‘अनुराग कश्यप ने ट्रेलर कहा बकवास:सुमित गहलावत बोले- सबकी अपनी सोच है, द केरला स्टोरी 2 का बीफ सीन हर कोई देखें

‘द केरल स्टोरी’ के पहले भाग ने देशभर में तीखी बहस को जन्म दिया था। फिल्म को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। अब इसका दूसरा भाग एक नई कहानी और नए किरदारों के साथ दर्शकों के सामने आने वाला है। फिल्म के इस भाग में अभिनेता सुमित गहलावत सलीम नामक एक अहम और परतदार किरदार निभा रहे हैं। लगभग 12 वर्षों से इंडस्ट्री में सक्रिय सुमित का कहना है कि यह उनके करियर की अब तक की सबसे बड़ी और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से एक है। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने फिल्म, विवाद, संघर्ष और अपने सफर पर खुलकर बात की हैं। आपकी फिल्में, जैसे द केरल स्टोरी और बस्तर: द नक्सल स्टोरी, अक्सर राजनीतिक और वैचारिक बहस को जन्म देती हैं। एक कलाकार के रूप में आप इन प्रतिक्रियाओं और विवादों को किस नजरिए से देखते हैं? मैं व्यक्तिगत रूप से हर फिल्म को सिर्फ सिनेमा के रूप में देखता हूं। एक अभिनेता के तौर पर मेरा काम है अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाना। विषय राजनीतिक है, सामाजिक है या विवादित है यह लेखक और निर्देशक का दृष्टिकोण होता है। मैं स्क्रिप्ट पढ़ते समय यही देखता हूं कि मेरे किरदार में कितनी गहराई है, कितनी चुनौती है और मैं उसमें कितना सच्चापन ला सकता हूं। मैं इस इंडस्ट्री में इसलिए आया हूं ताकि अलग-अलग तरह के रोल निभा सकूं। इसलिए मेरा चयन हमेशा भूमिका और स्क्रिप्ट के आधार पर होता है, किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं। ऐसी फिल्मों में ‘प्रोपेगेंडा बनाम सच्चाई’ की बहस शुरू हो जाती है। क्या यह आपको प्रभावित करती है? बहस होना स्वाभाविक है, लेकिन कभी-कभी दुख इस बात का होता है कि अभिनय की चर्चा पीछे रह जाती है। हम कलाकार महीनों तैयारी करते हैं, मानसिक रूप से किरदार में उतरते हैं, कई सालों के संघर्ष के बाद ऐसे मौके मिलते हैं। जब फिल्म रिलीज होती है तो चर्चा कहानी से ज्यादा राजनीतिक एंगल पर होने लगती है। मैं राजनीति में नहीं पड़ता। मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि लोग यह भी देखें कि कलाकार ने अपना काम कितनी ईमानदारी से किया है। फिल्म के ट्रेलर को लेकर अनुराग कश्यप और प्रकाश राज जैसे फिल्मी हस्तियों ने आलोचना की। इस पर आपका क्या कहना है? मैं इस पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं देना चाहूंगा। हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। जरूरी नहीं कि हर फिल्म या ट्रेलर सबको पसंद आए। कई बार हमें भी कोई ट्रेलर पसंद नहीं आता और हम आपस में खुलकर बोल देते हैं। अगर किसी को अच्छा नहीं लगा तो यह उनकी व्यक्तिगत पसंद है। बहुत से लोग तारीफ भी कर रहे हैं। जो अच्छा कह रहे हैं, उनका भी सम्मान है और जो आलोचना कर रहे हैं, उनका भी। हमारा काम है मेहनत करना और आगे और बेहतर करने की कोशिश करना। ट्रेलर में दिखाए गए एक ‘बीफ’ से जुड़े दृश्य को लेकर विवाद हुआ। क्या उस सीन को हटाने या बदलने पर कोई चर्चा हुई? ऐसे फैसले पूरी तरह निर्देशक और निर्माता के होते हैं। एक अभिनेता के रूप में हमारा काम है कि जो सीन हमें दिया गया है, उसे पूरी सच्चाई और प्रभाव के साथ निभाएं। वह दृश्य भावनात्मक रूप से कठिन था। लेकिन अगर दर्शक मेरे किरदार सलीम से नफरत महसूस करते हैं, तो एक अभिनेता के रूप में मैं समझूंगा कि मैंने अपना काम सही तरीके से किया। नेगेटिव किरदार को इस तरह निभाना कि वह वास्तविक लगे यही अभिनय की सफलता है। द केरला स्टोरी पार्ट 2 में आपका किरदार कितना अलग है? इस बार कहानी पूरी तरह नई है। मैं सलीम का किरदार निभा रहा हूं। यह एक लेयर्ड रोल है। शुरुआत में वह पढ़ा-लिखा, समझदार और सभ्य व्यक्ति दिखाई देता है, लेकिन परिस्थितियों के साथ उसका दूसरा रूप सामने आता है। यह किरदार केवल पूरी तरह नकारात्मक या सकारात्मक नहीं है। उसकी एक यात्रा है एक बदलाव है। उस जर्नी को निभाना मेरे लिए बेहद रोचक और चुनौतीपूर्ण अनुभव रहा। नेगेटिव रोल करने से क्या इमेज या फैन बेस पर असर पड़ सकता है? बिल्कुल नहीं। एक अभिनेता का काम हर तरह के भाव निभाना है। अगर आप उदाहरण देखें तो मनोज बाजपेयी और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकारों ने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की भूमिकाएं की हैं। आज दर्शक समझदार हैं। वे जानते हैं कि अभिनेता और उसका किरदार अलग होते हैं। नेगेटिव रोल में अक्सर ज्यादा चैलेंज होता है और अभिनेता को अपने अभिनय की रेंज दिखाने का मौका मिलता है। एक आउटसाइडर के तौर पर इंडस्ट्री में आपका संघर्ष कैसा रहा? जब मैं मुंबई आया तो मुझे शहर की बुनियादी जानकारी भी नहीं थी। ऑडिशन के लिए लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता था। कई बार ‘फिट नहीं’ कहकर मना कर दिया जाता था। मैंने शुरू से तय कर लिया था कि कम से कम 10 साल इस इंडस्ट्री को देने होंगे। यहां कोई गारंटी नहीं है। एक फिल्म मिलने का मतलब यह नहीं कि दूसरी भी मिल जाएगी। हर स्तर पर खुद को साबित करना पड़ता है। धैर्य सबसे जरूरी है। अगर धैर्य नहीं है, तो इस क्षेत्र में टिक पाना मुश्किल है। दर्शकों के लिए द केरला स्टोरी पार्ट 2 खास क्यों है और उन्हें यह फिल्म देखने के लिए क्या संदेश या अनुभव मिलेगा? यह फिल्म बहुत मेहनत से बनी है। निर्देशक से लेकर तकनीकी टीम और कलाकारों तक, सभी ने पूरी लगन से काम किया है। हम नए कलाकार हैं और हमारे लिए दर्शकों का भरोसा बहुत मायने रखता है। हम बस यही चाहते हैं कि दर्शक एक मौका दें। अगर उन्हें हमारा काम पसंद आए, तो वही हमारी सबसे बड़ी सफलता होगी।
‘अनुराग कश्यप ने ट्रेलर कहा बकवास:सुमित गहलावत बोले- सबकी अपनी सोच है, द केरला स्टोरी 2 का बीफ सीन हर कोई देखें

‘द केरल स्टोरी’ के पहले भाग ने देशभर में तीखी बहस को जन्म दिया था। फिल्म को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। अब इसका दूसरा भाग एक नई कहानी और नए किरदारों के साथ दर्शकों के सामने आने वाला है। फिल्म के इस भाग में अभिनेता सुमित गहलावत सलीम नामक एक अहम और परतदार किरदार निभा रहे हैं। लगभग 12 वर्षों से इंडस्ट्री में सक्रिय सुमित का कहना है कि यह उनके करियर की अब तक की सबसे बड़ी और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं में से एक है। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने फिल्म, विवाद, संघर्ष और अपने सफर पर खुलकर बात की हैं। आपकी फिल्में, जैसे द केरल स्टोरी और बस्तर: द नक्सल स्टोरी, अक्सर राजनीतिक और वैचारिक बहस को जन्म देती हैं। एक कलाकार के रूप में आप इन प्रतिक्रियाओं और विवादों को किस नजरिए से देखते हैं? मैं व्यक्तिगत रूप से हर फिल्म को सिर्फ सिनेमा के रूप में देखता हूं। एक अभिनेता के तौर पर मेरा काम है अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाना। विषय राजनीतिक है, सामाजिक है या विवादित है यह लेखक और निर्देशक का दृष्टिकोण होता है। मैं स्क्रिप्ट पढ़ते समय यही देखता हूं कि मेरे किरदार में कितनी गहराई है, कितनी चुनौती है और मैं उसमें कितना सच्चापन ला सकता हूं। मैं इस इंडस्ट्री में इसलिए आया हूं ताकि अलग-अलग तरह के रोल निभा सकूं। इसलिए मेरा चयन हमेशा भूमिका और स्क्रिप्ट के आधार पर होता है, किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं। ऐसी फिल्मों में ‘प्रोपेगेंडा बनाम सच्चाई’ की बहस शुरू हो जाती है। क्या यह आपको प्रभावित करती है? बहस होना स्वाभाविक है, लेकिन कभी-कभी दुख इस बात का होता है कि अभिनय की चर्चा पीछे रह जाती है। हम कलाकार महीनों तैयारी करते हैं, मानसिक रूप से किरदार में उतरते हैं, कई सालों के संघर्ष के बाद ऐसे मौके मिलते हैं। जब फिल्म रिलीज होती है तो चर्चा कहानी से ज्यादा राजनीतिक एंगल पर होने लगती है। मैं राजनीति में नहीं पड़ता। मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि लोग यह भी देखें कि कलाकार ने अपना काम कितनी ईमानदारी से किया है। फिल्म के ट्रेलर को लेकर अनुराग कश्यप और प्रकाश राज जैसे फिल्मी हस्तियों ने आलोचना की। इस पर आपका क्या कहना है? मैं इस पर ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं देना चाहूंगा। हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का पूरा अधिकार है। जरूरी नहीं कि हर फिल्म या ट्रेलर सबको पसंद आए। कई बार हमें भी कोई ट्रेलर पसंद नहीं आता और हम आपस में खुलकर बोल देते हैं। अगर किसी को अच्छा नहीं लगा तो यह उनकी व्यक्तिगत पसंद है। बहुत से लोग तारीफ भी कर रहे हैं। जो अच्छा कह रहे हैं, उनका भी सम्मान है और जो आलोचना कर रहे हैं, उनका भी। हमारा काम है मेहनत करना और आगे और बेहतर करने की कोशिश करना। ट्रेलर में दिखाए गए एक ‘बीफ’ से जुड़े दृश्य को लेकर विवाद हुआ। क्या उस सीन को हटाने या बदलने पर कोई चर्चा हुई? ऐसे फैसले पूरी तरह निर्देशक और निर्माता के होते हैं। एक अभिनेता के रूप में हमारा काम है कि जो सीन हमें दिया गया है, उसे पूरी सच्चाई और प्रभाव के साथ निभाएं। वह दृश्य भावनात्मक रूप से कठिन था। लेकिन अगर दर्शक मेरे किरदार सलीम से नफरत महसूस करते हैं, तो एक अभिनेता के रूप में मैं समझूंगा कि मैंने अपना काम सही तरीके से किया। नेगेटिव किरदार को इस तरह निभाना कि वह वास्तविक लगे यही अभिनय की सफलता है। द केरला स्टोरी पार्ट 2 में आपका किरदार कितना अलग है? इस बार कहानी पूरी तरह नई है। मैं सलीम का किरदार निभा रहा हूं। यह एक लेयर्ड रोल है। शुरुआत में वह पढ़ा-लिखा, समझदार और सभ्य व्यक्ति दिखाई देता है, लेकिन परिस्थितियों के साथ उसका दूसरा रूप सामने आता है। यह किरदार केवल पूरी तरह नकारात्मक या सकारात्मक नहीं है। उसकी एक यात्रा है एक बदलाव है। उस जर्नी को निभाना मेरे लिए बेहद रोचक और चुनौतीपूर्ण अनुभव रहा। नेगेटिव रोल करने से क्या इमेज या फैन बेस पर असर पड़ सकता है? बिल्कुल नहीं। एक अभिनेता का काम हर तरह के भाव निभाना है। अगर आप उदाहरण देखें तो मनोज बाजपेयी और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे कलाकारों ने सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की भूमिकाएं की हैं। आज दर्शक समझदार हैं। वे जानते हैं कि अभिनेता और उसका किरदार अलग होते हैं। नेगेटिव रोल में अक्सर ज्यादा चैलेंज होता है और अभिनेता को अपने अभिनय की रेंज दिखाने का मौका मिलता है। एक आउटसाइडर के तौर पर इंडस्ट्री में आपका संघर्ष कैसा रहा? जब मैं मुंबई आया तो मुझे शहर की बुनियादी जानकारी भी नहीं थी। ऑडिशन के लिए लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ता था। कई बार ‘फिट नहीं’ कहकर मना कर दिया जाता था। मैंने शुरू से तय कर लिया था कि कम से कम 10 साल इस इंडस्ट्री को देने होंगे। यहां कोई गारंटी नहीं है। एक फिल्म मिलने का मतलब यह नहीं कि दूसरी भी मिल जाएगी। हर स्तर पर खुद को साबित करना पड़ता है। धैर्य सबसे जरूरी है। अगर धैर्य नहीं है, तो इस क्षेत्र में टिक पाना मुश्किल है। दर्शकों के लिए द केरला स्टोरी पार्ट 2 खास क्यों है और उन्हें यह फिल्म देखने के लिए क्या संदेश या अनुभव मिलेगा? यह फिल्म बहुत मेहनत से बनी है। निर्देशक से लेकर तकनीकी टीम और कलाकारों तक, सभी ने पूरी लगन से काम किया है। हम नए कलाकार हैं और हमारे लिए दर्शकों का भरोसा बहुत मायने रखता है। हम बस यही चाहते हैं कि दर्शक एक मौका दें। अगर उन्हें हमारा काम पसंद आए, तो वही हमारी सबसे बड़ी सफलता होगी।
कंप्यूटर लैब में सिस्टम बंद, फिर भी छात्रों का प्रैक्टिकल:RDVV के छात्र बोले- सालों से ऐसा हो रहा; कांग्रेस विधायक ने विधासभा में उठाया मुद्दा

जबलपुर के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर साइंस एंड एप्लीकेशन विभाग में गुरुवार को डिजिटल फॉरेंसिक थर्ड सेमेस्टर का फाइनल वाइवा और प्रैक्टिकल आयोजित हुआ, जिसके लिए कंप्यूटर आवश्यक थे। लेकिन छात्रों का आरोप है कि एक घंटे की लिखित परीक्षा के बाद जब उन्होंने प्रैक्टिकल के लिए कंप्यूटर मांगे तो शिक्षकों ने कह दिया कि उनका प्रैक्टिकल पूरा हो चुका है। इस पर छात्र कक्षा से बाहर निकल आए और नाराजगी जताई। उनका कहना है कि तीन सेमेस्टर में एक बार भी कंप्यूटर ठीक से चालू नहीं हुए, जबकि हर साल हजारों रुपये फीस ली जाती है। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा कि पढ़ाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। बिना लैब के तकनीकी पढ़ाई पर सवाल यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर साइंस एंड एप्लिकेशन (UICSA), जहां BCA और MCA जैसे अहम तकनीकी कोर्स संचालित होते हैं, वहां की व्यवस्थाएं सवालों के घेरे में हैं। AICTE से मान्यता प्राप्त इन पाठ्यक्रमों में करीब 150 से अधिक छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन आरोप है कि उन्हें बुनियादी लैब सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। छात्रों का कहना है कि प्रैक्टिकल के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं और वास्तविक प्रयोगशाला अभ्यास के बिना ही उन्हें डिग्री लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ का आरोप दैनिक भास्कर की टीम को सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचकर देखा गया कि 23 छात्र-छात्राएं कक्षा में वाइवा परीक्षा दे रहे थे। करीब एक घंटे बाद उन्हें यह कहकर बाहर कर दिया गया कि प्रैक्टिकल पूरा हो चुका है और अंक परिणाम में जोड़ दिए जाएंगे। एमसीए थर्ड सेमेस्टर की छात्रा रिषिका नामदेव ने बताया कि डिजिटल फॉरेंसिक का फाइनल एग्जाम था, जिसमें वाइवा और प्रैक्टिकल दोनों होना था, लेकिन किसी भी छात्र को कंप्यूटर सिस्टम उपलब्ध नहीं कराया गया। कक्षा में लैब मौजूद है और लगभग 30 सिस्टम रखे हैं, पर छात्रों का कहना है कि एक भी कंप्यूटर चालू हालत में नहीं है। रिषिका के मुताबिक प्रैक्टिकल परीक्षा के लिए कंप्यूटर संचालन का ज्ञान जरूरी होता है, लेकिन तीन सेमेस्टर गुजरने के बाद भी छात्रों को लैब में काम करने का मौका नहीं मिला। उनका कहना है कि एचओडी से लेकर वीसी और रजिस्ट्रार तक से कई बार सिस्टम उपलब्ध कराने की मांग की गई, मगर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि शिक्षकों ने अपनी ओर से कुछ मदद करते हुए लैपटॉप पर सीमित जानकारी दी, लेकिन छात्रों के अनुसार वह पर्याप्त नहीं थी। 17 हजार फीस, पर पढ़ाई शून्य अखिलेश मिश्रा ने दैनिक भास्कर को बताया कि हर छात्र से प्रति सेमेस्टर करीब 17 हजार रुपए फीस ली जाती है और तीन साल में लगभग 54 हजार रुपए जमा कर चुके हैं, लेकिन पढ़ाई की स्थिति बेहद खराब है। उनका कहना है कि छात्र हर साल पास तो हो जाते हैं, मगर वास्तविक ज्ञान नहीं मिल रहा, जो उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ जैसा है। छात्रों के अनुसार फाइनल परीक्षा के दिन भी किसी को लैब में नहीं ले जाया गया। उनका दावा है कि विभाग शुरू होने के बाद से ही सिस्टम बंद पड़े हैं और इसी तरह औपचारिक रूप से प्रैक्टिकल कराकर छात्रों को पास कर दिया जाता है, जबकि कंप्यूटर का व्यावहारिक अनुभव उन्हें नहीं मिल पाता। नियामक मानकों पर उठे सवाल AICTE के नियमों के मुताबिक तकनीकी पाठ्यक्रम चलाने वाले संस्थानों में पर्याप्त आधुनिक कंप्यूटर, लाइसेंस प्राप्त सॉफ्टवेयर और प्रशिक्षित तकनीकी स्टाफ होना अनिवार्य है। निर्धारित मानक के अनुसार स्नातक स्तर पर 10 छात्रों पर एक कंप्यूटर और स्नातकोत्तर स्तर पर 4 छात्रों पर एक कंप्यूटर उपलब्ध होना चाहिए। डिजिटल युग में विडंबना एक ओर देश डिजिटल इंडिया और आईटी क्रांति की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं विश्वविद्यालय में डिजिटल फॉरेंसिक जैसे विषय का प्रैक्टिकल बिना कंप्यूटर सम्पन्न होना शिक्षा व्यवस्था की गंभीर विडंबना को उजागर करता है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के नियमानुसार लेकिन, विश्वविद्यालय प्रशासन इन नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा है। NAAC की पीयर टीम द्वारा बार-बार आधुनिक लैब्स और अपडेटेड कंप्यूटरों की जरूरत जताने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया! क्या यह प्रशासन की लापरवाही नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य से धोखाधड़ी नहीं है ?। टैंडर जारी कर दिया है बिना सिस्टम के छात्रों ने वाइवा के साथ प्रैक्टिकल दे दिया। मामले पर कुलसचिव डा सुरेंद्र सिंह का कहा कि सिस्टम को और अधिक बेहतर करने के लिए पीएम उषा योजना के तहत 200 से अधिक कंप्यूटर खरीदे जा रहे है, जिसका टैंडर भी जारी कर दिया है। अब किसी भी छात्र को सिस्टम के चलते परेशानी नहीं होगी। विधानसभा में उठा मुद्दा पूरे मामले की गूंज विधानसभा तक पहुंच चुकी है। जबलपुर पूर्व के कांग्रेस विधायक लखन घनघोरिया ने सदन में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के UICSA विभाग में उपलब्ध कंप्यूटर और तकनीकी संसाधनों की स्थिति को लेकर प्रश्न उठाया था। उन्होंने सरकार से विभाग में संचालित बीसीए और एमसीए पाठ्यक्रमों के लिए उपलब्ध लैब, कंप्यूटर एवं अन्य तकनीकी सुविधाओं की विस्तृत जानकारी मांगी थी। इस पर उच्च शिक्षा मंत्री ने BCA MCA के लिए 25 कंप्यूटर एवं संसाधनों की उपलब्धता और खरीद प्रक्रिया जारी होने की बात कही, लेकिन जमीनी हकीकत और छात्रों के आरोपों ने इस जवाब पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भारत ने दूसरा सबसे बड़ा टोटल बनाया:एक इनिंग में हाईएस्ट सिक्स भी लगाए; दोनों टीमों ने मिलकर 440 रन बनाए

गुरुवार को टीम इंडिया ने टी-20 वर्ल्ड कप का दूसरा सबसे बड़ा स्कोर खड़ा किया। इसी के साथ एक पारी में सबसे ज्यादा सिक्स लगाने का रिकॉर्ड भी अपने नाम दर्ज कर लिया। चेन्नई के चेपॉक स्टेडियम में खेले गए इस हाई-स्कोरिंग मुकाबले में दोनों टीमों ने मिलकर 440 रन बनाए। पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने 20 ओवर में 4 विकेट के नुकसान पर 256 रन बनाए। जवाब में जिम्बाब्वे ने भी दम दिखाया, लेकिन टीम 20 ओवर में 6 विकेट पर 184 रन ही बना सकी। भारत ने मैच 72 रन से अपने नाम किया। पढ़िए IND Vs ZIM मैच के टॉप रिकॉर्ड्स… 1. भारत ने टी-20 वर्ल्ड कप का दूसरा सबसे बड़ा टोटल बनाया भारत ने टी-20 वर्ल्ड कप का दूसरा सबसे बड़ा टोटल बना दिया। टीम ने 4 विकेट खोकर 256 रन बना डाले। भारत से आगे सिर्फ श्रीलंका है, जिसने 2007 में केन्या के खिलाफ 260 रन बनाए थे। 2. भारत ने एक टी-20 वर्ल्ड कप इनिंग में हाईएस्ट सिक्स लगाए भारत ने 17 सिक्स लगाए, जो किसी एक वर्ल्ड कप पारी में टीम के सबसे ज्यादा सिक्स हैं। इससे पहले भारत ने 2024 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 15 सिक्स लगाए थे। मौजूदा टूर्नामेंट में भारत अब तक 63 छक्के लगा चुका है, जो किसी एक एडिशन में उसका बेस्ट प्रदर्शन भी है। इस मामले में सिर्फ वेस्टइंडीज (66) भारत से आगे है। 3. भारत ने टी-20 वर्ल्ड कप में 5वीं बार 200+ टोटल बनाया भारत ने जिम्बाब्वे के खिलाफ 256 रन बनाकर टी-20 वर्ल्ड कप इतिहास में 5वीं बार 200+ स्कोर का आंकड़ा पार किया। इस सूची में भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि साउथ अफ्रीका 6 बार 200+ टोटल बनाकर टॉप पर काबिज है। 4. टी-20 वर्ल्ड कप का दूसरा हाईएस्ट एग्रीगेट स्कोर बना भारत और जिम्बाब्वे के बीच कुल 440 रन बने, जो टी-20 वर्ल्ड कप इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा मैच एग्रीगेट है। इस लिस्ट में टॉप पर 2016 में वानखेड़े में खेला गया साउथ अफ्रीका बनाम इंग्लैंड मुकाबला है, जिसमें 459 रन बने थे। दिलचस्प बात यह है कि 2007 के पहले वर्ल्ड कप में भी भारत और इंग्लैंड के बीच 418 रन बने थे, जो आज भी टॉप हाई-एग्रीगेट मैचों में शामिल है। 5. हार्दिक नंबर-5 या उससे नीचे सबसे ज्यादा फिफ्टी लगाने वाले प्लेयर मिडिल-ऑर्डर और फिनिशर रोल में भारत के हार्दिक पांड्या का रिकॉर्ड टी-20 वर्ल्ड कप में बेहद शानदार रहा है। नंबर-5 या उससे नीचे बल्लेबाजी करते हुए उन्होंने 4 अर्धशतक लगाए हैं, जो इस पोजिशन पर किसी भी बल्लेबाज द्वारा सबसे ज्यादा हैं। उनसे पहले डेविड मिलर, शोएब मलिक और मार्कस स्टोयनिस ने 3-3 हाफ सेंचुरी लगाई हैं। 6. जिम्बाब्वे के खिलाफ सबसे बड़ा पावरप्ले टोटल बना जिम्बाब्वे के खिलाफ टी-20 वर्ल्ड कप में सबसे बड़ा पावरप्ले स्कोर बन गया है। भारत ने शुरुआती 6 ओवर में 80 रन बना दिए। यह ओवरऑल भारत का वर्ल्ड कप में तीसरा सबसे बड़ा पावरप्ले टोटल भी है। इसी वर्ल्ड कप में नामीबिया के खिलाफ 86/1 रन बनाकर भारत ने बेस्ट पावरप्ले टोटल दर्ज किया था। 7. रजा टी-20 में 3 हजार रन और 100 विकेट लेने वाले दूसरे प्लेयर जिम्बाब्वे के ऑलराउंडर सिकंदर रजा ने टी-20 इंटरनेशनल क्रिकेट में एक खास उपलब्धि अपने नाम कर ली है। वे 3000 से ज्यादा रन बनाने और 100 से ज्यादा विकेट लेने वाले दुनिया के दूसरे खिलाड़ी बन गए हैं। उनसे पहले यह कारनामा मलेशिया के वीरनदीप सिंह कर चुके हैं। 8. नगारवा जिम्बाब्वे के लिए एक स्पेल में सबसे ज्यादा रन देने वाले बॉलर रिचर्ड नगारावा जिम्बाब्वे के लिए टी-20 इंटरनेशनल के सबसे महंगे गेंदबाज साबित हुए। उन्होंने अपने 4 ओवर में 62 रन लुटाए। यह किसी भी जिम्बाब्वे गेंदबाज द्वारा एक पारी में दिया गया सबसे ज्यादा रन है। इससे पहले यह अनचाहा रिकॉर्ड क्रिस मपोफू के नाम दर्ज था। 9. मपोसा वर्ल्ड कप के डेब्यू ओवर में दूसरे सबसे महंगे बॉलर जिम्बाब्वे के टिनोटेंडा मपोसा ने अपने टी-20 वर्ल्ड कप का पहला ओवर बेहद महंगा डाला। उन्होंने भारत के खिलाफ 23 रन खर्च किए, जो टूर्नामेंट इतिहास में किसी गेंदबाज के डेब्यू ओवर में दूसरे सबसे ज्यादा रन हैं। इस लिस्ट में उनसे आगे सिर्फ केन्या के स्टीव टिकोलो हैं, जिन्होंने 2007 वर्ल्ड कप में श्रीलंका के खिलाफ अपने एकमात्र ओवर में 25 रन दिए थे।
दिल्ली में डीबी एमिनेंस अवॉर्ड के 7वें सीजन का आयोजन:केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने मध्य प्रदेश के 45 दिग्गजों को सम्मानित किया

नई दिल्ली में गुरुवार को डीबी एमिनेंस अवॉर्ड के सातवें सीजन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान और दैनिक भास्कर समूह के डिप्टी एमडी पवन अग्रवाल मौजूद रहे। कार्यक्रम में दैनिक भास्कर समूह ने मध्य प्रदेश के उन 45 दिग्गजों को सम्मानित किया, जो अपने कामों से देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। चिराग ने शिक्षा, ऑटोमोबाइल, रियल एस्टेट, सामाजिक सेवा, अन्य उद्योगों से जुड़े लोगों को डीबी एमिनेंस अवॉर्ड दिया। चिराग ने कहा- मैं भास्कर ग्रुप का समूह का दिल से हृदय से आभार प्रकट करूंगा। ये भी अपनी रूट से जुड़े रहे। भास्कर ग्रुप का उदय उसमें आप सबके शहर इंदौर की एक अहम भूमिका रही। कार्यक्रम से जुड़ी तस्वीरें… दैनिक भास्कर समूह हर साल लीडर्स को सम्मानित करता है दैनिक भास्कर समूह हर साल यह अवॉर्ड ऐसे लीडर्स को प्रदान करता है, जो अपने-अपने क्षेत्र में अतुलनीय काम कर रहे हैं। दैनिक भास्कर समूह के डिप्टी एमडी पवन अग्रवाल ने इस मौके पर सम्मानित हुए लोगों से कहा कि उन सभी ने अपने कामों से एक मिसाल कायम किया है। उन्होंने कहा कि दैनिक भास्कर का भी प्रयास होता है कि जैसा आप समाज में बदलाव कर रहे हैं, वैसा हम भी करें। समाज में कुछ ना कुछ नया करते रहें। आपके साथ यही जुगलबंदी है। इंदौर दैनिक भास्कर के लिए काफी खास जगह है। क्योंकि वहां 10 साल पहचान बनाने के बाद ही हिम्मत मिली कि पूरे देश में जाएं। डिप्टी एमडी ने कहा कि इस एंटरप्राइजिंग शहर (इंदौर) से ही हमें हिम्मत मिली। यहीं से हमें समझ आया था कि जब आप कुछ काम करते हैं तो उसकी कोई सीमा नहीं है। अगर आपके पास कल्पना है तो पूरा खुला आसमान है। चिराग पासवान ने अवॉर्ड पाने वाले लोगों को बधाई दी कार्यक्रम में केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने अवॉर्ड पाने वाले सभी 45 लोगों को बधाई दी और दैनिक भास्कर का धन्यवाद किया। उन्होंने वहां मौजूद उद्यमियों से फूड प्रोसेसिंग में इनोवेशन और निवेश करने की अपील की। चिराग ने आगे कहा- आज हर कोई विकसित भारत की चर्चा करता है, लेकिन बहुत कम लोग अपने योगदान के बारे में सोचते हैं। हम अक्सर सरकारों और प्रशासन से सवाल करते हैं कि विकसित भारत कैसे बनेगा, लेकिन आप वे लोग हैं जिन्होंने खुद से सवाल किया कि ‘मेरा योगदान क्या होगा?’ यदि देश की 140 करोड़ आबादी ईमानदारी से खुद से यह पूछने लग जाए, तो हम लक्ष्य के बहुत करीब होंगे। इसके अलावा इस कार्यक्रम में दैनिक भास्कर समूह के इंदौर के एग्जिक्यूटिव एडिटर अमित मंडलोई, इंदौर के यूनिट हेड दीपक किशोर और नेशनल पॉलिटिकल एडिटर धर्मेंद्र सिंह भदौरिया भी मौजूद थे। कार्यक्रम से जुड़े 5 वीडियो…
भाजपा नेता के भाई ने दलित बस्ती पर हमला किया:जान बचाने पहली मंजिल से कूदी महिला; पत्थरबाजी में एक घायल

नीमच जिले के काली कोटड़ी गांव में गुरुवार दोपहर भाजपा नेता उमराव सिंह गुर्जर के भाई गोपाल गुर्जर और उनके करीब 60 साथियों ने दलित बस्ती पर हमला कर दिया। इस दौरान हमलावरों ने घरों में तोड़फोड़ की और महिलाओं से मारपीट की। हमले में एक महिला गंभीर रूप से घायल हो गई, जबकि एक अन्य महिला ने अपनी जान बचाने के लिए घर की पहली मंजिल से छलांग लगा दी। गुरुवार दोपहर करीब 2:30 बजे लोडिंग टेंपो और पांच कारों में सवार होकर आए हमलावरों ने मनीष नायक, पुष्कर और अर्जुन नायक के घरों को निशाना बनाया। उन्होंने घरों में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की। मनीष नायक की पत्नी पूजा मेघवाल पर पत्थर से हमला किया गया, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई। यहां से शुरू हुआ विवाद यह विवाद 24 फरवरी की रात को शुरू हुआ था, जब दीपेश गुर्जर ने अपनी बिना नंबर की थार गाड़ी से मनीष नायक की बाइक को टक्कर मार दी थी। इस हादसे में मनीष घायल हो गए थे। पीड़ितों का आरोप है कि मेडिकल जांच के बावजूद पुलिस ने प्रभावशाली लोगों के दबाव में आकर उन्हें ही झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी थी। हमसे टकराने का अंजाम बुरा होगा पीड़ितों के अनुसार, गोपाल गुर्जर, सरदार सिंह, दीपेश और उनके साथियों ने जातिगत गालियां देते हुए धमकी दी कि “इस इलाके में हमारा आतंक है और हमसे टकराने का अंजाम बुरा होगा।” घटना के बाद डरे-सहमे पीड़ित परिवार शाम को नीमच पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे और न्याय की गुहार लगाई। दहशत में परिवार ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि आरोपी मछली पालन के बड़े ठेकेदार हैं और उनके राजनीतिक रसूख के कारण पुलिस कार्रवाई करने से बच रही है। पीड़ितों ने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई और उन्हें सुरक्षा नहीं मिली, तो उनके परिवार की जान को खतरा बना रहेगा।
JNU में प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर पत्थर-जूते फेंके:UGC रेगुलेशन लागू करने की मांग कर रहा था छात्रसंघ; यूनिवर्सिटी ने कोर्ट ऑर्डर का उल्लंघन बताया

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी(JNU) में स्टूडेंट यूनियन के प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस पर पत्थर फेंके, पुलिसवालों को काटा और जूते फेंके। पुलिस ने कहा कि इसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन(JNUSU) UGC रेगुलेशन लागू करने की मांग को लेकर मार्च निकाल रहा था। ये मार्च शिक्षा मंत्रालय तक निकाला जाना था लेकिन पुलिस ने इसे बीच में ही रोक दिया। पुलिस का आरोप है कि मार्च रोकने के बाद कुछ प्रोटेस्टर्स ने उनपर हमला कर दिया। इसके बीच यूनिवर्सिटी का भी बयान आया। JNU ने कहा कि यह मांग माननीय सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन है जिसने रेगुलेशन पर स्टे जारी किया था। JNU के वाइस चांसलर या रजिस्ट्रार के पास रेगुलेशन पर कोई अधिकार नहीं है। पुलिस पर हमले की 3 तस्वीरेंं… JNU ने कहा- हमारी सरकार को जवाबदेही JNU ने सोशल मीडिया X पर एक पोस्ट में कहा कि JNU एक पब्लिक यूनिवर्सिटी है इसलिए सरकार, पार्लियामेंट और भारतीय टैक्सपेयर्स के प्रति जवाबदेह है। यह बहुत बुरा है कि एक महिला OBC वाइस चांसलर पर झूठे आरोप लगाकर हमला किया जा रहा है, सिर्फ पब्लिक प्रॉपर्टी की हिंसा और तोड़-फोड़ के मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए। पहले इस पूरे मामले को समझें UGC के नए कानून का नाम है- ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026।’ इसके तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई निर्देश दिए गए थे। नए नियमों के तहत, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने का निर्देश दिया गया। ये टीमें SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों को देखेंगी। सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं। हालांकि, सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि UGC ने जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और इससे कॉलेजों में अराजकता पैदा होगी। सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि नए नियमों में सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ बना दिए गए हैं। इनसे उनके खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा। 30 जनवरी: सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर रोक लगाई सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने कहा कि इसके प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी मृत्युंजय तिवारी, एडवोकेट विनीत जिंदल और राहुल दीवान की याचिकाओं पर की, जिनमें आरोप लगाया गया है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। UGC ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही नियमों का ड्राफ्ट फिर से तैयार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अगली सुनवाई अब 19 मार्च को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल 2012 के UGC नियम देशभर में लागू रहेंगे। ———— ये खबर भी पढ़ें… ‘करप्शन इन ज्यूडीशियरी’ वाली NCERT किताब पर SC का बैन:कहा- हार्ड कॉपी वापस लें, डिजिटल कॉपी हटाएं सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ चैप्टर वाली NCERT के 8वीं क्लास की सोशल साइंस की किताब बैन कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जो किताबें छप चुकी हैं, उसे जब्त कीजिए और डिजिटल कॉपियों को भी हटाइए। पूरी खबर पढ़ें…
‘पाखंड’: सिद्धारमैया ने उर्दू स्वास्थ्य विज्ञापन विवाद पर बीजेपी की आलोचना की, कहा कि यह ‘मानक सरकारी प्रक्रिया’ है | राजनीति समाचार

आखरी अपडेट:26 फरवरी, 2026, 20:56 IST विवाद ने व्यक्तिगत मोड़ ले लिया क्योंकि कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री के घर पर बोली जाने वाली उर्दू पर भाजपा की टिप्पणियों को व्यापक रूप से उनकी पत्नी तब्बू राव के संदर्भ के रूप में देखा गया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस विचार को खारिज कर दिया कि उन्हें भाषाई गौरव में सबक की जरूरत है। (छवि: न्यूज18) कर्नाटक में स्वास्थ्य विभाग के अखबारों में विज्ञापनों को लेकर ताजा भाषा विवाद छिड़ गया है लेकिन इस बार यह कन्नड़ के बारे में नहीं है। कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच एक उर्दू अखबार में स्वास्थ्य संबंधी विज्ञापन को लेकर वाकयुद्ध छिड़ गया है। भाजपा द्वारा यह आरोप लगाए जाने के बाद कि राज्य सरकार “तुष्टिकरण की राजनीति” में लगी हुई है, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को भगवा पार्टी पर कड़ा प्रहार किया और उनके “पाखंड” को उजागर करते हुए कहा कि यह “मानक सरकारी प्रक्रिया” है। विवाद ने व्यक्तिगत मोड़ ले लिया क्योंकि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव के घर पर बोली जाने वाली भाषा पर भाजपा की टिप्पणियों को व्यापक रूप से उनकी पत्नी तब्बू राव के संदर्भ के रूप में देखा गया। उन्होंने हमले की निंदा करते हुए इसे “आत्म-धोखे की पराकाष्ठा” बताया और कहा कि उनका परिवार घर पर उर्दू भी नहीं बोलता। तब्बू राव ने कहा कि उनके पति के राजनीति में आने के बाद से उनकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि के कारण उन्हें गलत तरीके से निशाना बनाया गया है। “क्या उर्दू में येदियुरप्पा और प्रधान मंत्री मोदी वाले विज्ञापन नहीं हैं? क्या वे तुष्टीकरण में लिप्त हैं?” उन्होंने भाजपा के अचानक “कन्नड़ प्रेम” को शर्मनाक दोहरा मापदंड करार देते हुए पूछा। विवाद क्या है? यह विवाद ‘कुसुमा संजीवनी’ कार्यक्रम के लॉन्च से शुरू हुआ था, जो एक सरकारी पहल है जो हीमोफीलिया रोगियों के लिए मुफ्त एम्बुलेंस सेवाओं के साथ रोगनिरोधी उपचार प्रदान करती है। इस आयोजन को बढ़ावा देने के लिए, राज्य स्वास्थ्य विभाग ने विभिन्न प्रकाशनों में विज्ञापन जारी किए। उर्दू दैनिक समाचार पत्रों में छपने वाले संस्करण पूरी तरह से उर्दू भाषा में छपे थे, जिसे भाजपा ने तुरंत “विवाद की जड़” के रूप में लिया। सिद्धारमैया ने क्या कहा? सिद्धारमैया ने मंगलुरु में पत्रकारों से बात करते हुए विपक्ष के विरोध के तर्क पर सवाल उठाया. “विज्ञापन देते समय क्या हमें उर्दू अखबारों को भी नहीं देना चाहिए?” उन्होंने पूछा, भाजपा ने अपने पिछले कार्यों की अनदेखी करते हुए मौजूदा सरकार की हर बात का विरोध करने की आदत बना ली है। पहले कन्नड़ कवलु समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के बाद, उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया कि उन्हें भाषाई गौरव में सबक की आवश्यकता है, उनके लिए “कन्नड़ सिर्फ एक भाषा नहीं है, यह जीवन है”। बीजेपी ने क्या कहा? सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक तीखे हमले में, कर्नाटक भाजपा ने “कन्नड़ विरोधी, राज्य विरोधी कांग्रेस सरकार” पर राजनीतिक लाभ के लिए स्थानीय भाषा के हितों का बलिदान देने का आरोप लगाया। इसने सवाल किया कि क्या राज्य की प्रशासनिक भाषा बदल गई है, सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से पूछा गया: “क्या कर्नाटक की प्रशासनिक भाषा कन्नड़ या उर्दू है?” भाजपा ने आरोप लगाया कि सरकार ने केवल विज्ञापन के बजाय उर्दू में एक आधिकारिक निमंत्रण जारी किया था और दिनेश गुंडू राव पर व्यक्तिगत कटाक्ष करते हुए कहा कि वह अपने कार्यालय का उपयोग अपने घर में बोली जाने वाली भाषा को बढ़ावा देने के लिए कर रहे थे। स्वास्थ्य मंत्री ने क्या कहा? इस बीच, राव ने तीखा खंडन करते हुए भाजपा पर “बौद्धिक दिवालियापन” और आधिकारिक सरकारी निमंत्रण और एक मानक समाचार पत्र विज्ञापन के बीच अंतर करने में विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह कदम एक “नियमित प्रशासनिक अभ्यास” था, यह समझाते हुए कि विशिष्ट समाचार पत्र की भाषा में विज्ञापन प्रकाशित करना मानक प्रक्रिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जानकारी उसके इच्छित पाठकों तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि सरकारी विज्ञापन का लक्ष्य सभी नागरिकों तक सार्वजनिक योजनाओं की जानकारी प्रभावी ढंग से पहुंचाना है। उन्होंने पिछले भाजपा प्रशासन द्वारा उर्दू में प्रकाशित पिछले विज्ञापनों की एक श्रृंखला साझा की और विशेष रूप से बीएस येदियुरप्पा और बसवराज बोम्मई जैसे भाजपा मुख्यमंत्रियों का नाम लेते हुए पूछा कि क्या उनके कार्यकाल के दौरान उर्दू विज्ञापनों के उपयोग का मतलब यह है कि वे “राष्ट्र-विरोधी” या “तुष्टिकरण” में लगे हुए थे। (रोहिणी स्वामी के इनपुट्स के साथ) पहले प्रकाशित: 26 फरवरी, 2026, 20:56 IST समाचार राजनीति ‘पाखंड’: सिद्धारमैया ने उर्दू स्वास्थ्य विज्ञापन विवाद पर बीजेपी की आलोचना की, कहा कि यह ‘मानक सरकारी प्रक्रिया’ है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक भाषा विवाद(टी)कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग विज्ञापन(टी)उर्दू अखबार विवाद कर्नाटक(टी)सिद्धारमैया बीजेपी भाषा बहस(टी)कुसुमा संजीविनी कार्यक्रम(टी)दिनेश गुंडू राव उर्दू(टी)बीजेपी कांग्रेस भाषा राजनीति(टी)कन्नड़ भाषा मुद्दा
खाना खाने के बाद तुरंत भागते हैं शौचालय, अमेरिकी डॉक्टर ने बताई वजह, वक्त रहते हो जाएं सावधान

Last Updated:February 26, 2026, 19:06 IST Post-Meal Bowel Movements: खाना खाने के तुरंत बाद शौच जाना अक्सर गैस्ट्रोकॉलिक रिफ्लेक्स के कारण होता है. यह एक सामान्य शारीरिक प्रतिक्रिया है, लेकिन अगर यह बार-बार या दर्द के साथ हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. खाने के बाद तुरंत टॉयलेट भागना गैस्ट्रोकॉलिक रिफ्लेक्स के कारण होता है. Why People Go Toilet After Meals: कई लोग खाना खाने के बाद तुरंत टॉयलेट भागते हैं. कभी न कभी आपके साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा. खाना खाने के बाद पेशाब जाना तो नॉर्मल माना जाता है, लेकिन फ्रेश होने के लिए भागना नॉर्मल नहीं लगता है. यह स्थिति कभी-कभी असहज और चिंताजनक भी लग सकती है. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो ऐसा होना हमेशा किसी गंभीर समस्या का संकेत नहीं होता है, लेकिन बार-बार ऐसा हो, तो डॉक्टर से मिलकर कंसल्ट जरूर करना चाहिए. अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. जोसेफ साल्हाब के मुताबिक खाने के तुरंत बाद शौच की इच्छा होना अक्सर गैस्ट्रोकॉलिक रिफ्लेक्स के कारण होता है. यह शरीर की एक सामान्य प्रतिक्रिया है, जो तब सक्रिय होती है जब भोजन पेट में पहुंचता है. इस रिफ्लेक्स के तहत कोलन संकुचित होकर पाचन तंत्र में नई जगह बनाने की कोशिश करती है. कुछ लोगों में यह प्रतिक्रिया ज्यादा तीव्र होती है, जिससे खाना खाने के तुरंत बाद मल त्याग की जरूरत महसूस होती है. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपने जो खाना अभी खाया, वही तुरंत बाहर निकल गया. दरअसल मल पहले से ही बड़ी आंत में मौजूद होता है. भोजन का पेट में जाना केवल आंतों की गतिविधि को तेज कर देता है. जिन लोगों को इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS), लैक्टोज इनटॉलरेंस या कुछ खाद्य पदार्थों से संवेदनशीलता होती है, उनमें यह रिफ्लेक्स अधिक सक्रिय हो सकता है. View this post on Instagram
शिल्पा ने ‘बास्टियन’ बंद होने की अफवाहों पर तोड़ी चुप्पी:बोलीं– मेरा नाम सिर्फ क्लिकबेट बनाकर पेश किया जा रहा है

बॉलीवुड एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी ने आखिरकार अपने फेमस रेस्तरां बास्टियन के बंद होने की अफवाहों और उनके पति राज कुंद्रा को लेकर छाई नकारात्मक पब्लिसिटी पर बयान दिया है। अभिनेत्री ने कहा है कि पिछले कई महीनों से उनके नाम और ब्रांड का जिक्र मीडिया में ऐसे तरीके से हो रहा है जैसे उनका नाम केवल क्लिकबेट बन गया हो। The Indian Express को दिए इंटरव्यू में शिल्पा ने बताया कि जो बातें सोशल मीडिया पर चल रही हैं, उन पर वह आम तौर पर चुप रहती हैं। उनका मानना है कि एक सेलिब्रेटी को कभी शिकायत नहीं करनी चाहिए और कभी स्पष्टीकरण नहीं देना चाहिए। लेकिन इस बार उन्होंने चुप्पी तोड़ी क्योंकि चर्चाओं का असर उनके प्यार से बनाया गया बास्टियन ब्रांड पर पड़ रहा था। उन्होंने साफ कहा कि चाहे खबरें कैसी भी हों, उनकी प्रतिष्ठा और काम की ईमानदारी लोगों को पहचान में आती है और यही वजह है कि ब्रांड आज भी मजबूती से खड़ा है। शिल्पा ने मीडिया में चल रही अफवाहों को नकारते हुए कहा कि उन्होंने जानबूझकर सोशल मीडिया पर ब्रांड से जुड़ी बातें साझा कीं, ताकि गलतफहमियों को दूर किया जा सके। बातचीत में बास्टियन के मूल संस्थापक रणजीत बिंद्रा भी मौजूद थे। उन्होंने हंसते हुए कहा कि किसी भी तरह की पब्लिसिटी अच्छी पब्लिसिटी होती है। शिल्पा ने भी माना कि नकारात्मक खबरों में भी कुछ सकारात्मक सीख मिलती है, खासकर जब लोग सकारात्मक सोच के साथ मुद्दों को लेते हैं। शिल्पा ने बास्टियन की शुरुआत का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 2016 में वह पहली बार ग्राहक के रूप में बास्टियन गई थीं और वहीं से उनकी दोस्ती और पार्टनरशिप की शुरुआत हुई। बाद में यह ब्रांड बढ़ा और आज इसके चार अलग-अलग ब्रांड की आठ आउटलेट्स हैं। शिल्पा ने यह भी कहा कि लोग सही और गलत में फर्क करना जानते हैं, और वो अपने काम के साथ आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि बास्टियन अपने ग्राहकों को वही दे रहा है जो उन्हें चाहिए।








