Wednesday, 16 Sep 2026 | 03:21 AM

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UK Independence Demand | Scotland Wales Northern Ireland Leaders Meeting

UK Independence Demand | Scotland Wales Northern Ireland Leaders Meeting

कार्डिफ32 मिनट पहले कॉपी लिंक स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड को ब्रिटेन से अलग करने की मांग करने वाली पार्टियों के नेता पहली बार एक साथ बैठे। वेल्स की राजधानी कार्डिफ में हुई इस बैठक में उन्होंने कहा कि इन देशों के लोगों को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार है। तीनों नेताओं ने ब्रिटेन की संसद वेस्टमिंस्टर से कहा कि वह लोगों को आजादी के लिए लोकतांत्रिक तरीके से फैसला करने से नहीं रोक सकती। तीनों पार्टियां चाहती हैं कि उनके क्षेत्रों को ब्रिटेन से ज्यादा अधिकार मिलें और आगे चलकर वे अलग देश बन सकें। हालांकि, आजादी के लिए जनमत संग्रह कब और किस तरह कराया जाए, इसे लेकर तीनों पार्टियों की राय अलग-अलग है। बाएं से दाएं: SNP नेता जॉन स्विनी, प्लेड कमरी नेता रून एपी इओरवर्थ, सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड और नॉर्दर्न आयरलैंड की फर्स्ट मिनिस्टर मिशेल ओ’नील। समझौते में कही गईं 8 अहम बातें स्कॉटलैंड, वेल्स और आयरलैंड का इतिहास, पहचान और राजनीतिक परंपराएं अलग-अलग हैं। तीनों देशों के लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार है। ब्रिटेन की कोई भी सरकार लोकतंत्र को रोक नहीं सकती। तीनों पार्टियां मानती हैं कि आजादी को लेकर उनकी संवैधानिक स्थिति अलग-अलग है। इसलिए हर देश अपने तरीके और अपने समय के हिसाब से अपने भविष्य का फैसला करेगा। तीनों पार्टियों का मानना है कि वेस्टमिंस्टर यानी लंदन की ब्रिटिश संसद का दौर खत्म होने की ओर है। तीनों देश अपने ऊर्जा संसाधनों का ज्यादा इस्तेमाल करना चाहते हैं। उनका मकसद आम लोगों के लिए बिजली की दरों को कम करना है। ब्रेक्सिट ने उनकी अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचाया और लोगों के लिए अवसर कम किए। वे यूरोप को अपना साझा घर मानते हैं। उनका भविष्य यूरोपीय संघ (EU) में है। वे EU से रिश्ते मजबूत करेंगे। ब्रिटेन से अलग होना इतना आसान क्यों नहीं? यूनाइटेड किंगडम चार हिस्सों से बना है- इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की अपनी संसद और सरकारें हैं। उन्हें कई मामलों में अपने फैसले लेने की ताकत मिली हुई है। लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अभी भी लंदन की सरकार के पास हैं। यह व्यवस्था अमेरिका या जर्मनी जैसी नहीं है, जहां केंद्र और राज्यों के अधिकार संविधान में साफ-साफ बांटे गए हैं। सबसे अहम बात यह है कि इन चारों में से कोई भी हिस्सा अपने दम पर ब्रिटेन से अलग होने का फैसला नहीं कर सकता। स्कॉटलैंड में पहले हो चुका है आजादी पर जनमत संग्रह स्कॉटलैंड में ब्रिटेन से अलग होने को लेकर 2014 में जनमत संग्रह हो चुका है। यह जनमत संग्रह वेस्टमिंस्टर की मंजूरी के बाद कराया गया था। इसमें लोगों से पूछा गया था कि क्या स्कॉटलैंड को ब्रिटेन से अलग होकर स्वतंत्र देश बनना चाहिए। नतीजे में 55% लोगों ने आजादी के खिलाफ और 45% ने इसके पक्ष में वोट दिया था। वेल्स में स्थिति अलग है। वहां की संसद सेनेड अपने दम पर आजादी के लिए जनमत संग्रह नहीं करा सकती। नॉर्दर्न आयरलैंड के लिए नियम कुछ अलग हैं। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत अगर ब्रिटेन के नॉर्दर्न आयरलैंड सचिव को लगता है कि वहां बहुमत लोग आयरलैंड के साथ जुड़ने के पक्ष में वोट कर सकते हैं, तो ब्रिटिश सरकार को जनमत संग्रह कराना होगा। आजादी के समर्थन में कितने लोग हैं? हाल के कुछ सर्वे बताते हैं कि तीनों जगह ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था बदलने की मांग को समर्थन मिल रहा है। हालांकि, तीनों जगह स्थिति अलग-अलग है। सर्वेशन के एक सर्वे में स्कॉटलैंड में 47% लोगों ने आजादी का समर्थन किया। लिवरपूल यूनिवर्सिटी के एक सर्वे में नॉर्दर्न आयरलैंड में 36% लोगों ने आयरलैंड के साथ जुड़ने के पक्ष में वोट करने की बात कही। वेल्स में सर्वेशन के सर्वे के मुताबिक 32% लोग आजादी के समर्थन में हैं। लेकिन इन आंकड़ों को तीनों जगह एक जैसा नहीं देखा जा सकता। जैसे वेल्स की प्लेड कमरी पार्टी ने चुनाव में आजादी के मुद्दे पर ज्यादा जोर नहीं दिया था। वहीं, स्कॉटलैंड में आजादी का मुद्दा काफी बड़ा है, जबकि नॉर्दर्न आयरलैंड में इसके पीछे की राजनीतिक स्थिति अलग है। ऐसे में कार्डिफ की बैठक अहम है। पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की आजादी समर्थक पार्टियां एक साथ आई हैं और ब्रिटेन के भविष्य को लेकर अपनी बात रखी है। तीनों पार्टियों का कहना है कि अपने भविष्य का फैसला करने का हक आखिरकार इन देशों के लोगों के पास होना चाहिए। ———————— ब्रिटेन से अलग हो सकते हैं स्कॉटलैंड-वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड:कल नेताओं की मीटिंग, आजादी के फैसले पर जनमत संग्रह संभव UK के एकजुट रहने पर फिर सवाल उठ रहे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के नेता सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलने वाले हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

Samantha Prabhu Seemantam Ceremony | Actress Baby Shower Photos Update

Samantha Prabhu Seemantam Ceremony | Actress Baby Shower Photos Update

14 मिनट पहले कॉपी लिंक साउथ एक्ट्रेस सामंथा रुथ प्रभु और उनके पति राज निदिमोरु जल्द ही माता-पिता बनने वाले हैं। पहली बार मां बनने जा रही सामंथा के लिए पारंपरिक ‘सीमंतम’ (बेबी शावर) सेरेमनी का आयोजन किया गया। इस सेरेमनी में सामंथा फूलों की माला पहने श्रीविद्या परंपरा के तहत पूजा-पाठ और अभिषेक कराती नजर आ रही हैं। इस दौरान उनके पति राज निदिमोरु भी उनके साथ रस्मों में हिस्सा लेते दिखे। एक्ट्रेस ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट इंस्टाग्राम पर इस सेरेमनी की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए हैं। देखें बेबी शावर सेरेमनी की तस्वीरें …. सामंथा ने बताया कि इस सेरेमनी का आयोजन तमिल और तेलुगू परंपराओं के अनुसार किया गया। रस्म में गर्भवती महिला को पवित्र जल और मंत्रों से ऊर्जावान बनाया जाता है। सामंथा का पारंपरिक ‘सीमंतम’ (बेबी शावर) सेरेमनी का आयोजन किया गया। एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया अकाउंट इंस्टाग्राम पर इस सेरेमनी की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए हैं। सेरेमनी में सामंथा फूलों की माला पहने श्रीविद्या परंपरा के तहत पूजा-पाठ कराती नजर आ रही हैं। श्रीविद्या परंपरा से हुई ‘सीमंतम’ की रस्म सामंथा ने बताया कि इस सेरेमनी का आयोजन तमिल और तेलुगू परंपराओं के अनुसार किया गया। हल्के ऑरेंज कलर के सूट और गले में फूलों की माला पहने सामंथा एक खुली जगह पर बैठी दिखीं। पुजारियों ने वैदिक मंत्रों के जाप के साथ उन पर पवित्र जल से अभिषेक किया और सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। सामंथा ने बताया कि हालांकि वे हर रस्म का पूरा मतलब नहीं समझतीं, लेकिन मंत्रों के जाप से पैदा हुई सकारात्मक ऊर्जा और पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपराओं के प्रति उनका मन हमेशा से सम्मान से भरा रहा है। अभिषेक के बाद ‘श्री चक्र यंत्र’ के केंद्र में बैठीं एक्ट्रेस । पूजा के दौरान सामंथा पर फूल चढ़ाए गए। ‘रस्म में मां को देवी का रूप माना गया’ इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर कर सामंथा ने लिखा कि सेरेमनी में श्रीविद्या उपासक पुजारी ने हर रस्म का अर्थ समझाया। उन्होंने बताया कि ‘कला आवरण’ (श्री कल्पम) रस्म के जरिए देवी की 94 कलाओं का सम्मान किया जाता है। इसके तहत गर्भवती महिला के सात चक्रों को पवित्र जल और मंत्रों से ऊर्जावान बनाया जाता है। सामंथा ने कहा कि इस रस्म की सबसे खास बात यह थी कि इसमें होने वाली मां को खुद एक देवी और पवित्र रचनाकार के रूप में देखा जाता है, जो एक नए जीवन को जन्म देने जा रही है। पूजा में उनके पति राज निदिमोरु भी उनके साथ रस्मों में हिस्सा लेते दिखे। श्री चक्र यंत्र के केंद्र में बैठकर किया जाप पूजा के अगले चरण के बारे में बताते हुए सामंथा ने लिखा कि अभिषेक के बाद होने वाली मां को ‘श्री चक्र यंत्र’ के केंद्र में बिठाया जाता है। यह यंत्र नौ आवरणों से बना होता है जो आध्यात्मिक यात्रा के अलग-अलग चरणों को दर्शाते हैं। देवी खड्गमाला के पाठ के दौरान नौ घेरों से जुड़ी दैवीय शक्तियों के नामों का जाप किया गया। सामंथा के मुताबिक, यह प्रक्रिया मन को भीतर की ओर मोड़ने और आने वाले बच्चे व मां दोनों की सुरक्षा का आशीर्वाद देती है। सामंथा और फिल्ममेकर राज निदिमोरु ने पिछले साल शादी की थी। राज निदिमोरु से 2025 में कोयंबटूर में की थी शादी सामंथा और फिल्ममेकर राज निदिमोरु ने 1 दिसंबर 2025 को तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित ईशा योग केंद्र के लिंग भैरवी मंदिर में शादी की थी। यह एक पारंपरिक समारोह था, जिसमें सिर्फ परिवार के लोग और करीबी दोस्त शामिल हुए थे। दोनों के बीच रिश्ते की खबरें 2023 से आ रही थीं, जब उन्होंने सीरीज ‘द फैमिली मैन 2’ और ‘सिटाडेल: हनी बन्नी’ में साथ काम किया था। इससे पहले सामंथा की शादी एक्टर नागा चैतन्य से हुई थी, जिनसे 2021 में उनका तलाक हो गया था। वहीं राज निदिमोरु की पहली शादी श्यामाली डे से हुई थी। ये खबर भी पढ़ें सामंथा प्रभु ने शेयर की बेबी बंप की तस्वीरें:प्रेग्नेंसी ग्लो में सेल्फी भी पोस्ट की; फैंस ने सुझाया बेबी नेम, एक्ट्रेस ने दिया रिएक्शन एक्ट्रेस सामंथा रुथ प्रभु इस वक्त अपने प्रेग्नेंसी ब्रेक पर हैं। वे सोशल मीडिया पर अपने प्रेग्नेंसी सफर की तस्वीरें लगातार शेयर कर रही हैं। हाल ही में सामंथा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक नया फोटो डंप शेयर किया है, जिसमें वे अपना बेबी बंप और प्रेग्नेंसी ग्लो दिखाती नजर आ रही हैं। पूरी खबर पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

Samantha Prabhu Seemantam Ceremony | Actress Baby Shower Photos Update

Samantha Prabhu Seemantam Ceremony | Actress Baby Shower Photos Update

5 मिनट पहले कॉपी लिंक साउथ एक्ट्रेस सामंथा रुथ प्रभु और उनके पति राज निदिमोरु जल्द ही माता-पिता बनने वाले हैं। पहली बार मां बनने जा रही सामंथा के लिए पारंपरिक ‘सीमंतम’ (बेबी शावर) सेरेमनी का आयोजन किया गया। इस सेरेमनी में सामंथा फूलों की माला पहने श्रीविद्या परंपरा के तहत पूजा-पाठ और अभिषेक कराती नजर आ रही हैं। इस दौरान उनके पति राज निदिमोरु भी उनके साथ रस्मों में हिस्सा लेते दिखे। एक्ट्रेस ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट इंस्टाग्राम पर इस सेरेमनी की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए हैं। देखें बेबी शावर सेरेमनी की तस्वीरें …. सामंथा का पारंपरिक ‘सीमंतम’ (बेबी शावर) सेरेमनी का आयोजन किया गया। एक्ट्रेस ने सोशल मीडिया अकाउंट इंस्टाग्राम पर इस सेरेमनी की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए हैं। सेरेमनी में सामंथा फूलों की माला पहने श्रीविद्या परंपरा के तहत पूजा-पाठ कराती नजर आ रही हैं। श्रीविद्या परंपरा से हुई ‘सीमंतम’ की रस्म सामंथा ने बताया कि इस सेरेमनी का आयोजन तमिल और तेलुगू परंपराओं के अनुसार किया गया। हल्के ऑरेंज कलर के सूट और गले में फूलों की माला पहने सामंथा एक खुली जगह पर बैठी दिखीं। पुजारियों ने वैदिक मंत्रों के जाप के साथ उन पर पवित्र जल से अभिषेक किया और सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। सामंथा ने बताया कि हालांकि वे हर रस्म का पूरा मतलब नहीं समझतीं, लेकिन मंत्रों के जाप से पैदा हुई सकारात्मक ऊर्जा और पीढ़ियों से चली आ रही इन परंपराओं के प्रति उनका मन हमेशा से सम्मान से भरा रहा है। अभिषेक के बाद ‘श्री चक्र यंत्र’ के केंद्र में बैठीं एक्ट्रेस । पूजा के दौरान सामंथा पर फूल चढ़ाए गए। ‘रस्म में मां को देवी का रूप माना गया’ इंस्टाग्राम पर पोस्ट शेयर कर सामंथा ने लिखा कि सेरेमनी में श्रीविद्या उपासक पुजारी ने हर रस्म का अर्थ समझाया। उन्होंने बताया कि ‘कला आवरण’ (श्री कल्पम) रस्म के जरिए देवी की 94 कलाओं का सम्मान किया जाता है। इसके तहत गर्भवती महिला के सात चक्रों को पवित्र जल और मंत्रों से ऊर्जावान बनाया जाता है। सामंथा ने कहा कि इस रस्म की सबसे खास बात यह थी कि इसमें होने वाली मां को खुद एक देवी और पवित्र रचनाकार के रूप में देखा जाता है, जो एक नए जीवन को जन्म देने जा रही है। पूजा में उनके पति राज निदिमोरु भी उनके साथ रस्मों में हिस्सा लेते दिखे। श्री चक्र यंत्र के केंद्र में बैठकर किया जाप पूजा के अगले चरण के बारे में बताते हुए सामंथा ने लिखा कि अभिषेक के बाद होने वाली मां को ‘श्री चक्र यंत्र’ के केंद्र में बिठाया जाता है। यह यंत्र नौ आवरणों से बना होता है जो आध्यात्मिक यात्रा के अलग-अलग चरणों को दर्शाते हैं। देवी खड्गमाला के पाठ के दौरान नौ घेरों से जुड़ी दैवीय शक्तियों के नामों का जाप किया गया। सामंथा के मुताबिक, यह प्रक्रिया मन को भीतर की ओर मोड़ने और आने वाले बच्चे व मां दोनों की सुरक्षा का आशीर्वाद देती है। सामंथा और फिल्ममेकर राज निदिमोरु ने पिछले साल शादी की थी। राज निदिमोरु से 2025 में कोयंबटूर में की थी शादी सामंथा और फिल्ममेकर राज निदिमोरु ने 1 दिसंबर 2025 को तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित ईशा योग केंद्र के लिंग भैरवी मंदिर में शादी की थी। यह एक पारंपरिक समारोह था, जिसमें सिर्फ परिवार के लोग और करीबी दोस्त शामिल हुए थे। दोनों के बीच रिश्ते की खबरें 2023 से आ रही थीं, जब उन्होंने सीरीज ‘द फैमिली मैन 2’ और ‘सिटाडेल: हनी बन्नी’ में साथ काम किया था। इससे पहले सामंथा की शादी एक्टर नागा चैतन्य से हुई थी, जिनसे 2021 में उनका तलाक हो गया था। वहीं राज निदिमोरु की पहली शादी श्यामाली डे से हुई थी। ये खबर भी पढ़ें सामंथा प्रभु ने शेयर की बेबी बंप की तस्वीरें:प्रेग्नेंसी ग्लो में सेल्फी भी पोस्ट की; फैंस ने सुझाया बेबी नेम, एक्ट्रेस ने दिया रिएक्शन एक्ट्रेस सामंथा रुथ प्रभु इस वक्त अपने प्रेग्नेंसी ब्रेक पर हैं। वे सोशल मीडिया पर अपने प्रेग्नेंसी सफर की तस्वीरें लगातार शेयर कर रही हैं। हाल ही में सामंथा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक नया फोटो डंप शेयर किया है, जिसमें वे अपना बेबी बंप और प्रेग्नेंसी ग्लो दिखाती नजर आ रही हैं। पूरी खबर पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

टोयोटा हिलक्स हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी:इस पर मशीनगन-रॉकेट लगाना आसान, 45 साल से दुनिया भर के आतंकियों की पहचान बनी

टोयोटा हिलक्स हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी:इस पर मशीनगन-रॉकेट लगाना आसान, 45 साल से दुनिया भर के आतंकियों की पहचान बनी

यमन में हूती विद्रोहियों के काफिले में एक खास तरह की पिकअप गाड़ियां लगातार चर्चा में हैं। हूती लड़ाके मशीनगन और रॉकेट से लेस टोयोटा हिलक्स समेत कई पिकअप गाड़ियों में नजर आए हैं। आम दिखने वाली ये गाड़ियां करीब 45 साल से दुनिया के अलग-अलग संघर्षों में विद्रोहियों और आतंकियों की पसंद बनी हुई हैं। इसकी कम कीमत, मजबूत बनावट और आसानी से हथियार लगाने की वजह से यह आम गाड़ी युद्ध के मैदान में बेहद काम की साबित हुई है। इन पिकअप पर मशीनगन, ऑटोकैनन, एंटी-टैंक मिसाइल और दूसरे घातक हथियार लगाए जाते हैं। ये वाहन शहरों में चलने वाली आम गाड़ियों जैसे दिखते हैं। हिलक्स की लोकप्रियता की वजह हिलक्स जैसी गाड़ियों का युद्ध में इस्तेमाल नया नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश स्पेशल फोर्सेज ने उत्तरी अफ्रीका में धुरी राष्ट्रों की पंक्तियों के पीछे हमलों के लिए जीप और हल्के ट्रकों का इस्तेमाल किया था। गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों में हिलक्स की लोकप्रियता की जड़ें 1980 के दशक के आखिर तक जाती हैं। उस समय लीबिया-चाड युद्ध अपने अंतिम चरण में था। सहारा के दक्षिण में स्थित देश चाड, मुअम्मर गद्दाफी के लीबिया से एक दशक से युद्ध लड़ रहा था। उसके पूर्व उपनिवेशवादी देश फ्रांस ने चाड को 400 हिलक्स और लैंड क्रूजर पिकअप दीं। इन वाहनों के साथ एंटी-टैंक और एंटी-एयर मिसाइलें भी दी गई थीं। फ्रांसीसी हवाई मदद के साथ इन टोयोटा वाहनों ने चाड को लीबिया के खिलाफ कई बड़ी सैन्य जीत दिलाईं। बाद में इस युद्ध को ‘टोयोटा वॉर’ नाम दिया गया। इस युद्ध ने दिखाया कि सही इस्तेमाल होने पर टोयोटा एक प्रभावी हथियार बन सकती है। इन वाहनों की रफ्तार और तेजी से दिशा बदलने की क्षमता ने उन्हें दुश्मन की गोलीबारी से बचने में मदद की। वे धीमे लीबियाई टैंकों के चारों ओर तेजी से घूमकर अचानक हमला कर सकती थीं। टोयोटा पिकअप सस्ती और टिकाऊ थीं। बुनियादी औजारों वाले लगभग किसी भी मैकेनिक से इनकी मरम्मत कराई जा सकती थी। दुनिया भर में आम नागरिकों के बीच लोकप्रिय होने के कारण इनके स्पेयर पार्ट्स आसानी से मिल जाते थे। हथियारों के विपरीत, टोयोटा हिलक्स या फोर्ड F-150 को विद्रोही गुटों तक पहुंचाने के लिए निर्यात पाबंदियों से नहीं गुजरना पड़ता। 1987 का युद्ध टोयोटा और विद्रोही गुटों की कहानी की शुरुआत भर था। समय के साथ अफगानिस्तान के पहाड़ों, इराक के रेगिस्तान और सोमालिया की सड़कों पर हिलक्स और दूसरी पिकअप आम दिखने लगीं। इन गाड़ियों को एक खास नाम भी मिला—‘टेक्निकल्स’। यह शब्द 1990 के दशक की शुरुआत में सोमालिया में सामने आया। उस समय सहायता एजेंसियां अपने कर्मचारियों और सामान की सुरक्षा के लिए स्थानीय सशस्त्र गुटों को पैसे देती थीं। इसे ‘टेक्निकल असिस्टेंस’ यानी तकनीकी सहायता कहा जाता था। बाद में हथियारों से लैस इन पिकअप के लिए ‘टेक्निकल्स’ नाम चलन में आ गया। विद्रोही गुटों को इतनी टोयोटा कैसे मिलती हैं इराक के कब्जे वाले शहरों में काली हिलक्स के साथ IS लड़ाके नजर आए। हूती लड़ाके भी यमन के लाल सागर तट पर ऐसी पिकअप तेजी से चलाते दिखे। सवाल यह है कि गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों को इतनी बड़ी संख्या में ये वाहन मिलते कैसे हैं। 2015 में IS के चरम पर पहुंचने के दौरान अमेरिकी आतंकवाद रोधी अधिकारियों ने टोयोटा से इस बारे में जवाब मांगा था। वे जानना चाहते थे कि आतंकी संगठन इतनी हिलक्स और लैंड क्रूजर कैसे हासिल कर रहा है। टोयोटा ने विद्रोहियों को वाहन बेचने से इनकार किया था। कंपनी ने 2015 में कहा था, “हमारी सख्त नीति है कि हम ऐसे संभावित खरीदारों को वाहन नहीं बेचते, जो उनका इस्तेमाल या उनमें बदलाव अर्धसैनिक या आतंकी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं।” टोयोटा के आंकड़ों के मुताबिक, इराक में हिलक्स और लैंड क्रूजर की बिक्री 2011 में 6,000 से बढ़कर 2013 में 18,000 हो गई थी। 2014 में यह बिक्री घटकर 13,000 रह गई। ABC न्यूज ने इन आंकड़ों की रिपोर्ट की थी। यह आंकड़े उस समय के हैं, जब IS ने सीरिया से इराक में बड़ा हमला शुरू किया था। यह हमला राजधानी बगदाद के बाहरी इलाकों तक पहुंच गया था। टोयोटा सीधे आतंकियों को वाहन न भी बेचती हो, फिर भी गैर-सरकारी गुटों के पास इन्हें हासिल करने के अपने तरीके हैं। दुनिया भर में हिलक्स की लोकप्रियता के कारण पुरानी गाड़ियां खुले बाजार में हमेशा उपलब्ध रहती हैं। कंपनी ने 2014 में कहा था, “हम केवल अनुमान लगा सकते हैं कि ये वाहन गुप्त रास्तों से आते हैं और लोगों के बीच खरीदे-बेचे जाते हैं। खासकर पुराने वाहनों का ऐसा अनौपचारिक कारोबार किसी वाहन निर्माता के लिए ट्रैक करना बहुत मुश्किल है।” एक मामले में अमेरिका के एक प्लंबर की फोर्ड पिकअप IS लड़ाकों को बेच दी गई थी। उसके दरवाजे पर प्लंबर का नाम और फोन नंबर लिखा हुआ था। वह फोर्ड सीरिया में IS के लिए इस्तेमाल होती रही। गाड़ी पर वही पहचान संबंधी जानकारी लगी थी। बाद में अमेरिकी न्यूज चैनलों ने इसे दिखाया। गैर-सरकारी सशस्त्र गुट बिचौलियों की मदद भी ले सकते हैं। ये बिचौलिए स्थानीय और विदेशी बाजारों से वाहन खरीदते हैं। इसके बाद कंपनी की नीतियों से बचने के लिए गाड़ियां अंतिम इस्तेमाल करने वालों तक पहुंचाई जाती हैं। बड़े संघर्ष शुरू होने से पहले वाहनों की बिक्री में अचानक बढ़ोतरी इसी प्रक्रिया का संकेत हो सकती है। टोयोटा के आंकड़ों में 2013 में इराक में IS के बड़े हमले से पहले बिक्री में भारी बढ़ोतरी दर्ज हुई थी। यमन के लाल सागर तट पर हिलक्स के बड़े बेड़े के साथ आगे बढ़ रहे हूती लड़ाकों को ये वाहन कैसे मिले, यह सवाल अब भी बना हुआ है। उन्होंने ये गाड़ियां पुरानी खरीदीं, बिचौलियों के जरिए शोरूम से लीं, विदेश से तस्करी कराईं या चुराईं—यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन जिस भी तरीके से ये हासिल की गई हों, साधारण और कम साजोसामान वाली हिलक्स विद्रोही गुटों के बीच अब भी बेहद पसंदीदा वाहन बनी हुई है।

टोयोटा हिलक्स हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी:इस पर मशीनगन-रॉकेट लगाना आसान, 45 साल से दुनिया भर के आतंकियों की पहचान बना

टोयोटा हिलक्स हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी:इस पर मशीनगन-रॉकेट लगाना आसान, 45 साल से दुनिया भर के आतंकियों की पहचान बना

यमन के लाल सागर तट पर पिछले हफ्ते हूती लड़ाकों के काफिले में टोयोटा हिलक्स पिकअप बड़ी संख्या में नजर आईं। इन पर मशीनगन और रॉकेट लगे थे। टोयोटा हिलक्स पिछले करीब 45 साल से दुनिया के अलग-अलग संघर्षों में विद्रोहियों और आतंकी संगठनों के बीच इस्तेमाल होती रही है। इसकी कम कीमत, मजबूत बनावट और आसानी से हथियार लगाने की वजह से यह आम गाड़ी युद्ध के मैदान में बेहद काम की साबित हुई है। हूती लड़ाकों ने यमन के लाल सागर तट के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पर नियंत्रण हासिल किया। टोयोटा हिलक्स आम नागरिकों की पिकअप से बदलकर विद्रोही युद्ध का प्रतीक बन चुकी है। IS से लेकर हूती लड़ाकों तक, कई सशस्त्र गुट इन्हें मोबाइल हथियार मंच की तरह इस्तेमाल करते हैं। अगर दुनिया भर के विद्रोहियों और गुरिल्लाओं की आम राइफल कलाश्निकोव पैटर्न की असॉल्ट राइफल है, तो उनकी पसंदीदा गाड़ी टोयोटा हिलक्स हो सकती है। यमन के हूती लड़ाकों से लेकर इराक में IS और अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज तक, हिलक्स संघर्ष वाले इलाकों में आम नजर आती है। फोर्ड, शेवरले और निसान जैसी कंपनियों की पिकअप भी इसी तरह इस्तेमाल होती हैं। इन पिकअप पर मशीनगन, ऑटोकैनन, एंटी-टैंक मिसाइल और दूसरे घातक हथियार लगाए जाते हैं। इस वजह से ये गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों की पसंद बन गई हैं। आधुनिक देशों की सेनाएं अपने सैनिकों को बचाने वाले अत्याधुनिक बख्तरबंद वाहन बनाने पर लाखों खर्च करती हैं। इसके उलट विद्रोही, आतंकी, गुरिल्ला या लड़ाके साधारण टोयोटा से जंग में पहुंच जाते हैं। इन गाड़ियों पर मशीनगन या रॉकेट लॉन्चर लगाया जाता है। ये वाहन शहरों में चलने वाली आम गाड़ियों जैसे दिखते हैं। हिलक्स की लोकप्रियता की वजह हिलक्स जैसी गाड़ियों का युद्ध में इस्तेमाल नया नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश स्पेशल फोर्सेज ने उत्तरी अफ्रीका में धुरी राष्ट्रों की पंक्तियों के पीछे हमलों के लिए जीप और हल्के ट्रकों का इस्तेमाल किया था। गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों में हिलक्स की लोकप्रियता की जड़ें 1980 के दशक के आखिर तक जाती हैं। उस समय लीबिया-चाड युद्ध अपने अंतिम चरण में था। सहारा के दक्षिण में स्थित देश चाड, मुअम्मर गद्दाफी के लीबिया से एक दशक से युद्ध लड़ रहा था। उसके पूर्व उपनिवेशवादी देश फ्रांस ने चाड को 400 हिलक्स और लैंड क्रूजर पिकअप दीं। इन वाहनों के साथ एंटी-टैंक और एंटी-एयर मिसाइलें भी दी गई थीं। फ्रांसीसी हवाई मदद के साथ इन टोयोटा वाहनों ने चाड को लीबिया के खिलाफ कई बड़ी सैन्य जीत दिलाईं। बाद में इस युद्ध को ‘टोयोटा वॉर’ नाम दिया गया। इस युद्ध ने दिखाया कि सही इस्तेमाल होने पर टोयोटा एक प्रभावी हथियार बन सकती है। इन वाहनों की रफ्तार और तेजी से दिशा बदलने की क्षमता ने उन्हें दुश्मन की गोलीबारी से बचने में मदद की। वे धीमे लीबियाई टैंकों के चारों ओर तेजी से घूमकर अचानक हमला कर सकती थीं। टोयोटा पिकअप सस्ती और टिकाऊ थीं। बुनियादी औजारों वाले लगभग किसी भी मैकेनिक से इनकी मरम्मत कराई जा सकती थी। दुनिया भर में आम नागरिकों के बीच लोकप्रिय होने के कारण इनके स्पेयर पार्ट्स आसानी से मिल जाते थे। हथियारों के विपरीत, टोयोटा हिलक्स या फोर्ड F-150 को विद्रोही गुटों तक पहुंचाने के लिए निर्यात पाबंदियों से नहीं गुजरना पड़ता। 1987 का युद्ध टोयोटा और विद्रोही गुटों की कहानी की शुरुआत भर था। समय के साथ अफगानिस्तान के पहाड़ों, इराक के रेगिस्तान और सोमालिया की सड़कों पर हिलक्स और दूसरी पिकअप आम दिखने लगीं। इन गाड़ियों को एक खास नाम भी मिला—‘टेक्निकल्स’। यह शब्द 1990 के दशक की शुरुआत में सोमालिया में सामने आया। उस समय सहायता एजेंसियां अपने कर्मचारियों और सामान की सुरक्षा के लिए स्थानीय सशस्त्र गुटों को पैसे देती थीं। इसे ‘टेक्निकल असिस्टेंस’ यानी तकनीकी सहायता कहा जाता था। बाद में हथियारों से लैस इन पिकअप के लिए ‘टेक्निकल्स’ नाम चलन में आ गया। विद्रोही गुटों को इतनी टोयोटा कैसे मिलती हैं इराक के कब्जे वाले शहरों में काली हिलक्स के साथ IS लड़ाके नजर आए। हूती लड़ाके भी यमन के लाल सागर तट पर ऐसी पिकअप तेजी से चलाते दिखे। सवाल यह है कि गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों को इतनी बड़ी संख्या में ये वाहन मिलते कैसे हैं। 2015 में IS के चरम पर पहुंचने के दौरान अमेरिकी आतंकवाद रोधी अधिकारियों ने टोयोटा से इस बारे में जवाब मांगा था। वे जानना चाहते थे कि आतंकी संगठन इतनी हिलक्स और लैंड क्रूजर कैसे हासिल कर रहा है। टोयोटा ने विद्रोहियों को वाहन बेचने से इनकार किया था। कंपनी ने 2015 में कहा था, “हमारी सख्त नीति है कि हम ऐसे संभावित खरीदारों को वाहन नहीं बेचते, जो उनका इस्तेमाल या उनमें बदलाव अर्धसैनिक या आतंकी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं।” टोयोटा के आंकड़ों के मुताबिक, इराक में हिलक्स और लैंड क्रूजर की बिक्री 2011 में 6,000 से बढ़कर 2013 में 18,000 हो गई थी। 2014 में यह बिक्री घटकर 13,000 रह गई। ABC न्यूज ने इन आंकड़ों की रिपोर्ट की थी। यह आंकड़े उस समय के हैं, जब IS ने सीरिया से इराक में बड़ा हमला शुरू किया था। यह हमला राजधानी बगदाद के बाहरी इलाकों तक पहुंच गया था। टोयोटा सीधे आतंकियों को वाहन न भी बेचती हो, फिर भी गैर-सरकारी गुटों के पास इन्हें हासिल करने के अपने तरीके हैं। दुनिया भर में हिलक्स की लोकप्रियता के कारण पुरानी गाड़ियां खुले बाजार में हमेशा उपलब्ध रहती हैं। कंपनी ने 2014 में कहा था, “हम केवल अनुमान लगा सकते हैं कि ये वाहन गुप्त रास्तों से आते हैं और लोगों के बीच खरीदे-बेचे जाते हैं। खासकर पुराने वाहनों का ऐसा अनौपचारिक कारोबार किसी वाहन निर्माता के लिए ट्रैक करना बहुत मुश्किल है।” एक मामले में अमेरिका के एक प्लंबर की फोर्ड पिकअप IS लड़ाकों को बेच दी गई थी। उसके दरवाजे पर प्लंबर का नाम और फोन नंबर लिखा हुआ था। वह फोर्ड सीरिया में IS के लिए इस्तेमाल होती रही। गाड़ी पर वही पहचान संबंधी जानकारी लगी थी। बाद में अमेरिकी न्यूज चैनलों ने इसे दिखाया। गैर-सरकारी सशस्त्र गुट बिचौलियों की मदद भी ले सकते हैं। ये बिचौलिए स्थानीय और विदेशी बाजारों से वाहन खरीदते हैं। इसके बाद कंपनी की नीतियों से

Ram Bola Film Title Controversy

Ram Bola Film Title Controversy

10 मिनट पहले कॉपी लिंक फिल्म हनुमान अंश डायरेक्ट करने वाले डॉक्टर विशाल चतुर्वेदी ने गणेश चतुर्थी के अवसर पर अगली फिल्म राम बोला की घोषणा की है। उनकी ये फिल्म महाकवि तुलसीदास की जिंदगी पर आधारित होगी, लेकिन इसी दिन, इसी टाइटल पर दूसरी फिल्म की भी घोषणा हो गई, जिससे दो मेकर्स के बीच टाइटल का विवाद शुरू हो गया है। डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने प्रोडक्शन हाउस महावीर जैन के साथ राम बोला अनाउंस की। इसी समय डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने भी फिल्म राम बोला की घोषणा की। पोस्ट में बताया गया कि इसे चंद्रप्रकाश द्विवेदी डायरेक्ट करेंगे, जबकि मधु मंटेना और मंदिरा द्विवेदी इसे प्रोड्यूस करेंगी। हनुमान अंश डायरेक्टर की फिल्म राम बोला का पोस्टर। फिल्ममेकर चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा जारी किया गया फिल्म राम बोला का पोस्टर। एक ही टाइटल और एक ही टॉपिक पर दो फिल्में अनाउंस होने पर विवाद हो गया। इस विवाद पर महावीर जैन से जुड़े एक करीबी सूत्र ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा है कि फिल्म राम बोला का टाइटल डॉक्टर विशाल चतुर्वेदी के नाम पर रजिस्टर है। वह कुछ समय पहले महावीर जैन के पास इस फिल्म का आइडिया लेकर पहुंचे थे, जिसके बाद इस फिल्म पर काम शुरू हुआ। फिल्म बनाने के राइट्स विशाल चतुर्वेदी और महावीर जैन प्रोडक्शन के पास हैं। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने विशाल चतुर्वेदी द्वारा फिल्म की घोषणा करने पर आपत्ति जताई और कहा कि इस फिल्म के टाइटल के राइट्स उनके पास हैं। उन्होंने दावा किया है कि कुछ समय पहले ही उन्होंने महावीर जैन से इस फिल्म पर बातचीत की थी, जिसके बाद उन्होंने खुद इस फिल्म पर अधिकार जताते हुए इसकी घोषणा कर दी, जबकि राइट्स उनके पास हैं। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने दैनिक जागरण को दिए इंटरव्यू में दावा किया है कि वो पिछले कुछ महीनों से महावीर जैन से इस फिल्म पर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने महावीर जैन को एक मेल और 8 मिनट का एक वीडियो भी भेजा था। चंद्रप्रकाश द्विवेदी का कहना है कि अब इस विवाद का फैसला राइटर एसोसिएशन और अदालत में होगा। बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड बना रही फिल्म हनुमान अंश पहले हफ्ते डिजास्टर घोषित होने वाली फिल्म हनुमान अंश रिलीज के 38 दिनों बाद भी बंपर कमाई कर रही है। इसने 39वें दिन यानी छठे सोमवार को 8 करोड़ 25 लाख रुपए का कलेक्शन किया है। जबकि इससे पहले रविवार को फिल्म ने 22 करोड़ कमाए थे। अब फिल्म का वर्ल्डवाइड कलेक्शन 279 करोड़ हो चुका है। 2026 की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी हनुमान अंश इस कलेक्शन के साथ ये 2026 में रिलीज हुई तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन चुकी है। कमाई के मामले में इसने मिर्जापुर, आवारापन 2, भूत बंगला, कॉकटेल 2 और बंटवारा 1947 जैसी फिल्मों को भी पीछे कर दिया है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

Ram Bola Film Title Controversy

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27 मिनट पहले कॉपी लिंक फिल्म हनुमान अंश डायरेक्ट करने वाले डॉक्टर विशाल चतुर्वेदी ने गणेश चतुर्थी के अवसर पर अगली फिल्म राम बोला की घोषणा की है। उनकी ये फिल्म महाकवि तुलसीदास की जिंदगी पर आधारित होगी, लेकिन इसी दिन, इसी टाइटल पर दूसरी फिल्म की भी घोषणा हो गई, जिससे दो मेकर्स के बीच टाइटल का विवाद शुरू हो गया है। डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी ने प्रोडक्शन हाउस महावीर जैन के साथ राम बोला अनाउंस की। इसी समय डॉक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने भी फिल्म राम बोला की घोषणा की। पोस्ट में बताया गया कि इसे चंद्रप्रकाश द्विवेदी डायरेक्ट करेंगे, जबकि मधु मंटेना और मंदिरा द्विवेदी इसे प्रोड्यूस करेंगी। हनुमान अंश डायरेक्टर की फिल्म राम बोला का पोस्टर। फिल्ममेकर चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा जारी किया गया फिल्म राम बोला का पोस्टर। एक ही टाइटल और एक ही टॉपिक पर दो फिल्में अनाउंस होने पर विवाद हो गया। इस विवाद पर महावीर जैन से जुड़े एक करीबी सूत्र ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा है कि फिल्म राम बोला का टाइटल डॉक्टर विशाल चतुर्वेदी के नाम पर रजिस्टर है। वह कुछ समय पहले महावीर जैन के पास इस फिल्म का आइडिया लेकर पहुंचे थे, जिसके बाद इस फिल्म पर काम शुरू हुआ। फिल्म बनाने के राइट्स विशाल चतुर्वेदी और महावीर जैन प्रोडक्शन के पास हैं। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने विशाल चतुर्वेदी द्वारा फिल्म की घोषणा करने पर आपत्ति जताई और कहा कि इस फिल्म के टाइटल के राइट्स उनके पास हैं। उन्होंने दावा किया है कि कुछ समय पहले ही उन्होंने महावीर जैन से इस फिल्म पर बातचीत की थी, जिसके बाद उन्होंने खुद इस फिल्म पर अधिकार जताते हुए इसकी घोषणा कर दी, जबकि राइट्स उनके पास हैं। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने दैनिक जागरण को दिए इंटरव्यू में दावा किया है कि वो पिछले कुछ महीनों से महावीर जैन से इस फिल्म पर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने महावीर जैन को एक मेल और 8 मिनट का एक वीडियो भी भेजा था। चंद्रप्रकाश द्विवेदी का कहना है कि अब इस विवाद का फैसला राइटर एसोसिएशन और अदालत में होगा। बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड बना रही फिल्म हनुमान अंश पहले हफ्ते डिजास्टर घोषित होने वाली फिल्म हनुमान अंश रिलीज के 38 दिनों बाद भी बंपर कमाई कर रही है। इसने 39वें दिन यानी छठे सोमवार को 8 करोड़ 25 लाख रुपए का कलेक्शन किया है। जबकि इससे पहले रविवार को फिल्म ने 22 करोड़ कमाए थे। अब फिल्म का वर्ल्डवाइड कलेक्शन 279 करोड़ हो चुका है। 2026 की तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी हनुमान अंश इस कलेक्शन के साथ ये 2026 में रिलीज हुई तीसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन चुकी है। कमाई के मामले में इसने मिर्जापुर, आवारापन 2, भूत बंगला, कॉकटेल 2 और बंटवारा 1947 जैसी फिल्मों को भी पीछे कर दिया है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

US Deploys Space Weapons | Warning to Russia and China

US Deploys Space Weapons | Warning to Russia and China

वॉशिंगटन डीसी4 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिका ने पहली बार सार्वजनिक रूप से माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार को कहा कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैन्य बलों को दुश्मन की कार्रवाई से बचाने के लिए किया जा सकता है। मिंक ने इन हथियारों को ‘स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ बताया। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि ये हथियार किस तरह के हैं, कितने हैं और इन्हें कब अंतरिक्ष में तैनात किया गया था। मिंक का बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में सैन्य ताकत बढ़ाने की होड़ तेज हो रही है। ऐसे में अमेरिका का यह खुलासा रूस और चीन के लिए चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की प्रतिस्पर्धा और बढ़ने की आशंका भी है। ट्रॉय मिंक ने सोमवार को मैरीलैंड में आयोजित एयर, स्पेस एंड साइबर कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी अंतरिक्ष क्षमताओं को लेकर यह जानकारी दी। मिंक बोले- दुश्मन की कार्रवाई से अमेरिकी सेना की रक्षा करेंगे मिंक ने कहा कि अमेरिका लगातार यह सुनिश्चित कर रहा है कि बदलते खतरों से निपटने के लिए उसकी सेना तैयार रहे। इसी वजह से अमेरिका के पास अब ऑर्बिट में ऐसे स्पेस कंट्रोल हथियार हैं, जो दुश्मन की कार्रवाई से अमेरिकी सैन्य बलों की रक्षा करने में सक्षम हैं। हालांकि, मिंक ने इन हथियारों की वास्तविक क्षमता के बारे में कोई जानकारी नहीं दी। जब उनसे हथियारों के बारे में और जानकारी मांगी गई तो उन्होंने कोई अतिरिक्त विवरण देने से इनकार कर दिया। इसलिए अभी यह पता नहीं है कि अमेरिका ने अंतरिक्ष में किस तरह के हथियार तैनात किए हैं। रूस-चीन के लिए क्यों अहम है यह खुलासा? अमेरिका लंबे समय से रूस और चीन की बढ़ती काउंटर-स्पेस क्षमताओं को लेकर चिंता जताता रहा है। आधुनिक युद्ध में सैटेलाइट बेहद महत्वपूर्ण हो चुके हैं। सेनाएं इनका इस्तेमाल संचार, नेविगेशन, खुफिया जानकारी जुटाने और मिसाइलों की निगरानी जैसे कामों के लिए करती हैं। इसलिए किसी देश के सैटेलाइट पर हमला उसकी सैन्य क्षमता को कमजोर कर सकता है। इसी वजह से बड़ी सैन्य ताकतें अब सिर्फ अपने सैटेलाइट की संख्या बढ़ाने पर ध्यान नहीं दे रही हैं, बल्कि उन्हें दुश्मन के हमले से बचाने और विरोधी की अंतरिक्ष क्षमताओं को रोकने की तकनीक भी विकसित कर रही हैं। मिंक का यह कहना कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में हथियार मौजूद हैं, इसी बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच एक अहम सैन्य संकेत माना जा रहा है। रूस अंतरिक्ष को युद्ध का एक क्षेत्र मानता है अमेरिकी स्पेस फोर्स के मुताबिक, रूस अंतरिक्ष को युद्ध का एक क्षेत्र मानता है। अमेरिका का कहना है कि रूस के लिए भविष्य के संघर्ष में अंतरिक्ष पर बढ़त निर्णायक हो सकती है। अमेरिकी अधिकारियों ने रूस के कुछ सैटेलाइट मिशनों को लेकर भी चिंता जताई है। उनके मुताबिक, इन मिशनों से ऐसी क्षमताओं के विकास का संकेत मिलता है जिनका इस्तेमाल भविष्य में अंतरिक्ष में हमले और बचाव, दोनों के लिए किया जा सकता है। अमेरिका को रूस की संभावित अंतरिक्ष-आधारित परमाणु हथियार क्षमता को लेकर भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों ने पहले आशंका जताई थी कि रूस ऐसा हथियार विकसित कर सकता है जो बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हो। रूस ने इन आरोपों से इनकार किया है। चीन भी तेजी से बढ़ा रहा अंतरिक्ष क्षमता अमेरिका के मुताबिक, चीन अपनी सैन्य आधुनिकीकरण योजना के तहत अंतरिक्ष और काउंटर-स्पेस क्षमताएं विकसित कर रहा है। चीन की बढ़ती सैन्य और अंतरिक्ष ताकत को अमेरिका अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक को लेकर भी चिंता जताई है। ऐसे में अमेरिका का अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना यह संकेत देता है कि वॉशिंगटन अंतरिक्ष में अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत कर रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर विरोधी की कार्रवाई का जवाब दिया जा सके। हालांकि, अमेरिका ने जिन हथियारों की तैनाती की बात कही है, उनकी वास्तविक क्षमता अभी गुप्त है। अगर अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो असर धरती पर भी पड़ेगा अंतरिक्ष में सैन्य टकराव का असर सिर्फ सैनिकों और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आज दुनिया की कई जरूरी सेवाएं सैटेलाइट पर निर्भर हैं। मौसम की जानकारी, प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी, नेविगेशन और संचार जैसे कामों में सैटेलाइट महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। GPS जैसी नेविगेशन सेवाओं का इस्तेमाल विमान, जहाज, ट्रक और दूसरी परिवहन सेवाओं में होता है। बैंकिंग और वित्तीय सिस्टम में भी सटीक समय और संचार के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। अगर बड़े पैमाने पर सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जाता है तो संचार, नेविगेशन और कई जरूरी नागरिक सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। यही वजह है कि अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती तैनाती को सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। 1967 की संधि ने परमाणु हथियारों पर लगाई थी रोक अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने के अमेरिकी खुलासे के बीच 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है। अमेरिका, सोवियत संघ और कई दूसरे देशों ने करीब 60 साल पहले यह संधि की थी। इसका मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के दूसरे हथियारों की तैनाती से बचाना था। संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या दूसरे सामूहिक विनाश के हथियार रखने पर रोक लगाई गई है। हालांकि, इसमें हर तरह के पारंपरिक हथियारों को अंतरिक्ष में तैनात करने पर पूरी तरह रोक नहीं है। इसलिए अमेरिका के मौजूदा बयान से सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने इस संधि का उल्लंघन किया है। लेकिन अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में तैनात किए गए ‘स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ किस श्रेणी के हथियार हैं। इसलिए इनकी वास्तविक प्रकृति सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के लिहाज से इनकी स्थिति क्या है। ट्रम्प के दौर में अंतरिक्ष पर बढ़ा फोकस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल

स्वीपर की नौकरी तक नहीं मिलेगी:राखी सावंत पर भड़कीं कंगना रनोट, नरेंद्र मोदी पर दिए विवादित बयान पर जमकर लगाई फटकार

स्वीपर की नौकरी तक नहीं मिलेगी:राखी सावंत पर भड़कीं कंगना रनोट, नरेंद्र मोदी पर दिए विवादित बयान पर जमकर लगाई फटकार

एक्ट्रेस और सांसद कंगना रनोट, राखी सावंत के बयान पर भड़क गई हैं। राखी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक आपत्तिजनक कमेंट किया, जिस पर कंगना ने उन्हें फटकारते हुए कहा है कि ऐसे बयान देने वालों को कोई स्वीपर की नौकरी तक नहीं देगा। कंगना रनोट ने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से लिखा है, “सिर्फ यही (राखी) नहीं, बल्कि ज्यादातर नाकाम और जलने वाले लोग किसी कामयाब महिला के कैरेक्टर पर कीचड़ उछालकर अपनी जलन, ईर्ष्या, नाकामी और घटिया सोच को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। लेकिन अब बहुत हो गया। ऐसी बार-बार और जानबूझकर की जाने वाली चरित्र हत्या और पब्लिक में बदनाम करने की कोशिशों को सहना बंद करना होगा। खुद को बेवजह अपमानित और आहत महसूस करना बंद करो और हर बात पर सफाई देना भी बंद करो।” आगे कंगना ने लिखा, “सफलता के लिए तुम भले ही अपना सबकुछ दांव पर लगा दो, लेकिन असली मजेदार बात तो ये है कि किसी को तुमसे कुछ चाहिए ही नहीं। तुम्हारे किए हुए सारे एहसान और सिफारिशें जोड़ लो, फिर भी तुम्हें स्वीपर की नौकरी तक नहीं मिलेगी क्योंकि उस नौकरी में भी थोड़ी काबिलियत और टैलेंट की जरूरत होती है। इसलिए ज्यादा खुशफहमी में मत रहो। एहसान करो या एहसान मत करो, तुम कहीं नहीं पहुंचने वालीं। अब चुपचाप बैठो, मेरी रील्स देखो और रोते रहो।” क्या था नरेंद्र मोदी पर राखी का बयान राखी सावंत ने हाल ही में कहा था कि वो प्रधानमंत्री के लिए वो कर सकती हैं, जो राखी सावंत और स्मृति ईरानी करती हैं। राखी सावंत ने हाल ही में मोहसिन खान के पॉडकास्ट एम.के.टॉक्स में कहा, “मोदी जी इधर-उधर क्यों देख रहे हैं? कंगना से उन्हें हड्डियों के अलावा और क्या मिलेगा? मोदी जी, स्मृति, कंगना और इन सभी महिलाओं ने आपको ऐसा क्या दिया कि आपने उन्हें मंत्री बना दिया? तो जो भी उन्होंने आपको दिया है, मैं भी आपको दे सकती हूं।” कंगना-राखी का पहले भी हुआ विवाद राखी सावंत और कंगना रनौत के बीच विवाद काफी पुराना है। दोनों के बीच पहली बार तब तकरार देखने को मिली थी, जब कंगना ने एक पुराने बयान में खुद की तुलना राखी सावंत से करने से इनकार किया था। दरअसल, उस समय कंगना से मीका सिंह के साथ किसिंग सीन को लेकर सवाल किया गया था। कंगना ने कथित तौर पर कहा था कि वह राखी सावंत नहीं हैं, जो इस तरह का सीन करेंगी। कंगना का यह बयान राखी को बिल्कुल पसंद नहीं आया। इसके बाद राखी ने कंगना को जवाब देते हुए कहा था कि अगर कंगना को इतनी ही पब्लिसिटी चाहिए थी, तो वह मीका को किस कर लेतीं, लेकिन उनका नाम लेकर पब्लिसिटी लेने की जरूरत नहीं थी। साल 2020 में कंगना और महाराष्ट्र सरकार के बीच विवाद के दौरान भी राखी सावंत ने कंगना पर निशाना साधा था। इसके बाद भी दोनों के बीच समय-समय पर बयानबाजी होती रही। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट के समय भी राखी ने कंगना के बयानों की आलोचना की थी।

जंगली कुत्ते मादा की तलाश में 4000 km घूमे:9 महीने तक जोड़ीदार तलाशते रहे, अब तक की सबसे लंबी दूरी तय की

जंगली कुत्ते मादा की तलाश में 4000 km घूमे:9 महीने तक जोड़ीदार तलाशते रहे, अब तक की सबसे लंबी दूरी तय की

साथी की तलाश में जाम्बिया के तीन अफ्रीकी जंगली कुत्तों ने करीब 4,126 किलोमीटर का सफर तय किया। ये तीनों भाई 2025 के बीच में अपने पुराने इलाके से निकले और करीब 9 महीने तक लगातार घूमते रहे। अप्रैल 2026 तक उन्होंने यह दूरी पूरी कर ली थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जमीन पर रहने वाले किसी अफ्रीकी स्तनधारी के साथी की तलाश में दर्ज की गई यह अब तक की सबसे लंबी दूरी है। इन तीनों को मायूकूयूकू मेल्स (Mayukuyuku males) के नाम से पहचाना गया है। उनका सफर सिर्फ लंबा नहीं था, बल्कि बेहद मुश्किल भी था। रास्ते में उन्हें जंगलों के साथ-साथ सड़कें, शहर, खेती और औद्योगिक इलाके भी मिले। वे इनसे बचते हुए बार-बार अपना रास्ता बदलते रहे। 420 किमी की दूरी, लेकिन सफर 4 हजार किमी का अगर नक्शे पर दोनों छोरों के बीच सीधी लाइन खींचें तो तीनों भाइयों ने करीब 260 मील यानी 420 किमी की दूरी तय की। लेकिन असल में वे करीब 2,485 मील यानी 4 हजार किमी घूमे। सोचिए, मंजिल 420 किमी दूर हो और वहां पहुंचने के लिए 4 हजार किमी का चक्कर लगाना पड़े। इन जंगली कुत्तों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। वे जहां इंसानी गतिविधियां ज्यादा देखते, वहां से रास्ता बदल लेते। इस तरह जंगलों और दूसरे प्राकृतिक इलाकों के बीच घूमते हुए उन्होंने एक लंबा घुमावदार रास्ता तय किया। वैज्ञानिक इस तरह अपने जन्म वाले झुंड या इलाके को छोड़कर साथी की तलाश में निकलने को डिस्पर्सल कहते हैं। यह माइग्रेशन से अलग है। माइग्रेशन में जानवर आमतौर पर मौसम के साथ भोजन या रहने की जगह की तलाश में एक इलाके से दूसरे इलाके जाते हैं और फिर लौटते हैं। डिस्पर्सल में जानवर नए साथी या नए इलाके की तलाश में निकलता है। अपने ही झुंड में जोड़ी नहीं बनाते अफ्रीकी जंगली कुत्ते झुंड में रहने वाले बेहद सामाजिक जानवर हैं। वे साथ मिलकर शिकार करते हैं और झुंड के बच्चों की देखभाल भी करते हैं। लेकिन वे आमतौर पर अपने जन्म वाले झुंड में प्रजनन नहीं करते। इसलिए बड़े होने पर उनके सामने दो रास्ते होते हैं। वे अपने झुंड में रहकर इंतजार करें और आगे चलकर उसी झुंड का हिस्सा बने रहें, या फिर करीब 2 से 3 साल की उम्र में साथी की तलाश में बाहर निकल जाएं। जाम्बिया में इन तीन भाइयों ने साथी की तलाश में निकलने का रास्ता चुना। राजधानी लुसाका से भी बचकर निकले तीनों का रास्ता सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं था। वे जाम्बिया के अलग-अलग वन्यजीव इलाकों के बीच घूमे। इस दौरान उन्होंने राजधानी लुसाका और भारी औद्योगिक विकास वाले इलाकों के आसपास से भी रास्ता बनाया। सड़कों, शहरों और खेती की वजह से कई प्राकृतिक इलाके एक-दूसरे से कट गए हैं। ऐसे में किसी जानवर के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाना आसान नहीं है। इसके बावजूद तीनों भाइयों ने इन बाधाओं के बीच रास्ता निकाला। वैज्ञानिकों के लिए यह एक अहम संकेत है। इससे पता चलता है कि पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में जंगली कुत्तों की अलग-अलग आबादियां शायद पहले के अनुमान से ज्यादा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। तीन बहनें भी साथी की तलाश में निकलीं, 2 की मौत इसी रिसर्च में तीन मादा जंगली कुत्तों की गतिविधियों पर भी नजर रखी गई। उन्होंने भी साथी की तलाश में लंबी दूरी तय करना शुरू किया था। लेकिन उनका सफर पूरा नहीं हो सका। तीनों में से एक शिकारी के लगाए तार के फंदे यानी स्नेर में फंस गई। बाद में तीनों में से दो की मौत हो गई। दूसरी की मौत की जानकारी नहीं मिल पाई है। रिसर्चर्स ने इन जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उनके गले में GPS कॉलर लगाए थे। इससे पता चला कि बची हुई मादा जंगली कुत्तियां बार-बार उसी जगह लौट रही थीं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसा व्यवहार अक्सर तब देखा जाता है जब झुंड का कोई साथी मर जाता है। हालांकि, यह पूरी तरह तय नहीं है कि वे साथी को खोज रही थीं या उस जगह से उनका जुड़ाव बना हुआ था। इस रिसर्च में GPS कॉलर लगाए गए कुछ दूसरे जंगली कुत्तों की मौत भी अवैध शिकार के लिए लगाए गए फंदों में फंसने से हुई। जंगलों में करीब 6 हजार ही जंगली कुत्ते बचे अफ्रीकी जंगली कुत्ते अफ्रीका के सबसे दुर्लभ शिकारी जानवरों में शामिल हैं। जंगलों में इनकी संख्या करीब 6 हजार ही बची है। इनके लिए खतरा सिर्फ शिकारियों से नहीं है। सड़कें, शहर और खेती उनके रहने वाले इलाकों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट रहे हैं। इससे साथी की तलाश में एक इलाके से दूसरे इलाके तक जाना मुश्किल हो सकता है। फिर भी इस रिसर्च में तीन भाइयों का 4 हजार किमी का सफर यह दिखाता है कि ये जानवर इंसानों से बदले हुए इलाकों के बीच भी रास्ता खोज सकते हैं। मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्कॉट क्रील, जो इस रिसर्च के प्रमुख लेखक हैं और 1991 से अफ्रीकी जंगली कुत्तों का अध्ययन कर रहे हैं, इसे सावधानी के साथ उम्मीद जगाने वाला नतीजा मानते हैं। उनके मुताबिक, पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में बाड़ से घिरे इलाकों को छोड़ दें तो जंगली कुत्तों की लगभग सभी बड़ी आबादियां एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। लेकिन उनके मुताबिक तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। जानवर इतनी लंबी दूरी तय कर सकते हैं, लेकिन रास्ते में इंसानों की वजह से पैदा हुए खतरे भी हैं। इनमें सबसे बड़ा खतरा शिकारियों के लगाए फंदों का है। सिर्फ जंगल बचाना काफी नहीं, उनके बीच के रास्ते भी जरूरी यह रिसर्च इकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई है। इसके नतीजे बताते हैं कि वन्यजीवों के लिए सिर्फ संरक्षित जंगल बचाना पर्याप्त नहीं है। मान लीजिए दो बड़े जंगल हैं, लेकिन उनके बीच सड़क, शहर और खेती इतनी बढ़ गई कि जानवर एक से दूसरे तक पहुंच ही नहीं सकते। ऐसे में दोनों जंगल धीरे-धीरे अलग-अलग छोटे द्वीप जैसे बन जाएंगे। द नेचर कंजरवेंसी से जुड़े और रिसर्च के सह-लेखक ब्रूस एलेंडर के मुताबिक, जंगली कुत्तों और हाथियों जैसे बड़े इलाके में घूमने वाले जानवरों को जिंदा रहने के लिए जुड़े हुए प्राकृतिक इलाके चाहिए। इसलिए संरक्षण का मतलब सिर्फ जंगल