Dabur Moves Delhi High Court Against FSSAI Over 100% Claim Ban Controversy

Hindi News Business Dabur Moves Delhi High Court Against FSSAI Over 100% Claim Ban Controversy नई दिल्ली11 मिनट पहले कॉपी लिंक एफएमसीजी कंपनी डाबर ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी ने FSSAI पर भेदभाव करने का आरोप लगाया है। इसके अलावा कंपनी ने FSSAI पर कॉम्पिटिटर्स में शामिल अन्य मैन्युफैक्चरर्स के कॉमर्शियल हितों को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया। डाबर का दावा है कि प्रॉडक्ट्स पर 100% दावे के इस्तेमाल को तुरंत बैन करने के आदेश से उसकी 150 करोड़ रुपए की वैल्यू की इन्वेंट्री यानी माल नष्ट होने के जोखिम में आ गया था। 6 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में डाबर ने FSSAI के इस आदेश को बिना सोच-समझकर जारी किया गया और एकतरफा बताया है। याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कंपनी को राहत देते हुए FSSAI के आदेश पर 24 अगस्त तक स्टे लगा दिया। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई भी निर्देश जारी करने से पहले कंपनी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए था। क्या है पूरा विवाद: 100% क्लेम पर बैन और FSSAI की कार्रवाई फूड रेगुलेटर FSSAI ने प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट्स के विज्ञापनों और लेबल्स पर 100% प्योर, 100% नेचुरल या 100% ऑर्गेनिक जैसे दावों को भ्रामक माना है। FSSAI के अनुसार, इस तरह के दावे फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (एडवर्टाइजिंग एंड क्लेम्स) रेगुलेशन, 2018 का उल्लंघन करते हैं। FSSAI ने तुरंत प्रभाव से 100% क्लेम वाले प्रॉडक्ट्स की बिक्री पर रोक लगा दी थी और डाबर से 15 दिनों के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) मांगी थी। FSSAI का तर्क है कि ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से अन्य कंपनियों के प्रोडक्ट्स की छवि प्रभावित होती है। डाबर का तर्क: अन्य मैन्युफैक्चरर्स के बिजनेस इंटरेस्ट को बढ़ावा दे रहा FSSAI डाबर ने अपनी रिट याचिका में FSSAI के आरोपों को खारिज किया है। कंपनी का कहना है कि 100% क्लेम बिना किसी दूसरे मैन्युफैक्चरर का रेफरेंस दिए स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल किया जाता है। यह पूरी इंडस्ट्री में सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाला शब्द है। कंपनी के अनुसार, यह स्पष्ट है कि यह बैन जनहित में जारी नहीं किया गया है, बल्कि अन्य मैन्युफैक्चरर के कॉमर्शियल हितों को साधने के लिए जारी किया गया। डाबर ने दावा किया कि FSSAI ने बिना किसी कारण बताओ नोटिस या सुधार का अवसर दिए ही सीधे बैन लगा दिया। ₹150 करोड़ का स्टॉक दांव पर, 11 फ्लैगशिप प्रोडक्ट्स प्रभावित FSSAI की इस कार्रवाई से डाबर के 11 प्रमुख फ्लैगशिप प्रोडक्ट्स सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। इनमें डाबर हनी, डाबर वर्जिन कोकोनट ऑयल और रियल एक्टिव कोकोनट वॉटर जैसे बड़े ब्रांड्स शामिल हैं। डाबर का आरोप है कि FSSAI ने लेबल्स की जांच किए बिना आदेश जारी किया है। कंपनी के अनुसार, डाबर होममेड कोकोनट मिल्क और डाबर कोल्ड प्रेस्ड सेसम ऑयल के लेबल पर कभी 100% का दावा लिखा ही नहीं गया था, फिर भी उन्हें बैन की लिस्ट में शामिल किया। इससे कंपनी की ₹150 करोड़ की इन्वेंट्री बर्बाद होने की कगार पर है। क्विक-कॉमर्स और होटलों से सप्लाई चेन पर असर FSSAI के इस आदेश को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किए जाने के बाद डाबर की रिटेल सप्लाई चेन अचानक प्रभावित हो गई। कई रिटेल और ऑनलाइन चैनल्स को कंपनी के 100% क्लेम वाले प्रॉडक्ट्स न बेचने की सलाह दी गई। 4 अगस्त को जोमैटो के क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ब्लिंकिट ने डाबर को अल्टीमेटम जारी करते हुए उसके प्रोडक्ट्स की लिस्टिंग को तुरंत डिसेबल कर दिया। ब्लिंकिट ने ईमेल में स्पष्ट किया कि इस मामले से पैदा होने वाली किसी भी कानूनी या वित्तीय देनदारी के लिए वह जिम्मेदार नहीं होगा। वहीं हॉस्पिटैलिटी ब्रांड हिल्टन होटल्स ने भी विवाद सुलझने तक प्रभावित प्रोडक्ट्स को अपनी सप्लाई से बाहर करने का प्रस्ताव रखा। कंपनी पहले ही कर रही थी लेबल्स में बदलाव डाबर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह FSSAI के लेटर में बताए गए प्रोडक्ट्स के लेबल्स से 100% क्लेम हटाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुकी थी। कंपनी के पिछले हफ्ते जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, आदेश में मेंशन ज्यादातर प्रोडक्ट्स के लेबल्स, विज्ञापनों और वेबसाइट रेफरेंस को बिना 100% क्लेम वाले नए लेबल्स में बदल दिया गया है या बदलने की फाइनल प्रोसेस में हैं। FSSAI का बड़ा क्रैकडाउन और आगे का रास्ता FSSAI हाल के दिनों में एफएमसीजी कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों, आर्टिफिशियल इंग्रीडिएंट्स के इस्तेमाल और हाइजीन से जुड़े मामलों पर सख्त कार्रवाई कर रहा है। रेगुलेटर ने प्रोसेस्ड फूड्स पर बिना किसी सॉलिड वेरिफिकेशन के इस्तेमाल किए जाने वाले मार्केटिंग शब्दों पर रोक लगाई है। फिलहाल FSSAI ने इस कानूनी मामले और डाबर के आरोपों पर तुरंत कोई आधिकारिक जवाब या प्रतिक्रिया जारी नहीं की है। दिल्ली हाईकोर्ट की दी गई 24 अगस्त तक की राहत के बाद अब सभी की निगाहें अगली अदालती सुनवाई पर टिकी हैं। नॉलेज पार्ट: जानें क्या कहता है FSSAI का ‘क्लेम्स रेगुलेशन’? शो-कॉज नोटिस अनिवार्य: खाद्य सुरक्षा नियमों के अनुसार, अगर FSSAI को किसी प्रोडक्ट के विज्ञापन या क्लेम पर आपत्ति होती है, तो पहले फूड बिजनेस ऑपरेटर (FBO) को स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस देना होता है। सिंगल बनाम मल्टी-इन्ग्रीडिएंट: FSSAI का मानना है कि प्रोसेस्ड या मल्टी-इन्ग्रीडिएंट फूड में ‘100% Pure’ लिखना गलत है, जबकि कंपनियां तर्क देती हैं कि शहद या शुद्ध नारियल पानी जैसे प्राकृतिक प्रोडक्ट्स में यह दावा जायज है। ये खबर भी पढ़ें… डाबर के ‘100% प्योर’ दावे वाले प्रोडक्ट्स पर बैन टला: FSSAI के बिक्री रोकने वाले आदेश पर हाईकोर्ट का स्टे; डाबर हनी-घी बिकते रहेंगे दिल्ली हाईकोर्ट ने डाबर को अंतरिम राहत दी है। कोर्ट ने FSSAI के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें ‘100% प्योर’, ‘100% नेचुरल’ और ‘100% ऑर्गेनिक’ जैसे दावों वाले उत्पादों की बिक्री तुरंत रोकने को कहा था। जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने केंद्र और FSSAI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जब तक मामले में अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक FSSAI का बैन ऑर्डर सस्पेंड रहेगा। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Dabur Moves Delhi High Court Against FSSAI Over 100% Claim Ban Controversy

Hindi News Business Dabur Moves Delhi High Court Against FSSAI Over 100% Claim Ban Controversy नई दिल्ली50 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली हाईकोर्ट ने डाबर को राहत देते हुए FSSAI के बैन के आदेश पर 24 अगस्त तक स्टे लगा दिया। एफएमसीजी कंपनी डाबर ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी ने FSSAI पर भेदभाव करने का आरोप लगाया है। इसके अलावा कंपनी ने FSSAI पर कॉम्पिटिटर्स में शामिल अन्य मैन्युफैक्चरर्स के कॉमर्शियल हितों को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया। डाबर का दावा है कि प्रोडक्ट्स पर 100% दावे के इस्तेमाल को तुरंत बैन करने के आदेश से उसकी 150 करोड़ रुपए की वैल्यू की इन्वेंट्री यानी माल नष्ट होने के जोखिम में आ गया था। 6 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में डाबर ने FSSAI के इस आदेश को बिना सोच-समझकर जारी किया गया और एकतरफा बताया है। हाईकोर्ट ने FSSAI के आदेश पर 24 अगस्त तक स्टे लगाया याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने कंपनी को राहत देते हुए FSSAI के आदेश पर 24 अगस्त तक स्टे लगा दिया। कोर्ट ने माना कि ऐसा कोई भी निर्देश जारी करने से पहले कंपनी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए था। क्या है पूरा विवाद: 100% क्लेम पर बैन और FSSAI की कार्रवाई फूड रेगुलेटर FSSAI ने प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट्स के विज्ञापनों और लेबल्स पर 100% प्योर, 100% नेचुरल या 100% ऑर्गेनिक जैसे दावों को भ्रामक माना है। FSSAI के अनुसार, इस तरह के दावे फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (एडवर्टाइजिंग एंड क्लेम्स) रेगुलेशन, 2018 का उल्लंघन करते हैं। FSSAI ने तुरंत प्रभाव से 100% क्लेम वाले प्रॉडक्ट्स की बिक्री पर रोक लगा दी थी और डाबर से 15 दिनों के भीतर एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) मांगी थी। FSSAI का तर्क है कि ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से अन्य कंपनियों के प्रोडक्ट्स की छवि प्रभावित होती है। डाबर का तर्क: अन्य मैन्युफैक्चरर्स के बिजनेस इंटरेस्ट को बढ़ावा दे रहा FSSAI डाबर ने अपनी रिट याचिका में FSSAI के आरोपों को खारिज किया है। कंपनी का कहना है कि 100% क्लेम बिना किसी दूसरे मैन्युफैक्चरर का रेफरेंस दिए स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल किया जाता है। यह पूरी इंडस्ट्री में सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाला शब्द है। कंपनी के अनुसार, यह स्पष्ट है कि यह बैन जनहित में जारी नहीं किया गया है, बल्कि अन्य मैन्युफैक्चरर के कॉमर्शियल हितों को साधने के लिए जारी किया गया। डाबर ने दावा किया कि FSSAI ने बिना किसी कारण बताओ नोटिस या सुधार का अवसर दिए ही सीधे बैन लगा दिया। ₹150 करोड़ का स्टॉक दांव पर, 11 फ्लैगशिप प्रोडक्ट्स प्रभावित FSSAI की इस कार्रवाई से डाबर के 11 प्रमुख फ्लैगशिप प्रोडक्ट्स सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं। इनमें डाबर हनी, डाबर वर्जिन कोकोनट ऑयल और रियल एक्टिव कोकोनट वॉटर जैसे बड़े ब्रांड्स शामिल हैं। डाबर का आरोप है कि FSSAI ने लेबल्स की जांच किए बिना आदेश जारी किया है। कंपनी के अनुसार, डाबर होममेड कोकोनट मिल्क और डाबर कोल्ड प्रेस्ड सेसम ऑयल के लेबल पर कभी 100% का दावा लिखा ही नहीं गया था, फिर भी उन्हें बैन की लिस्ट में शामिल किया। इससे कंपनी की ₹150 करोड़ की इन्वेंट्री बर्बाद होने की कगार पर है। क्विक-कॉमर्स और होटलों से सप्लाई चेन पर असर FSSAI के इस आदेश को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किए जाने के बाद डाबर की रिटेल सप्लाई चेन अचानक प्रभावित हो गई। कई रिटेल और ऑनलाइन चैनल्स को कंपनी के 100% क्लेम वाले प्रॉडक्ट्स न बेचने की सलाह दी गई। 4 अगस्त को जोमैटो के क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ब्लिंकिट ने डाबर को अल्टीमेटम जारी करते हुए उसके प्रोडक्ट्स की लिस्टिंग को तुरंत डिसेबल कर दिया। ब्लिंकिट ने ईमेल में स्पष्ट किया कि इस मामले से पैदा होने वाली किसी भी कानूनी या वित्तीय देनदारी के लिए वह जिम्मेदार नहीं होगा। वहीं हॉस्पिटैलिटी ब्रांड हिल्टन होटल्स ने भी विवाद सुलझने तक प्रभावित प्रोडक्ट्स को अपनी सप्लाई से बाहर करने का प्रस्ताव रखा। कंपनी पहले ही कर रही थी लेबल्स में बदलाव डाबर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि वह FSSAI के लेटर में बताए गए प्रोडक्ट्स के लेबल्स से 100% क्लेम हटाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुकी थी। कंपनी के पिछले हफ्ते जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, आदेश में मेंशन ज्यादातर प्रोडक्ट्स के लेबल्स, विज्ञापनों और वेबसाइट रेफरेंस को बिना 100% क्लेम वाले नए लेबल्स में बदल दिया गया है या बदलने की फाइनल प्रोसेस में हैं। FSSAI का बड़ा क्रैकडाउन और आगे का रास्ता FSSAI कुछ दिनों से एफएमसीजी कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों, आर्टिफिशियल इंग्रीडिएंट्स के इस्तेमाल और हाइजीन से जुड़े मामलों पर सख्त कार्रवाई कर रहा है। रेगुलेटर ने प्रोसेस्ड फूड्स पर बिना किसी सॉलिड वेरिफिकेशन के इस्तेमाल किए जाने वाले मार्केटिंग शब्दों पर रोक लगाई है। फिलहाल FSSAI ने इस कानूनी मामले और डाबर के आरोपों पर तुरंत कोई आधिकारिक जवाब या प्रतिक्रिया जारी नहीं की है। दिल्ली हाईकोर्ट की दी गई 24 अगस्त तक की राहत के बाद अब सभी की निगाहें अगली अदालती सुनवाई पर टिकी हैं। नॉलेज पार्ट: जानें क्या कहता है FSSAI का ‘क्लेम्स रेगुलेशन’? शो-कॉज नोटिस अनिवार्य: खाद्य सुरक्षा नियमों के अनुसार, अगर FSSAI को किसी प्रोडक्ट के विज्ञापन या क्लेम पर आपत्ति होती है, तो पहले फूड बिजनेस ऑपरेटर (FBO) को स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस देना होता है। सिंगल बनाम मल्टी-इन्ग्रीडिएंट: FSSAI का मानना है कि प्रोसेस्ड या मल्टी-इन्ग्रीडिएंट फूड में ‘100% Pure’ लिखना गलत है, जबकि कंपनियां तर्क देती हैं कि शहद या शुद्ध नारियल पानी जैसे प्राकृतिक प्रोडक्ट्स में यह दावा जायज है। ये खबर भी पढ़ें… डाबर के ‘100% प्योर’ दावे वाले प्रोडक्ट्स पर बैन टला: FSSAI के बिक्री रोकने वाले आदेश पर हाईकोर्ट का स्टे; डाबर हनी-घी बिकते रहेंगे दिल्ली हाईकोर्ट ने डाबर को अंतरिम राहत दी है। कोर्ट ने FSSAI के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें ‘100% प्योर’, ‘100% नेचुरल’ और ‘100% ऑर्गेनिक’ जैसे दावों वाले उत्पादों की बिक्री तुरंत रोकने को कहा था। जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने केंद्र और FSSAI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जब तक मामले में अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक FSSAI
Preity Zinta Reacts To Aamir Khan Controversy

5 मिनट पहले कॉपी लिंक प्रीति की आखिरी रिलीज फिल्म ‘भैयाजी सुपरहिट’ 2018 में आई थी। प्रीति जिंटा ने फिल्म ‘बटवारा 1947’ के प्रमोशन के दौरान आमिर खान को नजरअंदाज करने के दावों को खारिज किया। प्रीति ने पोस्ट को ‘क्लिकबेट कंटेंट’ बताया और कहा कि उन्होंने उस समय आमिर को देखा ही नहीं था। दरअसल, एक पैपराजी अकाउंट ने फिल्म के प्रमोशनल इवेंट का वीडियो पोस्ट किया था। वीडियो में प्रीति अपनी वैनिटी वैन से बाहर निकलकर फोटोग्राफर्स से पूछती दिखीं, ‘एक मिनट, गाइज, कहां जाना है?’ प्रीति लगभग 8 साल के बाद आमिर खान द्वारा निर्मित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ से बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं। फोटोग्राफर्स के दिशा बताने के बाद प्रीति दूसरी तरफ चली गईं। आमिर अपनी वैनिटी वैन के पास खड़े थे, लेकिन प्रीति ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद एक पैपराजी पेज ने वीडियो के साथ कैप्शन लिखा, ‘ओह नो, प्रीति जिंटा ने आमिर खान को नजरअंदाज किया?’ दावे वाली पोस्ट। यूजर्स ने दोनों के बीच अनबन की अटकलें लगाईं वीडियो के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने दोनों एक्टर्स के बीच किसी विवाद या असहज रिश्ते को लेकर अटकलें लगानी शुरू कर दीं। प्रीति ने बाद में इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए वीडियो को पेश करने के तरीके की आलोचना की। उन्होंने लिखा, ‘इस तरह का क्लिकबेट कंटेंट ठीक नहीं है। मैंने आमिर को नहीं देखा, क्योंकि मैं अंदर कुछ शॉट्स शूट करने की जल्दी में थी और फिर ‘बंटवारा 1947’ के प्रमोशन के लिए फ्लाइट पकड़नी थी।’ प्रीति की पोस्ट। प्रीति ने आगे लिखा, ‘अगली बार, अगर आपका इरादा किसी भी तरह की नेगेटिविटी को बढ़ावा देना है, तो मुझसे यह उम्मीद न करें कि मैं रुककर तस्वीरें खिंचवाऊंगी। आमिर के लिए मेरे मन में बहुत प्यार और सम्मान है, इसलिए यह पोस्ट अच्छी बात नहीं है।’ बता दें कि प्रीति जिंटा जल्द अपकमिंगम फिल्म ‘बंटवारा 1947’ में नजर आएंगे। फिल्म में सनी देओल, करण देओल, शबाना आजमी, अली फजल और अभिमन्यु सिंह भी हैं। फिल्म के डायरेक्टर राजकुमार संतोषी हैं और इसके प्रोड्यूसर आमिर खान (आमिर खान प्रोडक्शंस) तथा अपर्णा पुरोहित हैं। फिल्म बंटवारा 1947 का पोस्टर। फिल्म भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है। फिल्म की कहानी हिंसा, विस्थापन और पारिवारिक संघर्ष से जूझ रहे एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘बंटवारा 1947’ 14 अगस्त 2026 को रिलीज होगी। ………………. प्रीति जिंटा जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…. प्रीति जिंटा बोलीं- मोहाली मेरा घर, यह सबसे प्यारी घरवापसी:सनी देओल संग पंजाब आईं, चंडीगढ़ के बाद जालंधर-अमृतसर भी पहुंचीं बॉलीवुड एक्टर सनी देओल और प्रीति जिंटा शनिवार को पंजाब पहुंचे। यहां उन्होंने चंडीगढ़, मोहाली, जालंधर और अमृतसर में अपनी आने वाली फिल्म बंटवारा 1947 के प्रमोशनल इवेंट्स में हिस्सा लिया। फिल्म प्रमोशन के दौरान सनी देओल और प्रीति जिंटा ने स्टूडेंट्स से मुलाकात की और उन्हें फिल्म देखने के लिए सिनेमाघरों में आने का न्योता दिया। उनके साथ सनी देओल के बेटे करण देओल भी मौजूद थे। इसके अलावा उनकी सुरक्षा और प्रमोशनल टीम भी वहां थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…. दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Natasa Stankovic Juhu Mumbai | Paparazzi Controversy Alexander Ilic

2 मिनट पहले कॉपी लिंक भारतीय क्रिकेटर हार्दिक पंड्या की एक्स-वाइफ नताशा स्टेनकोविक पैपराजी पर भड़क गईं। यह घटना शनिवार रात हुई, जब नताशा को मुंबई के जुहू इलाके में स्पॉट किया गया था। नताशा अपने करीबी दोस्त और मॉडल अलेक्जेंडर एलेक्स इलिक के साथ नजर आईं। पैपराजी ने उन्हें कैमरे में कैद करने के लिए घेर लिया और लगातार तस्वीरें लेने लगे। इस दौरान नताशा असहज नजर आईं। वह पैपराजी के लगातार तस्वीरें लेने और प्राइवेसी में दखल देने से नाराज दिखीं। हार्दिक पंड्या से तलाक लेने के बाद, नताशा को कई मौकों पर मुंबई में अलेक्जेंडर के साथ स्पॉट किया गया है। भीड़ और कैमरों के बीच अलेक्जेंडर उन्हें आगे ले जाते और भीड़ से बचाते नजर आए। हार्दिक ने 2020 में नताशा स्टेनकोविक से शादी की थी बता दें कि हार्दिक ने मई 2020 में नताशा स्टेनकोविक से शादी की थी। उसी साल नताशा ने बेटे अगस्त्य को 30 जुलाई 2020 को जन्म दिया। साल 2024 में दोनों अलग हो गए। हार्दिक इन दिनों माहिका शर्मा को डेट कर रहे हैं। हार्दिक और माहिका का रिश्ता पिछले साल अक्टूबर में पब्लिक हुआ था। वहीं, हार्दिक पंड्या ने फरवरी के महीने में बेटे अगस्त्य पंड्या को शनिवार को एक लग्जरी कार गिफ्ट की थी। कार डिलीवरी के फोटो-वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए थे। हार्दिक ने बेटे को लैंड रोवर डिफेंडर गिफ्ट की थी, जिसकी कीमत लगभग 4 करोड़ रुपए बताई गई थी। दरअसल, लैंड रोवर मुंबई के इंस्टाग्राम पेज पर तस्वीरें और वीडियो शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा गया था, ‘हार्दिक पंड्या ने एक बार फिर अपनी डिफेंडर खरीदने के लिए नवनीत मोटर्स को चुना। भरोसे पर बना रिश्ता। उत्कृष्टता पर टिका फैसला। मुंबई में डिलीवर, लैंड रोवर डिफेंडर। अगस्त्य पंड्या और स्टेनकोविक को प्रेजेंट। दमदार परफॉर्मेंस के लिए तैयार। आगे बढ़कर नेतृत्व करने वालों के लिए बनाई गई।’ लैंड रोवर मुंबई की पोस्ट। तलाक के बाद हार्दिक पंड्या और नताशा बेटे अगस्त्य की को-पेरेंटिंग कर रहे हैं। हार्दिक पंड्या भी पैपराजी पर भड़के थे बता दें कि हार्दिक ने दिसंबर 2025 में सोशल मीडिया पर अपनी गर्लफ्रेंड माहिका शर्मा की तस्वीरों को लेकर नाराजगी जताई थी। दरअसल, कुछ पैपराजी ने माहिका की फोटो गलत एंगल से क्लिक की, जब वह मुंबई के बांद्रा इलाके में एक रेस्टोरेंट की सीढ़ियों से नीचे उतर रही थीं। हार्दिक ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर एक लंबा नोट लिखकर कहा था, ‘मैं समझता हूं कि पब्लिक फिगर होने का मतलब है कि लोगों का ध्यान मुझ पर रहेगा और मेरी हरकतों पर नजर रखी जाएगी। यह मेरे काम और मेरी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन आज जो हुआ, वह बिल्कुल गलत था। माहिका बस सीढ़ियों से उतर रही थी, तभी कुछ फोटोग्राफर्स ने गलत एंगल से उसकी फोटो खींची। किसी भी महिला की तस्वीर इस तरह से नहीं लेनी चाहिए। यह एक प्राइवेट मोमेंट था, जिसे सस्ती पब्लिसिटी बना दिया गया।’ पूरी खबर यहां पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Kajal Raghwani Controversy | Bhojpuri Stars Nirahua & Aamrapali Statement

4 मिनट पहले कॉपी लिंक भोजपुरी बवाल शो में भोजपुरी स्टार्स में जारी जुबानी जंग के बीच अभिनेत्री काजल राघवानी ने सोशल मीडिया पर लाइव आकर दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ और आम्रपाली दुबे पर तीखा हमला बोला है। काजल ने निरहुआ के अपनी पत्नी को लेकर दिए गए हालिया बयान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो इंसान अपने संघर्ष के दिनों में साथ देने वाली पत्नी का सम्मान नहीं कर सकता, वह किसी और की क्या इज्जत करेगा। इसके साथ ही काजल ने आम्रपाली दुबे के करियर, नीलम गिरी के बयानों और अपनी अंग्रेजी को लेकर बनाए जा रहे मजाक पर भी अपनी बात रखी। इस विवाद की शुरुआत भोजपुरी बवाल शो के दौरान कलाकारों द्वारा एक-दूसरे के करियर, पर्सनल लाइफ और काम न देने के आरोपों से हुई थी। अभिनेत्री काजल राघवानी। निरहुआ के ‘फर्ज’ वाले बयान पर उठाया सवाल काजल राघवानी ने सोशल मीडिया लाइव में निरहुआ के उस इंटरव्यू का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी मंशा यादव के लिए कहा था कि “प्यार नहीं करता, यह मेरा फर्ज है।” काजल ने कहा कि निरहुआ की पत्नी ने उनके मुश्किल दौर में साथ दिया। शादी के 20-25 साल बाद और बच्चे होने के बाद भी उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं। काजल के मुताबिक, जो व्यक्ति अपनी ही पत्नी को अपने लायक नहीं समझता, वह एक अभिनेता या नेता के रूप में चाहे कितना भी बड़ा हो, इंसानियत और रिश्तों के मामले में एकदम खोखला है। भोजपुरी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे। आम्रपाली को दिया जवाब, कहा- आपने सीधे हीरो पकड़ा आम्रपाली दुबे द्वारा कॉम्पिटिशन की बात कहे जाने पर काजल ने कहा कि दोनों के करियर की शुरुआत अलग रही है। काजल ने कहा कि आम्रपाली ने इंडस्ट्री में आते ही बड़े स्टार के साथ काम करना शुरू कर दिया था, जबकि उन्होंने खुद छोटे-छोटे कदम बढ़ाकर अपनी पहचान बनाई है। काजल ने सेट के अनुशासन का जिक्र करते हुए कहा कि जब डायरेक्टर और पूरी टीम शॉट के लिए इंतजार करती थी, तब 4-4 असिस्टेंट डायरेक्टर्स को कलाकारों को बुलाने के लिए कमरे तक भेजना पड़ता था। अंग्रेजी बोलने पर तंज का दिया करारा जवाब अपनी पढ़ाई और अंग्रेजी को लेकर बन रहे मजाक पर काजल ने कहा कि उनके माता-पिता की जितनी क्षमता थी, उन्होंने उसी स्कूल में पढ़ाया। उन्हें अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी पर कोई शर्मिंदगी नहीं है। काजल ने कहा कि इंडस्ट्री में कई ऐसे बड़े स्टार्स हैं जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती। अगर किसी को बहुत अच्छी अंग्रेजी आती है, तो उसे विदेशों में जाकर काम करना चाहिए। जानिए क्या है भोजपुरी इंडस्ट्री का यह पूरा विवाद भोजपुरी इंडस्ट्री में पिछले कुछ समय से कलाकारों के बीच आपसी मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। निरहुआ और आम्रपाली दुबे की जोड़ी पर अक्सर इंडस्ट्री में अन्य कलाकारों को काम न करने देने के आरोप लगते रहे हैं। काजल राघवानी ने पहले भी आरोप लगाया था कि निरहुआ उनके साथ काम नहीं करना चाहते। इसके जवाब में निरहुआ और आम्रपाली के बयानों के बाद अब काजल ने लाइव आकर अपनी बात रखी है। पवन सिंह, निरहुआ और तेज प्रताप यादव एक साथ इस शो में भोजपुरी के पावर स्टार पवन सिंह, अभिनेता दिनेश लाल यादव (निरहुआ), आम्रपाली दुबे, काजल राघवानी और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव एक साथ नजर आ रहे हैं। शो का प्रसारण 2 अगस्त को जियो हॉटस्टार पर शुरू हो चुका है। ये खबर भी पढ़ें भोजपुरी एक्ट्रेसेज ने उड़ाया बॉलीवुड अभिनेत्रियों की सर्जरी का मजाक:कहा- हमारा सब कुछ नैचुरल, बॉलीवुड में होते तो बतख जैसे होंठ कराने पड़ते भोजपुरी एक्ट्रेसेज आम्रपाली दुबे और रानी चटर्जी ने बॉलीवुड अभिनेत्रियों के सर्जरी कराने का मजाक उड़ाया है। वे रियलिटी शो ‘भोजपुरी बवाल’ के सेट पर ये बातें करती नजर आईं। दैनिक भास्कर के पास इस बात बातचीत का अनकट वीडियो पहुंचा है। इसमें रानी चटर्जी, आम्रपाली दुबे और उनकी साथी एक्ट्रेस मेकअप रूम में बैठी नजर आ रही हैं। पूरी खबर पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
विवाद के बाद कंगना के जेन-जी पर बदले बोल:कहा- ये सरकार की ताकत, इन पर गर्व, कुछ इनका नाम खराब कर रहे हैं; पहले कहा था गटरछाप

प्रोटेस्ट के बाद स्टूडेंट और जेन-जी पर निशाना साथ रहीं एक्ट्रेस और सांसद कंगना रनोट के बोल बदल चुके हैं। एक्ट्रेस ने नए बयान में इस जनरेशन की सराहना की और कहा कि ये भी सरकार का ही हिस्सा हैं। हाल ही में संसद के बाहर कंगना से पूछा गया था कि राहुल गांधी कह रहे हैं कि सरकार को जेन-जी की बात सुननी चाहिए। इस पर उन्होंने कहा, जेन-जी सरकार का हिस्सा हैं। उन्हीं का तो योगदान है, जो हमारी सरकार इतने सालों से सत्ता में है। जेन-जी का ही जनादेश है। ऐसा जरूरी नहीं है कि प्रोटेस्ट में 10-15 गाली देने वाले ही जेन-जी हैं। हमें जेन-जी पर गर्व है- कंगना रनोट आगे कंगना ने कहा, ‘आज जो झारखंड में बच्चे बैठे हैं और जो इतने अच्छे से प्रोटेस्ट कर रहे हैं और जो युवा मेडल लेकर आए, जिन्होंने मेडल प्रधानमंत्री जी को समर्पित किए हैं। ये कुछ मुट्ठीभर लोग हैं, जो जेन-जी का नाम खराब कर रहे हैं। जेन-जी जो हैं, वो हमारी सबसे बड़ी ताकत है, हमें गर्व है अपने जेन-जी पर।’ पहले नई जनरेशन को कहा था गटरछाप अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनोट ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन पर कहा था कि जेन-जी की रील्स देखकर उन्हें उल्टी आने जैसा महसूस होता है। कंगना ने प्रदर्शनकारियों की भाषा और व्यवहार पर सवाल उठाते हुए उन्हें ‘कॉकरोच’ के प्रतीक का इस्तेमाल करने पर भी खरी-खोटी सुनाई है। कंगना रनोट ने इंस्टाग्राम पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा कि प्रदर्शनकारियों के बोलने का तरीका और भाषा बेहद खराब है। उन्होंने लिखा, “मैंने अपनी जिंदगी में एक साथ किसी फ्रेम में इतना भद्दा कंटेंट नहीं देखा है। इन्हें कौन पैदा कर रहा है और कैसी परवरिश दे रहा है?” इसके अलावा कंगना ने नई जनरेशन की महिलाओं पर भी निशाना साधा और उन्हें गटरछाप कहा। कंगना ने सोशल मीडिया से लिखा था, ‘सबसे शर्मनाक बात उन युवा हिंदू महिलाओं का व्यवहार है, जो स्वतंत्र और करियर बनाने वाली महिलाओं की जिंदगी की नकल करना चाहती हैं, लेकिन उस आजादी के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को नहीं निभाना चाहतीं। वे अपने माता-पिता या परिवार की कीमत पर ऐसा नहीं करतीं।’ ‘आज तथाकथित वेस्टर्न सोच से प्रभावित भारतीय महिलाओं की एक नई पीढ़ी सामने आई है। मैं इन्हें ‘गटर जेनरेशन’ कहती हूं। इनमें से कुछ के पास समाज को देने के लिए कुछ भी नहीं है। वे पढ़ाई में अच्छी नहीं हैं, लेकिन इतनी बदसूरत सोच और भ्रष्ट मानसिकता रखती हैं कि अच्छी हाउसवाइफ भी नहीं बन सकतीं।’ ‘इसके बावजूद वे अपनी तथाकथित आजादी का दिखावा करती हैं, नशा, शराब और अनगिनत यौन संबंधों को अपनी आजादी बताती हैं। बेशर्मी से अपने माता-पिता की कमाई पर पलती हैं और लगातार स्वतंत्र जीवन जीने की बातें करती हैं, जबकि वास्तव में वे आत्मनिर्भर होती ही नहीं। एक छोटी-सी याद दिला दूं, आजाद जीवन कमाना पड़ता है। अगर बिना जिम्मेदारी उठाए स्वतंत्र बनने की कोशिश करोगे, तो तुम सिर्फ एक विकृत मानसिकता वाले इंसान हो, ‘गटर छाप’।’ कंगना के इन बयानों पर विवाद हो गया। सोनू सूद समेत कई सेलेब्स ने भी उनके बयान की निंदा की। इसके बाद से ही सोशल मीडिया पर कंगना के पुराने पार्टी वीडियोज और बोल्ड मूवी क्लिप वायरल हो गए। इन पर रिएक्शन देते हुए कंगना ने कहा कि फिल्मों में निभाए गए किरदार और असल जिंदगी के विचारों की तुलना करना गलत है। उन्होंने लोगों से रील और रियल लाइफ का फर्क समझने की अपील की।
विवाद के बाद कंगना के जेन-जी पर बदले बोल:कहा- ये सरकार की ताकत, इन पर गर्व, कुछ इनका नाम खराब कर रहे हैं; पहले कहा था गटरछाप

प्रोटेस्ट के बाद स्टूडेंट और जेन-जी पर निशाना साथ रहीं एक्ट्रेस और सांसद कंगना रनोट के बोल बदल चुके हैं। एक्ट्रेस ने नए बयान में इस जनरेशन की सराहना की और कहा कि ये भी सरकार का ही हिस्सा हैं। हाल ही में संसद के बाहर कंगना से पूछा गया था कि राहुल गांधी कह रहे हैं कि सरकार को जेन-जी की बात सुननी चाहिए। इस पर उन्होंने कहा, जेन-जी सरकार का हिस्सा हैं। उन्हीं का तो योगदान है, जो हमारी सरकार इतने सालों से सत्ता में है। जेन-जी का ही जनादेश है। ऐसा जरूरी नहीं है कि प्रोटेस्ट में 10-15 गाली देने वाले ही जेन-जी हैं। हमें जेन-जी पर गर्व है- कंगना रनोट आगे कंगना ने कहा, ‘आज जो झारखंड में बच्चे बैठे हैं और जो इतने अच्छे से प्रोटेस्ट कर रहे हैं और जो युवा मेडल लेकर आए, जिन्होंने मेडल प्रधानमंत्री जी को समर्पित किए हैं। ये कुछ मुट्ठीभर लोग हैं, जो जेन-जी का नाम खराब कर रहे हैं। जेन-जी जो हैं, वो हमारी सबसे बड़ी ताकत है, हमें गर्व है अपने जेन-जी पर।’ पहले नई जनरेशन को कहा था गटरछाप अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनोट ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन पर कहा था कि जेन-जी की रील्स देखकर उन्हें उल्टी आने जैसा महसूस होता है। कंगना ने प्रदर्शनकारियों की भाषा और व्यवहार पर सवाल उठाते हुए उन्हें ‘कॉकरोच’ के प्रतीक का इस्तेमाल करने पर भी खरी-खोटी सुनाई है। कंगना रनोट ने इंस्टाग्राम पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा कि प्रदर्शनकारियों के बोलने का तरीका और भाषा बेहद खराब है। उन्होंने लिखा, “मैंने अपनी जिंदगी में एक साथ किसी फ्रेम में इतना भद्दा कंटेंट नहीं देखा है। इन्हें कौन पैदा कर रहा है और कैसी परवरिश दे रहा है?” इसके अलावा कंगना ने नई जनरेशन की महिलाओं पर भी निशाना साधा और उन्हें गटरछाप कहा। कंगना ने सोशल मीडिया से लिखा था, ‘सबसे शर्मनाक बात उन युवा हिंदू महिलाओं का व्यवहार है, जो स्वतंत्र और करियर बनाने वाली महिलाओं की जिंदगी की नकल करना चाहती हैं, लेकिन उस आजादी के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को नहीं निभाना चाहतीं। वे अपने माता-पिता या परिवार की कीमत पर ऐसा नहीं करतीं।’ ‘आज तथाकथित वेस्टर्न सोच से प्रभावित भारतीय महिलाओं की एक नई पीढ़ी सामने आई है। मैं इन्हें ‘गटर जेनरेशन’ कहती हूं। इनमें से कुछ के पास समाज को देने के लिए कुछ भी नहीं है। वे पढ़ाई में अच्छी नहीं हैं, लेकिन इतनी बदसूरत सोच और भ्रष्ट मानसिकता रखती हैं कि अच्छी हाउसवाइफ भी नहीं बन सकतीं।’ ‘इसके बावजूद वे अपनी तथाकथित आजादी का दिखावा करती हैं, नशा, शराब और अनगिनत यौन संबंधों को अपनी आजादी बताती हैं। बेशर्मी से अपने माता-पिता की कमाई पर पलती हैं और लगातार स्वतंत्र जीवन जीने की बातें करती हैं, जबकि वास्तव में वे आत्मनिर्भर होती ही नहीं। एक छोटी-सी याद दिला दूं, आजाद जीवन कमाना पड़ता है। अगर बिना जिम्मेदारी उठाए स्वतंत्र बनने की कोशिश करोगे, तो तुम सिर्फ एक विकृत मानसिकता वाले इंसान हो, ‘गटर छाप’।’ कंगना के इन बयानों पर विवाद हो गया। सोनू सूद समेत कई सेलेब्स ने भी उनके बयान की निंदा की। इसके बाद से ही सोशल मीडिया पर कंगना के पुराने पार्टी वीडियोज और बोल्ड मूवी क्लिप वायरल हो गए। इन पर रिएक्शन देते हुए कंगना ने कहा कि फिल्मों में निभाए गए किरदार और असल जिंदगी के विचारों की तुलना करना गलत है। उन्होंने लोगों से रील और रियल लाइफ का फर्क समझने की अपील की।
UPI Payment Controversy | Finance Minister Nirmala Sitharaman Statement

नई दिल्ली12 मिनट पहले कॉपी लिंक भारत में रोजाना फल-सब्जी खरीदने से लेकर कैब के किराए तक के लिए करोड़ों लोग यूपीआई (UPI) का इस्तेमाल करते हैं। हाल ही में संसद में पेश हुए नए बिल के बाद एक बहस शुरू हो गई है कि क्या भविष्य में यूपीआई पेमेंट करने पर ग्राहकों को शुल्क देना होगा। इस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्थिति साफ की है। वित्त मंत्री ने कहा है कि आम ग्राहकों को डरने की कोई जरूरत नहीं है, यूपीआई उनके लिए फ्री ही रहेगा। जानिए क्या है पूरा मामला, संसद में पेश नया बिल, एमडीआर का नियम और आम यूजर्स पर इसका क्या असर होगा… सवाल: क्या आम ग्राहकों को अब UPI से पेमेंट करने पर कोई चार्ज देना होगा? जवाब: नहीं, बिल्कुल नहीं। सरकार और आरबीआई दोनों ने साफ किया है कि आम ग्राहकों से यूपीआई पेमेंट पर कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। आप पहले की तरह ही किसी भी क्यूआर कोड को स्कैन करके फ्री में पैसों का ट्रांसफर और खरीदारी कर सकेंगे। सवाल: फिर यूपीआई पर चार्ज लगने की चर्चा क्यों शुरू हुई? जवाब: सरकार ने संसद में टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल-2026 पेश किया है। इसमें पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट- 2007 की धारा 10A में संशोधन का प्रस्ताव है। इसके तहत भविष्य में कुछ खास यूपीआई लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का कानूनी ढांचा तैयार किया जा रहा है। इसी के बाद विपक्ष ने सवाल उठाए कि इससे आम जनता पर बोझ पड़ेगा। सवाल: कांग्रेस और विपक्ष का इस नए संशोधन बिल पर क्या आरोप है? जवाब: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह संशोधन उस कानूनी सुरक्षा को हटाता है जिसने अब तक यूपीआई ट्रांजेक्शन को पूरी तरह मुफ्त रखा है। उनका आरोप है कि इससे भविष्य में यूपीआई पर एमडीआर लगाने का रास्ता साफ होगा और इसका अंतिम बोझ आम जनता पर ही पड़ेगा। सवाल: विपक्ष के आरोपों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने क्या सफाई दी? जवाब: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विपक्ष के दावों को खारिज करते हुए X पर कहा कि एमडीआर केवल मर्चेंट्स (दुकानदारों/व्यापारियों) पर लागू होता है, न कि अंतिम उपभोक्ता या ग्राहकों पर। इससे मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल बैंक और फिनटेक कंपनियां अपने इंफ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन और सिक्योरिटी को मजबूत करने में करेंगी, जिसका फायदा अंततः सभी यूपीआई यूजर्स को ही मिलेगा। सवाल: क्या अभी से यूपीआई ट्रांजेक्शन पर एमडीआर लागू कर दिया गया है? जवाब: नहीं, अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि संसद से बिल पास होने के बाद नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की ‘यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी’ इस पर अंतिम फैसला लेगी। अभी यह केवल एक प्रस्ताव के स्तर पर है। सवाल: यह एमडीआर आखिर होता क्या है और यह कौन देता है? जवाब: एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह फीस होती है जो कोई व्यापारी या दुकानदार डिजिटल पेमेंट प्रोसेस करने के बदले बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देता है। यह शुल्क ग्राहक की जेब से नहीं कटता, बल्कि दुकानदारों के डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के बदले चुकाया जाता है। वर्तमान नियमों के तहत यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड पर एमडीआर 0% है। सवाल: RBI गवर्नर का इस पूरे मुद्दे पर क्या रुख है? जवाब: आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मॉनेटरी पॉलिसी के बाद कहा कि इस पर अभी से किसी नतीजे पर पहुंचना बहुत जल्दबाजी होगी। सरकार कानून में संशोधन कर रही है और चर्चा जारी है। डिजिटल पेमेंट सिस्टम को चलाने का खर्च किसी न किसी को तो उठाना ही होगा। उन्होंने कहा कि आरबीआई की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल पेमेंट सुरक्षित, टिकाऊ और सभी के लिए किफायती बना रहे। सवाल: प्रस्तावित योजना के तहत किन दुकानों और ट्रांजेक्शन पर चार्ज लग सकता है? जवाब: विचाराधीन प्रस्ताव के अनुसार, ₹2,000 से ज्यादा के यूपीआई ट्रांजेक्शन पर 0.3% से 0.5% तक का एमडीआर (MDR) लगाया जा सकता है। राहत की बात यह है कि यह नियम केवल ₹1.5 करोड़ से ज्यादा के सालाना टर्नओवर वाले बड़े मर्चेंट्स/दुकानदारों पर ही लागू करने का प्लान है। छोटे व्यापारी और सब्जी-किराना वाले इसके दायरे से बाहर रहेंगे। सवाल: अगर एमडीआर लागू भी हो जाता है, तो दुकानदारों पर क्या असर पड़ेगा? जवाब: अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो केवल ₹1.5 करोड़ से ज्यादा का टर्नओवर रखने वाले बड़े कारोबारियों को ही ₹2,000 से ज्यादा के यूपीआई लेन-देन पर 0.3% से 0.5% तक फीस देनी होगी। छोटे दुकानदारों और आम ग्राहकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सवाल: यूपीआई के भविष्य और इसकी फंडिंग को लेकर असली विवाद क्या है? जवाब: भारत में तेजी से बढ़ते डिजिटल पेमेंट्स नेटवर्क का खर्च कौन उठाएगा। यह इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ है। बैंक और फिनटेक कंपनियों का कहना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा बनाए रखने के लिए भारी लागत आती है। सरकार चाहती है कि आम यूजर्स पर बोझ डाले बिना बैंकों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाया जाए, ताकि यूपीआई सर्विस बिना किसी रुकावट के चलती रहे। नॉलेज पार्ट: जानें क्या है पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट? धारा 10A का नियम: भारत सरकार ने डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए इस कानून में धारा 10A जोड़ी थी, जिसके तहत यूपीआई और रूपे कार्ड लेन-देन पर किसी भी प्रकार का एमडीआर लगाने पर रोक लगा दी गई थी। संशोधन की जरूरत क्यों: धारा 10A में संशोधन के बाद सरकार और एनपीसीआई (NPCI) को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे जरूरत पड़ने पर बड़े व्यावसायिक लेन-देन पर सीमित शुल्क (MDR) तय कर सकें, ताकि डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च निकाला जा सके। ये खबर भी पढ़ें… मैगी विवाद में दुकानदारों पर लगे सभी क्रिमिनल केस हटे: हाईकोर्ट बोला- लैब जांच में लेड लिमिट में मिला, अब केस का कोई आधार नहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के मैगी विवाद में दुकानदारों के खिलाफ दर्ज सभी केस रद्द कर दिए हैं। यह सभी क्रिमिनल केस मैगी में लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने के आरोपों के बाद दर्ज किए गए थे। जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि
Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed

Hindi News Business Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed नई दिल्ली3 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के मैगी विवाद में दुकानदारों के खिलाफ दर्ज सभी केस रद्द कर दिए हैं। यह सभी क्रिमिनल केस मैगी में लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने के आरोपों के बाद दर्ज किए गए थे। जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) की जांच में मैगी के सैंपल सुरक्षित पाए जा चुके हैं, तो दुकानदारों पर मुकदमा चलाना उनके साथ अन्याय होगा। इस फैसले और पूरे मामले के हर पहलू को सवाल-जवाब के जरिए जानिए… सवाल: दिल्ली हाईकोर्ट ने मैगी से जुड़ा क्या फैसला सुनाया है? जवाब: दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के चर्चित मैगी विवाद में दुकानदारों (रिटेलर्स और सप्लायर्स) के खिलाफ दर्ज सभी क्रिमिनल केस रद्द कर दिए हैं। फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने 2015 में जिन दुकानों से सैंपल लिए थे, उनके मालिकों पर मुकदमे चलाए जा रहे थे। कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए कानूनी कार्यवाही को समाप्त कर दिया है। सवाल: अदालत ने मुकदमों को खारिज करने का क्या कारण बताया? जवाब: जस्टिस मधु जैन ने कहा कि जब जांच का मूल आधार ही वैज्ञानिक रूप से खत्म हो चुका है, तो एक लंबा आपराधिक ट्रायल सही नहीं होगा। कोर्ट के मुताबिक, फूड सेफ्टी एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट के अलावा मिलावट का कोई सबूत मौजूद नहीं है। सवाल: यह पूरा मामला कब और कैसे शुरू हुआ था? जवाब: मई 2015 में देशभर में मैगी के सैंपल लिए गए थे। फूड एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मैगी के मसाला टेस्टमेकर में लेड की मात्रा तय सीमा 2.5 पार्ट्स पर मिलियन (PPM) से ज्यादा थी। इसके अलावा पैकेट पर नो एडेड मैसेज का दावा करने के बावजूद इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट यानी अजीनोमोटो मिलने का आरोप लगाया गया था। साथ ही इसे इंसान के खाने के लिए असुरक्षित बताया गया था। सवाल: मामले में दुकानदारों और सप्लायरों को कैसे आरोपी बनाया गया था? जवाब: फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने जांच के दौरान मैगी की सप्लाई चेन का पता लगाया। दुकानदारों के अलावा सप्लायर फर्म मेसर्स धींगरा ब्रदर्स और मैन्युफैक्चरर कंपनी नेस्ले इंडिया लिमिटेड के जिम्मेदार प्रतिनिधियों के खिलाफ फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत FIR दर्ज कर समन जारी किए गए थे। सवाल: दुकानदारों के वकीलों ने कोर्ट में क्या दलीलें दीं? जवाब: आरोपियों की तरफ से पेश वकील राजेश बत्रा और सोनिया कुकरेजा ने दलील दी कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2015 को ही मैगी पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। इसके बाद तीन मान्यता प्राप्त लैब में नए सैंपलों की जांच हुई थी, जिसमें लीड की मात्रा तय सीमा के भीतर पाई गई थी। इसलिए अब केस का कोई आधार ही नहीं बचता। सवाल: सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय प्रयोगशाला (CFTRI) की क्या भूमिका रही? जवाब: मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी 2016 को मैसुरु स्थित ‘सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (CFTRI) को मैगी के सैंपलों की दोबारा जांच का आदेश दिया। CFTRI की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि मैगी में लीड और ग्लूटामिक एसिड (MSG) की मात्रा तय नियमों और तय मानकों के भीतर ही थी। सवाल: राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) ने इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया था? जवाब: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CFTRI की रिपोर्ट को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के समक्ष रखा गया था। NCDRC ने केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि मैगी असुरक्षित थी, इसका कोई प्रमाण नहीं है और रेफरल लैब की रिपोर्ट ही अंतिम मानी जाएगी। सवाल: सरकारी पक्ष (राज्य सरकार) की क्या दलील थी? जवाब: राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील दिगम सिंह डागर ने तर्क दिया कि सैंपल लेने की प्रक्रिया FSS एक्ट के नियमों के अनुसार हुई थी। उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और NCDRC के फैसले अलग संदर्भ में थे, इसलिए दुकानदारों के खिलाफ चल रहे केस स्वतः रद्द नहीं होने चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। सवाल: इस फैसले का आम दुकानदारों और आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जवाब: इस फैसले से उन छोटे दुकानदारों को बड़ी राहत मिली है, जो पिछले 9 सालों से सिर्फ सामान बेचने की वजह से अदालती चक्कर काट रहे थे। आम उपभोक्ताओं के लिए भी यह फैसला साफ करता है कि देश की सर्वोच्च अदालतों और वैज्ञानिक लैब की जांच में मैगी में सीसे और हानिकारक तत्वों का दावा खारिज हो चुका है। जानें क्या है मोनोसोडियम ग्लूटामेट और पार्स पर मिलियन मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG): यह एक फ्लेवर एन्हांसर है, जो खाने के स्वाद को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह कई प्राकृतिक चीजों (जैसे टमाटर, पनीर) में भी पाया जाता है। पार्स पर मिलियन (PPM): यह किसी तत्व की शुद्धता या मिलावट मापने की इकाई है। 1 PPM का मतलब 10 लाख हिस्सों में से 1 हिस्सा होता है। खाद्य नियमों के तहत मैगी में सीसे की सीमा 2.5 PPM निर्धारित है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed

Hindi News Business Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed नई दिल्ली20 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के मैगी विवाद में दुकानदारों के खिलाफ दर्ज सभी केस रद्द कर दिए हैं। यह सभी क्रिमिनल केस मैगी में लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने के आरोपों के बाद दर्ज किए गए थे। जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) की जांच में मैगी के सैंपल सुरक्षित पाए जा चुके हैं, तो दुकानदारों पर मुकदमा चलाना उनके साथ अन्याय होगा। इस फैसले और पूरे मामले के हर पहलू को सवाल-जवाब के जरिए जानिए… सवाल: दिल्ली हाईकोर्ट ने मैगी से जुड़ा क्या फैसला सुनाया है? जवाब: दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के चर्चित मैगी विवाद में दुकानदारों (रिटेलर्स और सप्लायर्स) के खिलाफ दर्ज सभी क्रिमिनल केस रद्द कर दिए हैं। फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने 2015 में जिन दुकानों से सैंपल लिए थे, उनके मालिकों पर मुकदमे चलाए जा रहे थे। कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए कानूनी कार्यवाही को समाप्त कर दिया है। सवाल: अदालत ने मुकदमों को खारिज करने का क्या कारण बताया? जवाब: जस्टिस मधु जैन ने कहा कि जब जांच का मूल आधार ही वैज्ञानिक रूप से खत्म हो चुका है, तो एक लंबा आपराधिक ट्रायल सही नहीं होगा। कोर्ट के मुताबिक, फूड सेफ्टी एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट के अलावा मिलावट का कोई सबूत मौजूद नहीं है। सवाल: यह पूरा मामला कब और कैसे शुरू हुआ था? जवाब: मई 2015 में देशभर में मैगी के सैंपल लिए गए थे। फूड एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मैगी के मसाला टेस्टमेकर में लेड की मात्रा तय सीमा 2.5 पार्ट्स पर मिलियन (PPM) से ज्यादा थी। इसके अलावा पैकेट पर नो एडेड मैसेज का दावा करने के बावजूद इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट यानी अजीनोमोटो मिलने का आरोप लगाया गया था। साथ ही इसे इंसान के खाने के लिए असुरक्षित बताया गया था। सवाल: मामले में दुकानदारों और सप्लायरों को कैसे आरोपी बनाया गया था? जवाब: फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने जांच के दौरान मैगी की सप्लाई चेन का पता लगाया। दुकानदारों के अलावा सप्लायर फर्म मेसर्स धींगरा ब्रदर्स और मैन्युफैक्चरर कंपनी नेस्ले इंडिया लिमिटेड के जिम्मेदार प्रतिनिधियों के खिलाफ फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत FIR दर्ज कर समन जारी किए गए थे। सवाल: दुकानदारों के वकीलों ने कोर्ट में क्या दलीलें दीं? जवाब: आरोपियों की तरफ से पेश वकील राजेश बत्रा और सोनिया कुकरेजा ने दलील दी कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2015 को ही मैगी पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। इसके बाद तीन मान्यता प्राप्त लैब में नए सैंपलों की जांच हुई थी, जिसमें लेड की मात्रा तय सीमा के भीतर पाई गई थी। इसलिए अब केस का कोई आधार ही नहीं बचता। सवाल: सुप्रीम कोर्ट और सरकारी लैब की क्या भूमिका रही? जवाब: मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो हाई कोर्ट ने 16 जनवरी 2016 को मैसुरु स्थित सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) को मैगी के सैंपलों की दोबारा जांच का आदेश दिया। सरकारी लैब की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि मैगी में लेड और अजीनोमोटो की मात्रा तय नियमों और तय मानकों के भीतर ही थी। सवाल: राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया था? जवाब: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CFTRI की रिपोर्ट को नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के समक्ष रखा गया था। NCDRC ने केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि मैगी असुरक्षित थी, इसका कोई प्रमाण नहीं है और रेफरल लैब की रिपोर्ट ही अंतिम मानी जाएगी। सवाल: मामले पर सरकारी पक्ष की क्या दलील थी? जवाब: राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील दिगम सिंह डागर ने तर्क दिया कि सैंपल लेने की प्रक्रिया FSS एक्ट के नियमों के अनुसार हुई थी। उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और NCDRC के फैसले अलग संदर्भ में थे, इसलिए दुकानदारों के खिलाफ चल रहे केस रद्द नहीं होने चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। सवाल: इस फैसले का आम दुकानदारों और आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जवाब: इस फैसले से उन छोटे दुकानदारों को बड़ी राहत मिली है, जो पिछले 9 सालों से सिर्फ सामान बेचने की वजह से अदालती चक्कर काट रहे थे। आम उपभोक्ताओं के लिए भी यह फैसला साफ करता है कि देश की सर्वोच्च अदालतों और वैज्ञानिक लैब की जांच में मैगी में लेड और हानिकारक तत्वों का दावा खारिज हो चुका है। जानें क्या है मोनोसोडियम ग्लूटामेट और पार्स पर मिलियन मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG): यह एक फ्लेवर एन्हांसर है, जो खाने के स्वाद को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह कई प्राकृतिक चीजों (जैसे टमाटर, पनीर) में भी पाया जाता है। पार्स पर मिलियन (PPM): यह किसी तत्व की शुद्धता या मिलावट मापने की इकाई है। 1 PPM का मतलब 10 लाख हिस्सों में से 1 हिस्सा होता है। खाद्य नियमों के तहत मैगी में सीसे की सीमा 2.5 PPM निर्धारित है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…







