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विदेशी डिग्री का क्रेज खत्म,घर लौटे 52 लाख चीनी छात्र:कम हुआ विदेश जाने का रुझान; पिछले साल 94% छात्र स्वदेश लौटे

विदेशी डिग्री का क्रेज खत्म,घर लौटे 52 लाख चीनी छात्र:कम हुआ विदेश जाने का रुझान; पिछले साल 94% छात्र स्वदेश लौटे

चीन में विदेश जाकर पढ़ाई करने का चलन तेजी से कम हो रहा है। माता-पिता मानते हैं कि देश के अपने विश्वविद्यालय अब पहले से बेहतर हो गए हैं। इसलिए भारी खर्च करके विदेश जाने का फायदा कम दिखता है। इसी वजह से 2019 में जहां 7 लाख छात्र विदेश पढ़ने गए थे, 2025 में यह संख्या घटकर करीब 5.7 लाख रह गई। दूसरी ओर विदेश से पढ़ाई पूरी करके चीन लौटने वालों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। 2025 में विदेश में रुकने के बजाय करीब 94% छात्र वापस लौट आए। 10 साल में कुल 52 लाख ग्रेजुएट लौट चुके हैं। न्यू ओरिएंटल के आंकड़ों के मुताबिक, विदेश से लौटने वाले छात्रों की शुरुआती सैलरी औसतन करीब 1.80 लाख रुपए प्रति महीना है। वहीं, देश में ही पढ़ाई करने वालों की औसत सैलरी करीब 1 लाख रुपए है। हालांकि हालात ऐसे हैं कि कई विदेश-पढ़े युवाओं को इससे भी कम कमाई मिल रही है और गुजारे के लिए डिलीवरी जैसे काम करने पड़ रहे हैं। विदेशी डिग्री का फायदा घटा,कंपनियों का नजरिया बदला कई कंपनियां अब विदेशी डिग्री को पहले जैसी तरजीह नहीं देतीं। विदेश की पढ़ाई के कोर्स की समय सीमों कम होना और आसान दाखिले के कारण कुछ एचआर इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं। जैसे चीन में पोस्ट ग्रेजुएशन तीन साल का होता है। वहीं ब्रिटेन और अमेरिका में एक साल का। सरकारी नौकरियों में भी विदेश से पढ़े युवाओं के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं। शिक्षा पर खर्च बढ़ा तो परिवारों ने बजट घटाया विदेश में पढ़ाई का खर्च तेजी से बढ़ा है। सर्वे के मुताबिक, 2025 में विदेश पढ़ाई का औसत खर्च बढ़कर 85 लाख रुपए हो गया है। यह 2023 के मुकाबले करीब 20% ज्यादा है। इसलिए जो छात्र अब भी बाहर जा रहे हैं, वे ऐसे देश चुन रहे हैं जहां पैसा वसूल हो सके। चीन की यूनिवर्सिटीज मजबूत, फीस कम चीन के विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में सुधार हुआ है। वर्ल्ड रैंकिंग में पेकिंग और त्सिंगहुआ यूनिवर्सिटी अब 13वें और 14वें नंबर पर हैं। देश के ‘985’ और ‘211’ समूह के कॉलेज कई विदेशी संस्थानों से बेहतर माने जा रहे हैं। सरकारी यूनिवर्सिटी की सालाना फीस विदेशों के से बहुत कम है।

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विदेशी डिग्री का क्रेज खत्म,घर लौटे 52 लाख चीनी छात्र:कम हुआ विदेश जाने का रुझान; पिछले साल 94% छात्र स्वदेश लौटे

चीन में विदेश जाकर पढ़ाई करने का चलन तेजी से कम हो रहा है। माता-पिता मानते हैं कि देश के अपने विश्वविद्यालय अब पहले से बेहतर हो गए हैं। इसलिए भारी खर्च करके विदेश जाने का फायदा कम दिखता है। इसी वजह से 2019 में जहां 7 लाख छात्र विदेश पढ़ने गए थे, 2025 में यह संख्या घटकर करीब 5.7 लाख रह गई। दूसरी ओर विदेश से पढ़ाई पूरी करके चीन लौटने वालों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। 2025 में विदेश में रुकने के बजाय करीब 94% छात्र वापस लौट आए। 10 साल में कुल 52 लाख ग्रेजुएट लौट चुके हैं। न्यू ओरिएंटल के आंकड़ों के मुताबिक, विदेश से लौटने वाले छात्रों की शुरुआती सैलरी औसतन करीब 1.80 लाख रुपए प्रति महीना है। वहीं, देश में ही पढ़ाई करने वालों की औसत सैलरी करीब 1 लाख रुपए है। हालांकि हालात ऐसे हैं कि कई विदेश-पढ़े युवाओं को इससे भी कम कमाई मिल रही है और गुजारे के लिए डिलीवरी जैसे काम करने पड़ रहे हैं। विदेशी डिग्री का फायदा घटा,कंपनियों का नजरिया बदला कई कंपनियां अब विदेशी डिग्री को पहले जैसी तरजीह नहीं देतीं। विदेश की पढ़ाई के कोर्स की समय सीमों कम होना और आसान दाखिले के कारण कुछ एचआर इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं। जैसे चीन में पोस्ट ग्रेजुएशन तीन साल का होता है। वहीं ब्रिटेन और अमेरिका में एक साल का। सरकारी नौकरियों में भी विदेश से पढ़े युवाओं के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं। शिक्षा पर खर्च बढ़ा तो परिवारों ने बजट घटाया विदेश में पढ़ाई का खर्च तेजी से बढ़ा है। सर्वे के मुताबिक, 2025 में विदेश पढ़ाई का औसत खर्च बढ़कर 85 लाख रुपए हो गया है। यह 2023 के मुकाबले करीब 20% ज्यादा है। इसलिए जो छात्र अब भी बाहर जा रहे हैं, वे ऐसे देश चुन रहे हैं जहां पैसा वसूल हो सके। चीन की यूनिवर्सिटीज मजबूत, फीस कम चीन के विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में सुधार हुआ है। वर्ल्ड रैंकिंग में पेकिंग और त्सिंगहुआ यूनिवर्सिटी अब 13वें और 14वें नंबर पर हैं। देश के ‘985’ और ‘211’ समूह के कॉलेज कई विदेशी संस्थानों से बेहतर माने जा रहे हैं। सरकारी यूनिवर्सिटी की सालाना फीस विदेशों के से बहुत कम है।

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