Friday, 24 Jul 2026 | 07:03 AM

Trending :

मूवी रिव्यू: दुल्हनिया ले आएगी:रिश्तों पर नहीं, समाज की सोच पर निशाना साधती है खुशाली कुमार की फिल्म 'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में 'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा India Panama Maritime Security Cooperation बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में
EXCLUSIVE

मूवी रिव्यू: दुल्हनिया ले आएगी:रिश्तों पर नहीं, समाज की सोच पर निशाना साधती है खुशाली कुमार की फिल्म

मूवी रिव्यू: दुल्हनिया ले आएगी:रिश्तों पर नहीं, समाज की सोच पर निशाना साधती है खुशाली कुमार की फिल्म

क्या 30 की उम्र पार होते ही लड़की की शादी कर देना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए? यही सवाल उठाती है निर्देशक आकाशादित्य लामा की फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’। कॉमेडी, इमोशन और पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने में बुनी गई यह फिल्म मनोरंजन के साथ एक जरूरी सामाजिक संदेश भी देती है कि शादी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। हालांकि कहानी कई जगह अनुमानित लगती है, लेकिन इसका उद्देश्य और क्लाइमैक्स फिल्म को एक बार देखने लायक बना देते हैं। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 8 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है। कैसी है फिल्म की कहानी? फिल्म की कहानी 32 वर्षीय नव्या (खुशहाली कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है। बढ़ती उम्र को लेकर उसके पिता (महेश मांजरेकर) लगातार उसकी शादी की चिंता करते रहते हैं। जल्दबाजी में उसकी शादी एक ऐसे लड़के से तय कर दी जाती है, जिसके पहले से कई लड़कियों के साथ अफेयर रह चुके होते हैं। नव्या को इस सच्चाई का पता चल जाता है, लेकिन वह अपने पिता का दिल नहीं तोड़ना चाहती। वह यह बात उनसे छिपा लेती है और तय करती है कि शादी तो उसी दिन होगी, लेकिन सही दूल्हे के साथ। इसके बाद शुरू होती है उसके लिए सही जीवनसाथी की तलाश, जिसमें कई मजेदार और भावुक घटनाएं सामने आती हैं। इस सफर में ओंकार कपूर का किरदार भी कहानी में अहम मोड़ लेकर आता है। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका क्लाइमैक्स है। आखिर में निर्देशक यह संदेश देते हैं कि सरकार ने भले ही लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय कर दी हो, लेकिन शादी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। लड़की को तभी शादी करनी चाहिए, जब उसे सही जीवनसाथी मिले। हालांकि पहले हाफ में कहानी थोड़ी धीमी गति से आगे बढ़ती है और कई घटनाएं पहले से अनुमानित लगती हैं। अगर स्क्रीनप्ले पर थोड़ा और काम किया जाता तो फिल्म और प्रभावशाली बन सकती थी। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? खुशहाली कुमार ने नव्या के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। उन्होंने एक ऐसी लड़की की भावनाओं को अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है, जो परिवार की खुशी और अपनी जिंदगी के फैसलों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। ओंकार कपूर अपने किरदार में सहज नजर आते हैं और कहानी को हल्कापन देने में सफल रहते हैं। महेश मांजरेकर एक चिंतित पिता के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं। उनके और खुशहाली कुमार के बीच के भावनात्मक दृश्य फिल्म की सबसे मजबूत कड़ियों में शामिल हैं। वहीं पीयूष मिश्रा अपनी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और संवाद अदायगी से हर बार की तरह प्रभावित करते हैं। भले ही उनका किरदार बहुत लंबा न हो, लेकिन जहां भी नजर आते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष निर्देशक आकाशादित्य लामा ने गंभीर सामाजिक मुद्दे को भारी-भरकम बनाने के बजाय हल्के-फुल्के और मनोरंजक अंदाज में पेश किया है। यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहानी को पारिवारिक दर्शकों के हिसाब से सरल और सहज रखा है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के माहौल के अनुरूप है और रंगों का इस्तेमाल आकर्षक लगता है। एडिटिंग पहले हाफ में थोड़ी और कसी जा सकती थी, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी अच्छी रफ्तार पकड़ लेती है। संवाद कई जगह मुस्कुराने पर मजबूर करते हैं, जबकि क्लाइमैक्स भावनात्मक असर छोड़ता है। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? फिल्म का संगीत इसकी मजबूत कड़ियों में से एक है। ‘बिटिया पराई नहीं होती’ गाना भावनात्मक रूप से दिल को छूता है और फिल्म के संदेश को मजबूती देता है। वहीं ‘जलवा दिखा जाए’ कहानी में मनोरंजन का तड़का लगाता है। दोनों गाने फिल्म के मूड के साथ अच्छी तरह मेल खाते हैं और याद रह जाते हैं। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? ‘दुल्हनिया ले आएगी’ कोई बहुत अलग कहानी नहीं कहती, लेकिन समाज में लड़कियों की शादी को लेकर बने दबाव और सोच पर जरूरी सवाल जरूर उठाती है। फिल्म कॉमेडी, इमोशन और सामाजिक संदेश का संतुलित मिश्रण है। अगर आप परिवार के साथ ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं, जो मनोरंजन के साथ एक सकारात्मक संदेश भी दे, तो यह फिल्म आपके लिए अच्छी पसंद हो सकती है।

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत

India Panama Maritime Security Cooperation

India Panama Maritime Security Cooperation

Hindi News Career India Panama Maritime Security Cooperation | IASV Triveni Return Update 11 मिनट पहले कॉपी लिंक आज के प्रमुख करेंट अफेयर्स, जो सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के लिए जरूरी हैं- नेशनल (NATIONAL) 1. अनुराग जैन नीति आयोग के नए CEO होंगे 23 जुलाई को अनुराग जैन नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त हुए। अपॉइंटमेंट कमेटी ऑफ द कैबिनेट (ACC) ने अनुराग के नाम को मंजूरी दी। अनुराग पदभार ग्रहण करने की तारीख से अगले दो सालों तक इस पद पर बने रहेंगे। अनुराग अंतरिम CEO IAS निधि छिब्बर की जगह लेंगे। निधि 24 फरवरी को इस पद पर अपॉइंट की गई थीं। अनुराग 1989 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के IAS ऑफिसर हैं। अनुराग अक्टूबर 2024 से अब तक मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव के पद पर थे, उनका कार्यकाल 31 अगस्त को खत्म हो रहा है। अनुराग के पास स्वास्थ्य, वन, पर्यावरण, कृषि, प्रशासन से जुड़े कई विभागों समेत कई विभागों का लंबा अनुभव है। इसके साथ ही इस आदेश के बाद मध्य प्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग ने सीनियर IAS अधिकारी अशोक बर्णवाल को अनुराग की जगह अस्थायी सचिव अपॉइंट किया है। अशोक अगस्त 2016 में शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें अपना प्रमुख सचिव बनाया तो 2018 में जब कमल नाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तब भी वे प्रमुख सचिव थे। नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) भारत सरकार का एक प्रमुख नीति थिंक टैंक है जिसने 2015 में योजना आयोग की जगह ली है। नीति आयोग का चेयरपर्सन पीएम होता है। इसके वाइस चेयरमेन पीएम अपॉइंट करते हैं और CEO केंद्र सरकार नियुक्त करती है। 2. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ को फ्लैग-इन किया 22 जुलाई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए ‘समुद्र प्रदक्षिणा’ अभियान को वर्चुअल फ्लैग-इन किया। ये पहला त्रि-सेवा यानी, थल सेना , वायु सेना और नौसेना का महिला क्रू नौकायन अभियान है। इस अभियान में भारतीय सेना की नौकायन पोत इंडियन आर्मी सेलिंग वेसल (IASV) त्रिवेणी से 9 महिला अधिकारियों ने 314 दिन यात्रा की। इस यात्रा के दौरान लगभग 25,500 समुद्री मील की दूरी तय की गई। फ्लैग-इन के मौके पर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, आर्मी चीफ जनरल धीरज सेठ, नेवी चीफ एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन और एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह भी मौजूद रहे। IASV त्रिवेणी 11 सितंबर 2025 को मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से रवाना किया गया था। इस यात्रा के दौरान IASV त्रिवेणी ने तीन बड़े केप्स – केप लीविन (ऑस्ट्रेलिया), केप हॉर्न (दक्षिण अमेरिका) और केप ऑफ गुड होप (अफ्रीका) का चक्कर लगाया है। IASV त्रिवेणी ने दक्षिणी महासागर बेल्ट सहित सभी देशांतरों (longitudes) और प्रमुख अक्षांशों (latitudes) से गुजरकर अपनी समुद्री परिक्रमा पूरी की है। IASV त्रिवेणी क्रू ने पनामा या स्वेज नहर जैसी किसी भी नहर का इस्तेमाल किए बिना खुले समुद्र का रास्ता अपनाया और यात्रा उसी जगह खत्म की जहां से शुरू हुई थी। IASV त्रिवेणी अभियान क्रू में मेजर करमजीत कौर, मेजर ओमिता दलवी, कैप्टन प्राजक्ता निकम, लेफ्टिनेंट कमांडर प्रियंका गुसाईं, विंग कमांडर विभा सिंह, स्क्वाड्रन लीडर अरुवी जयदेव और स्क्वाड्रन लीडर वैशाली भंडारी भी शामिल थीं। इस यात्रा के दौरान IASV त्रिवेणी क्रू ने चार महासागरों का सफलतापूर्वक चक्कर लगाया। 3. भारत और पनामा ने समुद्री सुरक्षा सहयोग पर सहमति जताई 22 जुलाई को भारत और पनामा ने समुद्री सुरक्षा के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। पनामा में पनामा नहर ग्लोबल समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र है और लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र का प्रवेश द्वार माना जाता है। इस सहमति के बाद भारत के महानिदेशालय नौवहन और पनामा मैरीटाइम अथॉरिटी मिलकर काम करेंगे। इस सहमति के बाद दोनों देश मिलकर पोर्ट डेवलपमेंट, लॉजिस्टिक्स, शिपिंग और समुद्री परिवहन में साझेदारी मजबूत करने पर काम करेंगे। यह साझेदारी मुख्य रूप से लॉजिस्टिक्स, डिजिटल इनोवेशन और ग्लोबल कनेक्टिविटी पर केंद्रित है। इसके तहत मैरीटाइम एजुकेशन एंड स्किल और नाविकों के ट्रेनिंग में सहयोग बढ़ाया जाएगा। पनामा नहर वैश्विक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है, और इस साझेदारी से भारतीय निर्यातकों को लाभ होगा। डिजिटल मैरीटाइम ट्रांसफॉर्मेशन के तहत AI, स्मार्ट पोर्ट लॉजिस्टिक्स और मेरीटाइम सिंगल विंडो जैसी टेक्नोलॉजी पर मिलकर काम किया जाएगा। इस सहमति के साथ ही ग्रीन शिप रीसाइक्लिंग, आधुनिक वेयरहाउसिंग और समुद्री स्ट्रक्चर के विकास पर भी सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है, ये पहल भारत की सागरमाला, मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 और वैश्विक समुद्री संपर्क को सुदृढ़ करने की रणनीति को भी समर्थन देती है। 4. DRDO एयरबस A321 विमानों के लिए अनुबंध किया 23 जुलाई को DRDO और अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस ने मिलकर नेक्स्ट-जेनरेशन के एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C-MKII) प्रोग्राम के लिए बड़ा MoU किया। इस MoU का उद्देश्य भारतीय वायुसेना के एयर सर्विलांस, अर्ली वॉरनिंग और कमांड कंट्रोल क्षमताओं मजबूत बनाना है। इस कार्यक्रम में DRDO टेक्निकल डिजाइन, रिसर्च और डेवलपमेंट को लीड करेगा। जबकि अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस AEW&C-MKII का प्रोडक्शन और इंटीग्रेशन का काम करेगा। AEW&C Mk-II प्लेटफॉर्म आधुनिक AESA रडार, लंबी दूरी की निगरानी क्षमता तथा नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध प्रणाली से लैस होगा। DRDO ने ये डील AI इंजीनियरिंब सर्विस लिमिटेड (AIESL) के साथ भी की है। जिसके तहत 6 एयरबस A321 विमानों को सैन्य उपयोग के लिए ‘ग्रीन कॉन्फिगरेशन’ में बदला जाएगा। इन विमानों को नेत्रा (Netra) Mk II एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम में बदला जाएगा। इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स, मेंटेनेंस, रिपेयर, ओवरहॉल (MRO) और करीब 30 साल तक तकनीकी सहायता की भी जिम्मेदारी इसी कार्यक्रम का हिस्सा होगी। इसका उद्देश्य दुश्मन के लंबी दूसरी के विमानों, मिसाइलों और ड्रोन का पता लगाना है और हवाई हमलों के दौरान कमांड और कंट्रोल में मदद करना है। अब तक अमेरिका, फ्रांस, इजरायल, चीन और स्वीडन जैसे सिर्फ पांच देशों ने स्वदेशी AEW&C क्षमता विकसित की है। AEW&C-MKII कार्यक्रम के बाद भारत भी इसमें शामिल हो जाएगा। ये विमान दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को लंबी दूरी से पहचान सकेंगे और विमानों में स्वदेशी रडार और सेंसर लगाए जाएंगे। मिसलीनियस (Miscellaneous) 4.भारत ने केन्या को इबोला से निपटने के लिए सहायता भेजी 23 जुलाई को भारत ने केन्या को इबोला से निपटने के लिए 4.5

'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा

'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा

फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’ को लेकर अभिनेत्री खुशहाली कुमार और निर्देशक-निर्माता आकाशादित्य लामा ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। इंटरव्यू में लामा ने मजाकिया अंदाज में खुद को टी-सीरीज का ‘राइवल’ बताते हुए खुशहाली की कास्टिंग की वजह बताई। दोनों ने शादी को लेकर युवाओं की बदलती सोच, रिश्तों में भरोसे की अहमियत और फिल्म के संदेश पर बात की। खुशहाली ने पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर के साथ काम करने का अनुभव साझा किया। साथ ही पिता गुलशन कुमार की विरासत, अपनी अलग पहचान और समाजसेवा से जुड़े किस्से भी बताए। सवाल: आजकल युवाओं में शादी को लेकर डर बढ़ रहा है। ऐसे में ‘दुल्हनिया ले आएगी’ जैसी फिल्म लाने का विचार कैसे आया? जवाब/आकाशादित्य लामा: शादी के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है और शादी से ही बनता है। हमारी फिल्म कॉमेडी जरूर है, लेकिन इसके जरिए रिश्तों, प्यार और पिता-बेटी के रिश्ते की बात कही गई है। गंभीर बातों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया है। खुशहाली कुमार: शादी तब करनी चाहिए, जब आप उसके लिए तैयार हों। सरकार ने शादी की न्यूनतम उम्र तय की है, लेकिन कोई एक्सपायरी डेट नहीं रखी। सही साथी मिले और आप मानसिक रूप से तैयार हों, तभी शादी का फैसला लेना चाहिए। यही बात फिल्म भी मजेदार अंदाज में कहती है। सवाल: खुशहाली कुमार को इस फिल्म के लिए कैसे चुना? जवाब/आकाशादित्य लामा: (हंसते हुए) लोग कहते हैं कि खुशहाली बड़ी म्यूजिक कंपनी की मालकिन हैं। मैं भी आजकल एक छोटी-सी म्यूजिक कंपनी चला रहा हूं, इसलिए फिलहाल हम दोनों राइवल हैं। ऐसे में मैं उनके पास क्यों जाता? लेकिन सच यह है कि मैंने उन्हें सिर्फ एक अभिनेत्री के तौर पर चुना। मैंने उनकी फिल्म ‘धोखा: राउंड द कॉर्नर’ देखी थी और ‘स्टारफिश’ के कुछ हिस्से भी। मेरी कहानी की ‘नव्या’ के लिए वही सबसे फिट लगीं। मैं ऐसी अभिनेत्री चाहता था, जिसकी कोई तय इमेज न हो। खुशहाली ने पहले कॉमेडी नहीं की थी, इसलिए लगा कि उनके साथ फिल्म में नई ताजगी आएगी। कहानी उन्हें पसंद आई और वहीं से हमारी यात्रा शुरू हुई। सवाल: फिल्म में पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर जैसे बड़े कलाकार हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब/आकाशादित्य लामा: कई लोगों ने पहले ही कहा था कि इतने बड़े कलाकारों को संभालना आसान नहीं होगा। लेकिन मेरा अनुभव बिल्कुल उल्टा रहा। अगर कलाकार को भरोसा हो जाए कि निर्देशक अपना काम जानता है और निर्माता उसका सम्मान करता है, तो कोई दिक्कत नहीं होती। दिलचस्प बात यह रही कि महेश मांजरेकर, पीयूष मिश्रा और स्नेहिल दीक्षित खुद भी निर्देशक हैं। मैंने इस फिल्म से सीखा कि निर्देशक को डायरेक्ट करना सबसे आसान होता है। खुशहाली कुमार: पीयूष जी की एनर्जी कमाल की है। रात की शूटिंग हो या दिन की, वह हमेशा पूरे उत्साह के साथ सेट पर आते थे। महेश सर के साथ पिता-बेटी के भावनात्मक दृश्य करना मेरे लिए खास अनुभव रहा। वह इतने नैचुरल अभिनेता हैं कि उनके साथ अभिनय करना आसान हो जाता है। सवाल: अगर फिल्म की शूटिंग का बिहाइंड द सीन वीडियो रिलीज हो, तो सबसे यादगार पल कौन-सा होगा? जवाब/आकाशादित्य लामा: दो सीन मेरे सबसे करीब हैं। पहला, जब नव्या अपने पिता से कहना चाहती है कि वह शादी नहीं करना चाहती, लेकिन उनकी भावनाओं को देखकर चुप रह जाती है। दूसरा, फिल्म के आखिर में खुशहाली का लंबा मोनोलॉग। उन्होंने उसे बिना रीटेक के एक ही बार में पूरा किया। ट्रायल शो में लोग पहले हंस रहे थे, लेकिन यह सीन आते ही माहौल भावुक हो गया। खुशहाली कुमार: सेट पर सबसे ज्यादा मजा तब आता था, जब सर खुद एक्टिंग करके सीन समझाते थे। उनका थिएटर बैकग्राउंड है, इसलिए वह हर सीन निभाकर दिखाते थे। कई बार हमें हंसी रोकना मुश्किल हो जाता था। सवाल: आजकल शादी को लेकर युवाओं की सोच बदल रही है। कई लोग शादी से बचना चाहते हैं। आप इसे कैसे देखते हैं? जवाब/आकाशादित्य लामा: कुछ घटनाओं की वजह से लोगों के मन में डर बढ़ा है, लेकिन रिश्ते भरोसे से चलते हैं। सोशल मीडिया के दौर में हर घटना तुरंत वायरल हो जाती है। हमें सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि सामने वाले ने क्या कहा, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों कहा। रिश्तों में विश्वास और धैर्य सबसे जरूरी हैं। परिवार के साथ ज्यादा समय बिताने की जरूरत है। खुशहाली कुमार: मैं भी मानती हूं कि शादी तभी करनी चाहिए, जब दोनों लोग उसके लिए तैयार हों। कई बार परिवार या समाज के दबाव में लोग शादी कर लेते हैं और बाद में परेशानियां शुरू हो जाती हैं। आज लड़कियां खुलकर अपनी बात कह रही हैं। अगर कोई पहले करियर बनाना चाहती है, तो उसके फैसले का सम्मान होना चाहिए। हर इंसान को वही करना चाहिए, जो वह सच में चाहता है। सवाल: खुशहाली, लोग आपको अक्सर टी-सीरीज और गुलशन कुमार के परिवार से जोड़कर देखते हैं। क्या आपको लगता है कि अब आपकी अलग पहचान भी बन चुकी है? जवाब/खुशहाली कुमार: मुझे गर्व है कि मैं गुलशन कुमार जी की बेटी हूं। मैं हमेशा चाहूंगी कि लोग मुझे उनके नाम से भी याद रखें। लेकिन जब मुझे मेहनत की वजह से काम मिलता है, तो वह खुशी अलग होती है। ‘धोखा’ के बाद यह फिल्म मुझे मेरी एक्टिंग देखकर मिली। उससे पहले मैं फैशन डिजाइनर थी। पेरिस और न्यूयॉर्क में शो किए, हॉलीवुड कलाकारों के लिए डिजाइनिंग की। वहां मुझे कोई परिवार की वजह से नहीं जानता था। वहां जो पहचान मिली, वह मेरी मेहनत की वजह से मिली। सवाल: इस फिल्म से जुड़ी सबसे खास याद क्या रहेगी? जवाब/खुशहाली कुमार: यह मेरे प्रोडक्शन हाउस के बाहर साइन की गई पहली फिल्म और पहली कॉमेडी भी है। पहला साइनिंग अमाउंट मिलने पर मैंने उसे भगवान गणेश के चरणों में रखा। यही पल मेरे लिए सबसे खास रहेगा। मेरी कोशिश रहती है कि कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। कई लड़कियों की पढ़ाई का खर्च मैं उठाती हूं। पहले अपनी फैक्ट्री के पास बच्चों को रोज खाना भी खिलाती थी। मुझे लगता है कि ये संस्कार मुझे पापा से

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत

'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा

'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा

फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’ को लेकर अभिनेत्री खुशहाली कुमार और निर्देशक-निर्माता आकाशादित्य लामा ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। इंटरव्यू में लामा ने मजाकिया अंदाज में खुद को टी-सीरीज का ‘राइवल’ बताते हुए खुशहाली की कास्टिंग की वजह बताई। दोनों ने शादी को लेकर युवाओं की बदलती सोच, रिश्तों में भरोसे की अहमियत और फिल्म के संदेश पर बात की। खुशहाली ने पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर के साथ काम करने का अनुभव साझा किया। साथ ही पिता गुलशन कुमार की विरासत, अपनी अलग पहचान और समाजसेवा से जुड़े किस्से भी बताए। सवाल: आजकल युवाओं में शादी को लेकर डर बढ़ रहा है। ऐसे में ‘दुल्हनिया ले आएगी’ जैसी फिल्म लाने का विचार कैसे आया? जवाब/आकाशादित्य लामा: शादी के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है और शादी से ही बनता है। हमारी फिल्म कॉमेडी जरूर है, लेकिन इसके जरिए रिश्तों, प्यार और पिता-बेटी के रिश्ते की बात कही गई है। गंभीर बातों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया है। खुशहाली कुमार: शादी तब करनी चाहिए, जब आप उसके लिए तैयार हों। सरकार ने शादी की न्यूनतम उम्र तय की है, लेकिन कोई एक्सपायरी डेट नहीं रखी। सही साथी मिले और आप मानसिक रूप से तैयार हों, तभी शादी का फैसला लेना चाहिए। यही बात फिल्म भी मजेदार अंदाज में कहती है। सवाल: खुशहाली कुमार को इस फिल्म के लिए कैसे चुना? जवाब/आकाशादित्य लामा: (हंसते हुए) लोग कहते हैं कि खुशहाली बड़ी म्यूजिक कंपनी की मालकिन हैं। मैं भी आजकल एक छोटी-सी म्यूजिक कंपनी चला रहा हूं, इसलिए फिलहाल हम दोनों राइवल हैं। ऐसे में मैं उनके पास क्यों जाता? लेकिन सच यह है कि मैंने उन्हें सिर्फ एक अभिनेत्री के तौर पर चुना। मैंने उनकी फिल्म ‘धोखा: राउंड द कॉर्नर’ देखी थी और ‘स्टारफिश’ के कुछ हिस्से भी। मेरी कहानी की ‘नव्या’ के लिए वही सबसे फिट लगीं। मैं ऐसी अभिनेत्री चाहता था, जिसकी कोई तय इमेज न हो। खुशहाली ने पहले कॉमेडी नहीं की थी, इसलिए लगा कि उनके साथ फिल्म में नई ताजगी आएगी। कहानी उन्हें पसंद आई और वहीं से हमारी यात्रा शुरू हुई। सवाल: फिल्म में पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर जैसे बड़े कलाकार हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब/आकाशादित्य लामा: कई लोगों ने पहले ही कहा था कि इतने बड़े कलाकारों को संभालना आसान नहीं होगा। लेकिन मेरा अनुभव बिल्कुल उल्टा रहा। अगर कलाकार को भरोसा हो जाए कि निर्देशक अपना काम जानता है और निर्माता उसका सम्मान करता है, तो कोई दिक्कत नहीं होती। दिलचस्प बात यह रही कि महेश मांजरेकर, पीयूष मिश्रा और स्नेहिल दीक्षित खुद भी निर्देशक हैं। मैंने इस फिल्म से सीखा कि निर्देशक को डायरेक्ट करना सबसे आसान होता है। खुशहाली कुमार: पीयूष जी की एनर्जी कमाल की है। रात की शूटिंग हो या दिन की, वह हमेशा पूरे उत्साह के साथ सेट पर आते थे। महेश सर के साथ पिता-बेटी के भावनात्मक दृश्य करना मेरे लिए खास अनुभव रहा। वह इतने नैचुरल अभिनेता हैं कि उनके साथ अभिनय करना आसान हो जाता है। सवाल: अगर फिल्म की शूटिंग का बिहाइंड द सीन वीडियो रिलीज हो, तो सबसे यादगार पल कौन-सा होगा? जवाब/आकाशादित्य लामा: दो सीन मेरे सबसे करीब हैं। पहला, जब नव्या अपने पिता से कहना चाहती है कि वह शादी नहीं करना चाहती, लेकिन उनकी भावनाओं को देखकर चुप रह जाती है। दूसरा, फिल्म के आखिर में खुशहाली का लंबा मोनोलॉग। उन्होंने उसे बिना रीटेक के एक ही बार में पूरा किया। ट्रायल शो में लोग पहले हंस रहे थे, लेकिन यह सीन आते ही माहौल भावुक हो गया। खुशहाली कुमार: सेट पर सबसे ज्यादा मजा तब आता था, जब सर खुद एक्टिंग करके सीन समझाते थे। उनका थिएटर बैकग्राउंड है, इसलिए वह हर सीन निभाकर दिखाते थे। कई बार हमें हंसी रोकना मुश्किल हो जाता था। सवाल: आजकल शादी को लेकर युवाओं की सोच बदल रही है। कई लोग शादी से बचना चाहते हैं। आप इसे कैसे देखते हैं? जवाब/आकाशादित्य लामा: कुछ घटनाओं की वजह से लोगों के मन में डर बढ़ा है, लेकिन रिश्ते भरोसे से चलते हैं। सोशल मीडिया के दौर में हर घटना तुरंत वायरल हो जाती है। हमें सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि सामने वाले ने क्या कहा, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों कहा। रिश्तों में विश्वास और धैर्य सबसे जरूरी हैं। परिवार के साथ ज्यादा समय बिताने की जरूरत है। खुशहाली कुमार: मैं भी मानती हूं कि शादी तभी करनी चाहिए, जब दोनों लोग उसके लिए तैयार हों। कई बार परिवार या समाज के दबाव में लोग शादी कर लेते हैं और बाद में परेशानियां शुरू हो जाती हैं। आज लड़कियां खुलकर अपनी बात कह रही हैं। अगर कोई पहले करियर बनाना चाहती है, तो उसके फैसले का सम्मान होना चाहिए। हर इंसान को वही करना चाहिए, जो वह सच में चाहता है। सवाल: खुशहाली, लोग आपको अक्सर टी-सीरीज और गुलशन कुमार के परिवार से जोड़कर देखते हैं। क्या आपको लगता है कि अब आपकी अलग पहचान भी बन चुकी है? जवाब/खुशहाली कुमार: मुझे गर्व है कि मैं गुलशन कुमार जी की बेटी हूं। मैं हमेशा चाहूंगी कि लोग मुझे उनके नाम से भी याद रखें। लेकिन जब मुझे मेहनत की वजह से काम मिलता है, तो वह खुशी अलग होती है। ‘धोखा’ के बाद यह फिल्म मुझे मेरी एक्टिंग देखकर मिली। उससे पहले मैं फैशन डिजाइनर थी। पेरिस और न्यूयॉर्क में शो किए, हॉलीवुड कलाकारों के लिए डिजाइनिंग की। वहां मुझे कोई परिवार की वजह से नहीं जानता था। वहां जो पहचान मिली, वह मेरी मेहनत की वजह से मिली। सवाल: इस फिल्म से जुड़ी सबसे खास याद क्या रहेगी? जवाब/खुशहाली कुमार: यह मेरे प्रोडक्शन हाउस के बाहर साइन की गई पहली फिल्म और पहली कॉमेडी भी है। पहला साइनिंग अमाउंट मिलने पर मैंने उसे भगवान गणेश के चरणों में रखा। यही पल मेरे लिए सबसे खास रहेगा। मेरी कोशिश रहती है कि कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। कई लड़कियों की पढ़ाई का खर्च मैं उठाती हूं। पहले अपनी फैक्ट्री के पास बच्चों को रोज खाना भी खिलाती थी। मुझे लगता है कि ये संस्कार मुझे पापा से