Indigo Flights Cut by 7% Amidst Rising Fuel Costs

नई दिल्ली6 मिनट पहले कॉपी लिंक टाटा ग्रुप के स्वामित्व वाली एयरलाइन एअर इंडिया ने अपनी घरेलू उड़ानों में 22% तक की कटौती करने का फैसला लिया है। यह बदलाव जून से अगस्त 2026 के बीच प्रभावी रहेगा। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, भारी वित्तीय घाटे और ऑपरेशनल कॉस्ट में बढ़ोतरी का सामना कर रही कंपनी ने यह फैसला एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी जेट फ्यूल की बढ़ती कीमतों के कारण लिया है। 4400 वीकली उड़ानों पर असर पड़ेगा एअर इंडिया वर्तमान में हर हफ्ते करीब 4400 उड़ानों का संचालन कर रही है। इनमें लगभग 3600 घरेलू और 800 अंतरराष्ट्रीय उड़ाने शामिल हैं। एअर इंडिया का कहना है कि वह बाजार की मांग और ऑपरेटिंग परिस्थितियों पर बारीकी से नजर रखेगी। जैसे ही परिस्थितियां सामान्य और स्थिर होंगी, उड़ानों की संख्या को दोबारा बहाल करने पर विचार किया जाएगा। एअर इंडिया ने 14 दिन पहले ही 23 इंटरनेशनल रूट्स पर अपनी उड़ानों की संख्या करीब 27% घटाई हैं और 6 इंटरनेशनल रूट्स पर फ्लाइट कैंसिल की हैं। इंडिगो भी 7% तक करेगी कटौती वहीं, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने दावा किया कि मार्केट लीडर इंडिगो अपनी घरेलू उड़ानों में 5% से 7% की कटौती कर सकती है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब स्कूल की छुट्टियों के बाद हवाई यात्रा की मांग में सीजनल गिरावट देखने को मिलती है। ईरान युद्ध और फ्यूल की बढ़ती कीमतें मुख्य वजह उड़ानों में कटौती की सबसे बड़ी वजह 28 फरवरी को ईरान पर हुए हमलों के बाद मिडिल ईस्ट में शुरू हुआ संघर्ष है। इससे जेट फ्यूल की कीमतों में इजाफा हुआ है। इसके अलावा, ईरानी हवाई क्षेत्र का उपयोग न करने की वजह से अंतरराष्ट्रीय रूट लंबे हो गए हैं और पाकिस्तानी एयरस्पेस पर पाबंदियों ने भी ऑपरेशन कॉस्ट बढ़ा दी है। एअर इंडिया ने कहा कि उड़ानों में कटौती मुख्य रूप से ऊंचे ईंधन दामों के कारण की गई है। लगातार बढ़ते फ्यूल प्राइस से एयरलाइन के ओवरऑल ऑपरेशन्स पर भारी दबाव पड़ रहा है। एयरलाइंस का फ्यूल खर्च 40% से बढ़कर 60% हुआ FIA के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय और घरेलू सेक्टर में फ्यूल की कीमतों के भारी अंतर ने एयरलाइंस के नेटवर्क को वित्तीय रूप से अस्थिर बना दिया है। पहले एयरलाइंस के कुल ऑपरेशनल खर्च में फ्यूल का हिस्सा 40% होता था, जो बढ़कर 60% तक पहुंच गया है। मार्च-अप्रैल में भी कम रही उड़ानों की संख्या एविएशन एनालिटिक्स फर्म ‘सिरियम’ के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च और अप्रैल में भारत की चार सबसे बड़ी एयरलाइंस के ऑपरेशन्स में पिछले साल की तुलना में 6% की गिरावट आई है। इस दौरान इंडिगो ने 4.5% और एअर इंडिया ने 7.5% कम उड़ानें संचालित कीं। एअर इंडिया की बजट एयरलाइन ‘एयर इंडिया एक्सप्रेस’ में सबसे ज्यादा 17.1% की गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते किराए से यात्रियों की संख्या पर असर ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ने से एयरलाइंस ने इसका बोझ यात्रियों पर डाल दिया है, जिससे हवाई किराए महंगे हो गए हैं। किराए बढ़ने से घरेलू हवाई यात्रा की डिमांड में भी कमी आई है। भारत में अभी इंडिगो और एअर इंडिया ग्रुप का दबदबा है और घरेलू क्षमता में इनका मार्केट शेयर करीब 90% है। इस बीच, आकासा एयर छोटे बेड़े के बावजूद तेजी से विस्तार की कोशिश कर रही है। ———————- ये खबर भी पढ़ें… एअर इंडिया ने 6 इंटरनेशनल रूट्स पर फ्लाइट्स कैंसिल की:23 रूट्स पर घटाई, जून से अगस्त का शेड्यूल जारी; फ्यूल महंगा होने के चलते फैसला एअर इंडिया ने अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर कटौती का फैसला लिया है। एयरलाइन ने बुधवार को बताया कि जून से अगस्त तक 6 इंटरनेशनल रूट्स की रद्द कर दी है। इसमें दिल्ली-शिकागो और मुंबई-न्यूयॉर्क जैसे व्यस्त रूट भी शामिल हैं। इसके अलावा 23 इंटरनेशनल रूट्स पर फ्लाइट्स की संख्या घटाई है। पूरी खबर पढ़ें… ————– एअर इंडिया VP लेवल के अफसरों की सैलरी काटेगी: ईरान युद्ध के कारण 20% उड़ानें रद्द करने की तैयारी, नॉन-टेक्निकल स्टाफ को छुट्टी पर भेजेगी कंपनी टाटा ग्रुप की एयरलाइन कंपनी एअर इंडिया अपनी लागत घटाने के लिए कर्मचारियों की सैलरी में कटौती और उड़ानों की संख्या करीब 20% कम कर सकती है। वर्तमान में एयरलाइन हर दिन करीब 900 उड़ानों का संचालन करती है। कंपनी मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण जेट फ्यूल महंगा होने से ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ने की वजह से यह कदम उठाने की तैयारी कर रही है। बता दें कि एयरलाइन पहले से ही घाटे में है और अपने नए CEO की तलाश कर रही है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Indigo Flights Cut by 7% Amidst Rising Fuel Costs

नई दिल्ली3 मिनट पहले कॉपी लिंक टाटा ग्रुप के स्वामित्व वाली एयरलाइन एअर इंडिया घरेलू उड़ानों में 22% तक कटौती कर रही है। यह बदलाव जून से अगस्त 2026 के बीच प्रभावी रहेगा। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक यह फैसला जेट फ्यूल की बढ़ती कीमतों के कारण लिया है। फ्यूल महंगा होने से कंपनी की ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ गई है। वहीं, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने दावा किया कि इंडिगो अपनी घरेलू उड़ानों में 5% से 7% की कटौती कर सकती है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब स्कूल की छुट्टियों के बाद हवाई यात्रा की मांग में सीजनल गिरावट देखने को मिलती है। 4400 वीकली फ्लाइट्स पर असर पड़ेगा एअर इंडिया वर्तमान में हर हफ्ते करीब 4400 उड़ानें ऑपरेट कर रही है। इनमें करीब 3600 घरेलू और 800 अंतरराष्ट्रीय उड़ानें शामिल हैं। एअर इंडिया का कहना है कि वह बाजार की मांग और ऑपरेटिंग परिस्थितियों पर बारीकी से नजर रखेगी। जैसे ही परिस्थितियां सामान्य और स्थिर होंगी, उड़ानों की संख्या को दोबारा बहाल करने पर विचार किया जाएगा। एअर इंडिया ने 14 दिन पहले ही 23 इंटरनेशनल रूट्स पर अपनी उड़ानों की संख्या करीब 27% घटाई हैं और 6 इंटरनेशनल रूट्स पर फ्लाइट कैंसिल की हैं। ईरान युद्ध और फ्यूल की बढ़ती कीमतें मुख्य वजह उड़ानों में कटौती की सबसे बड़ी वजह 28 फरवरी को ईरान पर हुए हमलों के बाद मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष है। इससे जेट फ्यूल की कीमतों में इजाफा हुआ है। इसके अलावा, ईरानी हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल न करने की वजह से अंतरराष्ट्रीय रूट लंबे हो गए हैं और पाकिस्तानी एयरस्पेस पर पाबंदियों ने भी ऑपरेशन कॉस्ट बढ़ा दी है। एअर इंडिया ने कहा कि उड़ानों में कटौती मुख्य रूप से ऊंचे ईंधन दामों के कारण की गई है। लगातार बढ़ते फ्यूल प्राइस से एयरलाइन के ओवरऑल ऑपरेशन्स पर भारी दबाव पड़ रहा है। एयरलाइंस का फ्यूल खर्च 40% से बढ़कर 60% हुआ इंटरनेशनल ऑटोमोबाइल फेडरेशन (FIA) के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय और घरेलू सेक्टर में फ्यूल की कीमतों के भारी अंतर ने एयरलाइंस के नेटवर्क को वित्तीय रूप से अस्थिर बना दिया है। पहले एयरलाइंस के कुल ऑपरेशनल खर्च में फ्यूल का हिस्सा 40% होता था, जो बढ़कर 60% तक पहुंच गया है। मार्च-अप्रैल में भी कम रही उड़ानों की संख्या एविएशन एनालिटिक्स फर्म ‘सिरियम’ के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च और अप्रैल में भारत की चार सबसे बड़ी एयरलाइंस के ऑपरेशन्स में पिछले साल की तुलना में 6% की गिरावट आई है। इस दौरान इंडिगो ने 4.5% और एअर इंडिया ने 7.5% कम उड़ानें संचालित कीं। एअर इंडिया की बजट एयरलाइन ‘एयर इंडिया एक्सप्रेस’ में सबसे ज्यादा 17.1% की गिरावट दर्ज की गई। बढ़ते किराए से यात्रियों की संख्या पर असर ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ने से एयरलाइंस ने इसका बोझ यात्रियों पर डाल दिया है, जिससे हवाई किराए महंगे हो गए हैं। किराए बढ़ने से घरेलू हवाई यात्रा की डिमांड में भी कमी आई है। भारत में अभी इंडिगो और एअर इंडिया ग्रुप का दबदबा है और घरेलू क्षमता में इनका मार्केट शेयर करीब 90% है। इस बीच, आकासा एयर छोटे बेड़े के बावजूद तेजी से विस्तार की कोशिश कर रही है। ———————- ये खबर भी पढ़ें… एअर इंडिया ने 6 इंटरनेशनल रूट्स पर फ्लाइट्स कैंसिल की:23 रूट्स पर घटाई, जून से अगस्त का शेड्यूल जारी; फ्यूल महंगा होने के चलते फैसला एअर इंडिया ने अपनी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर कटौती का फैसला लिया है। एयरलाइन ने बुधवार को बताया कि जून से अगस्त तक 6 इंटरनेशनल रूट्स की रद्द कर दी है। इसमें दिल्ली-शिकागो और मुंबई-न्यूयॉर्क जैसे व्यस्त रूट भी शामिल हैं। इसके अलावा 23 इंटरनेशनल रूट्स पर फ्लाइट्स की संख्या घटाई है। पूरी खबर पढ़ें… ————– एअर इंडिया VP लेवल के अफसरों की सैलरी काटेगी: ईरान युद्ध के कारण 20% उड़ानें रद्द करने की तैयारी, नॉन-टेक्निकल स्टाफ को छुट्टी पर भेजेगी कंपनी टाटा ग्रुप की एयरलाइन कंपनी एअर इंडिया अपनी लागत घटाने के लिए कर्मचारियों की सैलरी में कटौती और उड़ानों की संख्या करीब 20% कम कर सकती है। वर्तमान में एयरलाइन हर दिन करीब 900 उड़ानों का संचालन करती है। कंपनी मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण जेट फ्यूल महंगा होने से ऑपरेटिंग कॉस्ट बढ़ने की वजह से यह कदम उठाने की तैयारी कर रही है। बता दें कि एयरलाइन पहले से ही घाटे में है और अपने नए CEO की तलाश कर रही है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
‘कोई जवाबदेही नहीं’: राहुल गांधी ने सीबीएसई विवाद पर पीएम मोदी पर निशाना साधा, परिणाम संकट को ‘साजिश’ बताया | भारत समाचार

आखरी अपडेट:27 मई, 2026, 14:19 IST एक्स पर एक पोस्ट में, राहुल गांधी ने दावा किया कि सीबीएसई परिणामों में “बड़े पैमाने पर छेड़छाड़” हुई है, जिससे देश भर के छात्र और अभिभावक हैरान और परेशान हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी. (एक्स) सीबीएसई पंक्ति: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को सीबीएसई कक्षा 12 बोर्ड की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में कथित अनियमितताओं पर चुप रहने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। एक्स पर एक पोस्ट में, गांधी ने दावा किया कि सीबीएसई परिणामों में “बड़े पैमाने पर छेड़छाड़” हुई है, जिससे देश भर के छात्र और अभिभावक हैरान और परेशान हैं। उन्होंने कहा, “सीबीएसई परीक्षा परिणामों में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ हुई है, जिससे देश भर के लाखों बच्चे और उनके माता-पिता सदमे में हैं। और श्रीमान मोदी? हमेशा की तरह – कोई जवाब नहीं, कोई जवाबदेही नहीं, कोई शर्म नहीं।” सीबीएसई परीक्षा परिणाम में भयंकर हेर-फेर हो गए, जिस देश के लाखों बच्चे और उनके माता-पिता स्तुतिगान में हैं। और मोदी जी? हमेशा की तरह – न उत्तर, न उत्तरदायित्व, न शर्म। जिस कंपनी COEMPT को यह जिम्मेदारी मिली, वह पहले ग्लोबरेना के नाम से तेलंगाना में 2019 में यही कारनामे कर चुकी है। नाम… pic.twitter.com/iZG8bvUXPJ – राहुल गांधी (@RahulGandhi) 27 मई 2026 लोकसभा में विपक्ष के नेता ने इस विवाद को “जानबूझकर की गई साजिश” बताया और बोर्ड की नई ऑन-स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली का प्रबंधन करने वाली कंपनी कोएम्प्ट एडु टेक को सीबीएसई डिजिटल मूल्यांकन अनुबंध देने के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी पहले ग्लोबरेना नाम से काम करती थी और 2019 में तेलंगाना में इसी तरह के विवाद से जुड़ी थी। गांधी ने एक स्वतंत्र जांच और एक विशेष जांच दल (एसआईटी) के तत्काल गठन की मांग करते हुए कहा, “नाम बदल गया – लेकिन इरादे वही, स्वभाव वही। हर कोई इतिहास जानता था, फिर भी अनुबंध दिया गया। 1.85 मिलियन बच्चों का भविष्य ऐसी कंपनी को सौंप दिया गया, और किसी ने आंख नहीं खोली। यह कोई गलती नहीं है – यह एक जानबूझकर की गई साजिश है।” कांग्रेस नेता ने सरकार से कई सवाल भी पूछे, जिनमें यह भी शामिल था कि कोएम्प्ट को अनुबंध क्यों दिया गया, क्या उचित प्रक्रियाओं का पालन किया गया था, और क्या पर्याप्त पृष्ठभूमि की जांच की गई थी। पंक्ति क्या है? सीबीएसई द्वारा इस साल शुरू की गई नई डिजिटल अंकन प्रणाली के तहत पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान अपलोड की गई उत्तर पुस्तिकाओं में कई छात्रों द्वारा तकनीकी गड़बड़ियों और कथित विसंगतियों की शिकायत करने के बाद विवाद खड़ा हो गया। ओएसएम प्रणाली के तहत, शिक्षकों द्वारा मूल्यांकन के लिए भौतिक उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन किया गया और ऑनलाइन अपलोड किया गया। 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं में 18 लाख से अधिक छात्रों के शामिल होने के बाद लगभग 98 लाख उत्तर पुस्तिकाओं को डिजिटल किया गया। सिस्टम को लेकर चिंता तब और बढ़ गई जब एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने दावा किया कि उसके रोल नंबर से जुड़ी भौतिकी की उत्तर पुस्तिका उसकी नहीं है। उन्होंने विषयों के बीच लिखावट के अंतर की तुलना करते हुए स्क्रीनशॉट ऑनलाइन साझा किए और सवाल किया कि क्या उनके वास्तविक पेपर का मूल्यांकन किया गया था। इस मुद्दे ने सोशल मीडिया पर व्यापक बहस छेड़ दी, जिसमें छात्रों और अभिभावकों ने स्कैनिंग त्रुटियों, पोर्टल की गड़बड़ियों और डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चिंता जताई। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया ‘कोई जवाबदेही नहीं’: राहुल गांधी ने सीबीएसई विवाद को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा, परिणाम संकट को ‘साजिश’ बताया अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें
पाकिस्तान में 9 मुस्लिम जगहों के नाम नहीं बदलेंगे:हिंदू-सिख दौर का नाम रखा जाना था, कट्टरपंथियों के विरोध के बाद फैसला बदला

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मरियम नवाज सरकार ने लाहौर की सड़कों, चौकों और इलाकों के पुराने नाम बहाल करने का फैसला फिलहाल टाल दिया है। सरकार जिन नामों को बहाल करना चाहती थी, उनमें कई हिंदू और सिख दौर के नाम शामिल थे। सरकार ने यह कदम कट्टरपंथी समूहों और सोशल मीडिया पर बढ़ते विरोध के बाद उठाया। कुछ लोगों ने इसे हिंदू और सिख पहचान वापस लाने की कोशिश बताते हुए धार्मिक रंग दे दिया था। लाहौर के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन (रिटायर्ड) मोहम्मद अली एजाज ने पाकिस्तानी अखबार डॉन से कहा कि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। नवाज शरीफ और मरियम नवाज की बैठक में मंजूर हुआ था प्रस्ताव 16 मार्च को लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल (LHAR) की बैठक हुई थी। इसकी अध्यक्षता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने की थी। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज भी इसमें शामिल थीं। इसी बैठक में लाहौर के कई पुराने प्री-पार्टिशन नाम बहाल करने का प्रस्ताव पास किया गया। यह योजना लाहौर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर से सामने लाने के लिए बनाई गई थी। बाद में मई में मरियम नवाज कैबिनेट ने भी इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी थी। नवाज शरीफ का कहना था कि हमें यूरोप से सीख लेनी चाहिए। वे ऐतिहासिक नामों से छेड़छाड़ नहीं करते हैं। मरियम का कहना था कि लाहौर का इतिहास ही इसकी पहचान है। पुराने नाम और इमारतें इसका सबूत हैं। यह पूरा प्रोजेक्ट लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल (LAHR) के तहत चलाया जा रहा था। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, यह कई अरब पाकिस्तानी रुपए का प्रोजेक्ट है। कट्टपंथियों ने इसे धार्मिक मुद्दा बना दिया डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ कट्टरपंथी तत्वों और सोशल मीडिया व्लॉगर्स ने इस फैसले पर मुख्यमंत्री मरियम नवाज का खुलकर विरोध किया। उन्होंने सरकार पर हिंदू और सिख नाम वापस लाने का आरोप लगाया और इसे धार्मिक मुद्दा बना दिया। PTI के मुताबिक, सरकार को डर था कि इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो सकता है। इसी वजह से प्रशासन ने फिलहाल फैसला टाल दिया। विरोध के बाद LHAR ने इतिहासकारों, शहरी योजनाकारों, आर्किटेक्ट्स और दूसरे विशेषज्ञों की एक बैठक भी बुलाई। इसमें लाहौर की पुरानी पहचान और ऐतिहासिक नामों को बचाने पर चर्चा हुई। सरकारी बयान के मुताबिक, बैठक में मौजूद ज्यादातर लोगों ने माना कि लाहौर की ऐतिहासिक पहचान बहुमूल्य विरासत है और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाया जाना चाहिए। कई विशेषज्ञ पुराने नाम बहाल करने के पक्ष में थे। पार्टिशन के बाद इन इलाकों के नाम बदल दिए गए थे पाकिस्तान बनने के बाद कई इलाकों के नाम बदल दिए गए थे। इसके बावजूद लाहौर के पुराने हिंदू और ब्रिटिश दौर के नाम आज भी लोगों की यादों और रोजमर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होते हैं। कराची के इतिहासकार याकूब खान बंगश ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि 1947 के बाद लाहौर में वैसा वैचारिक बदलाव नहीं हुआ जैसा कराची जैसे शहरों में देखने को मिला था। उनके मुताबिक लाहौर में आने वाले ज्यादातर शरणार्थी कामकाजी तबके से थे, जिन्होंने शहर की पुरानी सामाजिक पहचान के साथ खुद को जोड़ लिया। इसी वजह से शहर का पुराना इतिहास लोगों की याद में बना रहा। —————— ये खबर भी पढ़ें… भारत ने जम्मू-कश्मीर पर चीन-पाकिस्तान का बयान खारिज किया:कहा- दूसरे देश को टिप्पणी का हक नहीं; चीन ने इतिहास से जुड़ा विवाद बताया था भारत ने चीन और पाकिस्तान के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के जिक्र को पूरी तरह खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। भारत ने चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) परियोजनाओं पर भी कड़ी आपत्ति जताई। यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की चीन यात्रा के बाद जारी संयुक्त बयान के जवाब में आया है। इसमें कहा गया था कि पाकिस्तान ने चीन को जम्मू-कश्मीर के हालात की जानकारी दी। पूरी खबर पढ़ें…
पाकिस्तान में 9 मुस्लिम जगहों के नाम नहीं बदलेंगे:हिंदू-सिख दौर का नाम रखा जाना था, कट्टरपंथियों के विरोध के बाद फैसला बदला

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की मरियम नवाज सरकार ने लाहौर की सड़कों, चौकों और इलाकों के पुराने नाम बहाल करने का फैसला फिलहाल टाल दिया है। सरकार जिन नामों को बहाल करना चाहती थी, उनमें कई हिंदू और सिख दौर के नाम शामिल थे। सरकार ने यह कदम कट्टरपंथी समूहों और सोशल मीडिया पर बढ़ते विरोध के बाद उठाया। कुछ लोगों ने इसे हिंदू और सिख पहचान वापस लाने की कोशिश बताते हुए धार्मिक रंग दे दिया था। लाहौर के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन (रिटायर्ड) मोहम्मद अली एजाज ने पाकिस्तानी अखबार डॉन से कहा कि अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। नवाज शरीफ और मरियम नवाज की बैठक में मंजूर हुआ था प्रस्ताव 16 मार्च को लाहौर हेरिटेज एरियाज रिवाइवल (LHAR) की बैठक हुई थी। इसकी अध्यक्षता पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने की थी। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज भी इसमें शामिल थीं। इसी बैठक में लाहौर के कई पुराने प्री-पार्टिशन नाम बहाल करने का प्रस्ताव पास किया गया। यह योजना लाहौर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को फिर से सामने लाने के लिए बनाई गई थी। बाद में मई में मरियम नवाज कैबिनेट ने भी इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी थी। नवाज शरीफ का कहना था कि हमें यूरोप से सीख लेनी चाहिए। वे ऐतिहासिक नामों से छेड़छाड़ नहीं करते हैं। मरियम का कहना था कि लाहौर का इतिहास ही इसकी पहचान है। पुराने नाम और इमारतें इसका सबूत हैं। यह पूरा प्रोजेक्ट लाहौर अथॉरिटी फॉर हेरिटेज रिवाइवल (LAHR) के तहत चलाया जा रहा था। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, यह कई अरब पाकिस्तानी रुपए का प्रोजेक्ट है। कट्टपंथियों ने इसे धार्मिक मुद्दा बना दिया डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ कट्टरपंथी तत्वों और सोशल मीडिया व्लॉगर्स ने इस फैसले पर मुख्यमंत्री मरियम नवाज का खुलकर विरोध किया। उन्होंने सरकार पर हिंदू और सिख नाम वापस लाने का आरोप लगाया और इसे धार्मिक मुद्दा बना दिया। PTI के मुताबिक, सरकार को डर था कि इस मुद्दे पर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो सकता है। इसी वजह से प्रशासन ने फिलहाल फैसला टाल दिया। विरोध के बाद LHAR ने इतिहासकारों, शहरी योजनाकारों, आर्किटेक्ट्स और दूसरे विशेषज्ञों की एक बैठक भी बुलाई। इसमें लाहौर की पुरानी पहचान और ऐतिहासिक नामों को बचाने पर चर्चा हुई। सरकारी बयान के मुताबिक, बैठक में मौजूद ज्यादातर लोगों ने माना कि लाहौर की ऐतिहासिक पहचान बहुमूल्य विरासत है और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाया जाना चाहिए। कई विशेषज्ञ पुराने नाम बहाल करने के पक्ष में थे। पार्टिशन के बाद इन इलाकों के नाम बदल दिए गए थे पाकिस्तान बनने के बाद कई इलाकों के नाम बदल दिए गए थे। इसके बावजूद लाहौर के पुराने हिंदू और ब्रिटिश दौर के नाम आज भी लोगों की यादों और रोजमर्रा की बातचीत में इस्तेमाल होते हैं। कराची के इतिहासकार याकूब खान बंगश ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि 1947 के बाद लाहौर में वैसा वैचारिक बदलाव नहीं हुआ जैसा कराची जैसे शहरों में देखने को मिला था। उनके मुताबिक लाहौर में आने वाले ज्यादातर शरणार्थी कामकाजी तबके से थे, जिन्होंने शहर की पुरानी सामाजिक पहचान के साथ खुद को जोड़ लिया। इसी वजह से शहर का पुराना इतिहास लोगों की याद में बना रहा। —————— ये खबर भी पढ़ें… भारत ने जम्मू-कश्मीर पर चीन-पाकिस्तान का बयान खारिज किया:कहा- दूसरे देश को टिप्पणी का हक नहीं; चीन ने इतिहास से जुड़ा विवाद बताया था भारत ने चीन और पाकिस्तान के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर के जिक्र को पूरी तरह खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अभिन्न और अविभाज्य हिस्से हैं। भारत ने चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) परियोजनाओं पर भी कड़ी आपत्ति जताई। यह बयान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की चीन यात्रा के बाद जारी संयुक्त बयान के जवाब में आया है। इसमें कहा गया था कि पाकिस्तान ने चीन को जम्मू-कश्मीर के हालात की जानकारी दी। पूरी खबर पढ़ें…
Randhir Singh Asian Games Gold Medallist & OCA President Passes Away

Hindi News Sports Randhir Singh Asian Games Gold Medallist & OCA President Passes Away स्पोर्ट्स डेस्क6 मिनट पहले कॉपी लिंक एशियन गेम्स में भारत को शूटिंग का पहला गोल्ड दिलाने वाले शूटर रणधीर सिंह का बुधवार को निधन हो गया। वे 79 साल के थे और लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। उन्होंने हाल ही में स्वास्थ्य कारणों से ओलिंपिक काउंसिल ऑफ एशिया (OCA) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। उन्हें 2024 में 4 साल के कार्यकाल के लिए चुना गया था। रणधीर ने 1978 बैंकॉक एशियन गेम्स के ट्रैप शूटिंग इवेंट में गोल्ड मेडल जीता था। उन्होंने भारत में आयोजित 1982 एशियाड में ब्रॉन्ज और 1986 में सिल्वर भी जीता था। रणधीर ने 5 ओलिंपिक गेम्स और 1978 कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की ओर से हिस्सा लिया। उन्हें 1979 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। रणधीर सिंह ने भारत को एशियन गेम्स में शूटिंग का पहला गोल्ड दिलाया। परिवार में कई इंटरनेशनल प्लेयर्स रणधीर के परिवार से कई सदस्यों ने भारत को रिप्रेजेंट किया है। उनके चाचा महाराजा यादविंद्र सिंह ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला। वे IOC के सदस्य थे। रणधीर के पिता भलिंद्र सिंह भी फर्स्ट क्लास क्रिकेटर और 1947 से 1992 तक IOC सदस्य थे। खेल प्रशासन में लंबा अनुभव रहा नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के सचिव राजीव भाटिया ने उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा कि रणधीर सिंह खेल प्रशासन के सबसे सम्मानित व्यक्तियों में शामिल थे। उन्होंने शूटिंग खेल और ओलिंपिक आंदोलन के विकास में अहम योगदान दिया। वे इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन (IOA) के महासचिव रहे। इतना ही नहीं, वे इंटरनेशनल ओलिंपिक कमेटी (IOC) के सदस्य भी थे। ——————————————————- स्पोर्ट्स से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… फ्रेंच ओपन- कार एक्सीडेंट के बावजूद जीतीं कोको गॉफ फ्रेंच ओपन में खिताब बचाने उतरीं अमेरिकी टेनिस स्टार कोको गॉफ मंगलवार को एक छोटे कार हादसे का शिकार हो गईं। हालांकि, उन्हें चोट नहीं आई और वे मैच जीतकर दूसरे दौर में पहुंच गईं। 22 साल की गॉफ ने बताया कि रोलां गैरों पहुंचने के दौरान उनकी कार पोल से टकरा गई और क्षतिग्रस्त हो गई। उन्हें टैक्सी से स्टेडियम पहुंचना पड़ा। गाफ ने अपने ही देश की टेलर टाउनसेंड को 6-4, 6-0 से हराया। पढ़ें पूरी खबर दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Randhir Singh Asian Games Gold Medallist & OCA President Passes Away

Hindi News Sports Randhir Singh Asian Games Gold Medallist & OCA President Passes Away स्पोर्ट्स डेस्क4 मिनट पहले कॉपी लिंक एशियन गेम्स में भारत को शूटिंग का पहला गोल्ड मेडल दिलाने वाले शूटर रणधीर सिंह का बुधवार को निधन हो गया। वे 79 साल के थे और लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। पूर्व निशानेबाज रणधीर ने हाल ही में स्वास्थ्य कारणों से ओलिंपिक काउंसिल ऑफ एशिया (OCA) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। उन्हें 2024 में 4 साल के कार्यकाल के लिए चुना गया था। रणधीर ने 1978 बैंकॉक एशियन गेम्स के ट्रैप शूटिंग इवेंट में गोल्ड मेडल जीता था। उन्होंने 5 ओलिंपिक गेम्स और एक कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की ओर से हिस्सा लिया। उन्हें 1979 में अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। रणधीर सिंह ने भारत को एशियन गेम्स में शूटिंग का पहला गोल्ड दिलाया। बेटी राजेश्वरी इंटरनेशनल शूटर हैं, 2022 में सिल्वर जीता था रणधीर अपने पीछे पत्नी विनीता और 3 बेटियां (महिमा, सुनैना और राजेश्वरी) छोड़ गए हैं। उनकी बेटी राजेश्वरी इंटरनेशनल लेवल पर ट्रैप शूटिंग करती हैं। राजेश्वरी ने 2022 एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीता था। सिल्वर जीतने के बाद पिता रणधीर सिंह के साथ राजेश्वरी (बाएं से पहली), साथ में प्रीति रजक। रणधीर के परिवार से कई सदस्यों ने भारत को रिप्रेजेंट किया है। उनके चाचा महाराजा यादविंद्र सिंह ने भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेला। वे IOC के सदस्य थे। रणधीर के पिता भलिंद्र सिंह भी फर्स्ट क्लास क्रिकेटर और 1947 से 1992 तक IOC सदस्य थे। खेल प्रशासन में लंबा अनुभव रहा नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NRAI) के सचिव राजीव भाटिया ने उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा कि रणधीर सिंह खेल प्रशासन के सबसे सम्मानित व्यक्तियों में शामिल थे। उन्होंने शूटिंग खेल और ओलिंपिक आंदोलन के विकास में अहम योगदान दिया। वे इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन (IOA) के महासचिव रहे। इतना ही नहीं, वे इंटरनेशनल ओलिंपिक कमेटी (IOC) के सदस्य भी थे। ——————————————————- स्पोर्ट्स से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… फ्रेंच ओपन- कार एक्सीडेंट के बावजूद जीतीं कोको गॉफ फ्रेंच ओपन में खिताब बचाने उतरीं अमेरिकी टेनिस स्टार कोको गॉफ मंगलवार को एक छोटे कार हादसे का शिकार हो गईं। हालांकि, उन्हें चोट नहीं आई और वे मैच जीतकर दूसरे दौर में पहुंच गईं। 22 साल की गॉफ ने बताया कि रोलां गैरों पहुंचने के दौरान उनकी कार पोल से टकरा गई और क्षतिग्रस्त हो गई। उन्हें टैक्सी से स्टेडियम पहुंचना पड़ा। गाफ ने अपने ही देश की टेलर टाउनसेंड को 6-4, 6-0 से हराया। पढ़ें पूरी खबर दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
RPSC RAS 2026 Recruitment | Application Process & Vacancy Details

राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) ने राजस्थान राज्य और अधीनस्थ सेवाएं (RAS) संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा-2026 के तहत 607 पदों के लिए भर्ती निकाली है। . राज्य सेवा के 192 पद और अधीनस्थ सेवा के 415 पद हैं। कैंडिडेट की आयु 1 जनवरी 2027 को न्यूनतम 21 साल और अधिकतम 40 साल होनी चाहिए। 17 अप्रैल को आयोग ने आरएएस-2024 का रिजल्ट जारी किया था। इससे पहले राज्य सरकार ने जनवरी में एक लाख भर्ती परीक्षाओं का कैलेंडर जारी किया था। इसमें जानकारी दी गई थी कि आरएएस भर्ती 2026 करीब 500 पदों पर होगी। इस भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा के लिए 3 मई की तारीख प्रस्तावित की थी, लेकिन वैकेंसी नहीं निकली। यह रहेगा परीक्षा शुल्क सामान्य (अनारक्षित) और राजस्थान के क्रीमीलेयर श्रेणी के अन्य पिछड़ा वर्ग/अति पिछड़ा वर्ग के आवेदक के लिए 600 रुपए। राजस्थान के नॉन क्रीमीलेयर श्रेणी के अन्य पिछड़ा वर्ग/अति पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांग के लिए 400 रुपए। ऐसे करें अप्लाई अभ्यर्थियों को आयोग की वेबसाइट https://rpsc.rajasthan.gov.in पर अप्लाई ऑनलाइन लिंक पर क्लिक करना होगा या SSO पोर्टल https://sso.rajasthan.gov.in से लॉगिन करना होगा। इसके बाद सिटीजन एप (G2C) में रिक्रूटमेंट पोर्टल का चयन कर वन टाइम रजिस्ट्रेशन (OTR) करना होगा। पहली बार OTR करने के लिए अभ्यर्थी का नाम, पिता का नाम, जन्म तिथि, लिंग, सेकेंडरी/समकक्ष परीक्षा, आधार कार्ड/पैन कार्ड/वोटर कार्ड/ड्राइविंग लाइसेंस में से किसी एक आई.डी. प्रूफ की डिटेल और डॉक्युमेंट अपलोड करना जरूरी है। लॉगिन कर सिटीजन एप में उपलब्ध रिक्रूटमेंट का चयन कर अपने OTR नंबर के आधार पर ऑनलाइन आवेदन करें। वन टाइम रजिस्ट्रेशन करने के बाद ओटीआर प्रोफाइल में किसी भी प्रकार का परिवर्तन किया जाना संभव नहीं होगा। —– यह खबर भी पढ़िए… RAS में आधा नंबर से टॉपर बने दिनेश विश्नोई:9वें स्थान पर रहे भूपेन्द्र के इन्टरव्यू में सबसे ज्यादा नंबर; पहले प्रयास में 23 साल की शालू सिलेक्ट राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) परीक्षा-2024 का रिजल्ट आरपीएससी ने जारी कर दिया। वैकेंसी निकालने से लेकर फाइनल रिजल्ट तक के सफर में इस बार महज 1 साल 7 महीने और 17 दिन का ही समय लगा। पढ़ें पूरी खबर…
फ्रांस में 100 से ज्यादा स्कूलों में चाइल्ड एब्यूज स्कैंडल:3 साल की बच्ची का 'मॉनिटर' ने रेप किया; केस की खुली सुनवाई शुरू

फ्रांस इस समय एक बड़े चाइल्ड एब्यूज स्कैंडल से जूझ रहा है। पेरिस समेत 100 से ज्यादा स्कूलों और डे-केयर सेंटरों में बच्चों के साथ हिंसा, यौन शोषण और रेप के आरोपों की जांच चल रही है। मामले सामने आने के बाद देशभर में आक्रोश बढ़ गया है। 100 से ज्यादा संस्थानों में जांच पेरिस की प्रॉसिक्यूटर लॉर बेको ने बताया कि राजधानी में 84 प्रीस्कूल, करीब 20 प्राइमरी स्कूल और लगभग 10 डे-केयर सेंटरों में जांच चल रही है। कई मामलों में छोटे बच्चों के साथ रेप और यौन शोषण के आरोप लगाए गए हैं। आरोप स्कूल मॉनिटर्स पर लगे हैं। ये वे कर्मचारी होते हैं जो बच्चों की देखभाल लंच ब्रेक, खेल, सोने के समय और आफ्टर-स्कूल गतिविधियों के दौरान करते हैं। #MeTooSchool आंदोलन ने उठाई आवाज कोर्ट के बाहर #MeTooSchool आंदोलन से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने बैनर पर लिखा- “कोई भी बच्चा स्कूल जाने से न डरे।” आंदोलन की सह-संस्थापक बार्का जरूआली ने कहा कि अब पूरे देश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर जागने की जरूरत है। बच्चों को भूखा रखने और मारपीट के आरोप अभिभावकों ने आरोप लगाया कि कुछ मॉनिटर्स बच्चों पर चिल्लाते थे, बाल खींचते थे और खाना देने से मना कर देते थे। कुछ मामलों में बच्चों के साथ यौन शोषण के आरोप भी लगे हैं। पीड़ित परिवारों के वकीलों का कहना है कि कई अभिभावकों को शिकायत दर्ज कराने और कार्रवाई करवाने के लिए महीनों संघर्ष करना पड़ा। पीड़ित परिवारों ने ट्रायल सार्वजनिक कराया फ्रांस में बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई आमतौर पर बंद कमरे में होती है, लेकिन इस बार पीड़ित परिवारों ने ट्रायल सार्वजनिक रखने की मांग की। परिवारों के वकीलों के मुताबिक वे गिसेल पेलिको के चर्चित रेप केस से प्रेरित थे। गिसेल ने कहा था कि “शर्म पीड़ितों नहीं, अपराधियों को होनी चाहिए।” कोर्ट में शुरू हुआ पहला बड़ा ट्रायल स्कैंडल से जुड़े पहले बड़े मामलों में से एक का ट्रायल इस हफ्ते पेरिस में शुरू हुआ। 36 वर्षीय स्कूल सहायक डेविड जी. पर सितंबर 2024 से अप्रैल 2025 के बीच 3 से 5 साल के पांच बच्चों के यौन शोषण और दो महिला सहकर्मियों के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप है। हालांकि, आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार किया है। जांचकर्ताओं के मुताबिक बच्चों ने पुलिस को अपने शब्दों में अनुचित छूने की घटनाएं बताईं। अगर दोष साबित हुए तो आरोपी को 10 साल तक की जेल और 1.5 लाख यूरो तक जुर्माना हो सकता है। बच्चों में दिखा गंभीर मानसिक असर कुछ अभिभावकों ने कहा कि उनके बच्चों में लंबे समय से डर और मानसिक तनाव के संकेत दिख रहे थे। एक वकील ने बताया कि 3 साल का एक बच्चा स्कूल जाने से डरने लगा था। आरोप है कि उसके साथ हिंसा करने वाले मॉनिटर के खिलाफ पहले भी शिकायतें थीं। प्रशासन पर बढ़ा दबाव मामले सामने आने के बाद पेरिस प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है। अधिकारियों के मुताबिक 2026 के पहले तीन महीनों में 78 स्कूल सहायकों को सस्पेंड किया गया, जिनमें 31 पर यौन शोषण के आरोप हैं। फ्रांस की स्वतंत्र संस्था CIIVISE के अनुसार देश में हर साल करीब 1.6 लाख बच्चे रेप या यौन शोषण का शिकार होते हैं। फ्रांस में स्कूल मॉनिटर कौन होते हैं? फ्रांस में स्कूल मॉनिटर, जिन्हें एनिमेटर या पेरिस्कोलर स्टाफ भी कहा जाता है, स्थानीय नगर प्रशासन द्वारा नियुक्त कर्मचारी होते हैं। ये सीधे फ्रांस के शिक्षा मंत्रालय के अधीन नहीं होते। इनकी जिम्मेदारी नर्सरी और प्राइमरी स्कूलों में 3 से 11 साल तक के बच्चों की निगरानी करना होती है। ये बच्चों को लंच ब्रेक, दोपहर की नींद, खेलकूद और आफ्टर-स्कूल गतिविधियों के दौरान संभालते हैं। ये शिक्षक नहीं होते, बल्कि खेल, क्राफ्ट और मनोरंजन गतिविधियां संचालित करते हैं। वहीं सेकेंडरी स्कूलों (कॉलेज और हाई स्कूल) में अनुशासन, सुरक्षा और अनुपस्थिति की निगरानी ‘स्कूल लाइफ’ स्टाफ करता है, जो विशेष प्रशासनिक अधिकारियों के अधीन काम करता है। फ्रांस में तीन साल की उम्र से स्कूल जाना जरूरी है। इसलिए नर्सरी और प्राइमरी स्कूलों में छोटे बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा इन मॉनिटर्स के साथ बिताते हैं। मॉनिटर्स सीधे शिक्षा मंत्रालय या स्कूल के कर्मचारी नहीं होते। इन्हें स्थानीय प्रशासन, नगर परिषद या सिटी हॉल की तरफ से भर्ती किया जाता है। अब यह सिस्टम विवादों में है। ऐसा कहा जा रहा है कि मॉनिटर्स की भर्ती प्रक्रिया बहुत कमजोर है। कई लोगों को बिना खास ट्रेनिंग, मनोवैज्ञानिक जांच या पेशेवर डिग्री के काम पर रख लिया जाता है। बड़ी संख्या में लोग अस्थायी या घंटे के हिसाब से काम करते हैं, इसलिए निगरानी और जवाबदेही भी कमजोर रहती है। क्या है #MeTooSchool आंदोलन? #MeTooSchool फ्रांस का एक अभिभावक और सामाजिक आंदोलन है, जो स्कूलों में बच्चों के खिलाफ यौन शोषण, हिंसा और उत्पीड़न के मामलों को सामने लाने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग करता है। पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया कि शुरुआती शिकायतों को स्कूल प्रशासन ने नजरअंदाज कर दिया था। पेरिस की प्रॉसिक्यूटर लॉर बेको के मुताबिक राजधानी में 84 नर्सरी स्कूल, 20 प्राइमरी स्कूल और 10 डे-केयर सेंटरों में जांच चल रही है। पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोयर ने बताया कि 2026 की शुरुआत से अब तक 78 स्कूल और आफ्टर-स्कूल कर्मचारियों को सस्पेंड किया गया है। इनमें 31 पर यौन हिंसा के आरोप हैं। उन्होंने बच्चों के खिलाफ अपराध रोकने के लिए 2 करोड़ यूरो की योजना की घोषणा की है। आगे क्या? फ्रांस सरकार स्कूलों और डे-केयर सेंटरों में सुरक्षा नियम कड़े कर सकती है। बच्चों के साथ काम करने वाले स्टाफ की जांच और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन बढ़ाए जाने की संभावना है। आने वाले महीनों में और ट्रायल और गिरफ्तारी हो सकती हैं।
फ्रांस में 100 से ज्यादा स्कूलों में चाइल्ड एब्यूज स्कैंडल:3 साल की बच्ची का 'मॉनिटर' ने रेप किया; केस की खुली सुनवाई शुरू

फ्रांस इस समय एक बड़े चाइल्ड एब्यूज स्कैंडल से जूझ रहा है। पेरिस समेत 100 से ज्यादा स्कूलों और डे-केयर सेंटरों में बच्चों के साथ हिंसा, यौन शोषण और रेप के आरोपों की जांच चल रही है। मामले सामने आने के बाद देशभर में आक्रोश बढ़ गया है। 100 से ज्यादा संस्थानों में जांच पेरिस की प्रॉसिक्यूटर लॉर बेको ने बताया कि राजधानी में 84 प्रीस्कूल, करीब 20 प्राइमरी स्कूल और लगभग 10 डे-केयर सेंटरों में जांच चल रही है। कई मामलों में छोटे बच्चों के साथ रेप और यौन शोषण के आरोप लगाए गए हैं। आरोप स्कूल मॉनिटर्स पर लगे हैं। ये वे कर्मचारी होते हैं जो बच्चों की देखभाल लंच ब्रेक, खेल, सोने के समय और आफ्टर-स्कूल गतिविधियों के दौरान करते हैं। #MeTooSchool आंदोलन ने उठाई आवाज कोर्ट के बाहर #MeTooSchool आंदोलन से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने बैनर पर लिखा- “कोई भी बच्चा स्कूल जाने से न डरे।” आंदोलन की सह-संस्थापक बार्का जरूआली ने कहा कि अब पूरे देश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर जागने की जरूरत है। बच्चों को भूखा रखने और मारपीट के आरोप अभिभावकों ने आरोप लगाया कि कुछ मॉनिटर्स बच्चों पर चिल्लाते थे, बाल खींचते थे और खाना देने से मना कर देते थे। कुछ मामलों में बच्चों के साथ यौन शोषण के आरोप भी लगे हैं। पीड़ित परिवारों के वकीलों का कहना है कि कई अभिभावकों को शिकायत दर्ज कराने और कार्रवाई करवाने के लिए महीनों संघर्ष करना पड़ा। पीड़ित परिवारों ने ट्रायल सार्वजनिक कराया फ्रांस में बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई आमतौर पर बंद कमरे में होती है, लेकिन इस बार पीड़ित परिवारों ने ट्रायल सार्वजनिक रखने की मांग की। परिवारों के वकीलों के मुताबिक वे गिसेल पेलिको के चर्चित रेप केस से प्रेरित थे। गिसेल ने कहा था कि “शर्म पीड़ितों नहीं, अपराधियों को होनी चाहिए।” कोर्ट में शुरू हुआ पहला बड़ा ट्रायल स्कैंडल से जुड़े पहले बड़े मामलों में से एक का ट्रायल इस हफ्ते पेरिस में शुरू हुआ। 36 वर्षीय स्कूल सहायक डेविड जी. पर सितंबर 2024 से अप्रैल 2025 के बीच 3 से 5 साल के पांच बच्चों के यौन शोषण और दो महिला सहकर्मियों के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप है। हालांकि, आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार किया है। जांचकर्ताओं के मुताबिक बच्चों ने पुलिस को अपने शब्दों में अनुचित छूने की घटनाएं बताईं। अगर दोष साबित हुए तो आरोपी को 10 साल तक की जेल और 1.5 लाख यूरो तक जुर्माना हो सकता है। बच्चों में दिखा गंभीर मानसिक असर कुछ अभिभावकों ने कहा कि उनके बच्चों में लंबे समय से डर और मानसिक तनाव के संकेत दिख रहे थे। एक वकील ने बताया कि 3 साल का एक बच्चा स्कूल जाने से डरने लगा था। आरोप है कि उसके साथ हिंसा करने वाले मॉनिटर के खिलाफ पहले भी शिकायतें थीं। प्रशासन पर बढ़ा दबाव मामले सामने आने के बाद पेरिस प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है। अधिकारियों के मुताबिक 2026 के पहले तीन महीनों में 78 स्कूल सहायकों को सस्पेंड किया गया, जिनमें 31 पर यौन शोषण के आरोप हैं। फ्रांस की स्वतंत्र संस्था CIIVISE के अनुसार देश में हर साल करीब 1.6 लाख बच्चे रेप या यौन शोषण का शिकार होते हैं। फ्रांस में स्कूल मॉनिटर कौन होते हैं? फ्रांस में स्कूल मॉनिटर, जिन्हें एनिमेटर या पेरिस्कोलर स्टाफ भी कहा जाता है, स्थानीय नगर प्रशासन द्वारा नियुक्त कर्मचारी होते हैं। ये सीधे फ्रांस के शिक्षा मंत्रालय के अधीन नहीं होते। इनकी जिम्मेदारी नर्सरी और प्राइमरी स्कूलों में 3 से 11 साल तक के बच्चों की निगरानी करना होती है। ये बच्चों को लंच ब्रेक, दोपहर की नींद, खेलकूद और आफ्टर-स्कूल गतिविधियों के दौरान संभालते हैं। ये शिक्षक नहीं होते, बल्कि खेल, क्राफ्ट और मनोरंजन गतिविधियां संचालित करते हैं। वहीं सेकेंडरी स्कूलों (कॉलेज और हाई स्कूल) में अनुशासन, सुरक्षा और अनुपस्थिति की निगरानी ‘स्कूल लाइफ’ स्टाफ करता है, जो विशेष प्रशासनिक अधिकारियों के अधीन काम करता है। फ्रांस में तीन साल की उम्र से स्कूल जाना जरूरी है। इसलिए नर्सरी और प्राइमरी स्कूलों में छोटे बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा इन मॉनिटर्स के साथ बिताते हैं। मॉनिटर्स सीधे शिक्षा मंत्रालय या स्कूल के कर्मचारी नहीं होते। इन्हें स्थानीय प्रशासन, नगर परिषद या सिटी हॉल की तरफ से भर्ती किया जाता है। अब यह सिस्टम विवादों में है। ऐसा कहा जा रहा है कि मॉनिटर्स की भर्ती प्रक्रिया बहुत कमजोर है। कई लोगों को बिना खास ट्रेनिंग, मनोवैज्ञानिक जांच या पेशेवर डिग्री के काम पर रख लिया जाता है। बड़ी संख्या में लोग अस्थायी या घंटे के हिसाब से काम करते हैं, इसलिए निगरानी और जवाबदेही भी कमजोर रहती है। क्या है #MeTooSchool आंदोलन? #MeTooSchool फ्रांस का एक अभिभावक और सामाजिक आंदोलन है, जो स्कूलों में बच्चों के खिलाफ यौन शोषण, हिंसा और उत्पीड़न के मामलों को सामने लाने और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग करता है। पीड़ित परिवारों ने आरोप लगाया कि शुरुआती शिकायतों को स्कूल प्रशासन ने नजरअंदाज कर दिया था। पेरिस की प्रॉसिक्यूटर लॉर बेको के मुताबिक राजधानी में 84 नर्सरी स्कूल, 20 प्राइमरी स्कूल और 10 डे-केयर सेंटरों में जांच चल रही है। पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोयर ने बताया कि 2026 की शुरुआत से अब तक 78 स्कूल और आफ्टर-स्कूल कर्मचारियों को सस्पेंड किया गया है। इनमें 31 पर यौन हिंसा के आरोप हैं। उन्होंने बच्चों के खिलाफ अपराध रोकने के लिए 2 करोड़ यूरो की योजना की घोषणा की है। आगे क्या? फ्रांस सरकार स्कूलों और डे-केयर सेंटरों में सुरक्षा नियम कड़े कर सकती है। बच्चों के साथ काम करने वाले स्टाफ की जांच और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन बढ़ाए जाने की संभावना है। आने वाले महीनों में और ट्रायल और गिरफ्तारी हो सकती हैं।







