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Health Tips: लू से बचाव में कितना कारगर है प्याज? जानिए एक्सपर्ट की सलाह और देसी उपाय

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Last Updated:May 04, 2026, 17:13 IST Heat Stroke Prevention Measures: जोधपुर सहित मरुस्थलीय क्षेत्रों में बढ़ती गर्मी और लू का असर लोगों के स्वास्थ्य पर दिखने लगा है. ऐसे में पारंपरिक उपायों में प्याज का सेवन फिर चर्चा में है. चिकित्सकों के अनुसार, प्याज शरीर में पानी और लवण का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है, जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा कम होता है. इसके साथ ही लोगों को अधिक तरल पदार्थ लेने, धूप से बचने और सुबह-शाम बाहर निकलने की सलाह दी गई है. ये देसी उपाय आज भी लू से बचाव में कारगर माने जा रहे हैं. ख़बरें फटाफट जोधपुर. मरुस्थलीय क्षेत्रों में पड़ रही तेज गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच लोगों के स्वास्थ्य पर असर साफ नजर आने लगा है. ऐसे में पारंपरिक उपाय एक बार फिर चर्चा में हैं, जिनमें प्याज का सेवन खास तौर पर अहम माना जा रहा है. ग्रामीण और बुजुर्गों की मान्यता है कि गर्मी के दिनों में नियमित रूप से प्याज खाने से शरीर पर लू का असर कम पड़ता है. यही कारण है कि रेगिस्तानी इलाकों में आज भी लोग अपने भोजन में प्याज को प्रमुखता देते हैं. बढ़ते तापमान के बीच यह देसी उपाय लोगों के लिए राहत का साधन बनता दिख रहा है. डॉक्टर मोहन मकवाना ने जानकारी देते हुए बताया कि गर्मी के मौसम में शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद जरूरी होता है. प्याज के सेवन से शरीर में पानी और लवण का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है, जिससे डिहाइड्रेशन का खतरा कम हो जाता है. इसके साथ ही उन्होंने सलाह दी कि तेज धूप में बाहर निकलने से बचना चाहिए और यदि आवश्यक हो तो सिर को ढककर ही बाहर जाएं. गर्मी से बचने के लिए अपनाएं ये तरीका उन्होंने बताया कि दिन में निकलने के बजाय सुबह या शाम के समय बाहर निकलना अधिक सुरक्षित रहता है. अधिक से अधिक तरल पदार्थ जैसे पानी, छाछ, नींबू पानी और अन्य पेय पदार्थों का सेवन करने से शरीर को ठंडक मिलती है और लू से बचाव संभव होता है. विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा दोनों का संतुलन ही गर्मी से बचाव का बेहतर तरीका है. रेगिस्तानी इलाके में लंबे समय समय से अपनाए जा रहे हैं ये तरीके जहां एक ओर प्याज जैसे घरेलू उपाय शरीर को अंदर से ठंडक पहुंचाते हैं, वहीं दूसरी ओर नियमित रूप से पानी पीना और धूप से बचाव जैसे उपाय बेहद जरूरी हैं .रेगिस्तानी इलाकों में लंबे समय से अपनाए जा रहे ये तरीके आज भी उतने ही कारगर साबित हो रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि लोग इन सरल उपायों को अपनाकर खुद को और अपने परिवार को लू के खतरों से सुरक्षित रखें. About the Author deep ranjan दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से News18 हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Jodhpur,Rajasthan

NEET Exam Center Controversy | Rajasthan Burqa Entry Row 2026

NEET Exam Center Controversy | Rajasthan Burqa Entry Row 2026

12 मिनट पहले कॉपी लिंक 3 मई को हुई NEET UG परीक्षा के एग्‍जाम सेंटर वीडियोज इस साल भी वायरल हैं। अलग-अलग राज्यों में छात्र छात्राओं की सख्‍ती से चेकिंग के वीडियोज सोशल मीडिया पर शेयर किए जा रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं जो चर्चा का विषय बने हैं। बुर्का पहनकर सेंटर पहुंची छात्रा पहला वीडियो राजस्थान के बाड़मेर जिले का है, जिसमें बुर्का पहने एक NEET एस्पिरेंट को बस चेहरा आडेंटिफाई करके एग्जाम सेंटर में एंट्री मिल गई। इस वीडियो पर कईयों का कहना है कि इतनी सख्‍त चेकिंग के बीच किसी को बुर्का पहनकर एग्‍जाम सेंटर में घुसने की इजाजत कैसे दी जा रही है। हालांकि, इस वीडियो के आधार पर यह स्‍पष्‍ट नहीं है कि छात्रा को पेपर देने की अनुमति मिली है। वीडियो में छात्रा चेकिंग कराकर आगे जाते दिखाई दे रही है। छात्रा से उतरवाई तुलसी माला वहीं दूसरा वीडियो गुजरात के सूरत का है, जहां एक छात्रा को कंठी (तुलसी माला) के साथ एंट्री नहीं मिलने पर काफी बवाल हुआ। वीडियो में छात्रा के पिता ने इस सख्त चेकिंग को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने ये तक कह दिया कि ‘हम सूरत में हैं, पाकिस्तान में नहीं।’ छात्रा को वापस कंठी पहनाता पिता। एग्जाम में बुर्का अलाउड नहीं, फिर इसके साथ एंट्री कैसे? इसके बाद सोशल मीडिया पर ऑनलाइन डिबेट-सी छिड़ गई कि एक ओर इतनी सख्त चेकिंग जहां हिंदू धर्म के प्रतीकों तक को नहीं छोड़ा जा रहा, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम कैंडिडेट को बुर्का के साथ एग्जाम सेंटर में एंट्री मिली। वो भी तब जबकि NEET एग्जाम में हिजाब तो अलाउड है पर बुर्का नहीं। रबड़बैंड-कलावा कटवाया, इन सबमें पढ़ा हुआ भूली इसी बीच NEET 2024 क्वालिफाई करने वाली एक डॉक्टर की भी वीडियो वायरल हुई, जिसमें उन्होंने 2024 में अपने एग्जाम का अनुभव साझा किया है। उन्होंने बताया कि एग्जाम सेंटर में एंट्री से पहले कलावा कटवाया था, रबड़बैंड तक हटाने को कह दिया था। वो आगे कहती हैं, ‘इन सबके चक्कर में इतना क्यॉटिक माहौल हो गया था कि जितना मैंने पढ़ा था, उससे ज्यादा तो मैं भूल रही थी। उस वक्त मुझे बुखार तक आ गया।’ सीकर में पजामे का नाड़ा-चेन काटकर हटाया, फिर एंट्री तीसरा वीडियो भी राजस्थान के सीकर का है, जिसमें कैंडिडेट्स के पजामे का नाड़ा और यहां तक कि चेन भी काटकर निकाला गया। इसके बाद ही एंट्री मिली। 🚨लोवर या पैंट की ज़िप से क्या तात्पर्य?? आप बताएं🤔3 मई 2026 को सीकर में NEET परीक्षा कड़ी सुरक्षा और कड़ी चेकिंग (धागे, चैन तक की तलाशी) के बीच शांतिपूर्वक संपन्न हुई। पिपराली और फतेहपुर रोड पर भारी ट्रैफिक जाम रहा। बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के बाद ही छात्रों को केंद्र में… pic.twitter.com/7UYcuD980q— Abhimanyu Singh (@Abhimanyu1305) May 4, 2026 चौथा वीडियो तमिलनाडु के नामक्कल जिले का है, जहां एक छात्र को एडमिट कार्ड पर लगी सेम फोटो साथ नहीं लाने पर सेंटर में एंट्री नहीं मिली। 20.05 लाख कैंडिडेट्स एग्जाम देने पहुंचे ऐसे कुछ बवालों के बावजूद 3 मई को NEET एग्जाम सफल हुआ। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के मुताबिक, NEET UG 2026 में करीब 20.05 लाख कैंडिडेट्स एग्जाम देने पहुंचे। इस एग्जाम के लिए 22.79 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने रजिस्ट्रेशन किया था। NTA के ऑफिशियल नोटिस के मुताबिक, 3 मई को देश के 551 शहरों और देश के बाहर के 14 शहरों के एग्जामिनेशन सेंटर्स पर एग्जाम हुए। एग्जाम दोपहर 2 से शाम 5 बजे तक ऑफलाइन मोड यानी पेन-पेपर मोड में आयोजित हुई थी। NEET UG 2026 का पेपर बैलेंस्ड, लेकिन लेंदी रहा दिल्ली में विशनरी मास्टर्ज के डायरेक्टर हरप्रीत सिंह के मुताबिक, NEET UG 2026 परीक्षा का स्तर कुल मिलाकर मॉडरेट रहा। हालांकि, अभ्यर्थियों के मुताबिक पेपर बैलेंस्ड, लेकिन लेंदी था। फिजिक्स सेक्शन रैंक डिसाइडिंग फैक्टर साबित हो सकता है फिजिक्स वाला सेक्शन काफी चैलेंजिग रहा, जिसमें करेंट करेंट इलेक्ट्रिसिटी, मैग्नेटिक इफेक्ट्स, जैसे विषयों से कॉन्सेप्चुअल और कैलकुलेटिव सवाल ज्यादा पूछे गए, जिससे ये सेक्शन रैंक डिसाइडिंग फैक्टर साबित हो सकता है। केमिस्ट्री में ज्यादातर सवाल NCERT बेस्ड केमिस्ट्री का लेवल आसान से मॉडरेट रहा, जहां फिजिकल केमिस्ट्री आसान रही, जबकि ऑर्गेनिक केमिस्ट्री के कुछ सवाल थोड़े पेचीदा थे और ज्यादातर सवाल NCERT बेस्ड थे। बायोलॉजी में एस्पिरेंट्स की कॉन्सेप्चुअल अंडरस्टैंडिंग को परखा बायोलॉजी सबसे ज्यादा स्कोरिंग सेक्शन रहा, जिसमें Human Physiology, Genetics, Biotechnology और Plant Physiology जैसे टॉपिक्स से सीधे सवाल पूछे गए। इस साल बायोलॉजी सेक्शन में स्टेटमेंट-बेस्ड और मैच-द-कोलम जैसे ज्यादा सवाल रहे, जिनमें एस्पिरेंट्स की कॉन्सेप्चुअल अंडरस्टैंडिंग, NCERT की लाइन-बाई-लाइन समझ और आपस में मिलते-जुलते कॉन्सेप्ट्स में अंतर करने की क्षमता को परखा गया, न कि सिर्फ रटने की क्षमता को। कुल मिलाकर पेपर में कॉन्सेप्ट की समझ और NCERT पर पकड़ को प्रायॉरिटी दी गई और एस्पिरेंट्स का मानना है कि सवाल आसान थे, लेकिन अच्छा स्कोर करने के लिए टाइम मैनेजमेंट बेहद जरूरी रहा। स्टोरी – सोनाली राय —————————– ये खबर भी पढ़ें… NEET-एस्पिरेंट अंकिता का एडमिट कार्ड मलबे में दबा, वीडियो वायरल:एग्जाम से एक दिन पहले घर टूटा और डॉक्टर बनने का सपना भी आज 3 मई को देशभर में NEET का एग्जाम हुआ। इससे ठीक एक दिन पहले, जहां एक ओर सारे एस्पिरेंट्स इसकी आखिरी तैयारी में लगे थे, वहीं दूसरी ओर भोपाल की NEET एस्पिरेंट अंकिता दांगी मलबे में से अपना एडमिट कार्ड खोज रही थी। वही मलबा जो शनिवार सुबह तक उसका घर था। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

फुल क्रीम और टोन्ड मिल्क में क्या अंतर है? किस दूध में ज्यादा पोषक तत्व, आपके लिए क्या बेहतर

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Last Updated:May 04, 2026, 16:52 IST Full Cream vs Toned Milk: जब आप दूध खरीदने जाते हैं, तो दुकानदार पूछता है फुल क्रीम चाहिए या टोन्ड मिल्क? अक्सर लोग इसे लेकर कंफ्यूज हो जाते हैं. एक्सपर्ट्स की मानें तो फुल क्रीम और टोन्ड मिल्क में मुख्य अंतर फैट और कैलोरी का होता है, जबकि बाकी पोषक तत्व लगभग समान रहते हैं. लोग अपनी जरूरत के अनुसार इन दोनों में से कोई एक चुन सकते हैं. फुल क्रीम मिल्क और टोन्ड मिल्क में मुख्य अंतर फैट का होता है. Full Cream vs Toned Milk Benefits: दूध हमारी डाइट का अहम हिस्सा है और यह शरीर के लिए बेहद जरूरी होता है. पुराने समय में लोग गाय-भैंस का दूध पीते थे, लेकिन अब शहरों में अधिकतर लोगों के पास सिर्फ पैकेट वाला दूध खरीदने का ऑप्शन है. पैकेट में कई तरह का दूध बिकता है. आमतौर पर जब भी लोग दूध खरीदने जाते हैं, तब उनके पास फुल क्रीम मिल्क और टोन्ड मिल्क का ऑप्शन होता है. यह देखकर कई लोग कंफ्यूज हो जाते हैं. मन में सवाल आता है कि फुल क्रीम और टोन्ड मिल्क क्या है. दोनों में क्या अंतर होता है और सेहत के लिए कौन सा ऑप्शन बेहतर है. इस बारे में आपको जरूरी बातें जान लेनी चाहिए. क्या है फुल क्रीम और टोन्ड मिल्क ? फुल क्रीम मिल्क में फैट की मात्रा ज्यादा होती है. आमतौर पर इस दूध में लगभग 6% तक फैट होता है. यह दूध ज्यादा गाढ़ा और क्रीमी होता है, इसलिए इसका स्वाद भी ज्यादा रिच होता है. इसमें कैलोरी अधिक होती है, जो बच्चों, एथलीट्स या वजन बढ़ाने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है. इसके अलावा इसमें फैट सॉल्यूबल विटामिन्स भी अच्छी मात्रा में होते हैं. टोन्ड मिल्क में फैट की मात्रा कम कर दी जाती है, जो लगभग 3% के आसपास होती है. इसे बनाने के लिए फुल क्रीम दूध में स्किम्ड मिल्क और पानी मिलाया जाता है. स्किम्ड मिल्क वह दूध होता है, जिसकी मलाई निकाल ली जाती है. इसका स्वाद हल्का होता है और यह कम कैलोरी वाला विकल्प है. यह उन लोगों के लिए बेहतर है, जो वजन कंट्रोल करना चाहते हैं. सेहत के लिए कौन सा दूध बेहतर? पोषण के लिहाज से देखा जाए तो दोनों तरह के दूध में प्रोटीन, कैल्शियम और जरूरी मिनरल्स लगभग समान मात्रा में होते हैं. फर्क सिर्फ फैट और कैलोरी का होता है. अगर आप कम फैट लेना चाहते हैं, तो टोन्ड मिल्क सही रहेगा. अगर आपको ज्यादा एनर्जी और रिच टेस्ट चाहिए, तो फुल क्रीम मिल्क बेहतर विकल्प है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार बच्चों के लिए फुल क्रीम दूध ज्यादा फायदेमंद होता है, क्योंकि उन्हें ग्रोथ के लिए ज्यादा फैट और एनर्जी की जरूरत होती है. जो लोग वजन घटाना चाहते हैं या हार्ट से जुड़ी समस्याओं से बचना चाहते हैं, उनके लिए टोन्ड मिल्क ज्यादा फायदेमंद माना जाता है. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें

प्रचंड गर्मी ने आगरा के लोगों को किया जीना मुश्किल, अस्पताल में बढ़ी मरीजों की संख्या, एक्सपर्ट ने दी खास सलाह

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Last Updated:May 04, 2026, 16:50 IST Agra News: भीषण गर्मी के प्रकोप से आगरा के लोगों का जीना मुश्किल हो रहा है. मई की शुरुआत हो चुकी है. ऐसे में चिपचिपी गर्मी ने लोगों का हाल बेहाल कर दिया है. आगरा के जिला अस्पताल और सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज में अचानक मरीजों की संख्या बढ़ गई है. एक्सपर्ट ने इस प्रचंड गर्मी से बचने के लिए लोगों को कुछ उपाय बताए हैं. आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा में भीषण गर्मी ने दस्तक दे दी है. आगरा में तापमान 40 पार पहुंच गया है. हालांकि पिछले एक-दो दिन पहले हल्की बूंदाबादी से तापमान में गिरावट आई थी, लेकिन फिर वही हाल है. मई की शुरुआत हो चुकी है. ऐसे में चिपचिपी गर्मी ने लोगों का हाल बेहाल कर दिया है. आगरा के जिला अस्पताल और सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज में अचानक मरीजों की संख्या बढ़ गई है. जिला अस्पताल के चिकित्सक आशीष मित्तल ने बताया कि लू, दस्त, उल्टी, बुखार जैसे मरीज अचानक बढ़ गए है. उन्होंने कहा कि अस्पताल कि ओपीडी हर वक़्त फुल जा रही है. लोगों को बताया जा रहा है कि यह सब समस्या गर्मी की वजह से हो रही है. उन्होंने कहा कि लोगों को सलाह दी जा रही है कि बेवजह दोपहर में घर से ना निकलें और सुबह जल्दी उठकर काम को निपटा लें. उन्होंने कहा कि दोपहर 1 बजे से शाम 5 बजे तक भयंकर धूप और लू का प्रकोप रहता है. ऐसे में व्यक्ति बीमार हो रहा है. पर्याप्त पानी पीते रहने की सलाह दी जा रही है. गर्मी में ऐसे करें बचाव, नहीं होंगे बीमारआगरा के जिला अस्पताल में तैनात चिकित्सक आशीष मित्तल ने बताया कि लोग लू की चपेट में आकर बीमार पड़ रहे हैं. ऐसे कई मरीज जिला अस्पताल में आ रहे हैं. उन्होंने कहा कि लू लगने से इंसान को उल्टी, दस्त, बुखार और शरीर टूटने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. डॉ. ने बताया कि लू से बचने के लिए सबसे पहले तो धूप में निकलने से बचना है. यदि कार्य अधिक महत्वपूर्ण है तो कॉटन के फुल कपड़े पहने. अपने साथ पर्याप्त मात्रा में पानी रखें, जिससे बॉडी को पानी मिल सके. उन्होंने कहा कि धूप में आने के बाद एकदम से ठंडा पानी या AC में ना बैठें, पहले शरीर के तापमान को सामन्य होने दें. हेल्दी फूड का सेवन करें, बाहर के खाने से बचें, जिससे फूड पोइजनिंग या लूज मोशन ना हो. डॉ. आशीष ने बताया कि लू ने दस्तक दे दी है. ऐसे में लोगों को बस लू की चपेट में आने से बचाव करना है. मरीजों की संख्या में अचानक इजाफाआगरा के जिला अस्पताल में तैनात डॉ. आशीष मित्तल ने बताया कि जैसे ही भीषण गर्मी ने दस्तक दी है, वैसे ही अस्पताल में अचानक मरीजों की संख्या बढ़ गई. उन्होंने बताया कि लू की चपेट में आये मरीज अधिक आ रहे हैं. उन्हें अधिक पानी, धूप में ना निकलने की सलाह और अन्य बचाव के बारे में जानकारी दी जा रही है. उन्होंने कहा की आने वाले समय में और ज्यादा गर्मी पड़ने की संभावना है. ऐसे में बचाव ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, इसलिए धूप में निकलने से बचें. सुबह जल्दी उठकर कोशिश करें कि 12 बजे तक सभी काम निपट जाए और फिर शाम 4 बजे के बाद किसी कार्य को करें. उन्होंने कहा कि दोपहर 1 स 4 के बीच सबसे ज्यादा हिट वेव चलती है, जो लोगों को बीमार कर रही है. About the Author आर्यन सेठ आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए. News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Agra,Uttar Pradesh Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.

चुनाव परिणाम 2026: ममता आगे, स्टालिन पीछे; प्रमुख सीटों पर विजयन और हिमंत का दबदबा | चुनाव समाचार

Palakkad reported a voter turnout of 79.22% this assembly elections.

आखरी अपडेट:04 मई, 2026, 16:47 IST मतगणना अभी भी जारी है, इन प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजे इन चार मुख्यमंत्रियों के राजनीतिक भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे। ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, पिनाराई विजयन और हिमंत बिस्वा सरमा सभी अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए जमकर लड़ रहे हैं। (पीटीआई तस्वीरें) जैसे-जैसे 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए वोटों की गिनती जारी है, प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के बीच मुकाबला और भी कड़ा हो गया है। ममता बनर्जी, एमके स्टालिन, पिनाराई विजयन और हिमंत बिस्वा सरमा सभी अपने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए जमकर लड़ रहे हैं, प्रत्येक नेता का प्रदर्शन उनके संबंधित राज्यों के राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मतगणना अभी भी जारी है, इन प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजे इन चार मुख्यमंत्रियों के राजनीतिक भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे। ममता ने बढ़त बरकरार रखी है हाई-प्रोफाइल भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा के सुवेंदु अधिकारी से आगे चल रही हैं। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 20 में से 12 राउंड की गिनती के बाद बनर्जी की बढ़त का अंतर 7,184 वोटों पर है। बनर्जी, जो शुरुआती दौर में अधिकारी से पीछे चल रहे थे, अधिकारी के 37,545 वोटों की तुलना में 44,729 वोट हासिल करके अंतर को काफी हद तक कम करने में कामयाब रहे। प्रतियोगिता में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया, लेकिन दूसरे दौर में एक संक्षिप्त झटके से उबरने के बाद बनर्जी ने फिर से बढ़त हासिल कर ली, जहां अधिकारी आगे निकल गए। आठ राउंड की गिनती शेष रहने के बाद भी ममता की बढ़त कायम दिख रही है और परिणाम कांटे की टक्कर पर बने हुए हैं। कोलाथुर में स्टालिन ट्रेल्स तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन फिलहाल अपने गृह निर्वाचन क्षेत्र कोलाथुर में पीछे चल रहे हैं। तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) के वीएस बाबू के खिलाफ चुनाव लड़ रहे स्टालिन को 63,959 वोट मिले हैं, जबकि बाबू 72,498 वोटों के साथ आगे हैं। स्टालिन अपने संघर्ष में अकेले नहीं हैं, क्योंकि द्रमुक के कई अन्य मंत्री अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पीछे चल रहे हैं। विशेष रूप से, डिप्टी सीएम उदयनिधि स्टालिन भी चेपॉक-थिरुवल्लिकेनी में 1,200 से अधिक वोटों से पीछे चल रहे हैं। विजयन धर्मदोम में आगे बढ़े केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, जो शुरुआत में धर्मदोम निर्वाचन क्षेत्र में पीछे चल रहे थे, अब आगे बढ़ गए हैं। 84,504 वोटों के साथ विजयन अपने कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी वीपी अब्दुल रशीद से आगे निकल गए हैं, जिन्होंने 66,067 वोट हासिल किए हैं। विजयन, जो धर्माडोम से लगातार तीसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं, ने हर गुजरते दौर के साथ अपनी बढ़त बढ़ती देखी है, जो इस क्षेत्र में उनके गढ़ को दर्शाता है। धर्मडोम को एलडीएफ का गढ़ माना जाता है, और इस करीबी मुकाबले को कन्नूर में सीपीआई (एम) के लिए एक असामान्य विकास के रूप में देखा जा रहा है, खासकर 2021 में विजयन की 45,000 से अधिक वोटों के भारी जीत अंतर को देखते हुए। जालुकबाड़ी में हिमंत का दबदबा असम में, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र में 89,562 वोट हासिल करके अपनी मजबूत बढ़त बना ली है, जो कि उनकी कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी बिदिशा नेओग से काफी आगे हैं, जिन्हें 26,533 वोट मिले हैं। 13 राउंड की गिनती के बाद सरमा की बढ़त 103,793 वोटों की भारी बढ़त पर है। सरमा, जिन्होंने कई बार जलुकबारी का प्रतिनिधित्व किया है, लगातार छठी बार निर्वाचन क्षेत्र में अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहते हैं। हर चुनाव के साथ उनकी जीत का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है और उम्मीद है कि मतगणना समाप्त होने के बाद भी वह सीट बरकरार रखेंगे। (एजेंसियों से इनपुट के साथ) चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना समाचार चुनाव चुनाव परिणाम 2026: ममता आगे, स्टालिन पीछे; प्रमुख सीटों पर विजयन और हिमंता का दबदबा अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)2026 विधानसभा चुनाव परिणाम(टी)ममता बनर्जी भबानीपुर(टी)एमके स्टालिन कोलाथुर(टी)पिनाराई विजयन धर्मदोम(टी)हिमंत बिस्वा सरमा जलुकबारी(टी)पश्चिम बंगाल चुनाव 2026(टी)तमिलनाडु चुनाव 2026(टी)केरल चुनाव 2026

पश्चिम बंगाल 2026: ध्रुवीकरण नहीं, बल्कि शुद्ध बंगाली हृदयविदारक – यहां तक ​​कि मुसलमान भी टीएमसी से पूछते हैं: ‘क्या किया है?’ | भारत समाचार

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आखरी अपडेट:04 मई, 2026, 16:41 IST स्थानीय मुसलमानों ने पहचान की राजनीति पर नौकरियों और सुरक्षा को प्राथमिकता दी – यहां तक ​​कि इमाम समितियों ने “विकास मतदान” का आग्रह किया, जो अंध टीएमसी वफादारी से एक शांत लेकिन निर्णायक विराम का संकेत है। पश्चिम बंगाल 2026 ने दशकों पुरानी निष्ठाओं को हिलाकर रख दिया – कोलकाता के मोहल्लों से लेकर ग्रामीण बंजर भूमि तक, मतदाताओं ने दंगे नहीं, बल्कि जवाब मांगे। मोथाबारी की धूल भरी गलियों में, जहां विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर मतदाता सूची की अराजकता ने तीव्र रोष प्रज्वलित किया, एक निवासी की कांपती आवाज ने चुनावी उन्माद को चीर दिया: “क्या किया है टीएमसी ने? 10 साल से क्या किया तुम्हारी सरकार ने?” यह सांप्रदायिक आग नहीं थी – यह बंगाली आत्मा को उजागर कर देने वाली आग थी। कोलकाता के भीड़भाड़ वाले मुस्लिम मोहल्लों से लेकर ग्रामीण बंजर भूमि तक, पश्चिम बंगाल का 2026 का चुनाव एक भावनात्मक भूकंप बन गया, जिसने दशकों पुरानी वफादारी की नींव हिला दी। मतदाता जवाब मांग रहे हैं, दंगे नहीं। कोलकाता की मेट्रो त्रासदी – निर्माण के बजाय अदालतें कोलकाता, जो कभी भारत की सांस्कृतिक धड़कन थी, अब टीएमसी की अदालती लत के कारण दम तोड़ रहा है। चिंगरीघाटा-एयरपोर्ट मेट्रो लाइन – लाखों लोगों के लिए एक जीवन रेखा – एक टूटा हुआ वादा बनी हुई है: • सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को उसके “अड़ियल रवैये” के लिए फटकार लगाई. • हाई कोर्ट ने बार-बार जारी किये आदेश; टीएमसी ने भूमि अनुमतियों पर देरी की रणनीति के साथ जवाब दिया • मानसून के दौरान ऑरेंज लाइन सुरंगों में बाढ़ आती है – पंपिंग स्टेशन की अनुमति कभी नहीं मिली • उत्तर-दक्षिण कोलकाता को जोड़ने वाला एस्प्लेनेड स्टेशन अधूरा पड़ा है • हावड़ा ब्रिज पर यात्रियों को 2 घंटे का ट्रैफिक जाम झेलना पड़ता है जबकि खाली मेट्रो सुरंगें उनके धैर्य का मजाक उड़ाती हैं केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के “विकास विरोधी सरकार” के आरोप का ज़मीनी स्तर पर कुछ खंडन हुआ। राजारहाट के दिहाड़ी मजदूरों ने पूछा: “मेरी बेटी को कॉलेज जाने के लिए मेट्रो में सुरक्षित यात्रा कब मिलेगी?” घेराबंदी में महिलाएं – बंगाल की सबसे बड़ी शर्म पश्चिम बंगाल की महिलाएँ – 10 करोड़ की आबादी में से 48% – शांत भय में जी रही हैं। संख्याएँ एक गंभीर कहानी बताती हैं: • महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर चौथा स्थान (NCRB डेटा) • प्रतिवर्ष 1,100 से अधिक बलात्कार की घटनाएं दर्ज की जाती हैं • साल्ट लेक की गलियों में बाइक गिरोह के हमले, मुर्शिदाबाद में मानव तस्करी नेटवर्क, शाम की कक्षाओं के बाद डरी हुई कॉलेज की लड़कियाँ आरजी कर बलात्कार-हत्या कोई अलग घटना नहीं थी – यह ब्रेकिंग पॉइंट था। कोलकाता के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया: “महिलाएं कलंक, अदालती उत्पीड़न, राजनीतिक दबाव के डर से उदासीन हो जाती हैं।” टीएमसी की लक्ष्मीर भंडार नकद योजना सुरक्षित सड़कें नहीं खरीद सकी। बेहाला में माताएं चावल पर सब्सिडी नहीं चाहती थीं – वे चाहती थीं कि बेटियां ट्यूशन से सुरक्षित लौट आएं। मोथाबारी का सार्वभौमिक रोष – सांप्रदायिक रेखाओं से परे मोथाबारी कोई अलग भूकंप नहीं था; इसने एक विवर्तनिक बदलाव का संकेत दिया। एसआईआर से भड़के गुस्से के पीछे एक गहरा शासन पतन छिपा है, जो समुदायों में व्याप्त है: • मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू मतदाताओं ने चुपचाप सहमति जताई • हिंदू-बहुल वार्डों में, मुस्लिम दुकानदारों ने समान निराशा साझा की • बच्चे नौकरियों के लिए बेंगलुरु चले गए जबकि स्थानीय टीएमसी नेताओं ने टेंडर कमीशन को लेकर लड़ाई की • मानव तस्करी राष्ट्रीय शर्म की सूची में शीर्ष पर रही जबकि ममता ने सामुदायिक दुर्गा पूजा का उद्घाटन किया • युवाओं को खाड़ी के अनुबंधों में धकेल दिया गया जबकि राज्य के उद्योगों में जंग लग गई “क्या किया है?” यह बंगाल का चुनावी गीत बन गया – सांप्रदायिक युद्ध का नारा नहीं, बल्कि सार्वभौमिक विश्वासघात का रोना। मुस्लिम मोहभंग – मेटियाब्रुज़ से मुर्शिदाबाद यहां तक ​​कि टीएमसी का सबसे वफादार आधार भी टूट गया. कोलकाता के मेटियाब्रुज़, राजाबाजार और पार्क सर्कस – पारंपरिक गढ़ – में संदेह ने जड़ें जमा ली थीं: • मदरसा शिक्षा के बावजूद बेटे बेरोजगार • उत्पीड़न के कारण बेटियां कॉलेज छोड़ रही हैं • विरासत वाली मस्जिदें ढह गईं जबकि सामुदायिक भवनों को सफेद हाथी मिल गए मुर्शिदाबाद में, अवैध आप्रवासन संबंधी चिंताएं भाजपा की मनगढ़ंत बातें नहीं थीं – वे दैनिक सीमा-गांव की वास्तविकताएं थीं। स्थानीय मुसलमानों ने बंगाली पहचान कमजोर होने की शिकायत की, न कि हिंदू वर्चस्व की। राजाबाजार के एक ऑटो चालक का हवाला दिया गया इंडिया टुडे: “शांति और नौकरियाँ पहचान की राजनीति से अधिक मायने रखती हैं।” यहां तक ​​कि इमाम समितियों ने अंध वफ़ादारी के बजाय “विकास मतदान” का आग्रह किया। औद्योगिक गौरव के बावजूद दरिद्र बंगाल का विरोधाभास सबसे गहरा है। एक समय भारत की इस्पात और जूट राजधानी, अब यह प्रवासन राजधानी है: • आसनसोल के कोयला क्षेत्रों में कम स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है; दुर्गापुर के स्टील प्लांट आधी क्षमता पर चलते हैं • हल्दिया बंदरगाह कंटेनरों को संभालता है जबकि मछुआरे भूमि अधिग्रहण विवादों के कारण अपनी आजीविका खो देते हैं • साल्ट लेक में आईटी हब अन्य राज्यों के प्रवासियों को रोजगार देते हैं जबकि बंगाली स्नातक बीमा बेचते हैं एक स्थानीय शिक्षक ने संक्षेप में कहा: “मेरा बेटा केरल में पढ़ता है क्योंकि यहां के कॉलेज कहीं नहीं जाते।” यह सांप्रदायिक पुनर्गठन नहीं था – यह उलटफेर की मांग करने वाला एक आर्थिक पलायन था। भावनात्मक फैसला – माताओं, श्रमिकों, परिवारों ने बात की भूल जाओ मंदिर-मस्जिद बिसात. असली मतदाता थके हुए, सामान्य बंगालियों से बने थे: • वे माताएँ जो चाहती थीं कि बेटियाँ बाज़ार से सुरक्षित घर चलें • दैनिक वेतन भोगी 18 घंटे के गल्फ अनुबंधों के बजाय 8 घंटे की स्थिर शिफ्ट को तरस रहे हैं • रिक्शा चालक जो फुटपाथ चाहते थे, गड्ढे नहीं • पार्क सर्कस की आंटियाँ शाम की चाय पर अपराध दर पर चर्चा कर रही हैं • हावड़ा साड़ी व्यापारी प्रवासन लागत की गणना कर रहे हैं • सामूहिक हिंसा के डर से सिलीगुड़ी के छात्र कॉलेज छोड़ रहे हैं • भाजपा ने सिर्फ

पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम 2026: टीएमसी के पास 38 गढ़ थे, बीजेपी ने उनमें से आधे को पलट दिया | पूरी सूची | भारत समाचार

Palakkad reported a voter turnout of 79.22% this assembly elections.

आखरी अपडेट:04 मई, 2026, 16:41 IST पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी की जीत के पीछे एक बड़ा कारण यह है कि वह राज्य भर में टीएमसी के गढ़ों में सेंध लगाने में सफल रही। जहां टीएमसी अभी भी अपने आधे पारंपरिक गढ़ों को बरकरार रखने की राह पर है, वहीं बीजेपी ने पहले की तुलना में अधिक गहरी और व्यापक पैठ बना ली है। (पीटीआई) भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पश्चिम बंगाल में अपनी पहली सरकार बनाने के लिए तैयार है, चुनाव नतीजों के साथ भगवा पार्टी को राज्य में चौथे कार्यकाल के लिए ममता बनर्जी की उम्मीदों पर पानी फेरने के लिए 190+ सीटों का भारी जनादेश मिला है। शाम 4 बजे तक, 294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में बीजेपी 198 सीटों पर आगे चल रही थी, जो 148 के जादुई आंकड़े से काफी आगे थी, जबकि ममता बनर्जी की टीएमसी सिर्फ 89 सीटों पर आगे थी। पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी की जीत के पीछे एक बड़ा कारण राज्य भर में टीएमसी के गढ़ों में सेंध लगाना है। उन 38 निर्वाचन क्षेत्रों में से, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता था – जहां उसने पिछले तीन चुनाव 10% से अधिक वोटों के अंतर से जीते थे – भाजपा 2026 में बड़ी सेंध लगाने में कामयाब रही है। जहां टीएमसी अभी भी अपने आधे पारंपरिक गढ़ों को बरकरार रखने की राह पर है, वहीं बीजेपी ने पहले की तुलना में अधिक गहरी और व्यापक पैठ बना ली है। बारुईपुर पश्चिम, बेलेघाटा, भबनीपुर, मंदिरबाजार, चौरंगी, देगंगा, डोमजुर, अमदंगा, अशोकनगर, बगनान, बारासात, एंटली, कोलकाता पोर्ट और हावड़ा मध्य ऐसे गढ़ हैं जहां टीएमसी की पकड़ बनी हुई है, जो दर्शाता है कि इन क्षेत्रों में इसका मुख्य समर्थन आधार बहुत कम नहीं हुआ है। साथ ही, भाजपा ने उन क्षेत्रों में कई मोर्चे खोल दिए हैं, जिन्हें कभी सुरक्षित टीएमसी क्षेत्र माना जाता था। यह दासपुर के साथ-साथ मानिकतला और नैहाटी में आगे चल रहा है, जो उत्तर 24 परगना और उससे आगे के इलाकों में शुरुआती सफलता की ओर इशारा करता है। औद्योगिक और पेरी-शहरी बेल्ट में, भाजपा आसनसोल उत्तर और बारानगर में आगे है, जबकि बारबनी और मेदिनीपुर में भी आगे है, जो कोलकाता महानगरीय क्षेत्र के बाहर बढ़त को रेखांकित करता है। पार्टी ने कोलकाता-हावड़ा-हुगली क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रभाव डाला है। यह वर्तमान में हरिपाल, राशबिहारी, जगतबल्लवपुर, जगतदल, शिबपुर, श्यामपुकुर और श्यामपुर जैसी सीटों पर आगे है, जो इन क्षेत्रों में टीएमसी के लंबे समय से चले आ रहे प्रभुत्व के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती का संकेत है। आगे का दबाव दक्षिणी और उपनगरीय समूहों में दिखाई दे रहा है, जहां भाजपा कुछ अन्य इलाकों में गति बनाए रखने के अलावा, सोनारपुर उत्तर, नयाग्राम और गोपीबल्लवपुर में आगे चल रही है। इसलिए जबकि टीएमसी अपने उच्च-मार्जिन वाले गढ़ों की एक बड़ी संख्या को बनाए रखने के लिए तैयार है, कोलकाता के शहरी कोर से लेकर औद्योगिक बेल्ट और ग्रामीण इलाकों तक व्यापक निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा की बढ़त एक बार टीएमसी के अभेद्य आधार के स्पष्ट रूप से खिसकने का संकेत देती है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना जगह : पश्चिम बंगाल, भारत, भारत न्यूज़ इंडिया पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम 2026: टीएमसी के पास 38 गढ़ थे, बीजेपी ने उनमें से आधे को पलट दिया | पूरी सूची अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट) पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम (टी) बीजेपी की जीत पश्चिम बंगाल (टी) बीजेपी ने सरकार बनाई (टी) टीएमसी का गढ़ (टी) ममता बनर्जी की हार (टी) पश्चिम बंगाल विधानसभा सीटें (टी) बीजेपी निर्वाचन क्षेत्रों में आगे (टी) कोलकाता टीएमसी का गढ़

Phil Salt Returns England | Finger Injury Update; RCB

Phil Salt Returns England | Finger Injury Update; RCB

बेंगलुरु21 मिनट पहले कॉपी लिंक इस सीजन 6 पारियों में 200 से ज्यादा रन बनाए। रॉयल चैलेंजर्स बैंगलुरु के ओपनिंग बल्लेबाज फिल साल्ट फिंगर इंजरी की वजह से अपने देश इंग्लैंड लौट गए हैं। चोट की वजह से वे पिछले तीन मैच नहीं खेल पाए थे। अब वे स्कैन के लिए इंग्लैंड गए हैं। उन्होंने उंगली का स्कैन कराया है और फिलहाल परिवार के साथ समय बिता रहे हैं। उन्हें और टीम को उम्मीद है कि वे इसी महीने वापस भारत लौट आएंगे। उनकी गैरमौजूदगी में विराट कोहली के साथ जैकब बेथेल पारी की शुरुआत कर रहे हैं। साल्ट की चोट पर टीम की ओर से कोई बयान नहीं आरसीबी ने साल्ट की इंजरी को लेकर कोई बयान जारी नहीं किया है। ईएसपीएन क्रिकइन्फो के मुताबिक, साल्ट 18 अप्रैल को दिल्ली कैपिटल्स के खिलाफ फील्डिंग के दौरान चोटिल हुए थे। डीप बैकवर्ड स्क्वायर लेग पर डाइव लगाते समय उनके बाएं हाथ की उंगली में चोट आई थी। फील्डिंग के दौरान उंगली पर चोट लगी थी। चोट से पहले साल्ट शानदार फॉर्म में थे टी20 वर्ल्ड कप में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद साल्ट ने IPL में फॉर्म में वापसी की थी। उन्होंने इस सीजन 6 पारियों में 168.33 की स्ट्राइक रेट से 202 रन बनाए थे। पिछले सीजन टीम की खिताबी जीत में उनकी अहम भूमिका थी। उन्होंने 2025 में 175.98 की स्ट्राइकर रेट से 403 रन बनाए थे। इस सीजन साल्ट ने 6 पारियों में 202 रन बनाए। बेथेल अब तक फ्लॉप रहे कोहली के नए ओपनिंग पार्टनर बेथेल खराब फॉर्म जूझ रहे हैं। उन्होंने अब तक खेले 3 पारियों में सिर्फ 39 रन बनाए हैं। टीम के पास जॉर्डन कॉक्स के रुप में बैकअप बल्लेबाज है। बेथेल इस सीजन की 3 पारियों में सिर्फ 39 रन बना सके हैं। अगर चोट गंभीर हुई तो बेंगलुरु आईपीएल नियमों के तहत साल्ट की जगह रिप्लेसमेंट खिलाड़ी ले सकती है। हालांकि टीम उन्हें रिकवर करने का पूरा मौका दे रही है। बेंगलुरु 7 मई को लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाफ अपना अगला मैच खेलेगी। —————————————— स्पोर्ट्स की ये खबर भी पढ़ें… CSK के ऑलराउंडर रामाकृष्णा घोष IPL 2026 से बाहर:मुंबई के खिलाफ डेब्यू मैच में चोटिल हुए थे; चेन्नई ने अब तक रिप्लेसमेंट नहीं चुना IPL 2026 में चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) की मुश्किलें जारी हैं। टीम के बॉलिंग ऑलराउंडर रामाकृष्णा घोष चोट के कारण मौजूदा सीजन से बाहर हो गए हैं। घोष ने शनिवार (2 मई) को मुंबई इंडियंस के खिलाफ IPL डेब्यू किया था और शानदार प्रदर्शन किया था। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

प्लास्टिक चटनी रेसिपी: क्या आपने देखा बंगाल का मशहूर ‘प्लास्टिक चटनी’, चिलचिलाती गर्मी में शरीर को बनाएगी ठंडी; नोट करें गुप्त रेसिपी

तस्वीर का विवरण

प्लास्टिक निर्माण की सामग्री: 2 कच्चा आम, 1 कप चीनी स्वाद, 1 कप पानी, 2 सूखी लाल मिर्च, 1/2 छोटा काला पंचफोरन, नमक का स्वाद, 1/2 छोटा काला नमक, मसाला छवि: एआई बनाने की आसान विधि: सबसे पहले कढ़ाही में थोड़ा सा तेल गर्म करें। इसमें पंचफोरन और ड्राई लाल मिर्च प्लास्टर सा भून लें। अब केट में कच्चे आम डाले और 2-3 मिनट तक का समय दिया। छवि: एआई फिर होता है पानी नामांकित आम को नर डे। जब हम थोड़ा पक जाएं, तब उसमें चीनी, नमक और नमक काला डाल दें। अब इसे अंतिम रूप दिया गया है जब तक कि प्लास्टिक जब तक सामान्य प्लास्टिक न दिखे। छवि: एआई अंतिम में आटा और 2 मिनट का आटा। गैस बंद करें और ठंडा करें। इस रेसिपी को आप दाल-चावल, दाल-चावल या रोटी के साथ खा सकते हैं। अनोखा-ठंडी चिप्स खाने में और भी ज्यादा स्वादिष्ट होता है। छवि: एआई आम को अंतिम सीमा तक जरूरी है, जब तक वह हासिल नहीं कर लेता। बहुमत न करें, छोटी चाशनी जैसी कंसिस्टेंसी रखें। आप इसमें थोड़ा सा भी जीरा पाउडर भी डाल सकते हैं, इससे स्वाद और बढ़ जाएगा। छवि: एआई गर्मी में रॉ आम शरीर को ठंडा रखने में मदद मिलती है। इसे लू से बच में भी माना जाता है। इसके अलावा पाचन तंत्र भी बेहतर काम करता है। छवि: फ्रीपिक अगर आपके पास अभी तक यह अनोखा प्लास्टिक प्लास्टर स्ट्रेंथ नहीं है, तो यह गर्मी जरूर बनाई जा सकती है। इसका स्वाद आपके लिए एक नया कारखाना है। छवि: एआई (टैग्सटूट्रांसलेट)बंगाल प्लास्टिक चटनी रेसिपी(टी)चटनी रेसिपी(टी)बंगाल प्रसिद्ध चटनी(टी)प्लास्टिक चटनी रेसिपी(टी)कच्चे आम की चटनी(टी)कच्चे आम की चटनी(टी)साल्टिक की चटनी

Left Govt Ends, Congress Returns

Left Govt Ends, Congress Returns

2 मिनट पहलेलेखक: ऐश्वर्य राज कॉपी लिंक केरलम विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन की अगुवाई वाले लेफ्ट एलायंस LDF को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली UDF ने 140 में से 90 से ज्यादा सीटें जीतकर 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर ली है। केरलम में इस हार के बाद 49 साल में यह पहली होने जा रहा है जब देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं है। जानते हैं देश में वामपंथ के विस्तार, जीत और हार से जुड़ी प्रमुख बातें… इससे पहले जानिए लेफ्ट यानी कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में। 1947 में मिली आजादी को मानने से इंकार किया भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 1947 में भारत को मिली आजादी को असली आजादी मानने से इंकार कर दिया था। उस वक्त पार्टी का कहना था कि यह आजादी अधूरी और समझौतों का परिणाम है, जिसे उन्होंने ‘झूठी आजादी’ का नाम दिया। इस हकीकत को पूरी तरह स्वीकार करने में पार्टी को 5 साल से ज्यादा का समय लग गया। मार्च 1948 में पार्टी के भीतर एक बड़ा बदलाव हुआ। पीसी. जोशी की जगह बीटी. रणदिवे (BTR) नए जनरल सेक्रेटरी बने। उनके आते ही पार्टी में ‘रणदिवे लाइन’ लागू हुई, जो बेहद कट्टर और आक्रामक थी। इसी सोच के तहत जनवरी 1950 में संविधान लागू होने से पहले ही CPI ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस के नेता भारतीय जनता पर ‘गुलामी का संविधान’ थोप रहे हैं। लेफ्ट पार्टी ने नेहरू सरकार को हिंसक तरीके से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। 1948 और 1949 के दौरान यह नीति पूरी तरह विफल रही। इसके बाद मई-जून 1950 में बीटी. रणदिवे को पद से हटा दिया गया। पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने यह स्वीकार किया कि बिना सोचे-समझे 9 मार्च 1949 को देशव्यापी हड़ताल और विद्रोह का जो आह्वान किया गया था, वह बड़ी भूल थी। करीब 6 साल के बाद CPI अपनी कट्टर विचारधारा छोड़कर देश की आजादी की सच्चाई स्वीकार करने के लिए मजबूर हुई। दुनिया की पहली चुनी हुई लोकतांत्रिक लेफ्ट सरकार 5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदरिपाद । 1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार को मिलाकर एक नया राज्य केरलम बना। मार्च 1957 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। 126 सीटों वालीं विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI को 60 सीट मिलीं। 5 निर्दलीय को मिलाकर उसने सरकार बना ली। ये दुनिया में लेफ्ट की पहली चुनी हुई सरकार थी। ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद ही दो बड़े कानून लागू किए। पहला- भूमि सुधार कानून और दूसरा- शिक्षा में सुधार को लेकर। भूमि सुधार कानून के बाद बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने की छूट मिल गई। लैंडहोल्डिंग की लिमिट तय हो गई। वहीं, एजुकेशन बिल के जरिए प्राइवेट संस्थानों को रेगुलेट करने के लिए सख्त नियम बना दिए। 2 फरवरी 1959 को इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वो केरलम गईं। वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नेहरू को सौंप दी। 31 जुलाई 1959 को केरलम सरकार बर्खास्त कर दी गई। गांधी की तस्वीरें हटाईं, माओ–स्टालिन की लगाईं इसी बीच केरलम के स्कूल-कॉलेजों से गांधी की तस्वीर हटाकर माओ और स्टालिन की तस्वीर लगाई जाने लगीं। कहा जाने लगा कि नंबूदरीपाद की सरकार बनाने के लिए कम्युनिस्ट देशों ने फंड भेजे हैं। इसके विरोध में केरलम के गांधी कहे जाने वाले मन्नथ पिल्लई की अगुआई में लाखों लोग सड़कों पर उतर गए। हजारों लोग जेल में डाल दिए गए। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसमें मछुआरे कम्युनिटी की एक प्रेग्नेंट महिला की जान चली गई। आंदोलन और भड़क उठा। जगह-जगह हिंसा होने लगीं। चीन युद्ध पर सरकार से अलग रुख के कारण दूसरा बड़ा विभाजन 1962 के भारत–चीन युद्ध ने CPI के भीतर वैचारिक दरार बढ़ा दिया। पार्टी का एक धड़ा नेहरू सरकार के समर्थन में था। दूसरा धड़ा चीन को आक्रमणकारी मानने को तैयार नहीं था। ‘राष्ट्रवाद बनाम अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद’ की इस बहस के बीच, चीन समर्थक माने जाने वाले नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसी तनाव ने पार्टी के आधार को हिला दिया और कम्युनिस्ट आंदोलन दो फाड़ हो गया। युद्ध के दो साल बाद, 1964 में मतभेद इतने बढ़ गए कि कम्युनिस्ट पार्टी आधिकारिक रूप से विभाजित हो गई। सोवियत संघ की नरम नीति के समर्थक CPI में रहे, जबकि क्रांतिकारी रुख अपनाने वाले नेताओं ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) का गठन किया। साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद। बंगाल में 1967 में लेफ्ट पश्चिम बंगाल में पहली बार लेफ्ट ने 1967 में ‘यूनाइटेड फ्रंट’ गठबंधन के जरिए सरकार में आई। उस समय अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने थे और ज्योति बसु डिप्टी सीएम थे। हालांकि, सरकार बहुत अस्थिर रही। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो CPI ने शुरुआत में इंदिरा गांधी और इमरजेंसी का समर्थन किया था, जबकि CPI(M) ने इसका विरोध किया था और उनके कई नेता जेल भी गए थे। 1977 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट को बंगाल में भारी बहुमत मिला और यहीं से राज्य में कम्युनिस्टों के लंबे शासन की असली शुरुआत हुई। ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और लगातार 2000 तक राज्य के सीएम रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने राज्य में उद्योगों को लाने की कोशिश की। लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण विवादों के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में कम्युनिस्टों के 34 साल पुराने शासन को खत्म कर दिया। उस वक्त के सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद अपना चुनाव हार गए। 90 के दशक में ज्योति बसु को 3 बार PM बनाने का मौका CBI के पूर्व डायरेक्टर अरुण प्रसाद मुखर्जी ने अपनी किताब ‘राजीव गांधी, ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त के अनछुए पहलू’ में बताया है कि 1990 और 1991 के उथल-पुथल भरे दौर में राजीव गांधी चाहते थे कि ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनें। पहली बार अक्टूबर 1990 में राजीव गांधी ने ज्योति बसु