Wednesday, 23 Sep 2026 | 11:44 AM

Trending :

EXCLUSIVE

कफन साथ लेकर चलते हैं सिंगर अली अली:लाइव कॉन्सर्ट में भावुक होकर कहा- जहां मरूं, वहीं जाने देना, मैंने मौत को स्वीकार कर लिया है

कफन साथ लेकर चलते हैं सिंगर अली अली:लाइव कॉन्सर्ट में भावुक होकर कहा- जहां मरूं, वहीं जाने देना, मैंने मौत को स्वीकार कर लिया है

सिंगर लकी अली हाल ही में लाइव परफॉर्मेंस के दौरान मौत पर बात करते हुए भावुक हो गए। 67 साल के लकी अली ने बताया कि वह मौत के लिए तैयार रहते हैं और सफर के दौरान अपना कफन का कपड़ा साथ रखते हैं। ऑडियंस से बातचीत के दौरान लकी अली ने भावुक होकर कहा, “मुझे पता है, मैं भी आप सभी से प्यार करता हूं। एक दिन हम सभी को जाना है। मैं आपको इसके लिए तैयार नहीं कर रहा, लेकिन मैं खुद तैयार हूं। जब भी मैं सफर करता हूं, अपना इहराम साथ लेकर चलता हूं, जो मेरा कफन है। मैं जहां भी मरूं, मुझे वहीं से जाने देना।” वीडियो देख भावुक हुए फैंस लकी अली ने ऑफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट से कॉन्सर्ट का ये वीडियो शेयर किया। इसके बाद फैंस ने कमेंट सेक्शन में उनके लिए प्यार और चिंता जाहिर की। लकी अली अपनी अलग आवाज और मशहूर गानों के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने कई बॉलीवुड फिल्मों के लिए अपनी आवाज दी। इनमें ‘कहो ना… प्यार है’, ‘युवा’, ‘बचना ऐ हसीनो’, ‘अंजाना अंजानी’ और ‘तमाशा’ शामिल हैं। 2015 में बॉलीवुड से लिया संन्यास, कहा- मेरे साथ गलत व्यवहार हुआ पिछले साल नवभारत टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “एक समय था, जब मैं फिल्मों में अभिनय करता था और गाने गाता था, लेकिन बाद में मुझे समझ नहीं आया कि आगे क्या करना है। मैं अपने अंदाज में गाना चाहता था। आजादी की इसी तलाश से ‘ओ सनम’ बना।” उन्होंने आगे कहा, “2015 में मैंने इंडस्ट्री से दूरी बना ली। लोगों ने मेरे साथ गलत व्यवहार किया था, लेकिन मैं उनकी नकारात्मकता की वजह से दूर नहीं हुआ। मुझे एक जैसी चीजों से ऊब हो गई थी। पिता की मौत के बाद मुझे लगा कि वहां मेरे लिए कुछ नहीं बचा है। मेरे दोस्त भी नहीं थे।” तीन शादियां कर चुके हैं लकी अली लकी अली की तीन शादियां हुई हैं। उनकी पहली शादी मेगन जेन मैक्लियरी से हुई थी। दोनों के दो बच्चे हैं। इसके बाद उन्होंने ईरान की रहने वाली इनाया से शादी की। दोनों के भी दो बच्चे हैं। 2010 में लकी अली ने ब्रिटिश मॉडल और पूर्व ब्यूटी क्वीन केट एलिजाबेथ हॉलम से शादी की। दोनों का एक बेटा है। 2017 में उनका तलाक हो गया। अपनी शादियों और रिश्तों के बारे में लकी अली ने पहले कहा था, “आपको एक ही साथी के साथ जिंदगी शुरू और खत्म करने की जरूरत नहीं है। मैंने तीन शादियां कीं और हर बार अलग देश में कीं। हर स्थिति अलग थी।” उन्होंने कहा, “मेरे पिता (महमूद) ने भी भारत से बाहर शादी की थी, इसलिए हमारे घर का माहौल काफी ग्लोबल था। मेरी कोई भी शादी नहीं चली, लेकिन मेरे सभी रिश्ते आज भी कायम हैं।” लकी अली ने आगे कहा, “हम साथ नहीं रहते, लेकिन हमेशा एक-दूसरे के लिए मौजूद रहते हैं। मैं हमेशा अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदार रहा हूं। मेरा मानना है कि बच्चों की परवरिश का सही तरीका सिर्फ प्यार है। बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं।”

ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

भारतीय ब्रांड्स ने जेन जी यानी 14 से 29 साल तक की युवा पीढ़ी की भाषा और सौंदर्यबोध अपनाने में महारत हासिल कर ली है। नायका और स्विगी इंस्टामार्ट ने हाल ही में ‘गंजी चुड़ैल’ जैसे ट्रेंड भुनाए, टिंडर ने ‘सिचुएशनशिप’ और ‘मेन-कैरेक्टर एनर्जी’ जैसे शब्द अपनाए, तो फास्ट्रैक ने ‘यू डू यू’ कैंपेन के जरिए फ्लुइड पहचान का जश्न मनाया। लेकिन जब परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आंदोलन के तहत जेन जी सड़कों पर उतरी तो ब्रांड्स की जुड़ाव वाली यह छवि गायब हो गई। दरअसल, आज ब्रांड्स सिर्फ युवा संस्कृति के सौंदर्यबोध को उधार लेकर उनकी वास्तविक चिंताओं से दूर नहीं रह सकते, जैसा कि पेप्सी ने 1960 के दशक में ‘पेप्सी जनरेशन’ कैंपेन के जरिए किया था। इसके उलट, नाइकी ने ‘कॉलिन कैपरनिक’ कैंपेन के जरिए नस्ली न्याय के मुद्दे पर लगातार फोकस करके करीब 1,550 करोड़ रुपए की मीडिया वैल्यू और बिक्री में तगड़ी बढ़त हासिल की। लेकिन बात और काम के बीच तालमेल न हो तो नुकसान भी होता है। कोविड के दौर में मैकडॉनल्ड्स के बयान और कंपनी के भीतर अश्वेत कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़े आरोपों के बीच अंतर इसकी मिसाल है। बहरहाल, सीजेपी आंदोलन ने दिखाया कि भारतीय जेन जी 37.7 करोड़ की आबादी और करीब 81 लाख करोड़ रुपए खर्च करने क्षमता के साथ अपनी आर्थिक ताकत अच्छी तरह पहचानती है। प्रदर्शनकारियों ने हास्य, ‘गेट रेडी विद मी’ वीडियो और पुलिस हिंसा के फुटेज को गेमिंग इमेजरी के साथ जोड़कर पूरी स्क्रिप्ट खुद लिखी। इस ब्रीच कई मौकों पर युवाओं को जोड़ने के ब्रांड्स के दांव सही नहीं बैठे। जुलाई में वाडीलाल का ‘वर्ल्ड आइसक्रीम डे’ कैंपेन जिसमें नीट टॉपर्स की तस्वीरों में डिजिटल मुस्कान जोड़ी गई। सीजेपी आंदोलन के बीच आने पर यह आलोचनाओं में घिर गया। इसके उलट स्टेफ्री ने प्रदर्शनकारियों द्वारा गढ़े गए नारे ‘एट लीस्ट द पैड्स डोंट लीक’ को अपने चैनल पर बढ़ावा देने का मौका गंवा दिया। करवी और फॉस्टो जैसे ब्रांड्स ने प्रचार गतिविधियां रोककर सांकेतिक एकजुटता दिखाई। ब्लू टोकाई के जनपथ आउटलेट ने पुलिस हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों को शरण दी, जबकि ट्रैक ने कर्मचारियों को प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से न रोकने की बात कही। ब्रांड्स एक्सपर्ट स्वाति शर्मा का कहना है कि बाजार का गणित अब यह नहीं रह गया कि आलोचना होगी या नहीं, बल्कि यह है कि ब्रांड लंबी अवधि की विश्वसनीयता के लिए फौरी विवाद झेलने के लिए तैयार है या नहीं। स्ट्रीटवियर ब्रांड मैनलिक के संस्थापक प्रीतम कुदेव ने कहा, ‘यदि युवा अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर हैं, तो हम कम से कम उनके साथ खड़ा तो हो सकते थे।’ भारतीय कंपनियों के सामने पश्चिमी ब्रांड्स से अलग चुनौती, पक्षपाती दिखने का खतरा शर्मा का कहना है कि ब्रांड्स के सामने राजनीतिक रूप से पक्षपाती दिखने का खतरा मंडराता रहता है। 2020 में आए तनिष्क के विज्ञापन को ही ले लीजिए। उसमें एक विशेष धर्म को मानने वाली सास अन्य धर्म की बहू की गोदभराई कराती दिखी थी। ‘बायकॉट तनिष्क’ ट्रेंड के बाद उसे वापस लेना पड़ा। हालांकि सर्फ एक्सेल ने इसी तरह के बहिष्कार के बावजूद विज्ञापन नहीं हटाया, जिसे एक करोड़ से ज्यादा बार देखा गया।

ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

भारतीय ब्रांड्स ने जेन जी यानी 14 से 29 साल तक की युवा पीढ़ी की भाषा और सौंदर्यबोध अपनाने में महारत हासिल कर ली है। नायका और स्विगी इंस्टामार्ट ने हाल ही में ‘गंजी चुड़ैल’ जैसे ट्रेंड भुनाए, टिंडर ने ‘सिचुएशनशिप’ और ‘मेन-कैरेक्टर एनर्जी’ जैसे शब्द अपनाए, तो फास्ट्रैक ने ‘यू डू यू’ कैंपेन के जरिए फ्लुइड पहचान का जश्न मनाया। लेकिन जब परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आंदोलन के तहत जेन जी सड़कों पर उतरी तो ब्रांड्स की जुड़ाव वाली यह छवि गायब हो गई। दरअसल, आज ब्रांड्स सिर्फ युवा संस्कृति के सौंदर्यबोध को उधार लेकर उनकी वास्तविक चिंताओं से दूर नहीं रह सकते, जैसा कि पेप्सी ने 1960 के दशक में ‘पेप्सी जनरेशन’ कैंपेन के जरिए किया था। इसके उलट, नाइकी ने ‘कॉलिन कैपरनिक’ कैंपेन के जरिए नस्ली न्याय के मुद्दे पर लगातार फोकस करके करीब 1,550 करोड़ रुपए की मीडिया वैल्यू और बिक्री में तगड़ी बढ़त हासिल की। लेकिन बात और काम के बीच तालमेल न हो तो नुकसान भी होता है। कोविड के दौर में मैकडॉनल्ड्स के बयान और कंपनी के भीतर अश्वेत कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़े आरोपों के बीच अंतर इसकी मिसाल है। बहरहाल, सीजेपी आंदोलन ने दिखाया कि भारतीय जेन जी 37.7 करोड़ की आबादी और करीब 81 लाख करोड़ रुपए खर्च करने क्षमता के साथ अपनी आर्थिक ताकत अच्छी तरह पहचानती है। प्रदर्शनकारियों ने हास्य, ‘गेट रेडी विद मी’ वीडियो और पुलिस हिंसा के फुटेज को गेमिंग इमेजरी के साथ जोड़कर पूरी स्क्रिप्ट खुद लिखी। इस ब्रीच कई मौकों पर युवाओं को जोड़ने के ब्रांड्स के दांव सही नहीं बैठे। जुलाई में वाडीलाल का ‘वर्ल्ड आइसक्रीम डे’ कैंपेन जिसमें नीट टॉपर्स की तस्वीरों में डिजिटल मुस्कान जोड़ी गई। सीजेपी आंदोलन के बीच आने पर यह आलोचनाओं में घिर गया। इसके उलट स्टेफ्री ने प्रदर्शनकारियों द्वारा गढ़े गए नारे ‘एट लीस्ट द पैड्स डोंट लीक’ को अपने चैनल पर बढ़ावा देने का मौका गंवा दिया। करवी और फॉस्टो जैसे ब्रांड्स ने प्रचार गतिविधियां रोककर सांकेतिक एकजुटता दिखाई। ब्लू टोकाई के जनपथ आउटलेट ने पुलिस हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों को शरण दी, जबकि ट्रैक ने कर्मचारियों को प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से न रोकने की बात कही। ब्रांड्स एक्सपर्ट स्वाति शर्मा का कहना है कि बाजार का गणित अब यह नहीं रह गया कि आलोचना होगी या नहीं, बल्कि यह है कि ब्रांड लंबी अवधि की विश्वसनीयता के लिए फौरी विवाद झेलने के लिए तैयार है या नहीं। स्ट्रीटवियर ब्रांड मैनलिक के संस्थापक प्रीतम कुदेव ने कहा, ‘यदि युवा अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर हैं, तो हम कम से कम उनके साथ खड़ा तो हो सकते थे।’ भारतीय कंपनियों के सामने पश्चिमी ब्रांड्स से अलग चुनौती, पक्षपाती दिखने का खतरा शर्मा का कहना है कि ब्रांड्स के सामने राजनीतिक रूप से पक्षपाती दिखने का खतरा मंडराता रहता है। 2020 में आए तनिष्क के विज्ञापन को ही ले लीजिए। उसमें एक विशेष धर्म को मानने वाली सास अन्य धर्म की बहू की गोदभराई कराती दिखी थी। ‘बायकॉट तनिष्क’ ट्रेंड के बाद उसे वापस लेना पड़ा। हालांकि सर्फ एक्सेल ने इसी तरह के बहिष्कार के बावजूद विज्ञापन नहीं हटाया, जिसे एक करोड़ से ज्यादा बार देखा गया।

कामयाबी के लिए अपनों को बदनाम गलत:पत्नी सुनीता के अफेयर के आरोपों पर गोविंदा बोले- दूरी बनाने के लिए बुराई करना जरूरी नहीं

कामयाबी के लिए अपनों को बदनाम गलत:पत्नी सुनीता के अफेयर के आरोपों पर गोविंदा बोले- दूरी बनाने के लिए बुराई करना जरूरी नहीं

गोविंदा ने पत्नी सुनीता आहूजा के उन आरोपों पर जवाब दिया है, जिनमें उन्होंने उनके कई अफेयर्स की बात कही थी। गोविंदा ने कहा कि सुनिता सार्वजनिक तौर पर उनके बारे में नकारात्मक बातें कर स्टारडम हासिल कर रही हैं। साथ ही एक्टर ने कहा कि क्या आपको कामयाबी के लिए दूसरों को बदनाम करना जरूरी है। ANI से बातचीत में सुनीता के कई लड़कियों से अफेयर के दावों पर गोविंदा ने कहा, “वह मुझे बहुत प्यार से गाली देती हैं और मैं उनके हाथ से खाता भी हूं। मुझे लगता है कि जो लोग जहां हैं और भगवान ने उन्हें जो भी भूमिका दी है, अगर वो वहां नहीं होते हम कामयाब नहीं हो सकते थे।” गोविंदा बोले- दूरी बनाने के लिए आरोप लगाना जरूरी नहीं गोविंदा ने इशारा किया कि उनके बारे में खुलकर बोलने के बाद सुनीता को स्टारडम मिला। उन्होंने कहा, “बहुत सी बातें ऐसी होती हैं, जो बयां नहीं की जातीं। क्या दूरी बनाने के लिए आरोप लगाने की जरूरत है क्या? लेकिन लोग मानते हैं कि ये निकलने का आसान रास्ता है।” उन्होंने सवाल किया, “कामयाबी के लिए अपने ही लोगों की बुराई जरूरी है क्या? यह थोड़ा आसान है। सुनीता तारीफ करती है फिर एक बुराई करती है। मुझे इसमें ज्यादा प्यार दिखाई देता है।” सुनीता ने कहा था- गोविंदा के कई अफेयर्स रहे सुनीता आहूजा हाल ही में ‘लॉक अप 2’ की कंटेस्टेंट बनी थीं। शो के दौरान उन्होंने गोविंदा के कथित अफेयर्स पर बात की थी। उन्होंने कहा था, “प्यार में आपको हर चीज सहन करने में सक्षम होना चाहिए। चीची (गोविंदा) के जवानी में कई अफेयर्स रहे हैं। तब मैंने नजरअंदाज किया था, लेकिन अब नहीं करूंगी। एक्ट्रेस कोमल के साथ स्पॉट हुए गोविंदा, सुनीता ने कहा था- कोमल से नफरत है सुनीता आहूजा कई मौकों पर गोविंदा पर एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर और धोखा देने के आरोप लगा चुकी हैं। अफेयर रूमर्स के बीच गोविंदा एक्ट्रेस कोमल रानी स्वर्णकर के साथ एयरपोर्ट पर स्पॉट किए गए हैं, जिनका नाम उनकी पत्नी सुनीता भी ले चुकी हैं। सुनीता ने कुछ समय पहले ही कहा था कि उन्हें कोमल नाम से नफरत है। सुनीता ने धोखा देने के आरोप लगाकर कहा था, मुझे कोमल नाम से नफरत है कुछ समय पहले ही सुनीता ने मिस मालिनी को दिए इंटरव्यू में गोविंदा के अफेयर रूमर्स पर बात करते हुए कहा कि जवानी में गलतियां होती हैं, लेकिन 63 की उम्र में ये सब सुनना ठीक नहीं है। जब इंटरव्यूअर ने बताया कि उनका नाम कोमल है, तो सुनीता ने कहा, ‘ये नाम थोड़ा गड़बड़ है। मुझे कोमल नाम से नफरत है। एक है कोमल, एक्स वाय जेड है कोई। मुझे उससे नफरत है।’ गोविंदा के साथ बॉलीवुड डेब्यू करने वाली हैं कोमल गोविंदा 7 साल बाद बॉलीवुड कमबैक कर रहे हैं और अपने प्रोडक्शन की इस फिल्म से कोमल को भी लॉन्च कर रहे हैं। सिर्फ यही नहीं कोमल के गोविंदा की दूसरी फिल्म दुनियादारी में होने की भी खबरें हैं। गोविंदा ने जुलाई में अपकमिंग फिल्म रूपा से जुड़ी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोमल का मीडिया से परिचय करवाया और तारीफ कर कहा कि फिल्म देखने के बाद दर्शक उन्हें अच्छी एक्ट्रेस मानेंगे। सुनीता ने कहा- नई लड़कियों को शुगर डैडी चाहिए होता है, शक्ल होती नहीं इसी इंटरव्यू में सुनीता ने कहा था, ‘आजकल की जो लड़कियां आती है ना स्ट्रगल करने के लिए दे नीड अ शुगर डैडी जिसका जो उनका खर्चा चलाए। शकल दो कौड़ी की होती है, लेकिन हीरोइन बनना होता है। फिर क्या करती हैं फंसा लेती हैं, ब्लैकमेल करती हैं। ऐसी लड़कियां बहुत आती हैं, लेकिन तुम (गोविंदा) थोड़ी बेवकूफ हो, 63 के हो, सुंदर बीवी है, बच्चे हैं। तुम इस उम्र में ये सब नहीं कर सकते। जवानी में सब गलती करते हैं, लेकिन इस उम्र में नहीं।’ 1987 में हुई थी गोविंदा और सुनिता की शादी गोविंदा और सुनिता आहूजा ने 1987 में एक प्राइवेट समारोह में शादी की थी। उस समय गोविंदा बॉलीवुड स्टार बन चुके थे। दोनों ने गोविंदा के करियर को बचाने के लिए करीब दो साल तक अपनी शादी की बात छिपाकर रखी। बेटी टीना आहूजा के जन्म के बाद उन्होंने शादी को सार्वजनिक किया था। इसके बाद दोनों के बेटे यशवर्धन आहूजा का जन्म हुआ।

विदेशी डिग्री का क्रेज खत्म,घर लौटे 52 लाख चीनी छात्र:कम हुआ विदेश जाने का रुझान; पिछले साल 94% छात्र स्वदेश लौटे

विदेशी डिग्री का क्रेज खत्म,घर लौटे 52 लाख चीनी छात्र:कम हुआ विदेश जाने का रुझान; पिछले साल 94% छात्र स्वदेश लौटे

चीन में विदेश जाकर पढ़ाई करने का चलन तेजी से कम हो रहा है। माता-पिता मानते हैं कि देश के अपने विश्वविद्यालय अब पहले से बेहतर हो गए हैं। इसलिए भारी खर्च करके विदेश जाने का फायदा कम दिखता है। इसी वजह से 2019 में जहां 7 लाख छात्र विदेश पढ़ने गए थे, 2025 में यह संख्या घटकर करीब 5.7 लाख रह गई। दूसरी ओर विदेश से पढ़ाई पूरी करके चीन लौटने वालों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। 2025 में विदेश में रुकने के बजाय करीब 94% छात्र वापस लौट आए। 10 साल में कुल 52 लाख ग्रेजुएट लौट चुके हैं। न्यू ओरिएंटल के आंकड़ों के मुताबिक, विदेश से लौटने वाले छात्रों की शुरुआती सैलरी औसतन करीब 1.80 लाख रुपए प्रति महीना है। वहीं, देश में ही पढ़ाई करने वालों की औसत सैलरी करीब 1 लाख रुपए है। हालांकि हालात ऐसे हैं कि कई विदेश-पढ़े युवाओं को इससे भी कम कमाई मिल रही है और गुजारे के लिए डिलीवरी जैसे काम करने पड़ रहे हैं। विदेशी डिग्री का फायदा घटा,कंपनियों का नजरिया बदला कई कंपनियां अब विदेशी डिग्री को पहले जैसी तरजीह नहीं देतीं। विदेश की पढ़ाई के कोर्स की समय सीमों कम होना और आसान दाखिले के कारण कुछ एचआर इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं। जैसे चीन में पोस्ट ग्रेजुएशन तीन साल का होता है। वहीं ब्रिटेन और अमेरिका में एक साल का। सरकारी नौकरियों में भी विदेश से पढ़े युवाओं के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं। शिक्षा पर खर्च बढ़ा तो परिवारों ने बजट घटाया विदेश में पढ़ाई का खर्च तेजी से बढ़ा है। सर्वे के मुताबिक, 2025 में विदेश पढ़ाई का औसत खर्च बढ़कर 85 लाख रुपए हो गया है। यह 2023 के मुकाबले करीब 20% ज्यादा है। इसलिए जो छात्र अब भी बाहर जा रहे हैं, वे ऐसे देश चुन रहे हैं जहां पैसा वसूल हो सके। चीन की यूनिवर्सिटीज मजबूत, फीस कम चीन के विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में सुधार हुआ है। वर्ल्ड रैंकिंग में पेकिंग और त्सिंगहुआ यूनिवर्सिटी अब 13वें और 14वें नंबर पर हैं। देश के ‘985’ और ‘211’ समूह के कॉलेज कई विदेशी संस्थानों से बेहतर माने जा रहे हैं। सरकारी यूनिवर्सिटी की सालाना फीस विदेशों के से बहुत कम है।

26/11 हमले से जुड़े लश्कर आतंकी अब्दुल-अजीज की मौत:इस्लामाबाद में मस्जिद के बाहर अचानक गिरा; मौत की वजह साफ नहीं

26/11 हमले से जुड़े लश्कर आतंकी अब्दुल-अजीज की मौत:इस्लामाबाद में मस्जिद के बाहर अचानक गिरा; मौत की वजह साफ नहीं

26/11 मुंबई आतंकी हमले से जुड़े लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी कारी सईद अब्दुल-अजीज की पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में मौत हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह कुबा मस्जिद के बाहर अचानक गिर पड़ा, जिसके बाद उसकी मौत हो गई। बताया जा रहा है कि मस्जिद पहुंचने से पहले अजीज ने एक रेस्टोरेंट में खाना खाया था। इसके बाद नमाज के लिए पहुंचने पर वह अचानक गिर पड़ा। मौत की वजह अभी स्पष्ट नहीं है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने भी घटना की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। अजीज पर 26 नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की साजिश में शामिल होने का आरोप था। हमले में लश्कर के 10 आतंकियों ने मुंबई के कई ठिकानों को निशाना बनाया था। इसमें 166 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। उस पर लश्कर की एक यूनिट संभालने का भी आरोप था, जो आतंकियों के बीच कम्युनिकेशन और जम्मू-कश्मीर में मारे गए लश्कर आतंकियों के परिवारों को आर्थिक मदद से जुड़े काम देखती थी। पाकिस्तान में लश्कर आतंकियों की रहस्यमय मौतों का सिलसिला जारी अजीज की मौत ऐसे समय हुई है, जब पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कई आतंकियों और ऑपरेटिव्स की रहस्यमय तरीके से हत्या की खबरें सामने आती रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अलग-अलग घटनाओं में 30 से 40 लश्कर ऑपरेटिव्स मारे जा चुके हैं। हालांकि, इन घटनाओं और अजीज की मौत के बीच कोई सीधा संबंध होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल यह भी साफ नहीं है कि अजीज की मौत बीमारी या किसी दूसरे कारण से हुई। मामले में पाकिस्तानी अधिकारियों की आधिकारिक जानकारी का इंतजार है। 26/11 हमले की पूरी टाइमलाइन 26 नवंबर 2008 की रात समुद्र के रास्ते आए 10 लश्कर-ए-तैयबा आतंकियों ने मुंबई में कई जगहों पर हमला किया। CST, ताज होटल, ओबेरॉय-ट्राइडेंट और नरीमन हाउस मुख्य निशाने थे। 29 नवंबर की सुबह ताज होटल में आखिरी आतंकियों के मारे जाने के साथ ऑपरेशन खत्म हुआ। बॉम्बे हाईकोर्ट के मुताबिक, हमले में 166 लोगों की मौत और 238 लोग घायल हुए थे। 26 नवंबर | हमले की शुरुआत CST के बाद पुलिस पर हमला 27 नवंबर | कमांडो ऑपरेशन शुरू 28 नवंबर | दो जगह ऑपरेशन खत्म 29 नवंबर | ताज में आखिरी ऑपरेशन 10 आतंकियों का क्या हुआ? 9 आतंकी मारे गए | 1 आतंकी अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया। जांच और अदालत की कार्रवाई में सामने आया कि हमले के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का नेटवर्क था। लश्कर का आतंकी नेटवर्क कैसे काम करता है लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन का नेटवर्क केवल हमले करने वाले आतंकियों तक सीमित नहीं होता। इसके पीछे भर्ती, ट्रेनिंग, कम्युनिकेशन, फंडिंग और संगठन से जुड़े लोगों के परिवारों की मदद जैसे अलग-अलग काम संभालने वाले नेटवर्क होते हैं।

26/11 हमले से जुड़े लश्कर आतंकी अब्दुल-अजीज की मौत:इस्लामाबाद में मस्जिद के बाहर अचानक गिरा; रेस्टोरेंट में खाना खाया था

26/11 हमले से जुड़े लश्कर आतंकी अब्दुल-अजीज की मौत:इस्लामाबाद में मस्जिद के बाहर अचानक गिरा; मौत की वजह साफ नहीं

26/11 मुंबई आतंकी हमले से जुड़े लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी कारी सईद अब्दुल-अजीज की पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में मौत हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह कुबा मस्जिद के बाहर अचानक गिर पड़ा, जिसके बाद उसकी मौत हो गई। बताया जा रहा है कि मस्जिद पहुंचने से पहले अजीज ने एक रेस्टोरेंट में खाना खाया था। इसके बाद नमाज के लिए पहुंचने पर वह अचानक गिर पड़ा। मौत की वजह अभी स्पष्ट नहीं है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने भी घटना की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। अजीज पर 26 नवंबर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की साजिश में शामिल होने का आरोप था। हमले में लश्कर के 10 आतंकियों ने मुंबई के कई ठिकानों को निशाना बनाया था। इसमें 166 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। उस पर लश्कर की एक यूनिट संभालने का भी आरोप था, जो आतंकियों के बीच कम्युनिकेशन और जम्मू-कश्मीर में मारे गए लश्कर आतंकियों के परिवारों को आर्थिक मदद से जुड़े काम देखती थी। पाकिस्तान में लश्कर आतंकियों की रहस्यमय मौतों का सिलसिला जारी अजीज की मौत ऐसे समय हुई है, जब पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े कई आतंकियों और ऑपरेटिव्स की रहस्यमय तरीके से हत्या की खबरें सामने आती रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अलग-अलग घटनाओं में 30 से 40 लश्कर ऑपरेटिव्स मारे जा चुके हैं। हालांकि, इन घटनाओं और अजीज की मौत के बीच कोई सीधा संबंध होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। फिलहाल यह भी साफ नहीं है कि अजीज की मौत बीमारी या किसी दूसरे कारण से हुई। मामले में पाकिस्तानी अधिकारियों की आधिकारिक जानकारी का इंतजार है। 26/11 हमले की पूरी टाइमलाइन 26 नवंबर 2008 की रात समुद्र के रास्ते आए 10 लश्कर-ए-तैयबा आतंकियों ने मुंबई में कई जगहों पर हमला किया। CST, ताज होटल, ओबेरॉय-ट्राइडेंट और नरीमन हाउस मुख्य निशाने थे। 29 नवंबर की सुबह ताज होटल में आखिरी आतंकियों के मारे जाने के साथ ऑपरेशन खत्म हुआ। बॉम्बे हाईकोर्ट के मुताबिक, हमले में 166 लोगों की मौत और 238 लोग घायल हुए थे। 26 नवंबर | हमले की शुरुआत CST के बाद पुलिस पर हमला 27 नवंबर | कमांडो ऑपरेशन शुरू 28 नवंबर | दो जगह ऑपरेशन खत्म 29 नवंबर | ताज में आखिरी ऑपरेशन 10 आतंकियों का क्या हुआ? 9 आतंकी मारे गए | 1 आतंकी अजमल कसाब जिंदा पकड़ा गया। जांच और अदालत की कार्रवाई में सामने आया कि हमले के पीछे लश्कर-ए-तैयबा का नेटवर्क था। लश्कर का आतंकी नेटवर्क कैसे काम करता है लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन का नेटवर्क केवल हमले करने वाले आतंकियों तक सीमित नहीं होता। इसके पीछे भर्ती, ट्रेनिंग, कम्युनिकेशन, फंडिंग और संगठन से जुड़े लोगों के परिवारों की मदद जैसे अलग-अलग काम संभालने वाले नेटवर्क होते हैं।

एक्ट्रेस बोलीं-रानियां हैवी ज्वेलरी पहनती थीं,मेरे लिए आसान नहीं था:राजस्थानी ट्रेडिशनल ड्रेस पहनकर लगा, जैसे मैं भंसाली की फिल्म से निकलकर आई हूं

एक्ट्रेस बोलीं-रानियां हैवी ज्वेलरी पहनती थीं,मेरे लिए आसान नहीं था:राजस्थानी ट्रेडिशनल ड्रेस पहनकर लगा, जैसे मैं भंसाली की फिल्म से निकलकर आई हूं

जयपुर कॉट्योर शो सीजन-14 के दूसरे दिन बॉलीवुड अभिनेत्री संदीपा धर ने ज्वेलरी डिजाइनर हुकुम सिंह के लिए शोस्टॉपर के रूप में रैंप वॉक किया। इस दौरान अभिनेत्री ने पारंपरिक राजस्थानी पोशाक के साथ बेहद खूबसूरत और भारी पारंपरिक ज्वेलरी पहनी थी। रैंप वॉक के बाद अपने अनुभव साझा करते हुए संदीपा धर ने कहा- “इस पहनावे और ज्वेलरी को पहनकर वे खुद को एक रानी की तरह महसूस कर रही हैं। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे वे किसी राजमहल में हैं और वह महल उनका अपना ही है। संदीपा धर ने अपने राजस्थानी लुक को लेकर कहा कि मैं बता नहीं सकती कि मैं इस पहनावे को लेकर कितनी एक्साइटेड हूं। यह पोशाक और इतनी खूबसूरत ज्वेलरी पहनकर मैं अपनी खुशी शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। मैं एक रानी की तरह महसूस कर रही हूं। ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी राजमहल में हूं और वह मेरा ही महल है। ‘ऐसा लग रहा है जैसे भंसाली की फिल्म से निकलकर आई हूं’ शिव ज्वेलर्स के हुकुम सिंह का आभार जताते हुए कहा कि उन्हें राजस्थान की संस्कृति का हिस्सा बनने और इस तरह की पारंपरिक पोशाक व ज्वेलरी पहनने का अवसर मिला, यह उनके लिए खास अनुभव है। संदीपा ने कहा कि एक लड़की के तौर पर मुझे लगता है कि इस तरह तैयार होना हर लड़की का सपना होता है। आज मुझे लग रहा है कि मैं सीधे किसी संजय लीला भंसाली की फिल्म से निकलकर आई हूं। आसान नहीं है ऐसी ज्वैलरी पहनना राजस्थान की रानियों की ओर से पहनी जाने वाली भारी ज्वेलरी और पारंपरिक परिधानों को लेकर भी संदीपा ने दिलचस्प अंदाज में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि इतनी भारी ज्वेलरी पहनने के बाद शरीर और व्यक्तित्व में एक अलग तरह का ठहराव और ग्रेस आ जाता है। उन्होंने कहा कि शायद इसी वजह से उस समय की रानियां इतनी ग्रेसफुल दिखाई देती थीं। इस तरह की पोशाक और हैवी ज्वेलरी पहनने के बाद एक ठहराव आ जाता है। मैं तो एक दिन पहनकर ही थक गई हूं, लेकिन उन महिलाओं को सलाम है जो रोजाना इतनी भारी ज्वेलरी और पोशाक पहनती थीं। संदीपा ने मजाकिया अंदाज में कहा कि वह सोचती हैं कि अगर उनका जन्म उस दौर में हुआ होता तो उन्हें रोज इस तरह तैयार होने का मौका मिलता। उन्होंने कहा कि महिलाएं किसी मायने में सुपर ह्यूमन होती हैं, जो इतनी भारी ज्वेलरी और परिधानों को भी सहजता से संभाल लेती थीं। तीन महीने बीकानेर में शूटिंग, राजस्थान से खास जुड़ाव संदीपा धर का राजस्थान से जुड़ाव हाल के समय में और गहरा हुआ है। उन्होंने बताया कि वह करीब तीन महीने बीकानेर में शूटिंग कर रही थीं और इस दौरान उनका जयपुर आना-जाना भी लगातार रहा। ऐसे में राजस्थान की संस्कृति, खान-पान और कला को करीब से समझने का मौका मिला। राजस्थान के खाने की तारीफ करते हुए संदीपा ने मजाकिया अंदाज में कहा कि यहां की थालियां खा-खाकर उनका वजन करीब पांच-छह किलो बढ़ गया है। हालांकि उन्होंने तुरंत यह भी कहा कि राजस्थान का खाना इतना शानदार है कि उसे छोड़ना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि राजस्थान से उनका जुड़ाव सिर्फ खाने तक सीमित नहीं है। यहां की कला, फाइन आर्ट, फर्नीचर, ज्वेलरी और पारंपरिक पोशाकें उन्हें बेहद प्रभावित करती हैं। संदीपा ने कहा कि राजस्थान की खासियत यह है कि यहां कला केवल संग्रहालयों या प्रदर्शनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हुई है। यहां के लोगों की प्रतिभा और पारंपरिक कला के प्रति जुड़ाव उन्हें बेहद खास लगता है। राजस्थान का आर्ट और कल्चर कमाल का है। चाहे फाइन आर्ट हो, फर्नीचर हो, ज्वेलरी हो या पोशाक, यहां हर चीज में कला दिखाई देती है। यहां के लोग बेहद प्रतिभाशाली हैं और यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि कला यहां लोगों की जिंदगी से इतनी गहराई से जुड़ी हुई है। 28 अगस्त को नेटफ्लिक्स पर नजर आएंगी संदीपा संदीपा धर ने बातचीत में अपने आगामी प्रोजेक्ट्स को लेकर भी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि उनका नया शो ‘चुंबक’ 28 अगस्त को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने जा रहा है। इस शो को लेकर वह काफी उत्साहित हैं। उन्होंने बताया कि ‘चुंबक’ के मेकर्स इससे पहले लोकप्रिय कॉमेडी शो ‘खिचड़ी’ और ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ से जुड़े रहे हैं। संदीपा इस प्रोजेक्ट के जरिए पहली बार कॉमेडी जॉनर में काम कर रही हैं। इस शो में अभिनेत्री नीना गुप्ता सहित कई प्रतिभाशाली कलाकार नजर आएंगे। संदीपा ने उनके साथ काम करने के अनुभव को भी शानदार बताया और दर्शकों से 28 अगस्त को शो देखने की अपील की।

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की हार के 65% चांस:हारे तो मनमानी पर रोक लगेगी, नवंबर में होनी है वोटिंग

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की हार के 65% चांस:हारे तो मनमानी पर रोक लगेगी, नवंबर में होनी है वोटिंग

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। इप्सॉस-एएपीआई सर्वे के मुताबिक, चुनाव में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के हारने की आशंका 65% तक है। नवंबर में मिडटर्म के लिए वोटिंग होनी है। मिडटर्म चुनाव ट्रम्प के चार साल के कार्यकाल के बीच होने वाला बड़ा राजनीतिक इम्तिहान है। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के साथ राज्यों और स्थानीय सरकारों के कई अहम पदों के लिए वोटिंग होगी। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के करीब 80% उम्मीदवार पहले ही तय हो चुके हैं। मिडटर्म में रिपब्लिकन पार्टी हारती है तो ट्रम्प राष्ट्रपति बने रहेंगे। लेकिन कांग्रेस में बहुमत खोने पर उनके फैसलों पर रोक-टोक बढ़ सकती है। टैरिफ, वीजा और दूसरे बड़े नीतिगत फैसलों को लागू करने में ट्रम्प को डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। कार्यकाल के बाकी दो साल में उन्हें कांग्रेस के साथ ज्यादा तालमेल बनाकर चलना होगा। मिडटर्म में ट्रम्प की तीन सबसे बड़ी चुनौती… महंगाई, इमिग्रेशन और ईरान युद्ध 1. महंगाई: ट्रम्प की आर्थिक रेटिंग 32% पर​ फिसल गई अमेरिकी वोटरों की सबसे बड़ी चिंता महंगाई है। इप्सोस सर्वे में 54% लोगों ने महंगाई और अर्थव्यवस्था को वोट का बड़ा मुद्दा बताया। वहीं, एपी-एनओआरसी सर्वे में सिर्फ 32% लोगों ने माना कि ट्रम्प अर्थव्यवस्था अच्छी तरह संभाल रहे हैं। 69% अमेरिकियों को मौजूदा आर्थिक हालात खराब लगते हैं। इप्सोस सर्वे में 65% लोगों ने कहा कि रोजमर्रा का किराना महंगा पड़ रहा है, जबकि 48% को डर है कि अगले साल आर्थिक हालात और खराब हो सकते हैं। ईरान युद्ध: 20% वोटरों के लिए बड़ा मुद्दा ईरान युद्ध अब सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं है। इसका असर सीधे अमेरिकी लोगों की जेब पर पड़ रहा है। इप्सोस सर्वे में 20% वोटरों ने ईरान युद्ध को वोट का अहम मुद्दा बताया। अगर जंग लंबी खिंची और तेल महंगा हुआ तो पेट्रोल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। यानी ट्रम्प के सामने चुनौती है ईरान पर सख्ती भी दिखानी है और अमेरिकी लोगों को महंगाई से राहत का भरोसा भी देना है। इमिग्रेशन: 61% अमेरिकी ट्रम्प की नीति से नाराज 2024 में इमिग्रेशन ट्रम्प की बड़ी ताकत था, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। हालिया सर्वे में 61% अमेरिकियों ने ट्रम्प की इमिग्रेशन नीति का विरोध किया, जबकि समर्थन सिर्फ 39% रहा। दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ट्रम्प की इस नीति को 49% लोगों का समर्थन था। रिपब्लिकन वोटरों में भी समर्थन घटकर 80% रह गया है। सख्त डिपोर्टेशन और इमिग्रेशन कार्रवाई के बीच बढ़ती नाराजगी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प के लिए बड़ा नुकसान बन सकती है। ट्रम्प पर महाभियोग का खतरा बढ़ेगा अगर रिपब्लिकन कांग्रेस में बहुमत खो देते हैं, तो ट्रम्प पर महाभियोग की कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है। डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में मजबूत होते हैं तो वे ट्रम्प के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। कांग्रेस के पास टैरिफ और इमिग्रेशन से जुड़े कानूनों पर बड़ा अधिकार है। वह ट्रम्प के फैसलों पर कानून बनाकर रोक लगा सकती है और वीजा नीति को भी चुनौती दे सकती है। ईरान युद्ध में भी कांग्रेस सैन्य कार्रवाई और युद्ध के लिए फंडिंग पर ट्रम्प पर दबाव बना सकती है। यानी कांग्रेस का बहुमत गया तो ट्रम्प की मनमानी पर लगाम लग सकती है।

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की हार के 65% चांस:हारे तो मनमानी पर रोक लगेगी, नवंबर में होनी है वोटिंग

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की हार के 65% चांस:हारे तो मनमानी पर रोक लगेगी, नवंबर में होनी है वोटिंग

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। इप्सॉस-एएपीआई सर्वे के मुताबिक, चुनाव में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के हारने की आशंका 65% तक है। नवंबर में मिडटर्म के लिए वोटिंग होनी है। मिडटर्म चुनाव ट्रम्प के चार साल के कार्यकाल के बीच होने वाला बड़ा राजनीतिक इम्तिहान है। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के साथ राज्यों और स्थानीय सरकारों के कई अहम पदों के लिए वोटिंग होगी। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के करीब 80% उम्मीदवार पहले ही तय हो चुके हैं। मिडटर्म में रिपब्लिकन पार्टी हारती है तो ट्रम्प राष्ट्रपति बने रहेंगे। लेकिन कांग्रेस में बहुमत खोने पर उनके फैसलों पर रोक-टोक बढ़ सकती है। टैरिफ, वीजा और दूसरे बड़े नीतिगत फैसलों को लागू करने में ट्रम्प को डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। कार्यकाल के बाकी दो साल में उन्हें कांग्रेस के साथ ज्यादा तालमेल बनाकर चलना होगा। मिडटर्म में ट्रम्प की तीन सबसे बड़ी चुनौती… महंगाई, इमिग्रेशन और ईरान युद्ध 1. महंगाई: ट्रम्प की आर्थिक रेटिंग 32% पर​ फिसल गई अमेरिकी वोटरों की सबसे बड़ी चिंता महंगाई है। इप्सोस सर्वे में 54% लोगों ने महंगाई और अर्थव्यवस्था को वोट का बड़ा मुद्दा बताया। वहीं, एपी-एनओआरसी सर्वे में सिर्फ 32% लोगों ने माना कि ट्रम्प अर्थव्यवस्था अच्छी तरह संभाल रहे हैं। 69% अमेरिकियों को मौजूदा आर्थिक हालात खराब लगते हैं। इप्सोस सर्वे में 65% लोगों ने कहा कि रोजमर्रा का किराना महंगा पड़ रहा है, जबकि 48% को डर है कि अगले साल आर्थिक हालात और खराब हो सकते हैं। ईरान युद्ध: 20% वोटरों के लिए बड़ा मुद्दा ईरान युद्ध अब सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं है। इसका असर सीधे अमेरिकी लोगों की जेब पर पड़ रहा है। इप्सोस सर्वे में 20% वोटरों ने ईरान युद्ध को वोट का अहम मुद्दा बताया। अगर जंग लंबी खिंची और तेल महंगा हुआ तो पेट्रोल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। यानी ट्रम्प के सामने चुनौती है ईरान पर सख्ती भी दिखानी है और अमेरिकी लोगों को महंगाई से राहत का भरोसा भी देना है। इमिग्रेशन: 61% अमेरिकी ट्रम्प की नीति से नाराज 2024 में इमिग्रेशन ट्रम्प की बड़ी ताकत था, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। हालिया सर्वे में 61% अमेरिकियों ने ट्रम्प की इमिग्रेशन नीति का विरोध किया, जबकि समर्थन सिर्फ 39% रहा। दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ट्रम्प की इस नीति को 49% लोगों का समर्थन था। रिपब्लिकन वोटरों में भी समर्थन घटकर 80% रह गया है। सख्त डिपोर्टेशन और इमिग्रेशन कार्रवाई के बीच बढ़ती नाराजगी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प के लिए बड़ा नुकसान बन सकती है। ट्रम्प पर महाभियोग का खतरा बढ़ेगा अगर रिपब्लिकन कांग्रेस में बहुमत खो देते हैं, तो ट्रम्प पर महाभियोग की कार्रवाई का खतरा बढ़ सकता है। डेमोक्रेट्स दोनों सदनों में मजबूत होते हैं तो वे ट्रम्प के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। कांग्रेस के पास टैरिफ और इमिग्रेशन से जुड़े कानूनों पर बड़ा अधिकार है। वह ट्रम्प के फैसलों पर कानून बनाकर रोक लगा सकती है और वीजा नीति को भी चुनौती दे सकती है। ईरान युद्ध में भी कांग्रेस सैन्य कार्रवाई और युद्ध के लिए फंडिंग पर ट्रम्प पर दबाव बना सकती है। यानी कांग्रेस का बहुमत गया तो ट्रम्प की मनमानी पर लगाम लग सकती है।