Wednesday, 16 Sep 2026 | 06:59 PM

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पेरू में टूरिस्ट प्लेन क्रैश, क्रू समेत 13 की मौत:2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स देखने गए थे; मरने वालों की पहचान नहीं हो सकी

पेरू में टूरिस्ट प्लेन क्रैश, क्रू समेत 13 की मौत:2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स देखने गए थे; मरने वालों की पहचान नहीं हो सकी

पेरू के नाज्का शहर के बाहर शनिवार को पर्यटकों को ले जा रहा एक छोटा प्लेन क्रैश हो गया। इस हादसे में 13 लोगों की मौत हो गई है। एजेंसी रिपोर्ट्स के मुताबिक प्लेन ने पास के इका शहर से उड़ान भरी थी। नाज्का लाइन्स के पास पहुंचने के बाद प्लेन खेत में जाकर गिरा। इसमें आग लग गई। प्लेन में 2 पायलट्स के अलावा 11 पर्यटक थे। हादसे के बाद प्लेन के मलबे के पास जले हुए शव बिखरे पड़े थे। दरअसल, 2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स को पूरी तरह से केवल प्लेन या व्यूइंग टावर से ही देखा जा सकता है। इसलिए प्लेन पर्यटकों को लेकर निकला था। मरने वाले कहां से थे, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। पेरू प्लेन हादसे के बाद खेत में बिखरे शव… 14 साल से सीनिक फ्लाइट्स ऑर्गनाइज कर रही थी कपंनी जो प्लेन हादसे का शिकार हुआ, उसे पेरू की कंपनी ‘एरोडियाना’ ऑपरेट कर रही थी। एयरलाइन की वेबसाइट के मुताबिक, वह पिछले 14 साल से सेसना ग्रैंड कारवां प्लेन का इस्तेमाल करके नाज्का लाइन्स के ऊपर सीनिक फ्लाइट्स (नजारे दिखाने वाली उड़ानें) की सुविधा दे रहे हैं। हादसे की जांच की जा रही है। एरोडियाना ने कोई कमेंट नहीं दिया। पेरू के मूल निवासियों ने बनाईं थीं नाज्का लाइन्स पेरू की राजधानी लीमा से लगभग 400 किमी दक्षिण में पेरू के नाज्का और पाल्पा रेगिस्तान में कुछ आकृतियां बनी हैं। माना जाता है कि इन्हें 200 ईसा पूर्व से 600 ईस्वी के बीच नाज्का सभ्यता के लोगों ने बनाया। रेगिस्तान की गहरे रंग की पत्थरीली सतह हटाकर नीचे की हल्की मिट्टी को दिखाया गया, जिससे ये आकृतियां बन गईं। कई आकृतियां 100 से 300 मीटर और उससे भी बड़ी हैं। कुछ सीधी रेखाएं कई किलोमीटर तक जाती हैं। इन्हें क्यों बनाया गया, यह आज भी रहस्य है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये धार्मिक अनुष्ठान, वॉटर सोर्स, अंतरिक्ष की गणनाओं या फिर संस्कृति से जुड़ी हो सकती हैं। यहां बहुत कम बारिश और शुष्क जलवायु होने के कारण ये आकृतियां करीब 2,000 साल से सुरक्षित बनी हुई हैं। नाज्का में पहले भी हो चुके हैं हादसे पिछले कुछ दशकों में इस मशहूर हैरिटेज साइट पर विमान दुर्घटना का यह पहला मामला नहीं है।

पेरू में टूरिस्ट प्लेन क्रैश, क्रू समेत 13 की मौत:2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स देखने गए थे; मरने वालों की पहचान नहीं हो सकी

पेरू में टूरिस्ट प्लेन क्रैश, क्रू समेत 13 की मौत:2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स देखने गए थे; मरने वालों की पहचान नहीं हो सकी

पेरू के नाज्का शहर के बाहर शनिवार को पर्यटकों को ले जा रहा एक छोटा प्लेन क्रैश हो गया। इस हादसे में 13 लोगों की मौत हो गई है। एजेंसी रिपोर्ट्स के मुताबिक प्लेन ने पास के इका शहर से उड़ान भरी थी। नाज्का लाइन्स के पास पहुंचने के बाद प्लेन खेत में जाकर गिरा। इसमें आग लग गई। प्लेन में 2 पायलट्स के अलावा 11 पर्यटक थे। हादसे के बाद प्लेन के मलबे के पास जले हुए शव बिखरे पड़े थे। दरअसल, 2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स को पूरी तरह से केवल प्लेन या व्यूइंग टावर से ही देखा जा सकता है। इसलिए प्लेन पर्यटकों को लेकर निकला था। मरने वाले कहां से थे, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। पेरू प्लेन हादसे के बाद खेत में बिखरे शव… 14 साल से सीनिक फ्लाइट्स ऑर्गनाइज कर रही थी कपंनी जो प्लेन हादसे का शिकार हुआ, उसे पेरू की कंपनी ‘एरोडियाना’ ऑपरेट कर रही थी। एयरलाइन की वेबसाइट के मुताबिक, वह पिछले 14 साल से सेसना ग्रैंड कारवां प्लेन का इस्तेमाल करके नाज्का लाइन्स के ऊपर सीनिक फ्लाइट्स (नजारे दिखाने वाली उड़ानें) की सुविधा दे रहे हैं। हादसे की जांच की जा रही है। एरोडियाना ने कोई कमेंट नहीं दिया। पेरू के मूल निवासियों ने बनाईं थीं नाज्का लाइन्स पेरू की राजधानी लीमा से लगभग 400 किमी दक्षिण में पेरू के नाज्का और पाल्पा रेगिस्तान में कुछ आकृतियां बनी हैं। माना जाता है कि इन्हें 200 ईसा पूर्व से 600 ईस्वी के बीच नाज्का सभ्यता के लोगों ने बनाया। रेगिस्तान की गहरे रंग की पत्थरीली सतह हटाकर नीचे की हल्की मिट्टी को दिखाया गया, जिससे ये आकृतियां बन गईं। कई आकृतियां 100 से 300 मीटर और उससे भी बड़ी हैं। कुछ सीधी रेखाएं कई किलोमीटर तक जाती हैं। इन्हें क्यों बनाया गया, यह आज भी रहस्य है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये धार्मिक अनुष्ठान, वॉटर सोर्स, अंतरिक्ष की गणनाओं या फिर संस्कृति से जुड़ी हो सकती हैं। यहां बहुत कम बारिश और शुष्क जलवायु होने के कारण ये आकृतियां करीब 2,000 साल से सुरक्षित बनी हुई हैं।

वर्ल्ड अपडेट्स:रूस की राजधानी मास्को के रेस्टोरेंट में धमाका, 3 की मौत, 21 घायल; एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा- यह बम ब्लास्ट था

वर्ल्ड अपडेट्स:रूस की राजधानी मास्को के रेस्टोरेंट में धमाका, 3 की मौत, 21 घायल; एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा- यह बम ब्लास्ट था

रूस की राजधानी मॉस्को में शनिवार को एक रेस्टोरेंट में प्राइवेट कार्यक्रम के दौरान जोरदार धमाका हुआ। नेशनल एंटी-टेररिज्म कमेटी ने सरकारी समाचार एजेंसी RIA नोवोस्ती को बताया कि यह धमाका घर पर बने बम में हुआ। जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में धमाका करने वाली महिला संदिग्ध भी शामिल थी। हादसे में घायलों की संख्या 15 से बढ़कर 21 हो गई है। कमेटी ने बताया कि एक अनजान महिला कुद्रिन्स्काया स्क्वायर पर बने ‘बाल्जी रॉसी’ रेस्टोरेंट में घुसने की कोशिश कर रही थी। उसके पास एक इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) था। यह डिवाइस समय से पहले रेस्टोरेंट के बाहर ही फट गया, जिससे उसे रोकने वाले सुरक्षा गार्ड और रेस्टोरेंट के एक ग्राहक की मौत हो गई। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… ट्रेडर्स अब पैसे देकर पहले देख सकेंगे ट्रम्प के पोस्ट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सोशल मीडिया कंपनी ट्रुथ सोशल ने वॉल स्ट्रीट के हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स के लिए ट्रुथ एपीआई नाम की पेड सर्विस शुरू की है। इसके तहत कस्टमर मंथली फीस देकर ट्रम्प और दूसरे अकाउंट्स के पोस्ट तक तेज तकनीकी पहुंच हासिल कर सकेंगे, ताकि वे बाजार में तेजी से ट्रेड कर सकें। आलोचकों का कहना है कि ट्रम्प के टैरिफ, युद्ध, ब्याज दर और दूसरे नीतिगत फैसलों से शेयर, बॉन्ड और मुद्रा बाजार प्रभावित होते हैं, ऐसे में यह व्यवस्था इनसाइडर ट्रेडिंग और सार्वजनिक पद के निजी लाभ के लिए इस्तेमाल जैसे गंभीर सवाल खड़े करती है। वहीं ट्रम्प मीडिया का कहना है कि पोस्ट सभी के लिए एक ही समय पर जारी किए जाएंगे और सर्विस में कोई अनुचित लाभ नहीं है।

वर्ल्ड अपडेट्स:रूस की राजधानी मास्को के रेस्टोरेंट में धमाका, 3 की मौत, 15 घायल; एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा- यह बम ब्लास्ट था

वर्ल्ड अपडेट्स:रूस की राजधानी मास्को के रेस्टोरेंट में धमाका, 3 की मौत, 15 घायल; एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा- यह बम ब्लास्ट था

मास्को के एक रेस्टोरेंट में हुए धमाके में कम से कम 3 लोगों की मौत हो गई है। इस घटना में 15 लोग घायल हुए हैं। रूसी सरकारी मीडिया ने शनिवार को यह जानकारी दी। घटना मास्को के कुद्रिन्सकाया स्क्वायर इलाके की है। धमाके के बाद फॉरेंसिक एक्सपर्ट और इमरजेंसी सर्विस के लोग पहुंच गए और रेस्क्यू शुरू किया। धमाके के बाद इलाके की घेराबंदी कर दी गई। जांच कर रही एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा है कि यह धमाका बम ब्लास्ट था। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… ट्रेडर्स अब पैसे देकर पहले देख सकेंगे ट्रम्प के पोस्ट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सोशल मीडिया कंपनी ट्रुथ सोशल ने वॉल स्ट्रीट के हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स के लिए ट्रुथ एपीआई नाम की पेड सर्विस शुरू की है। इसके तहत कस्टमर मंथली फीस देकर ट्रम्प और दूसरे अकाउंट्स के पोस्ट तक तेज तकनीकी पहुंच हासिल कर सकेंगे, ताकि वे बाजार में तेजी से ट्रेड कर सकें। आलोचकों का कहना है कि ट्रम्प के टैरिफ, युद्ध, ब्याज दर और दूसरे नीतिगत फैसलों से शेयर, बॉन्ड और मुद्रा बाजार प्रभावित होते हैं, ऐसे में यह व्यवस्था इनसाइडर ट्रेडिंग और सार्वजनिक पद के निजी लाभ के लिए इस्तेमाल जैसे गंभीर सवाल खड़े करती है। वहीं ट्रम्प मीडिया का कहना है कि पोस्ट सभी के लिए एक ही समय पर जारी किए जाएंगे और सर्विस में कोई अनुचित लाभ नहीं है।

आध्यात्मिक शरण में एक्ट्रेस टिस्का चोपड़ा:पालमपुर में 30 साल बाद गुरु से मिलीं; बोलीं-'घर वापसी' जैसा आध्यात्मिक अनुभव मिला

आध्यात्मिक शरण में एक्ट्रेस टिस्का चोपड़ा:पालमपुर में 30 साल बाद गुरु से मिलीं; बोलीं-'घर वापसी' जैसा आध्यात्मिक अनुभव मिला

बॉलीवुड एक्ट्रेस एवं निर्देशक टिस्का चोपड़ा इन दिनों हिमाचल प्रदेश की शांत वादियों में आध्यात्मिक सुकून की तलाश में हैं। गुरु पूर्णिमा पर उन्होंने पालमपुर के कंदवाड़ी स्थित महावतार बाबा मेडिटेशन सेंटर का दौरा किया। यहां उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु योगीराज अमर ज्योति से मुलाकात कर आशीर्वाद लिया। दोनों की यह मुलाकात लगभग तीन दशकों (30 वर्षों) के लंबे अंतराल के बाद हुई है। 30 साल बाद मुलाकात को बताया ‘घर वापसी’ दैनिक भास्कर से बातचीत में टिस्का चोपड़ा ने नुभव को बेहद भावुक और आत्मिक बताया। उन्होंने कहा कि लगभग 30 वर्षों के बाद अपने गुरु योगीराज अमर ज्योति से दोबारा मिलना उनके लिए किसी ‘घर वापसी’ जैसा अनुभव था। आश्रम प्रवास के दौरान उन्होंने ध्यान (मेडिटेशन), पवित्र हवन और गुरु के सान्निध्य में समय बिताया। टिस्का चोपड़ा ने कहा कि कुछ अनुभव शोर के साथ नहीं आते, बल्कि चुपचाप जीवन में उतरते हैं। वे अपने साथ अधिक स्पष्टता, विनम्रता और यह एहसास छोड़ जाते हैं कि जीवन की सबसे गहरी यात्राएं हमेशा भीतर की ओर होती हैं।” — तनाव और भागदौड़ से दूर पहाड़ों का रुख आश्रम प्रवास के बाद टिस्का ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने स्वीकार किया कि जब जीवन में तनाव, अत्यधिक सोच और लगातार भागदौड़ बढ़ जाती है, तब उनकी रचनात्मकता फीकी पड़ने लगती है। ऐसे समय में परिस्थितियों से उलझने के बजाय वे सुकून की तलाश में सीधे पहाड़ों की ओर रुख कर लेती हैं। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि देवदार के वृक्षों की महक, बर्फीली धाराओं का शीतल जल और बादलों के बीच बिताए कुछ दिन उनकी आत्मा को फिर से तरोताजा और शांत कर देते हैं। गुरु पूर्णिमा पर पाया गुरु आशीर्वाद टिस्का ने साझा किया कि इस बार की हिमाचल यात्रा केवल विश्राम तक सीमित नहीं थी। ईश्वर की कृपा से उन्हें गुरु पूर्णिमा के विशेष दिन बाबाजी के आश्रम में रहने, हवन यज्ञ में हिस्सा लेने और अपने गुरु का प्रत्यक्ष आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला, जिसने उन्हें मानसिक व आत्मिक रूप से नई ऊर्जा से भर दिया है।

नेपाल के मशहूर पर्वतारोही निर्मल पुर्जा की पाकिस्तान में मौत:8 हजार मीटर ऊंची ब्रॉड पीक पर चढ़ रहे थे, हिमस्खलन में गई जान

नेपाल के मशहूर पर्वतारोही निर्मल पुर्जा की पाकिस्तान में मौत:8 हजार मीटर ऊंची ब्रॉड पीक पर चढ़ रहे थे, हिमस्खलन में गई जान

नेपाल के मशहूर पर्वतारोही निर्मल पुर्जा की पाकिस्तान में हिमस्खलन यानी एवलांच की चपेट में आने के बाद मौत हो गई। उनके निधन की पुष्टि उनकी ही पर्वतारोहण कंपनी एलीट एक्सपेडिशन ने की है। निर्मल पुर्जा 30 जुलाई को काराकोरम इलाके में 8,051 मीटर ऊंची ब्रॉड पीक की चोटी पर चढ़ाई कर रहे थे। इस दौरान करीब 7,000 मीटर की ऊंचाई पर यह हादसा हुआ। हिमस्खलन के बाद निर्मल पुर्जा समेत 10 पर्वतारोही लापता हो गए थे। इनमें छह नेपाली पर्वतारोही भी शामिल थे। मैप से समझिए हादसे की लोकेशन… 6 महीने में 14 सबसे ऊंची चोटियां फतह कीं ब्रिटिश स्पेशल फोर्स जॉइन करने वाले पहले नेपाली निर्मल पुर्जा का जन्म 25 जुलाई 1983 को नेपाल के म्याग्दी जिले के दाना गांव में हुआ था। उनके परिवार का सेना से गहरा नाता रहा है। कई पीढ़ियों से परिवार के लोग गोरखा रेजिमेंट में सेवा करते रहे। उनके पिता और तीन बड़े भाई भी गोरखा सैनिक थे। ऐसे माहौल में पले-बढ़े निर्मल ने भी बचपन से ही सैनिक बनने का सपना देखा। बाद में उन्होंने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया और ब्रिटिश सेना की गोरखा रेजिमेंट में भर्ती हो गए। करीब छह साल तक गोरखा सैनिक के रूप में सेवा देने के बाद उन्होंने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की। वह ब्रिटिश रॉयल नेवी की स्पेशल बोट सर्विस (SBS) में शामिल होने वाले पहले नेपाली बने। SBS ब्रिटेन की नौसेना की सबसे खतरनाक और प्रतिष्ठित स्पेशल फोर्स है। इसके सैनिक समुद्र, पहाड़, जंगल और दुश्मन के इलाके में सीक्रेट ऑपरेशन चलाने के लिए ट्रेंड होते हैं। इसमें चयन इतना मुश्किल है कि बहुत कम सैनिक इसे पूरा कर पाते हैं। करीब 16 साल तक सेना में रहते हुए निर्मल पुर्जा ने अत्यधिक ठंडे और मुश्किल इलाकों में कई स्पेशल ऑपरेशन में हिस्सा लिया। इसी दौरान उनके मन में दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने का ख्याल आया। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने सुरक्षित सैन्य करियर छोड़ने का बड़ा फैसला लिया। सेना से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने पूरी तरह पर्वतारोहण पर फोकस किया। इसमें सबसे बड़ी चुनौती पैसों की थी। खर्च जुटाने के लिए उन्होंने अपना घर तक बेच दिया, ताकि दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ने का सपना पूरा कर सकें।

'फिल्मों के किरदार से मुझे जज मत करो':Gen Z विवाद पर कंगना रनोट का पलटवार, बोलीं- रील और रियल लाइफ में फर्क समझिए

'फिल्मों के किरदार से मुझे जज मत करो':Gen Z विवाद पर कंगना रनोट का पलटवार, बोलीं- रील और रियल लाइफ में फर्क समझिए

Gen Z को लेकर दिए गए बयान पर घिरीं कंगना रनोट ने अब ट्रोलर्स को करारा जवाब दिया है। सोशल मीडिया पर उनकी फिल्मों के किरदारों की क्लिप्स शेयर कर उन्हें निशाने पर लेने वालों पर कंगना ने पलटवार करते हुए कहा कि फिल्मों में निभाए गए किरदार और असल जिंदगी के विचारों की तुलना करना गलत है। उन्होंने लोगों से रील और रियल लाइफ का फर्क समझने की अपील की। Gen Z को लेकर हाल ही में दिए गए बयान के बाद कंगना रनोट लगातार सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। उनके बयान के विरोध में कई ट्रोल पेजों और सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी फिल्मों के अलग-अलग किरदारों की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए। इन पोस्ट्स के जरिए यह सवाल उठाया गया कि अगर कंगना फिल्मों में ऐसे किरदार निभा सकती हैं तो फिर वह Gen Z की सोच और व्यवहार पर सवाल कैसे उठा सकती हैं। अब इस पूरे विवाद पर कंगना ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर संसद में दिए गए अपने एक पुराने भाषण का वीडियो साझा करते हुए आलोचकों को जवाब दिया। कंगना ने कहा कि फिल्मों में निभाया गया किरदार किसी अभिनेता की निजी सोच या जीवन का प्रतिबिंब नहीं होता। अभिनय एक पेशा है और कलाकार अलग-अलग तरह के किरदार निभाते हैं, इसलिए उन्हें उनकी फिल्मों के आधार पर जज करना गलत है। कंगना ने अपने बयान में कहा कि कुछ लोग जानबूझकर युवाओं को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, फिल्मी किरदारों और किसी अभिनेता के वास्तविक विचारों को एक जैसा बताना न सिर्फ गलत है, बल्कि यह दर्शकों के बीच भ्रम भी पैदा करता है। उन्होंने कहा कि फिल्मों का मकसद मनोरंजन करना होता है, न कि लोगों को वही व्यवहार अपनाने की सीख देना। किसी कलाकार ने पर्दे पर जो किरदार निभाया है, उसका मतलब यह नहीं कि वह असल जिंदगी में भी वैसा ही सोचता या व्यवहार करता है। कंगना ने लोगों से अपील की कि वे मनोरंजन और वास्तविक जीवन के बीच का फर्क समझें। कंगना का यह बयान ऐसे समय आया है जब सोशल मीडिया पर उनके पुराने फिल्मी किरदारों की क्लिप्स तेजी से वायरल हो रही हैं। कई यूजर्स का कहना था कि कंगना के ऑन-स्क्रीन किरदार और उनके हालिया बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। इसी आलोचना के जवाब में उन्होंने अपना पक्ष सार्वजनिक किया। कंगना ने यह भी संकेत दिया कि सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे को आधी-अधूरी जानकारी के साथ पेश करना युवाओं के बीच गलत संदेश पहुंचा सकता है। उनका कहना है कि किसी अभिनेता के निजी विचारों पर बहस की जा सकती है, लेकिन उसके फिल्मी किरदारों को उससे जोड़ना उचित नहीं है। कंगना के इस जवाब के बाद सोशल मीडिया पर बहस और तेज हो गई है। एक तरफ उनके समर्थक उनकी बात का समर्थन कर रहे हैं और अभिनय व निजी जीवन को अलग मानने की दलील दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आलोचक अब भी उनके हालिया बयान पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में Gen Z को लेकर शुरू हुआ यह विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा।

किराने के सामान के लिए भी कर्ज ले रहे अमेरिकी:महंगाई में पेट भरना मुश्किल; 2साल में दोगुने हुए 'BNPL' यूजर्स, वर्षों चुका रहे ब्याज

किराने के सामान के लिए भी कर्ज ले रहे अमेरिकी:महंगाई में पेट भरना मुश्किल; 2साल में दोगुने हुए 'BNPL' यूजर्स, वर्षों चुका रहे ब्याज

कल्पना कीजिए कि आपने महीनों पहले जो सब्जी, दूध और ब्रेड खरीदी और खा भी लिया, उसका ब्याज आप आज भी चुका रहे हैं। यह कोई मजाक नहीं, बल्कि हकीकत है। अमेरिका में लाखों परिवार कुछ महीनों से यही परेशानी झेल रहे हैं। किराने के सामान की कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि लोग अब उसे क्रेडिट कार्ड और “बाय नाउ, पे लेटर’ (बीएनपीएल) जैसी उधारी स्कीम्स की मदद से खरीद रहे हैं। फिर उसी कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। अमेरिका की गैर-लाभकारी संस्था ‘अर्बन इंस्टीट्यूट’ के ताजा सर्वे के मुताबिक, कामकाजी उम्र (18-64 साल) के हर चार में से एक अमेरिकी वयस्क ने किराने के सामान के लिए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किया। लेकिन उसका पूरा बिल समय पर चुकाने में उसे दिक्कत हुई। सिर्फ 35% लोग ही पूरा बिल एक साथ चुका पाए, बाकी या तो न्यूनतम राशि चुका रहे हैं या इतना भुगतान भी नहीं कर पा रहे। नतीजतन छोटी सी किराने की खरीद, रिवॉल्विंग डेट यानी घूमते-फिरते कर्ज में बदल जाती है, जिस पर वर्षों तक ब्याज चुकाना पड़ता है। यह बोझ भी किसी एसेट के लिए नहीं, बल्कि खाने-पीने की आम जरूरतों के लिए उठाया जा रहा है। बीएनपीएल सर्विसेज की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। लेंडिंगट्री के मुताबिक, अमेरिका में करीब 29% बीएनपीएल यूजर्स अब किराने के सामान के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, जो दो साल पहले सिर्फ 14% था। यानी हिस्सेदारी दोगुनी हो गई। जेन-जी (14 से 29 साल) में तो यह आंकड़ा 38% तक पहुंच जाता है। लेकिन सुविधा की यह चमक जल्द फीकी पड़ जाती है। करीब 47% यूजर्स ने बीते एक साल में कम से कम एक बार पेमेंट लेट की, जो एक साल पहले सिर्फ 34% थी। हर पांच में से करीब एक अमेरिकी अब किराने के लिए बचत के पैसे भी इस्तेमाल करने लगा है। कम व मध्यम आय वालों में यह आंकड़ा और भी ज्यादा है। विशेषज्ञों की चिंता यह है कि बचत और क्रेडिट, दोनों ऐसे रास्ते हैं जो छोटी अवधि में राहत तो देते हैं, लेकिन बार-बार इस्तेमाल होने पर परिवारों को लंबी अवधि की वित्तीय अस्थिरता की ओर धकेल सकते हैं। इसका मतलब है कि आज की भूख मिटाने के लिए लिया गया कर्ज, आपकी की जेब को वर्षों तक हल्का करता रहेगा। तगड़ी मार – अमेरिका में 5 साल में किराने के दाम 32% बढ़ चुके पांच साल में किराने के दाम करीब 32% बढ़ चुके हैं। ऐसे में लोग बिल टालने के लिए क्रेडिट कार्ड और बीएनपीएल का सहारा लेते हैं। लेकिन मिनिमम पेमेंट चूकने पर पहले करीब 30 डॉलर (2,862) की लेट फीस, फिर अगली बार 41 डॉलर (3,912) तक की पेनल्टी लगती है। साथ ही इसमें करीब 30% सालाना ब्याज भी जुड़ जाता है। यानी सस्ता लगने वाला रास्ता असल में सबसे महंगा साबित होता है

एथेनॉल से पेट्रोल पर ₹30 प्रति लीटर की बचत हुई:सरकार का दावा- ब्लेंडिंग न होती तो दिल्ली में ₹125 लीटर मिलता, अभी ₹102 में मिल रहा

एथेनॉल से पेट्रोल पर ₹30 प्रति लीटर की बचत हुई:सरकार का दावा- ब्लेंडिंग न होती तो दिल्ली में ₹125 लीटर मिलता, अभी ₹102 में मिल रहा

क्रूड ऑयल की कीमतें जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में 135 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थीं, तब अगर तेल कंपनियों ने पेट्रोल में एथेनॉल की ब्लेंडिंग न की होती, तो दिल्ली में पेट्रोल का भाव लगभग 125 रुपए प्रति लीटर पहुंच गया होता। शुक्रवार को पेट्रोलियम मंत्रालय ने एथेनॉल प्रोग्राम की लागत, खाद्य सुरक्षा पर असर और टैक्सपेयर्स की सब्सिडी से जुड़े दावों का जवाब देते हुए यह बात कही। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि संकट के समय पर इस प्रोग्राम की वजह से पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग 30 रुपए की बचत हुई। दिल्ली में अभी 102 रुपए लीटर है E20 पेट्रोल पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, वैश्विक बाजार में क्रूड की कीमतें बढ़ने के बावजूद देश में उपभोक्ताओं को पेट्रोल 94.77 रुपए प्रति लीटर के भाव पर मिला। इसका कारण यह था कि पूर्व-निर्धारित कीमतों पर घरेलू स्तर पर खरीदे गए एथेनॉल की हर एक लीटर पेट्रोल में 20% हिस्सेदारी थी। इसी वजह से रिटेल कीमतें क्रूड के तेज उछाल से बची रहीं। 28 फरवरी को पश्चिमी एशिया में तनाव और संघर्ष शुरू होने के बाद, सरकार ने करीब 75 दिनों तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा था। इसके बाद मई में दामों में 7.5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। दिल्ली में फिलहाल मानक E20 पेट्रोल (91-ऑक्टेन) की कीमत 102.12 रुपए प्रति लीटर है, जबकि 100-ऑक्टेन वाला पेट्रोल 169 रुपए प्रति लीटर के भाव पर मिल रहा है। गरीबों का अनाज या FCI का चावल डायवर्ट नहीं हुआ पेट्रोलियम मंत्रालय ने उन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनमें कहा जा रहा था कि गरीबों के हक का खाद्यान्न एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया कि इस प्रोग्राम को चलाने या सपोर्ट देने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) के सब्सिडी वाले चावल का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। माइलेज पर कितना असर: 2 से 6% तक घट सकती है एफिशिएंसी सड़क परिवहन मंत्रालय ने ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के एक अध्ययन का हवाला दिया। गुरुवार को लोकसभा में जानकारी देते हुए मंत्रालय ने बताया कि E10 ईंधन के लिए डिजाइन की गई BS-III, BS-IV और BS-VI गाड़ियां जब E20 पर चलाई जाती हैं, तो उनकी कैपेसिटी और उम्र के हिसाब से माइलेज (फ्यूल एफिशिएंसी) में 2 से 6% तक की गिरावट आ सकती है। इससे पहले 20 जुलाई को तेल मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया था कि ऐसी गाड़ियों में माइलेज की यह कमी लगभग 3-5% तक ही सीमित रहती है। वैज्ञानिक जांच के बाद लागू हुआ E20 दोनों मंत्रालयों ने जोर देकर कहा कि एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम को पूरी तरह से वैज्ञानिक रूप से जांचे-परखे और चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है। जैसे-जैसे देश में उत्पादन क्षमता और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होता गया, ब्लेंडिंग के स्तर को भी धीरे-धीरे बढ़ाया गया। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने लोकसभा में बताया कि E20 पर शिफ्ट होने का फैसला फ्यूल सिस्टम, इंजन की मजबूती, ड्राइवैबिलिटी, मटीरियल कम्पैटिबिलिटी और एमिशन परफॉर्मेंस की पूरी जांच और वैलिडेशन के बाद ही लिया गया है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वाहन निर्माताओं, तेल विपणन कंपनियों (OMCs) और चीनी व अनाज उद्योग से लगातार सलाह-मशविरा किया गया। 23 करोड़ से ज्यादा गाड़ियों पर कोई असर नहीं सरकार ने लैब स्टडीज और रियल-वर्ल्ड डेटा का हवाला देते हुए बताया कि E20 फ्यूल के इस्तेमाल से गाड़ियों की ओवरऑल परफॉर्मेंस पर कोई विपरीत या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। सड़कों पर चल रही 20 करोड़ से ज्यादा टू-व्हीलर्स और 3 करोड़ से अधिक पेट्रोल कारें इन एथेनॉल-मिश्रित ईंधनों पर चल रही हैं। एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से इंजन खराब होने का कोई भी प्रामाणिक या सत्यापित मामला सामने नहीं आया है।

शाहरुख की फिल्मों में सबसे ज्यादा मेहनत करते थे:ललित पंडित बोले- आज के संगीत में अच्छे गीतकारों की सबसे ज्यादा कमी खलती है

शाहरुख की फिल्मों में सबसे ज्यादा मेहनत करते थे:ललित पंडित बोले- आज के संगीत में अच्छे गीतकारों की सबसे ज्यादा कमी खलती है

‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘कुछ कुछ होता है’, ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘फना’ और ‘हम तुम’ जैसी फिल्मों का संगीत देने वाले ललित पंडित गुरु पूर्णिमा पर साईं बाबा को समर्पित भक्ति गीत ‘साई नाम सांचा’ लेकर आए हैं। इसमें हरिहरन, उदित नारायण, शान, जावेद अली, बेला शेंडे के साथ नई पीढ़ी के कलाकारों को भी मौका मिला है। दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने नए भजन, 90 के दशक के संगीत, बेटों के करियर, शाहरुख खान और आज की म्यूजिक इंडस्ट्री पर बात की। सवाल: आपने रोमांटिक गानों से लोगों का दिल जीता। अब साईं बाबा पर भक्ति गीत ‘साईं नाम सांचा’ लेकर आए हैं। इसे बनाने का विचार कैसे आया? क्या इसके पीछे कोई निजी अनुभव या आस्था जुड़ी है? जवाब: मैं और मेरी पत्नी अक्सर साईं बाबा के मंदिर जाते हैं। काफी समय से मन था कि साईं बाबा के लिए ऐसा बनाया जाए, जो सिर्फ गाना नहीं, बल्कि श्रद्धा का भाव हो। उसी दौरान मेरे दोनों बेटे संगीत निर्देशन में आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने हाल ही में फिल्म ‘अल्फा’ का संगीत तैयार किया है। एक पिता होने के नाते मैंने सोचा कि उनके नए सफर की शुरुआत साईं बाबा के आशीर्वाद से हो। यही भावना इस भजन के पीछे रही। धुन तैयार होने पर मुझे वह पसंद आई और लगा कि इसे रिकॉर्ड कर लोगों तक पहुंचाना चाहिए। सवाल: इस भजन में कई बड़े गायकों के साथ नए गायक भी हैं। इसकी क्या वजह रही? जवाब: मैं चाहता था कि यह सिर्फ बड़े नामों वाला एल्बम न बने। इसमें हरिहरन, उदित नारायण, शान, जावेद अली और बेला शेंडे के साथ नई आवाजों को भी मौका दिया। मीना मंगेशकर की पोती सांजली, मेरे भाई के बेटे स्वर और सारिका कंसारा ने भी गाया है। स्वर पंडित जसराज के आखिरी शिष्यों में रहे हैं। मेरा मानना है कि संगीत तभी आगे बढ़ेगा, जब नई प्रतिभाओं को बड़े कलाकारों के साथ मंच मिलेगा। सवाल: आजकल भक्ति संगीत भी काफी कमर्शियल हो गया है। आपने इसे किस नजरिए से बनाया? जवाब: मैंने इस भजन को कभी कमर्शियल प्रोजेक्ट नहीं माना। इसे पूरी श्रद्धा से बनाया। पूरा खर्च भी मैंने खुद उठाया। कई लोगों ने बड़ी म्यूजिक कंपनी के साथ रिलीज करने की सलाह दी, लेकिन वहां कई सुझाव आने लगते हैं कि किस गायक को लेना है। मैं अपनी रचनात्मक आजादी से समझौता नहीं करना चाहता था। यह फिल्म का गाना नहीं था, इसलिए वही किया जो मुझे सही लगा। मेरा उद्देश्य था कि यह भजन साईं मंदिरों में बजे और लोगों को शांति दे। सवाल: जतीन-ललित की जोड़ी ने 90 के दशक को यादगार बनाया। आज पीछे मुड़कर देखते हैं तो सबसे बड़ी उपलब्धि क्या लगती है? जवाब: बहुत संतोष होता है। हमने सिर्फ हिट गाने नहीं, बल्कि ऐसा संगीत बनाने की कोशिश की जो वर्षों तक जिंदा रहे। आज नई पीढ़ी भी ‘पहला नशा’, ‘तुझे देखा तो’, ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘चांद छुपा बादल में’ सुनती है तो लगता है कि मेहनत सफल हुई। कई लोग कहते हैं कि आर.डी. बर्मन के बाद कल्ट संगीत में जतिन-ललित का नाम भी शामिल है। यह सुनकर खुशी होती है। सवाल: अगर आज दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे या कुछ कुछ होता है का संगीत बनाना हो, तो क्या वह वैसा ही होगा या मुश्किल होगा? जवाब: उस समय भी यह आसान नहीं था। हमने हर धुन पर घंटों मेहनत की। किसी अरेंजर पर निर्भर नहीं रहते थे। हर नोट और ऑर्केस्ट्रेशन खुद तैयार करते थे। इसी वजह से हमारे संगीत की पहचान बनी। आज भी ऐसा संगीत बन सकता है, लेकिन इसके लिए निर्देशक का वैसा विजन और निर्माता का भरोसा जरूरी है। सिर्फ अच्छा संगीतकार होना काफी नहीं। सवाल: क्या आज भी निर्देशक 90 के दशक जैसा संगीत मांगते हैं? जवाब: बिल्कुल। आज भी कई निर्देशक वैसी ही मेलोडी की मांग करते हैं। लेकिन काम शुरू होने पर कुछ नया जोड़ने की बात करते हैं। यही सबसे बड़ी चुनौती है। फिल्म संगीत में अपनी नहीं, निर्देशक के विजन के मुताबिक काम करना पड़ता है। इसलिए फिल्म संगीत सबसे मुश्किल काम है। प्राइवेट म्यूजिक या भजन में अपनी सोच के मुताबिक काम किया जा सकता है, लेकिन फिल्मों में नहीं। सवाल: आज के संगीत में आपको सबसे ज्यादा किस चीज की कमी महसूस होती है? जवाब: मुझे लगता है कि आज सबसे ज्यादा कमी अच्छे गीतकारों की है। पहले आनंद बख्शी और मजरूह सुल्तानपुरी जैसे बड़े लेखक थे। उनके शब्दों में गहराई होती थी। आज अच्छे संगीतकार और गायक हैं, लेकिन वैसी लेखनी कम दिखाई देती है। मजबूत शब्द धुन का असर और बढ़ा देते हैं। सवाल: करियर का सबसे मुश्किल गाना कौन-सा रहा, जिस पर सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ी? जवाब: अगर एक गाने का नाम लूं तो वह ‘पहला नशा’ है। उस समय हम इंडस्ट्री में नए थे। कई लोग हमारे काम करने के तरीके से सहमत नहीं थे और नई सोच स्वीकार नहीं करते थे। उस गाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। ‘पहला नशा’ का पूरा अरेंजमेंट मैंने खुद किया था। उस समय कोई अरेंजर नहीं था। मेरे दिमाग का वही साउंड रिकॉर्ड हुआ। शायद यही वजह है कि आज भी वह गाना वैसा ही महसूस होता है। मेरा मानना है कि कुछ गाने दोबारा नहीं बन सकते और ‘पहला नशा’ हमारे लिए ऐसा ही गाना है। सवाल: क्या कभी ऐसा लगा कि कोई गाना और बेहतर बनाया जा सकता था? जवाब: ऐसे कई गाने हैं। आज भी उन्हें सुनता हूं तो लगता है कि कुछ चीजें बेहतर हो सकती थीं। कई बार तकनीकी वजहों या साथ काम करने वाले लोगों के कारण वैसा रिजल्ट नहीं मिला जैसा हम चाहते थे। लेकिन यही संगीत की खूबसूरती है। हर गाना कुछ नया सिखाकर जाता है। सवाल: शाहरुख खान के साथ आपकी बॉन्डिंग कैसे बनी? जवाब: हमारी और शाहरुख खान की शुरुआत लगभग एक साथ हुई थी। हमारी शुरुआती बड़ी फिल्मों में ‘राजू बन गया जेंटलमैन’ थी और शाहरुख भी उसी दौर में करियर बना रहे थे। वहीं से रिश्ता बना। इसके बाद उनकी हर फिल्म में मैं और जतिन अपना सबसे बेहतरीन काम देने की कोशिश करते थे। शायद इसी वजह से उनकी फिल्मों के लिए