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87% पुरुष ज्यादा कमाने वाली से भी शादी को तैयार:शादी को लेकर बदल रही सोच, 27 के बजाय 29 की उम्र में पार्टनर चाहते हैं लोग

87% पुरुष ज्यादा कमाने वाली से भी शादी को तैयार:शादी को लेकर बदल रही सोच, 27 के बजाय 29 की उम्र में पार्टनर चाहते हैं लोग

देश में शादी को लेकर सोच बदल रही है। जीवनसाथी की रिपोर्ट ‘द बिग शिफ्ट: हाउ इंडिया इज रीराइटिंग द रूल्स ऑफ पार्टनर सर्च एंड मैरिज’ के मुताबिक, अब युवा उम्र या आर्थिक मजबूती से ज्यादा ‘सही पार्टनर’ चाहते हैं। 50% यूजर्स 29 साल की उम्र में पार्टनर सर्च शुरू कर रहे हैं। यह अध्ययन 2016-25 के डेटा पर आधारित है, जिसमें 30 हजार से ज्यादा लोग शामिल हुए। फैसले… 77% प्रोफाइल युवा खुद संभाल रहे, शादियों में पेरेंट्स का दखल 10% कम -77% प्रोफाइल अब युवा खुद मैनेज कर रहे। (पहले से 10% ज्यादा) -33% से घटकर 23% रह गया है माता-पिता का कंट्रोल। (पहले से 10% कम) -90% यूजर्स के लिए ‘सैलरी’ से ज्यादा ‘सही पार्टनर’ होना जरूरी। (शादी की औसत उम्र 27 से बढ़कर अब 29 साल हुई। (+2) समाज… जाति की दीवारें ढहीं, अब 54% ही जाति को लेकर सख्त, पहले 91 फीसदी थी -54% रह गई है सख्त जाति प्राथमिकता, यह पहले 91% थी। (-37%) -49% लोग ही जाति को अहमियत दे रहे हैं बड़े शहरों में। -16% हुए दूसरी शादी चाहने वाले पहले ये 11% था। (43% की बढ़ोतरी)। (15% कुंवारे यूजर्स अब तलाकशुदा पार्टनर अपनाने को तैयार हैं।) नजरिया… 87 फीसदी पुरुषों को अब ज्यादा कमाने वाली पत्नी से कोई आपत्ति नहीं -87% पुरुष खुद से ज्यादा कमाने वाली महिला से शादी को तैयार। -92% लोग चाहते हैं कि पति-पत्नी दोनों कमाएं, सिर्फ 8% ‘सिंगल अर्नर’ के पक्ष में। -78% यूजर्स अगले 6 महीने के भीतर ही शादी करना चाहते हैं। (15% महिलाएं अब खुद से कम कमाने वाले पति को चुन रही हैं।)

महज एक सैलरी काफी नहीं:नौकरी के साथ युवा मनपसंद काम कर बना रहे अपनी पहचान, 57% पार्ट टाइम जॉब भी कर रहे

महज एक सैलरी काफी नहीं:नौकरी के साथ युवा मनपसंद काम कर बना रहे अपनी पहचान, 57% पार्ट टाइम जॉब भी कर रहे

दुनियाभर के युवाओं खासकर ‘जेन जी’ में करियर को लेकर बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। अब युवा केवल एक नौकरी के भरोसे रहने के बजाय अपनी कमाई और शौक के लिए ‘दूसरे रास्ते’ तलाश रहे हैं। अमेरिका में हुए सर्वे (हैरिस पोल) के अनुसार जहां 57% युवा पार्ट टाइम जॉब, फ्रीलांसिंग या साइड हसल (जैसे पॉडकास्ट, कंटेंट क्रिएशन या इलस्ट्रेशन) कर रहे हैं, ताकि उन्हें आर्थिक स्थिरता के साथ अपने सपनों को जीने की आजादी भी मिल सके। न्यूयॉर्क में इंजीनियर भारतीय मूल की आशना दोषी नौकरी के साथ पॉडकास्ट और सोशल मीडिया के लिए वीडियो बनाती हैं। यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जहां युवा मुख्य नौकरी के अलावा असली पहचान अपने जुनून वाले कामों से बना रहे हैं। ट्रेंड: ‘कई हुनर-कई कमाई’ का फॉर्मूला अपना रहे युवा आशना जैसी युवा प्रोफेशनल्स के लिए यह अतिरिक्त काम एक ‘सुरक्षा कवच’ की तरह है। टेक सेक्टर में बढ़ती छंटनी और एआई के कारण अनिश्चितता ने जेन-जी को डरा दिया है। उन्हें लगता है कि आज नौकरी है, शायद कल न रहे; ऐसे में खुद का कोई काम उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि युवा अलग-अलग प्रोजेक्ट्स के जरिए अपना ‘फ्यूचर पोर्टफोलियो’ तैयार कर रहे हैं। इससे न केवल आमदनी बढ़ती है, बल्कि मानसिक सुकून भी मिलता है। निजी काम आजादी और रचनात्मकता ज्यादा देता है न्यूयॉर्क की सेन हो ड्यूटी के बाद डिजिटल पेंटिंग और ग्राफिक्स का काम करते हैं। वे दिन में स्टोर की नौकरी और रात में अपने हुनर को क्लाइंट्स तक पहुंचाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य में कंपनियां केवल वेतन पर युवाओं को नहीं रोक पाएंगी, उन्हें काम में लचीलापन देना ही होगा।

AI क्रांतिः तैयार सॉफ्टवेयर का दौर खत्म:भारतीय आईटी इंडस्ट्री के अरबों डॉलर बिजनेस मॉडल को बदल रहे, डेटा और एआई एजेंट का जमाना

AI क्रांतिः तैयार सॉफ्टवेयर का दौर खत्म:भारतीय आईटी इंडस्ट्री के अरबों डॉलर बिजनेस मॉडल को बदल रहे, डेटा और एआई एजेंट का जमाना

ग्लोबल टेक इंडस्ट्री एक निर्णायक मोड़ पर हैं, जहां पुराने अरबों डॉलर के बिजनेस मॉडल तेजी से ध्वस्त हो रहे हैं। क्लाउड, एआई और ऑटोमेशन ने पारंपरिक आईटी सर्विसेज, महंगे सॉफ्टवेयर लाइसेंस और लंबी अवधि के मेंटेनेंस कॉन्ट्रैक्ट्स को चुनौती दी है। अब कोडिंग, टेस्टिंग और सपोर्ट जैसे काम एआई टूल्स के जरिए तेजी से और कम लागत में किए जा रहे हैं। इससे आईटी कंपनियों के राजस्व पर दबाव पड़ रहा है। टेक जगत में इस बदलाव को सासपोकैलिप्स कहा जा रहा है, जो पारंपरिक सॉफ्टवेयर-एज-अ-सर्विस कंपनियों के लिए किसी प्रलय से कम नहीं है। इसकी दहशत में भारत समेत दुनियाभर के आईटी कंपनियों के शेयर टूट रहे हैं। भारत में एक माह में आईटी इंडेक्स 14% से अधिक टूट चुका है, जो हालिया वर्षों में सबसे बड़ी गिरावट है। खास बात यह है कि इसकी अगुवाई भारतीय मूल के दिग्गज कर रहे हैं। जानते हैं ऐसे कुछ मार्केट लीडर्स के बारे में राहुल पाटील: 11 विभागों का काम एआई करेगा; आईटी के शेयर गिरे एन्थ्रोपिक में चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर राहुल पाटील ने एआई मॉडल क्लाउड को चैटबॉट से आगे बढ़ाकर एक ऑटोनॉमस एआई वर्कफ्लो टूल क्लाउड कोवर्क में बदल दिया। इसमें 11 ऐसे प्लग-इन हैं जो अलग-अलग विभागों (लीगल, सेल्स, मार्केटिंग, डेटा आदि) के काम कर सकते हैं। इसकी लॉन्चिंग के बाद वैश्विक शेयर बाजारों में सॉफ्टवेयर और आईटी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई। राहुल ने कंप्यूटर साइंस में बीई बेंगलुरु से किया। अमेरिका की एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी से कम्प्यूटर साइंस में मास्टर किया। राहुल पाटील इससे पहले ओरेकल क्लाउड, अमेजन बेव सर्विसेज, स्ट्राइप और माइक्रोसॉफ्ट में अहम ओहदों पर रह चुके हैं। श्रीधर रामास्वामी: डेटा सॉल्यूशंस से सेल्सफोर्स, ओरेकल को कड़ी चुनौती स्नोफ्लेक सीईओ श्रीधर रामास्वामी के नेतृत्व में कंपनियों को अलग-अलग स्रोतों (एप्स, वेबसाइट) से डेटा जोड़ने, स्टोर करने और उसी डेटा पर एप्लिकेशन बनाने की सुविधा देता है। कंपनियां अब तैयार सॉफ्टवेयर (जैसे पारंपरिक सीआरएम) खरीदने के बजाय डेटा पर आधारित कस्टम सॉल्यूशंस बना रही हैं। स्नोफ्लेक का मॉडल एमेजन एडब्ल्यूएस, माइक्रोसॉफ्ट एज्योर व गूगल क्लाउड तीनों पर काम करता है। इससे सेल्सफोर्स, ओरेकल जैसे एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर दिग्गज कंपनियों को चुनौती मिली है। रामास्वामी आईआईटी मद्रास से बीटेक और अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी से पीएचडी हैं। गूगल में लंबे समय तक सीनियर वीपी रहे। 2024 में स्नोफ्लेक के सीईओ बनें। अरविंद कृष्णा: डेटा सुरक्षा के साथ कस्टम मॉडल बनाने की सुविधा दी आईबीएम सीईओ अरविंद कृष्णा कंपनी को पारंपरिक हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर दिग्गज से एआई और हाइब्रिड क्लाउड-फोकस्ड टेक कंपनी में बदल रहे हैं। वॉटसनएक्स प्लेटफॉर्म एंटरप्राइज एआई टूल्स का व्यापक इकोसिस्टम है। ये कंपनियों को एआई मॉडल बनाने, ट्रेन करने और सुरक्षित तरीके से लागू करने की सुविधा देता है। क्या बदलाव आया? मैनुअल कोडिंग, लंबी डेवलपमेंट प्रक्रिया कम हो रही है। कंपनियां अपने डेटा पर कस्टम एआई मॉडल तैयार कर सकती हैं। बैंकिंग, हेल्थकेयर, सरकारी संस्थान सुरक्षित तरीके से एआई अपना सकते हैं। कृष्णा ने आईआईटी कानपुर से इंजीनियरिंग व यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय से पीएचडी। 1990 में आईबीएम से जुड़े। 2020 में सीईओ बने। रेवती अद्वैती: इंटीग्रेटेड सॉल्यूशंस से सॉफ्टवेयर कंपनियों को कड़ी चुनौती फ्लेक्स की सीईओ रेवती अद्वैती मैन्युफैक्चरिंग कंपनी को पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण से आगे बढ़ाकर इंटेलिजेंट टेक्नोलॉजी सॉल्यूशन प्रोवाइडर में बदल रही हैं। इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन सिस्टम, हेल्थकेयर उपकरण जैसे प्रोडक्ट में सॉफ्टवेयर और एआई क्षमताएं जोड़ी जा रही हैं, जिससे डिवाइस खुद डेटा प्रोसेस कर सके। निर्णय लेने में सक्षम हो। क्या बदलाव आया? स्टैंडअलोन सॉफ्टवेयर कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती। ग्राहक अलग-अलग समाधान खरीदने के बजाय इंटीग्रेटेड एंड-टू-एंड सिस्टम को प्राथमिकता दे रहे हैं। रेवती ने बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग और अमेरिका के थंडरबर्ड स्कूल से एमबीए किया। हनीवेल में सीनियर नेतृत्व भूमिकाओं के बाद 2019 में फ्लेक्स की सीईओ बनीं।

32 की उम्र तक परिपक्व हो पाता है दिमाग:दबाव से 18-34 साल के 33% युवा आत्मनिर्भर नहीं हो पाते; बच्चों के बॉस नहीं, दोस्त बनें पेरेंट्स

32 की उम्र तक परिपक्व हो पाता है दिमाग:दबाव से 18-34 साल के 33% युवा आत्मनिर्भर नहीं हो पाते; बच्चों के बॉस नहीं, दोस्त बनें पेरेंट्स

18 की उम्र में युवा बालिग हो जाता है, लेकिन कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की रिसर्च बताती है कि इंसानी दिमाग की किशोर अवस्था 32 साल तक रहती है। यानी 18-25 की उम्र में परिपक्वता पूरी नहीं होती। यह समय बच्चों के लिए चुनौती और अवसर दोनों होता है। ब्रिटेन की साइकोथेरेपिस्ट जूलिया सैमुअल के अनुसार, आज के दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच टकराव का सबसे बड़ा कारण यही है कि पेरेंट्स 18 के बाद भी बच्चों पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। रिसर्च के मुताबिक ज्यादा दखल देने वाले पेरेंट्स के बच्चों में आत्मविश्वास की कमी होती है और वे अपनी पहचान नहीं बना पाते। महंगे रहन-सहन और बदलते करियर के कारण आज 18-34 साल के 33% युवा आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं और माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। ऐसे में पेरेंट्स को बॉस के बजाय दोस्त की भूमिका निभानी चाहिए। रिश्ता: हर वक्त माता-पिता की निगरानी से घटता है बच्चों का आत्मविश्वास कई माता-पिता अक्सर ‘हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग’ (हर वक्त निगरानी) का शिकार हो जाते हैं, जिससे बच्चों का आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जब बच्चा होस्टल से स्कूलिंग-कॉलेज कर वयस्क होकर घर लौटे, तो उससे घर के खर्चों, कामकाज और प्राइवेसी पर खुलकर बात करें। उन्हें किशोर के बजाय वयस्क की तरह ट्रीट करें। अगर आप उनके हर फैसले खुद लेंगे, तो वे कभी जिम्मेदार नहीं बन पाएंगे। याद रखें, एक मां या पिता का असली काम बच्चे को अपने ऊपर निर्भर बनाना नहीं, बल्कि उसे इस काबिल बनाना है कि वह खुद अपनी राह चुन सके। आपसी मतभेद होने पर बहस जीतने के बजाय उनके नजरिए को समझना रिश्ते को टूटने से बचाता है। आपसी समझ ही सुखी परिवार का असली राज रिश्तों में जरूरत से ज्यादा निर्भरता अक्सर गलत मानी जाती है, लेकिन एक्सपर्ट नेड्रा तवाब के अनुसार हर निर्भरता खराब नहीं होती। वे इसे ‘हेल्दी डिपेंडेंसी’ कहती हैं। तवाब का मानना है कि अकेले रहकर हम अपनी पसंद समझना या अपनी बात मजबूती से रखना जैसे गुण नहीं सीख सकते। ये अनुभव केवल रिश्तों के साथ ही मुमकिन हैं। उनके मुताबिक, हर रिश्ता गणित के 50-50 नियम पर नहीं चलता।

खो रहा कागज पर लिखने का हुनर:एक्सपर्ट का मत- तेज रफ्तार जिंदगी में ठहराव-अपनापन लाता है हाथों से लिखना

खो रहा कागज पर लिखने का हुनर:एक्सपर्ट का मत- तेज रफ्तार जिंदगी में ठहराव-अपनापन लाता है हाथों से लिखना

आज की डिजिटल दुनिया में, जहां हमारे इनबॉक्स ई-मेल से भरे पड़े हैं और एआई तेजी से संदेश लिख रहा है, वहां पेन उठाकर कागज पर कुछ लिखना ‘खोया हुआ हुनर’ बन रहा है। इस तकनीकी क्रांति के बीच, हम सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि उन शब्दों के साथ मिलने वाले गहरे भावनात्मक और शारीरिक फायदों को भी खो रहे हैं। सेंटर फॉर जर्नल थेरेपी की डायरेक्टर कैथलीन एडम्स कहती हैं,‘जब आप हाथ से पत्र लिखते हैं, तो सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि अपना समय और भावनाएं भी भेजते हैं। यह ‘आत्मीय और सचेत विकल्प’ है। जब आप किसी खास व्यक्ति को स्नेह या प्रशंसा जैसे सकारात्मक विचारों के बारे में लिखते हैं, तो यह हमारे मस्तिष्क को ‘फील-गुड’ न्यूरोट्रांसमीटर से भर देता है और हमारे जुड़ाव, सहानुभूति और कृतज्ञता की भावना को सक्रिय करता है।’ मनोवैज्ञानिक रेबेका स्वेंसन कहती हैं,‘आप खुद का एक हिस्सा किसी और को दे रहे होते हैं। अपने विचारों या भावनाओं को कलमबद्ध करना हमारे लिए और पाने वाले व्यक्ति के लिए बहुत सुकून देने वाला होता है।’ रेबेका के मुताबिक भावनाओं को लिखकर व्यक्त करना शरीर पर भी असर डालता है। इससे इंफ्लेमेशन कम होती है, ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट घटता है। साथ ही डिप्रेशन और एंग्जायटी का स्तर भी घटता है। इससे व्यक्ति को मानसिक रूप से बेहतर महसूस होता है। शब्दों के अपनेपन को फिर से महसूस करें लेखिका लिंडसे रोथ कहती हैं,‘खास कागज, स्याही या पेन का इस्तेमाल करना भी एक यादगार अनुभव बन सकता है। जब हम किसी को सुंदर स्टेशनरी पर चिट्ठी लिखते हैं, तो वह उसे लंबे समय तक संभालकर रखता है। यह एक तरह की रस्म बन जाती है, जो आज की तेज रफ्तार जिंदगी में ठहराव और अपनापन लाता है। लिंडसे कहती हैं, ई-मेल में मेहनत नहीं लगती, हाथ से लिखे शब्द बताते हैं कि आप वास्तव में परवाह करते हैं।’ तो आइए… इस डिजिटल शोर में, पेन उठाएं और शब्दों के अपनेपन को फिर महसूस करें।’ कैफे दे रहा खुद को चिट्ठी लिखने का मौका लिखना शुरू करने वालों के लिए कई तरह के प्रयोग हो रहे हैं। जैसे लुई वितों की ‘क्लेमेंस नोटबुक’ या एस्पिनल ऑफ लंदन की ‘रिफिलेबल लग्जरी जर्नल’ जैसी डायरी में विचार लिखना खास अनुभव बनता है। लंदन के स्टेशनरी स्टोर ‘चूजिंग कीपिंग’ में 120 से ज्यादा फाउंटेन पेन हैं। इनमें ‘एमराल्ड वाजिमा’ व ‘स्काई एंड क्लाउड्स’ डिजाइन वाले पेन लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। पेरिस के ‘कैफे प्ली’ में चिट्ठी लिख सकते हैं, जो आप ही को 1, 5 या 20 साल बाद भेजी जाती है। इसमें स्टेशनरी, वैक्स स्टैम्प, पोस्टेज शामिल रहता है।

Regret over every thing can become the reason for worry and anger, know how to deal with it?

Regret over every thing can become the reason for worry and anger, know how to deal with it?

Hindi News Happylife Regret Over Every Thing Can Become The Reason For Worry And Anger, Know How To Deal With It? नई दिल्ली7 दिन पहले कॉपी लिंक छोटी-छोटी बातों पर गिल्ट होना मेंटल हेल्थ ठीक न होने की निशानी है।- सिम्बॉलिक इमेज क्या आपको दिन भर छोटी-छोटी बातों पर गिल्ट या अफसोस होता है-जैसे किसी का कॉल मिस कर देना, दोस्त का जन्मदिन भूल जाना या किसी कार्यक्रम में न जा पाना? गिल्ट एक सामान्य भावना है, लेकिन यह जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए तो एंग्जायटी और गुस्से का कारण बन सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. जेनिफर रीड के अनुसार, गिल्ट कभी-कभी हमें बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है, लेकिन अनहेल्दी होने पर यह हमें मानसिक रूप से नीचे खींच सकता है। इससे निपटने के आसान तरीके 1. गलती को देखें, खुद को नहीं हम अपनी गलती को व्यक्तित्व से जोड़ लेते हैं। ‘मैंने कुछ प्रोडक्टिव नहीं किया’ को ‘मैं आलसी हूं’ मानना कॉग्निटिव डिस्टॉर्शन है। खुद को जज न करके काम पर ध्यान दें। 2. जो अच्छा किया है, उसे याद करें न्यूयॉर्क की साइकोलॉजिस्ट डेल एटकिंस सलाह देती हैं कि गिल्ट ज्यादा हो, तो कुछ मिनट अपने अच्छे कामों पर ध्यान दें। इससे गुस्सा और तनाव कम हो सकता है। 3. हर किसी को खुश करना जरूरी नहीं डॉ. रीड के अनुसार, सभी को खुश रखना नामुमकिन है। अपने फैसलों की जिम्मेदारी लें, सामने वाले की भावनाओं को समझें, लेकिन खुद को बेवजह दोष न दें। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

वैलेंटाइन डे: 86% भारतीय महिलाओं को गिफ्ट नहीं पसंद:76 फीसदी महिलाओं को सरप्राइज ट्रिप ज्यादा पसंद, इनका मानना- प्लानिंग में पुरुषों को आगे आना चाहिए

वैलेंटाइन डे: 86% भारतीय महिलाओं को गिफ्ट नहीं पसंद:76 फीसदी महिलाओं को सरप्राइज ट्रिप ज्यादा पसंद, इनका मानना- प्लानिंग में पुरुषों को आगे आना चाहिए

वैलेंटाइन वीक आते ही हर तरफ चॉकलेट, गुलाब और डिनर डेट की बातें शुरू हो जाती हैं। ब्रांड्स ऑफर निकालते हैं, रेस्टोरेंट्स स्पेशल मेन्यू लाते हैं और ई-कॉमर्स एप्स गिफ्ट सेक्शन से भर जाते हैं। लेकिन इस साल तस्वीर थोड़ी बदली दिख रही है। अब ट्रैवल नया ‘लव लैंग्वेज’ बन रहा है। बुकिंग डॉट कॉम के हालिया सर्वे के मुताबिक, 86% भारतीयों ने माना कि जब पार्टनर खुद पहल कर पूरी ट्रिप प्लान और बुक कर दे, तो वह उन्हें सबसे अधिक पसंद आता है। वैलेंटाइन वीकेंड पर कहां जा रहे कपल्स? ट्रैवल प्लेटफॉर्म्स के डेटा में इस साल बड़ा उछाल दिख रहा है। वैलेंटाइन वीक में होटल बुकिंग्स में करीब 175% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। घूमने के लिए ये डेस्टिनेशंस सबसे आगे पॉन्डिचेरी 48% ज्यादा सर्च हुई है। यहां लोगों को समुद्री किनारा, फ्रेंच गलियां और स्लो वॉक्स का आकर्षण पसंद आ रहा है। तिरुवनंतपुरम 41% उछाल दिखी। यहां का क्लिफ साइड व्यू और कैफे कल्चर युवा कपल्स के बीच काफी लोकप्रिय हो रहा है। उदयपुर 33% बढ़त हुई है। यह यूं तो कई सालों से प्रचलित है। यहां की झीलें, महल और हेरिटेज स्टे अब भी कपल्स में फेवरेट हैं। दुबई-हॉन्गकॉन्ग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये डेस्टिनेशंस लोकप्रिय बनी हुई हैं, जबकि कोलंबो में बुकिंग्स में 65% से ज्यादा ग्रोथ दिखी है। महिलाओं के लिए ‘एफर्ट’ सबसे बड़ा गिफ्ट 76 फीसदी महिलाओं का मानना है कि छुट्टियों की प्लानिंग में पुरुषों को आगे आना चाहिए 92 फीसदी महिलाओं को उनके पार्टनर का ट्रिप प्लान करना आकर्षक लगता है। 82 फीसदी महिलाएं उन पार्टनर्स को प्राथमिकता देती हैं जो अच्छे एक्सपीरियंस रखें, सिर्फ महंगे गिफ्ट नहीं।

कॉर्पोरेट इंफ्लुएंसर्स का बढ़ा ट्रेंड:ऑफिस के तनाव-चुनौती रोचक तरीके से दिखाकर करोड़ों कमा रहे, ग्राहकों-कर्मियों से जुड़ना आसान किया

कॉर्पोरेट इंफ्लुएंसर्स का बढ़ा ट्रेंड:ऑफिस के तनाव-चुनौती रोचक तरीके से दिखाकर करोड़ों कमा रहे, ग्राहकों-कर्मियों से जुड़ना आसान किया

अमेरिका की नताली मार्शल ‘कॉर्पोरेट नताली’ के नाम से चर्चित हैं। वे ऑफिस की अजीब हरकतों और शब्दावली का मजाक उड़ाती हैं। अपने वीडियो में नताली ऑफिस की दिनचर्या को रोचक तरीके से पेश करती हैं। जैसे- लोग किस तरह ई-मेल पढ़कर झूठा उत्साह दिखाते हैं। या काम को ही पूरी जिंदगी बताते हैं। इसके अलावा दफ्तर में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करना जो आम जिंदगी में कोई नहीं बोलता (जैसे- ‘सिनर्जी’ या ‘क्लोज द लूप’)। कॉर्पोरेट ऑफिस की बोरिंग मानी जाने वाली दुनिया सोशल मीडिया पर मनोरंजन और कमाई का नया जरिया बन गई है। नताली के वीडियो को 5 करोड़ से ज्यादा लाइक्स मिल चुके हैं। वे अकेली नहीं हैं। दुनियाभर में इंफ्लुएंसर 9टू5 व कॉरपोरेटलाइफ जैसे हैशटैग के जरिए ऑफिस लाइफ की झलक दिखा रहे हैं। कोई बैंकर की दिनचर्या दिखाता है, कोई मार्केटिंग प्रोफेशनल की। कुछ 20 घंटे का वर्कडे दिखाते हैं, तो कुछ सुबह 5 से 9 बजे तक की तैयारी। इन्हें कॉर्पोरेट इंफ्लुएंसर के तौर पर जाना जा रहा है। कॉर्पोरेट इन्फ्लुएंसर्स की लोकप्रियता को देखते हुए कंपनियां इन्हें अपने ब्रांड से जोड़ रही हैं। एक्सपर्ट कहते हैं, इनके वीडियो टीम भावना बढ़ाते हैं, कर्मचारी इन्हें साझा करते हैं। इससे ऑफिस का माहौल हल्का होता है कंसल्टिंग फर्म डेलॉय ने लारा सोफी बोथुर को इन-हाउस इन्फ्लुएंसर के तौर पर रखा। उनके लिंक्डइन अकाउंट से सालाना 118 करोड़ रु. की विज्ञापन वैल्यू जेनरेट हुई। नताली ने मार्केटिंग छोड़कर इंफ्लुएंसर्स के लिए वर्चुअल असिस्टेंट कंपनी शुरू की। 20 लाख फॉलोअर वाले कॉनर हबर्ड एनालिस्ट का काम छोड़कर इन्फ्लुएंसर बन गए हैं। ये लोग नौकरी करने वाले कर्मचारी नहीं रहे, बल्कि अपने नाम व काम को ब्रांड बनाकर खुद का करियर गढ़ रहे हैं। ये वास्तविकता दिखाते हैं, लोग खुद को जोड़ पाते हैं: एक्सपर्ट कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में कम्युनिकेशन एवं डिजिटल मीडिया की प्रोफेसर ब्रुक डफी कहती हैं,‘लोग इंफ्लुएंसर पर ब्रांड्स से ज्यादा भरोसा करते हैं क्योंकि वे रोजमर्रा की जिंदगी को असली अंदाज में दिखाते हैं। कॉर्पोरेट इंफ्लुएंसर ऑफिस की चुनौतियां, तनाव और मजाक को सामने लाते हैं, जिससे दर्शक खुद को उनसे जोड़ पाते हैं। ब्रुक कहती हैं फिल्मों में ऑफिस लाइफ को ग्लैमराइज किया जाता है, लेकिन ये इन्फ्लुएंसर असलियत दिखाते हैं। कंपनियों ने भी इनकी अहमियत समझ ली है। इसलिए इन्हें मौके दे रही हैं। इनका तर्क है कि ग्राहकों और कर्मचारियों से जुड़ने और दूरियां मिटाने में ये इंफ्लुएंसर मददगार साबित हो रहे हैं।’ भारत में भी बढ़ रहा प्रभाव इंफ्लुएंसर मार्केटिंग कंपनी कोफ्लुएंस के अनुसार भारत में कॉपोर्रेट इंफ्लुएंसर सोशल मीडिया पर कंटेट बनाने वाले लोग नहीं रहे, बल्कि बिजनेस लीडर, ब्रांड बिल्डर और प्रेरक व्यक्तिक बन चुके हैं। उनकी बढ़ती संख्या व प्रभाव दिखाता है कि भविष्य में कॉर्पोरेट कल्चर और मार्केटिंग रणनीतियों में इंफ्लुएंसर्स की भूमिका और भी मजबूत होगी।