FSSAI Ban Energy Drink Claims

नई दिल्ली15 मिनट पहले कॉपी लिंक अगर आप थकान मिटाने या तुरंत रिफ्रेश होने के लिए एनर्जी ड्रिंक के नाम पर रेडबुल, स्टिंग और मोंस्टर जैसे ड्रिंक्स पीते हैं, तो ये कंपनियों का भ्रामक दावा है। भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने इन कंपनियों को अपने प्रॉडक्ट्स से यह नाम और इससे जुड़े दावों को हटाने का आदेश दिया है। FSSAI ने कहा है कि ये ड्रिंक्स पीने से “शरीर और दिमाग तरोताजा हो जाता है” या “तुरंत ताकत मिलती है”, जैसे दावे लोगों को गुमराह करने वाले हैं। भारत में ऐसी ड्रिंक्स के लिए कोई मानक तय ही नहीं हैं। इंडस्ट्री के विरोध और कारोबार पर असर होने की दलीलों को खारिज करते हुए FSSAI ने कंपनियों को लेबल में बदलाव करने के लिए 90 दिन का समय दिया है। नियामक ने हाल ही में कंपनियों को नोटिस दिया था। एनर्जी ड्रिंक शब्द का इस्तेमाल करने पर बैन नियामक ने स्टिंग के लिए पेप्सी, रेड बुल, मोंस्टर बेवरेज, कैम्पा एनर्जी के लिए रिलायंस और हेल एनर्जी जैसी बड़ी कंपनियों को ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने का निर्देश दिया है। FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रजीत पुन्हानी ने शुक्रवार को हुई मीटिंग में कंपनियों के नुकसान के तर्कों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि कंपनियां चाहें तो फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं। कंपनियों को ब्रांड इमेज और सेल्स पर असर पड़ने का डर पेप्सी का ‘स्टिंग’ विज्ञापन में शरीर में बिजली जैसी ऊर्जा दौड़ने का दावा करता है, वहीं रेड बुल का “गिव्स यू विंग्स” स्लोगन दुनियाभर में प्रसिद्ध है। कंपनियां डर रही हैं कि ‘एनर्जी’ कैटेगरी का लेबल हटने से उनकी वर्षों पुरानी ब्रांड इमेज और बिक्री पर बुरा असर पड़ेगा। इंडियन बेवरेज एसोसिएशन ने FSSAI को पत्र लिखकर कहा है कि इस तरह के नोटिस सार्वजनिक करने से ब्रांड्स की इमेज को नुकसान होता है और लोगों में भ्रम फैलता है। एसोसिएशन ने पहले से चर्चा करके और चरणबद्ध तरीके से नियम लागू करने की मांग की है। कार्रवाई: राजस्थान में जब्ती और ई-कॉमर्स पर सख्ती 1. भारत में ‘एनर्जी ड्रिंक्स’ का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और 2028 तक इसके लगभग ₹13,300 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। 2018 से 2023 के बीच इसकी बिक्री में सालाना 100% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2. राजस्थान सरकार ने स्टिंग, कैम्पा एनर्जी और रेड बुल की हजारों बोतलें जब्त की हैं। इसके अलावा अमेजन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकिट और स्विगी इन्स्टामार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों को इन ड्रिंक्स को ‘एनर्जी ड्रिंक’ के रूप में प्रमोट न करने को कहा है। खतरा: कैफीन और टॉरिन की मात्रा अधिक होने से नुकसानदायक इन ड्रिंक्स में कैफीन, शुगर और एमिनो एसिड ‘टॉरिन’ की मात्रा काफी अधिक होती है, जिसे लेकर दुनियाभर में रेगुलेटर्स चिंतित हैं। इंग्लैंड में अगले साल अप्रैल से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए हाई-कैफीन ड्रिंक्स पर बैन लगने जा रहा है, जबकि पाकिस्तान के कुछ इलाकों में इन्हें ‘स्टिमुलेंट ड्रिंक्स’ (उत्तेजक पेय) लिखना अनिवार्य किया गया है। आगे क्या: 90 दिन में पैकेजिंग बदलना अनिवार्य FSSAI और कंपनियों के बीच हुई चर्चा के बाद इंडस्ट्री बदलावों को लागू करने पर सहमत हो गई है। अब कंपनियों के पास अपनी पैकेजिंग, डिब्बों और बोतलों से ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द और उससे जुड़े दावों को हटाने के लिए 90 दिनों की समय-सीमा है। निर्धारित समय के बाद नए लेबल के साथ ही प्रॉडक्ट्स बाजार में बेचे जा सकेंगे। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
FSSAI Ban Energy Drink Claims

नई दिल्ली47 मिनट पहले कॉपी लिंक अगर आप थकान मिटाने या तुरंत रिफ्रेश होने के लिए एनर्जी ड्रिंक के नाम पर रेडबुल, स्टिंग और मोंस्टर जैसे ड्रिंक्स पीते हैं, तो ये कंपनियों का भ्रामक दावा है। भारत के खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने इन कंपनियों को अपने प्रॉडक्ट्स से यह नाम और इससे जुड़े दावों को हटाने का आदेश दिया है। FSSAI ने कहा है कि ये ड्रिंक्स पीने से “शरीर और दिमाग तरोताजा हो जाता है” या “तुरंत ताकत मिलती है”, जैसे दावे लोगों को गुमराह करने वाले हैं। भारत में ऐसी ड्रिंक्स के लिए कोई मानक तय ही नहीं हैं। इंडस्ट्री के विरोध और कारोबार पर असर होने की दलीलों को खारिज करते हुए FSSAI ने कंपनियों को लेबल में बदलाव करने के लिए 90 दिन का समय दिया है। नियामक ने हाल ही में कंपनियों को नोटिस दिया था। एनर्जी ड्रिंक शब्द का इस्तेमाल करने पर बैन नियामक ने स्टिंग के लिए पेप्सी, रेड बुल, मोंस्टर बेवरेज, कैम्पा एनर्जी के लिए रिलायंस और हेल एनर्जी जैसी बड़ी कंपनियों को ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करने का निर्देश दिया है। FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रजीत पुन्हानी ने शुक्रवार को हुई मीटिंग में कंपनियों के नुकसान के तर्कों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि कंपनियां चाहें तो फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं। कंपनियों को ब्रांड इमेज और सेल्स पर असर पड़ने का डर पेप्सी का ‘स्टिंग’ विज्ञापन में शरीर में बिजली जैसी ऊर्जा दौड़ने का दावा करता है, वहीं रेड बुल का “गिव्स यू विंग्स” स्लोगन दुनियाभर में प्रसिद्ध है। कंपनियां डर रही हैं कि ‘एनर्जी’ कैटेगरी का लेबल हटने से उनकी वर्षों पुरानी ब्रांड इमेज और बिक्री पर बुरा असर पड़ेगा। इंडियन बेवरेज एसोसिएशन ने FSSAI को पत्र लिखकर कहा है कि इस तरह के नोटिस सार्वजनिक करने से ब्रांड्स की इमेज को नुकसान होता है और लोगों में भ्रम फैलता है। एसोसिएशन ने पहले से चर्चा करके और चरणबद्ध तरीके से नियम लागू करने की मांग की है। कार्रवाई: राजस्थान में जब्ती और ई-कॉमर्स पर सख्ती 1. भारत में ‘एनर्जी ड्रिंक्स’ का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और 2028 तक इसके लगभग ₹13,300 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। 2018 से 2023 के बीच इसकी बिक्री में सालाना 100% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2. राजस्थान सरकार ने स्टिंग, कैम्पा एनर्जी और रेड बुल की हजारों बोतलें जब्त की हैं। इसके अलावा अमेजन, फ्लिपकार्ट, ब्लिंकिट और स्विगी इन्स्टामार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों को इन ड्रिंक्स को ‘एनर्जी ड्रिंक’ के रूप में प्रमोट न करने को कहा है। खतरा: कैफीन और टॉरिन की मात्रा अधिक होने से नुकसानदायक इन ड्रिंक्स में कैफीन, शुगर और एमिनो एसिड ‘टॉरिन’ की मात्रा काफी अधिक होती है, जिसे लेकर दुनियाभर में रेगुलेटर्स चिंतित हैं। इंग्लैंड में अगले साल अप्रैल से 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए हाई-कैफीन ड्रिंक्स पर बैन लगने जा रहा है, जबकि पाकिस्तान के कुछ इलाकों में इन्हें ‘स्टिमुलेंट ड्रिंक्स’ (उत्तेजक पेय) लिखना अनिवार्य किया गया है। आगे क्या: 90 दिन में पैकेजिंग बदलना अनिवार्य FSSAI और कंपनियों के बीच हुई चर्चा के बाद इंडस्ट्री बदलावों को लागू करने पर सहमत हो गई है। अब कंपनियों के पास अपनी पैकेजिंग, डिब्बों और बोतलों से ‘एनर्जी ड्रिंक’ शब्द और उससे जुड़े दावों को हटाने के लिए 90 दिनों की समय-सीमा है। निर्धारित समय के बाद नए लेबल के साथ ही प्रॉडक्ट्स बाजार में बेचे जा सकेंगे। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
₹10 और ₹20 के 200 करोड़ प्लास्टिक नोट आएंगे:ये ट्रायल, सफल हुआ तो आगे और नोट आएंगे; कागज करेंसी भी चलेगी

बाजार में जल्द ही ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोट नजर आएंगे। रिजर्व बैंक 100-100 करोड़ यानी टोटल 200 करोड़ पॉलिमर यानी प्लास्टिक से बने नोट छापेगी। यह प्लास्टिक करेंसी का ट्रायल है, अगर यह सफल होता है तो आगे और नोट भी छापे जाएंगे। केंद्र सरकार ने इसकी मंजूरी दे दी है। यह जानकारी वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने सोमवार को लोकसभा में दी। पॉलिमर बैंकनोट के ट्रायल सफल होने के बाद RBI ₹10 और ₹20 दोनों वैल्यू के नोटों को रेगुलर तौर पर जारी करेगा। हालांकि कागज की मौजूदा करेंसी भी चलती रहेगी। इसे बंद नहीं किया जाएगा। 10 दिन पहले मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि RBI जल्द ही देश में पॉलीमर से बने नोटों का पहला पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। यह देश में नए जनरेशन की करेंसी लाने के RBI के प्लान का अगला कदम है। नए नोट के साथ पुराने कागजी नोट भी चलेंगे भारतीय बाजार में पॉलीमर नोटों के आने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मौजूदा कागजी नोट तुरंत चलन से बाहर हो जाएंगे। सरकार ने साफ किया है कि नई करेंसी पुराने पेपर नोटों की जगह नहीं लेगी। RBI ने जारी किया ग्लोबल टेंडर RBI की नोट-प्रिंटिंग यूनिट ने ग्लोबल लेवल पर ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EOI) जारी किया। यह टेंडर विशेष प्रकार की ‘पॉलीमर सबस्ट्रेट शीट’ की मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई के लिए मंगाया गया है, जिसका इस्तेमाल इन नोटों को छापने के लिए किया जाता है। डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, दुनिया भर के मैन्युफैक्चरर को एडवांस सेफ्टी फीचर्स से लैस पॉलीमर सबस्ट्रेट की सप्लाई के लिए इनवाइट किया गया है। इस टेंडर के तहत बोलियां जमा करने की आखिरी तारीख 18 अगस्त तय की गई है। नोटों की उम्र बढ़ाने और बढ़ती मांग के लिए कदम मई में आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि आरबीआई नोटों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने और पिछले कुछ सालों में बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए पॉलिमर बैंकनोट्स छापने पर विचार कर रहा था। इसके बाद जून में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पुष्टि की थी कि पॉलिमर बैंकनोट्स का प्रस्ताव विचाराधीन है और केंद्रीय बैंक इसके नफा-नुकसान का वैल्यूएशन कर रहा है। दुनिया के 60 देशों में पहले से चल रहे पॉलीमर नोटा दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में पॉलिमर बैंकनोट्स चलन में शामिल किए जा चुके हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (यूके) और न्यूजीलैंड जैसे देश शामिल हैं। भारत ने पहली बार नोटों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए 2012 में पॉलिमर बैंकनोट्स लाने का प्रयास किया था। हालांकि, उस समय तकनीकी चुनौतियों के कारण इस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया था। नए नोट फटेंगे नहीं, पानी-धूल से भी सुरक्षित रहेंगे पॉलीमर से बने बैंकनोट ट्रेडिशनल कागजी नोटों की तुलना में बहुत ज्यादा टिकाऊ होते हैं। यह नोट पानी, गंदगी और धूल में भी सुरक्षित रहते हैं। इसके अलावा यह नोट आसानी से फटते भी नहीं हैं। इस वजह से ये बाजार में लंबे समय तक बिना फटे और साफ-सुथरे बने रहते हैं। पॉलीमर शीट का सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि इसमें एडवांस सेफ्टी फीचर्स को आसानी से जोड़ा जा सकता है। इससे नकली नोट बनाने वाले जालसाजों के लिए इनकी नकल करना लगभग नामुमकिन हो जाता है, जिससे देश का सेफ्टी सिस्टम और मजबूत होगा। 2024-25 में छपाई पर ₹6,372.8 करोड़ खर्च हुए RBI की वित्त वर्ष 2024-25 की एनुअल रिपोर्ट के अनुसार, कागजी नोटों की छपाई पर ₹6,372.8 करोड़ का खर्च आया। पिछले वित्त वर्ष (FY24) में यह खर्च ₹5,101.4 करोड़ था। छपाई के खर्च में बढ़ोतरी के कारण इस खर्च में इजाफा दर्ज किया गया है। क्या होते हैं पॉलीमर बैंकनोट्स? ये नोट कागज के बजाय एक खास किस्म के प्लास्टिक मटेरियल यानी पॉलीमर सबस्ट्रेट पर छापे जाते हैं। ये छूने में तो सामान्य नोटों जैसे ही हल्के होते हैं, लेकिन पानी में भीगने पर भी नहीं गलते और लंबे समय तक चलते हैं। क्या होता है एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट? यह एक तरह का ग्लोबल टेंडर डॉक्यूमेंट होता है, जिसके जरिए रिजर्व बैंक दुनिया भर की अनुभवी और योग्य कंपनियों को प्रोजेक्ट के लिए अपनी क्षमता, तकनीक और कीमतों के साथ प्रस्ताव भेजने का न्योता देता है।
देश में जल्द चलेंगे ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक-नोट:ट्रायल के लिए 200 करोड़ नोट छपेंगे; कागज के नोट भी चलेंगे

बाजार में जल्द ही ₹10 और ₹20 के प्लास्टिक नोट नजर आएंगे। रिजर्व बैंक 100-100 करोड़ यानी टोटल 200 करोड़ पॉलिमर यानी प्लास्टिक से बने नोट छापेगी। यह प्लास्टिक करेंसी का ट्रायल है, अगर यह सफल होता है तो आगे और नोट भी छापे जाएंगे। केंद्र सरकार ने इसकी मंजूरी दे दी है। यह जानकारी वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने सोमवार को लोकसभा में दी। पॉलिमर बैंकनोट के ट्रायल सफल होने के बाद RBI ₹10 और ₹20 दोनों वैल्यू के नोटों को रेगुलर तौर पर जारी करेगा। हालांकि कागज की मौजूदा करेंसी भी चलती रहेगी। इसे बंद नहीं किया जाएगा। 10 दिन पहले मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि RBI जल्द ही देश में पॉलीमर से बने नोटों का पहला पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने जा रहा है। यह देश में नए जनरेशन की करेंसी लाने के RBI के प्लान का अगला कदम है। नए नोट के साथ पुराने कागजी नोट भी चलेंगे भारतीय बाजार में पॉलीमर नोटों के आने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मौजूदा कागजी नोट तुरंत चलन से बाहर हो जाएंगे। सरकार ने साफ किया है कि नई करेंसी पुराने पेपर नोटों की जगह नहीं लेगी। RBI ने जारी किया ग्लोबल टेंडर RBI की नोट-प्रिंटिंग यूनिट ने ग्लोबल लेवल पर ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EOI) जारी किया। यह टेंडर विशेष प्रकार की ‘पॉलीमर सबस्ट्रेट शीट’ की मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई के लिए मंगाया गया है, जिसका इस्तेमाल इन नोटों को छापने के लिए किया जाता है। डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, दुनिया भर के मैन्युफैक्चरर को एडवांस सेफ्टी फीचर्स से लैस पॉलीमर सबस्ट्रेट की सप्लाई के लिए इनवाइट किया गया है। इस टेंडर के तहत बोलियां जमा करने की आखिरी तारीख 18 अगस्त तय की गई है। नोटों की उम्र बढ़ाने और बढ़ती मांग के लिए कदम मई में आई एक रिपोर्ट में बताया गया था कि आरबीआई नोटों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने और पिछले कुछ सालों में बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए पॉलिमर बैंकनोट्स छापने पर विचार कर रहा था। इसके बाद जून में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पुष्टि की थी कि पॉलिमर बैंकनोट्स का प्रस्ताव विचाराधीन है और केंद्रीय बैंक इसके नफा-नुकसान का वैल्यूएशन कर रहा है। दुनिया के 60 देशों में पहले से चल रहे पॉलीमर नोट दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में पॉलिमर बैंकनोट्स चलन में शामिल किए जा चुके हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (यूके) और न्यूजीलैंड जैसे देश शामिल हैं। भारत ने पहली बार नोटों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए 2012 में पॉलिमर बैंकनोट्स लाने का प्रयास किया था। हालांकि, उस समय तकनीकी चुनौतियों के कारण इस प्रोजेक्ट को रोक दिया गया था। नए नोट फटेंगे नहीं, पानी-धूल से भी सुरक्षित रहेंगे पॉलीमर से बने बैंकनोट ट्रेडिशनल कागजी नोटों की तुलना में बहुत ज्यादा टिकाऊ होते हैं। यह नोट पानी, गंदगी और धूल में भी सुरक्षित रहते हैं। इसके अलावा यह नोट आसानी से फटते भी नहीं हैं। इस वजह से ये बाजार में लंबे समय तक बिना फटे और साफ-सुथरे बने रहते हैं। पॉलीमर शीट का सबसे बड़ा फायदा यह भी है कि इसमें एडवांस सेफ्टी फीचर्स को आसानी से जोड़ा जा सकता है। इससे नकली नोट बनाने वाले जालसाजों के लिए इनकी नकल करना लगभग नामुमकिन हो जाता है, जिससे देश का सेफ्टी सिस्टम और मजबूत होगा। 2024-25 में छपाई पर ₹6,372.8 करोड़ खर्च हुए RBI की वित्त वर्ष 2024-25 की एनुअल रिपोर्ट के अनुसार, कागजी नोटों की छपाई पर ₹6,372.8 करोड़ का खर्च आया। पिछले वित्त वर्ष (FY24) में यह खर्च ₹5,101.4 करोड़ था। छपाई के खर्च में बढ़ोतरी के कारण इस खर्च में इजाफा दर्ज किया गया है। क्या होते हैं पॉलीमर बैंकनोट्स? ये नोट कागज के बजाय एक खास किस्म के प्लास्टिक मटेरियल यानी पॉलीमर सबस्ट्रेट पर छापे जाते हैं। ये छूने में तो सामान्य नोटों जैसे ही हल्के होते हैं, लेकिन पानी में भीगने पर भी नहीं गलते और लंबे समय तक चलते हैं। क्या होता है एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट? यह एक तरह का ग्लोबल टेंडर डॉक्यूमेंट होता है, जिसके जरिए रिजर्व बैंक दुनिया भर की अनुभवी और योग्य कंपनियों को प्रोजेक्ट के लिए अपनी क्षमता, तकनीक और कीमतों के साथ प्रस्ताव भेजने का न्योता देता है।
मिडिल ईस्ट में शुरू हो सकती है एक नई जंग:सऊदी अरब का यमन की राजधानी सना पर हमला, हूती ने शुरू की समुद्री नाकेबंदी

28 फरवरी को जब अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू हुई थी, तभी माना जा रहा था कि इसमें ईरान के सहयोगी हूती विद्रोही भी कूद सकते हैं। करीब पांच महीने बाद वही आशंका सच साबित होती दिख रही है। पिछले एक हफ्ते में हूतियों ने सऊदी अरब और रेड सी में जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन से कई हमले किए हैं। जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने भी हूती ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। यानी करीब चार साल से किसी तरह टला हुआ यमन का युद्ध फिर भड़कने की कगार पर है। हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया है, जबकि दोनों तरफ से हमले लगातार बढ़ रहे हैं। इससे मिडिल ईस्ट में एक नई जंग शुरू होने का खतरा बढ़ गया है। हूती और सऊदी के बीच विवाद की शुरुआत हूती और सऊदी के बीच ताजा विवाद 13 जुलाई को शुरू हुआ। दरअसल, कुछ हूती नेता अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद ईरान से यमन लौट रहे थे। लेकिन यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने इस प्लेन को सना एयरपोर्ट पर उतरने ही नहीं दिया। यमन सरकार का कहना था कि हूती अधिकारी यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही वापस लौटें। उन्हें ईरान की एयरलाइन में आने नहीं दिया जाएगा। वहीं हूती ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे। इसके बाद सरकार समर्थित फोर्स ने सना एयरपोर्ट के रनवे को बम से उड़ा दिया, ताकि ईरानी विमान वहां उतर न सके। नतीजतन, हूती नेताओं वाला प्लेन सना एयरपोर्ट पर उतर ही नहीं सका। प्लेन ने अपना रास्ता बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट पर लैंडिंग की, जो हूतियों के कंट्रोल में है। इस घटना के बाद हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया। शुरुआत में ईरान जंग से दूर रहे हूती विद्रोही फरवरी में जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब हूती सीधे इस लड़ाई में शामिल होने से बचते दिखे। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर टूटने के बाद उनका रुख बदल गया। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान ने हूतियों पर जंग में शामिल होने का दबाव बनाया। हालांकि उनका कहना है कि इससे सिर्फ ईरान को ही नहीं, बल्कि हूतियों को भी फायदा है। वे इस मौके का इस्तेमाल यमन में अपनी राजनीतिक ताकत और पकड़ और मजबूत करने के लिए करना चाहते हैं। 4 साल से यमन-सऊदी के बीच जंग रूकी थी यमन में 2022 हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच हुए युद्धविराम के बाद लड़ाई लगभग रुक गई थी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि दोनों पक्षों के बीच विवाद खत्म हो गया था। हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच स्थायी शांति समझौते पर बातचीत आगे नहीं बढ़ सकी। इससे तनाव बना रहा, लेकिन दोनों पक्ष दोबारा बड़े युद्ध से बचना चाहते थे। खासकर सऊदी अरब, क्योंकि कई साल के युद्ध में उसे भारी आर्थिक और सैन्य नुकसान उठाना पड़ा था। हालात तब बदले, जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध छिड़ गया। ईरान हूती विद्रोहियों का सबसे बड़ा समर्थक माना जाता है। इस वजह से पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया और इसका असर यमन पर भी पड़ा। पिछले कुछ हफ्तों में हूती और सऊदी अरब के बीच फिर टकराव बढ़ने लगा है और एक बार फिर से जंग का खतरा बढ़ गया है। हूती से जंग नहीं चाहता सऊदी अरब सऊदी अरब इस समय हूतियों के साथ दोबारा युद्ध नहीं चाहता। इसकी वजह पिछला युद्ध है, जो करीब एक दशक तक चला। इस लड़ाई में सऊदी अरब ने भारी पैसा खर्च किया, लेकिन उसे कोई बड़ा फायदा नहीं मिला। उल्टा उसकी छवि खराब हुई और युद्ध, भूख व बीमारियों की वजह से लाखों यमनियों की जान चली गई। दूसरी ओर, हूतियों को लगता है कि अगर वे सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाते हैं तो उन्हें फायदा हो सकता है। अधिकारियों के मुताबिक, वे यमन के तेल से होने वाली कमाई में ज्यादा हिस्सा और देश में ज्यादा राजनीतिक ताकत चाहते हैं। यमन मामलों के विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी कहते हैं, “हूतियों के लिए हर समस्या का एक ही जवाब है- युद्ध। वहीं सऊदी अरब हर समस्या को पैसे से सुलझाने की कोशिश करता है, जबकि हूती हथियारों से जवाब देते हैं।” ईरान की मदद से मजबूत हुए हूती विद्रोही हूती कभी यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में सक्रिय शिया विद्रोहियों का एक छोटा समूह थे। उनका नारा था- “अमेरिका और इजराइल की मौत।” ईरान के समर्थन से उन्होंने 2014 में गृहयुद्ध शुरू किया और राजधानी सना पर कब्जा कर अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को वहां से हटा दिया। यमन की उत्तरी सीमा से लगे सऊदी अरब को अपने पड़ोस में ईरान समर्थित हूती संगठन का मजबूत होना बड़ा खतरा लगा। साल 2015 में सऊदी अरब ने 8 और अरब देशों के साथ मिलकर एक गठबंधन बनाया और हूतियों के खिलाफ जंग छेड़ दी। इसका मकसद राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को फिर से सत्ता में लाना था, जिसे हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना से हटा दिया था। करीब 8 साल तक जंग लड़ने के बाद सऊदी अरब को समझ आ गया कि सिर्फ सैन्य ताकत से हूती को हराना संभव नहीं है। इसलिए 2022 के बाद उसने बातचीत का रास्ता अपनाया और सीधे हूती नेताओं से भी संपर्क शुरू किया। फिलहाल हूती विद्रोहियों का उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर अपना प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर लिया था। वहीं दक्षिणी यमन पर अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का कंट्रोल है, लेकिन वह आर्थिक और सैन्य मदद के लिए काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। आज भी यमन के कई अहम मामलों में सऊदी अरब का प्रभाव बना हुआ है। गाजा जंग की वजह से शांति प्रक्रिया पटरी से उतरी 2022 में युद्धविराम लागू होने के बाद पहली बार लगा कि यमन में शांति लौट सकती है। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में सऊदी अरब और हूतियों के बीच समझौते की बातचीत आगे बढ़ी। दोनों पक्ष ऐसे फॉर्मूले पर काम कर रहे थे, जिससे वर्षों से चला आ रहा युद्ध खत्म हो सके। इस बातचीत में
मिडिल ईस्ट में शुरू हो सकती है एक नई जंग:सऊदी अरब का यमन की राजधानी सना पर हमला, हूती ने शुरू की समुद्री नाकेबंदी

28 फरवरी को जब अमेरिका और ईरान के बीच जंग शुरू हुई थी, तभी माना जा रहा था कि इसमें ईरान के सहयोगी हूती विद्रोही भी कूद सकते हैं। करीब पांच महीने बाद वही आशंका सच साबित होती दिख रही है। पिछले एक हफ्ते में हूतियों ने सऊदी अरब और रेड सी में जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन से कई हमले किए हैं। जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने भी हूती ठिकानों पर हवाई हमले शुरू कर दिए हैं। यानी करीब चार साल से किसी तरह टला हुआ यमन का युद्ध फिर भड़कने की कगार पर है। हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया है, जबकि दोनों तरफ से हमले लगातार बढ़ रहे हैं। इससे मिडिल ईस्ट में एक नई जंग शुरू होने का खतरा बढ़ गया है। हूती और सऊदी के बीच विवाद की शुरुआत हूती और सऊदी के बीच ताजा विवाद 13 जुलाई को शुरू हुआ। दरअसल, कुछ हूती नेता अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद ईरान से यमन लौट रहे थे। लेकिन यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने इस प्लेन को सना एयरपोर्ट पर उतरने ही नहीं दिया। यमन सरकार का कहना था कि हूती अधिकारी यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही वापस लौटें। उन्हें ईरान की एयरलाइन में आने नहीं दिया जाएगा। वहीं हूती ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे। इसके बाद सरकार समर्थित फोर्स ने सना एयरपोर्ट के रनवे को बम से उड़ा दिया, ताकि ईरानी विमान वहां उतर न सके। नतीजतन, हूती नेताओं वाला प्लेन सना एयरपोर्ट पर उतर ही नहीं सका। प्लेन ने अपना रास्ता बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट पर लैंडिंग की, जो हूतियों के कंट्रोल में है। इस घटना के बाद हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया। शुरुआत में ईरान जंग से दूर रहे हूती विद्रोही फरवरी में जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब हूती विद्रोही सीधे इस लड़ाई में उतरने से बचते दिखे। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने के बाद उनका रुख बदल गया। कई विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान ने हूतियों पर जंग में सक्रिय भूमिका निभाने का दबाव बनाया। हालांकि उनका कहना है कि इससे सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि हूतियों को भी फायदा है। वे इस मौके का इस्तेमाल यमन में अपनी राजनीतिक पकड़ और ताकत बढ़ाने के लिए करना चाहते हैं। 4 साल से यमन-सऊदी के बीच जंग रूकी थी 2022 में हुए युद्धविराम के बाद यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच लड़ाई लगभग रुक गई थी। हालांकि इसका मतलब यह नहीं था कि दोनों पक्षों के बीच विवाद खत्म हो गया था। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में स्थायी शांति समझौते पर बातचीत भी शुरू हुई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। तनाव बना रहा, मगर दोनों पक्ष बड़े युद्ध से बचने की कोशिश करते रहे। अब अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद हालात तेजी से बदल गए हैं। पिछले कुछ हफ्तों में हूती और सऊदी अरब के बीच फिर टकराव बढ़ा है और चार साल पुराना युद्धविराम टूटने की कगार पर पहुंच गया है। हूती से जंग नहीं चाहता सऊदी अरब सऊदी अरब इस समय हूतियों के साथ फिर युद्ध नहीं चाहता। इसकी वजह पिछला संघर्ष है, जो करीब एक दशक तक चला। इस लड़ाई में सऊदी अरब ने अरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन उसे कोई निर्णायक सफलता नहीं मिली। उल्टा उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचा और युद्ध, भूख व बीमारियों की वजह से लाखों यमनियों की जान चली गई। दूसरी ओर, हूतियों को लगता है कि सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाकर वे अपनी शर्तें मनवा सकते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, वे यमन के तेल से होने वाली कमाई में ज्यादा हिस्सा और देश की राजनीति में बड़ी भूमिका चाहते हैं। यमन मामलों के विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी कहते हैं, हूतियों के लिए हर समस्या का एक ही जवाब है- युद्ध। वहीं सऊदी अरब हर समस्या को पैसे से सुलझाने की कोशिश करता है, जबकि हूती हथियारों से जवाब देते हैं। ईरान की मदद से मजबूत हुए हूती विद्रोही हूती कभी यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में सक्रिय शिया विद्रोहियों का एक छोटा समूह थे। उनका नारा था- “अमेरिका और इजराइल की मौत।” 2011 में ट्यूनीशिया से शुरू हुई अरब क्रांति की लहर यमन भी पहुंची। उस समय राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह करीब 33 साल से सत्ता में थे। युवाओं के प्रदर्शन की वजह से उनकी गद्दी छीन गई। फरवरी 2012 में अब्दरब्बू मंसूर हादी राष्ट्रपति बने। लेकिन उनकी सरकार कमजोर थी। हूती विद्रोहियों ने इसका फायदा उठाया और सितंबर 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया और अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को वहां से हटा दिया। हालात इतने बिगड़ गए कि 2015 में राष्ट्रपति हादी को देश छोड़कर सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी। सऊदी ने 2015 में हूती के खिलाफ जंग शुरू की हादी के पद छोड़ने के बाद से यमन पर किसी एक सरकार का कंट्रोल नहीं रह गया। इससे पड़ोस के सऊदी अरब को खतरा महसूस हुआ क्योंकि हूती का समर्थन ईरान कर रहा था। ऐसे में सऊदी ने 2015 में आठ अरब देशों के साथ मिलकर सैन्य गठबंधन बनाया और हूतियों के खिलाफ जंग शुरू कर दी। इस गठबंधन का मकसद राष्ट्रपति अब्दरब्बुह मंसूर हादी की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को फिर सत्ता में लाना था। करीब आठ साल तक लड़ाई के बाद सऊदी अरब को समझ आ गया कि सिर्फ सैन्य ताकत से हूतियों को हराना संभव नहीं है। इसके बाद उसने बातचीत का रास्ता अपनाया और सीधे हूती नेताओं से संपर्क शुरू किया। आज उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर हूतियों का नियंत्रण है। वहीं दक्षिणी यमन अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के नियंत्रण में है, लेकिन वह आर्थिक और सैन्य मदद के लिए काफी हद तक सऊदी अरब पर निर्भर है। गाजा युद्ध ने बिगाड़ दिया शांति समझौता 2022 में युद्धविराम लागू होने के बाद पहली बार लगा कि यमन में स्थायी शांति लौट सकती है। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में सऊदी अरब और हूतियों के बीच समझौते पर बातचीत आगे बढ़ रही थी। दोनों पक्ष ऐसे फॉर्मूले पर काम कर रहे थे, जिससे वर्षों
भारत ने यूक्रेन के राजदूत को तलब किया:ब्लैक सी में जहाज पर हमले में भारतीय चीफ ऑफिसर सागर गुप्ता की मौत

भारत ने ब्लैक सी में एक जहाज पर हुए हमले में भारतीय नाविक की मौत के मामले में यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को तलब किया है। भारतीय नाविकों की यूनियनों ने हमले के लिए यूक्रेनी ड्रोन को जिम्मेदार बताया है। विदेश मंत्रालय ने इस मामले को यूक्रेन के सामने मजबूती से उठाया है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जहाज एमवी ओमोर्फी पर 18 जुलाई को ब्लैक सी से गुजरते समय हमला हुआ था। मंत्रालय ने पिछले हफ्ते जारी एक बयान में कहा था कि यह हमला कथित तौर पर रूसी क्षेत्रीय जलक्षेत्र में हुआ। हमले के समय जहाज पर 10 क्रू मेंबर सवार थे। इनमें 3 भारतीय नागरिक थे। हमले में भारतीय क्रू मेंबर और चीफ ऑफिसर सागर गुप्ता की मौत हो गई। जहाज पर मौजूद दो अन्य भारतीय क्रू मेंबर सुरक्षित बताए गए हैं। भारत ने हमले की निंदा की भारत ने जहाज पर हुए हमले की कड़ी निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि कमर्शियल शिपिंग और नागरिक क्रू मेंबर पर हमले स्वीकार नहीं किए जा सकते। मंत्रालय ने सभी पक्षों से समुद्री आवाजाही की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वैश्विक व्यापार के मुक्त प्रवाह को बनाए रखने की अपील की है। भारत का कहना है कि कमर्शियल शिपिंग रूट्स की सुरक्षा जरूरी है और नागरिक नाविकों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला जहाज था एमवी ओमोर्फी एमवी ओमोर्फी मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला बल्क कैरियर है। इसे 2010 में बनाया गया था। यह उस क्षेत्र में संचालित हो रहा था, जहां रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच व्यापारी जहाजों पर बार-बार हमले हुए हैं। इस घटना ने ब्लैक सी क्षेत्र में काम कर रहे भारतीय नाविकों के सामने बढ़ते सुरक्षा जोखिम को भी सामने रखा है। भारतीय नाविक दुनिया की मर्चेंट नेवी में सबसे बड़े समूहों में शामिल हैं। भारतीय नाविकों और शिपिंग कंपनियों को एडवाइजरी भारतीय अधिकारियों ने नाविकों और शिपिंग कंपनियों को एडवाइजरी जारी कर ब्लैक सी या उसके आसपास के इलाकों में काम से पहले सुरक्षा जोखिमों का सावधानी से आकलन करने को कहा है। एडवाइजरी में नाविकों और शिपिंग कंपनियों को समुद्री मार्गों की पुष्टि करने, इंश्योरेंस कवरेज की जांच करने और इमरजेंसी प्रक्रियाओं को समझने की सलाह दी गई है। अधिकारियों ने कहा है कि किसी भी असाइनमेंट को स्वीकार करने से पहले इन पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। हमले में यूक्रेनी ड्रोन के इस्तेमाल का आरोप भारतीय नाविकों की यूनियनों ने इस हमले के लिए यूक्रेनी ड्रोन को जिम्मेदार बताया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यूक्रेन की ओर से इस आरोप की पुष्टि का उल्लेख नहीं है। हमले की जिम्मेदारी और इसकी पूरी परिस्थितियों को लेकर उपलब्ध कॉपी में आगे की जानकारी नहीं दी गई है। भारत ने इससे पहले भी कमर्शियल शिपिंग लेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। नई दिल्ली लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि समुद्री रास्तों से होने वाले वैश्विक व्यापार को सुरक्षित रखा जाए और नागरिक नाविकों की सुरक्षा से किसी भी स्थिति में समझौता न हो।
भारत ने यूक्रेन के राजदूत को तलब किया:ब्लैक सी में जहाज पर हमले में भारतीय चीफ ऑफिसर सागर गुप्ता की मौत

भारत ने ब्लैक सी में एक जहाज पर हुए हमले में भारतीय नाविक की मौत के मामले में यूक्रेन के राजदूत डॉ. ओलेक्सांद्र पोलिशचुक को तलब किया है। भारतीय नाविकों की यूनियनों ने हमले के लिए यूक्रेनी ड्रोन को जिम्मेदार बताया है। विदेश मंत्रालय ने इस मामले को यूक्रेन के सामने मजबूती से उठाया है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, जहाज एमवी ओमोर्फी पर 18 जुलाई को ब्लैक सी से गुजरते समय हमला हुआ था। मंत्रालय ने पिछले हफ्ते जारी एक बयान में कहा था कि यह हमला कथित तौर पर रूसी क्षेत्रीय जलक्षेत्र में हुआ। हमले के समय जहाज पर 10 क्रू मेंबर सवार थे। इनमें 3 भारतीय नागरिक थे। हमले में भारतीय क्रू मेंबर और चीफ ऑफिसर सागर गुप्ता की मौत हो गई। जहाज पर मौजूद दो अन्य भारतीय क्रू मेंबर सुरक्षित बताए गए हैं। भारत ने हमले की निंदा की भारत ने जहाज पर हुए हमले की कड़ी निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि कमर्शियल शिपिंग और नागरिक क्रू मेंबर पर हमले स्वीकार नहीं किए जा सकते। मंत्रालय ने सभी पक्षों से समुद्री आवाजाही की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वैश्विक व्यापार के मुक्त प्रवाह को बनाए रखने की अपील की है। भारत का कहना है कि कमर्शियल शिपिंग रूट्स की सुरक्षा जरूरी है और नागरिक नाविकों की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाना चाहिए। मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला जहाज था एमवी ओमोर्फी एमवी ओमोर्फी मार्शल आइलैंड्स के झंडे वाला बल्क कैरियर है। इसे 2010 में बनाया गया था। यह उस क्षेत्र में संचालित हो रहा था, जहां रूस-यूक्रेन संघर्ष के बीच व्यापारी जहाजों पर बार-बार हमले हुए हैं। इस घटना ने ब्लैक सी क्षेत्र में काम कर रहे भारतीय नाविकों के सामने बढ़ते सुरक्षा जोखिम को भी सामने रखा है। भारतीय नाविक दुनिया की मर्चेंट नेवी में सबसे बड़े समूहों में शामिल हैं। भारतीय नाविकों और शिपिंग कंपनियों को एडवाइजरी भारतीय अधिकारियों ने नाविकों और शिपिंग कंपनियों को एडवाइजरी जारी कर ब्लैक सी या उसके आसपास के इलाकों में काम से पहले सुरक्षा जोखिमों का सावधानी से आकलन करने को कहा है। एडवाइजरी में नाविकों और शिपिंग कंपनियों को समुद्री मार्गों की पुष्टि करने, इंश्योरेंस कवरेज की जांच करने और इमरजेंसी प्रक्रियाओं को समझने की सलाह दी गई है। अधिकारियों ने कहा है कि किसी भी असाइनमेंट को स्वीकार करने से पहले इन पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है। हमले में यूक्रेनी ड्रोन के इस्तेमाल का आरोप भारतीय नाविकों की यूनियनों ने इस हमले के लिए यूक्रेनी ड्रोन को जिम्मेदार बताया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में यूक्रेन की ओर से इस आरोप की पुष्टि का उल्लेख नहीं है। हमले की जिम्मेदारी और इसकी पूरी परिस्थितियों को लेकर उपलब्ध कॉपी में आगे की जानकारी नहीं दी गई है। भारत ने इससे पहले भी कमर्शियल शिपिंग लेन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। नई दिल्ली लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि समुद्री रास्तों से होने वाले वैश्विक व्यापार को सुरक्षित रखा जाए और नागरिक नाविकों की सुरक्षा से किसी भी स्थिति में समझौता न हो।
मलाई घेवर रेसिपी: बाजार से नहीं, अब घर में तैयार करें मलाई घेवर, मुंह में जाएगी ही जाएगी मोटाई; विधि नोट करें

घेवर के लिए: 2 कप मैदा, ½ कप ठंडी घी, 1 कप ठंडा दूध, 2 से 2½ कप बर्फ वाला ठंडा पानी, 1 चुटकी सोडा, घी या तेल छवि: एआई चाशनी के लिए: 1 कप चीनी, ½ कप पानी, 3-4 इलायची, कुछ केसर के टुकड़े। मलाई टॉपिंग के लिए: 1 कप गाढ़ी रबड़ी या मलाई, कटे हुए बादाम और पिस्ता, थोड़ा-सा केसर, चांदी का कारखाना छवि: एआई बनाने की विधि: सबसे पहले एक बाउल में ठंडा घी चॉकलेट गुड तरह फेंट लें। अब इसमें थोड़ा-थोड़ा करके मैदा, दूध और बर्फ वाला ठंडा पानी मिलाते हैं। छवि: एआई बिना गुठली वाला बैटर तैयार करें। एक मोटा और भारी नारियल वाले पोथ में घी या तेल गर्म करें। जब तेल अच्छी तरह गर्म हो जाए, तब ऊपर से एक कलछी बैटर धीरे-धीरे बीच में घुस गया। छवि: एआई कुछ सेकंड बाद फिर थोड़ा बैटर डाला। इसी तरह 4-5 बार बैटर डालें ताकि घेवर में जालीदार डिजाइन बन जाए। बीच में जगह बनाने पर उसे प्रभाव-सा खोल दें। सुनहरा होने तक तलें और बारहमासी अतिरिक्त तेल गंतव्य। छवि: एआई एक पैन में चीनी और पानी के स्मारक। इलायची और केसर डालें और एक तार की रोशनी चाशनी तैयार कर लें। 20-30 सेकंड के लिए सूखे हुए घेवर को चाशनी में डुबोएं और फिर ठंडा ठंडा होने दें। छवि: एआई अब घेवर के ऊपर गाधी रबड़ी या मलाई फैलाएं। इसके बाद बादाम, पिस्ता और केसर से सजाएं। क्रूड तो सिल्वर का वर्कशॉप भी लगा सकते हैं। मलाई घेवर को फ़िरोज़ में 30 मिनट ठंडा करके सर्व करें। छवि: एआई इसका स्वाद ठंडा है और देखने में भी लाजवाब है। यह त्यौहार, त्योहार या किसी खास व्यंजन पर मिठाई के रूप में बनाया जा सकता है। छवि: एआई घेवर का बैटर हमेशा के लिए पतला और ठंडा हो जाता है, फिर भी तैयार हो जाता है। तेल या घी अच्छी तरह गर्म होना चाहिए। चाशनी ज्यादातर गाधी न छोड़ें, बाकी घेवर सख्त हो सकते हैं। छवि: एआई ताजी और गाढ़ी रबड़ी के इस्तेमाल से स्वाद कई गुना बढ़ जाता है। इसे बनाने में मलाई घेवर का स्वाद इतना शानदार होता है कि एक बार खाने के बाद बाजार वाला घेवर भी मांग में रह जाता है। छवि: एआई इस आसान रेसिपी को जरूर बनाएं और परिवार के साथ त्योहार का मजा लें। छवि: एआई (टैग्सटूट्रांसलेट)मलाई घेवर रेसिपी(टी)मलाई घेवर रेसिपी(टी)घर पर घेवर कैसे बनाएं(टी)घेवर रेसिपी(टी)भारतीय मिठाई
Bank of Baroda Data Leak

Hindi News Business Bank Of Baroda Data Leak | Customers Internal Records Exposed On Dark Web मुंबई16 मिनट पहले कॉपी लिंक बैंक ऑफ बड़ौदा के ग्राहकों का पर्सनल डेटा और बैंक के इंटरनल डॉक्यूमेंट्स डार्क वेब पर लीक हो गए हैं। इस मामले से जुड़े एक सूत्र और साइबरसिक्योरिटी रिसर्चर ने इस बात की जानकारी दी है। कैशलेस कंज्यूमर के फाउंडर और साइबरसिक्योरिटी रिसर्चर श्रीकांत एल के अनुसार, लीक हुए डेटा में ग्राहकों की पर्सनल डिटेल्स, आइडेंटिफिकेशन डॉक्यूमेंट्स, लोन से जुड़े पेपर और बैंक के इंटरनल ऑडिट रिकॉर्ड शामिल हैं। इस डेटा लीक को कंफर्म करते हुए मामले से जुड़े सूत्र ने बताया कि बैंक ऑफ बड़ौदा ने इस घटना की जांच के लिए फोरेंसिक ऑडिट शुरू कर दिया है। हालांकि, इस लीक से कितने ग्राहक प्रभावित हुए हैं, इसकी सटीक संख्या अभी साफ नहीं हो पाई है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने इस डेटा ब्रीच के संबंध में अभी तक स्टॉक एक्सचेंजों को कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी है। ईमेल सिस्टम से हुई सेंधमारी की आशंका सूत्र के मुताबिक, शुरुआती संकेतों से पता चलता है कि यह पूरी घटना बैंक के एक कंप्रोमाइज्ड यानी हैक या सेंधमारी का शिकार हुए ईमेल सिस्टम की वजह से हुई है। हैकर्स ने ईमेल सिस्टम को हैक कर बैंक के संवेदनशील डेटा तक पहुंच हासिल की। डार्क वेब पर 700GB डेटा की बिक्री का दावा साइबरसिक्योरिटी रिसर्चर श्रीकांत एल ने वेबसाइट के मेटाडेटा एनालिसिस के आधार पर बताया कि यह डेटा शनिवार रात एक डार्क वेब साइट पर सामने आया था। डार्क वेब पर इस डेटा को 700 GB से भी ज्यादा जानकारी वाले डेटा कैशे के रूप में एडवर्टाइज किया गया था। मामले पर नियामक एजेंसियों ने साधी चुप्पी डेटा लीक के इस मामले पर फिलहाल बैंक ऑफ बड़ौदा, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत की साइबर सुरक्षा नियामक एजेंसी सर्ट-इन (CERT-In) की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। कॉर्पोरेट जगत में बढ़ रही साइबर सुरक्षा की चिंताएं यह डेटा लीक ऐसे समय में सामने आया है जब ग्राहकों और व्यवसायों का भारी मात्रा में डेटा स्टोर करने वाली बड़ी कंपनियों और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस के सामने साइबर सुरक्षा के जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं। इससे पहले जून महीटने में एपल के सप्लायर ‘टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स’ पर हुए साइबर हमले के कारण एपल और इलॉन मस्क की कंपनी टेस्ला से जुड़े कंपोनेंट डिजाइन और स्पेसिफिकेशंस के डॉक्यूमेंट्स डार्क वेब पर लीक हो गए थे। इसके अलावा, इसी महीने की शुरुआत में ‘वर्ल्ड लीक्स’ नाम के रैनसमवेयर ग्रुप ने भारत के सबसे बड़े न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ी फाइलें भी डार्क वेब पर पोस्ट कर दी थीं। क्या होता है डार्क वेब और फोरेंसिक ऑडिट? डार्क वेब: इंटरनेट का वह छिपा हुआ हिस्सा है जिसे गूगल या सामान्य सर्च इंजन से एक्सेस नहीं किया जा सकता। इसे इस्तेमाल करने के लिए विशेष सॉफ्टवेयर (जैसे Tor Browser) की जरूरत होती है। इसका उपयोग अक्सर अवैध खरीदारी, डेटा चोरी और हैकिंग से जुड़े कामों के लिए किया जाता है। फोरेंसिक ऑडिट: यह किसी डिजिटल सिस्टम या वित्तीय रिकॉर्ड की एक गहन तकनीकी जांच होती है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि हैकिंग या सेंधमारी कैसे हुई, कहां से डेटा लीक हुआ और इसमें किसकी लापरवाही या संलिप्तता थी, ताकि इसे कानूनी सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके। बैंक के कस्टमर्स के लिए सेफ्टी टिप्स पासवर्ड और PIN बदलें: बैंक ऑफ बड़ौदा के ग्राहक एहतियात के तौर पर अपने नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग एप के पासवर्ड और ATM PIN तुरंत बदल लें। फिशिंग कॉल से बचें: किसी भी अनजान कॉल, मैसेज या ईमेल पर अपने बैंक खाते की जानकारी, OTP या CVV शेयर न करें। बैंक कभी भी फोन पर गोपनीय जानकारी नहीं मांगता। ये खबर भी पढ़ें… चांदी ₹2,050 बढ़कर ₹2.25 लाख पर पहुंची: सोना ₹751 महंगा होकर ₹1.45 लाख का 10 ग्राम हुआ, इस साल ₹1.60 लाख तक जा सकता है सोने-चांदी की कीमतों में आज यानी 27 जुलाई को बढ़त है। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के मुताबिक, एक किलो चांदी 2,050 रुपए बढ़कर 2.25 लाख रुपए पर पहुंच गई है। वहीं, 10 ग्राम 24 कैरेट सोना 751 रुपए चढ़कर 1.45 लाख रुपए पर पहुंच गया है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…






