Saturday, 02 May 2026 | 02:25 PM

Trending :

दही बेहतर है या छाछ? पेट की ठंडक के लिए किसका करें सेवन; जानें आपके शरीर के लिए कौन सा विकल्प है बेस्ट आपके बच्चे को लखपति बनाएगा PPF अकाउंट:अपने बच्चे के नाम खुलवाएं ये अकाउंट, जानें इसको लेकर क्या हैं नियम benjamin netanyahu gym video| prostate cancer| iran-israel| नेतन्याहू को तो देखिए, कैंसर को मात दे जिम में बना रहे डोले, ईरान कैसे न खौफ खाए फिल्म हेरा फेरी के राइट्स को लेकर फ्रॉड का केस:फिरोज नाडियाडवाला का दावा- ₹4.5 लाख में खरीदे राइट्स; रिलीज से पहले पैसे ऐंठे गए अमेरिका अपने 5000 सैनिक जर्मनी से वापस बुलाएगा:जर्मन चांसलर ने कहा था- ईरान के खिलाफ उनकी प्लानिंग ठीक नहीं, इससे ट्रम्प नाराज साल में बस 2 ही महीने मिलता है ये फल, बना सकते हैं अचार, चटनी, सब्जी, कई रोगों के लिए काल!
EXCLUSIVE

अमेरिका अपने 5000 सैनिक जर्मनी से वापस बुलाएगा:जर्मन चांसलर ने कहा था- ईरान के खिलाफ उनकी प्लानिंग ठीक नहीं, इससे ट्रम्प नाराज

अमेरिका अपने 5000 सैनिक जर्मनी से वापस बुलाएगा:जर्मन चांसलर ने कहा था- ईरान के खिलाफ उनकी प्लानिंग ठीक नहीं, इससे ट्रम्प नाराज

अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिक हटाने का फैसला किया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी होगी। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच बयानबाजी के बाद सामने आया है। मर्ज ने पिछले महीने एक कार्यक्रम में कहा था कि अमेरिका के पास कोई अच्छी प्लानिंग नहीं है। उसे पता ही नहीं है कि वह इस जंग से बाहर कैसे निकलेगा। उन्होंने कहा कि ईरान बातचीत को टालने में माहिर है और अमेरिका को बिना नतीजे के इस्लामाबाद तक आना-जाना पड़ा। इससे अमेरिका को ईरान के सामने अपमानित होना पड़ा। इससे ट्रम्प नाराज हो गए थे। उन्होंने मर्ज को लेकर कहा कि वे बहुत खराब काम कर रहे हैं। उनको लगता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना अच्छी बात है। उन्हें हकीकत की समझ नहीं है। जर्मनी में 36 हजार अमेरिकी सैन्य तैनात BBC के मुताबिक दिसंबर तक जर्मनी में 36,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात थे। यह संख्या जापान के बाद दूसरी सबसे बड़ी तैनाती है, जहां करीब 55,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। इसके अलावा इटली में करीब 12,000 और ब्रिटेन में लगभग 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। जर्मनी में अमेरिकी सैन्य ठिकाने लंबे समय से यूरोप में अमेरिका की रणनीतिक मौजूदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच ईरान को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। यूरोपीय देशों ने ईरान जंग में ट्रम्प का साथ देने के लिए कई बार इनकार किया है। जिसके बाद ट्रम्प आरोप लगाते आए है कि यूरोपीय देश केवल कागजी शेर है क्योंकि समय पर वह कभी काम नहीं आते। इसी बीच ट्रम्प ने इटली और स्पेन से भी सैनिक हटाने का संकेत दिया है। उनका कहना है कि ये देश ईरान के खिलाफ अमेरिका का साथ नहीं दे रहे हैं, जिससे नाटो के भीतर मतभेद बढ़ते दिख रहे हैं। पहले भी सैनिक हटाने की कोशिश कर चुके ट्रम्प राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इससे पहले भी जर्मनी से सैनिक हटाने की बात कर चुके हैं। उन्होंने जर्मनी पर नाटो के तय लक्ष्य के मुताबिक रक्षा खर्च न करने का आरोप लगाया था। साल 2020 में जर्मनी से 12,000 सैनिक हटाने का प्रस्ताव भी आया था, लेकिन अमेरिकी संसद ने इसे रोक दिया था। बाद में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस फैसले को पलट दिया था। पिछले साल अमेरिका ने रोमानिया में भी अपने सैनिकों की संख्या कम करने का फैसला लिया था। दरअसल, ट्रम्प अमेरिकी सैनिकों को यूरोप से हटाकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शिफ्ट करना चाहते हैं ताकि चीन के खतरों से निपटा जा सके। अमेरिका के जर्मनी में सैन्य ठिकाने क्यों हैं? जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी 1945 से शुरू हुई, जब नाजी जर्मनी की हार के बाद अमेरिका ने वहां कब्जा कर लिया था। दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद वहां करीब 16 लाख अमेरिकी सैनिक तैनात थे, हालांकि 1 साल के बाद वहां 3 लाख सैनिक रह गए। शुरुआत में उनका काम जर्मनी के अमेरिकी कंट्रोल वाले हिस्से को संभालना और नाजीकरण खत्म करना था। लेकिन बाद में शीत युद्ध शुरू होने के साथ ही अमेरिका का मकसद बदल गया और जर्मनी को सोवियत संघ के खिलाफ एक मजबूत रक्षा दीवार बनाया गया। 1949 में नाटो बनने के बाद, अमेरिका के ये सैन्य ठिकाने स्थायी हो गए। इनका मकसद पश्चिम जर्मनी को मजबूत बनाना और सोवियत संघ के मुकाबले में खड़ा करना था। शीत युद्ध के समय जर्मनी में अमेरिका के करीब 50 बड़े सैन्य बेस और 800 से ज्यादा छोटे ठिकाने थे। उस समय वहां 2.5 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात रहते थे, और कई जगहों पर तो पूरी की पूरी अमेरिकी बस्तियां बस गई थीं, जहां सैनिकों के परिवार के लोग रहते थे। सोवियत संघ कमजोर हुआ तो सैनिक लौटे 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद अमेरिका ने अपनी मौजूदगी काफी कम कर दी, लेकिन पूरी तरह हटाई नहीं। आज की स्थिति में, यूरोप में अमेरिका के करीब 68,000 सैनिक तैनात हैं, जिनमें से लगभग 36,400 सिर्फ जर्मनी में हैं। ये सैनिक 20 से 40 अलग-अलग बेस में फैले हुए हैं। स्टुटगार्ट में यूरोप और अफ्रीका के लिए अमेरिकी कमांड हेडक्वार्टर है, जहां से पूरे क्षेत्र में सैन्य ऑपरेशन कंट्रोल होते हैं। यूरोप में अमेरिकी सेना के सात में से पांच स्थाई ठिकाने जर्मनी में ही हैं, बाकी बेल्जियम और इटली में हैं। जर्मनी के सबसे बड़े ठिकानों में रामस्टीन एयर बेस शामिल है, जो यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का मुख्य केंद्र है और यहां करीब 8,500 सैनिक हैं। इसके अलावा ग्राफेनवोहर, विल्सेक और होहेनफेल्स यूरोप का सबसे बड़ा अमेरिकी ट्रेनिंग एरिया हैं। वीसबाडेन में अमेरिका आर्मी यूरोप और अफ्रीका का मुख्यालय है और लैंडस्टूल मेडिकल सेंटर अमेरिका का विदेश में सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल है। इन बेस का रोल अब पूरी तरह बदल चुका है। पहले ये सोवियत खतरे को रोकने के लिए थे, लेकिन अब ये अमेरिका के लिए ‘लॉन्चिंग पैड’ और लॉजिस्टिक हब बन गए हैं। यहीं से अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और हाल ही में ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों को चलाया और सपोर्ट किया। असल में समझौता ऐसा है कि अमेरिका यूरोप की सुरक्षा में मदद करता है और बदले में यूरोप उसे ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर देता है जिससे वह दुनिया भर में अपने सैन्य अभियान चला सके। इसलिए यह सिर्फ ‘यूरोप की मदद’ नहीं, बल्कि अमेरिका की रणनीति का हिस्सा है। एक्सपर्ट्स- इस फैसले से नाटो की एकता कमजोर हो सकती है सुरक्षा एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका जर्मनी से अपने सैनिक हटाता है तो इसके बड़े असर हो सकते हैं। इससे नाटो की एकता कमजोर पड़ सकती है, खासकर ऐसे वक्त में जब दुनिया में पहले ही तनाव बढ़ा हुआ है। साथ ही इससे ये संदेश जा सकता है कि अमेरिका अब यूरोप की सुरक्षा को लेकर उतना गंभीर नहीं है, जिसका फायदा रूस जैसे देश उठा सकते हैं। अमेरिकी संसद में भी इस फैसले की आलोचना हो रही है। कई नेताओं ने इसे लापरवाही भरा बताया है और कहा है कि इससे यूरोप में अमेरिका की पकड़ कमजोर हो सकती है। सीनेटर जैक रीड ने कहा कि यह कदम दिखाता है कि अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ कमिटमेंट को राष्ट्रपति के मूड के हिसाब से बदल रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह फैसला नहीं रोका गया, तो इससे रिश्तों और देश की सुरक्षा पर लंबे समय तक बुरा असर पड़ सकता है। वहीं, रक्षा विशेषज्ञ ब्रैडली बोमन का कहना है कि जर्मनी और यूरोप में अमेरिकी सेना की मौजूदगी सिर्फ रूस को रोकने में मदद नहीं करती, बल्कि इससे अमेरिका को भूमध्यसागर, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका जैसे इलाकों में अपनी सैन्य ताकत जल्दी पहुंचाने में भी मदद मिलती है। इसके अलावा, एक बड़ा ऑपरेशनल मुद्दा भी है। जर्मनी में मौजूद अमेरिकी बेस, लॉजिस्टिक्स (सप्लाई सिस्टम), इंटेलिजेंस और दुनिया में कहीं भी तुरंत सैनिक भेजने की क्षमता के लिए बेहद अहम माने जाते हैं। ————————- ये खबर भी पढ़ें… मुजतबा खामेनेई का चेहरा-होंठ जला, प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत:पैर काटने की नौबत, नकली पैर लगेगा; अब ईरान को सेना के जनरल चला रहे 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान में मुजतबा खामेनेई के पिता (अयातुल्ला अली खामेनेई) के ठिकाने पर हमला किया था, तब से वह छिपकर रह रहे हैं। उसी हमले में अयातुल्ला खामेनेई, पत्नी और बेटे की मौत हो गई। मुजतबा खुद भी घायल हो गए और अब डॉक्टरों की एक टीम उनकी देखभाल कर रही है। उनसे मिलना बहुत मुश्किल है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
जरूरत की खबर- गर्मियों में स्ट्रीट फूड न खाएं:8 हेल्थ प्रॉब्लम्स का रिस्क, अगर खाने की मजबूरी हो तो ये 12 बातें ध्यान रखें

April 1, 2026/
4:30 am

गर्मियों में तापमान बढ़ने से डिहाइड्रेशन और फूड पॉइजनिंग का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। गर्मियों...

authorimg

April 30, 2026/
3:35 pm

पटना. देश में स्तन कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. बिहार भी इससे अछूता नहीं है....

शूटिंग रोकी तो मधुबाला को कटघरे तक ले पहुंचे बी.आर.चोपड़ा:प्रिंस ने भारत को समझने के लिए इनकी फिल्म देखी, जवाहरलाल नेहरू ने लिखी चिट्ठी

April 22, 2026/
4:30 am

22 अप्रैल 1914 आज से ठीक 112 साल पहले अखण्ड भारत के पंजाब में पीडब्ल्यू डी में सरकारी नौकरी करने...

हल्द्वानी में श्रीलंका-साउथ अफ्रीका के खिलाड़ियों को किया लॉक:मैच खत्म होते ही स्टेडियम में लगे ताले, सैलरी नहीं मिलने से भड़के बाउंसर

March 17, 2026/
7:37 pm

हल्द्वानी के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में लीजेंड्स लीग क्रिकेट के दौरान श्रीलंका, साउथ अफ्रीका, जिम्बाब्वे और भारत के...

100 फीट ऊंची पानी टंकी पर स्टंट:दतिया में वायरल होने के लिए रील बनाई,,जान जोखिम में डालकर पाइप से उतरा युवक

April 10, 2026/
10:47 am

दतिया में सोशल मीडिया पर वायरल होने की होड़ अब जानलेवा स्टंट में बदलती जा रही है। बड़ौनी नगर पंचायत...

PBKS IPL 2026 Best Score

April 20, 2026/
4:02 am

स्पोर्ट्स डेस्क2 घंटे पहले कॉपी लिंक IPL के 29वें मैच में पंजाब किंग्स ने लखनऊ सुपर जायंट्स को हरा दिया।...

रबड़ी रेसिपी: दूध से घर पर बनी मीठी-मीठी रबड़ी, 30 मिनट में हलवाई जैसी गाढ़ी और लच्छेदार बनेगी; जानिए सीक्रेट रेसिपी स्टेप-बाय-स्टेप

April 4, 2026/
7:41 pm

रबड़ी रेसिपी: भारतीय मिठाइयों में रबड़ी ने अपनी खास जगह हासिल की है। दूध से इसे धीरे-धीरे-धीरे-धीरे पकाकर बनाया जाता...

हेल्थ & फिटनेस

राजनीति

अमेरिका अपने 5000 सैनिक जर्मनी से वापस बुलाएगा:जर्मन चांसलर ने कहा था- ईरान के खिलाफ उनकी प्लानिंग ठीक नहीं, इससे ट्रम्प नाराज

अमेरिका अपने 5000 सैनिक जर्मनी से वापस बुलाएगा:जर्मन चांसलर ने कहा था- ईरान के खिलाफ उनकी प्लानिंग ठीक नहीं, इससे ट्रम्प नाराज

अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिक हटाने का फैसला किया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी होगी। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के बीच बयानबाजी के बाद सामने आया है। मर्ज ने पिछले महीने एक कार्यक्रम में कहा था कि अमेरिका के पास कोई अच्छी प्लानिंग नहीं है। उसे पता ही नहीं है कि वह इस जंग से बाहर कैसे निकलेगा। उन्होंने कहा कि ईरान बातचीत को टालने में माहिर है और अमेरिका को बिना नतीजे के इस्लामाबाद तक आना-जाना पड़ा। इससे अमेरिका को ईरान के सामने अपमानित होना पड़ा। इससे ट्रम्प नाराज हो गए थे। उन्होंने मर्ज को लेकर कहा कि वे बहुत खराब काम कर रहे हैं। उनको लगता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार होना अच्छी बात है। उन्हें हकीकत की समझ नहीं है। जर्मनी में 36 हजार अमेरिकी सैन्य तैनात BBC के मुताबिक दिसंबर तक जर्मनी में 36,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात थे। यह संख्या जापान के बाद दूसरी सबसे बड़ी तैनाती है, जहां करीब 55,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। इसके अलावा इटली में करीब 12,000 और ब्रिटेन में लगभग 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। जर्मनी में अमेरिकी सैन्य ठिकाने लंबे समय से यूरोप में अमेरिका की रणनीतिक मौजूदगी का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच ईरान को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। यूरोपीय देशों ने ईरान जंग में ट्रम्प का साथ देने के लिए कई बार इनकार किया है। जिसके बाद ट्रम्प आरोप लगाते आए है कि यूरोपीय देश केवल कागजी शेर है क्योंकि समय पर वह कभी काम नहीं आते। इसी बीच ट्रम्प ने इटली और स्पेन से भी सैनिक हटाने का संकेत दिया है। उनका कहना है कि ये देश ईरान के खिलाफ अमेरिका का साथ नहीं दे रहे हैं, जिससे नाटो के भीतर मतभेद बढ़ते दिख रहे हैं। पहले भी सैनिक हटाने की कोशिश कर चुके ट्रम्प राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इससे पहले भी जर्मनी से सैनिक हटाने की बात कर चुके हैं। उन्होंने जर्मनी पर नाटो के तय लक्ष्य के मुताबिक रक्षा खर्च न करने का आरोप लगाया था। साल 2020 में जर्मनी से 12,000 सैनिक हटाने का प्रस्ताव भी आया था, लेकिन अमेरिकी संसद ने इसे रोक दिया था। बाद में राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस फैसले को पलट दिया था। पिछले साल अमेरिका ने रोमानिया में भी अपने सैनिकों की संख्या कम करने का फैसला लिया था। दरअसल, ट्रम्प अमेरिकी सैनिकों को यूरोप से हटाकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शिफ्ट करना चाहते हैं ताकि चीन के खतरों से निपटा जा सके। अमेरिका के जर्मनी में सैन्य ठिकाने क्यों हैं? जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी 1945 से शुरू हुई, जब नाजी जर्मनी की हार के बाद अमेरिका ने वहां कब्जा कर लिया था। दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद वहां करीब 16 लाख अमेरिकी सैनिक तैनात थे, हालांकि 1 साल के बाद वहां 3 लाख सैनिक रह गए। शुरुआत में उनका काम जर्मनी के अमेरिकी कंट्रोल वाले हिस्से को संभालना और नाजीकरण खत्म करना था। लेकिन बाद में शीत युद्ध शुरू होने के साथ ही अमेरिका का मकसद बदल गया और जर्मनी को सोवियत संघ के खिलाफ एक मजबूत रक्षा दीवार बनाया गया। 1949 में नाटो बनने के बाद, अमेरिका के ये सैन्य ठिकाने स्थायी हो गए। इनका मकसद पश्चिम जर्मनी को मजबूत बनाना और सोवियत संघ के मुकाबले में खड़ा करना था। शीत युद्ध के समय जर्मनी में अमेरिका के करीब 50 बड़े सैन्य बेस और 800 से ज्यादा छोटे ठिकाने थे। उस समय वहां 2.5 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात रहते थे, और कई जगहों पर तो पूरी की पूरी अमेरिकी बस्तियां बस गई थीं, जहां सैनिकों के परिवार के लोग रहते थे। सोवियत संघ कमजोर हुआ तो सैनिक लौटे 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और 1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद अमेरिका ने अपनी मौजूदगी काफी कम कर दी, लेकिन पूरी तरह हटाई नहीं। आज की स्थिति में, यूरोप में अमेरिका के करीब 68,000 सैनिक तैनात हैं, जिनमें से लगभग 36,400 सिर्फ जर्मनी में हैं। ये सैनिक 20 से 40 अलग-अलग बेस में फैले हुए हैं। स्टुटगार्ट में यूरोप और अफ्रीका के लिए अमेरिकी कमांड हेडक्वार्टर है, जहां से पूरे क्षेत्र में सैन्य ऑपरेशन कंट्रोल होते हैं। यूरोप में अमेरिकी सेना के सात में से पांच स्थाई ठिकाने जर्मनी में ही हैं, बाकी बेल्जियम और इटली में हैं। जर्मनी के सबसे बड़े ठिकानों में रामस्टीन एयर बेस शामिल है, जो यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का मुख्य केंद्र है और यहां करीब 8,500 सैनिक हैं। इसके अलावा ग्राफेनवोहर, विल्सेक और होहेनफेल्स यूरोप का सबसे बड़ा अमेरिकी ट्रेनिंग एरिया हैं। वीसबाडेन में अमेरिका आर्मी यूरोप और अफ्रीका का मुख्यालय है और लैंडस्टूल मेडिकल सेंटर अमेरिका का विदेश में सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल है। इन बेस का रोल अब पूरी तरह बदल चुका है। पहले ये सोवियत खतरे को रोकने के लिए थे, लेकिन अब ये अमेरिका के लिए ‘लॉन्चिंग पैड’ और लॉजिस्टिक हब बन गए हैं। यहीं से अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान और हाल ही में ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों को चलाया और सपोर्ट किया। असल में समझौता ऐसा है कि अमेरिका यूरोप की सुरक्षा में मदद करता है और बदले में यूरोप उसे ऐसा इन्फ्रास्ट्रक्चर देता है जिससे वह दुनिया भर में अपने सैन्य अभियान चला सके। इसलिए यह सिर्फ ‘यूरोप की मदद’ नहीं, बल्कि अमेरिका की रणनीति का हिस्सा है। एक्सपर्ट्स- इस फैसले से नाटो की एकता कमजोर हो सकती है सुरक्षा एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका जर्मनी से अपने सैनिक हटाता है तो इसके बड़े असर हो सकते हैं। इससे नाटो की एकता कमजोर पड़ सकती है, खासकर ऐसे वक्त में जब दुनिया में पहले ही तनाव बढ़ा हुआ है। साथ ही इससे ये संदेश जा सकता है कि अमेरिका अब यूरोप की सुरक्षा को लेकर उतना गंभीर नहीं है, जिसका फायदा रूस जैसे देश उठा सकते हैं। अमेरिकी संसद में भी इस फैसले की आलोचना हो रही है। कई नेताओं ने इसे लापरवाही भरा बताया है और कहा है कि इससे यूरोप में अमेरिका की पकड़ कमजोर हो सकती है। सीनेटर जैक रीड ने कहा कि यह कदम दिखाता है कि अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ कमिटमेंट को राष्ट्रपति के मूड के हिसाब से बदल रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह फैसला नहीं रोका गया, तो इससे रिश्तों और देश की सुरक्षा पर लंबे समय तक बुरा असर पड़ सकता है। वहीं, रक्षा विशेषज्ञ ब्रैडली बोमन का कहना है कि जर्मनी और यूरोप में अमेरिकी सेना की मौजूदगी सिर्फ रूस को रोकने में मदद नहीं करती, बल्कि इससे अमेरिका को भूमध्यसागर, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका जैसे इलाकों में अपनी सैन्य ताकत जल्दी पहुंचाने में भी मदद मिलती है। इसके अलावा, एक बड़ा ऑपरेशनल मुद्दा भी है। जर्मनी में मौजूद अमेरिकी बेस, लॉजिस्टिक्स (सप्लाई सिस्टम), इंटेलिजेंस और दुनिया में कहीं भी तुरंत सैनिक भेजने की क्षमता के लिए बेहद अहम माने जाते हैं। ————————- ये खबर भी पढ़ें… मुजतबा खामेनेई का चेहरा-होंठ जला, प्लास्टिक सर्जरी की जरूरत:पैर काटने की नौबत, नकली पैर लगेगा; अब ईरान को सेना के जनरल चला रहे 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान में मुजतबा खामेनेई के पिता (अयातुल्ला अली खामेनेई) के ठिकाने पर हमला किया था, तब से वह छिपकर रह रहे हैं। उसी हमले में अयातुल्ला खामेनेई, पत्नी और बेटे की मौत हो गई। मुजतबा खुद भी घायल हो गए और अब डॉक्टरों की एक टीम उनकी देखभाल कर रही है। उनसे मिलना बहुत मुश्किल है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.