No Electricity, Water & Just One Teacher; Teachers Shortage Worse

Hindi News Career Bihar Schools: No Electricity, Water & Just One Teacher; Teachers Shortage Worse 6 मिनट पहले कॉपी लिंक नीति आयोग की जारी हालिया रिपोर्ट बताती है कि राज्य में शिक्षकों की कमी में बिहार पहले नंबर पर है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 2.08 लाख एलिमेंट्री, 36,035 सेकेंडरी और 33,035 सीनियर सेकेंडरी शिक्षक पद खाली पड़े हैं। यानी लगभग 2,77,070 पद खाली हैं। ये रिपोर्ट उस वक्त जारी हुई जब बिहार में शिक्षक भर्ती की मांग को लेकर प्रोटेस्ट हो रहे हैं। 8 मई को BPSC TRE-4 नोटिफिकेशन की मांग को लेकर प्रोटेस्ट कर रहे कैंडिडेट्स पर लाठीचार्ज हुआ, करीब 500 प्रोटेस्टर्स डिटेन किए गए और 4 की गिरफ्तारी हुई। पटना में BPSC TRE-4 भर्ती के नोटिफिकेशन की मांग कर रहे कैंडिडेट्स पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। बिहार के अलावा झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी एलिमेंट्री, सेकेंडरी और सीनियर सेकेंडरी टीचर्स के पद खाली हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट से 11 जरूरी इनसाइट्स: नीति आयोग ने 7 मई को ‘स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया’ नाम की रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट पिछले 10 सालों में भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की पूरी तस्वीर दिखाती है। 1. हर 10 में से 4 स्टूडेंट हाइयर सेकेंडरी एजुकेशन से ड्रॉप आउट हो रहा मौजूदा स्कूल एजुकेशन सिस्टम एक सीधे पिरामिड की तरह है। इसमें प्राइमरी स्कूल्स तो काफी हैं, लेकिन जैसे-जैसे क्लास बढ़ती जाती है, स्कूलों की संख्या घटती चली जाती है। देश में प्राइमरी लेवल पर ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) 90.9% है, यानी ज्यादातर बच्चे शुरुआती कक्षाओं में तो स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन सेकेंडरी लेवल तक आते-आते यह आंकड़ा घटकर 78.7% रह जाता है। वहीं हायर सेकेंडरी लेवल पर ये और गिरकर सिर्फ 58.4% रह जाता है। इसका मतलब है कि हर 10 में से करीब 4 बच्चे हायर सेकेंडरी तक पहुंचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 5.4% स्कूल ही ऐसे हैं जहां बच्चे पहली से 12वीं तक लगातार पढ़ाई कर सकते हैं। बाकी ज्यादातर छात्रों को बीच-बीच में स्कूल बदलने पड़ते हैं। बच्चों के पढ़ाई छोड़ने की ये भी एक बड़ी वजह है। प्राइमरी लेवल पर ये ड्रॉपआउट रेट 0.3% है, अपर प्राइमरी में ये रेट 3.5% तो सेकेंडरी लेवल पर 11.5% है। रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा ड्रॉपआउट रेट पश्चिम बंगाल में 20% दर्ज की गई है। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक में 18.3-18.3%, जबकि असम में 17.5% बच्चे सेकेंडरी स्तर पर पढ़ाई छोड़ रहे हैं। 2. 1.19 लाख स्कूलों में बिजली, 14,505 स्कूलों में पीने का पानी नहीं रिपोर्ट के मुताबिक, UDISE+ 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि देश के 1.19 लाख स्कूलों में आज भी बिजली की सुविधा ठीक से उपलब्ध नहीं है। पानी और साफ-सफाई से जुड़ी सुविधाओं की हालत भी हर जगह एक जैसी नहीं है। हालांकि, 2014 में जहां 96.5% स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा थी, वह 2025 तक बढ़कर 99% हो गई है। इसके बावजूद अब भी 14,505 स्कूल ऐसे हैं जहां पीने के पानी का ठीक इंतजाम नहीं है। वहीं करीब 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा तक नहीं है, जिससे बच्चों की सेहत और साफ-सफाई पर असर पड़ता है। रिपोर्ट बताती है कि करीब 50% सरकारी सेकेंडरी स्कूल बिना साइंस लैब के चल रहे हैं। स्कूलों में इंटरनेट पहुंच पिछले कुछ सालों में आठ गुना बढ़कर 63.5% तक पहुंच गई है। इसके बावजूद अब भी एक-तिहाई स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं है। निजी स्कूलों की मांग लगातार बढ़ रही रिपोर्ट के मुताबिक, प्राइवेट अनएडेड स्कूलों की संख्या भले कम हो, लेकिन उनमें पढ़ने वाले बच्चों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। 2014-15 में जहां 31.7% स्टूडेंट ही प्राइवेट स्कूलों में थे, वहीं 2024-25 में ये आंकड़ा बढ़कर 38.8% पहुंच गया। इसके उलट, पिछले दस साल में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की हिस्सेदारी घटी है। 2014-15 में कुल एनरोलमेंट में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 54.3% थी, जो 2024-25 में घटकर 49.25% रह गई। गवर्नमेंट-एडेड स्कूलों में करीब 10% बच्चे पढ़ते हैं, और इस दौरान उनकी हिस्सेदारी में भी हल्की गिरावट दर्ज हुई है। रिपोर्ट की मानें तो ये इस बात का संकेत है कि परिवारों के बीच निजी स्कूलों की मांग लगातार बढ़ रही है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की क्वॉलिटी गिरी रिपोर्ट के मुताबिक, प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों में बच्चों का दाखिला तो बढ़ा है, लेकिन पढ़ने-लिखने और समझने की क्षमता में गिरावट आई है। 2014 में 8वीं के 74.7% स्टूडेंट्स सेकेंड ग्रेड की टेक्स्टबुक्स पढ़ सकते थे, लेकिन 2024 तक ये आंकड़ा घटकर 71.1% रह गया। यानी बच्चे स्कूल में तो पहुंच रहे हैं, मगर बुनियादी पढ़ाई की पकड़ कमजोर हो रही है। रिपोर्ट कहती है कि 8वीं के सिर्फ 45.8% स्टूडेंट्स ही डिवीजन का आसान सवाल हल कर पाते हैं। रिपोर्ट में PARAKH 2024 का हवाला देते हुए कहा गया है कि बच्चे रटकर पैटर्न समझ तो लेते हैं, लेकिन उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में उस ज्ञान का इस्तेमाल करने में दिक्कत होती है। परिवारों पर सेकेंडरी एजुकेशन का आर्थिक बोझ बढ़ रहा रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में शुरुआती पढ़ाई ज्यादातर मुफ्त होती है, लेकिन सेकेंडरी स्तर पर किताबें, यूनिफॉर्म, आने-जाने का खर्च, एग्जाम फीस और प्राइवेट ट्यूशन जैसी चीजों पर जेब से काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। रिपोर्ट में अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी सेकेंडरी स्कूलों में एक बच्चे की पढ़ाई पर होने वाला खर्च प्राइमरी लेवल की तुलना में तीन से पांच गुना तक बढ़ जाता है। आर्थिक मजबूरियों की वजह से कई बच्चों ने स्कूल छोड़ा और घर की जिम्मेदारियां उठाने के लिए काम करना शुरू किया। रिपोर्ट में कोटेड PLFS 2020-21 के मुताबिक, स्कूल से बाहर 14 से 17 साल के 31% किशोर किसी न किसी काम में लगे हुए थे, जबकि 25% घर के कामकाज के लिए। कई लड़कियों को कम उम्र में ही घर और देखभाल की जिम्मेदारियां उठाने के लिए स्कूल छोड़ना पड़ता है। SC/ST/OBCs पढ़ाई में अपने साथियों से पिछड़ रहे सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों (SEDGs) जैसे SC/ST/OBCs के लिए एनरोलमेंट के साथ ही पढ़ाई के नतीजों में भी बड़ा फर्क है। PARAKH 2024 के आंकड़ों के मुताबिक, SEDGs के स्टूडेंट लगभग हर मेजर सब्जेक्ट में अपने साथ









