बागल में रिपोलिंग के दौरान साइंटिस्ट स्टाफ, भड़के शुभेंदु अधिकारी बोले- लोकतंत्र का भविष्य क्या है…

पश्चिम बंगाल विधानसभा क्षेत्र में नामांकन के नेता और भाजपा उम्मीदवार सुवेंदु अधिकारी ने शनिवार को पिघला और दासपुर क्षेत्र में विधानसभा के दिन सामुहिक कार्यकर्ताओं को दृढ़ संकल्पित करने के लिए चिंता का विषय बना दिया। उन्होंने नामांकन में नामांकन का आरोप लगाया और चुनाव आयोग से हस्तक्षेप की मांग की। साहित्यिक संस्था के लिए संवैधानिक संस्था पर उठे सवाल एक पोस्ट में अधिकारी ने लिखा, “क्या लोकतंत्र के भविष्य के अनुरूप कर्मचारियों के हाथों में शामिल किया जा रहा है? यह एक गंभीर चिंता का विषय है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता पर सीधा हमला है। 227-पिंघला एसी और 230-दासपुर एसी के लिए जारी शब्दावली सिद्धांतों को देखने के लिए मैं स्तब्ध हूं, जहां लोकतंत्र के लिए बड़ी संख्या में ठोस और कमजोर कर्मचारियों को जारी किया गया है।” उन्होंने जिबिका के सेवकों, सहायकों और सांकेतिक मतदान अधिकारियों की गिनती के लिए बाजीगरी के प्रश्न पूछे हैं। भाजपा नेताओं ने कहा कि मठ, वीवीपीएटी और डाक मतपत्रों को अचयनित किया जाता है जैसे कि शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी, जिबिका सेवकों और सहायकों को कैसे चिह्नित किया जा सकता है? ये पद स्वाभाविक रूप से राजनीतिक दबाव के प्रति संवेदनशील होते हैं। विवरण से पता चलता है कि महत्वपूर्ण अभिलेखों के लिए सूचीबद्ध कर्मचारियों पर भरोसा किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टीएमसी का पहला विरोध, ममता बनर्जी के सबसे बड़े नेता बोले-साला स्टालिन के लिए… ‘मतगणना में सरकारी कर्मचारियों को शामिल किया जाएगा’उन्होंने आगे कहा कि पिंघला ऐस (227), बिपालेंदु बेरा (जेएसी), शंकर हिल (जेएसी) और नबा कुमार एपिक (बीएलएस) जैसे बेसिक स्टाफ़निक टीम शामिल हैं। यहां तक कि ‘रिज़र्व टैगिंग’ में भी बबला जैसे स्टाफ लगे हुए हैं। अन्य होटलों और यहां तक कि यहां की नोट्स/वीवीएटी की सीलिंग में भी सहायकों, वीईएलई और सहायकों पर नियुक्त डीईओ की भरमार है। सुवेंदु अधिकारी ने चुनाव आयोग से ये सुनिश्चित करने को कहा है कि 4 मई को होने वाली माध्यमिक में नियमित सरकारी कर्मचारियों को शामिल किया जाए. मुख्य चुनाव आयुक्त से हस्तक्षेप की मांगउन्होंने लिखा, “मुख्य चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव अधिकारी पश्चिम बंगाल में हस्तक्षेप करना चाहते हैं, ताकि इन दस्तावेजों में संशोधन किया जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रारंभिक प्रक्रिया में केवल वैध, नियमित कर्मचारी सरकारी अधिकारी शामिल हों, ताकि सहायक बने रहें।” उन्होंने आगे कहा कि चुनाव आयोग को लोकतंत्र के संविधान पर रोक लगाने के लिए कार्रवाई करनी चाहिए. हम जनता के साथ मिलकर उन लोगों को नौकरी पर नहीं रखना चाहते, जो कि समुदाय विशेष के दल के आधार पर हैं। ये भी पढ़ें बंगाल चुनाव की मतगणना को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर बीजेपी का पहला बयान, कहा- टीएमसी जब भी कोर्ट गई, उसे…
नूर जहां, लक्ष्मणभोग से लेकर इमाम पसंद का नाम सुना है? ये हैं देश के रेयर आम,स्वाद, आकार, रंग में जबरदस्त

होमफोटोलाइफ़फूड नूर जहां, लक्ष्मणभोग से लेकर इमाम पसंद का नाम सुना है? ये हैं देश के रेयर आम Last Updated:May 02, 2026, 14:24 IST Rare mango varieties from india: फलों के राजा आम खाने का सीजन आ गया है. कुछ ही दिनों में आपको तरह-तरह के स्वाद, आकार, रंग वेरायटी वाले आम मार्केट में दिख जाएंगे. हर किसी का आम पसंदीदा फल होता है. भारत में सैकड़ों किस्म के आम उगाए जाते हैं. इनमें से तो कुछ आम की किस्में अब दुर्लभ हो गई हैं. ये रेयर किस्म के आम अब तो मिलते भी नहीं हैं. चलिए कुछ ऐसे ही आमों की खासियत के बारे में जानते हैं. कोहितुर Kohitur: कभी मुगल दरबारों में सराहे जाने वाला यह दुर्लभ आम अब लगभग विलुप्त हो चुका है. इसकी भरपूर सुगंध और अत्यधिक दुर्लभता इसे एक बहुमूल्य विलासिता का सामान बनाती है, जो उच्च वर्ग के खरीदारों और निर्यात संग्राहकों के लिए एकदम उपयुक्त है. इमाम पसंद Imam Pasand: इमाम पसंद आम दक्षिण भारत में मिलता है. वहां इसे हिमायत भी कहते हैं. इसकी मिठास रेशमी होती है, लोग इस आम को खूब खाना पसंद करते हैं. हालांकि, कम पैदावार के कारण यह एक विशिष्ट किस्म का आम बनकर रह गया है. किसान भी अब इसे एक प्रीमियम मैंगो के रूप में देखते हैं. मनकुराद Mankurad: पर्यटकों को लुभाने वाली अपनी मनमोहक उष्णकटिबंधीय सुगंध के लिए प्रसिद्ध है ये आम. इस आम को जीआई-टैग प्राप्त हो चुका है. इसका सेवन आप जरूर करें, अगर आपको ये कहीं भी मिल जाता है. Add News18 as Preferred Source on Google लक्ष्मणभोग Lakshmanbhog: पश्चिम बंगाल का यह आम ऐसे समय में आता है, जब अधिकांश किस्में मुरझाने लगती हैं. इसका सही समय, आकार और भरपूर स्वाद किसानों को गर्मी के मौसम में आपूर्ति में भारी कमी के दौरान बेहतर कीमतें प्राप्त करने में मदद करता है. नूर जहां Noor Jahan: मध्य प्रदेश में नूर जहां आम मिलता है. इस आम का आकार काफी विशाल होता है, इसलिए ये अधिक मशहूर है. इसकी दुर्लभता और आकर्षक रूप-रंग इसे वायरल कर देता है, जिसके चलते लोग फार्म का दौरा करने और सीधे बिक्री करने के लिए प्रेरित होते हैं. फ़ज़ली Fazli : फजली आम बंगाल और बिहार में काफी लोकप्रिय है. यह पल्पिंग और प्रसंस्करण के लिए आदर्श है. इस आम की इंडस्ट्रियल मांग भी खूब होती है. इसे बेचने से कोई नफा-नुकसान नहीं होता है, बल्कि पूरे साल आय आने की स्थिरता की गारंटी बनी रहती है. गुलाब खास Gulab Khas: अपनी विशिष्ट गुलाब जैसी सुगंध के कारण मशहूर है. यह आम उपहार देने के लिए आदर्श है. इसकी अनूठी सुगंध शहरी खरीदारों और प्रीमियम फ्रूट सब्सक्रिप्शन बॉक्स ग्राहकों को आकर्षित करती है, जो इसके लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।
टोल प्लाजा पर अब नहीं रुकेंगी गाड़ियां:सूरत में देश का पहला बैरियर-लेस टोलिंग सिस्टम हुआ लॉन्च, रियल टाइम में कट जाएगा पैसा

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने शुक्रवार को भारत का पहला मल्टी-लेन फ्री फ्लो (एमएलएफएफ) बैरियर-लेस टोलिंग सिस्टम लॉन्च किया। यह सिस्टम गुजरात में सूरत-भरूच सेक्शन के एनएच-48 पर चोर्यासी टोल प्लाजा पर शुरू किया गया है, जिससे वाहन बिना रुके टोल दे सकेंगे। बैरियर-फ्री टोलिंग मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) टेक्नोलॉजी पर आधारित है। यह 120 की स्पीड से भी गुजरने वाली गाड़ियों को बिना रुके टोल पॉइंट से गुजरने की सुविधा देती है। पारंपरिक टोल प्लाजा पर जहां फिजिकल बैरियर होते हैं वहीं यह सिस्टम सेंसर और कैमरों से लैस ओवरहेड फ्रेम का इस्तेमाल करता है, ताकि गाड़ियों की अपने-आप पहचान हो सके और टोल शुल्क रियल टाइम में काट लिया जाए। 120 की स्पीड से भी गुजरने वाली गाड़ियों की नंबर प्लेट पढ़ लेगें Ai कैमरे यह सिस्टम FASTag को ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) टेक्नोलॉजी के साथ जोड़ता है। हाई-परफॉर्मेंस वाले एआई कैमरे 120 किमी की स्पीड से भी गुजरने वाली गाड़ियों की नंबर प्लेट पढ़ लेते हैं, जबकि RFID रीडर FASTag स्टिकर को स्कैन करते हैं। इसके बाद टोल की रकम सीधे लिंक्ड अकाउंट से काट ली जाती है। अगर किसी गाड़ी में FASTag काम नहीं कर रहा है या गाड़ी पर फास्टैग नहीं लगा है तो कैमरा नंबर प्लेट के जरिए गाड़ी की पहचान कर मालिक को ई-नोटिस भेज देता है। यात्रा समय में कमी और हाईवे पर जाम घटेगा इस प्रणाली से यात्रा समय में उल्लेखनीय कमी आएगी बल्कि हाईवे पर लगने वाले जाम में भी कमी आएगी। साथ ही दावा किया जा रहा है कि ईंधन की बचत भी होगी। वाहनों से होने वाले प्रदूषण में कमी और टोल संचालन में कम से कम लोगों की जरूरत होगी। नए सिस्टम से ईंधन की होगी बचत मंत्रालय के अनुसार, इस सिस्टम से यात्रा का समय कम होगा, हाईवे पर जाम घटेगा, ईंधन की बचत होगी, वाहन प्रदूषण कम होगा और टोल संचालन में मानव हस्तक्षेप भी कम होगा। बयान में कहा गया कि एमएलएफएफ की शुरुआत भारत के टोल सिस्टम के डिजिटलीकरण और राष्ट्रीय राजमार्गों के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है। आम लोगों के जीवन को आसान बनाएगा सिस्टम: गडकरी गडकरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि यह अत्याधुनिक प्रणाली वाहनों को बिना रुके निर्बाध टोल भुगतान की सुविधा देती है। इसमें ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (एएनपीआर) और फास्टैग जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया गया है। उन्होंनेकहा कि यह बैरियर-लेस टोलिंग सिस्टम आम लोगों के जीवन को आसान बनाएगा और व्यापार करने में भी सुविधा देगा, क्योंकि इससे माल और लॉजिस्टिक्स की आवाजाही तेज और अधिक प्रभावी होगी। ————————- ये खबर भी पढ़ें… पेट्रोल-डीजल ₹28 महंगा होने की खबरें गलत:सरकार बोली- दाम बढ़ाने का प्रस्ताव नहीं पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ₹25-28 प्रति लीटर बढ़ोतरी की खबरों को सरकार ने गलत बताया है। आज यानी 23 अप्रैल को पेट्रोलियम मिनिस्ट्री ने कहा कि दाम बढ़ाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। ये खबरें भ्रामक हैं और डर फैलाने के लिए फैलाई जा रही हैं। पूरी खबर पढ़ें…
ऑस्कर के बदले नियमों से भारतीय सिनेमा को राहत:फेस्टिवल्स में चमकने वाली फिल्मों को अब देश की आधिकारिक एंट्री बनने की जरूरत नहीं

ऑस्कर 2027 के लिए एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज ने इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के नियमों में बदलाव किया है। इसका असर भारत जैसे देशों पर पड़ सकता है, जहां हर साल ऑस्कर एंट्री को लेकर विवाद होते रहे हैं। नए नियमों के बाद अब किसी देश की आधिकारिक एंट्री ही ऑस्कर तक पहुंचने का इकलौता रास्ता नहीं रहेगा। एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज की नई गाइडलाइंस के अनुसार, अगर कोई फिल्म कान्स, वेनिस, टोरंटो, बर्लिन, सनडांस या बुसान जैसे इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में टॉप अवॉर्ड जीतती है, तो वह सीधे ऑस्कर की इंटरनेशनल फीचर कैटेगरी के लिए क्वालिफाई कर सकती है। यानी उस फिल्म को अपने देश की ऑफिशियल एंट्री बनने की जरूरत नहीं होगी। इस बदलाव का उदाहरण भारतीय फिल्ममेकर पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन ऐज लाइट’ से समझा जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर ये नियम पहले लागू होते तो फिल्म भारत की आधिकारिक एंट्री बने बिना भी ऑस्कर की रेस में शामिल हो सकती थी। भारत में ऑस्कर के लिए फिल्म चुनने का जिम्मा फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) के पास होता है। लेकिन कई सालों से इसकी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं। साल 2013 में इरफान खान की फिल्म ‘द लंच बॉक्स’ को लेकर विवाद हुआ था। कान्स फिल्म फेस्टिवल में सराहना मिलने के बावजूद इसे भारत की ऑफिशियल एंट्री नहीं चुना गया था। इसकी जगह ‘द गुड रोड’ को भेजा गया था। उस समय फिल्ममेकर अनुराग कश्यप समेत कई लोगों ने चयन प्रक्रिया की आलोचना की थी। नई गाइडलाइन के तहत अब इंटरनेशनल फीचर अवॉर्ड का क्रेडिट देश की बजाय फिल्म के डायरेक्टर को दिया जाएगा। साथ ही एक देश से एक से ज्यादा फिल्मों के ऑस्कर रेस में पहुंचने की संभावना बढ़ गई है। फिल्म इंडस्ट्री के जानकार इसे भारतीय सिनेमा के लिए मौका मान रहे हैं, क्योंकि अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई फिल्मों को घरेलू चयन राजनीति से राहत मिल सकती है।
दही बेहतर है या छाछ? पेट की ठंडक के लिए किसका करें सेवन; जानें आपके शरीर के लिए कौन सा विकल्प है बेस्ट

Curd vs Buttermilk Health Benefits: गर्मियों के मौसम में शरीर को अंदर से ठंडा रखने के लिए दही और छाछ दोनों ही लोकप्रिय विकल्प हैं, लेकिन बात जब ये चुनने की आती है कि इनमें से ज़्यादा बेहतर क्या है, तो जवाब आपकी ज़रूरत पर टिका है. जहाँ एक तरफ दही कैल्शियम और प्रोबायोटिक्स का गाढ़ा खज़ाना है, वहीं छाछ में 90% पानी होता है, जो शरीर में पानी की कमी दूर करने के लिए किसी अमृत से कम नहीं है. चाहे बात डाइजेशन सुधारने की हो या फिर बढ़ते वजन को कंट्रोल करने की, इन दोनों के अपने-अपने जबरदस्त फायदे हैं. तो चलिए, समझते हैं कि आपकी बॉडी टाइप और इस मौसम के हिसाब से आपके लिए दही बेहतर है या छाछ. दही और छाछ में क्या है बेहतर? दही: पोषक तत्वों का पावरहाउसदही को एक ‘कम्पलीट फूड’ माना जाता है क्योंकि इसमें पोषक तत्वों की सघनता अधिक होती है. प्रोबायोटिक्स की प्रचुरता: दही में छाछ के मुकाबले जीवित बैक्टीरिया (Probiotics) की सांद्रता अधिक होती है, जो आंतों के स्वास्थ्य को सुधारने में मदद करते हैं. हड्डियों के लिए अमृत: इसमें कैल्शियम और प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, जो हड्डियों और दांतों को मजबूती प्रदान करती है. शारीरिक विकास: जो लोग शारीरिक रूप से कमजोर हैं या वजन बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए दही एक बेहतरीन ऊर्जा स्रोत है. छाछ: गर्मियों का नेचुरल कूलरजब बात पाचन और हाइड्रेशन की आती है, तो छाछ का कोई मुकाबला नहीं है. इसे दही को मथकर और उसमें पानी मिलाकर तैयार किया जाता है. बेहतरीन हाइड्रेशन: छाछ में लगभग 90% पानी होता है, जो गर्मियों में शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाता है.पाचन में हल्का: आयुर्वेद के अनुसार, भारी भोजन के बाद छाछ पीना सबसे अच्छा है क्योंकि यह एसिडिटी को शांत करती है और पाचन तंत्र को सक्रिय करती है.वेट लॉस के लिए बेहतर: इसमें फैट और कैलोरी बहुत कम होती है, जो इसे वजन घटाने वालों के लिए एक आदर्श ड्रिंक बनाती है. तो क्या चुनें अपने लिये-इन दोनों के बीच चुनाव करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है: दही तुलना में पचने में भारी होता है, जबकि छाछ बहुत हल्की होती है और तुरंत पच जाती है. वजन कम करने के लिए छाछ और वजन बढ़ाने या मांसपेशियों के निर्माण के लिए दही बेहतर है. गर्मियों और उमस भरे मौसम में छाछ शरीर के तापमान को नियंत्रित रखती है. इन बातों का रखें ख्याल-आयुर्वेद के अनुसार, दोपहर के भोजन के साथ छाछ का सेवन अमृत के समान माना गया है. हालांकि, रात के समय दही खाने से बचना चाहिए क्योंकि यह कफ की समस्या बढ़ा सकता है. अगर आप पेट की ठंडक और हल्कापन चाहते हैं, तो छाछ चुनें. लेकिन अगर आपकी प्राथमिकता हड्डियों की मजबूती और अधिक पोषण है, तो दही आपके लिए सबसे अच्छा विकल्प है. (Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)
आपके बच्चे को लखपति बनाएगा PPF अकाउंट:अपने बच्चे के नाम खुलवाएं ये अकाउंट, जानें इसको लेकर क्या हैं नियम

अगर आप बच्चे के नाम पर निवेश शुरू करने का प्लान बना रहे हैं तो पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF) स्कीम में निवेश कर सकते हैं। इस स्कीम में अभी 7.1% सालाना ब्याज दिया जा रहा है। आप अपने बच्चे के नाम पर PPF अकाउंट खोलकर उसके लिए आसानी से लाखों का फंड तैयार कर सकते हैं। लेकिन इसके कुछ नियम हैं। हम आपको उन नियमों के बारे में बता रहे हैं। एक व्यक्ति एक ही बच्चे के नाम पर खोल सकता है PPF अकाउंट एक व्यक्ति अपने नाम पर केवल एक ही PPF अकाउंट खुलवा सकता है। हालांकि व्यक्ति अपने PPF अकाउंट के अलावा नाबालिग बच्चे के नाम पर एक अन्य PPF खाता खुलवा सकता है। लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि एक अभिभावक (गार्जियन) एक ही बच्चे के नाम पर PPF खाता खोल सकता है। नियमों के मुताबिक, अगर किसी के दो बच्चे हैं तो एक नाबालिग बच्चे का PPF अकाउंट मां और दूसरे का पिता खुलवा सकता है। कितना पैसा कर सकते हैं जमा? नाबालिग के PPF अकाउंट के लिए भी एक वित्त वर्ष में कम से कम 500 और अधिकतम 1.5 लाख रुपए की डिपॉजिट लिमिट लागू है। लेकिन अगर मां-पिता का खुद का PPF अकाउंट भी है तो उनके खुद के अकाउंट और नाबालिग के PPF अकाउंट दोनों को मिलाकर अधिकतम डिपॉजिट लिमिट 1.5 लाख रुपए सालाना ही रहेगी। बच्चे के 18 साल का होने पर बच्चा हैंडल कर सकता है अपना अकाउंट नाबालिग बच्चे के 18 साल का हो जाने के बाद अकाउंट का स्टेटस माइनर से मेजर करने के लिए ऐप्लिकेशन देनी होगी। इसके बाद बालिग हो चुका बच्चा अपना अकाउंट खुद से हैंडल कर सकता है। 15 साल का रहता है मैच्योरिटी पीरियड PPF अकाउंट 15 साल में मैच्योर होता है। आप चाहे तो मैच्योरिटी के बाद पूरा पैसा निकाल सकते हैं। हालांकि अगर आपको पैसे की जरूरत नहीं है तो इसे 5-5 साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। इस पर मिलता है टैक्स छूट का लाभ PPF इनकम टैक्स की EEE कैटेगरी में आती है। यानी योजना में किए गए पूरे निवेश पर आपको टैक्स छूट का लाभ मिलता है। साथ ही इस योजना में निवेश से मिलने वाले ब्याज और निवेश की पूरी राशि पर भी किसी तरह का टैक्स नहीं देना होता। आसानी से तैयार होगा बड़ा फंड इस स्कीम के जरिए अगर आप हर महीने 1 हजार रुपए निवेश करते हैं तो आपको 15 साल बाद 3 लाख 18 हजार रुपए मिलेंगे। वहीं अगर 2 हजार रुपए महीना निवेश करते हैं तो आपको 15 साल बाद 6 लाख 37 हजार रुपए मिलेंगे। यहां जानें इसमें निवेश करने पर आपको कितना फायदा होगा। कौन खोल सकता है PPF अकाउंट? कोई भी व्यक्ति किसी पोस्ट ऑफिस या बैंक में अपने नाम पर यह अकाउंट खोल सकता है। इसके अलावा नाबालिग की तरफ से किसी और व्यक्ति द्वारा भी से खाता खोला जा सकता है।
benjamin netanyahu gym video| prostate cancer| iran-israel| नेतन्याहू को तो देखिए, कैंसर को मात दे जिम में बना रहे डोले, ईरान कैसे न खौफ खाए

Last Updated:May 02, 2026, 13:46 IST Israel PM benjamin netanyahu Gym: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू वैसे तो हमेशा ही कुछ न कुछ दिलचस्प चीजें करते रहते हैं लेकिन इस बार उनका जिम से आया वीडियो काफी वायरल हो रहा है. 76 की उम्र में, प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे नेतन्याहू का जिम में पसीना बहाते, सीढ़ियां चढ़ते, नाश्ते में उबले अंडे खाते हुए युवाओं को संदेश काफी कुछ कह रहा है. उन्होंने कहा है कि कसरत करें और कभी हार न मानें. यह वीडियो उनकी रिकवरी और मजबूत इरादे का ईरान को साफ संदेश है. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का हाल ही में जारी जिम का वीडियो काफी वायरल हो रहा है. 76 साल की उम्र में प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे नेता जिम में डंबल उठा रहे हैं, डोले बना रहे हैं और सीढ़ियां चढ़ रहे हैं. वे साफ-साफ बता रहे हैं कि वे एकदम फिट हैं और दुश्मनों को कोई मौका नहीं देना चाहते. उनके मजबूत इरादे निश्चित ही ईरान की पेशानी पर बल डालने के लिए काफी हैं. AI Image नेतन्याहू ने इस वीडियो में उबले अंडे खाते हुए युवाओं को संदेश भी दिया है कि कसरत करें और कभी हार न मानें. यह वीडियो उनकी रिकवरी और मजबूत इरादे के अलावा उनके टाइट रूटीन अनुशासन का उदाहरण है. वे नियमित रूप से जिम जाते हैं, वेट ट्रेनिंग और कार्डियो करते हैं. रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रोस्टेट कैंसर की सर्जरी और रेडिएशन थेरेपी के बावजूद उनका स्वास्थ्य सामान्य है.जिस कैंसर के होने पर लोग बेड पकड़ लेते हैं, नेतन्याहू का जिम में पसीना बहाना वाकई लोगों को प्रेरित करने वाला है. डॉक्टरों की मानें तो प्रोस्टेट कैंसर से उबरने वाले मरीजों के लिए व्यायाम बेहद जरूरी और फायदेमंद होता है. नियमित एक्सरसाइज मसल स्ट्रेंथ बढ़ाती है, थकान कम करती है और हड्डियों को मजबूत बनाती है. यह दिल की हेल्थ सुधारता है और वजन कंट्रोल रखता है. ADT (हॉर्मोन थेरेपी) के साइड इफेक्ट्स जैसे मसल लॉस और ऑस्टियोपोरोसिस को भी व्यायाम से रोका जा सकता है. कई स्टडी में सक्रिय पुरुषों में रिकरेंस का खतरा कम पाया गया है. Add News18 as Preferred Source on Google एम्स नई दिल्ली की ही कई स्टडीज बताती हैं कि व्यायाम के फायदे प्रोस्टेट ही नहीं बल्कि कई कैंसर सर्वाइवर्स में स्पष्ट हैं. मॉडरेट एक्सरसाइज (सप्ताह में 150-300 मिनट) कैंसर से मौत का खतरा 25-35 फीसदी तक कम कर सकती है. एक्सरसाइज से मूड बेहतर करता है, नींद सुधरती है और क्वालिटी लाइफ बढ़ती है. नेतन्याहू जैसा रूटीन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के साथ कार्डियो रिकवरी में मददगार साबित होता है. हालांकि,एक्सपर्ट कहते हैं कि प्रोस्टेट कैंसर में व्यायाम करते समय सावधानी जरूरी है. डॉक्टर कहते हैं कि हड्डी मेटास्टेसिस वाले मरीजों को हाई इंपैक्ट एक्सरसाइज से बचना चाहिए क्योंकि इससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ सकता है. थेरेपी के दौरान थकान या दर्द हो तो व्यायाम की तीव्रता कम रखनी चाहिए. हमेशा डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की सलाह से ही व्यायाम शुरू करें, जैसा कि नेतन्याहू करते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट की मानें तो प्रोस्टेट कैंसर मरीजों को सप्ताह में कम से कम 2 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और रोजाना मॉडरेट एरोबिक एक्टिविटी करनी चाहिए. वार्म-अप और कूल-डाउन जरूर शामिल करें. नेतन्याहू का संदेश प्रेरणादायक है कि उम्र या बीमारी के बावजूद पॉजिटिव सोच और मेहनत से बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है. नियमित चेकअप के साथ स्वस्थ आदतें अपनाए रखने से बेहतर हेल्थ बनी रहती है. ऐसे में नेतन्याहू का यह वीडियो सिर्फ फिटनेस नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती का भी प्रतीक है जो निश्चित रूप से ईरान और उनके प्रतिद्वंद्वियों को उनके फौलादी इरादों का संकेत दे रहा है. नेतन्याहू का प्रोस्टेट कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर वापसी करना लाखों लोगों को प्रेरित करता है. डॉक्टरों का मानना है कि व्यायाम दवा की तरह काम करता है, फायदे ज्यादा, नुकसान कम, बशर्ते सही तरीके से किया जाए. स्वस्थ रहने के लिए अनुशासन और डॉक्टरी सलाह सबसे जरूरी है. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।
फिल्म हेरा फेरी के राइट्स को लेकर फ्रॉड का केस:फिरोज नाडियाडवाला का दावा- ₹4.5 लाख में खरीदे राइट्स; रिलीज से पहले पैसे ऐंठे गए

फिल्म प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने साल 2000 में रिलीज हुई फिल्म हेरा फेरी के कॉपीराइट और रीमेक राइट्स को लेकर मुंबई के अंबोली पुलिस स्टेशन में फ्रॉड की शिकायत दर्ज कराई है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, नाडियाडवाला ने शिकायत में कहा कि विवाद साल 1989 की मलयालम फिल्म रामजी राव स्पीकिंग से जुड़ा है, जिस पर हेरा फेरी आधारित थी। उन्होंने दावा किया कि साल 2000 में उन्होंने सुरेश कुमार सिंघल से 4.5 लाख रुपए में कुछ रीमेक राइट्स कानूनी रूप से खरीदे थे। शिकायत में कहा गया कि फिल्म रिलीज से सात दिन पहले कुछ लोगों ने दबाव बनाकर उनसे पैसे ऐंठने की कोशिश की। नाडियाडवाला के अनुसार, उन्हें भारी इन्वेस्टमेंट और संभावित नुकसान के डर से पेमेंट करना पड़ा, जबकि कोर्ट ने उनके पक्ष में स्टे ऑर्डर दिया था। पुलिस ने केस दर्ज किया नाडियाडवाला ने यह भी आरोप लगाया कि 2022 में ओरिजिनल फिल्म से जुड़े पक्षों ने पहले से बिके राइट्स को दोबारा बेच दिया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने गोपाला पिल्लई विजयकुमार और एम पॉल माइकल के खिलाफ केस दर्ज किया। इसके अलावा, दिसंबर 2024 में उन्हें एक लीगल नोटिस मिला, जिसमें फिर हेरा फेरी को गैर-कानूनी बताया गया और 60 लाख रुपए के साथ फिल्म के मुनाफे में 25% हिस्सेदारी की मांग की गई। नाडियाडवाला ने यह भी कहा कि उनकी कंपनी की पब्लिक लिस्टिंग प्रोसेस में बाधा डाली जा रही है और अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी और परेश रावल के नाम का इस्तेमाल कर झूठी खबरें फैलाई गईं, जिससे उनकी प्रोफेशनल इमेज को नुकसान पहुंचा। मामले में पुलिस ने संबंधित पक्षों को पूछताछ के लिए बुलाने की तैयारी शुरू कर दी है।
अमेरिका अपने 5000 सैनिक जर्मनी से वापस बुलाएगा:जर्मन चांसलर ने कहा था- ईरान के खिलाफ उनकी प्लानिंग ठीक नहीं, इससे ट्रम्प नाराज

अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिक हटाने का फैसला किया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी होगी। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच बयानबाजी के बाद सामने आया है। मर्ज ने पिछले महीने एक कार्यक्रम में कहा था कि अमेरिका के पास कोई अच्छी प्लानिंग नहीं है। उसे पता ही नहीं है कि वह इस जंग से बाहर कैसे निकलेगा। उन्होंने कहा कि ईरान बातचीत को टालने में माहिर है और अमेरिका को बिना नतीजे के इस्लामाबाद तक आना-जाना पड़ा। इससे अमेरिका को ईरान के सामने अपमानित होना पड़ा। इससे ट्रम्प नाराज हो गए थे। उन्होंने मर्ज को लेकर कहा कि वे बहुत खराब काम कर रहे हैं। उनको लगता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना अच्छी बात है। उन्हें हकीकत की समझ नहीं है। जर्मनी में 36 हजार अमेरिकी सैन्य तैनात BBC के मुताबिक दिसंबर तक जर्मनी में 36,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात थे। यह संख्या जापान के बाद दूसरी सबसे बड़ी तैनाती है, जहां करीब 55,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। इसके अलावा इटली में करीब 12,000 और ब्रिटेन में लगभग 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। जर्मनी में अमेरिकी सैन्य ठिकाने लंबे समय से यूरोप में अमेरिका की रणनीतिक मौजूदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच ईरान को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। यूरोपीय देशों ने ईरान जंग में ट्रम्प का साथ देने के लिए कई बार इनकार किया है। जिसके बाद ट्रम्प आरोप लगाते आए है कि यूरोपीय देश केवल कागजी शेर है क्योंकि समय पर वह कभी काम नहीं आते। इसी बीच ट्रम्प ने इटली और स्पेन से भी सैनिक हटाने का संकेत दिया है। उनका कहना है कि ये देश ईरान के खिलाफ अमेरिका का साथ नहीं दे रहे हैं, जिससे नाटो के भीतर मतभेद बढ़ते दिख रहे हैं। पहले भी सैनिक हटाने की कोशिश कर चुके ट्रम्प राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इससे पहले भी जर्मनी से सैनिक हटाने की बात कर चुके हैं। उन्होंने जर्मनी पर नाटो के तय लक्ष्य के मुताबिक रक्षा खर्च न करने का आरोप लगाया था। साल 2020 में जर्मनी से 12,000 सैनिक हटाने का प्रस्ताव भी आया था, लेकिन अमेरिकी संसद ने इसे रोक दिया था। बाद में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस फैसले को पलट दिया था। पिछले साल अमेरिका ने रोमानिया में भी अपने सैनिकों की संख्या कम करने का फैसला लिया था। दरअसल, ट्रम्प अमेरिकी सैनिकों को यूरोप से हटाकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शिफ्ट करना चाहते हैं ताकि चीन के खतरों से निपटा जा सके। अमेरिका के जर्मनी में सैन्य ठिकाने क्यों हैं? जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी 1945 से शुरू हुई, जब नाजी जर्मनी की हार के बाद अमेरिका ने वहां कब्जा कर लिया था। दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद वहां करीब 16 लाख अमेरिकी सैनिक तैनात थे, हालांकि 1 साल के बाद वहां 3 लाख सैनिक रह गए। शुरुआत में उनका काम जर्मनी के अमेरिकी कंट्रोल वाले हिस्से को संभालना और नाजीकरण खत्म करना था। लेकिन बाद में शीत युद्ध शुरू होने के साथ ही अमेरिका का मकसद बदल गया और जर्मनी को सोवियत संघ के खिलाफ एक मजबूत रक्षा दीवार बनाया गया। 1949 में नाटो बनने के बाद, अमेरिका के ये सैन्य ठिकाने स्थायी हो गए। इनका मकसद पश्चिम जर्मनी को मजबूत बनाना और सोवियत संघ के मुकाबले में खड़ा करना था। शीत युद्ध के समय जर्मनी में अमेरिका के करीब 50 बड़े सैन्य बेस और 800 से ज्यादा छोटे ठिकाने थे। उस समय वहां 2.5 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात रहते थे, और कई जगहों पर तो पूरी की पूरी अमेरिकी बस्तियां बस गई थीं, जहां सैनिकों के परिवार के लोग रहते थे। सोवियत संघ कमजोर हुआ तो सैनिक लौटे 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद अमेरिका ने अपनी मौजूदगी काफी कम कर दी, लेकिन पूरी तरह हटाई नहीं। आज की स्थिति में, यूरोप में अमेरिका के करीब 68,000 सैनिक तैनात हैं, जिनमें से लगभग 36,400 सिर्फ जर्मनी में हैं। ये सैनिक 20 से 40 अलग-अलग बेस में फैले हुए हैं। स्टुटगार्ट में यूरोप और अफ्रीका के लिए अमेरिकी कमांड हेडक्वार्टर है, जहां से पूरे क्षेत्र में सैन्य ऑपरेशन कंट्रोल होते हैं। यूरोप में अमेरिकी सेना के सात में से पांच स्थाई ठिकाने जर्मनी में ही हैं, बाकी बेल्जियम और इटली में हैं। जर्मनी के सबसे बड़े ठिकानों में रामस्टीन एयर बेस शामिल है, जो यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का मुख्य केंद्र है और यहां करीब 8,500 सैनिक हैं। इसके अलावा ग्राफेनवोहर, विल्सेक और होहेनफेल्स यूरोप का सबसे बड़ा अमेरिकी ट्रेनिंग एरिया हैं। वीसबाडेन में अमेरिका आर्मी यूरोप और अफ्रीका का मुख्यालय है और लैंडस्टूल मेडिकल सेंटर अमेरिका का विदेश में सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल है। इन बेस का रोल अब पूरी तरह बदल चुका है। पहले ये सोवियत खतरे को रोकने के लिए थे, लेकिन अब ये अमेरिका के लिए ‘लॉन्चिंग पैड’ और लॉजिस्टिक हब बन गए हैं। यहीं से अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और हाल ही में ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों को चलाया और सपोर्ट किया। असल में समझौता ऐसा है कि अमेरिका यूरोप की सुरक्षा में मदद करता है और बदले में यूरोप उसे ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर देता है जिससे वह दुनिया भर में अपने सैन्य अभियान चला सके। इसलिए यह सिर्फ ‘यूरोप की मदद’ नहीं, बल्कि अमेरिका की रणनीति का हिस्सा है। एक्सपर्ट्स- इस फैसले से नाटो की एकता कमजोर हो सकती है सुरक्षा एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका जर्मनी से अपने सैनिक हटाता है तो इसके बड़े असर हो सकते हैं। इससे नाटो की एकता कमजोर पड़ सकती है, खासकर ऐसे वक्त में जब दुनिया में पहले ही तनाव बढ़ा हुआ है। साथ ही इससे ये संदेश जा सकता है कि अमेरिका अब यूरोप की सुरक्षा को लेकर उतना गंभीर नहीं है, जिसका फायदा रूस जैसे देश उठा सकते हैं। अमेरिकी संसद में भी इस फैसले की आलोचना हो रही है। कई नेताओं ने इसे लापरवाही भरा बताया है और कहा है कि इससे यूरोप में अमेरिका की पकड़ कमजोर हो सकती है। सीनेटर जैक रीड ने कहा
साल में बस 2 ही महीने मिलता है ये फल, बना सकते हैं अचार, चटनी, सब्जी, कई रोगों के लिए काल!

Lasoda health benefits in summer: कई तरह के फल गर्मियों में आप खाते हैं, लेकिन क्या कभी लसोड़ा फल (Lasoda fruit) का स्वाद चखा है? छोटा गोल आकार का हरे रंग (कच्चा) का ये फल मुख्य रूप से गर्मियों में मिलने वाला फल है. जब ये पक जाता है तो थोड़ा बहुत रंग पीला भी हो जाता है. हालांकि, ये एक ट्रॉपिकल और जंगली फल है, जिसे ग्लू बेरी (Glue berry), इंडियन बेरी भी कहते हैं. भारत में ये फल मुख्य रूप से राजस्थान में मिलता है. इससे गर्मियों में अचार, चटनी और सब्ज़ी बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. आपने लसोड़े के अचार के बारे में जरूर सुना होगा. यह एक चिपचिपा फल है, जो ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल में रखता है. जानिए लसोड़ा कब मिलता है, इसके सेवन के क्या फायदे होते हैं. लसोड़ा किस महीने मिलता है? अन्य फलों की तरह लसोड़ा सालभर नहीं मिलता है. यदि आपको इसका स्वाद चखना है तो आपको मई-जून महीने का इंतजार करना होगा. इसी वजह से ये दुर्लभ फलों में शामिल है. लसोड़ा गर्मियों में खाया जाने वाला फल है. बस, दो महीने ही ये आपको मार्केट में मिलेगा. यह एक मौसमी फल है. आपको लसोड़ा मिले तो जरूर खरीदें और इससे चटनी, अचार, सब्जी बनाकर खाएं. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. लसोड़ा में पोषक तत्व पोषण मूल्यों की बात करें तो लसोड़े फल में एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन, कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन, जिंक जैसे मिनरल्स भरपूर मौजूद होते हैं. लसोड़ा खाने के फायदे एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर- लसोड़ा फल में फ्लेवोनॉइड्स और फेनोलिक यौगिक पाए जाते हैं. ये शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं. यह प्रक्रिया बढ़ती उम्र और कई क्रोनिक डिजीज के जोखिम को कम करने से जुड़ी होती है. पाचन को रखे दुरुस्त- गर्मियों में लसोड़ा खाने से पाचन तंत्र सही रहता है. इसमें मौजूद फाइबर आंतों की कार्यप्रणाली को बेहतर बनाता है. मल त्याग को नियमित करता है, जिससे आप कब्ज से बचे रह सकते हैं. श्वसन तंत्र को रखे हेल्दी- आयुर्वेद में लसोड़ा का उपयोग खांसी और गले की परेशानी को ठीक करने के लिए किया जाता है. कुछ शोध के अनुसार, इसमें कफ को बाहर निकालने वाले गुण मौजूद होते हैं. सूजन कम करे- इस फल के अर्क में प्रयोगशाला अध्ययनों के अनुसार एंटी-इंफ्लेमेशन प्रभाव पाए गए हैं, जो सूजन और हल्के संक्रमण से राहत देने में सहायक हो सकते हैं. लिवर को रखे हेल्दी- कुछ अध्ययनों से ये भी संकेत मिलते हैं कि यह लिवर को स्वस्थ रखने में कारगर कर सकता है. एंटीबैक्टीरियल गुण- लसोड़ा के फल और पत्तियों में कुछ ऐसे कम्पाउंड भी होते हैं, जो बैक्टीरिया और फंगस के खिलाफ प्रभावी हो सकते हैं.







