ड्रैगन फ्रूट Vs बनाना शेक: ड्रैगन फ्रूट और बनाना शेक में कौन सबसे ज्यादा जादुई? जानिए क्या हैं फायदे

ड्रैगन फ्रूट बनाम केला शेक: गर्मी के मौसम में शरीर को वर्गीकृत और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए शेक और लॉजी दोनों ही कमाल किए जाते हैं। दोनों ही अपने-अपने अलग-अलग बन्धुओं के लिए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आपके स्वास्थ्य के लिए इन दोनों में से कौन सबसे बेहतर है?आओ कमलम और खाना शेक दोनों के फायदों के बारे में जानें और अगर दोनों को कंपनी बनाना है तो स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छा पद कौन सा है? ड्रैगन ड्रैगन या कमलम खाने के फायदे ड्रैगन ड्रैगन जिसे कमलम कहा जाता है। इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। ड्रैगन में असली की मात्रा काफी कम होती है और भूखापन होता है। यह वज़न की कोशिश कर रहे लोगों के लिए सर्वोत्तम है। विटामिन-सी की प्रचुरता होती है, जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और प्रतिरोध से लड़ने में मदद करती है।इसमें मौजूद प्रीबायोथिक्स पेट के अच्छे चर्चों को सूचीबद्ध करता है, जिसमें पाचन तंत्र कायम रहता है। ड्रैगन ड्रॉइंग से एंटी एजिंग का काम किया जा सकता है। इससे चेहरे पर चमक आती है। केला एक ऐसा फल है जो हर मौसम में आसानी से उपलब्ध होता है। दूध के साथ इसका मिश्रण एक ‘कम्प्लिट माइल्स’ बनाता है। केले में कार्बोहाइड्रेट्स और इलेक्ट्रॉनिक्स शुगर मौजूद है, जो तुरंत ऊर्जा प्रदान करता है। प्रतिक्रिया करने वालों के लिए यह सबसे अच्छा प्री या पोस्ट-वर्क आउट ड्रिंक है। इसमें साझीदार समानताएं होती हैं, जो मसालों में डूबी रहती हैं और उन्हें मजबूत बनाती हैं। शेक पीने से वजन बढ़ता है और दिल की सेहत में भी सुधार होता है। हार्डवेयर की आपूर्ति को नियंत्रित करने और दिल की सेहत को बनाए रखने में मदद मिलती है। ड्रैगन ड्रॉइंग और बनाना शेक में कौन सा बड़ा जादूगर? ड्रैगन ड्रैगन कम कैलोरी वाला है, जबकि बनाना शेक हाई कैलोरी वाला है। तीन के मामले में ड्रैगन दिखता है आगे। दूध में शेक बनाने के कारण इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। अगर आप वजन कम करना चाहते हैं, डिटॉक्स करना चाहते हैं या ग्लोइंग त्वचा की तलाश में हैं, तो ड्रैगन ड्रॉइंग आपके लिए सबसे अच्छा है। (टैग अनुवाद करने के लिए)ड्रैगन फ्रूट बनाम केला शेक कैलोरी(टी)ड्रैगन फ्रूट बनाम केला शेक(टी)ड्रैगन फ्रूट केला स्मूदी लाभ(टी)ड्रैगन फ्रूट बनाम केला शेक पोषण(टी)वजन घटाने के लिए ड्रैगन फ्रूट बनाम केला शेक(टी)वजन घटाने के लिए ड्रैगन फ्रूट और केला स्मूदी
पन्ना में बाघ ने महिला पर हमला किया:2 किमी कंधे पर लादकर घायल को गांव पहुंचाया, अस्पताल में भर्ती

पन्ना जिले के उत्तर वन मंडल के विश्रामगंज रेंज में एक बाघ ने महुआ बीनकर लौट रही महिला पर हमला कर दिया। ग्रामीणों के साहस से महिला की जान बच गई। उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है। यह घटना विश्रामगंज रेंज के टगरा बीट के कक्ष क्रमांक 299 (महुआ टोला) में हुई। शाम करीब 6:00 बजे, हीरापुर टपरियन निवासी 35 वर्षीय रामकली कोंदर पति किशन कोंदर अपने साथियों के साथ घर लौट रही थीं। तभी घात लगाए बैठे बाघ ने उन पर अचानक हमला कर दिया। बाघ ने महिला की टांग पकड़ ली और उसे घसीटकर घने जंगल की ओर ले जाने लगा। महिला की चीख-पुकार सुनकर मौके पर मौजूद 6-7 ग्रामीणों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने शोर मचाते हुए लकड़ियों से बाघ पर हमला किया। ग्रामीणों के इस सामूहिक प्रयास से बाघ महिला को छोड़कर जंगल में भाग गया। प्रत्यक्षदर्शी नंद लाल ने बताया कि इस दुर्गम जंगली इलाके में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं था, जिससे तत्काल मदद नहीं मिल सकी। ग्रामीणों ने महिला के पैर में कपड़ा बांधकर खून रोका। इसके बाद, ग्रामीणों ने घायल महिला को कंधे पर लादकर लगभग 2 किलोमीटर पैदल चलकर गांव तक पहुंचाया। वहां से उसे जिला चिकित्सालय पन्ना ले जाया गया। विश्रामगंज रेंजर अजय बाजपेई ने बताया कि महिला को तत्काल इलाज के लिए भर्ती कराया गया है और उसे आर्थिक सहायता राशि भी प्रदान की गई है। उन्होंने ग्रामीणों को महुआ के सीजन में अकेले जंगल में न जाने की सलाह दी है। घायल महिला का उपचार जिला चिकित्सालय पन्ना में जारी है। उसके पैर और कंधे में गंभीर चोटें आई हैं।
राजमा और छोले भिगोना भूल गए, कुकर में उबालते समय ट्राई करें ये सिंपल ट्रिक, 3-4 सीटी में ही होगा सॉफ्ट

काफी लोगों को छोले-भटूरे, राजमा-चावल खाना बहुत अच्छा लगता है. जगह-जगह आपको राजमा-चावल, छोले भटूरे वाले ठेले मिल जाएंगे. लोग इन्हें बहुत चाव से खाते हैं. राजमा और छोले बेहद ही पौष्टिक दाल बेस्ड फलियां (Beans) हैं. राजमा (kidney beans) और सफेद छोले या काबुली चने दोनों ही प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होते हैं. कई बार राजमा और सफेद छोले को पकाने में काफी समय लग जाते हैं. खासकर तब, जब आप इन्हें रात में पानी में भिगोकर रखना भूल जाएं. जब आप इसे कुकर में पकाने की कोशिश करते हैं तो ये जल्दी पकते नहीं हैं. खाने में ये सख्त, कच्चे और हार्ड लगते हैं. कोई बात नहीं, जब भी आप इन्हें रात में भिगोना भूल जाएं तो राजमा या छोले को पकाते समय इस एक ट्रिक को जरूर फॉलो करें. कुकर में जब आप इसे उबालें तो उसमें ये एक चीज डाल दें. राजमा में पाए जाने वाले पोषक तत्वराजमा में प्रोटीन, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, पोटैशियम, फोलेट, मैग्नीशियम आदि होते हैं. राजमा खाने से हार्ट हेल्दी रहता है. ब्लड प्रेशर कंट्रोल रहता है. वजन नहीं बढ़ता है, क्योंकि इसमें फाइबर होता है. प्रोटीन से मांसपेशियों को मजबूती मिलती है. शरीर को रिपेयर करने के लिए प्रोटीन जरूरी है. वेज खाने वालों के लिए प्रोटीन का बेहतर सोर्स है. पाचन बेहतर रहता है. कब्ज नहीं होता है. शरीर को एनर्जी मिलती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. छोले में मौजूद पोषक तत्वछोले यानी सफेद चना भी कई तरह के पोषक तत्वों से भरपूर होता है. इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन, कार्बोहाइड्रेट, फोलेट, पोटैशियम, मैग्नीशियम आदि भरपूर होते हैं. काबुली चने खाने से हड्डियां मजबूत होती हैं. हार्ट स्वस्थ रहता है. फाइबर भूख कंट्रोल करके वजन को बढ़ने से रोकता है. पोटैशियम ब्लड प्रेशर को काबू में रखता है. छोले को पानी में रातभर भिगोकर और अच्छी तरह से पकाकर ही खाना चाहिए. एक बार में ही अधिक खाने से बचें वरना पेट फूल सकता है, गैस की समस्या हो सकती है. राजमा और छोले को जल्दी पकाने का तरीका-जब आप रात में राजमा और छोले पानी में डुबाकर रखना भूल जाएं तो इसे आसानी से गलाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. इसे पकाने में 1 से 2 घंटे लग जाते हैं और कुकर में 7-8 सीटियां लगाने के बाद भी ये कच्चे और सख्त ही खाने में लगते हैं, तो आप यहां बताए गए इस एक ट्रिक को ट्राई करके देखिए. -राजमा और छोले को जल्दी पकाने के लिए आपको लेनी होगी एक अदरक. जब आप राजमा या छोला कुकर में बंद कर उबालें तो उसमें ये अदरक का टुकड़ा डाल दें. ये ट्रिक सोशल मीडिया पर शेयर किया गया है, जिसे लोग आजमाकर देख रहे हैं. -छोले या राजमा जो भी बनाना हो, उसे पानी से धोकर कुकर में डालें. इसमें एक गिलास पानी, एक छोटा टुकड़ा अदरक का डाल, थोड़ा सा नमक, हल्दी पाउडर डाल दें. कुकर का ढक्कन लगा दें. कुकर में 3 से 4 सीटी लगने दें. जब आप कुकर का ढक्कन हटाएंगे तो ये अच्छी तरह से पके हुए मिलेंगे. अब आप इसे अपने तरीके से तेल, मसाले, टमाटर, प्याज में पका लें. इसके लिए ढक्कन लगाकर पकाने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. अगर आपने सुबह ही पानी में राजमा या छोले भिगोया है, तो भी इसे जल्दी पकाने के लिए अदरक वाला ये ट्रिक ट्राई कर सकते हैं. – दरअसल, राजमा और छोले में एक खास तरह का कॉम्प्लेक्स शुगर होता है, जिसे ओलिगोसैचेराइड्स (Oligosaccharides) कहते हैं. पाचन तंत्र इसे आसानी से पचा नहीं पाता है. एब्जॉर्ब नहीं कर पाता है. ये शुगर आंतों में फर्मेंटेशन का कारण बनते हैं. इस वजह से काफी लोगों को राजमा और छोले खाने से गैस की समस्या शुरू हो जाती है. – वहीं, अदरक में मौजूद तत्व जिंजरोल इस शुगर को बहुत तेजी से तोड़ता है. इस वजह से राजमा और छोले या फिर कोई अन्य अनाज, फलियां भी जल्दी पक जाती हैं. इससे गैस की समस्या भी नहीं होगी. अदरक डालने से ये दोनों ही चीजें जल्दी पच भी जाएंगी. ये आसानी से नहीं पचते हैं. ये वात-वर्धक होते हैं. अदरक से इनमें मौजूद वात दोष कम हो सकता है. इस तरह से इन्हें पचाना आसान हो जाता है.
युवा वयस्कों में उच्च कोलेस्ट्रॉल: 20-30 वर्ष की आयु में बढ़ रहा है कोलेस्ट्रॉल, ये लक्षण खतरनाक होना होगा; बचाव के लिए क्या करें?

युवा वयस्कों में उच्च कोलेस्ट्रॉल: आज के दौर में खराब लाइफस्टाइल और गलत खान-पान की गलत स्थिति ने शर्त का चेहरा बदल दिया है। जो बीमारी पहले 50 और 60 की उम्र के बाद देखने को मिलती है, वहीं बीमारी आज 20 और 30 की उम्र में देखने को मिल रही है। इसके शिकार विशेष रूप से युवा हो रहे हैं। ये है सबसे खतरनाक बीमारी हाई कॉलेस्ट्रोल। युवाओं में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल न केवल उनके स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, बल्कि भविष्य में हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी सामान्य स्थिति देखने को मिल रही है। युवा इंडस्ट्री में बढ़ती उम्र का मुख्य कारण पिज्जा, बर्गर और कॉमर्स फूड में मौजूद ‘ट्रांस फाइट’ सीधे तौर पर खराब टुकड़ों को पेश किया जाता है।चौथे डेस्क पर काम करना और फ्लेक्स की कमी से शरीर में मेटाबॉलिज्म को धीमा कर दिया जाता है।क्रिटिक्स और निजी जीवन का तनाव शरीर में कोर्टिसोल की रैंकिंग बढ़ी है, जो चॉकलेट को प्रभावित करता है। एल्स को अक्सर ‘सैलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते हैं। बिना किसी भारी काम के, थकान और कमजोरी महसूस होना।सीढ़ियाँ चढ़ने की गति या थोड़ी तेज़ गति से चलने पर संसार का असामान्य रूप से फूलना।रेलवे में कोलेस्ट्रॉल जमने से रक्त सरकुलेशन प्रभावित होता है, जिससे हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन हो सकता है।कभी-कभी मांसपेशियों में दर्द या दबाव महसूस होता है, जो भविष्य में एंजाइना का रूप ले सकता है।आंखों की पलकों के आस-पास छोटे-छोटे पीले रंग के शांत अवशेष जमा होने का संकेत हैं। आपके खाने में ओट्स, हरी जड़ी-बूटियाँ, फल और ओमेगा-3 एसिडिटी से भरपूर चीज़ें शामिल हैं। तली-भुनी से दूरी।दिन में कम से कम 30-40 मिनट की वॉक, रनिंग या अंधविश्वास जरूर करें। यह गुड चॉकलेट को बढ़ाने में मदद करता है।बढ़ा हुआ वजन वाला छात्र का सबसे बड़ा दोस्त है। अपने बीएमआई को सामान्य रखने की कोशिश करें।अगर आप 20 साल की उम्र पार कर चुके हैं, तो हर साल कम से कम एक बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट जरूर करवाएं। (टैग्सटूट्रांसलेट)युवा वयस्कों में उच्च एलडीएल कोलेस्ट्रॉल(टी)उच्च कोलेस्ट्रॉल के लक्षण(टी)एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर(टी)युवा वयस्कों में हृदय जोखिम(टी)युवाओं में उच्च कोलेस्ट्रॉल(टी)जीवनशैली और कोलेस्ट्रॉल(टी)पेट की चर्बी और कोलेस्ट्रॉल(टी)लिपिड प्रोफाइल परीक्षण
एक अच्छी चीज़ का बहुत ‘माच’? कैसे बंगाल चुनाव अभियान ‘मछली बाज़ार’ में बदल गया | चुनाव समाचार

आखरी अपडेट:10 अप्रैल, 2026, 20:05 IST तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ने बंगाल में ‘माच’ (मछली) को एक केंद्रीय अभियान उपकरण में बदल दिया है। मछली को एक शीर्ष स्तरीय राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभारना सांस्कृतिक थोपे जाने को लेकर गहरी चिंता से उपजा है। प्रतीकात्मक तस्वीर जैसे-जैसे 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, राजनीतिक विमर्श उच्च-स्तरीय नीति से हटकर बंगाली रसोई के केंद्र में आ गया है। ऐसे राज्य में जहां मछली केवल भोजन नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ने “माच” (मछली) को एक केंद्रीय अभियान उपकरण में बदल दिया है। जो कभी घरेलूता का प्रतीक था, वह अब क्षेत्रीय गौरव और धार्मिक स्वायत्तता पर एक उच्च दांव की लड़ाई में सबसे आगे है। 2026 में मछली अंतिम अभियान हथियार क्यों बन गई है? मछली को एक शीर्ष स्तरीय राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभारना सांस्कृतिक थोपे जाने को लेकर गहरी चिंता से उपजा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव को स्थानीय बंगाली परंपराओं और जिसे वह “दिल्ली के नेतृत्व वाले शाकाहार” के रूप में संदर्भित करती हैं, के बीच एक विकल्प के रूप में तैयार किया है। बिहार और असम जैसे पड़ोसी राज्यों में मांस और मछली पर प्रतिबंधों को उजागर करके, टीएमसी ने एक कहानी बनाई है कि भाजपा की जीत से राज्य-शासित आहार में बदलाव आएगा। इसके विपरीत, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्योग के अर्थशास्त्र को हथियार बना लिया है। 9 अप्रैल को हल्दिया में एक हाई-प्रोफाइल रैली के दौरान, प्रधान मंत्री ने मछली उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने में विफलता के लिए राज्य सरकार की आलोचना की। उन्होंने इस विडंबना की ओर इशारा किया कि बंगाल की विशाल तटरेखा और नदी नेटवर्क के बावजूद, राज्य आंध्र प्रदेश और तेजी से गुजरात जैसे राज्यों से मछली आयात पर बहुत अधिक निर्भर है। बीजेपी ‘शाकाहारी पार्टी’ लेबल का मुकाबला कैसे कर रही है? टीएमसी के “बाहरी” कथन को बेअसर करने के लिए, भाजपा ने दृश्य और पाक संरेखण की रणनीति अपनाई है। एक क्षण जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, उसमें बिधाननगर के भाजपा उम्मीदवार डॉ. शरदवत मुखर्जी को एक विशाल कतला मछली ले जाते हुए स्थानीय बाजारों में प्रचार करते देखा गया। यह “फिश-इन-हैंड” कूटनीति यह संकेत देने का सीधा प्रयास है कि भगवा खेमे का आहार प्रतिबंध लगाने का कोई इरादा नहीं है। राज्य भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने स्वामी विवेकानंद की मांसाहारी भोजन की ऐतिहासिक स्वीकृति का हवाला देते हुए इसे मजबूत किया है और कहा है कि पार्टी बंगाल की अनूठी पाक विरासत का सम्मान करती है। पार्टी अनिवार्य रूप से दो-ट्रैक अभियान चला रही है: बंगाल की मत्स्य पालन को आधुनिक बनाने के लिए “नीली क्रांति” का वादा करना और साथ ही साथ अपने “बंगालीपन” को साबित करने के लिए सार्वजनिक मछली खाने के कार्यक्रमों में भाग लेना। बयानबाजी के पीछे आर्थिक वास्तविकताएँ क्या हैं? जबकि बयानबाजी पहचान पर केंद्रित है, अंतर्निहित तथ्य इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकट की ओर इशारा करते हैं। पश्चिम बंगाल भारत का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक बना हुआ है, फिर भी इसे लगातार घाटे का सामना करना पड़ रहा है। बांग्लादेश में पद्मा नदी से बेशकीमती हिल्सा (इलिश) की आपूर्ति भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेजी से अस्थिर हो गई है, जिससे कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे मध्यम वर्ग की जेब पर असर पड़ रहा है। भाजपा ने इस निर्भरता को कम करने के लिए उन्नत मछलीपालन तकनीकों और समुद्री भोजन प्रसंस्करण केंद्रों को लागू करने का वादा किया है। इस बीच, टीएमसी ने स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदाय के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में अपनी “जल धरो जल भरो” जल संरक्षण योजना पर प्रकाश डाला। औसत मतदाता के लिए, बहस उत्पादन आंकड़ों के बारे में कम और “प्लेट टेस्ट” के बारे में अधिक है – क्या उनकी पसंदीदा मछली सस्ती रहेगी और क्या इसे खाने का उनका अधिकार निर्विवाद रहेगा। क्या खाद्य पहचान 2026 के लिए निर्णायक कारक है? जैसे-जैसे मतदान की तारीखें नजदीक आ रही हैं, अभियान का “मछली-आंख” फोकस बताता है कि बंगाल में पहचान की राजनीति भाषा और धर्म से परे प्लेट के दायरे में आ गई है। टीएमसी का “माच-भात” (मछली और चावल) का नारा 90 प्रतिशत मांसाहारी वोट बैंक को मजबूत करने के लिए बनाया गया एक शक्तिशाली भावनात्मक उपकरण है। यदि भाजपा मतदाताओं को सफलतापूर्वक यह विश्वास दिला सकती है कि वह आपूर्ति श्रृंखला को ठीक करते समय उनके आहार विकल्पों की रक्षा करेगी, तो वह अंततः “अंदरूनी-बाहरी” बाधा को तोड़ सकती है। हालाँकि, अगर सांस्कृतिक एकरूपता का डर बना रहता है, तो विनम्र मछली अच्छी तरह से वह कांटा हो सकती है जो टीएमसी को सत्ता में बनाए रखती है। 2026 में, राज्य सचिवालय, नबन्ना का मार्ग स्पष्ट रूप से बंगाल के हलचल भरे मछली बाजारों से होकर गुजरता है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना पहले प्रकाशित: 10 अप्रैल, 2026, 20:05 IST समाचार चुनाव एक अच्छी चीज़ का बहुत ‘माच’? कैसे बंगाल चुनाव अभियान ‘मछली बाज़ार’ में बदल गया अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)पश्चिम बंगाल(टी)टीएमसी(टी)ममता बनर्जी(टी)बीजेपी(टी)मछली
अनूपपुर फ्लाईओवर: सर्विस लाइन निर्माण में फंसा जमीन का पेंच:वन विभाग की दीवार और रेलवे क्वार्टर बना बाधा; जून तक बहाल होगा यातायात

अनूपपुर जिला मुख्यालय पर निर्माणाधीन रेलवे ओवरब्रिज के निर्माण में तेजी आई है, लेकिन सर्विस लाइन का काम जमीनी विवाद में फंस गया है। रेलवे फाटक से कोतवाली तिराहे के बीच एक ओर वन विभाग की दीवार और दूसरी ओर रेलवे क्वार्टर का हिस्सा मार्ग में आ रहा है। इसके कारण फिलहाल इस हिस्से में सर्विस लाइन की सुविधा नहीं मिल सकेगी। सेतु निगम ने फिलहाल इस कार्य को रोककर मुख्य रिटेनिंग वॉल के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया है। जून तक पुल पर यातायात बहाल करने का लक्ष्य सेतु निगम शहडोल के एसडीओ प्रदीप सिंह बघेल ने बताया कि बारिश से पहले जून तक फ्लाईओवर ब्रिज का मुख्य कार्य पूरा कर लिया जाएगा। रिटेनिंग वॉल में मिट्टी भरने और ऊपरगामी मार्ग को तैयार करने का काम जारी है। विभाग का दावा है कि जून माह में पुल पर आवागमन बहाल कर दिया जाएगा, जिससे रेलवे फाटक के दोनों ओर फंसे रहने वाले नागरिकों को बड़ी राहत मिलेगी। 8 साल की देरी और ब्लैक लिस्ट की चेतावनी 20 करोड़ की लागत से बन रहा यह ब्रिज पिछले 8 वर्षों से लंबित है, जबकि इसे मात्र 18 महीने में पूर्ण होना था। निर्माण की सुस्त गति को देखते हुए कलेक्टर हर्षल पंचोली ने ठेकेदार को 10 अप्रैल से ब्लैक लिस्ट करने और 6 प्रतिशत जुर्माना लगाने की चेतावनी दी थी। प्रशासनिक सख्ती के बाद ठेकेदार ने मौके पर मशीनरी और मैनपावर बढ़ाकर काम की गति तेज की है। वन विभाग और रेलवे से पत्राचार जारी सर्विस लाइन के लिए आवश्यक भूमि को लेकर सेतु निगम ने वन विभाग और रेलवे से संपर्क किया है। वन विभाग ने वरिष्ठ अधिकारियों से इस संबंध में राय मांगी है, लेकिन वहां से जवाब मिलने में हो रही देरी ने काम को प्रभावित किया है। एसडीओ ने बताया कि जब तक भूमि का पेंच नहीं सुलझता, तब तक कोतवाली तिराहे की ओर सर्विस रोड का निर्माण संभव नहीं होगा।
टाटा संस की लिस्टिंग के पक्ष में आए शापूरजी मिस्त्री:बोले- यह केवल रेगुलेटरी जरूरत नहीं, बल्कि ट्रांसपेरेंसी के लिए जरूरी कदम

शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप के चेयरमैन शापूरजी पलोनजी मिस्त्री ने एक बार फिर टाटा संस की लिस्टिंग की वकालत की है। शुक्रवार को जारी एक बयान में मिस्त्री ने कहा कि टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट करना जरूरी है। इससे न केवल ग्रुप में पारदर्शिता यानी ट्रांसपेरेंसी बढ़ेगी, बल्कि गवर्नेंस और जवाबदेही भी मजबूत होगी। बता दें कि टाटा संस में शापूरजी पलोनजी ग्रुप की करीब 18% हिस्सेदारी है। पब्लिक लिस्टिंग से टाटा ट्रस्ट्स को फायदा होगा शापूरजी मिस्त्री ने कहा कि टाटा संस की लिस्टिंग केवल कानूनी नियमों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह टाटा ग्रुप के बुनियादी सिद्धांतों को और मजबूती देगी। उन्होंने तर्क दिया कि अब तक ऐसा कोई ठोस कारण या सबूत सामने नहीं आया है जो यह बताए कि पब्लिक लिस्टिंग से टाटा ट्रस्ट्स के हितों को नुकसान होगा या उनकी लोक कल्याणकारी गतिविधियों में कोई कमी आएगी। आम निवेशकों और शेयरधारकों को लाभ मिलेगा मिस्त्री के अनुसार, टाटा संस के लिस्ट होने से बोर्ड की जवाबदेही बढ़ेगी और निवेशकों का आधार भी बड़ा होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इससे लाखों रिटेल शेयरधारकों के लिए वैल्यू अनलॉक होगी। इसके अलावा, टाटा ट्रस्ट्स के लिए डिविडेंड (लाभांश) का एक तय और मजबूत जरिया बनेगा, जिससे समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए किए जाने वाले परोपकारी कामों में और तेजी आएगी। RBI के नियमों का हवाला दिया समाधान के लिए RBI से उम्मीद शापूरजी मिस्त्री ने बताया कि SP ग्रुप इस मामले के शांतिपूर्ण समाधान के लिए टाटा संस के नेतृत्व के साथ चर्चा कर रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे इस मामले में एक ठोस दिशा के लिए रिजर्व बैंक की ओर देख रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि भारत सरकार और RBI इस लिस्टिंग को लेकर निर्णायक कदम उठाएंगे। क्या है पूरा विवाद? हिस्सेदारी का गणित: टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की करीब 66% हिस्सेदारी है, जबकि शापूरजी पलोनजी परिवार के पास 18.4% हिस्सा है। RBI का नियम: सितंबर 2022 में RBI ने टाटा संस को ‘अपर लेयर’ NBFC घोषित किया था। इसके तहत कंपनी को 3 साल के भीतर (सितंबर 2025 तक) शेयर बाजार में लिस्ट होना जरूरी है। टाटा का रुख: टाटा संस अपनी होल्डिंग कंपनी के ढांचे को बदलने या कर्ज चुकाकर इस नियम से बचने के रास्ते तलाश रही है, ताकि उसे लिस्ट न होना पड़े। वहीं, SP ग्रुप चाहता है कि लिस्टिंग हो ताकि उनकी हिस्सेदारी की सही वैल्यू लग सके। ये खबर भी पढ़ें… चांदी आज ₹4855 बढ़कर ₹2.41 लाख पर पहुंची: सोना ₹368 महंगा होकर ₹1.50 लाख के पार, इस साल ₹17 हजार दाम बढ़े सोना-चांदी के दाम में शुक्रवार को तेजी है। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, एक किलो चांदी 4,855 रुपए बढ़कर 2,41,013 लाख रुपए पर पहुंच गई है। इससे पहले 9 अप्रैल को कीमत 2,36,158 रुपए प्रति किलो थी। वहीं, 10 ग्राम 24 कैरेट सोना 368 रुपए बढ़कर 1,50,305 रुपए पर पहुंच गया। इससे पहले गुरुवार को कीमत 1,49,937 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम थी। पूरी खबर पढ़ें…
खड़गे बोले- महिला आरक्षण संशोधन जल्दबाजी में लाया जा रहा:सरकार आचार संहिता का उल्लंघन कर रही; लोकसभा सीटें 543 से 816 होंगी

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को कहा कि सरकार महिला आरक्षण संशोधन और लोकसभा में सीटें बढ़ाने की बिल जल्दबाजी में ला रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान संसद सत्र बुलाना अचार संहिता का उल्लंघन है। सरकार बिल को जल्द से जल्द पास कराना चाहती है, ताकि आने वाले विधानसभा चुनावों में इसका फायदा मिल सके। आज दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) की इस मुद्दे पर बैठक हुई। इसमें खड़गे ने कहा कि अब तक सरकार की ओर से कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं मिला है। जानकारी सिर्फ प्रधानमंत्री के लेटर के जरिए सामने आई है। लंबे समय तक चुप रहने के बाद अब अचानक इस मुद्दे पर सक्रियता दिखाई जा रही है। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का सत्र बुलाया बुलाया है। इस दौरान संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी है। सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देने के साथ लोकसभा और विधानसभा सीटों में 50% तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव ला सकती है। इसके तहत लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 816 हो जाएगी। बैठक की चार मुख्य बातें… इसी बीच राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कांग्रेस महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध है। CWC की बैठक में महिला आरक्षण, परिसीमन और पश्चिम एशिया के हालात पर भी चर्चा हुई। एक दिन पहले सरकार ने ड्राफ्ट को मंजूरी दी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को कैबिनेट मीटिंग में नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के ड्राफ्ट बिल को मंजूरी दे दी थी। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा की सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर 816 की जाएंगी, जिनमें 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। परिसीमन कानून में संशोधन के लिए अलग बिल लाएगी सरकार राज्यों की विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में सीटों का आरक्षण होगा। सरकार एक संशोधन बिल के एक संविधान साथ-साथ परिसीमन कानून में संशोधन के लिए अलग साधारण बिल भी लाएगी। ताकि नए सिरे से सीटों का निर्धारण हो सके। नई सीटों का निर्धारण 2027 की जनगणना के बजाय 2011 की जनगणना के आधार पर किया जा सकता है। यह कानून राज्यों की विधानसभाओं और दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया जाएगा। महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 सीटें बढ़ेंगी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है। 1931 में पहली बार महिला आरक्षण का मुद्दा उठा था 1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिला आरक्षण पर पहली बार चर्चा हुई, लेकिन प्रस्ताव अंततः खारिज कर दिया गया। बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया। 1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया। इसके कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया। 1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इसमें पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की सिफारिश की 1988: राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी। 1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है। ————————– ये खबर भी पढ़ें… 2029 चुनाव से पहले लागू होगा 33% महिला आरक्षण:लोकसभा सीटें बढ़कर 816 होंगी, महिला सांसदों की संख्या 273 तक पहुंचेगी केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने की तैयारी में है। इसके लिए संसद के मौजूदा सत्र में दो बिल लाए जा सकते हैं। इसके जरिए महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्त में बदलाव किया जाएगा। पूरी खबर पढ़ें…
बाजार में मिलने वाला आम नेचुरल तरीके से पका है या कार्बाइड से, ऐसे करें पहचान, खा सकेंगे मीठे, रसीले Mango

Ways to check the quality of mangoes: फलों का राजा आम खाने के शौकीनों की कोई कमी नहीं है. हर किसी को गर्मियों का मौसम आते ही आम का इंतजार बेसब्री से रहता है. मुख्य रूप से मई से जुलाई तक के महीने में आम मार्केट में मिलते रहते हैं. आम के कई वेरायटी हैं और सभी का रगं, आकार, स्वाद, बनावट एक-दूसरे से अलग होता है. लेकिन, आम कोई सा भी क्यों न हो, ये सेहत के लिए बेहद हेल्दी होते हैं. बाजार रंग-बिरंगे आमों से भर जाता है, लेकिन जब आप मार्केट में आम खरीदने जाते हैं तो समझ नहीं आता है कि कौन सा आम नेचुरल तरीके से पकाया गया है और कौन सा कार्बाइड से पका है. कार्बाइड से पका आम स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक होता है. इससे पके आम को आप रेगुलर खाएंगे तो आपके लिवर, किडनी, आंतों पर नकारात्मक असर पड़ेगा. ऐसे में मार्केट में मिलने वाले आम कौन से हेल्दी हैं और कौन से हानिकारक, किसे नेचुरल तरीके से पकाया गया है, कौन सा मीठा और खट्टा है, ये आप इन तरीकों से पहचानें. आम की गुणवत्ता को पहचानने का तरीका -स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बाजार में बिकने वाले कई आम प्राकृतिक तरीके से नहीं, बल्कि केमिकल के जरिए जल्दी पकाए जाते हैं, जो शरीर पर गंभीर असर डाल सकते हैं. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. -जो आम प्राकृतिक रूप से पके होते हैं, उनमें एक खास तरह की मिठास, ताजगी भरी खुशबू होती है. इसे आप दूर से ही महसूस कर सकते हैं. वहीं, केमिकल से पकाए गए आमों में यह प्राकृतिक सुगंध लगभग न के बराबर होती है. उनका रंग भी असामान्य रूप से चमकीला पीला होता है. ये देखने में आकर्षक लगते हैं, लेकिन यह उनकी असल गुणवत्ता को छुपा सकता है. -वैज्ञानिकों के अनुसार, प्राकृतिक आम का रंग हल्का हरा और पीला होता है. ये अंदर से पूरी तरह पका होता है, जबकि कृत्रिम रूप से पकाए गए आम अक्सर बाहर से पीले और अंदर से कच्चे रह जाते हैं. -आप पानी में डालकर ये जान सकते हैं कि आप नेचुरल तरीके से पका है या नहीं. यदि आम पानी में डालते ही डूब जाता है तो आम प्राकृतिक रूप से पका है, क्योंकि ये भारी होता है. -केमिकल कार्बाइड से पकाया गया आम वजन में हल्का होता है. इसे पानी में डालेंगे तो तैरता रहेगा. केमिकल से पकाए गए आम को खाने से कई बार जीभ में जलन, गले में हल्की परेशानी महसूस हो सकती है. -कैल्शियम कार्बाइड एक खतरनाक रसायन है. अक्सर आम विक्रेता अपने फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करके आम को जल्दी पकाने की कोशिश करते हैं. इससे एसिटिलीन नाम की गैस निकलती है, जो शरीर के लिए हानिकारक होती है. इसमें आर्सेनिक और फॉस्फोरस जैसे तत्व भी हो सकते हैं, जो लंबे समय तक शरीर में रहने पर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. -केमिकल से पके हुए आम को खाने से आपको दस्त, पेट दर्द, उल्टी, डायरिया, गले में जलन, मुंह में छाले जैसी समस्याएं हो सकती हैं. अधिक सेंसेटिव लोगों को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है. चक्कर आ सकता है. नींद आने में समस्या हो सकती है. लंबे समय तक ऐसे फलों का सेवन करने से लिवर और किडनी को भी नुकसान पहुंचा सकता है. ये केमिकल कैंसर के रिस्क को भी बढ़ा सकता है.
हज यात्रियों की परेशानी पर भोपाल में प्रदर्शन:चूड़ियां लेकर औकाफ-ए-शाही पहुंचीं महिलाएं; रुबात बंद होने पर हाजियों का विरोध

भोपाल में हज यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। शुक्रवार को मुस्लिम समाज के लोग औकाफ-ए-शाही कार्यालय पहुंचे, जहां महिलाओं ने चूड़ियां लेकर विरोध जताया। आरोप है कि मक्का-मदीना की रुबात (धर्मशाला) बंद होने से हाजियों पर लाखों का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। कमेटी ने चेतावनी दी है कि जल्द समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन तेज किया जाएगा। बता दें कि हज यात्रा के लिए इस साल करीब 8 हजार लोग मध्य प्रदेश से जा रहे हैं। 18 अप्रैल को भारत से पहली फ्लाइट सऊदी अरब जाएगी। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने पोस्टर और बैनर लेकर नारेबाजी की। पोस्टर्स पर लिखा था “शाही औकाफ होश में आओ, लापरवाही नहीं चलेगी, जवाब दो”, “सोते हुए शहर को जगाने आए हैं, बंद रुबातों को खुलवाने आए हैं”, “रुबातें हमारा हक है, बहाल करो”। महिलाओं ने चूड़ियां देकर जताया विरोध प्रदर्शन में शामिल सरवर जहां ने कहा कि पिछले कई वर्षों से भोपाल के हाजी रुबात सुविधा से वंचित हैं। उन्होंने कहा, “यह हमारी बेगमात की धरोहर है। अगर जिम्मेदार लोग काम नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें चूड़ियां पहनकर घर बैठ जाना चाहिए। आज एक महिला बैठी है, कल सैकड़ों महिलाएं भी आ सकती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि समाज की महिलाएं धूप में बैठकर विरोध कर रही हैं, जबकि अधिकारी मिलने तक नहीं आए। 6 साल से मदीना की रुबात बंद, इस साल मक्का भी प्रभावित जिम्मेदार गायब, जवाब देने को कोई तैयार नहीं प्रदर्शन में शामिल आबिद मोहम्मद खान ने आरोप लगाया कि एक हफ्ते पहले लिखित आवेदन देने के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने कहा, “कार्यालय में कोई जिम्मेदार मौजूद नहीं है, मोबाइल बंद हैं। जब हमारी खुद की रुबातें मौजूद हैं, तो हमें किराए पर क्यों रुकना पड़ रहा है?” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि समन्वय की कमी और आंतरिक विवादों के कारण रुबात व्यवस्था प्रभावित हुई है। प्रशासन बोला- उच्च स्तर पर चल रहे प्रयास औकाफ-ए-शाही के प्रशासनिक प्रबंधक फारूक किबरिया ने कहा कि मामले में उच्च स्तर पर प्रयास जारी हैं। उन्होंने बताया कि सऊदी सरकार की प्रक्रियाओं में देरी के कारण इजाजतनामा मिलने में समय लगा है, जिससे भवन लेने में दिक्कत आई। उन्होंने कहा कि बोर्ड, चेयरमैन और सरकार के स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं और जल्द समाधान की उम्मीद है। कमेटी की मांगें रुबात क्या है रुबात दरअसल मक्का और मदीना में बनी ऐसी धर्मशालाएं या सराय होती हैं, जिन्हें पुराने समय में रियासतों और नवाबी दौर में हज यात्रियों की सुविधा के लिए बनवाया गया था। इनका मकसद यह था कि संबंधित रियासतों जैसे भोपाल के हाजी वहां मुफ्त या बेहद कम खर्च में ठहर सकें। भोपाल की बेगमों ने भी अपने दौर में हाजियों के लिए मक्का-मदीना में रुबात बनवाई थीं, ताकि शहर के लोग हज के दौरान आर्थिक बोझ से बच सकें और अपनी “रियासती धरोहर” का लाभ ले सकें। रुबात सिर्फ ठहरने की जगह नहीं, बल्कि नवाबी दौर की एक ऐतिहासिक विरासत मानी जाती है। शहर की बेगमों द्वारा मक्का और मदीना में बनवाई गई इन रुबातों का उद्देश्य भोपाल, सीहोर और रायसेन के हाजियों को हज के दौरान मुफ्त या रियायती ठहरने की सुविधा देना था। यही वजह है कि आज जब ये रुबातें बंद हैं या हाजियों को उपलब्ध नहीं हो पा रहीं, तो इसे सिर्फ सुविधा का नहीं बल्कि “हक और विरासत” का मुद्दा मानकर विरोध हो रहा है।








