर रहा है। (पीटीआई) सभी सुर्खियाँ बटोरने वाले वादों – 60 दिनों के भीतर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के कार्यान्वयन, और अवैध आप्रवासन पर परिचित “पता लगाने, हटाने, निर्वासित करने” की पिच के लिए – भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का नवीनतम पश्चिम बंगाल घोषणापत्र कहीं अधिक परिणामी बदलाव का खुलासा करता है। राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी बयानबाजी के पीछे एक शांत लेकिन तीव्र पुनर्गणना निहित है: भाजपा अब लंबे समय से ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रभुत्व वाले कल्याण युद्धक्षेत्र में कदम रख रही है। 2021 का विधानसभा चुनाव, कई मायनों में, बंगाल में भाजपा के लिए एक बड़ा संकेत था, लेकिन साथ ही यह उसकी सीमाओं का एक सबक भी था। पार्टी ने पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा और ध्रुवीकरण जैसे विषयों से भरपूर अभियान चलाया। हालांकि यह एक महत्वपूर्ण वोट शेयर को मजबूत करने और केवल दो सीटों से 77 तक पहुंचने में सफल रही, लेकिन यह बनर्जी को हटाने में विफल रही, जिनकी राजनीतिक प्रवृत्ति अधिक तीव्र साबित हुई। उन्होंने अपने अभियान को मूर्त कल्याण वितरण में शामिल किया – नकद हस्तांतरण, सब्सिडी वाली योजनाएं, और प्रत्यक्ष लाभ जो ग्रामीण और शहरी बंगाल के घरों तक पहुंचे। 2026 के घोषणापत्र की ओर तेजी से आगे बढ़ें, और ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा ने उस सबक को आत्मसात कर लिया है। पार्टी ने अतिरिक्त वित्तीय सहायता कार्यक्रमों पर जोर देते हुए कम से कम चार मौजूदा टीएमसी योजनाओं को मात देने का वादा किया है। यह नीतिगत नकल से कहीं अधिक है। बीजेपी का वादा बनाम टीएमसी का ऑफर इस बार ऐसा लगता है कि बंगाल की राजनीतिक लड़ाई कल्याण पर सीधी लड़ाई है। बनर्जी के तहत टीएमसी के कल्याण मॉडल के केंद्र में लक्ष्मीर भंडार योजना है। 2021 में लॉन्च किया गया, यह महिलाओं को मासिक वित्तीय सहायता प्रदान करता है – शुरुआत में 500 रुपये, अब श्रेणी के आधार पर 1,000 रुपये से 1,200 रुपये तक की वृद्धि हुई है। जवाब में, भाजपा ने अधिक आक्रामक नकद हस्तांतरण मॉडल का वादा किया है, जो मध्यम वर्ग, निम्न-मध्यम वर्ग और गरीब महिलाओं को प्रति माह 3,000 रुपये की पेशकश करेगा, इसे वित्तीय स्वतंत्रता के लिए एक उपकरण के रूप में पेश किया जाएगा। यह प्रतियोगिता बेरोजगार युवाओं तक भी फैली हुई है। टीएमसी की युबा साथी योजना 21 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के बेरोजगार युवाओं को प्रति माह 1,500 रुपये प्रदान करती है। भाजपा ने दोगुनी राशि – 3,000 रुपये मासिक भत्ता, पांच वर्षों में एक करोड़ रोजगार सृजन के व्यापक वादे के साथ, रोजगार आश्वासन के साथ कल्याण को मिश्रित करने का प्रयास किया है। स्वास्थ्य सेवा में, टीएमसी का स्वास्थ्य साथी प्रति परिवार 5 लाख रुपये तक का बीमा कवरेज प्रदान करता है। भाजपा ने लाभार्थियों को केंद्रीय योजना आयुष्मान भारत के साथ एकीकृत करने का प्रस्ताव रखा है, जबकि कवरेज सीमा को 5 लाख रुपये से अधिक बढ़ाया है, जो विस्तार और केंद्रीय संरेखण दोनों का संकेत है। इसके अलावा, आयुष्मान भारत के साथ, लाभार्थी केवल पश्चिम बंगाल में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं, जैसा कि सत्य साथी के मामले में है। किसान भी इस कल्याणकारी द्वंद्व के केंद्र में हैं। टीएमसी के कृषक बंधु के तहत किसानों को 4,000 रुपये से 10,000 रुपये तक की वार्षिक सहायता मिलती है। भाजपा ने केंद्र की पीएम-किसान योजना को अतिरिक्त राज्य समर्थन के साथ जोड़कर इसे बढ़ाने का वादा किया है, जिससे कुल सहायता लगभग 9,000 रुपये सालाना हो जाएगी। भाजपा के अनुसार, नई प्रणाली के तहत वर्गीकरण में कोई भेदभाव नहीं होगा, जहां भाजपा के सत्ता में आने पर प्रत्येक किसान को समान राशि मिलेगी। यह बदलाव क्यों मायने रखता है? यह बंगाल में एक राजनीतिक सच्चाई की मौन स्वीकृति है- कल्याण सिर्फ शासन नहीं है, यह चुनावी मुद्रा है। पिछले कुछ वर्षों में बनर्जी ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जहां लक्ष्मीर भंडार और कन्याश्री जैसी योजनाओं के माध्यम से राज्य की उपस्थिति सीधे नागरिकों के जीवन में महसूस की जाती है। ये मुफ़्त चीज़ों से कहीं अधिक हैं; वे राज्य समर्थन के मासिक अनुस्मारक हैं जो जीवन को छूते हैं। भाजपा ने 2021 के चुनाव में इस मॉडल की भावनात्मक और आर्थिक ताकत को कम आंककर गलती की। नवंबर 2025 में भी, भाजपा ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें बंगाल की मुख्यमंत्री की खैरात की राजनीति की आलोचना की गई थी और दावा किया गया था कि उनकी मुफ्त चीज़ें “ऋण का जाल है, उपहार नहीं”। हालाँकि, बीजेपी को जल्द ही एहसास हुआ कि ग्रामीण बंगाल, विशेष रूप से दक्षिण बंगाल के ग्रामीण हिस्से, पार्टी के लिए तब तक निषिद्ध क्षेत्र बने रहेंगे जब तक कि वे परिवारों को टीएमसी के प्रति वफादार बनाने वाली खैरात का स्वागत नहीं करते। इसके विपरीत, 2026 के घोषणापत्र से पता चलता है कि भाजपा अब बनर्जी की कल्याण राजनीति को बदलने की कोशिश नहीं कर रही है; वह इसे दोहराने और उससे आगे निकलने की कोशिश कर रहा है। टीएमसी को उसके ही खेल में हराना? इससे एक गहरा सवाल उठता है: क्या बीजेपी टीएमसी को मात दे सकती है? यहां दो जोखिम हैं. पहला, विश्वसनीयता. कल्याणकारी राजनीति का मतलब सिर्फ योजनाओं की घोषणा करना नहीं है; यह डिलीवरी में विश्वास के बारे में है। बनर्जी की सरकार को सत्ता में रहने का लाभ मिलता है। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी चाहे जो भी वादा करें, तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने वादे तुरंत पूरे कर सकते हैं. किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए यह हमेशा एक अतिरिक्त लाभ होता है। दूसरा, भेदभाव. यदि दोनों पार्टियां समान लाभ का वादा कर रही हैं, तो मुकाबला विचारधारा से हटकर कार्यान्वयन और व्यक्तित्व पर केंद्रित हो जाता है। ऐसे परिदृश्य में, बनर्जी की
सड़क पर तिरंगा फेंकने वाले तीन लोग हिरासत में:सीहोर- राष्ट्रीय ध्वज बिछाकर कुचलने का आरोप, जानबूझकर देश की भावनाओं को ठेस पहुंचाई

सीहोर जिले के दोराहा थाना क्षेत्र के ग्राम सिराड़ी में राष्ट्रध्वज के अपमान का एक मामला सामने आया है। पुलिस ने इस संबंध में तीन आरोपियों को हिरासत में लिया है और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। जानकारी के अनुसार, कुछ व्यक्तियों ने राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगे’ को बीच सड़क पर बिछा दिया। उन्होंने तिरंगे के चारों कोनों पर पत्थर रखे और कथित तौर पर उसे पैरों से कुचला। ग्राम निवासी राहुल दांगी ने पुलिस को लिखित शिकायत दी। उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपियों ने जानबूझकर देश की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से यह कृत्य किया। इस घटना को देखकर ग्रामीणों में रोष फैल गया और तत्काल डायल 112 पर सूचना दी गई। दो तस्वीरें देखिए तीन लोग पुलिस हिरासत में सूचना मिलते ही दोराहा थाना पुलिस मौके पर पहुंची और तिरंगे को सम्मानपूर्वक हटाया। दोराहा थाना प्रभारी राजेश सिन्हा ने बताया कि मामले में त्वरित कार्रवाई की गई है। पुलिस ने सलीम खान, जलील खान उर्फ गुड्डू और समीर खान नामक तीन आरोपियों को हिरासत में लिया है। तीनों आरोपियों के खिलाफ ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ की धारा 2 एवं 3 के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही है।
क्या काला चना सफेद चने से ज्यादा फायदेमंद है? प्रोटीन, फाइबर, वेट लॉस के नजरिए से आपके लिए कौन सा है असली सुपरफूड

Last Updated:April 11, 2026, 13:30 IST Desi Chana Vs Kabuli Chana : भारतीय रसोई में चने का एक विशेष स्थान है. फिर चाहे वह सुबह का नाश्ता हो या रात का डिनर. लेकिन अक्सर लोग इस बात को लेकर उलझन में रहते हैं कि काले चने (Desi Chana) और सफेद चने (Kabuli Chana) में से कौन सा ज्यादा पोषण से भरा है. विशेष रूप से जब बात वजन घटाने, ब्लड शुगर कंट्रोल और प्रोटीन की आती है, तो इन दोनों के बीच के अंतर को समझना बहुत ज़रूरी हो जाता है. जानते हैं कि आपके सेहत के लिए कौन सा चना बेहतर है. Black chickpeas vs white chickpeas : प्रोटीन की बात करें तो काले और सफेद, दोनों ही चने पौधों पर आधारित प्रोटीन (Plant-based protein) के बेहतरीन स्रोत हैं. हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक, इनमें प्रोटीन की मात्रा काफी हद तक समान होती है, जो उनकी किस्म और उगाने की परिस्थितियों पर निर्भर करती है. हालांकि कुछ डेटा काले चने को थोड़ा बेहतर बताते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से दोनों ही मांसपेशियों के निर्माण के लिए अच्छे हैं. फाइबर और पाचन शक्ति- काले चने में सफेद चने की तुलना में कुल और अघुलनशील फाइबर (Insoluble Fiber) अधिक होता है. इसका कारण काले चने का मोटा और सख्त छिलका है. अधिक फाइबर का मतलब है कि आपका पेट लंबे समय तक भरा रहेगा, जिससे बेवजह की भूख (Snacking) नहीं लगती. यह कब्ज जैसी समस्याओं को दूर करने और बाउल मूवमेंट को नियमित करने में भी काफी मददगार साबित होता है, जो वजन घटाने की प्रक्रिया में सहायक है. ब्लड शुगर कंट्रोल और डायबिटीज- डायबिटीज के मरीजों के लिए काला चना अक्सर पहली पसंद होता है. अधिक फाइबर और इसके गहरे रंग के छिलके में मौजूद पॉलीफेनोल्स के कारण इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) काफी कम होता है. यह खून में शुगर के स्तर को अचानक बढ़ने से रोकता है. हालांकि काबुली चना भी लो-जीआई (Low-GI) श्रेणी में आता है, लेकिन अगर ब्लड शुगर मैनेजमेंट आपकी प्राथमिकता है, तो काला चना एक बेहतर विकल्प साबित होता है. Add News18 as Preferred Source on Google दिल की सेहत और एंटीऑक्सीडेंट्स- काले चने के गहरे रंग के छिलके में फिनोलिक्स और फ्लेवोनोइड्स जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स अधिक मात्रा में पाए जाते हैं. ये तत्व कार्डियोमेटाबोलिक के लिए अच्छा होता है और शरीर में सूजन कम करने में मदद करते हैं. साथ ही, दोनों ही चने कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने में सहायक हैं. जब आप रिफाइंड कार्ब्स या प्रोसेस्ड मीट की जगह इन चनों को डाइट में शामिल करते हैं, तो आपके दिल की सेहत में सुधार होता है. आयरन और खनिजों का भंडार- पोषण संबंधी विश्लेषणों से पता चलता है कि काले चने में आयरन और कुछ विशिष्ट खनिजों की मात्रा सफेद चने से अधिक होती है. इसके मोटे छिलके में आयरन की सघनता ज्यादा होती है. यदि आप एनीमिया से बचना चाहते हैं या शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाना चाहते हैं, तो काला चना एक प्राकृतिक और सस्ता उपाय है. हालांकि, आयरन के बेहतर अवशोषण के लिए इसे विटामिन-सी (जैसे नींबू का रस) के साथ लेना न भूलें. पाचन में आसान भी- इतने सारे फायदों के बावजूद, काला चना हर किसी को रास नहीं आता. इसका उच्च फाइबर सामग्री संवेदनशील पेट वाले लोगों में गैस या पेट फूलने (Bloating) की समस्या पैदा कर सकती है. इसके विपरीत, काबुली चने का छिलका पतला और बनावट नरम होती है, जिससे इसे पचाना आसान होता है. अगर आपको पाचन की समस्या है, तो चने को अच्छी तरह भिगोकर और पूरी तरह पकाकर ही खाएं. वजन घटाने के लिए- वजन घटाने के लिए काले चने को अपनी उच्च फाइबर सामग्री और कम जीआई स्कोर के कारण थोड़ी बढ़त हासिल है. यह तृप्ति (Satiety) को बढ़ाता है और इंसुलिन रिस्पॉन्स को बेहतर करता है. फिर भी, काबुली चना भी एक हेल्दी विकल्प है बशर्ते आप इसकी मात्रा (Portion Control) का ध्यान रखें. याद रखें, अंततः आपकी पूरी थाली मायने रखती है मसालों में तेल और घी की मात्रा कम रखें और चने को ढेर सारी सब्जियों के साथ मिलाकर खाएं.(डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है. यह किसी भी तरह की चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है. अपनी डाइट में बड़े बदलाव करने से पहले विशेषज्ञ से परामर्श लें.) First Published : April 11, 2026, 13:30 IST








