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ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

भारतीय ब्रांड्स ने जेन जी यानी 14 से 29 साल तक की युवा पीढ़ी की भाषा और सौंदर्यबोध अपनाने में महारत हासिल कर ली है। नायका और स्विगी इंस्टामार्ट ने हाल ही में ‘गंजी चुड़ैल’ जैसे ट्रेंड भुनाए, टिंडर ने ‘सिचुएशनशिप’ और ‘मेन-कैरेक्टर एनर्जी’ जैसे शब्द अपनाए, तो फास्ट्रैक ने ‘यू डू यू’ कैंपेन के जरिए फ्लुइड पहचान का जश्न मनाया। लेकिन जब परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आंदोलन के तहत जेन जी सड़कों पर उतरी तो ब्रांड्स की जुड़ाव वाली यह छवि गायब हो गई। दरअसल, आज ब्रांड्स सिर्फ युवा संस्कृति के सौंदर्यबोध को उधार लेकर उनकी वास्तविक चिंताओं से दूर नहीं रह सकते, जैसा कि पेप्सी ने 1960 के दशक में ‘पेप्सी जनरेशन’ कैंपेन के जरिए किया था। इसके उलट, नाइकी ने ‘कॉलिन कैपरनिक’ कैंपेन के जरिए नस्ली न्याय के मुद्दे पर लगातार फोकस करके करीब 1,550 करोड़ रुपए की मीडिया वैल्यू और बिक्री में तगड़ी बढ़त हासिल की। लेकिन बात और काम के बीच तालमेल न हो तो नुकसान भी होता है। कोविड के दौर में मैकडॉनल्ड्स के बयान और कंपनी के भीतर अश्वेत कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़े आरोपों के बीच अंतर इसकी मिसाल है। बहरहाल, सीजेपी आंदोलन ने दिखाया कि भारतीय जेन जी 37.7 करोड़ की आबादी और करीब 81 लाख करोड़ रुपए खर्च करने क्षमता के साथ अपनी आर्थिक ताकत अच्छी तरह पहचानती है। प्रदर्शनकारियों ने हास्य, ‘गेट रेडी विद मी’ वीडियो और पुलिस हिंसा के फुटेज को गेमिंग इमेजरी के साथ जोड़कर पूरी स्क्रिप्ट खुद लिखी। इस ब्रीच कई मौकों पर युवाओं को जोड़ने के ब्रांड्स के दांव सही नहीं बैठे। जुलाई में वाडीलाल का ‘वर्ल्ड आइसक्रीम डे’ कैंपेन जिसमें नीट टॉपर्स की तस्वीरों में डिजिटल मुस्कान जोड़ी गई। सीजेपी आंदोलन के बीच आने पर यह आलोचनाओं में घिर गया। इसके उलट स्टेफ्री ने प्रदर्शनकारियों द्वारा गढ़े गए नारे ‘एट लीस्ट द पैड्स डोंट लीक’ को अपने चैनल पर बढ़ावा देने का मौका गंवा दिया। करवी और फॉस्टो जैसे ब्रांड्स ने प्रचार गतिविधियां रोककर सांकेतिक एकजुटता दिखाई। ब्लू टोकाई के जनपथ आउटलेट ने पुलिस हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों को शरण दी, जबकि ट्रैक ने कर्मचारियों को प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से न रोकने की बात कही। ब्रांड्स एक्सपर्ट स्वाति शर्मा का कहना है कि बाजार का गणित अब यह नहीं रह गया कि आलोचना होगी या नहीं, बल्कि यह है कि ब्रांड लंबी अवधि की विश्वसनीयता के लिए फौरी विवाद झेलने के लिए तैयार है या नहीं। स्ट्रीटवियर ब्रांड मैनलिक के संस्थापक प्रीतम कुदेव ने कहा, ‘यदि युवा अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर हैं, तो हम कम से कम उनके साथ खड़ा तो हो सकते थे।’ भारतीय कंपनियों के सामने पश्चिमी ब्रांड्स से अलग चुनौती, पक्षपाती दिखने का खतरा शर्मा का कहना है कि ब्रांड्स के सामने राजनीतिक रूप से पक्षपाती दिखने का खतरा मंडराता रहता है। 2020 में आए तनिष्क के विज्ञापन को ही ले लीजिए। उसमें एक विशेष धर्म को मानने वाली सास अन्य धर्म की बहू की गोदभराई कराती दिखी थी। ‘बायकॉट तनिष्क’ ट्रेंड के बाद उसे वापस लेना पड़ा। हालांकि सर्फ एक्सेल ने इसी तरह के बहिष्कार के बावजूद विज्ञापन नहीं हटाया, जिसे एक करोड़ से ज्यादा बार देखा गया।

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ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

ब्रांड्स का नया ट्रेंड; नस्ली न्याय से बढ़ी सेल्स:जेन जी को टारगेट करने वाले ब्रांड्स को करना पड़ रहा उनके मुद्दों को सपोर्ट

भारतीय ब्रांड्स ने जेन जी यानी 14 से 29 साल तक की युवा पीढ़ी की भाषा और सौंदर्यबोध अपनाने में महारत हासिल कर ली है। नायका और स्विगी इंस्टामार्ट ने हाल ही में ‘गंजी चुड़ैल’ जैसे ट्रेंड भुनाए, टिंडर ने ‘सिचुएशनशिप’ और ‘मेन-कैरेक्टर एनर्जी’ जैसे शब्द अपनाए, तो फास्ट्रैक ने ‘यू डू यू’ कैंपेन के जरिए फ्लुइड पहचान का जश्न मनाया। लेकिन जब परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आंदोलन के तहत जेन जी सड़कों पर उतरी तो ब्रांड्स की जुड़ाव वाली यह छवि गायब हो गई। दरअसल, आज ब्रांड्स सिर्फ युवा संस्कृति के सौंदर्यबोध को उधार लेकर उनकी वास्तविक चिंताओं से दूर नहीं रह सकते, जैसा कि पेप्सी ने 1960 के दशक में ‘पेप्सी जनरेशन’ कैंपेन के जरिए किया था। इसके उलट, नाइकी ने ‘कॉलिन कैपरनिक’ कैंपेन के जरिए नस्ली न्याय के मुद्दे पर लगातार फोकस करके करीब 1,550 करोड़ रुपए की मीडिया वैल्यू और बिक्री में तगड़ी बढ़त हासिल की। लेकिन बात और काम के बीच तालमेल न हो तो नुकसान भी होता है। कोविड के दौर में मैकडॉनल्ड्स के बयान और कंपनी के भीतर अश्वेत कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़े आरोपों के बीच अंतर इसकी मिसाल है। बहरहाल, सीजेपी आंदोलन ने दिखाया कि भारतीय जेन जी 37.7 करोड़ की आबादी और करीब 81 लाख करोड़ रुपए खर्च करने क्षमता के साथ अपनी आर्थिक ताकत अच्छी तरह पहचानती है। प्रदर्शनकारियों ने हास्य, ‘गेट रेडी विद मी’ वीडियो और पुलिस हिंसा के फुटेज को गेमिंग इमेजरी के साथ जोड़कर पूरी स्क्रिप्ट खुद लिखी। इस ब्रीच कई मौकों पर युवाओं को जोड़ने के ब्रांड्स के दांव सही नहीं बैठे। जुलाई में वाडीलाल का ‘वर्ल्ड आइसक्रीम डे’ कैंपेन जिसमें नीट टॉपर्स की तस्वीरों में डिजिटल मुस्कान जोड़ी गई। सीजेपी आंदोलन के बीच आने पर यह आलोचनाओं में घिर गया। इसके उलट स्टेफ्री ने प्रदर्शनकारियों द्वारा गढ़े गए नारे ‘एट लीस्ट द पैड्स डोंट लीक’ को अपने चैनल पर बढ़ावा देने का मौका गंवा दिया। करवी और फॉस्टो जैसे ब्रांड्स ने प्रचार गतिविधियां रोककर सांकेतिक एकजुटता दिखाई। ब्लू टोकाई के जनपथ आउटलेट ने पुलिस हिंसा के दौरान प्रदर्शनकारियों को शरण दी, जबकि ट्रैक ने कर्मचारियों को प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से न रोकने की बात कही। ब्रांड्स एक्सपर्ट स्वाति शर्मा का कहना है कि बाजार का गणित अब यह नहीं रह गया कि आलोचना होगी या नहीं, बल्कि यह है कि ब्रांड लंबी अवधि की विश्वसनीयता के लिए फौरी विवाद झेलने के लिए तैयार है या नहीं। स्ट्रीटवियर ब्रांड मैनलिक के संस्थापक प्रीतम कुदेव ने कहा, ‘यदि युवा अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर हैं, तो हम कम से कम उनके साथ खड़ा तो हो सकते थे।’ भारतीय कंपनियों के सामने पश्चिमी ब्रांड्स से अलग चुनौती, पक्षपाती दिखने का खतरा शर्मा का कहना है कि ब्रांड्स के सामने राजनीतिक रूप से पक्षपाती दिखने का खतरा मंडराता रहता है। 2020 में आए तनिष्क के विज्ञापन को ही ले लीजिए। उसमें एक विशेष धर्म को मानने वाली सास अन्य धर्म की बहू की गोदभराई कराती दिखी थी। ‘बायकॉट तनिष्क’ ट्रेंड के बाद उसे वापस लेना पड़ा। हालांकि सर्फ एक्सेल ने इसी तरह के बहिष्कार के बावजूद विज्ञापन नहीं हटाया, जिसे एक करोड़ से ज्यादा बार देखा गया।

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