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400 साल पुराने मंदिर से निकली 'द वन' की कहानी:अरुणाभ बोले- कहानी लिखते समय जीभ कटी, फिर नॉन-वेज छोड़ने का फैसला किया

400 साल पुराने मंदिर से निकली 'द वन' की कहानी:अरुणाभ बोले- कहानी लिखते समय जीभ कटी, फिर नॉन-वेज छोड़ने का फैसला किया

टीवीएफ की चर्चित वेब सीरीज ‘पंचायत’ के निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा अब बड़े पर्दे पर ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ लेकर आ रहे हैं। फिल्म की कहानी भारतीय लोककथाओं, आस्था और संस्कृति से जुड़ी है। इसका आइडिया बिहार के करीब 400 साल पुराने वन देवी मंदिर की कहानी से आया। अरुणाभ कुमार ने एकता कपूर के साथ इसे प्रोड्यूस किया है और आनंदेश्वर द्विवेदी के साथ कहानी लिखी है। फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, मनीष पॉल और सुनील ग्रोवर नजर आएंगे। दैनिक भास्कर से बातचीत में अरुणाभ और दीपक ने फिल्म के आइडिया, 35-40 रातों तक चली शूटिंग, कलाकारों की मेहनत और कहानी से जुड़ा दिलचस्प किस्सा साझा किया। अरुणाभ ने बताया कि कहानी लिखते समय एक बार उनकी जीभ कट गई, जिसके बाद उन्होंने फिल्म पर काम करते हुए नॉन-वेज खाना छोड़ दिया। सवाल: सबसे पहले फिल्म के आइडिया के बारे में बताइए। क्या यह किसी लोककथा या सच्ची घटना से प्रेरित है? जवाब/अरुणाभ कुमार: इस कहानी के मूल स्रोत दो हैं। पहला श्रेय मैं एकता कपूर को देना चाहूंगा। हम अक्सर साथ में मंदिर जाते हैं। एक जनवरी को नए साल के मौके पर हम सिद्धिविनायक मंदिर जाते हैं। महाशिवरात्रि पर मुक्तेश्वर मंदिर भी गए हैं। इन यात्राओं के दौरान मंदिरों से जुड़ी कहानियों पर हमारी बातचीत होने लगी। एकता ने मुझे महालक्ष्मी मंदिर और मुक्तेश्वर मंदिर से जुड़ी कुछ अद्भुत कहानियां सुनाईं। इसके बाद मैंने उन्हें बताया कि बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में भी ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके पीछे बहुत दिलचस्प कहानियां हैं। तब हमें एहसास हुआ कि भारतीय संस्कृति में लगभग हर मंदिर के पीछे कोई न कोई अद्भुत कहानी है। सवाल : इस कहानी से आपका व्यक्तिगत जुड़ाव कैसे हुआ और फिल्म बनाने का फैसला कैसे हुआ? जवाब/अरुणाभ कुमार: दूसरा स्रोत मेरी मां हैं। वह मुझे दुर्गा पूजा के दौरान देवी और शक्ति के अलग-अलग मंदिरों में ले जाया करती थीं। हम वहां पूजा करते थे, साड़ी चढ़ाते थे और कई दिनों तक मंदिर जाते थे। इसी दौरान वह मुझे पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर बिहटा स्थित वन देवी मंदिर लेकर गई थीं। यह करीब 400 साल पुराना मंदिर है। मान्यता है कि 16वीं सदी में वैद्यनाथ मिश्रा नाम के व्यक्ति ने इसे स्थापित किया था। उस समय वहां के लोग जंगल से जुड़े रहस्यमय तत्वों से परेशान थे। उनसे बचने के लिए उन्होंने दुर्गा के दस रूपों की प्रार्थना की और उन्हीं में से एक रूप वन देवी के रूप में वहां स्थापित हुआ। मैं इस कहानी से बहुत प्रभावित हुआ। मैंने यह कहानी दीपक और फिर एकता को सुनाई। उन्हें भी यह कहानी बहुत पसंद आई। एकता ने कहा कि इतनी बड़ी और अद्भुत कहानी को बड़े पर्दे पर लाना चाहिए। उन्हें लगा कि यह कहानी बड़े कैनवास की मांग करती है। यहीं से फिल्म की शुरुआत हुई। सवाल: दीपक जी, जब आपने पहली बार यह कहानी सुनी तो आपकी क्या प्रतिक्रिया थी? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: मैं बहुत उत्साहित था। हिंदी सिनेमा में इस तरह की लोककथा बड़े पर्दे पर पहले नहीं दिखाई गई है। मुझे यह बात बहुत नई लगी। हालांकि कहानी लोककथा है, लेकिन इसकी कहानी आज के समाज से जुड़ी है। जब हम किसी ऐसे मंदिर में जाते हैं तो हमारे मन में कई सवाल आते हैं- क्या यह सच है? ऐसा क्यों हुआ? ऐसी मान्यताएं कैसे बनीं? यही जिज्ञासा मुझे इस कहानी की तरफ खींच लाई। सवाल: जब आप सेट पर पहुंचे तो आपके दिमाग में फिल्म की पहली तस्वीर क्या थी? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: हमने कहानी के उस हिस्से से शुरुआत की थी, जहां कहानी मुंबई से शुरू होती है। मेरी पहली कोशिश यही थी कि शुरुआत में यह कहानी बिल्कुल सामान्य इंसान की कहानी लगे। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़े, उसकी असली दुनिया धीरे-धीरे खुलती जाए और उसमें अलग-अलग आयाम जुड़ते जाएं। जब मैं मुंबई में शूट कर रहा था तो मेरे दिमाग में फिल्म की तस्वीर अलग थी। जब गांव और जंगल वाले हिस्से में पहुंचा तो वह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। हर लोकेशन और हर दिन अपने साथ एक नई चुनौती लेकर आया। हमारी कोशिश थी कि कहानी को उसकी जरूरत के मुताबिक पूरी तरह जस्टिस दिया जाए। सवाल: इस फिल्म से जुड़ा कोई ऐसा अनुभव रहा, जब आप लोग कहानी में पूरी तरह डूब गए? जवाब/अरुणाभ कुमार: हां, एक बहुत मजेदार किस्सा है। मैंने पहली बार गोवा में दीपक को यह कहानी सुनाई थी। कहानी लिखने के दौरान एक बार मैंने नॉन-वेज खाया और उसी समय मेरी जीभ कट गई। इसके बाद मैंने मन में तय कर लिया कि जब तक इस कहानी पर काम करूंगा, नॉन-वेज नहीं खाऊंगा। धीरे-धीरे बात इतनी आगे बढ़ गई कि मैं वेजिटेरियन ही बन गया। सुनने में यह बात आपको अजीब लग सकती है, लेकिन जब आप किसी कहानी में पूरी तरह डूब जाते हैं तो ऐसी चीजें होने लगती हैं। कई बार ऐसा होता है कि लव स्टोरी लिखते समय आपको अपना पुराना प्यार याद आने लगता है। माता-पिता पर कहानी लिखते हैं तो अपने पेरेंट्स की याद आती है। इसी तरह हम भी इस कहानी में धीरे-धीरे पूरी तरह घुसते चले गए। सवाल: दीपक जी, इस फिल्म की शूटिंग के दौरान आपके साथ ऐसा क्या हुआ जो हमेशा याद रहेगा? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: हमने करीब 35-40 रातों तक लगातार शूटिंग की। पूरी टीम ऐसी हो गई थी कि शूट खत्म होने के बाद भी रात में नींद आना मुश्किल हो गया था। इस कहानी में रात अपने आप में एक कैरेक्टर है। हमने रात में लगातार एक्शन और एक्टिंग सीन्स शूट किए। सुबह 6 बजे तक शूटिंग के बाद भी कलाकार पूरी ऊर्जा के साथ काम करते थे। सबसे अच्छी बात यह थी कि पूरी टीम कहानी में इतनी डूब गई थी कि किसी को महसूस ही नहीं होता था कि हम इतनी रातों से लगातार जाग रहे हैं। सवाल: कलाकारों ने फिल्म के लिए कितनी मेहनत की? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: : सभी कलाकारों ने बहुत मेहनत की। सिद्धार्थ और तमन्ना अपने सीन्स को लेकर काफी सीरियस थे। वे बार-बार पूछते थे कि इसे और बेहतर कैसे किया जा सकता है। कल्चरल ऑथेंटिसिटी को लेकर भी वे बहुत सजग थे। तमन्ना कई बार कहती थीं कि अगर कहानी की दुनिया इतनी ऑथेंटिक है तो उसे उसी तरह दिखाना चाहिए। सिद्धार्थ ने एक्शन पर भी काफी मेहनत की है। मनीष पॉल और सुनील ग्रोवर के किरदार भी दर्शकों के लिए अलग अनुभव होंगे। सवाल: सिद्धार्थ और तमन्ना की कास्टिंग कैसे हुई? जवाब/अरुणाभ कुमार: हमें ऐसा अभिनेता चाहिए था जो शुरुआत में शहर का लगे और बाद में गांव की दुनिया में फिट हो जाए। सिद्धार्थ की पर्सनैलिटी हमें इसके लिए सही लगी। हम करीब एक घंटे के लिए मिलने वाले थे, लेकिन तीन-चार घंटे तक कहानी और किरदार को लेकर बातचीत होती रही। उन्हें कहानी काफी रिलेटेबल लगी। दीपक ने उनके साथ जिस तरह काम किया है, मुझे लगता है कि यह सिद्धार्थ की बेहतरीन परफॉर्मेंस में से एक होगी। तमन्ना ने भी इस तरह का किरदार पहले नहीं निभाया है। हमें उम्मीद है कि दोनों की जोड़ी दर्शकों को पसंद आएगी। सवाल: टीवीएफ की पहली थिएट्रिकल फिल्म होने का अनुभव कैसा रहा? जवाब/अरुणाभ कुमार: यह फिल्म हमने किसी प्लान के तहत शुरू नहीं की थी। पहले कहानियां सुनाते-सुनाते यह आइडिया आया। एकता को कहानी पसंद आई, फिर हमने इसे लिखना शुरू किया और धीरे-धीरे फिल्म बनती चली गई। टीवीएफ की कहानियों में जो रिलेटेबलनेस है, वह इस फिल्म में भी रहेगी। साथ ही दर्शकों को बड़े पर्दे का सिनेमैटिक अनुभव मिलेगा। छठ पर्व, लोककथाएं, जंगल और एनीमेशन जैसे कई तत्व फिल्म को अलग बनाते हैं। सवाल: आपकी कौन-सी वेब सीरीज है, जिस पर आपको लगता है कि बेहतर फिल्म बनाई जा सकती है? जवाब/अरुणाभ कुमार: मुझे लगता है कि ‘ट्रिपलिंग’ पर फिल्म बन सकती है। ‘सपने वर्सेस एवरीवन’ पर भी फिल्म बनाई जा सकती है। ‘पंचायत’ पर भी अगर फिल्म बनानी हो तो बनाई जा सकती है। बनाने को तो हमारी कई कहानियों पर फिल्म बन सकती है, लेकिन आपने पूछा तो फिलहाल ये दो नाम मेरे दिमाग में आए। सवाल: ‘पंचायत’ के सीजन 5 को लेकर कोई अपडेट देना चाहेंगे? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: सीजन 5 आने वाला है। मैं भी उसका इंतजार कर रहा हूं। मैं भी उसे देखने के लिए उत्साहित हूं।

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जवाब/अरुणाभ कुमार: दूसरा स्रोत मेरी मां हैं। वह मुझे दुर्गा पूजा के दौरान देवी और शक्ति के अलग-अलग मंदिरों में ले जाया करती थीं। हम वहां पूजा करते थे, साड़ी चढ़ाते थे और कई दिनों तक मंदिर जाते थे। इसी दौरान वह मुझे पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर बिहटा स्थित वन देवी मंदिर लेकर गई थीं। यह करीब 400 साल पुराना मंदिर है। मान्यता है कि 16वीं सदी में वैद्यनाथ मिश्रा नाम के व्यक्ति ने इसे स्थापित किया था। उस समय वहां के लोग जंगल से जुड़े रहस्यमय तत्वों से परेशान थे। उनसे बचने के लिए उन्होंने दुर्गा के दस रूपों की प्रार्थना की और उन्हीं में से एक रूप वन देवी के रूप में वहां स्थापित हुआ। मैं इस कहानी से बहुत प्रभावित हुआ। मैंने यह कहानी दीपक और फिर एकता को सुनाई। उन्हें भी यह कहानी बहुत पसंद आई। एकता ने कहा कि इतनी बड़ी और अद्भुत कहानी को बड़े पर्दे पर लाना चाहिए। उन्हें लगा कि यह कहानी बड़े कैनवास की मांग करती है। यहीं से फिल्म की शुरुआत हुई। सवाल: दीपक जी, जब आपने पहली बार यह कहानी सुनी तो आपकी क्या प्रतिक्रिया थी? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: मैं बहुत उत्साहित था। हिंदी सिनेमा में इस तरह की लोककथा बड़े पर्दे पर पहले नहीं दिखाई गई है। मुझे यह बात बहुत नई लगी। हालांकि कहानी लोककथा है, लेकिन इसकी कहानी आज के समाज से जुड़ी है। जब हम किसी ऐसे मंदिर में जाते हैं तो हमारे मन में कई सवाल आते हैं- क्या यह सच है? ऐसा क्यों हुआ? ऐसी मान्यताएं कैसे बनीं? यही जिज्ञासा मुझे इस कहानी की तरफ खींच लाई। सवाल: जब आप सेट पर पहुंचे तो आपके दिमाग में फिल्म की पहली तस्वीर क्या थी? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: हमने कहानी के उस हिस्से से शुरुआत की थी, जहां कहानी मुंबई से शुरू होती है। मेरी पहली कोशिश यही थी कि शुरुआत में यह कहानी बिल्कुल सामान्य इंसान की कहानी लगे। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़े, उसकी असली दुनिया धीरे-धीरे खुलती जाए और उसमें अलग-अलग आयाम जुड़ते जाएं। जब मैं मुंबई में शूट कर रहा था तो मेरे दिमाग में फिल्म की तस्वीर अलग थी। जब गांव और जंगल वाले हिस्से में पहुंचा तो वह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। हर लोकेशन और हर दिन अपने साथ एक नई चुनौती लेकर आया। हमारी कोशिश थी कि कहानी को उसकी जरूरत के मुताबिक पूरी तरह जस्टिस दिया जाए। सवाल: इस फिल्म से जुड़ा कोई ऐसा अनुभव रहा, जब आप लोग कहानी में पूरी तरह डूब गए? जवाब/अरुणाभ कुमार: हां, एक बहुत मजेदार किस्सा है। मैंने पहली बार गोवा में दीपक को यह कहानी सुनाई थी। कहानी लिखने के दौरान एक बार मैंने नॉन-वेज खाया और उसी समय मेरी जीभ कट गई। इसके बाद मैंने मन में तय कर लिया कि जब तक इस कहानी पर काम करूंगा, नॉन-वेज नहीं खाऊंगा। धीरे-धीरे बात इतनी आगे बढ़ गई कि मैं वेजिटेरियन ही बन गया। सुनने में यह बात आपको अजीब लग सकती है, लेकिन जब आप किसी कहानी में पूरी तरह डूब जाते हैं तो ऐसी चीजें होने लगती हैं। कई बार ऐसा होता है कि लव स्टोरी लिखते समय आपको अपना पुराना प्यार याद आने लगता है। माता-पिता पर कहानी लिखते हैं तो अपने पेरेंट्स की याद आती है। इसी तरह हम भी इस कहानी में धीरे-धीरे पूरी तरह घुसते चले गए। सवाल: दीपक जी, इस फिल्म की शूटिंग के दौरान आपके साथ ऐसा क्या हुआ जो हमेशा याद रहेगा? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: हमने करीब 35-40 रातों तक लगातार शूटिंग की। पूरी टीम ऐसी हो गई थी कि शूट खत्म होने के बाद भी रात में नींद आना मुश्किल हो गया था। इस कहानी में रात अपने आप में एक कैरेक्टर है। हमने रात में लगातार एक्शन और एक्टिंग सीन्स शूट किए। सुबह 6 बजे तक शूटिंग के बाद भी कलाकार पूरी ऊर्जा के साथ काम करते थे। सबसे अच्छी बात यह थी कि पूरी टीम कहानी में इतनी डूब गई थी कि किसी को महसूस ही नहीं होता था कि हम इतनी रातों से लगातार जाग रहे हैं। सवाल: कलाकारों ने फिल्म के लिए कितनी मेहनत की? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: : सभी कलाकारों ने बहुत मेहनत की। सिद्धार्थ और तमन्ना अपने सीन्स को लेकर काफी सीरियस थे। वे बार-बार पूछते थे कि इसे और बेहतर कैसे किया जा सकता है। कल्चरल ऑथेंटिसिटी को लेकर भी वे बहुत सजग थे। तमन्ना कई बार कहती थीं कि अगर कहानी की दुनिया इतनी ऑथेंटिक है तो उसे उसी तरह दिखाना चाहिए। सिद्धार्थ ने एक्शन पर भी काफी मेहनत की है। मनीष पॉल और सुनील ग्रोवर के किरदार भी दर्शकों के लिए अलग अनुभव होंगे। सवाल: सिद्धार्थ और तमन्ना की कास्टिंग कैसे हुई? जवाब/अरुणाभ कुमार: हमें ऐसा अभिनेता चाहिए था जो शुरुआत में शहर का लगे और बाद में गांव की दुनिया में फिट हो जाए। सिद्धार्थ की पर्सनैलिटी हमें इसके लिए सही लगी। हम करीब एक घंटे के लिए मिलने वाले थे, लेकिन तीन-चार घंटे तक कहानी और किरदार को लेकर बातचीत होती रही। उन्हें कहानी काफी रिलेटेबल लगी। दीपक ने उनके साथ जिस तरह काम किया है, मुझे लगता है कि यह सिद्धार्थ की बेहतरीन परफॉर्मेंस में से एक होगी। तमन्ना ने भी इस तरह का किरदार पहले नहीं निभाया है। हमें उम्मीद है कि दोनों की जोड़ी दर्शकों को पसंद आएगी। सवाल: टीवीएफ की पहली थिएट्रिकल फिल्म होने का अनुभव कैसा रहा? जवाब/अरुणाभ कुमार: यह फिल्म हमने किसी प्लान के तहत शुरू नहीं की थी। पहले कहानियां सुनाते-सुनाते यह आइडिया आया। एकता को कहानी पसंद आई, फिर हमने इसे लिखना शुरू किया और धीरे-धीरे फिल्म बनती चली गई। टीवीएफ की कहानियों में जो रिलेटेबलनेस है, वह इस फिल्म में भी रहेगी। साथ ही दर्शकों को बड़े पर्दे का सिनेमैटिक अनुभव मिलेगा। छठ पर्व, लोककथाएं, जंगल और एनीमेशन जैसे कई तत्व फिल्म को अलग बनाते हैं। सवाल: आपकी कौन-सी वेब सीरीज है, जिस पर आपको लगता है कि बेहतर फिल्म बनाई जा सकती है? जवाब/अरुणाभ कुमार: मुझे लगता है कि ‘ट्रिपलिंग’ पर फिल्म बन सकती है। ‘सपने वर्सेस एवरीवन’ पर भी फिल्म बनाई जा सकती है। ‘पंचायत’ पर भी अगर फिल्म बनानी हो तो बनाई जा सकती है। बनाने को तो हमारी कई कहानियों पर फिल्म बन सकती है, लेकिन आपने पूछा तो फिलहाल ये दो नाम मेरे दिमाग में आए। सवाल: ‘पंचायत’ के सीजन 5 को लेकर कोई अपडेट देना चाहेंगे? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: सीजन 5 आने वाला है। मैं भी उसका इंतजार कर रहा हूं। मैं भी उसे देखने के लिए उत्साहित हूं।

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