पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव से भारत नाराज:कहा- इससे अवैध कब्जा वैध नहीं होगा; वहां 7 जून को 24 सीटों पर वोटिंग

भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में 7 जून को होने वाले विधानसभा चुनावों का कड़ा विरोध किया है। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि पाकिस्तान जिस क्षेत्र पर अवैध और जबरन कब्जा किए हुए है, वहां चुनाव कराने की उसकी योजना पूरी तरह अस्वीकार्य है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल है, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। इसलिए पाकिस्तान को उन क्षेत्रों में किसी भी तरह की राजनीतिक प्रक्रिया चलाने का कोई अधिकार नहीं है। चुनाव कराने जैसी गतिविधियां वहां की जमीनी हकीकत को नहीं बदल सकतीं। गिलगित-बाल्टिस्तान में रविवार को 10 जिलों की 24 सामान्य सीटों पर मतदान कराया जाएगा। चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरण में है और विभिन्न राजनीतिक दल जोर-शोर से प्रचार अभियान चला रहे हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के प्रशासनिक नियंत्रण में है, लेकिन भारत इसे अपने केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का हिस्सा मानता है। इसी वजह से वहां होने वाले हर चुनाव या राजनीतिक कदम पर भारत आमतौर पर आपत्ति दर्ज कराता है। साढ़े पांच साल बाद हो रहे चुनाव गिलगित-बाल्टिस्तान में साढ़े पांच साल बाद हो रहे हैं। इससे पहले यहां नवंबर 2020 में चुनाव हुए थे, जिनमें पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने जीत हासिल की थी। यहां का कार्यकाल 5 साल का होता है। 2020 में चुनी गई विधानसभा ने नवंबर 2025 में अपना कार्यकाल पूरा कर लिया था। नियमों के मुताबिक इसके बाद नए चुनाव कराए जाने थे, लेकिन खराब मौसम और प्रशासनिक कारणों से मतदान समय पर नहीं हो सका। क्षेत्र में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती है, जिससे कई इलाकों में आवागमन प्रभावित हो जाता है। इसी वजह से चुनाव को टाल दिया गया और बाद में 7 जून 2026 की तारीख तय की गई। गिलगित-बाल्टिस्तान में दूसरा चुनाव गिलगित-बाल्टिस्तान और Pok (जिसे पाकिस्तान आजाद जम्मू-कश्मीर कहता है) की प्रशासनिक व्यवस्था अलग-अलग रही है। Pok का अपना अलग संविधान, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विधानसभा है। पाकिस्तान Pok को कुछ स्वायत्तता देता है, हालांकि वास्तविक शक्ति काफी हद तक इस्लामाबाद के पास रहती है। लेकिन गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थिति अलग थी। 1947 से लेकर कई दशकों तक इसे पाकिस्तान ने सीधे संघीय सरकार के जरिए चलाया। यहां न तो प्रांत का दर्जा था और न ही पाकिस्तान की संसद में पूरा प्रतिनिधित्व था। फिर 2009 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान एम्पावरमेंट एंड सेल्फ-गवर्नेंस ऑर्डर लागू किया। इसके तहत पहली बार यहां विधानसभा चुनाव हुए और एक स्थानीय सरकार बनाई गई। हालांकि तब भी विधानसभा के अधिकार सीमित थे और अहम फैसले प्रधानमंत्री लेता था। इसके बाद 2018 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान ऑर्डर 2018 लागू किया। इसमें स्थानीय विधानसभा और मुख्यमंत्री को कई शक्तियां दी गईं। यानी कि गिलगित-बाल्टिस्तान में ‘ऑर्डर ऑफ 2018’ के तहत यह दूसरा चुनाव कराया जा रहा है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में चुनाव से भारत नाराज:कहा- इससे अवैध कब्जा वैध नहीं होगा; 7 जून को 24 सीटों पर वोटिंग

भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में 7 जून को होने वाले विधानसभा चुनावों का कड़ा विरोध किया है। विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि पाकिस्तान जिस क्षेत्र पर अवैध और जबरन कब्जा किए हुए है, वहां चुनाव कराने की उसकी योजना पूरी तरह अस्वीकार्य है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी शामिल है, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। इसलिए पाकिस्तान को उन क्षेत्रों में किसी भी तरह की राजनीतिक प्रक्रिया चलाने का कोई अधिकार नहीं है। चुनाव कराने जैसी गतिविधियां वहां की जमीनी हकीकत को नहीं बदल सकतीं। गिलगित-बाल्टिस्तान में रविवार को 10 जिलों की 24 सीटों पर मतदान कराया जाएगा। यह भारत के केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का हिस्सा है। हालांकि, यह पाकिस्तान के कब्जे में है। इसी वजह से वहां होने वाले हर चुनाव या राजनीतिक कदम पर भारत आमतौर पर आपत्ति दर्ज कराता है। साढ़े पांच साल बाद हो रहे चुनाव गिलगित-बाल्टिस्तान में साढ़े पांच साल बाद हो रहे हैं। इससे पहले यहां नवंबर 2020 में चुनाव हुए थे, जिनमें पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) ने जीत हासिल की थी। यहां का कार्यकाल 5 साल का होता है। 2020 में चुनी गई विधानसभा ने नवंबर 2025 में अपना कार्यकाल पूरा कर लिया था। नियमों के मुताबिक इसके बाद नए चुनाव कराए जाने थे, लेकिन खराब मौसम और प्रशासनिक कारणों से मतदान समय पर नहीं हो सका। क्षेत्र में सर्दियों के दौरान भारी बर्फबारी होती है, जिससे कई इलाकों में आवागमन प्रभावित हो जाता है। इसी वजह से चुनाव को टाल दिया गया और बाद में 7 जून 2026 की तारीख तय की गई। गिलगित-बाल्टिस्तान में दूसरा चुनाव गिलगित-बाल्टिस्तान और Pok (जिसे पाकिस्तान आजाद जम्मू-कश्मीर कहता है) की प्रशासनिक व्यवस्था अलग-अलग रही है। Pok का अपना अलग संविधान, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विधानसभा है। पाकिस्तान Pok को कुछ स्वायत्तता देता है, हालांकि वास्तविक शक्ति काफी हद तक इस्लामाबाद के पास रहती है। लेकिन गिलगित-बाल्टिस्तान की स्थिति अलग थी। 1947 से लेकर कई दशकों तक इसे पाकिस्तान ने सीधे संघीय सरकार के जरिए चलाया। यहां न तो प्रांत का दर्जा था और न ही पाकिस्तान की संसद में पूरा प्रतिनिधित्व था। फिर 2009 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान एम्पावरमेंट एंड सेल्फ-गवर्नेंस ऑर्डर लागू किया। इसके तहत पहली बार यहां विधानसभा चुनाव हुए और एक स्थानीय सरकार बनाई गई। हालांकि तब भी विधानसभा के अधिकार सीमित थे और अहम फैसले प्रधानमंत्री लेता था। इसके बाद 2018 में पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान ऑर्डर 2018 लागू किया। इसमें स्थानीय विधानसभा और मुख्यमंत्री को कई शक्तियां दी गईं। यानी कि गिलगित-बाल्टिस्तान में ‘ऑर्डर ऑफ 2018’ के तहत यह दूसरा चुनाव कराया जा रहा है। PoK में 27 जुलाई को विधानसभा चुनाव होंगे गिलगित-बाल्टिस्तान के बाद 27 जुलाई को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे। PoK की विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं। इनमें से 45 सीटों पर सीधे चुनाव होता है, जबकि 8 सीटें महिलाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित हैं। PoK में विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का होता है। इससे पहले 2021 में PoK विधानसभा चुनाव में इमरान खान की पार्टी (PTI) ने 45 में से 25 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसके बाद सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी प्रधानमंत्री बने। हालांकि अप्रैल 2022 में इमरान खान की सरकार गिर गई। इसका असर वहां की राजनीति पर भी पड़ा। मई 2022 में सरदार अब्दुल कय्यूम नियाजी ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद PTI ने ही सरदार तनवीर इलियास को नया प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन अप्रैल 2023 में PoK की उच्च अदालत ने उन्हें अदालत की अवमानना के मामले में अयोग्य घोषित कर दिया। इसके बाद उनका पद चला गया और एक बार फिर नया प्रधानमंत्री चुनना पड़ा। इसके बाद PTI के ही चौधरी अनवरुल हक प्रधानमंत्री बने। लेकिन कुछ ही समय बाद उन्होंने इमरान खान और PTI से दूरी बना ली और खुद को स्वतंत्र नेता के रूप में स्थापित किया। बाद में पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज), पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और अन्य दलों के समर्थन से उनकी सरकार चलती रही। इस दौरान PoK में महंगाई, बिजली दरों और आटे की कीमतों को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन भी हुए। 2024 में कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए थे, जिसके बाद पाकिस्तान की संघीय सरकार को सब्सिडी और आर्थिक राहत पैकेज की घोषणा करनी पड़ी। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 24 सीटें रिजर्व 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के बाद बने परिसीमन ढांचे के तहत जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 24 सीटें PoK और गिलगित-बाल्टिस्तान के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों पर चुनाव नहीं होते क्योंकि ये क्षेत्र फिलहाल पाकिस्तान के नियंत्रण में हैं। इसलिए इन्हें खाली रखा जाता है। ——————————– यह खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश में ट्रम्प जैसे दिखने वाले भैंसे की कुर्बानी रुकी:तीन लाख रुपए में ईद के लिए नीलाम हुआ था, अब नेशनल जू भेजा गया बांग्लादेश में डोनाल्ड ट्रम्प नाम से मशहूर सफेद भैंसे की ईद पर कुर्बानी रोक दी गई है। इस भैंसे को 3.85 लाख टका (करीब 3 लाख रूपए) में बेचा गया था। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, भैंसे को जिंजिरा के रसूलपुर इलाके के रहने वाले मोहम्मद शोरोन ने 23 मई को ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी के लिए खरीदा था। पूरी खबर यहां पढ़ें…
विपक्ष के नेता और व्यवस्था: बंगाल में टीएमसी गुट की लड़ाई से पता चलता है कि ‘विपक्ष के नेता’ का पद इतना प्रतिष्ठित क्यों है | भारत समाचार

आखरी अपडेट:05 जून, 2026, 19:26 IST जब राजनीतिक गुट टूटते हैं, तो इस एकल कार्यालय पर नियंत्रण यह निर्धारित कर सकता है कि कौन सा समूह औपचारिक वैधता प्राप्त करता है और कौन राजनीतिक अस्पष्टता में चला जाता है ममता बनर्जी द्वारा टीएमसी से निकाले गए ऋतब्रत बनर्जी को बंगाल विधानसभा में विपक्ष का नेता नियुक्त किया गया है। फ़ाइल छवि विपक्ष के नेता (एलओपी) पद को लेकर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जैसे प्रमुख क्षेत्रीय दलों को अस्थिर करने वाली तीखी आंतरिक और विधायी लड़ाई भारतीय संसदीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण सच्चाई को उजागर करती है: यह पद, हालांकि एक संवैधानिक पद नहीं बल्कि एक वैधानिक पद है, एक औपचारिक पदवी से कहीं अधिक है। राज्य विधानसभाओं और संसद में समान रूप से, एलओपी एक महत्वपूर्ण संवैधानिक धुरी के रूप में कार्य करता है, जिसके पास पर्याप्त संस्थागत अधिकार, प्रशासनिक शक्ति और विशिष्ट कानूनी विशेषाधिकार होते हैं। जब राजनीतिक गुट टूटते हैं, तो इस एकल कार्यालय पर नियंत्रण यह निर्धारित कर सकता है कि कौन सा समूह औपचारिक वैधता प्राप्त करता है और कौन राजनीतिक अस्पष्टता में चला जाता है। नतीजतन, एलओपी पद के लिए संघर्ष विधायी पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर प्रणालीगत अस्तित्व, रणनीतिक प्रभुत्व और कथा नियंत्रण के लिए एक उच्च जोखिम वाली लड़ाई का प्रतिनिधित्व करता है। संवैधानिक ढांचा और नियुक्ति शक्ति वैधानिक रूप से, विपक्ष के नेता को एक अद्वितीय संवैधानिक दर्जा प्राप्त है, जो आधिकारिक तौर पर कैबिनेट मंत्री के पद, वेतन और भत्ते के बराबर है। प्रतिष्ठित प्रोटोकॉल से परे, कार्यालय की असली शक्ति उच्च-स्तरीय वैधानिक चयन समितियों में इसके अनिवार्य समावेश में निहित है। कानून के अनुसार, लोकायुक्त या लोकपाल, राज्य मानवाधिकार आयोग, मुख्य सूचना आयुक्त और केंद्रीय जांच एजेंसियों सहित महत्वपूर्ण निरीक्षण निकायों के प्रमुखों का चयन करने के लिए एलओपी मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री के साथ बैठता है। एक विद्रोही गुट के लिए, एलओपी पद हासिल करने से राज्य की नियुक्तियों पर उसके संस्थागत वीटो की मूल पार्टी छीन जाती है, जिससे प्रभावी रूप से प्रमुख संवैधानिक उत्तोलन सीधे अलग हुए समूह के हाथों में स्थानांतरित हो जाता है। प्रशासनिक सुविधाएं और विधायी नियंत्रण प्रशासनिक रूप से, एलओपी एक समर्पित सचिवालय, आधिकारिक वाहन, एक कैबिनेट-ग्रेड आवासीय बंगला और एक स्वतंत्र बजट का हकदार है। हालाँकि, सदन के अंदर की परिचालन शक्ति ही भयंकर राजनीतिक टकराव को जन्म देती है। महत्वपूर्ण विधायी बहसों के दौरान एलओपी को बोलने का प्राथमिक समय मिलता है, वह विपक्ष की सदन प्रबंधन रणनीति को निर्देशित करता है और शून्य तथा प्रश्नकाल के दौरान सत्ता पक्ष से सवाल पूछने में निर्णायक भूमिका निभाता है। इस कार्यालय पर नियंत्रण एक राजनीतिक गुट को विपक्ष के विधायी एजेंडे को निर्धारित करने, किन मुद्दों को उजागर किया जाए, यह निर्धारित करने और अपने स्वयं के वैचारिक स्पेक्ट्रम के भीतर प्रतिद्वंद्वी असहमति की आवाजों को प्रभावी ढंग से चुप कराने का एकतरफा अधिकार देता है। राजनीतिक वैधता की लड़ाई रणनीतिक दृष्टिकोण से, पार्टी के आंतरिक विभाजन के बाद एलओपी पदवी हासिल करना राजनीतिक वैधता के लिए अंतिम मानदंड है। जटिल विधायी पुनर्संरेखण में, विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अलग हुए गुट से एलओपी की औपचारिक मान्यता उस समूह की संख्यात्मक सर्वोच्चता की वास्तविक पुष्टि के रूप में कार्य करती है। यह सत्ता-विरोधी मतदाताओं और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को एक शक्तिशाली संकेत भेजता है कि मूल आलाकमान के बजाय विद्रोही खेमे ने प्राथमिक विपक्षी स्थान पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया है। यह बदलाव मूल पार्टी की सार्वजनिक छवि को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाता है, जिससे इसका शीर्ष नेतृत्व आगे चलकर दल-बदल के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। दल-बदल विरोधी चुनौतियों के विरुद्ध एक ढाल अंततः, नेता प्रतिपक्ष पद की लड़ाई रक्षात्मक कानूनी रणनीतियों के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। जब टीएमसी जैसी पार्टियों के भीतर गुट आपस में टकराते हैं, तो एलओपी पदनाम सुरक्षित करने वाले समूह को संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कार्यवाही में महत्वपूर्ण लाभ मिलता है। जबकि दलबदलुओं को दंडित करने का अंतिम अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास है, एलओपी पद रखने से एक गुट को बाद की न्यायिक समीक्षाओं में एक मजबूत रक्षात्मक ढाल मिलती है। अपने नेता को विधायी विपक्ष के आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त प्रमुख के रूप में नामित करके, विद्रोही अपने रैंक-एंड-फ़ाइल संख्या को मजबूत करने के लिए अमूल्य समय खरीदने के लिए संस्थागत मान्यता का उपयोग करके अदालत में अयोग्यता याचिकाओं को आक्रामक रूप से लड़ सकते हैं। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना लेखक के बारे में पथिकृत सेन गुप्ता पथिकृत सेन गुप्ता News18.com के वरिष्ठ एसोसिएट संपादक हैं और लंबी कहानी को छोटा करना पसंद करते हैं। वह राजनीति, खेल, वैश्विक मामलों, अंतरिक्ष, मनोरंजन और भोजन पर छिटपुट रूप से लिखते हैं। वह …और पढ़ें न्यूज़ इंडिया विपक्ष के नेता और व्यवस्था: बंगाल में टीएमसी गुट की लड़ाई से पता चलता है कि ‘विपक्ष के नेता’ पद को इतना महत्व क्यों दिया जाता है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)पश्चिम बंगाल(टी)ममता बनर्जी(टी)टीएमसी(टी)विपक्ष के नेता(टी)बंगाल(टी)एलओपी
बंगाल में नेता प्रतिपक्ष की मान्यता को लेकर कोर्ट जाएगी टीएमसी, कल्याण बनर्जी ने रीताब्रत बनर्जी पर साधा निशाना | भारत समाचार

आखरी अपडेट:05 जून, 2026, 19:24 IST टीएमसी सोमवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता की मान्यता को चुनौती देते हुए अदालत का रुख करेगी, इसे कानूनी रूप से अस्थिर और टीएमसी भाजपा के तनाव को बढ़ाने वाला बताएगी। टीएमसी सोमवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता की मान्यता को चुनौती देते हुए अदालत का रुख करेगी, इसे कानूनी रूप से अस्थिर और टीएमसी भाजपा के तनाव को बढ़ाने वाला बताएगी। (छवि: पीटीआई) तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने घोषणा की है कि वह पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता की मान्यता को चुनौती देते हुए सोमवार को अदालत का रुख करेगी और दावा करेगी कि यह निर्णय कानूनी रूप से अस्थिर है। वरिष्ठ टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने कहा कि पार्टी का मानना है कि विपक्षी नेता की मान्यता स्थापित संसदीय मानदंडों का उल्लंघन है और इस मामले पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करेगी। पत्रकारों से बात करते हुए, बनर्जी ने कहा कि विवाद विधानसभा के भीतर संसदीय मामलों से संबंधित है और कहा कि पद पर विपक्ष के दावे में कानूनी वैधता का अभाव है। यह घटनाक्रम पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ टीएमसी और भाजपा के बीच नवीनतम टकराव का प्रतीक है, जहां राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव के बाद राजनीतिक तनाव अधिक बना हुआ है। बातचीत के दौरान, कल्याण बनर्जी ने रीताब्रत बनर्जी पर भी कटाक्ष किया और उनकी राजनीतिक साख पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि हालांकि ऋतब्रत बनर्जी ने राज्यसभा के सदस्य के रूप में कार्य किया था, लेकिन वह कभी भी जमीनी स्तर की राजनीति में शामिल नहीं हुए थे। कल्याण बनर्जी ने मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम में ऋतब्रत बनर्जी की भूमिका की स्पष्ट आलोचना करते हुए टिप्पणी की, “राज्यसभा सदस्य होना एक बात है, लेकिन जमीनी स्तर की राजनीति पूरी तरह से अलग है।” टीएमसी ने अभी तक उन विशिष्ट कानूनी आधारों का खुलासा नहीं किया है जिन पर वह विपक्ष के नेता की मान्यता को चुनौती देना चाहती है, लेकिन पार्टी नेताओं ने संकेत दिया कि याचिका सोमवार को उचित अदालत के समक्ष दायर की जाएगी। इस कदम से पश्चिम बंगाल विधानसभा के कामकाज और सदन के भीतर विपक्ष की स्थिति पर एक नई कानूनी और राजनीतिक लड़ाई शुरू होने की उम्मीद है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना लेखक के बारे में न्यूज़ डेस्क न्यूज़ डेस्क उत्साही संपादकों और लेखकों की एक टीम है जो भारत और विदेशों में होने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं का विवरण और विश्लेषण करती है। लाइव अपडेट से लेकर एक्सक्लूसिव रिपोर्ट से लेकर गहन व्याख्याताओं तक…और पढ़ें न्यूज़ इंडिया बंगाल में नेता प्रतिपक्ष की मान्यता को लेकर टीएमसी कोर्ट जाएगी, कल्याण बनर्जी ने रीताब्रत बनर्जी पर निशाना साधा अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)टीएमसी अदालत में पश्चिम बंगाल विधानसभा को चुनौती(टी)तृणमूल कांग्रेस(टी)विपक्ष के नेता(टी)पश्चिम बंगाल की राजनीति(टी)संसदीय मानदंड विवाद(टी)कल्याण बनर्जी का बयान(टी)ऋतब्रत बनर्जी की आलोचना(टी)बीजेपी बनाम टीएमसी
देसी Vs हाईब्रिड खीरा: बाजार में धोखा तो नहीं खा रहे? इन 3 सबसे आसान मासूम से झट से पहचानें देसी और संकर खीरा; जानिए फायदे

देसी खेडा आकार में छोटा और छोटा टेढ़ा-मेढ़ा होता है। इसका रंग हरा या पीला-हरा हो सकता है। इसके साथ ही मधुमेह के आकार में लंबा, सीधा और एक समान दिखता है। इसका रंग गहरा हरा और चमकीला होता है। छवि: सोशल मीडिया देसी अनाज में बीज काफी बड़े और अधिक मात्रा में होते हैं। साथ ही किशोरावस्था के बीज छोटे और कम दिखाई देते हैं। खेडा कटर पर यह अंतर आसानी से समझ में आता है। छवि: सोशल मीडिया देसी मिठाई का स्वाद अधिक प्राकृतिक और प्रभाव मीठा होता है। इसमें अनुवाद भी अच्छा आता है। दूसरी ओर मैग्नीशियम खेडा अधिक पानीदार होता है और उसका स्वाद हल्का प्रभाव या अलग हो सकता है। छवि: सोशल मीडिया लंबे समय तक ताजा रहता है। आकार और गुणवत्ता में एकरूपता होती है। अधिक पानी होने के कारण शरीर को स्टॉक में रखने में मदद मिलती है। बाज़ार में आसानी से उपलब्ध है। छवि: फ्रीपिक शरीर को ठंडक देने में मदद करता है। वनस्पति से भरपूर होने के कारण पाचन क्रिया बेहतर होती है। प्राकृतिक स्वाद और पोषक तत्व से परिपूर्णता होती है। गर्मियों में डिहाइड्रेशन से बचने में मदद मिलती है। छवि: सोशल मीडिया देसी और मिश्रण दोनों अपने-अपने फायदे हैं। यदि आप प्राकृतिक स्वाद और पारंपरिक स्वाद पसंद करते हैं तो देसी खेडा बेहतर विकल्प हो सकता है। छवि: एआई वहीं अगर आप ज्यादा पानी वाला, साफा-सुथरा और लंबे समय तक टिकने वाला खेडाचाना चाहते हैं तो हाइब्रिड खेडा चुन सकते हैं। खेडा आदर्श समय केवल आकार और चमक को देखने का निर्णय न करें। छवि: फ्रीपिक रंग, स्वाद और मसालों की मजबूती पर ध्यान देकर आप आसानी से देसी और शानदार मसालों की पहचान कर सकते हैं। सही जानकारी के साथ खरीदारी करने पर आपको बेहतर स्वाद और पोषण दोनों का लाभ मिलेगा। छवि: फ्रीपिक
स्पोर्ट्स अपडेट्स:ढाका प्रीमियर लीग में सैलरी नहीं मिलने पर खिलाड़ियों ने खेलने से मना किया, विरोधी टीम विजेता घोषित

ढाका प्रीमियर लीग (DPL) में ब्रदर्स यूनियन के खिलाड़ियों ने बकाया भुगतान न मिलने पर मैच खेलने से इनकार कर दिया। खिलाड़ी मैदान पर तो आए, लेकिन उन्होंने टॉस करने से साफ मना कर दिया। इसके बाद अंपायरों ने विरोधी टीम ‘अग्रणी बैंक’ को बिना खेले ही विजेता घोषित कर दिया। सीनियर खिलाड़ी सोहाग गाजी ने बताया कि क्लब ने शुरुआत में सिर्फ 20% पेमेंट किया था। उन्होंने ईद से पहले मिलने वाली किस्त भी नहीं दी। खिलाड़ियों का कहना है कि घर चलाना मुश्किल हो रहा था, इसलिए विरोध का ही रास्ता बचा था। श्रीलंका के पाथिरागे ने नीरज चोपड़ा को पीछे छोड़ा, 92.62 मीटर का थ्रो फेंका रोम डायमंड लीग में श्रीलंका के 23 साल के जैवलिन थ्रोअर रुमेश पाथिरागे ने 92.62 मीटर का थ्रो फेंककर गोल्ड मेडल जीता है। वे 2026 में 90 मीटर का आंकड़ा पार करने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बन गए हैं। इस थ्रो के साथ ही पाथिरागे ने भारत के नीरज चोपड़ा (90.23 मीटर) को पीछे छोड़ दिया है। वे अरशद नदीम (92.97 मीटर) के बाद एशिया के दूसरे सबसे बेस्ट थ्रोअर बन गए हैं। वहीं इस लीग में भारत के सचिन यादव 79.18 मीटर के थ्रो के साथ आठवें स्थान पर रहे।
मोरिंगा की चटनी रेसिपी: घर में गर्मागर्म खट्टी-मीठी मोरिंगा के टुकड़े, खाने का स्वाद होगा दोगुना; विधि नोट करें

सामग्री: मोरिंगा के पत्ते, 2 बड़े आकार की भुनी हुई मूंगफली, 2 हरी मिर्च, 1 बड़ा मसाला अदरक, 1 बड़ा मसाला जीरा, 1 बड़ा चम्मच इमली का गुड़, 1 बड़ा चम्मच इमली का गुड़, 1 बड़ा चम्मच मसाला नमक, 1 बड़ा चम्मच तेल छवि: एआई धन्यवाद के लिए: 1 छोटा चम्मच लाल मिर्च, 5-6 छोटा चम्मच लाल मिर्च, 1 छोटा चम्मच तेल छवि: एआई बनाने की विधि: सबसे पहले मोरिंगा के विक्रेताओं को अच्छे तरीके से धोकर साफ कर लें। एक पैन में तेल गर्म करें और इसमें जीरा, हरी मिर्च और अदरक के टुकड़े भून लें। छवि: फ्रीपिक इसमें मोरिंगा के पत्ते डाले गए और 2-3 मिनट तक हाथी, जब तक पत्ते नंगा न हो गए। गैस बंद करके मिश्रण को ठंडा करें।प्लास्टर जार में भूनी मूंगफली, इमली का गूदा, गुड़, नमक और तैयार मिश्रण के कारीगर पीस लें। छवि: एआई जरूरत के मुताबिक छोटे पानी के प्लॉट लॉजिक तैयार कर लें। अब एक छोटे पैन में तेल गर्म करें और इसमें राई, करी पत्ता और सूखी लाल मिर्च का तड़का शामिल है। तैयार किये गए को तैयार करने के लिए तैयार करें। छवि: एआई मोरिंगा की यह खट्टी-मीठी ब्रेड, पराठा, इडली, डोसा या चावल के साथ बेहद स्वादिष्ट होती है. इसे आप किसी भी समय आबंटन से लेकर ज़ूमार और डायनर तक बना सकते हैं। छवि: एआई मोरिंगा के फलों में विटामिन-ए, सी, आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है, पाचन को बेहतर बनाता है और शरीर को ऊर्जा प्रदान करने में मदद करता है। छवि: फ्रीपिक
चौथी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही:वित्त वर्ष-26 में 7.7% की दर से बढ़ी इकोनॉमी, फरवरी में सरकार ने यह अनुमान 7.6% बताया था

वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च) में GDP ग्रोथ 7.8% रही। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 5 जून को ये आंकड़े जारी किए। इस बार GDP की गणना बेस ईयर 2011-12 के बजाय 2022-23 के आधार पर की गई है। सरकार ने बताया कि पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में GDP 7.7% की दर से बढ़ी है, जो पिछले साल 7.1% थी। इससे पहले फरवरी में सरकार ने इसका अनुमान 7.6% बताया था। नौकरों, ड्राइवर और ई-वाहन डेटा भी शामिल किया GDP की नई सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है। आर्थिक अनुमानों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए इसमें अब जीएसटी नेटवर्क, ई-वाहन डेटाबेस और घरों में काम करने वाले कुक, ड्राइवर और घरेलू नौकरों की सेवाओं से जुड़ा डेटा भी शामिल किया गया है। आमतौर पर हर 5 साल में बदला जाता है बेस-ईयर समय के साथ अर्थव्यवस्था में आने वाले बड़े बदलावों को दर्ज करने के लिए समय-समय पर बेस ईयर बदला जाता है। आमतौर पर मंत्रालय हर पांच साल में डेटा सीरीज को अपडेट करता है, लेकिन कोविड महामारी और जीएसटी लागू होने की वजह से इस काम में देरी हुई। 1950 तक के नए आंकड़े दिसंबर 2026 तक आएंगे सरकार सिर्फ नए आंकड़े ही नहीं जारी करेगी, बल्कि पुराने आंकड़ों को भी नए बेस ईयर के हिसाब से दोबारा कैलकुलेट करेगी। मंत्रालय ने संकेत दिया है कि इस नए फ्रेमवर्क के तहत ‘बैक-सीरीज’ डेटा (1950-51 तक के आंकड़े) दिसंबर 2026 तक आने की उम्मीद है। नए माप से सटीकता बढ़ेगी; हर 5 से 10 साल में मानक बदलना चाहिए आखिर जीडीपी मापने का तरीका क्यों बदला गया? 2011-12 वाला पैमाना 14 साल पुराना हो गया था। तब यूपीआई, जोमैटो, ओटीटी, गिग इकोनॉमी जैसी चीजें थीं ही नहीं। इसीलिए ये जरूरी था। 2022-23 को ही आधार वर्ष क्यों चुना गया? यह साल ‘सामान्य’ था। कोरोना खत्म हो चुका था। अर्थव्यवस्था स्थिर थी। डिजिटल इंडिया स्थापित हो चुका था। आधार वर्ष हमेशा ऐसा चुनते हैं जब न बहुत उछाल हो, न गिरावट। इससे आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा? जेब पर सीधा असर नहीं, लेकिन सही आंकड़ों से सरकार बेहतर नीतियां बनाएगी। सही जगह पैसा लगेगा और विदेशी निवेश भी बढ़ेगा, जिसका फायदा धीरे-धीरे आम नागरिक को मिलेगा। आंकड़े बदले या कुछ छुपाया तो नहीं गया? नहीं। नए पैमाने से नापने पर माप बदलती है, यह स्वाभाविक है। अमेरिका, ब्रिटेन, चीन सब यही करते हैं। आंकड़े बदलना सटीकता की निशानी है। कितने अंतराल पर इसे बदलना चाहिए? अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार हर 5 से 10 वर्ष में बदलना चाहिए। देश में 5 साल तय, पर 2017-18 में नोटबंदी व जीएसटी के कारण देरी हो गई। इसके बाद कोविड आ गया, इसलिए अब किया। नॉलेज पार्ट: क्या होता है बेस ईयर बेस ईयर वह साल है जिसकी कीमतों को ‘फिक्स’ मानकर आज की आर्थिक तरक्की को मापा जाता है। यह महंगाई के असर को हटाकर देश की ‘असली’ ग्रोथ दिखाने में मदद करता है। उदाहरण: अगर 2011 में एक पेन 5 रुपए का था और आज 10 रुपए का है। अगर हम आज भी 100 पेन बना रहे हैं, तो 2011 के हिसाब से जीडीपी 500 रुपए दिखेगी। वहीं ये आज के हिसाब से 1000 रुपए होगी। बेस ईयर हमें यह समझने में मदद करता है कि हम पेन ज्यादा बना रहे हैं या सिर्फ पेन महंगा हो गया है। इकोनॉमी की सेहत बताती है GDP GDP यानी देश के भीतर एक तय समय में कितनी वैल्यू का सामान बना और कितनी सर्विसेज दी गईं। इसे देश की आर्थिक सेहत का ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी कह सकते हैं। इसमें भारतीय कंपनियां ही नहीं, बल्कि देश में काम करने वाली विदेशी कंपनियों का प्रोडक्शन भी जोड़ा जाता है। दो तरह की GDP: रियल और नॉमिनल रियल जीडीपी: इसमें सामान और सेवाओं की कीमत बेस से तय की जाती है। अभी तक इसका साल 2011-12 था। इससे पता चलता है कि देश में उत्पादन सच में बढ़ा है या नहीं। नॉमिनल जीडीपी: यह मौजूदा बाजार भाव पर आधारित होती है। इसमें महंगाई भी शामिल होती है। अगर चीजों के दाम बढ़ रहे हैं, तो नॉमिनल जीडीपी भी बढ़ी हुई दिखेगी। कैसे की जाती है जीडीपी की गिनती? जीडीपी निकालने के लिए एक खास फॉर्मूले का इस्तेमाल होता है: $GDP = C + G + I + NX$ C (कंजम्प्शन): यानी हम और आप जो अपनी जरूरतों पर खर्च करते हैं। G (गवर्नमेंट): सरकार द्वारा देश के विकास और सुविधाओं पर किया गया खर्च। I (इन्वेस्टमेंट): कंपनियों द्वारा बिजनेस को बढ़ाने के लिए किया गया निवेश। NX (नेट एक्सपोर्ट): दूसरे देशों को बेचे गए सामान में से खरीदे गए सामान को घटाना।
डीके शिवकुमार: क्या उनकी सरकार गिर जाएगी? मध्यावधि चुनावों पर एक साहसिक भविष्यवाणी से कर्नाटक चर्चा में है | बेंगलुरु-न्यूज़ न्यूज़

आखरी अपडेट:05 जून, 2026, 15:43 IST कर्नाटक के नए मंत्रिमंडल के गठन के कुछ दिनों बाद, पोर्टफोलियो आवंटन पर असहमति सामने आई है। इस विवाद ने भाजपा को सरकार पर निशाना साधने का नया मौका दे दिया है राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पोर्टफोलियो आवंटन नए मुख्यमंत्री के सामने पहली बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है क्योंकि वह पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करना चाहते हैं। डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली नवगठित कर्नाटक सरकार आंतरिक तनाव के पहले संकेतों का सामना कर रही है, मंत्रालय के गठन के कुछ ही दिनों के भीतर कैबिनेट पोर्टफोलियो आवंटन पर असहमति सामने आ रही है। रिपोर्टों के अनुसार, कैबिनेट के गठन के तुरंत बाद वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के बीच असंतोष उभर आया है, जिससे नेतृत्व दबाव में है क्योंकि वह प्रशासन को स्थिर करने का प्रयास कर रहा है। पोर्टफोलियो आवंटन फ्लैशप्वाइंट बन जाता है वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी द्वारा उन्हें सौंपे गए पोर्टफोलियो को लेकर अपने मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद विवाद गहरा गया। इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता केएच मुनियप्पा के असंतोष की खबर आई, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने उन्हें आवंटित विभाग के बारे में भी आपत्ति जताई थी। एक के बाद एक हुए घटनाक्रम ने सत्तारूढ़ दल के भीतर आंतरिक मतभेदों की ओर ध्यान आकर्षित किया है और कैबिनेट गठन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पोर्टफोलियो आवंटन नए मुख्यमंत्री के सामने पहली बड़ी चुनौतियों में से एक बन गया है क्योंकि वह पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करना चाहते हैं। बीजेपी को दिख रहे हैं अस्थिरता के संकेत विपक्षी भाजपा ने सरकार की आलोचना करने के लिए घटनाक्रम को जब्त कर लिया है। राज्य भाजपा अध्यक्ष और बीवाई विजयेंद्र ने दावा किया कि रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा नए प्रशासन में गिरने वाला “पहला विकेट” है और तर्क दिया कि सरकार की कार्यप्रणाली बढ़ती अस्थिरता का संकेत देती है। उन्होंने आगे सुझाव दिया कि राजनीतिक स्थिति अंततः मध्यावधि चुनाव का कारण बन सकती है, और कहा कि भाजपा ऐसे परिदृश्य के लिए तैयार है। विपक्ष के नेता आर अशोक ने भी सरकार की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस के भीतर मतभेद तेजी से दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि सत्तारूढ़ दल के भीतर बार-बार होने वाले विवाद इसके कामकाज में गहरी समस्याओं को दर्शाते हैं और राजनीतिक अस्थिरता की भविष्यवाणियों को प्रतिबिंबित करते हैं। सरकार की स्थिरता पर सवाल मंत्रालय के गठन के तुरंत बाद रामलिंगा रेड्डी के इस्तीफे ने सरकार की आंतरिक गतिशीलता की जांच तेज कर दी है। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व ने अभी तक सरकार की स्थिरता के लिए किसी खतरे का संकेत नहीं दिया है, लेकिन इस प्रकरण ने इस बात पर राजनीतिक बहस छेड़ दी है कि क्या वरिष्ठ नेताओं के बीच चल रही असहमति आने वाले महीनों में शासन को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल, फोकस इस बात पर बना हुआ है कि मुख्यमंत्री पोर्टफोलियो आवंटन पर चिंताओं को कैसे संबोधित करते हैं और कैबिनेट के भीतर प्रतिस्पर्धी हितों का प्रबंधन करते हैं, क्योंकि प्रशासन अपनी शुरुआती राजनीतिक उथल-पुथल से आगे बढ़ना चाहता है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना जगह : कर्नाटक, भारत, भारत समाचार शहर बेंगलुरु-समाचार डीके शिवकुमार: क्या उनकी सरकार गिर जाएगी? मध्यावधि चुनावों पर एक साहसिक भविष्यवाणी से कर्नाटक चर्चा में है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक सरकार कैबिनेट संकट(टी)कर्नाटक राजनीतिक अस्थिरता(टी)डीके शिवकुमार सरकार(टी)रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा(टी)कैबिनेट पोर्टफोलियो आवंटन(टी)कांग्रेस आंतरिक असंतोष(टी)भाजपा की आलोचना कर्नाटक(टी)कर्नाटक मध्यावधि चुनाव
ललित मोदी बोले- मेरी बायोपिक पर काम जारी:रणवीर सिंह ने मेरा रोल निभाने की इच्छा जताई थी, लंदन में मुझसे मिले थे

बिजनेसमैन और पूर्व आईपीएल चेयरमैन ललित मोदी ने कहा कि उनकी जिंदगी पर फिल्म बनने जा रही है और इसकी स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि एक्टर रणवीर सिंह ने उनका रोल निभाने में रुचि दिखाई थी। न्यूज एजेंसी ANI के साथ बातचीत में ललित मोदी ने कहा कि उनकी एक पूरी टीम इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है। हालांकि, अभी कहानी को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जब उनसे पूछा गया कि वह अपने रोल में किसे देखना चाहते हैं, तो उन्होंने रणवीर सिंह का नाम लिया। मोदी ने कहा, ‘रणवीर सिंह मेरा रोल निभाना चाहते थे। वह खुद मेरे पास आए थे। मैं भी चाहूंगा कि वही मेरा रोल करें, लेकिन अब वह इतने बड़े स्टार बन चुके हैं कि पता नहीं उनके पास समय होगा या नहीं।’ ललित मोदी बोले- दो साल पहले हुई थी मुलाकात ललित मोदी ने कहा, ‘मैं रणवीर को नहीं जानता था। मैं दीपिका को अच्छी तरह जानता था, लेकिन रणवीर से कभी नहीं मिला था। फिर एक दिन मुझे फोन आया कि रणवीर आपसे मिलना चाहते हैं। वह मुझसे मिलने लंदन आए। यह करीब दो साल पहले की बात है। उस मुलाकात में उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें अपनी जिंदगी में कोई एक किरदार निभाने का मौका मिले, तो वह आईपीएल कमिश्नर के रूप में ललित मोदी का रोल निभाना चाहेंगे।’ मोदी ने यह भी कहा, ‘यहीं से यह बात शुरू हुई थी। मैंने उनसे नहीं कहा था। मुझे लगता है कि वह बेहतरीन एक्टर हैं। उन्होंने अपने करियर में शानदार काम किया है। अब वह आज भी मेरा रोल निभाना चाहते हैं या नहीं, यह मुझे नहीं पता, लेकिन दो साल पहले हम इसी घर में बैठे थे और इस रोल को लेकर बात हुई थी। हम इसे आगे बढ़ाने वाले थे। फिलहाल बायोपिक की स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है।’ मोदी ने बताया कि यह सिर्फ उनकी निजी कहानी नहीं होगी। फिल्म में आईपीएल के जन्म और उसे दुनिया की सबसे बड़ी क्रिकेट लीग में बदलने की कहानी भी दिखाई जाएगी। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ा प्रोडक्शन होगा और इसे बनाने में काफी मेहनत लग रही है। —————————- ये खबर भी पढ़ें… ललित मोदी बोले- मैं सुष्मिता सेन का केप्ट बॉयफ्रेंड था, हर जगह वही पेमेंट करती थीं बिजनेसमैन और पूर्व आईपीएल चेयरमैन ललित मोदी ने हाल ही में अपनी पूर्व पार्टनर सुष्मिता सेन को स्पेशल बताया। साथ ही उन्होंने एक्ट्रेस पर लगे ‘गोल्ड डिगर’ (पैसे के लिए रिश्ता रखने वाली) के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि एक्ट्रेस हर चीज की पेमेंट करती थीं। ललित मोदी ने कहा कि सुष्मिता उनकी जिंदगी का बेहद खास हिस्सा रही हैं। पूरी खबर पढ़ें…





