‘वज्र’ में दिखेगा हाई-ऑक्टेन एक्शन:टाइगर तैयार, जापान में शूट होगी फिल्म; 2027 में OTT पर भी देंगे दस्तक

एक्शन स्टार टाइगर श्रॉफ ने 2 मार्च को अपने जन्मदिन के मौके पर अपनी अगली फिल्म ‘वज्र’ के टाइटल की आधिकारिक घोषणा कर दी। यह फिल्म निर्देशक राम माधवानी और निर्माता महावीर जैन के साथ मिलकर बनाई जा रही है। ‘नीरजा’ और ‘आर्या’ जैसे कंटेंट-ड्रिवन प्रोजेक्ट्स के लिए पहचाने जाने वाले राम माधवानी के साथ टाइगर का यह सहयोग इंडस्ट्री में खास चर्चा बटोर रहा है। ‘वज्र’ को 2027 की सबसे बड़ी एक्शन फिल्मों में से एक माना जा रहा है, जिसमें हाई-ऑक्टेन एक्शन देखने को मिलेगा। फिल्म की शूटिंग अप्रैल से शुरू करने की है प्लानिंग सूत्रों के मुताबिक ‘वज्र’ एक स्पिरिचुअल एक्शन थ्रिलर होगी, जिसकी शूटिंग अप्रैल से शुरू करने की योजना है। फिल्म का बड़ा हिस्सा जापान में फिल्माया जाएगा, जहां टाइगर विशेष मार्शल आर्ट्स प्रशिक्षण भी लेंगे। इसे ग्लोबल दर्शकों के लिए नए प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है। ‘बागी 5’ भी है बननी, डेवलपमेंट स्टेज में है ‘हीरोपंती 3’ 2027 के लिए टाइगर ने बड़े स्केल पर बदलाव की तैयारी की है। साजिद नाडियाडवाला के बैनर तले बनने वाली ‘बागी 5’ उनकी सफल फ्रेंचाइज का अगला चैप्टर होगी। इसके अलावा ‘हीरोपंती 3’ फिलहाल डेवलपमेंट स्टेज में है और स्क्रिप्ट पर नए सिरे से काम किया जा रहा है, ताकि पिछली किस्त की कमियों को सुधारा जा सके। अंतरराष्ट्रीय स्टंट डायरेक्टर्स के साथ तैयारी हो रही है… डिजिटल स्पेस में टाइगर 2027 में अपना ओटीटी डेब्यू करने की तैयारी में भी हैं। ओटीटी के लिए वे आठ एपिसोड की एक एक्शन सीरीज में दिखेंगे। जिसकी कहानी जासूसी और अंडरकवर ऑपरेशन्स के इर्द-गिर्द है। अंतरराष्ट्रीय स्टंट डायरेक्टर्स के साथ इसकी तैयारी भी हो रही है।
इंटरव्यू: एक्टर रणविजय सिंह ने कहा:यूथ अपनी सेल्फ-वर्थ पहचानें; ट्रेंड नहीं टारगेट के पीछे दौड़ो, किसी और के लिए नहीं खुद के लिए जियो

फिटनेस और एडवेंचर की दुनिया का चर्चित चेहरा रणविजय सिंह एसके मैराथन में शामिल होने रायपुर पहुंचे। लगभग 21 कैटेगरी में मरीन ड्राइव से मैराथन की शुरुआत होगी। जिसका फ्लैग अॉफ रोडिज फेम रणविजय करेंगे। इस बार लेट्स रन टूवर्डस अ हेल्थियर इंडिया एंड अ सेफर डिजिटल इंडिया थीम पर होने वाली इस मैराथन में 10 हजार धावकों के शामिल होने की संभावना है। इस मौके पर रणविजय ने सिटी भास्कर से एक्सक्लूसिव बात की और अपने अनुभव साझा किए। पढ़िए रणविजय ने यूथ, फिटनेस और लाइफस्टाइल को लेकर क्या कहा… आने वाले समय में आपके क्या प्लान्स हैं? – मेरे बच्चे अभी छोटे हैं, तो मैं उनके लिए समय निकलना चाहता हूं। करियर के एक फेज में बहुत दौड़-धूप की, पर अब बच्चों के बड़े होने तक सलेक्टिव वर्क करने का प्लान है। क्वॉन्टिटी से ज्यादा क्वॉलिटी ऑफ वर्क पर फोकस है। रील और रियल लाइफ के बीच यूथ खुद को कैसे बैलेंस करे? – यूथ जो भी करता है वो अपने परिवार, बड़ों और समाज को देख कर करता है। जो उदाहरण हम उन्हें देंगे, वे आगे चल कर वही करेंगे। यूथ को खुद की सेल्फ-वर्थ समझना जरूरी है। किसी और के लिए नहीं, अपने लिए जिएं। आप काफी ओवरवेट थे, फिर इसे कैसे ठीक किया? – एक स्कूल में फिटनेस सेशन के दौरान बच्चे ने कहा कि आप तो फिट हैं, इसलिए फिटनेस की बात कहना आसान है। मैंने इसे चैलेंज के रूप में लिया। 39 की उम्र में 83 किलो से 108 किलो तक वेट गेन किया। फिर वर्कआउट और सही न्यूट्रिशन रूटीन फॉलो करके 9 महीने में वापस खुद को फिट किया। मिलिट्री फैमिली बैकग्राउंड की वजह से आपको लाइफ में कितनी हेल्प मिली – मिलिट्री बैकग्राउंड से होना मेरे लिए एडेड एडवांटेज साबित हुआ है। इसकी वजह से डिसिप्लिन, पंक्चुएलिटी और हर सिचुएशन में एडजस्ट करना मेरी लाइफ का हिस्सा रहे हैं। देश के छोटे-बड़े मिलिट्री कैनटोनमेंट(छावनी) में पापा की पोस्टिंग हुईं, जिससे मेरी पढ़ाई 9 अलग-अलग स्कूल्स से पूरी हुई। इस वजह से पूरा भारत नजदीक से देखा है, हर जगह दोस्त बनाए और हर शहर से कुछ सीखने को मिला। आपके अनुसार लाइफ में स्पोर्ट्स और फिटनेस की क्या अहमियत है? – स्पोर्ट्स मेरी लाइफ का मंत्रा है। स्पोर्ट्स डिसिप्लिन और स्ट्रैटजी सिखाता है, मोटिवेटेड रखता है, चैलेंजेज लेने के योग्य बनाता है और पॉजिटिव फ्रेम ऑफ माइंड देता है। फिटनेस, लाइफस्टाइल का बाय-प्रोडक्ट है। एक्टिव लाइफस्टाइल और माइंडफुल ईटिंग से अपने माइंड और बॉडी का हर उम्र में ध्यान रखा जा सकता है।
जापान के कोडो ग्रुप का वर्ल्ड टूर:ड्रम मास्टर्स बनने के लिए 2 साल बिना फोन-इंटरनेट के रहना पड़ता है, खुद बनाते हैं अपना खाना, चावल की बोरियां लेकर पेरिस पहुंचे

फ्रांस की राजधानी पेरिस के मशहूर ‘साले प्लेयेल हॉल’ के बाहर हाल ही में एक बस रुकी। बस से उतरे 14 लोग आम टूरिस्ट नहीं थे, ये जापान के दुनिया भर में मशहूर ‘कोडो’ ग्रुप के कलाकार थे। यह ग्रुप दुनिया का सबसे प्रसिद्ध ‘ताइको’ यानी पारंपरिक जापानी ड्रम बजाने वाला संगीत समूह है, जो इन दिनों वर्ल्ड टूर पर है। खास बात यह कि बड़े स्टार होने के बावजूद ये अपना सारा सामान, यहां तक कि भारी ड्रम भी खुद उठाते हैं। इनके साथ जापान से खास चावल की बोरियां भी आईं, क्योंकि ये खाना खुद बनाते हैं और जापानी चावल ही खाते हैं। प्रशिक्षण में ड्रम के साथ ही बांसुरी, नाच और संगीत भी सिखाते हैं कोडो का हिस्सा बनना आसान नहीं है। चयन के बाद नए प्रशिक्षुओं को जापान के पश्चिमी तट के ‘साडो द्वीप’ के ट्रेनिंग सेंटर में भेजा जाता है। यह वही द्वीप है, जिसे कभी निर्वासन की जगह माना जाता था। यहां 2 साल तक फोन, इंटरनेट या टीवी जैसी किसी भी टेक्नोलॉजी की अनुमति नहीं होती। दिन की शुरुआत सुबह 5:30 बजे लंबी दौड़ से होती है। रात तक अभ्यास, भोजन और फिर अभ्यास चलता रहता है। ट्रेनिंग में कलाकार सिर्फ ड्रम बजाना नहीं सीखते। वे खेती करके चावल खुद उगाते हैं। देवदार की लकड़ी तराशकर ड्रमस्टिक्स भी खुद बनाते हैं। साथ ही बांसुरी, नृत्य और धातु के वाद्य यंत्रों की दूसरी कलाएं भी सीखते हैं। पहले साल में ही आधे से ज्यादा छोड़ देते हैं ट्रेनिंग इतनी सख्त है कि पहले साल के अंत तक आधे से ज्यादा छात्र बीच में ही हार मानकर घर लौट जाते हैं। दूसरे साल के अंत में भी चयन तय नहीं होता। कभी सिर्फ 1-2 को जूनियर मेंबर चुना जाता है, तो कभी किसी को भी नहीं। जूनियर मेंबर बनने के बाद भी एक साल खुद को साबित करने पर ही कोई स्थाई सदस्य बन पाता है।
अब कस्टमाइज्ड सिनेमा का दौर:बटन दबाते ही रेगिस्तान में बदलेगा बर्फीले इलाके का दृश्य, IIM-IIT की तर्ज पर क्रिएटिव टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट; एनिमेशन, विजुअल इफैक्ट के क्रिएटर होंगे तैयार

आने वाला समय इंटरएक्टिव, कस्टमाइज्ड और इमर्सिव सिनेमा का है। दर्शक सिर्फ फिल्म देखेंगे नहीं, बल्कि महसूस करेंगे। फर्ज कीजिए थिएटर में एक दृश्य में रेगिस्तान का बैकग्राउंड है। आप इसे लद्दाख की बर्फीली वादियों में देखना चाहते हैं। रिमोट कंट्रोल का बटन दबाते ही दृश्य बदल जाएगा। दृश्य 360 डिग्री घुमाकर किसी भी एंगल से देख सकेंगे। थियेटर में अगर 40 दर्शक हैं तो सब अपनी पसंद के एंगल से फिल्म देख सकेंगे। 8 साल पहले आई हॉलीवुड फिल्म रियल प्लेयर वन में दिखाई विशाल वर्चुअल दुनिया ओएसिस की तरह दर्शक स्पर्श, कंपन, गर्मी, सर्दी, हवा और दूरी का अहसास कर पाएंगे। इसके लिए बॉडी सूट, ग्लव्ज और वीआर हेडसेट पहनने होंगे। यह अभी उपलब्ध 4डी सिनेमा से अलग है, जहां सीट हिलती है, पानी के छींटे पड़ते हैं या खुशबू आती है। इमर्सिव सिनेमा में वर्चुअल एक्शन का असर होगा, जिसमें एवीजीसी एक्सआर (एनिमेशन, विजुअल इफैक्ट, गेमिंग, कॉमिक्स व एक्सटेंडेट रियलिटी) का हर पहलू शामिल है। मुंबई के एनएफडीसी कैंपस स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजी (आईआईसीटी) में एवीजीसी एक्सआर के हर पहलू के लिए आधुनिक लैब व स्टूडियो हैं। सीईओ निनाद रायकर कहते हैं कि डीम्ड यूनिवर्सिटी दर्जे के बाद एनिमेशन, गेमिंग जैसे स्पेशलाइज्ड यूजी-पीजी कोर्स शुरू होंगे। अभी 19 डिप्लोमा-सर्टिफिकेट कोर्स हैं। संस्थान ने करिकुलम, रिसर्च व इनोवेशन के लिए नेटफ्लिक्स, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एपल, मेटा समेत 24 संस्थानों को भागीदार बनाया है। 2030 तक 20 लाख प्रोफेशनल की जरूरत 2030 तक इस इंडस्ट्री को 20 लाख प्रोफेशनल की जरूरत होगी। ऑरेंज इकोनॉमी के लिए बजट में घोषित 15 हजार स्कूलों व 500 कॉलेजों में छात्रों को एनिमेशन, विजुअल इफैक्ट्स जैसे क्षेत्रों में कुशल बनाने के लिए एवीजीसी कंटेंट क्रिएशन लैब का खाका जल्द तैयार होगा। सरकार की योजना एक मॉडल आईआईसीटी विकसित करने के बाद आईआईटी व आईआईएम की तर्ज पर देश में अलग-अलग जगह आईआईसीटी स्थापित करने की है। हॉलीवुड की 60% फिल्मों का प्रोसेस भारत में- सलिल देशपांडे फैकल्टी, आईआईसीटी भारत में भी एवीजीसी एक्सआर सेक्टर के लैब हैं। हॉलीवुड की 60% फिल्मों के कुछ हिस्से और दुनिया की 10% फिल्मों का एवीजीसी एक्सआर जॉब बैकएंड वर्क भारत में होता है। राजामौली जैसे फिल्मकार हैदराबाद की अन्नपूर्णा लैब इस्तेमाल करते हैं। भारत में अभी रोटोमेशन, रोटोस्कॉपिंग, मैचमूव, ट्रैकिंग, क्लीनअप, पेंट, क्राउड सिमुलेशन, लाइटिंग सपोर्ट का काम होता है। भारत बैकएंड पर काम करता है। करीब 80 लाख लोग जुड़े हैं। पर, भारत कॉन्सेप्ट डिजाइन यानी कहानी, कैरेक्टर, क्रिएटिव कंट्रोल, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (आईपी) पर मालिकाना हक नहीं रखता। ऑरेंज इकोनॉमी में हिस्सेदारी बढ़ाने का लाभ बैकएंड से फ्रंटफुट पर जाने में मिलेगा। आईआईसीटी की क्षमता आज ही अवतार जैसी फिल्मों के 40-50 फीसदी निर्माण की है। अभी आईआईसीटी 10 स्टार्टअप को इंक्यूबेट भी कर रही है।
होली से रिश्तों को करें रिचार्ज:होली पर करें ये 4 काम, खुशी के साथ रिश्तों के रंग निखरेंगे; शोध बताते हैं- सकारात्मक यादें मस्तिष्क को सक्रिय रखती हैं

होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है। यह रिश्तों को रिचार्ज करने, दिमाग को सक्रिय रखने और मन को हल्का करने का अवसर है। मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के शोध बताते हैं कि जब हम परिवार और दोस्तों के साथ मिलते हैं, हंसते हैं और सकारात्मक अनुभव साझा करते हैं, तो मस्तिष्क में डोपामाइन, सेरोटोनिन और ऑक्सीटोसिन जैसे ‘फील-गुड’ हार्मोन सक्रिय होते हैं। नियमित सामाजिक जुड़ाव व मानसिक सक्रियता बुजुर्गों में सोचने, याद रखने व तर्क करने की क्षमता में मदद कर सकती है। यानी होली जैसे त्योहार सिर्फ परंपरा नहीं, मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अच्छे होते हैं। इस होली पर जानिए कौन-से 4 काम करें, जिससे खुशियां बढ़ें और सेहत सुरक्षित रहे। 1- अनुभव बांटें: पोता-पोतियों को बताएं तब कैसे बनते थे रंग पोते-पोतियों को बताएं कि आपके समय में टेसू या पलाश के फूलों से रंग कैसे बनते थे। घर की पारंपरिक ठंडाई या पकवान की विधि साझा करें और पुरानी यादें सुनाएं। फायदा: मनोविज्ञान कहता है- नई पीढ़ी के साथ अनुभव साझा करने से मानसिक संतोष बढ़ता है। बुजुर्गों को अपनी भूमिका सार्थक महसूस होती है। अकेलेपन में कमी आती है। 2- सूखी होली खेलें: गुलाल से तिलक लगाएं, भीड़भाड़ से बचें केमिकल वाले रंग व पानी से बचें। सूखा, हर्बल गुलाल ही लगाएं और गले मिलें। भीड़भाड़ से बचें। बीपी, हार्ट डिसीज की समस्या है तो लंबे समय तक खड़े नहीं रहें। फायदा: सामाजिक स्पर्श- गले मिलने, हाथ थामने से ऑक्सीटोसिन रिलीज होता व तनाव हार्मोन (कॉर्टिसोल) कम होता है। इससे मन शांत रहता है और रिश्तों में निखार आता है। 3- खाने में संतुलन रखें: मीठा सीमित, घर की बनी ठंडाई पिएं गुजिया और मिठाई का स्वाद लें, लेकिन मात्रा नियंत्रित रखें। दिनभर मीठा और तला हुआ खाने से बचें। सादा पानी, नारियल पानी या कम-चीनी वाली घर की ठंडाई लें। फायदा: संतुलित खान-पान उत्सव का आनंद देता है। इससे आपका बीपी और शुगर कंट्रोल में रहेगा। वहीं पर्याप्त पानी, घर की बनी ठंडाई शरीर को डिहाइड्रेशन से बचाएगी। 4- पुरानी तस्वीरें देखें, परिवार के साथ यादों को दोहराएं होली खेलने के दौरान अपनी नई तस्वीरें खिंचवाएं। साथ ही अपने पुराने एलबम को निकालकर परिवार के साथ में बैठें और उन तस्वीरों से जुड़े किस्से उन्हें सुनाएं। फायदा: सकारात्मक यादों को दोहराने से मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय होते हैं जो स्मृति और भावनात्मक संतुलन से जुड़े हैं। इससे मूड बेहतर व मानसिक सक्रियता बनी रहती है। अब वे जरूरी बातें, जो होली खेलने के दौरान आपकी सुरक्षा करेंगी कान बचाएं: हल्के रुई के फाहे लगाएं, ताकि रंग कान के पर्दे तक न पहुंचें। हियरिंग एड लगाते हैं तो उसे निकालकर रख दें। नमी और बारीक कण उसे खराब कर सकते हैं। तेल लगाएं: रंग खेलने से 15 मिनट पहले बॉडी पर सरसों या नारियल का तेल लगा लें। यह त्वचा पर एक सुरक्षा परत बना देता है। चश्मा लगाएं: धूप का चश्मा पहनें। यह न केवल यूवी किरणों से बचाता है, बल्कि सूखा गुलाल सीधे आंखों में जाने से भी रोकता है, जिससे आपकी आंखें सुरक्षित रहेंगी।
भारत से प्रशिक्षित हैं कजाकिस्तान की अख्माराल काइनाजारोवा:सेंट्रल एशिया के 5 देशों के 5 हजार से ज्यादा लोगों को भरतनाट्यम सिखाया, कई ने अमेरिका-जापान जैसे देशों में करियर बनाया

ओकसाना ब्रिटेन में भरतनाट्यम कलाकार हैं… उल्मेनाई जापान में… तात्याना, कासिएट और दामिर अमेरिका में भरतनाट्यम के स्टेज शो करते हैं। स्वेतलाना रूस में भरतनाट्यम सिखाती हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों में भारतीय नृत्य और संस्कृति की पहचान बने ये कलाकार न भारतीय हैं और न ही इन्होंने भारत से नृत्य की शिक्षा ली है। इनकी गुरु हैं अख्माराल काइनाजारोवा। भारत से दूर कजाकिस्तान की पूर्व राजधानी अल्माटी में काइनाजारोवा भरतनाट्यम सिखाती हैं। वे भारत में प्रशिक्षित सेंट्रल एशिया में अकेली भरतनाट्यम कलाकार हैं। उन्होंने तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स कलाक्षेत्र से भरतनाट्यम का प्रशिक्षण लिया। काइनाजारोवा इस मायने में सेंट्रल एशिया में भरतनाट्यम ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एंबेसडर हैं कि उन्होंने 20 साल में सेंट्रल एशिया के पांच देशों कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान के 5 हजार से ज्यादा लोगों को भरतनाट्यम सिखाया। इनमें 17 साल से लेकर 70 साल तक के लोग शामिल हैं। वे कहती हैं- ‘सेंट्रल एशिया में लोग भारत से प्यार और यहां की संस्कृति को पसंद करते हैं। यही वजह है कि मेरे पास भरतनाट्यम सीखने कजाकिस्तान से ही नहीं, पड़ोसी देशों से भी लोग आते हैं। मैं 15 छात्रों को कथक भी सीखा रही हूं। मैं दिल्ली में कथक सीख रही थी, लेकिन अपनी डिग्री पूरी नहीं कर सकी। इसलिए सिर्फ उन्हें ही सिखाती हूं जो सिर्फ कथक ही सीखने आते हैं। हमारे देश में भरतनाट्यम से कमाई नहीं हो सकती। इसलिए मेरे सिखाए जिन लोगों ने भरतनाट्यम को करियर बनाया वे अमेरिका, जापान जैसे देशों में चले जाते हैं।’ रवींद्रनाथ टैगोर की फैन थीं दादी, उन्हीं से भारत को जाना काइनाजारोवा कहती हैं- मेरी दादी रवींद्रनाथ टैगोर की किताबों की फैन थीं। उनकी ही किताबों से मैं भारत के बारे में जान पाई। जब देश आजाद हुआ और हमारे यहां भारतीय दूतावास खुला तो मैंने वहां जाकर कहा कि मुझे भरतनाट्यम सीखना है। इसके बाद मेरे लिए रास्ते खुले और मैं भारत आ गई। यहां मैं चेन्नई, मुंबई और दिल्ली में रही। मेरी बेटी ने यहीं तमिल सीखी। हमने भारतीय संस्कृति को जीया। आईसीसीआर फेलो होने वाली पहली कजाक नागरिक हैं 1991 में कजाकिस्तान की आजादी के बाद काइनाजारोवा वह पहली शख्स हैं, जिन्हें आईसीसीआर की फेलोशिप मिली। इस फेलोशिप पर वे भरतनाट्यम सीखने भारत आईं। उन्होंने यहां योग भी सीखा। वे 200 से ज्यादा लोगों को योग सीखा रही हैं। भारत आने के बाद वे शाकाहारी हो गईं। वे बताती हैं कि हमारे देश में जहां तापमान -20 से -50 डिग्री तक जाता है। शाकाहारी होना बहुत मुश्किल है। जब वे चेन्नई से भरतनाट्यम सीख रहीं थीं तब उनकी बेटी ने वहां तमिल भी सीख लिया था।
मंदसौर ब्लड बैंक में घोटाला:35 डॉक्टर-26 कर्मचारियों को प्रोत्साहन की आड़ में बांट दिए 43.91 लाख रुपए

मंदसौर जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में 35 डॉक्टर और 26 कर्मचारियों ने प्रोत्साहन के नाम पर 43.91 लाख रुपए की बंदरबांट कर ली। निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को जरूरत पर ब्लड बैंक से खून के बदले 1050 रुपए और डोनर देना अनिवार्य है। नियमानुसार पूरी राशि रोकस में जमा होनी चाहिए लेकिन यहां 750 रु. ही जमा कर बाकी 300 रु. प्रति यूनिट “प्रोत्साहन” बताकर आपस में बांट रहे थे जबकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। भास्कर पड़ताल में सामने आया कि अप्रैल 2016 से जनवरी 2025 तक यह खेल चला। इस दौरान 14,639 यूनिट रक्त के बदले 1.53 करोड़ रुपए प्राप्त हुए। इनमें से 43.91 लाख रुपए का बंटवारा कर लिया। इसमें तत्कालीन दो सिविल सर्जन डॉ. एके मिश्रा और डॉ. डीके शर्मा भी पीछे नहीं रहे। दोनों ने बेटे-बेटी के खातों में कुल 13.70 लाख रुपए का भुगतान करवाया। इस तरह शुरू हुआ खेल- इस बंदरबाट के लिए 2016 में ब्लड बैंक के तत्कालीन प्रभारी डॉ. सौरभ मंडवारिया ने प्रस्ताव बनाया। फिर तत्कालीन सीएस डॉ. एके मिश्रा ने नोटशीट तैयार की। इसमें एड्स कंट्रोल के 12 फरवरी 2014 के पत्र क्रमांक 12016/01/2012 का हवाला देकर तत्कालीन कलेक्टर स्वतंत्र कुमार सिंह को भ्रमित कर वेतन मद बताकर मंजूरी ली गई। इसके तहत ब्लड बैंक प्रभारी को 150, टेक्नीशियन को 100 व असिस्टेंट को 50 रुपए दिए जाने लगे। मामला उजागर होते ही यह राशि लेना बंद कर दिया। तत्कालीन कलेक्टर को भ्रमित कर मंजूरी ली, अब फंसे तो रोक लगाई यह किया- कलेक्टर को भ्रमित कर मंजूरी ली। बेटी डॉ. नोमिता को प्रभारी बनाकर 1.17 लाख का भुगतान किया। जबकि डॉ. एके मिश्रा तत्कालीन सीएस ब्लड बैंक के प्रस्ताव की जांच करनी थी। कलेक्टर को दी नोटशीट में पूरी राशि रोगी कल्याण समिति को देने का उल्लेख करना था। अब बोले- ब्लड बैंक से ही प्रस्ताव आते हैं। इसके बाद अनुमोदन होता है। जांच में यदि गलत माना है तो संबंधितों को सही रिप्रेजेंट करना था। यह किया- इन्होंने अपने कार्यकाल में बेटे डॉ. सौरभ को ब्लड बैंक इंचार्ज बनाया। 12.52 लाख का भुगतान किया। जबकि खून डॉ. डीके शर्मा पूर्व सीएस के बदले मिलने वाली राशि से अतिरिक्त स्टाफ रखकर व्यवस्थाएं बेहतरीन कर इस बंदरबाट को रोकना था। अब बोले- तत्कालीन सीएस व डॉ. मंडवारिया ने ही स्वीकृति कराई। ब्लड बैंक ने रोकस को राशि कमाकर दी और उसमें से प्रोत्साहन राशि ली। डॉक्टर-टेक्नीशियन बोले- हमें नियम की जानकारी नहीं निजी चिकित्सकों की मांग के बाद प्रस्ताव भेजा था। राशि फिक्स नहीं होने से नए व्यक्ति नहीं रखकर मौजूद कर्मचारियों को ही अनुमोदन के बाद यह राशि दी गई। -डॉ. सौरभ मंडवारिया, तत्कालीन व वर्तमान ब्लड बैंक प्रभारी वेतन प्राप्त करने वाले कर्मचारियों को प्रोत्साहन राशि लेने का कोई प्रावधान नहीं है। इस राशि से अन्य कर्मचारी रखकर सुविधा और बेहतर बनाई जा सकती थी। वरिष्ठ स्तर पर निर्देश के बाद रिकवरी संबंधी प्रक्रिया भी कराई जाएगी। डॉ. जीएस चौहान, सीएमएचओ, मंदसौर व्यवस्था बदल रहे हैं संबंधितों पर कार्रवाई प्रस्तावित की है। आगे इस तरह की स्थिति नहीं बने, इसके लिए बनाई गई व्यवस्था को ही बदला जा रहा है। -अदिति गर्ग, कलेक्टर मंदसौर
1970 film ‘Aranyer Din Ratri’ in news again in New York

द न्यूयॉर्क टाइम्स8 घंटे पहले कॉपी लिंक फिल्म की शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई थी, जिसे रे ने अपनी जादुई दृष्टि से ‘मोहक जादुई जंगल’ जैसा बना दिया था। अमेरिका में 1970 की बंगाली फिल्म ‘अरण्येर दिन रात्रि’ को डिजिटल अवतार में री-लॉन्च किया गया है। मशहूर फिल्म निर्माता सत्यजित रे की इस फिल्म को नए 4के रूप में मैनहैटन के प्रसिद्ध आर्ट‑हाउस सिनेमाघर फिल्म फोरम में दो हफ्ते के लिए दोबारा दिखाया जा रहा है। पुरानी फिल्मों को संरक्षित करने वाली संस्था ‘द फिल्म फाउंडेशन’, फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और जानस फिल्म्स ने मिलकर इसे नए रूप में सजाया-संवारा है। इसे पिछले साल न्यूयॉर्क फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया था और अब आम दर्शकों के लिए यह खुला है। कोलकाता के शहरी माहौल में रहे चार दोस्तों की मस्ती के पीछे छिपी पुरुष सत्ता और जातिगत अहंकार की कहानी पर आधारित अरण्येर दिन रात्रि 1970 में जितनी प्रासंगिक थी, आज भी उतनी ही सटीक है। फिल्म में कोलकाता (तब कलकत्ता) के उच्च जाति के पढ़े‑लिखे, अंग्रेजी बोलने वाले अविवाहित युवकों- अशीम, संजय, हरी और शेखर की कहानी है, जो शहर के शोर से दूर झारखंड में पलामू के जंगलों की यात्रा पर जाते हैं। यहां उनका सामना संथाल इलाके में आदिवासी समाज और गांवों से होता है। वे बिना बुकिंग सरकारी गेस्ट हाउस पर पहुंचकर चौकीदार को घूस देकर कमरे हथिया लेते हैं और हंसी उड़ाते हुए अंग्रेजी में कहते हैं- ‘भ्रष्टाचार के लिए ईश्वर को धन्यवाद।’ हॉलीवुड फिल्म समीक्षक जे. होबरमैन कहते हैं, ‘यह फिल्म केवल एक यात्रा की कहानी नहीं है, बल्कि यह बंगाल के मध्यम वर्ग का एक ऐसा चित्रण है, जो अपनी सुविधाओं के खोल में कैद है। इसका नया संस्करण आज की पीढ़ी को यह समझने में मदद करेगा कि क्यों सत्यजीत रे को विश्व सिनेमा का जादुई चितेरा कहा जाता है।’ ‘अरण्येर दिनरात्रि’ को 1970 में बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में ‘गोल्डन बियर’ के लिए नामांकित किया गया था। इस फिल्म की शूटिंग झारखंड के जंगलों में हुई थी, जिसे रे ने अपनी जादुई दृष्टि से ‘मोहक जादुई जंगल’ जैसा बना दिया था। नई चमक के साथ पर्दे पर लौटी, आज भी जादू बरकरार री‑रिलीज के साथ एक तरह से सवाल भी लौट आया है- क्या भारतीय सिनेमा ने आज तक रे की इस फिल्म की तरह ईमानदारी से अपने ‘कन्फर्टेबल’ मध्य वर्ग, मर्दाना हठधर्मिता और आदिवासी समुदायों के प्रति नजरिये को स्क्रीन पर पूरी शिद्दत से रखा है? न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलिस और अन्य शहरों के शो के बाहर युवा दर्शक जिस तरह फिल्म की पॉलिटिक्स और जेंडर पर चर्चा करते दिख रहे हैं, वे बताते हैं कि 1970 की यह यात्रा सिर्फ चार दोस्तों की पिकनिक नहीं, हमारी सामाजिक स्मृति की भी एक जरूरी वापसी है। नई चमक के साथ लौटी इस क्लासिकल फिल्म का जादू 56 साल बाद भी कायम है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
‘स्टारड्यू वैली’ के 10 साल में 5 करोड़ ग्राहक:कॉर्पोरेट बर्नआउट का मरहम बना यह गेम, हॉलीवुड सेलिब्रिटी भी इसके दीवाने; पोकेमॉन-कॉल ऑफ ड्यूटी जैसे फ्रेंचाइजी गेम पीछे छूटे

कल्पना कीजिए आप अपनी थका देने वाली कॉर्पोरेट नौकरी और फाइलों के अंबार को हमेशा के लिए पीछे छोड़ देते हैं। आपके हाथ में दादाजी की विरासत में मिला छोटा सा घर है। चारों ओर हरी-भरी जमीन, मुट्ठी भर बीज और एक शांत सा कस्बा। यहां आप सिर्फ फसलें नहीं उगाते, बल्कि उन रिश्तों और सुकून को दोबारा सींचते हैं जो आधुनिक भागदौड़ में कहीं खो गए थे। यह ‘स्टारड्यू वैली’ की जादुई दुनिया है। इस गेम ने बीते 10 साल में सफलता की नई इबारत लिखी है। अब तक लगभग 5 करोड़ गेम बिक चुके हैं, जहां पोकेमॉन और कॉल ऑफ ड्यूटी जैसी अरबों डॉलर की फ्रेंचाइजी वाले गेम फीके नजर आते हैं। इसकी सफलता की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी है। इसे किसी विशाल स्टूडियो या सैकड़ों डेवलपर्स की टीम ने नहीं बनाया। इसे बनाने वाले एरिक बैरोन हैं, जिन्हें गेमिंग जगत ‘कंसर्न्डएप’ के नाम से जानता है। कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई के बाद बिना किसी पेशेवर अनुभव के बैरोन ने 2016 में इसे रिलीज किया। पहला वर्जन जारी करने में 5 साल लगे क्योंकि वे अकेले ही कोडिंग, आर्ट और म्यूजिक पर काम कर रहे थे। शुरुआत में यह प्रोजेक्ट उनके पोर्टफोलियो के लिए था, ताकि उन्हें गेम इंडस्ट्री में नौकरी मिल सके, लेकिन यह गेम इतना सफल हुआ कि उन्हें नौकरी की जरूरत ही नहीं पड़ी। सिएटल के एक छोटे से कार्यालय से काम करने वाले बैरोन कहते हैं, “यह सफलता मेरी कल्पना से परे थी। मैंने सोचा था कि यह एक बहुत ही छोटे बाजार तक ही सीमित रहेगा।” लेकिन पिक्सल के उन छोटे खानों में छिपे सुकून ने दुनिया भर के करोड़ों लोगों का दिल जीत लिया। कैट डेनिंग्स और बॉबी ली जैसे सितारों ने इस गेम के प्रति अपना जुनून साझा किया है। कैट डेनिंग्स का मानना है कि गेम की वजह से उनकी असल जिंदगी में बागवानी की आदत पड़ी। यह गेम केवल एक ‘फार्मिंग सिमुलेटर’ नहीं है। ‘पेलिकन टाउन’ नामक इसके काल्पनिक कस्बे में हर किरदार की अपनी गहराई है। यहां खिलाड़ी को टूटे हुए रिश्तों, अवसाद, युद्ध की मानसिक पीड़ा और शराब की लत जैसे गंभीर मानवीय पहलुओं का सामना करना पड़ता है। खिलाड़ी चाहे तो केवल खेती करे, या कस्बे को ‘कॉर्पोरेट पूंजीवाद’ की पकड़ से बचाने के मिशन पर निकल पड़े। लाखों खिलाड़ियों के लिए यह गेम ‘डिजिटल थेरेपी’ बन गया है। डिजिटल खेतों से 7000 करोड़ का कारोबार, ऑर्केस्ट्रा टूर भी स्टारड्यू वैली की अब तक 5 करोड़ कॉपी बिक चुकी है। इसका अनुमानित राजस्व करीब 7276.24 करोड़ हो सकता है। यह किसी एक व्यक्ति द्वारा बनाया गया शायद अब तक का सबसे लाभदायक बौद्धिक संपदा (आईपी) है। इसकी सफलता केवल गेम तक सीमित नहीं रही; इसने एक कुकबुक, बोर्ड गेम और दो वैश्विक ‘ऑर्केस्ट्रा टूर’ को भी जन्म दिया है, जहां 35 सदस्यीय बैंड इसके संगीत पर हजारों दर्शकों के सामने प्रस्तुति देता है।
वुमन ऑफ द ईयर प्रोजेक्ट-2026 में 3 भारतीय महिलाएं:सफीना ने 20लाख बेटियों को स्कूल लौटाया, 14 देशों को मुफ्त दवा दिलवा रहीं रेशमा; 7.5 लाख छात्राओं को सशक्त कर रहीं सौजानी

टाइम मैगजीन ने 2026 के वुमन ऑफ द ईयर प्रोजेक्ट के लिए 16 महिलाओं को चुना है। लिस्ट में भारतीय और भारतीय मूल की तीन महिलाएं भी हैं। ये सभी लीडर्स ज्यादा बराबरी वाली दुनिया बनाने के लिए काम कर रही हैं। साथ ही महिलाओं और लड़कियों की सबसे बड़ी चुनौतियां हल करने में जुटी हैं। यह प्रोजेक्ट टाइम के सालाना वुमन ऑफ द ईयर लिस्ट से अलग है। इसे 2020 में शुरू किया गया था। कवर पर हॉलीवुड अभिनेत्री टेयाना टेलर हैं। फिल्म ‘वन बैटल आफ्टर अनादर’ में उनका प्रदर्शन उम्दा रहा है। कुछ अनदेखे चेहरे जैसे- सिएरा लियोन के पहले मातृत्व केंद्र की अगुआई करने वाली इसाता डुम्बुया, अमेरिका-मैक्सिको बॉर्डर पर ह्यूमैनिटेरियन अभियान चला रही सिस्टर नॉरमा पिमेंटेल भी हैं। पढ़िए चुनिंदा लीडर्स का प्रेरक सफर… सफीना हुसैन- पढ़ाई अधूरी रही, इसी टीस को ताकत बनाया, जीता ‘एशिया का नोबेल’ बचपन गरीबी, हिंसा व अधूरी पढ़ाई के दर्द से गुजरा। इसी टीस को ताकत बनाया और मुंबई में ‘एजुकेट गर्ल्स’ की नींव रखी। वे कहती हैं,‘मैं जानती हूं पीछे छूट जाना कैसा लगता है। बीते साल संस्था ने भारत के गांवों की 20 लाख लड़कियों को स्कूल लौटाने में सफलता हासिल की। लक्ष्य 15 लाख ही था। इसके लिए संस्था को रैमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। उनका एनजीओ यह सम्मान पाने वाला पहला संगठन बना। हाल में आई उनकी किताब ‘एवरी लास्ट गर्ल’ में अंतिमबाला का किरदार हर उस लड़की का प्रतीक है, जिसकी आवाज अनसुनी कर दी गई। ‘कोई भी लड़की बकरी चराना या बाल वधू बनना नहीं चाहती, हर लड़की… बस स्कूल जाना चाहती है’- सफीना रेशमा केवलरमानी – सिकल सेल का इलाज खोजा, अब डायबिटीज को हराने में जुटीं ठान चुकी हैं, लाइलाज बीमारियों को जड़ से मिटाना है। किडनी डॉक्टर से शुरू हुआ सफर आज दुनिया की दिग्गज बायोटेक कंपनी (वर्टेक्स) की पहली महिला सीईओ बनने तक जा पहुंचा है। उनके नेतृत्व में वर्टेक्स भारत समेत दुनिया के 14 देशों में ‘सिस्टिक फाइब्रोसिस’ (फेफड़ों की बीमारी) की महंगी दवाएं मुफ्त उपलब्ध करा रही है। रेशमा के नेतृत्व में कंपनी ने सिकल सेल बीमारी के लिए क्रिस्पर आधारित पहली जीन-एडिटिंग थेरेपी लॉन्च की। अब डायबिटीज और किडनी रोगों को पूरी तरह खत्म करने वाली थेरेपी पर काम कर रही हैं। ‘दवाओं का असली मकसद सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि इंसान को मौत के मुंह से खींच लाना है’- रेशमा रेशमा सौजानी – अमेरिकी माताओं की आवाज, चाइल्डकेयर अभियान का चेहरा शरणार्थी की बेटी और पहली भारतीय-अमेरिकी कांग्रेस प्रत्याशी ने साहस से सत्ता को झकझोरा। इससे अमेरिका में माताओं के लिए सस्ते चाइल्डकेयर और न्यूयॉर्क में ‘यूनिवर्सल केयर’ का रास्ता खुला। अपनी संस्थाओं ‘मॉम्स फर्स्ट’ व ‘गर्ल्स हू कोड’ के जरिए 7.6 लाख छात्राओं को सशक्त कर रही हैं। हम बेटियों को ‘परफेक्ट’ बनाना चाहते हैं, जबकि बेटों को ‘बहादुर’। समाज में असली समानता तब आएगी जब हम महिलाओं को अपनी गलतियों पर शर्मिंदा होना नहीं, बल्कि अपनी बहादुरी पर गर्व करना सिखाएंगे।’ ‘असली ताकत ‘जीतने’ में नहीं, बल्कि ‘हारने के बाद भी दोबारा खड़े होने के साहस’ में है’- रेशमा सौजानी









