अमेरिकी महिलाओं का वोटिंग पैटर्न:महिलाएं कहती हैं कि राजनीति में रुचि नहीं, पर ट्रम्प की जीत में बड़ा योगदान

अमेरिका में अगर महिलाओं से राजनीति के बारे में पूछें, तो उनमें से कई यही कहेंगी कि वे राजनीति में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रखतीं। फिर भी, 1970 के दशक से शुरू होकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर उनके वोट की ताकत एक अलग ही कहानी बयां करती है। 2024 के चुनाव में लगभग दो-तिहाई महिलाओं ने डोनाल्ड ट्रम्प के पक्ष में मतदान किया। ये अमेरिका के कुल वोटरों का 37% हिस्सा हैं और इनमें से 68% खुद को ईसाई मानती हैं। वहीं, श्वेत इवेंजेलिकल (एक धार्मिक समूह) महिलाओं में से 80% से अधिक ने ट्रम्प को वोट दिया। इसके उलट, खुद को किसी भी धर्म से न जोड़ने वाली लगभग 80% श्वेत महिलाओं ने 2024 में कमला हैरिस को वोट दिया। अमेरिका में महिलाओं की राजनीति को किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं किया जा सकता। बल्कि, उनके मतदान के तरीके एक तरह के सांस्कृतिक नजरिए को दर्शाते हैं। महिलाओं की राजनीतिक पसंद केवल नेताओं के भाषणों से तय नहीं होती। वे जो किताबें पढ़ती हैं, घर में जो सामान रखती हैं और रोजमर्रा के जो कंटेंट देखती हैं, उसका भी उनकी सोच और वोट पर गहरा असर पड़ता है। आम धारणा यह है कि गर्भपात का विरोध ईसाई महिलाओं को रिपब्लिकन पार्टी को वोट देने के लिए प्रेरित करता है, लेकिन कई सर्वे से पता चलता है कि गर्भपात का नंबर महंगाई, आप्रवासन, अपराध जैसे मुद्दों से काफी नीचे है। महिलाओं के वोट पाने की रणनीति अलग है… लंबे समय से, फूलों से सजी बाइबल स्टडी बुक्स, लोकप्रिय उपन्यास महिलाओं को सिखाते रहे हैं कि उन्हें क्या मानना चाहिए, कैसे जीना चाहिए और कैसे मतदान करना चाहिए। मीडिया और लाइफस्टाइल ब्रांड ‘द कंजर्वेटर’ की फाउंडर जेमी लीघ फ्रैंकलिन ने दक्षिणपंथी रणनीति का वर्णन किया – महिलाओं को सांस्कृतिक रूप से रूढ़िवादी नजरिए में शामिल करो, फिर ‘अमेरिका समर्थक, पश्चिमी सभ्यता समर्थक, परिवार समर्थक’ वोट हासिल करो। राजनीति की बात करने की कोई जरूरत ही नहीं है।
अमेरिका में $1 के सिक्के पर ट्रम्प की तस्वीर:250वीं वर्षगांठ पर जारी हुआ, बिक्री शुरू होने के कुछ घंटे बाद आउट ऑफ स्टॉक

अमेरिका ने अपनी 250वीं वर्षगांठ के मौके पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर वाला $1 का खास सिक्का जारी किया है। अमेरिकी मिंट ने बुधवार दोपहर 12 बजे इसकी बिक्री शुरू की। बिक्री शुरू होने के कुछ ही घंटे बाद सिक्का आउट ऑफ स्टॉक हो गया। अमेरिकी मिंट की वेबसाइट पर दोपहर करीब 3 बजे 25 सिक्कों का रोल स्टॉक में नहीं था, जबकि 100 सिक्कों का बैग भी उपलब्ध नहीं था। सिक्के के आगे वाले हिस्से पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का पोर्ट्रेट है। इसके साथ ‘IN GOD WE TRUST’ और ‘LIBERTY’ लिखा है। दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति की आधिकारिक मुहर और अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के प्रतीक के तौर पर ‘250’ लिखा गया है। 25 सिक्कों के रोल की कीमत 61 डॉलर अमेरिकी मिंट के मुताबिक, 25 सिक्कों के एक रोल की कीमत 61 डॉलर और 100 सिक्कों के एक बैग की कीमत 154.50 डॉलर है। बिक्री शुरू होने के करीब आधे घंटे बाद वेबसाइट पर ग्राहकों को वेटिंग एरिया में भेजा गया। उन्हें करीब 1 घंटे का इंतजार बताया गया। गुरुवार दोपहर 2 बजे तक एक परिवार अधिकतम 2 खरीदारी कर सकता था। अमेरिकी मिंट ने बताया कि 2.5 लाख सिक्कों को खास ‘4 जुलाई’ प्रिवी मार्क के साथ रैंडम तरीके से रोल और बैग में शामिल किया गया है। इन सिक्कों पर यह निशान 4 जुलाई को बनाया गया था। अमेरिका में 4 जुलाई को स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। 1926 के बाद पहली बार जीवित राष्ट्रपति की तस्वीर अमेरिकी मिंट के मुताबिक, इससे पहले किसी जीवित राष्ट्रपति की तस्वीर 1926 में सिक्के पर दिखाई गई थी। उस समय राष्ट्रपति कैल्विन कूलिज की तस्वीर अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा पर हस्ताक्षर की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर जारी आधे डॉलर के सिक्के पर लगाई गई थी। अमेरिकी कानून के तहत किसी जीवित राष्ट्रपति या जीवित पूर्व राष्ट्रपति की तस्वीर सिक्के पर लगाना प्रतिबंधित है। हालांकि, अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के लिए कांग्रेस नेसर्कुलेटिंग कलेक्टिबल कॉइन रीडिजाइन एक्ट पास किया। इसके तहत ट्रेजरी को इस अवसर पर खास $1 के सिक्के जारी करने की अनुमति मिली। कानून में यह भी कहा गया है कि सिक्के के पीछे वाले हिस्से पर किसी जीवित व्यक्ति का पोर्ट्रेट नहीं हो सकता। ट्रम्प की तस्वीर सिक्के के आगे वाले हिस्से पर है, इसलिए इसे कानून के मुताबिक माना गया है।
अमेरिका में $1 के सिक्के पर ट्रम्प की तस्वीर:250वीं वर्षगांठ पर जारी हुआ, बिक्री शुरू होने के कुछ घंटे बाद आउट ऑफ स्टॉक

अमेरिका ने अपनी 250वीं वर्षगांठ के मौके पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर वाला $1 का खास सिक्का जारी किया है। अमेरिकी मिंट ने बुधवार दोपहर 12 बजे इसकी बिक्री शुरू की। बिक्री शुरू होने के कुछ घंटे बाद ही सिक्का आउट ऑफ स्टॉक हो गया। दोपहर करीब 3 बजे अमेरिकी मिंट की वेबसाइट पर 25 सिक्कों का रोल उपलब्ध नहीं था। वहीं, 100 सिक्कों का बैग भी आउट ऑफ स्टॉक दिख रहा था। सिक्के के एक तरफ ट्रम्प की तस्वीर है। इसके साथ ‘IN GOD WE TRUST’ और ‘LIBERTY’ लिखा है। दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति की मुहर और अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के लिए ‘250’ लिखा गया है। 25 सिक्कों के रोल की कीमत 61 डॉलर अमेरिकी मिंट के मुताबिक, 25 सिक्कों के रोल की कीमत 61 डॉलर और 100 सिक्कों के बैग की कीमत 154.50 डॉलर है। बिक्री शुरू होने के करीब आधे घंटे बाद ही वेबसाइट पर लोगों को वेटिंग एरिया में भेजा जाने लगा। वहां करीब 1 घंटे का वेटिंग टाइम बताया गया। गुरुवार दोपहर 2 बजे तक एक परिवार अधिकतम 2 खरीदारी कर सकता था। अमेरिकी मिंट ने बताया कि 2.5 लाख सिक्कों को खास ‘4 जुलाई’ निशान के साथ रैंडम तरीके से रोल और बैग में रखा गया है। ये सिक्के 4 जुलाई को बनाए गए थे। अमेरिका में इसी दिन स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। 1926 के बाद पहली बार जीवित राष्ट्रपति की तस्वीर अमेरिकी मिंट के मुताबिक, इससे पहले किसी जीवित राष्ट्रपति की तस्वीर 1926 में सिक्के पर दिखाई गई थी। उस समय राष्ट्रपति कैल्विन कूलिज की तस्वीर अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा पर हस्ताक्षर की 150वीं वर्षगांठ के मौके पर जारी आधे डॉलर के सिक्के पर लगाई गई थी। अमेरिकी कानून के तहत किसी जीवित राष्ट्रपति या जीवित पूर्व राष्ट्रपति की तस्वीर सिक्के पर लगाना प्रतिबंधित है। हालांकि, अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के लिए कांग्रेस नेसर्कुलेटिंग कलेक्टिबल कॉइन रीडिजाइन एक्ट पास किया। इसके तहत ट्रेजरी को इस अवसर पर खास $1 के सिक्के जारी करने की अनुमति मिली। कानून में यह भी कहा गया है कि सिक्के के पीछे वाले हिस्से पर किसी जीवित व्यक्ति का पोर्ट्रेट नहीं हो सकता। ट्रम्प की तस्वीर सिक्के के आगे वाले हिस्से पर है, इसलिए इसे कानून के मुताबिक माना गया है। —————————– ये खबर भी पढ़ें… नीदरलैंड्स ने अमेरिका-कनाडा से 86 टन सोना हटाकर लंदन भेजा:बैंक ऑफ इंग्लैड में रखा, कहा- संकट आने पर यहां आसानी से बेच सकेंगे नीदरलैंड्स ने अमेरिका और कनाडा में रखा अपना 86 टन सोना निकालकर लंदन भेज दिया है। डच सेंट्रल बैंक (DNB) के मुताबिक, यह ट्रांसफर मार्च से अगस्त के बीच कई महीनों में किया गया। अब यह सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
प्रीति जिंटा बोलीं- मैंने रोज 18 घंटे काम किया:दीपिका पादुकोण ने 8 घंटे शिफ्ट के लिए छोड़ी थी फिल्म; मेल एक्टर्स पर सवाल उठाया था

फिल्म इंडस्ट्री में काम के लंबे घंटों और वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। लगभग एक दशक के अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रहीं एक्ट्रेस प्रीति जिंटा ने इस मुद्दे पर अपना रुख साफ किया है। मुंबई में अपनी आने वाली एक्शन-कॉमेडी फिल्म ‘वाइब’ के ट्रेलर लॉन्च इवेंट में प्रीति जिंटा ने खुलासा किया कि उन्होंने इस फिल्म की शूटिंग के दौरान रोजाना 18 घंटे तक काम किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि “हर किसी की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं” और उन्होंने भारत में अपने कम समय के टूर और अमेरिका में बच्चों के पास जल्दी लौटने के लिए खुद यह लंबा शेड्यूल चुना था। ‘बच्चों के पास लौटने के लिए 18 घंटे काम किया’ ट्रेलर लॉन्च के दौरान जब मीडिया ने प्रीति जिंटा से सेट पर लंबे वर्किंग आवर्स के बारे में सवाल किया, तो उन्होंने बताया कि लंबे समय तक शूटिंग करना मुश्किल जरूर था, लेकिन यह उनका अपना व्यक्तिगत फैसला था। 50 साल की प्रीति जिंटा ने कहा, सबकी अपनी पसंद और जरूरतें होती हैं। बेशक, मैंने 18 घंटे तक काम किया क्योंकि मैं अपना काम जितनी जल्दी हो सके खत्म करके अमेरिका वापस अपने बच्चों के पास जाना चाहती थी। मेरा फोकस सिर्फ यही था कि मैं भारत आऊंगी, अपना काम तेजी से पूरा करूंगी और तुरंत लौट जाऊंगी। मैं यहां 30 से 40 दिनों के समय के लिए आई थी। इसलिए मुझे इतनी लंबी शिफ्ट में काम करने में कोई आपत्ति नहीं थी। प्रीति ने यह भी बताया कि इस फिल्म में उन्होंने कई कठिन एक्शन सीन खुद किए हैं, जिसके लिए लगातार लंबे शोज और शारीरिक मेहनत की जरूरत थी। दीपिका पादुकोण की थी 8 घंटे की शिफ्ट की मांग फिल्म इंडस्ट्री में वर्किंग आवर्स का यह विवाद असल में तब शुरू हुआ था, जब एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण के संदीप रेड्डी वांगा की फिल्म ‘स्पिरिट’ (प्रभास स्टारर) और ‘कल्कि 2898 एडी’ के सीक्वल से अलग होने की खबरें सामने आई थीं। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि मां बनने के बाद दीपिका ने अपनी पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ में बैलेंस बनाए रखने के लिए रोजाना 8 घंटे की वर्क शिफ्ट की मांग रखी थी। मेकर्स के साथ काम के घंटों और फीस को लेकर सहमति न बन पाने के कारण दीपिका इन प्रोजेक्ट्स से हट गईं। इसके बाद सोशल मीडिया और इंडस्ट्री में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि क्या भारतीय सिनेमा में तय वर्किंग टाइम लागू होना चाहिए या नहीं। मेल सुपरस्टार्स् पर दीपिका का बयान जब दीपिका पादुकोण की 8 घंटे की वर्किंग डिमांड पर विवाद बढ़ा, तो उन्होंने एक इंटरव्यू में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के दोहराव वाले रवैये पर खुलकर बात की। दीपिका ने CNBC-TV18 को दिए इंटरव्यू में कहा था, यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में कई मेल सुपरस्टार्स् सालों से सिर्फ 8 घंटे ही काम करते आ रहे हैं। वे सोमवार से शुक्रवार तक 8 घंटे काम करते हैं और वीकेंड्स पर काम नहीं करते। लेकिन जब कोई महिला अपने लिए 8 घंटे की शिफ्ट मांगती है, तो इसे हेडलाइन बना दिया जाता है। अक्षय कुमार करते हैं 8 घंटे काम इसी दौरान एक्टर अभिषेक बच्चन का एक पुराना वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें वे ‘द कपिल शर्मा शो’ में अक्षय कुमार के वर्किंग स्टाइल के बारे में बता रहे थे। अभिषेक ने कहा था, पैकअप का ऐलान होते ही सबसे ज्यादा खुश अक्षय कुमार होते हैं। वे 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करते। सुबह 7 बजे सेट पर आते हैं और तुरंत अपना काम शुरू कर देते हैं। सुनील शेट्टी ने कहा 18 घंटे काम प्रोडक्टिव नहीं वर्किंग आवर्स की इस बहस में एक्टर सुनील शेट्टी ने भी अपनी बात रखी थी। उन्होने कहा कि सेट पर 12 से 18 घंटे तक काम करना न तो प्रैक्टिकल है और न ही इससे बेहतर आउटपुट मिलता है। सुनील शेट्टी ने कहा था कि किसी भी कलाकार या क्रू मेंबर के लिए 12 से 18 घंटे तक लगातार काम करना संभव नहीं है। उन्होंने वर्क-लाइफ बैलेंस, सही ब्रेक और प्रॉपर रेस्ट को काम की क्वालिटी के लिए जरूरी बताया था। सुनील शेट्टी के मुताबिक, थकान में काम करने से रचनात्मकता पर बुरा असर पड़ता है, इसलिए सेट पर प्रोफेशनल और अनुशासित माहौल होना चाहिए। 70 घंटे के वर्क वीक की बहस सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं यह बहस सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं है। इंफोसिस के सह-संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति द्वारा देश के युवाओं को “हफ्ते में 70 घंटे काम” करने की सलाह देने के बाद से ही पूरे देश में ओवरवर्किंग और वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर चर्चा शुरू हुई थी। फिल्म निर्माता रोनी स्क्रूवाला ने नारायण मूर्ति के इस विचार का विरोध करते हुए कहा था कि केवल काम के घंटे बढ़ाने से उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) नहीं बढ़ती, बल्कि क्वालिटी वर्क, स्किल और बेहतर वर्क एनवायरनमेंट ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
प्रीति जिंटा बोलीं- मैंने रोज 18 घंटे काम किया:दीपिका पादुकोण ने 8 घंटे शिफ्ट के लिए छोड़ी थी फिल्म; मेल एक्टर्स पर सवाल उठाया था

फिल्म इंडस्ट्री में काम के लंबे घंटों और वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। लगभग एक दशक के अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रहीं एक्ट्रेस प्रीति जिंटा ने इस मुद्दे पर अपना रुख साफ किया है। मुंबई में अपनी आने वाली एक्शन-कॉमेडी फिल्म ‘वाइब’ के ट्रेलर लॉन्च इवेंट में प्रीति जिंटा ने खुलासा किया कि उन्होंने इस फिल्म की शूटिंग के दौरान रोजाना 18 घंटे तक काम किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि “हर किसी की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं” और उन्होंने भारत में अपने कम समय के टूर और अमेरिका में बच्चों के पास जल्दी लौटने के लिए खुद यह लंबा शेड्यूल चुना था। ‘बच्चों के पास लौटने के लिए 18 घंटे काम किया’ ट्रेलर लॉन्च के दौरान जब मीडिया ने प्रीति जिंटा से सेट पर लंबे वर्किंग आवर्स के बारे में सवाल किया, तो उन्होंने बताया कि लंबे समय तक शूटिंग करना मुश्किल जरूर था, लेकिन यह उनका अपना व्यक्तिगत फैसला था। 50 साल की प्रीति जिंटा ने कहा, सबकी अपनी पसंद और जरूरतें होती हैं। बेशक, मैंने 18 घंटे तक काम किया क्योंकि मैं अपना काम जितनी जल्दी हो सके खत्म करके अमेरिका वापस अपने बच्चों के पास जाना चाहती थी। मेरा फोकस सिर्फ यही था कि मैं भारत आऊंगी, अपना काम तेजी से पूरा करूंगी और तुरंत लौट जाऊंगी। मैं यहां 30 से 40 दिनों के समय के लिए आई थी। इसलिए मुझे इतनी लंबी शिफ्ट में काम करने में कोई आपत्ति नहीं थी। प्रीति ने यह भी बताया कि इस फिल्म में उन्होंने कई कठिन एक्शन सीन खुद किए हैं, जिसके लिए लगातार लंबे शोज और शारीरिक मेहनत की जरूरत थी। दीपिका पादुकोण की थी 8 घंटे की शिफ्ट की मांग फिल्म इंडस्ट्री में वर्किंग आवर्स का यह विवाद असल में तब शुरू हुआ था, जब एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण के संदीप रेड्डी वांगा की फिल्म ‘स्पिरिट’ (प्रभास स्टारर) और ‘कल्कि 2898 एडी’ के सीक्वल से अलग होने की खबरें सामने आई थीं। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि मां बनने के बाद दीपिका ने अपनी पर्सनल लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ में बैलेंस बनाए रखने के लिए रोजाना 8 घंटे की वर्क शिफ्ट की मांग रखी थी। मेकर्स के साथ काम के घंटों और फीस को लेकर सहमति न बन पाने के कारण दीपिका इन प्रोजेक्ट्स से हट गईं। इसके बाद सोशल मीडिया और इंडस्ट्री में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि क्या भारतीय सिनेमा में तय वर्किंग टाइम लागू होना चाहिए या नहीं। मेल सुपरस्टार्स् पर दीपिका का बयान जब दीपिका पादुकोण की 8 घंटे की वर्किंग डिमांड पर विवाद बढ़ा, तो उन्होंने एक इंटरव्यू में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के दोहराव वाले रवैये पर खुलकर बात की। दीपिका ने CNBC-TV18 को दिए इंटरव्यू में कहा था, यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में कई मेल सुपरस्टार्स् सालों से सिर्फ 8 घंटे ही काम करते आ रहे हैं। वे सोमवार से शुक्रवार तक 8 घंटे काम करते हैं और वीकेंड्स पर काम नहीं करते। लेकिन जब कोई महिला अपने लिए 8 घंटे की शिफ्ट मांगती है, तो इसे हेडलाइन बना दिया जाता है। अक्षय कुमार करते हैं 8 घंटे काम इसी दौरान एक्टर अभिषेक बच्चन का एक पुराना वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें वे ‘द कपिल शर्मा शो’ में अक्षय कुमार के वर्किंग स्टाइल के बारे में बता रहे थे। अभिषेक ने कहा था, पैकअप का ऐलान होते ही सबसे ज्यादा खुश अक्षय कुमार होते हैं। वे 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करते। सुबह 7 बजे सेट पर आते हैं और तुरंत अपना काम शुरू कर देते हैं। सुनील शेट्टी ने कहा 18 घंटे काम प्रोडक्टिव नहीं वर्किंग आवर्स की इस बहस में एक्टर सुनील शेट्टी ने भी अपनी बात रखी थी। उन्होने कहा कि सेट पर 12 से 18 घंटे तक काम करना न तो प्रैक्टिकल है और न ही इससे बेहतर आउटपुट मिलता है। सुनील शेट्टी ने कहा था कि किसी भी कलाकार या क्रू मेंबर के लिए 12 से 18 घंटे तक लगातार काम करना संभव नहीं है। उन्होंने वर्क-लाइफ बैलेंस, सही ब्रेक और प्रॉपर रेस्ट को काम की क्वालिटी के लिए जरूरी बताया था। सुनील शेट्टी के मुताबिक, थकान में काम करने से रचनात्मकता पर बुरा असर पड़ता है, इसलिए सेट पर प्रोफेशनल और अनुशासित माहौल होना चाहिए। 70 घंटे के वर्क वीक की बहस सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं यह बहस सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं है। इंफोसिस के सह-संस्थापक एन.आर. नारायण मूर्ति द्वारा देश के युवाओं को “हफ्ते में 70 घंटे काम” करने की सलाह देने के बाद से ही पूरे देश में ओवरवर्किंग और वर्क-लाइफ बैलेंस को लेकर चर्चा शुरू हुई थी। फिल्म निर्माता रोनी स्क्रूवाला ने नारायण मूर्ति के इस विचार का विरोध करते हुए कहा था कि केवल काम के घंटे बढ़ाने से उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी) नहीं बढ़ती, बल्कि क्वालिटी वर्क, स्किल और बेहतर वर्क एनवायरनमेंट ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
नीदरलैंड्स ने अमेरिका-कनाडा से 86 टन सोना हटाकर लंदन भेजा:बैंक ऑफ इंग्लैड में रखा, कहा- संकट आने पर यहां आसानी से बेच सकेंगे

नीदरलैंड्स ने अमेरिका और कनाडा में रखा 86 टन सोना निकालकर लंदन भेज दिया है। डच सेंट्रल बैंक (DNB) ने बताया कि यह ट्रांसफर मार्च से अगस्त के बीच कई महीनों में किया गया। अब यह सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा गया है। DNB के मुताबिक, संकट की स्थिति में लंदन में रखा सोना ज्यादा आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इस ट्रांसफर से पहले DNB के कुल सोने का 31.3% न्यूयॉर्क और 19.7% ओटावा में रखा था। अब दोनों जगहों पर यह हिस्सेदारी घटकर 18.5% रह गई है। वहीं, लंदन में रखे सोने की हिस्सेदारी 18.1% से बढ़कर 32.1% हो गई है। नीदरलैंड्स में 30.8% सोना अभी भी रखा हुआ है। 27 टन सोना न्यूयॉर्क-ओटावा से नीदरलैंड्स लाया गया DNB के मुताबिक, 27 टन सोने की छड़ें न्यूयॉर्क और ओटावा से नीदरलैंड्स के जाइस्ट पहुंचाई गईं। इसके बाद इसी मात्रा और गुणवत्ता का सोना लंदन भेज दिया गया। सोने की छड़ों को पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि, अटलांटिक महासागर के पार इतनी बड़ी मात्रा में सोना किस तरह पहुंचाया गया, इसकी जानकारी बैंक ने नहीं दी। DNB ने बताया कि ट्रांसफर का बाकी हिस्सा अलग तरीके से किया गया। न्यूयॉर्क में सोना बेचा गया और उतनी ही मात्रा का सोना लंदन में दोबारा खरीदा गया। बैंक के मुताबिक, सोने की खरीद-बिक्री और फिजिकल ट्रांसफर को साथ करने से इतनी बड़ी और जटिल प्रक्रिया से जुड़े जोखिम को बांटने में मदद मिली। संकट में लंदन का सोना जल्दी इस्तेमाल हो सकेगा DNB के मुताबिक, बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा सोना दुनिया में सबसे आसानी से ट्रेड होने वाले सोने में माना जाता है। इसलिए किसी संकट के समय इसे अमेरिका या कनाडा में रखे सोने की तुलना में ज्यादा आसानी से बेचा या खरीदा जा सकता है। DNB ने इस फैसले के पीछे “बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव” का हवाला दिया है। हालांकि, बैंक ने यह साफ नहीं किया कि वह किन घटनाओं को लेकर ऐसा कह रहा है। अमेरिका-कनाडा के बीच जारी है ट्रेड विवाद यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड विवाद चल रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत फेल होने के बाद एक-दूसरे के सामान पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। कनाडा के स्टील, एल्युमिनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख सेक्टर अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हुए हैं। अगस्त में अमेरिका ने करीब 28 अरब कनाडाई डॉलर यानी 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामान पर अतिरिक्त 50% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना DNB के मुताबिक, 2025 के अंत में नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना था। इसकी कीमत करीब 72.2 अरब यूरो थी। बैंक ने बताया कि सोने को अलग-अलग जगहों पर रखने की व्यवस्था का मकसद जोखिम को बांटना और संकट के समय सोने तक आसानी से पहुंच बनाए रखना है। लंदन का गोल्ड मार्केट सबसे बड़ा फ्रांस की नेशनल गोल्ड काउंटर के प्रेसिडेंट लॉरेंट श्वार्ट्ज ने कहा कि सेंट्रल बैंक करीब एक दशक से अपने गोल्ड रिजर्व को अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के मौजूदा राजनीतिक माहौल की वजह से भी कुछ सेंट्रल बैंक सोना रखने के लिए दूसरी जगहों को चुन सकते हैं। श्वार्ट्ज के मुताबिक, लंदन का गोल्ड मार्केट दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा लिक्विड मार्केट है। यानी यहां सोने को आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। इसलिए संकट के समय लंदन में रखा सोना जल्दी इस्तेमाल किया जा सकता है। सेंट्रल बैंक यहां अपने सोने को दूसरे बैंकिंग संस्थानों को आसानी से उधार भी दे सकते हैं। ——————– ये खबर भी पढ़ें… रूस-यूक्रेन ने ब्लैक सी में 300 जहाजों पर हमले किए:दुनिया में गेहूं-मक्का महंगा होने का खतरा; रूस का अनाज निर्यात 71% घटा रूस-यूक्रेन युद्ध में ब्लैक सी अब जंग का बड़ा मोर्चा बन गया है। पिछले करीब डेढ़ महीने में दोनों देशों ने 300 से ज्यादा जहाजों को निशाना बनाया है। इनमें अनाज ले जाने वाले जहाज, तेल टैंकर और दूसरे मालवाहक पोत शामिल हैं। लगातार हमलों से ब्लैक सी का समुद्री व्यापार प्रभावित हुआ है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
नीदरलैंड्स ने अमेरिका-कनाडा से 86 टन सोना हटाकर लंदन भेजा:बैंक ऑफ इंग्लैड में रखा, कहा- संकट आने पर यहां आसानी से बेचा जा सकेगा

नीदरलैंड्स ने अमेरिका और कनाडा में रखा 86 टन सोना निकालकर लंदन भेज दिया है। डच सेंट्रल बैंक (DNB) ने बताया कि यह ट्रांसफर मार्च से अगस्त के बीच कई महीनों में किया गया। अब यह सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा गया है। DNB के मुताबिक, संकट की स्थिति में लंदन में रखा सोना ज्यादा आसानी से खरीदा-बेचा जा सकता है। DNB के प्रेसिडेंट ओलाफ स्लेपेन ने कहा कि यह कदम देश की संकट से निपटने की तैयारी और मजबूती बढ़ाने के लिए जरूरी था। 27 टन सोना न्यूयॉर्क-ओटावा से नीदरलैंड्स लाया गया DNB के मुताबिक, 27 टन सोने की छड़ें न्यूयॉर्क और ओटावा से नीदरलैंड्स के जाइस्ट पहुंचाई गईं। इसके बाद इसी मात्रा और गुणवत्ता का सोना लंदन भेज दिया गया। सोने की छड़ों को पिघलाने की जरूरत नहीं पड़ी। हालांकि, अटलांटिक महासागर के पार इतनी बड़ी मात्रा में सोना किस तरह पहुंचाया गया, इसकी जानकारी बैंक ने नहीं दी। इस ट्रांसफर से पहले DNB के कुल सोने का 31.3% न्यूयॉर्क और 19.7% ओटावा में रखा था। अब दोनों जगहों पर यह हिस्सेदारी घटकर 18.5% रह गई है। वहीं, लंदन में रखे सोने की हिस्सेदारी 18.1% से बढ़कर 32.1% हो गई है। नीदरलैंड्स में 30.8% सोना अभी भी रखा हुआ है। न्यूयॉर्क में बेचकर लंदन में खरीदा बाकी सोना DNB ने बताया कि ट्रांसफर का बाकी हिस्सा अलग तरीके से किया गया। न्यूयॉर्क में सोना बेचा गया और उतनी ही मात्रा का सोना लंदन में दोबारा खरीदा गया। बैंक के मुताबिक, सोने की खरीद-बिक्री और फिजिकल ट्रांसफर को साथ करने से इतनी बड़ी और जटिल प्रक्रिया से जुड़े जोखिम को बांटने में मदद मिली। संकट में लंदन का सोना जल्दी इस्तेमाल हो सकेगा DNB के मुताबिक, बैंक ऑफ इंग्लैंड में रखा सोना दुनिया में सबसे आसानी से ट्रेड होने वाले सोने में माना जाता है। इसलिए किसी संकट के समय इसे अमेरिका या कनाडा में रखे सोने की तुलना में ज्यादा आसानी से बेचा या खरीदा जा सकता है। DNB ने इस फैसले के पीछे “बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव” का हवाला दिया है। हालांकि, बैंक ने यह साफ नहीं किया कि वह किन घटनाओं को लेकर ऐसा कह रहा है। अमेरिका-कनाडा के बीच जारी है ट्रेड विवाद यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड विवाद चल रहा है। दोनों देशों के बीच बातचीत फेल होने के बाद एक-दूसरे के सामान पर नए टैरिफ लगाए गए हैं। कनाडा के स्टील, एल्युमिनियम, लकड़ी और ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख सेक्टर अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित हुए हैं। अगस्त में अमेरिका ने करीब 28 अरब कनाडाई डॉलर यानी 20 अरब डॉलर के कनाडाई सामान पर अतिरिक्त 50% टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना DNB के मुताबिक, 2025 के अंत में नीदरलैंड्स के पास कुल 612.4 टन सोना था। इसकी कीमत करीब 72.2 अरब यूरो थी। बैंक ने बताया कि सोने को अलग-अलग जगहों पर रखने की व्यवस्था का मकसद जोखिम को बांटना और संकट के समय सोने तक आसानी से पहुंच बनाए रखना है।
ट्रम्प के जन्मजात नागरिकता से जुड़े आदेश पर रोक:जज बोलीं- सरकार जन्म से मिली नागरिकता नहीं छीन सकती

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के जन्म से मिलने वाली नागरिकता सीमित करने वाले नए आदेश पर फेडरल जज ने रोक लगा दी है। मैरीलैंड की जज डेबोरा बोर्डमैन ने बुधवार को यह फैसला सुनाया। जज ने कहा कि संविधान के तहत जन्म से अमेरिकी नागरिकता पाने वाले बच्चों की नागरिकता सरकार नहीं रोक सकती। ट्रम्प ने 6 अगस्त को यह आदेश जारी किया था। इसमें ‘बर्थ टूरिज्म’ को निशाना बनाया गया था। इसमें विदेशी लोग बच्चे के जन्म के लिए अमेरिका आते हैं, ताकि बच्चे को अमेरिकी नागरिकता मिल सके। आदेश में कुछ अन्य मामलों में अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता पर भी रोक लगाने की बात कही गई थी। जज बोलीं- नागरिकता रोकने का अधिकार नहीं जज बोर्डमैन ने कहा कि ट्रम्प का आदेश संविधान के खिलाफ हो सकता है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि इस मामले में आने वाले बच्चे जन्म से अमेरिकी नागरिक हैं। अदालत के आदेश के बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय, गृह सुरक्षा विभाग और सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन फिलहाल इस मामले से जुड़े बच्चों की नागरिकता रोकने की कार्रवाई नहीं कर सकेंगे। सरकार ने फैसले का विरोध किया ट्रम्प प्रशासन ने कहा कि अदालत ने जल्दबाजी में दखल दिया है। सरकार के मुताबिक, आदेश को लागू करने के नियम और दिशा-निर्देश अभी तैयार नहीं हुए थे। जज ने कहा कि मामले में तत्काल अदालत की दखल जरूरी है। राष्ट्रपति की ओर से नागरिकता का अधिकार सीमित करने की कोशिश की अदालत में समीक्षा हो सकती है। प्रवासी संगठनों ने कोर्ट में चुनौती दी थी प्रवासी अधिकार संगठनों CASA और असायलम सीकर एडवोकेसी प्रोजेक्ट ने आदेश के खिलाफ अदालत का रुख किया। उनका कहना था कि इससे कई बच्चों की नागरिकता प्रभावित हो सकती है। उन्होंने मांग की कि मामले की सुनवाई पूरी होने तक इन बच्चों को मिलने वाली नागरिकता पर कोई रोक न लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट पहले भी ट्रम्प को रोक चुका है जन्म से मिलने वाली नागरिकता को लेकर ट्रम्प प्रशासन की कोशिशों पर सुप्रीम कोर्ट भी 30 जून को फैसला दे चुका है। कोर्ट ने प्रशासन की उस कोशिश को रोक दिया था, जिसमें कुछ बच्चों की जन्मसिद्ध नागरिकता खत्म करने की बात कही गई थी। अब फेडरल जज के इस फैसले से ट्रम्प प्रशासन की जन्मसिद्ध नागरिकता सीमित करने की कोशिश को एक और झटका लगा है। बच्चों की नागरिकता के लिए हजारों लोग अमेरिका आते हैं माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट (MPI) के अनुसार, अमेरिका में हर साल जन्म लेने वाले बच्चों में ‘बर्थ टूरिज्म’ से जुड़े मामलों की संख्या बहुत कम होती है। संस्था का अनुमान है कि हर साल 22 हजार से 26 हजार लोग अपने बच्चों को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के उद्देश्य से अमेरिका आते हैं। हालांकि 2024 के सरकारी आंकड़ों में विदेशी पते वाली माताओं से जन्मे केवल 9,600 बच्चों का रिकॉर्ड दर्ज किया गया था। ———————- यह भी पढ़ें…. अमेरिका में 2 लाख विदेशियों के वीजा रद्द होंगे: इतिहास में पहली बार एक साथ इतने वीजा कैंसिल होंगे अमेरिकी सरकार 2 लाख विदेशी नागरिकों के बिजनेस (B1) और टूरिस्ट वीजा (B2) रद्द करने की तैयारी कर रही है। पूरी खबर पढ़ें…
ट्रम्प के जन्मजात नागरिकता से जुड़े आदेश पर रोक:जज बोलीं- सरकार जन्म से मिली नागरिकता नहीं छीन सकती

अमेरिका में फेडरल जज ने बुधवार को ट्रम्प प्रशासन के नए आदेश पर रोक लगा दी। यह आदेश अमेरिका में जन्म से मिलने वाली नागरिकता के नियम सीमित करने के लिए जारी किया गया था। ग्रीनबेल्ट की अमेरिकी जिला जज डेबोरा बोर्डमैन ने बुधवार को यह फैसला दिया। प्रवासी अधिकार संगठनों ने ट्रम्प के आदेश के खिलाफ याचिका लगाई थी। विवाद 30 जून को आए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शुरू हुआ था। तब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन की उस कोशिश को खारिज कर दिया था, जिसमें ऐसे बच्चों की जन्मसिद्ध नागरिकता खत्म करने की बात कही गई थी, जिनके माता-पिता अमेरिकी नागरिक या ग्रीन कार्ड धारक नहीं हैं। ट्रम्प ने बर्थ टूरिज्म को बनाया निशाना इसके बाद ट्रम्प ने 6 अगस्त को नया आदेश जारी किया। इसमें खास तौर पर ‘बर्थ टूरिज्म’ को निशाना बनाया गया था। बर्थ टूरिज्म उस स्थिति को कहा जाता है, जब विदेशी नागरिक अपने बच्चे को अमेरिकी नागरिकता दिलाने के लिए अमेरिका जाकर जन्म देते हैं। नए आदेश में कुछ अन्य श्रेणियों के बच्चों की नागरिकता पर भी सवाल उठाया गया था। नए आदेश के खिलाफ उन बच्चों की ओर से अदालत में याचिका दायर की गई, जिनकी नागरिकता प्रभावित हो सकती थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि मुकदमे के नतीजे आने तक उनकी नागरिकता को पूरी तरह मान्यता दी जाए। सरकार नागरिकता को नकार नहीं सकती जज बोर्डमैन ने याचिकाकर्ताओं से सहमति जताते हुए कहा कि ट्रम्प का नया आदेश भी संविधान के खिलाफ हो सकता है। उन्होंने अपने फैसले में लिखा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इस मामले से जुड़े बच्चे जन्म से अमेरिकी नागरिक हैं। ऐसे में सरकार उनकी नागरिकता को नकार नहीं सकती। अदालत के आदेश के बाद अमेरिकी विदेश मंत्रालय, गृह सुरक्षा विभाग और सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन जैसी संघीय एजेंसियां फिलहाल उन बच्चों की नागरिकता में दखल नहीं दे सकेंगी, जो इस मुकदमे के दायरे में आते हैं। संविधान से मिला हक राष्ट्रपति नहीं बदल सकते इस मामले में प्रवासी अधिकार संगठन CASA और असायलम सीकर अडवोकेट प्रोजेक्ट याचिकाकर्ता हैं। संगठनों का कहना है कि अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों की नागरिकता संविधान से मिला अधिकार है और इसे राष्ट्रपति के आदेश से नहीं बदला जा सकता। सरकार का तर्क – कोर्ट ने जल्दबाजी में दखल दिया अमेरिकी सरकार का तर्क है कि अदालत ने जल्दबाजी में दखल दिया, क्योंकि आदेश को कैसे लागू किया जाएगा, इससे जुड़े नियम और दिशा-निर्देश अभी जारी नहीं हुए हैं। हालांकि जज बोर्डमैन ने कहा कि मामले में तत्काल अदालत की दखल जरूरी है। उन्होंने लिखा कि राष्ट्रपति की ओर से नागरिकता के अधिकार को सीमित करने की यह नई कोशिश भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है। ———————-
रुबियो बोले- भारत-ईरान के बीच ट्रेड डील की जानकारी नहीं:अमेरिकी विदेश मंत्री की चेतावनी- ईरान से ट्रेड करने वालों पर लगाएंगे नए प्रतिबंध

पीएम मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन की मुलाकात के बाद अमेरिका ने भारत-ईरान व्यापार संबंधों को लेकर अपनी स्थिति साफ की है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच फिलहाल किसी ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है। हालांकि, उन्होंने साथ ही चेतावनी दी कि अगर कोई देश ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद करता है तो उस देश पर भी अमेरिका प्रतिबंध लगा सकता है। खबर को लगातार अपडेट किया जा रहा है।







