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‘परफेक्ट मां’ बनने का प्रेशर:देश की 22% माताएं डिप्रेशन में, हर समय खुश रहने का दबाव खतरनाक

‘परफेक्ट मां’ बनने का प्रेशर:देश की 22% माताएं डिप्रेशन में, हर समय खुश रहने का दबाव खतरनाक

भारत में मां बनना अब पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया है। आंकड़ों के अनुसार मातृ मृत्यु दर में गिरावट आई है। 2014-16 में जहां एक लाख जन्म पर 130 मौतें होती थीं, जो कि अब घटकर 88 पर आ गई हैं। 89 प्रतिशत से ज्यादा डिलीवरी अब अस्पतालों में हो रही हैं। लेकिन क्या एक मां मानसिक रूप से भी उतनी ही स्वस्थ हैं, जितनी शारीरिक रूप से? नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, अमेरिका के मुताबिक भारत में लगभग 22 फीसदी महिलाएं गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के बाद गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि मां की शारीरिक सुरक्षा के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी है। ‘नेशनल सेफ मदरहुड डे’ (11 अप्रैल) पर यह समझना जरूरी है कि सुरक्षित मातृत्व, स्वस्थ बच्चे के जन्म के साथ ही मां की मानसिक सेहत से भी जुड़ा है। आइए मेडिकल तथ्यों के नजरिए से समझते हैं मातृत्व का वह अनदेखा पहलू, जिस पर समाज आज भी बात नहीं करता। जानते हैं महिलाओं की मानसिक स्थिति से जुड़े खतरों के 4 संकेत और उनसे निपटने के उपाय भास्कर एक्सपर्ट तीन विशेषज्ञों से जानें सेफ मदरहुड के सही मायने, डॉ. सुनीला खंडेलवाल(स्त्री और प्रसूती रोग विशेषज्ञ), डॉ. स्मिता वैद कंसल्टेंट गाइनी और रोबोटिक सर्जन, डॉ. स्तुति कैलिफोर्निया (बर्कले यूनि. में एसोसिएट प्रोफेसर) 1. पॉजिटिव टॉक्सिसिटी – 23 फीसदी माताएं प्रभावित प्रेगनेंसी में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रॉन का उतार-चढ़ाव दिमाग पर असर डालता है, जिससे और एंग्जायटी बढ़ती है। जबरदस्ती खुश रहने के दबाव में नई मां असली भावनाएं दबा देती हैं, जिससे चिंता, थकान, इमोशनल डिस्कनेक्ट महसूस होता है। 14-23% महिलाएं क्लीनिकल एंग्जायटी से प्रभावित होती हैं।
एक्सपर्ट टिप – गर्भवती महिला पर ‘हर वक्त खुश रहने’ का दबाव न डालें। एंग्जायटी ज्यादा हो तो गाइनेकोलॉजिस्ट के साथ मनोवैज्ञानिक की भी मदद लें। 2. टोकोफोबिया – 14 से 16.5% महिलाओं में डिलीवरी का डर
करीब 14-16% महिलाएं टोकोफोबिया यानी डिलीवरी के डर से जूझती हैं। यह डर पिछले खराब अनुभव या लेबर पेन के कारण हो सकता है। ऐसे में कई महिलाएं सी-सेक्शन चुनती हैं। परिवार का कम सपोर्ट, अनप्लान्ड प्रेग्नेंसी, लड़का होने का दबाव और 35 साल की उम्र के बाद तनाव और बढ़ जाता है। एक्सपर्ट टिप – डॉक्टर से डिलीवरी की प्रक्रिया और पेन मैनेजमेंट पर बात करें। एंटीनेटल क्लासेस, काउंसलिंग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज से डर कम किया जा सकता है। 3. ब्रेस्टफीडिंग न करा पाना – मां के लिए तनाव का बड़ा कारण
शिशु के लिए पहले 6 महीने केवल स्तनपान की सलाह दी जाती है। लेकिन डिलीवरी के बाद कई महिलाएं चाहकर भी ब्रेस्टफीडिंग नहीं करा पाती। इसके पीछे अच्छी डाइट की कमी, पीसीओएस, थायरॉयड, डायबिटीज, ब्रेस्ट सर्जरी, प्रोलैक्टिन हॉर्मोन की कमी, तनाव, डिलीवरी के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग जैसे मेडिकल कारण हो सकते हैं। साथ ही डिलीवरी के बाद कम पानी पीना भी इसकी एक बड़ी वजह है।
एक्सपर्ट टिप – ब्रेस्टीफीडिंग में दिक्कत हो, तो फॉर्मूला फीडिंग एक विकल्प है। बस, बच्चा भूखा नहीं रहना चाहिए। इसकी मात्रा और देने का तरीका पीडियाट्रिशियन से डिस्कस कर लें। 4. प्रेगनेंसी के बाद डिप्रेशन – नवजात से दूरी और अलगाव
डिलीवरी के बाद करीब 70-80% मांएं मानसिक अस्थिरता से गुजरती हैं, जिसे ‘बेबी ब्लूज’ कहा जाता है। इसमें शुरुआती 2-3 दिनों तक थकान, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन रहता है, जो आमतौर पर 1-2 हफ्तों में ठीक हो जाता है। लेकिन अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) हो सकता है, जो करीब 15-20% महिलाओं में देखा जाता है। इसमें उदासी, तनाव, नींद और भूख में बदलाव, बच्चे से दूरी, परिवार और दोस्तों से अलगाव जैसे लक्षण होते हैं। गंभीर स्थिति में मां खुद को या बच्चे को नुकसान भी पहुंचा सकती है। एक्सपर्ट के अनुसार, अमेरिका में PPD के मामले ज्यादा देखे जाते हैं, क्योंकि वहां न्यूक्लियर फैमिली, देर से शादी और देर से मां बनने का ट्रेंड है। PPD के लक्षण अक्सर 6-8 हफ्तों बाद सामने आते हैं, जिनका इलाज काउंसलिंग, दवाइयों और बॉडी-माइंड थेरेपी से किया जाता है। एक्सपर्ट टिप – इसका सबसे बड़ा फैक्टर सोशल सपोर्ट की कमी है। इसलिए मां के लिए परिवार का साथ बहुत जरूरी है। अगर इनमें से कोई लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।

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भारत में मां बनना अब पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया है। आंकड़ों के अनुसार मातृ मृत्यु दर में गिरावट आई है। 2014-16 में जहां एक लाख जन्म पर 130 मौतें होती थीं, जो कि अब घटकर 88 पर आ गई हैं। 89 प्रतिशत से ज्यादा डिलीवरी अब अस्पतालों में हो रही हैं। लेकिन क्या एक मां मानसिक रूप से भी उतनी ही स्वस्थ हैं, जितनी शारीरिक रूप से? नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ, अमेरिका के मुताबिक भारत में लगभग 22 फीसदी महिलाएं गर्भावस्था के दौरान या बच्चे के जन्म के बाद गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करती हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि मां की शारीरिक सुरक्षा के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी है। ‘नेशनल सेफ मदरहुड डे’ (11 अप्रैल) पर यह समझना जरूरी है कि सुरक्षित मातृत्व, स्वस्थ बच्चे के जन्म के साथ ही मां की मानसिक सेहत से भी जुड़ा है। आइए मेडिकल तथ्यों के नजरिए से समझते हैं मातृत्व का वह अनदेखा पहलू, जिस पर समाज आज भी बात नहीं करता। जानते हैं महिलाओं की मानसिक स्थिति से जुड़े खतरों के 4 संकेत और उनसे निपटने के उपाय भास्कर एक्सपर्ट तीन विशेषज्ञों से जानें सेफ मदरहुड के सही मायने, डॉ. सुनीला खंडेलवाल(स्त्री और प्रसूती रोग विशेषज्ञ), डॉ. स्मिता वैद कंसल्टेंट गाइनी और रोबोटिक सर्जन, डॉ. स्तुति कैलिफोर्निया (बर्कले यूनि. में एसोसिएट प्रोफेसर) 1. पॉजिटिव टॉक्सिसिटी – 23 फीसदी माताएं प्रभावित प्रेगनेंसी में एस्ट्रोजन व प्रोजेस्ट्रॉन का उतार-चढ़ाव दिमाग पर असर डालता है, जिससे और एंग्जायटी बढ़ती है। जबरदस्ती खुश रहने के दबाव में नई मां असली भावनाएं दबा देती हैं, जिससे चिंता, थकान, इमोशनल डिस्कनेक्ट महसूस होता है। 14-23% महिलाएं क्लीनिकल एंग्जायटी से प्रभावित होती हैं।
एक्सपर्ट टिप – गर्भवती महिला पर ‘हर वक्त खुश रहने’ का दबाव न डालें। एंग्जायटी ज्यादा हो तो गाइनेकोलॉजिस्ट के साथ मनोवैज्ञानिक की भी मदद लें। 2. टोकोफोबिया – 14 से 16.5% महिलाओं में डिलीवरी का डर
करीब 14-16% महिलाएं टोकोफोबिया यानी डिलीवरी के डर से जूझती हैं। यह डर पिछले खराब अनुभव या लेबर पेन के कारण हो सकता है। ऐसे में कई महिलाएं सी-सेक्शन चुनती हैं। परिवार का कम सपोर्ट, अनप्लान्ड प्रेग्नेंसी, लड़का होने का दबाव और 35 साल की उम्र के बाद तनाव और बढ़ जाता है। एक्सपर्ट टिप – डॉक्टर से डिलीवरी की प्रक्रिया और पेन मैनेजमेंट पर बात करें। एंटीनेटल क्लासेस, काउंसलिंग और ब्रीदिंग एक्सरसाइज से डर कम किया जा सकता है। 3. ब्रेस्टफीडिंग न करा पाना – मां के लिए तनाव का बड़ा कारण
शिशु के लिए पहले 6 महीने केवल स्तनपान की सलाह दी जाती है। लेकिन डिलीवरी के बाद कई महिलाएं चाहकर भी ब्रेस्टफीडिंग नहीं करा पाती। इसके पीछे अच्छी डाइट की कमी, पीसीओएस, थायरॉयड, डायबिटीज, ब्रेस्ट सर्जरी, प्रोलैक्टिन हॉर्मोन की कमी, तनाव, डिलीवरी के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग जैसे मेडिकल कारण हो सकते हैं। साथ ही डिलीवरी के बाद कम पानी पीना भी इसकी एक बड़ी वजह है।
एक्सपर्ट टिप – ब्रेस्टीफीडिंग में दिक्कत हो, तो फॉर्मूला फीडिंग एक विकल्प है। बस, बच्चा भूखा नहीं रहना चाहिए। इसकी मात्रा और देने का तरीका पीडियाट्रिशियन से डिस्कस कर लें। 4. प्रेगनेंसी के बाद डिप्रेशन – नवजात से दूरी और अलगाव
डिलीवरी के बाद करीब 70-80% मांएं मानसिक अस्थिरता से गुजरती हैं, जिसे ‘बेबी ब्लूज’ कहा जाता है। इसमें शुरुआती 2-3 दिनों तक थकान, नींद की कमी और चिड़चिड़ापन रहता है, जो आमतौर पर 1-2 हफ्तों में ठीक हो जाता है। लेकिन अगर ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन (PPD) हो सकता है, जो करीब 15-20% महिलाओं में देखा जाता है। इसमें उदासी, तनाव, नींद और भूख में बदलाव, बच्चे से दूरी, परिवार और दोस्तों से अलगाव जैसे लक्षण होते हैं। गंभीर स्थिति में मां खुद को या बच्चे को नुकसान भी पहुंचा सकती है। एक्सपर्ट के अनुसार, अमेरिका में PPD के मामले ज्यादा देखे जाते हैं, क्योंकि वहां न्यूक्लियर फैमिली, देर से शादी और देर से मां बनने का ट्रेंड है। PPD के लक्षण अक्सर 6-8 हफ्तों बाद सामने आते हैं, जिनका इलाज काउंसलिंग, दवाइयों और बॉडी-माइंड थेरेपी से किया जाता है। एक्सपर्ट टिप – इसका सबसे बड़ा फैक्टर सोशल सपोर्ट की कमी है। इसलिए मां के लिए परिवार का साथ बहुत जरूरी है। अगर इनमें से कोई लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।

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