Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu & Vivek Joshi Profile Details

Hindi News Career Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu & Vivek Joshi Profile Details 3 मिनट पहले कॉपी लिंक इलेक्शन कमिश्नर सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने हाल ही में SIR यानी स्पेशल इंटेनसिव रिवीजन से जुड़े कुछ फैसलों और प्रोसेस पर आपत्तियां जताईं हैं। सुखबीर सिंह संधू मार्च 2024 में इलेक्शन कमिश्नर अपॉइंट हुए थे और डॉ जोशी को 2025 में इलेक्शन कमिश्नर अपॉइंट हुए थे। जानते हैं दोनों इलेक्शन कमिश्नर्स के प्रोफाइल… सुखबीर सिंह संधू ने लागू करवाया था FASTag सुखबीर संधू 1988 बैच के IAS हैं और उन्होंने MBBS की डिग्री भी ली है यानी वे मेडिकल ग्रेजुएट हैं। अक्टूबर 2019 में संधू ने NHAI यानी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया में चैयरमैन का पद संभाला और FASTag को देशभर में कंपलसरी करने का बदलाव लाए। हाईवे सेक्टर रिफॉर्म्स पर उनका प्रमुख योगदान रहा। ECI के अनुसार, उनके कार्यकाल में करीब ₹30,000 करोड़ के केस को मध्यस्था से सुलझाया गया था। संधू हॉकी प्लेयर रहे हैं। उन्हें ट्रेकिंग और पर्वतारोहण में दिलचस्पी है और उन्होंने उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में ब्लैक पीक (22,000 फीट) की चढ़ाई की है। उन्हें हार्वर्ड बिजनेस स्कूल, बोस्टन, U.S.A. में ‘भारतीय शहरों में तनाव कम करने’ पर भाषण देने के लिए आमंत्रित भी किया गया था। RBI और SBI बोर्ड के मेंबर रह चुके हैं डॉ. विवेक जोशी डॉ. विवेक जोशी 1989 बैच के हरियाणा कैडर के IAS अधिकारी हैं। उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार में करीब 35 सालों तक कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। 19 फरवरी 2025 से वे भारत निर्वाचन आयोग में इलेक्शन कमिश्नर अपॉइंट हुए हैं। डॉ. जोशी ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंन ट्रेड से इंटरनेशनल बिजनेस में एग्जीक्यूटिव मास्टर्स किया। डॉ. जोशी हरियाणा के जींद, हिसार और पंचकुला के डिप्टी कमिश्नर रहे। इसके बाद डिविजनल नवंबर 2022 में डॉ. जोशी फाइनेंस मिनिस्ट्री (DFS) में कमिश्नर बने। ——————— ये खबर भी पढ़ें… IIT स्टूडेंट सुसाइड के बाद डीन से हटाए गए दुल्ला:JEE एडवांस्ड, UCEED एग्जाम्स कंडक्ट कराते हैं, एक्सीलेंस इन टीचिंग अवार्ड से सम्मानित; जानें प्रोफाइल IIT बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की मौत के बाद इस संस्थान के जिस प्रोफेसर की सबसे ज्यादा चर्चा है, वह सूर्यनारायण दूल्ला हैं। प्रोफेसर सूर्यनारायण दूल्ला IIT बॉम्बे के ऊर्जा विज्ञान और इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर हैं। पूरी खबर पढ़ें.. दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
DU Election Result 2026 | ABVP Candidate Yash Dabas Win

Hindi News Career DU Election Result 2026 | ABVP Candidate Yash Dabas Win | Delhi News 19 मिनट पहले कॉपी लिंक डीयू के कॉलेजों में छात्र संघ समेत यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव के लिए शुक्रवार 18 सितंबर को वोटिंग आयोजित की गई। इसमें 40.46% मतदान दर्ज किया गया। आज इसका रिजल्ट जारी होने के साथ ही :::::पार्टी ने जीत दर्ज की है। सेंट्रल पैनल के लिए मतदान EVM से हुई थी। मतदान के लिए कुल 52 पोलिंग सेंटर बनाए गए थे। आज नॉर्थ कैंपस मल्टी पर्पज हॉल में EVM खुली और वोटिंग हुई। सेंट्रल पैनल पर मैदान में कुल 19 उम्मीदवार डूसू चुनाव मुख्य तौर पर दो स्तर पर होता है। इसमें कॉलेजों में छात्रसंघ का चुनाव होता है तो वहीं सेंट्रल पैनल पर भी छात्रसंघ चुना जाता है। डूसू चुनाव 2026 में सेंट्रल पैनल पर कुल 19 उम्मीदवार चुनाव में लड़ रहे हैं, जिसमें अध्यक्ष पर सबसे अधिक 7, उपाध्यक्ष पद पर 5, सचिव पद पर 4 और संयुक्त सचिव पद पर 4 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे। विजय जुलूस पर रोक, 140 कैंडिडेट्स को नोटिस दिल्ली हाईकोर्ट ने डूसू चुनाव 2026 से संबंधित एक अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने डूसू चुनाव के विजय जुलूस पर रोक लगा दी है, जिसके तहत कॉलेज छात्रसंघ समेत सेंट्र्रल पैनल पर विजय होने वाला कोई भी कैंडिडेट विजय जुलूस नहीं निकाल सकता है। साथ ही हाईकोर्ट ने 140 कैंडिडेट्स को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने चुनाव प्रचार के दौरान हुई हिंसा मामले की सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया है। उम्मीदवारों ने किया AI बेस्ड प्रचार दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 में प्रचार का तरीका इस बार पूरी तरह बदल गया है। डीयू प्रशासन की सख्ती के कारण छात्र संगठनों ने कागजी पोस्टरों की जगह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और सोशल मीडिया रील्स के जरिये प्रचार किया है। इस साल डूसू चुनाव की जंग बेहतर और रचनात्मक प्रॉम्प्ट से लड़ी जा रही है। युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए उम्मीदवारों ने शॉर्ट वीडियोज, मीम्स और रील्स को अपना हथियार बनाया। ———————————————————————————— ये खबर भी पढ़ें हरियाणा के 12 हजार शिक्षकों पर संकट:HTET जरूरी, नहीं तो नौकरी छोड़ो या रिटायरमेंट लो, पश्चिम बंगाल में 90 हजार टीचर्स के लिए एग्जाम की तैयारी हरियाणा के सरकारी स्कूलों में कार्यरत उन 12 हजार शिक्षकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जिन्होंने अब तक हरियाणा अध्यापक पात्रता परीक्षा (HTET) पास नहीं की है। विद्यालय शिक्षा निदेशालय (हरियाणा) ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए एक नोटिस जारी किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Russia Parliamentary Election | Putin Dominance & Ukraine Occupied Areas

मॉस्को19 मिनट पहले कॉपी लिंक रूस में शुक्रवार यानी 18 सितंबर से तीन दिन का संसदीय चुनाव शुरू हो गया। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की पार्टी यूनाइटेड रशिया का संसद में दबदबा बरकरार रहने की उम्मीद है। वहीं, यूक्रेन युद्ध का खुलकर विरोध करने वाली याब्लोको पार्टी को चुनाव से बाहर कर दिया गया है। यह 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण सैन्य हमले के बाद पहला संसदीय चुनाव है। रूस के कब्जे वाले यूक्रेन के इलाकों में भी वोटिंग हो रही है। यूक्रेन और यूरोपीय संघ ने वहां हो रहे मतदान को अवैध बताया है। राष्ट्रपति पुतिन ने भी शुक्रवार को ऑनलाइन वोट डालकर चुनाव में हिस्सा लिया। पुतिन की पार्टी का दबदबा फिर चुनाव जरूरी क्यों क्रेमलिन के लिए यह चुनाव सिर्फ संसद के सदस्य चुनने तक सीमित नहीं है। पुतिन चाहते हैं कि बड़ी संख्या में लोग वोट डालें, ताकि यह संदेश जाए कि यूक्रेन युद्ध के बीच भी जनता सरकार और रूसी सैनिकों के साथ खड़ी है। पुतिन ने शुक्रवार को ऑनलाइन वोट डाला। चुनाव से पहले उन्होंने कहा कि लोगों का फैसला दिखाएगा कि लाखों लोग रूस के सैनिकों के साथ खड़े हैं और देश एकजुट है। 450 सीटों के लिए हो रही वोटिंग रूस के स्टेट ड्यूमा में 225 सीटों पर लोग राजनीतिक पार्टियों को वोट देंगे। बाकी 225 सीटों पर अलग-अलग इलाकों से खड़े उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनेंगे। यूनाइटेड रशिया के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी, एलडीपीआर, ए जस्ट रशिया और न्यू पीपल जैसी पार्टियां भी चुनाव लड़ रही हैं। हालांकि, इन्हें रूस में सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्ष नहीं माना जाता। बड़े मुद्दों पर ये पार्टियां अक्सर सरकार का साथ देती हैं। संसदीय चुनाव से पहले मॉस्को में सत्तारूढ़ यूनाइटेड रशिया पार्टी का डिजिटल चुनावी विज्ञापन। युद्ध विरोधी याब्लोको पार्टी चुनाव से बाहर याब्लोको रूस की एकमात्र रजिस्टर्ड पार्टी थी, जो खुले तौर पर यूक्रेन युद्ध का विरोध करती रही है। पार्टी जंग खत्म करने और बातचीत के जरिए शांति की बात करती है। रूस की सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में याब्लोको की उम्मीदवारों की सूची का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया। कोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने चुनाव प्रचार में ऐसे लोगों से मिले पैसे का इस्तेमाल किया, जिन्हें विदेश से पैसा मिला था। इसके अलावा पार्टी ने कुछ तस्वीरों और दूसरी प्रचार सामग्री का बिना अनुमति इस्तेमाल किया। इंटरनेट पर प्रचार को लेकर भी पार्टी ने नियम तोड़े। हालांकि, याब्लोको का कहना है कि उसे असल में यूक्रेन युद्ध के खिलाफ उसके रुख की वजह से चुनाव से हटाया गया। पार्टी के कुछ उम्मीदवार अब भी अलग-अलग सीटों पर व्यक्तिगत उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं। वहीं, कुछ दूसरे युद्ध विरोधी नेताओं को जेल भेजा गया है या उन्हें रूस छोड़ना पड़ा है। विपक्षी पार्टी याब्लोको के नेता निकोलाय रिबाकोव इस महीने मॉस्को में एक कार्यक्रम के दौरान। कब्जे वाले यूक्रेनी इलाकों में भी वोटिंग इस चुनाव में रूस पहली बार यूक्रेन के डोनेट्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिजिया के उन इलाकों में भी मतदान करा रहा है, जिन पर उसका कब्जा है। रूस ने 2022 में इन चारों इलाकों को अपने देश में शामिल करने का दावा किया था। हालांकि, यूक्रेन और ज्यादातर दूसरे देश रूस के इस दावे को मान्यता नहीं देते। रूस का इन चारों इलाकों पर भी पूरा नियंत्रण नहीं है। क्रीमिया में भी मतदान हो रहा है। रूस ने 2014 में क्रीमिया पर कब्जा कर इसे अपने देश में शामिल कर लिया था। डोनेट्स्क के रूस के कब्जे वाले इलाके में मतदान के दौरान लोगों के पास एक हथियारबंद रूसी सैनिक भी तैनात दिखाई दिया। चुनाव पर्यवेक्षकों को नहीं बुलाया रूस ने इस बार यूरोप में सुरक्षा और सहयोग संगठन (OSCE) के चुनाव पर्यवेक्षकों को भी नहीं बुलाया है। इससे चुनाव की निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। 20 सितंबर की शाम से शुरुआती नतीजे आने शुरू हो सकते हैं। 21 सितंबर तक लगभग पूरी तस्वीर साफ होने की उम्मीद है। पुतिन की पार्टी के संसद में अपना दबदबा बनाए रखने की उम्मीद है। लेकिन इस चुनाव की अहमियत सिर्फ यह देखने तक सीमित नहीं है कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिलती हैं। पुतिन इसे यूक्रेन युद्ध के बीच जनता के समर्थन के तौर पर दिखाना चाहते हैं। वहीं, युद्ध का खुलकर विरोध करने वाली पार्टी चुनाव से बाहर है और रूस के कब्जे वाले यूक्रेनी इलाकों में भी वोटिंग हो रही है। —————————- यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका से जंग के बावजूद न्यूयॉर्क जाएंगे ईरानी राष्ट्रपति:US वीजा मिला, संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करेंगे; उनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हो सकती अमेरिका और ईरान के बीच 7 महीने से जंग चल रही है। इसके बावजूद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची अगले हफ्ते न्यूयॉर्क में होने वाली UNGA बैठक में शामिल होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
DUSU Election 2026 LIVE | Delhi University Student Union Voting Updates

Hindi News Career DUSU Election 2026 LIVE | Delhi University Student Union Voting Updates 11 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (DUSU) चुनाव 2026 के लिए मतदान 18 सितंबर यानी आज होगा। जबकि वोटों की गिनती 19 सितंबर को की जाएगी। केवल एलिजिबल डीयू छात्र ही मतदान कर सकेंगे। वोटिंग के लिए डीयू का आईडी कार्ड जरूरी रहेगा। इस चुनाव में सुरक्षा के इंतजामों को देखते हुए कॉलेजों और विभागों के बाहर पुलिस तैनात रहेगी। संवेदनशील स्थानों पर गश्त और महिला कॉलेजों में महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती का इंतजाम भी किया गया है। प्रचार का तरीका AI बेस्ड दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 2026 में प्रचार का तरीका इस बार पूरी तरह बदल गया है। डीयू प्रशासन की सख्ती के कारण छात्र संगठनों ने कागजी पोस्टरों की जगह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और सोशल मीडिया रील्स के जरिये प्रचार किया है। इस साल डूसू चुनाव की जंग बेहतर और रचनात्मक प्रॉम्प्ट से लड़ी जा रही है। युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए उम्मीदवारों ने शॉर्ट वीडियोज, मीम्स और रील्स को अपना हथियार बनाया। 17 सितंबर को कॉलेज में पहुंची ईवीएम डीयू में मतदान से एक दिन पहले यानी 17 सितंबर को कॉलेजों तक ईवीएम पहुंचाने की प्रोसेस पूरी हुई। इसके लिए ट्रेंड मास्टर ट्रेनरों की तैनाती की गई है। मतदान का समय कॉलेज शिफ्ट के अनुसार अलग अलग रखा गया है। डे क्लास के लिए सुबह साढ़े 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक समय तय किया गया है। वहीं इनविंग क्लास के लिए दोपहर 3 बजे से शाम को साढ़े 7 बजे तक का समय तय है। मतदान केंद्रों पर खास प्रबंध मतदान केंद्रों पर छात्रों की सुविधा का विशेष ध्यान रखने के प्रबंध किए गए हैं। मतदान केंद्र पर छात्रों की कतार व्यवस्थित करने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी और स्वयंसेवक लगाए गए हैं। प्रवेश और निकास के लिए अलग अलग रास्तों का इंतजाम किया गया है। छात्रों को गर्मी और भीड़ से बचाने के लिए पानी और छांव की व्यवस्था की गई है। प्राथमिक उपचार का प्रबंध भी किया गया है। मतदान केंद्र पर आईडी वेरिफिकेशन जरूरी डूसू चुनाव में बड़ी संख्या में छात्रा मतदाता होते हैं। ऐसे में मतदान केंद्र पर सही वोटर्स की पहचान तय करना भी इस चुनाव का खास हिस्सा है। इसी वजह से यूनिवर्सिटी ने आइडेंटिटी वेरिफिकेशन और एंट्री की व्यवस्था पर खास ध्यान दिया है। 13 अगस्त को जारी हुआ चुनाव कार्यक्रम DU ने 13 अगस्त को DUSU इलेक्शन 2026-27 का चुनाव कार्यक्रम जारी किया था। इसी महीने में चुनाव आचार संहिता और कैंपेनिंग के नियम लागू किए गए। इसमें पेपरलेस कैंपेन, डिजिटल/वीडियो प्रचार पर जोर दिया गया है। साल 2025 में 1.55 लाख से ज्यादा छात्र वोटिंग में शामिल पिछले साल डूसू चुनाव में लगभग 1.55 लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स ने वोट दिया था। इस चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP के आर्यन मान प्रेसिडेंट चुने गए थे। उन्होंने कांग्रेस बैक्ड नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया यानी NSUI की जोसलीन नंदिता चौधरी को 16,196 वोटों से हराया था। पिता और भाई मशहूर शराब व्यवसायी आर्यन मान बिजनेस परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता, सिकंदर मान बहादुरगढ़ स्थित ADS ग्रुप के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं। ये कंपनी मशहूर रॉयल ग्रीन शराब बनाती है। आर्यन के बड़े भाई विराट मान ADS स्पिरिट्स प्राइवेट लिमिटेड के CEO हैं। साथ ही, वो रोकोब्रांड के फाउंडर भी हैं। स्पोर्ट्स कोटे से एडमिशन हुआ 2 नेशनल सर्टिफिकेट के आधार पर मान का एडमिशन स्पोर्ट्स कोटे से दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज में हुआ। उस समय कोविड चल रहा था। ऐसे में पहले साल ऑनलाइन मोड क्लासेस अटेंड की और ओपन बुक एग्जाम में शामिल हुए। हंसराज में रहते हुए जॉइन किया ABVP हंसराज कॉलेज जॉइन करने के 1 सप्ताह के भीतर ही उन्हें स्पोर्ट्स इक्विपमेंट्स की कमी महसूस हुई। इक्विपमेंट नहीं मिलने के चलते उन्होंने कॉलेज प्रिंसिपल को ज्ञापन सौंपने का निर्णय लिया। फिर अपने साथियों के साथ आवेदन लेकर प्रिंसिपल को सौंपने गए। जब वे प्रिंसिपल ऑफिस की तरफ जा रहे थे, उसी दौरान रास्ते में ABVP के सपोर्टर्स और ऑफिस बियरर्स से मुलाकात हुई। उनके हाथों में पोस्टर और बैनर थे, जिस पर तीसरे लाइन में स्पोर्ट्स इक्विपमेंट प्रोवाइड करने की डिमांड लिखी थी। ये देखकर मान को लगा कि जो स्टूडेंट विंग हमारी मांग या जरूरत को अपना मुद्दा बनाता है, उससे जुड़ना बेहतर रहेगा। उसी दौरान वे ABVP से जुड़े। डीयू इलेक्शन कमीशन द्वारा जारी किया गया नोटिफिकेशन ———————————————————————————– ये खबर भी पढ़ें इंडियन आर्मी में अग्निवीर रैली के लिए टैटू पॉलिसी जारी:ट्राइबल कम्युनिटी और धार्मिक टैटू बनवा सकते हैं, ये 6 तरह के टैटू प्रतिबंधित इंडियन आर्मी ने अग्निवीर रैली के लिए टैटू पॉलिसी जारी की है। इसमें बताया गया है कि शरीर पर कहां टैटू बनवाया जा सकता है और कहां नहीं। अग्निवीर भर्ती में शारीरिक गतिविधियों के साथ उम्मीदवारों के पूरे शरीर की जांच की जाती है। साथ में शरीर पर टैटू भी देखा जाता है क्योंकि सेना में टैटू को लेकर कड़े नियम तय किए गए हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
UN Secretary General Election | Carolyn Rodrigues Birkett Leads Race

5 मिनट पहले कॉपी लिंक UN के 80 साल के इतिहास में पहली बार कोई महिला महासचिव बन सकती है। फिलहाल इस रेस में कुल 8 दावेदार हैं। इनमें 5 महिलाएं हैं। शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की अनौपचारिक वोटिंग में गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे हैं। वहीं दूसरे पायदान पर कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिन्सपैन हैं। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा महासचिव एंतोनियो गुटेरेस का दूसरा पांच साल का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को खत्म होगा। इसलिए अगला महासचिव चुनने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। UN महासचिव पद की उम्मीदवार गुयाना की कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट। (फाइल फोटो) UN महासचिव का चुनाव कैसे होता है? संयुक्त राष्ट्र का महासचिव सीधे जनता या सभी देशों की वोटिंग से नहीं चुना जाता। पहले सुरक्षा परिषद (UNSC) उम्मीदवारों के नामों पर विचार करती है। सुरक्षा परिषद में उम्मीदवारों को लेकर कई दौर की अनौपचारिक और सीक्रेट वोटिंग होती है। इसमें 15 सदस्य देश बताते हैं कि वे उम्मीदवार के साथ हैं, उसके खिलाफ हैं या उनकी कोई राय नहीं है। यह अंतिम या औपचारिक चुनाव नहीं होता। इसका मकसद यह देखना होता है कि कौन उम्मीदवार कितना मजबूत है। अगर किसी उम्मीदवार को कम समर्थन मिलता है, तो वह अपनी दावेदारी वापस भी ले सकता है। महासचिव बनने के लिए UNSC के स्थायी सदस्यों का साथ जरूरी सुरक्षा परिषद में कुल 15 देश होते हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस स्थायी सदस्य हैं। इन पांचों के पास वीटो पावर है। किसी उम्मीदवार को सुरक्षा परिषद से आगे बढ़ने के लिए कम से कम 9 वोट चाहिए। लेकिन सिर्फ 9 वोट मिल जाना काफी नहीं है। पांच स्थायी सदस्यों में से किसी एक का विरोध भी उम्मीदवार की राह रोक सकता है। इसलिए उम्मीदवार को बाकी देशों का समर्थन जुटाने के साथ यह भी देखना होता है कि पांचों स्थायी देशों में से कोई उसके खिलाफ न हो। जब बातचीत और वोटिंग के बाद किसी एक उम्मीदवार के नाम पर पर्याप्त सहमति बन जाती है, तो सुरक्षा परिषद औपचारिक बैठक में उस नाम की सिफारिश करती है। इसके बाद उम्मीदवार का नाम संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास जाता है। महासभा में संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देश होते हैं। महासभा सुरक्षा परिषद की सिफारिश के आधार पर नए महासचिव की नियुक्ति करती है। कई बार यह मंजूरी बिना औपचारिक वोटिंग के सर्वसम्मति से भी हो जाती है। नियुक्ति के बाद महासचिव का सामान्य कार्यकाल 5 साल का होता है। उसे दूसरी बार भी चुना जा सकता है। वोटिंग की प्रक्रिया अनौपचारिक वोटिंग में UNSC के 15 सदस्य हर उम्मीदवार के लिए अपनी राय देते हैं। इसमें तीन विकल्प होते हैं: 1. समर्थन 2. विरोध 3. कोई राय नहीं इसका मतलब यह है कि हर देश को उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में ही वोट देना जरूरी नहीं है। वह ‘कोई राय नहीं’ भी चुन सकता है। जैसे 30 जुलाई की पहली अनौपचारिक वोटिंग में रेबेका ग्रिन्सपैन को सबसे ज्यादा समर्थन मिला था। उन्हें 10 देशों का समर्थन, 1 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी थी। 21 अगस्त की अनौपचारिक वोटिंग में कैरोलिन रोड्रिग्स बिर्केट सबसे आगे रहीं। उन्हें 8 देशों का समर्थन, 3 का विरोध और 4 देशों ने कोई राय नहीं दी। हालांकि इन वोटिंग के ये आंकड़े अंतिम चुनाव के नतीजे नहीं होते। इनका मकसद सिर्फ यह पता लगाना होता है कि कौन उम्मीदवार सबसे मजबूत स्थिति में है और किसके नाम पर UNSC में सहमति बन सकती है। विकसित देशों से महासचिव क्यों नहीं बनता ? 1. हर इलाके को मौका देने की कोशिश संयुक्त राष्ट्र में यह कोशिश रहती है कि महासचिव का पद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के देशों को मिलता रहे। यानी हर बार एक ही इलाके के व्यक्ति को यह पद न मिले। इससे बाकी देशों को भी लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सबका है। 1997 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी कहा था कि महासचिव चुनते समय अलग-अलग क्षेत्रों को मौका देने और महिला-पुरुष बराबरी का ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि, यह कोई पक्का नियम नहीं है। 2. महासचिव किसी एक बड़े देश का आदमी न लगे महासचिव को पूरी दुनिया का चेहरा माना जाता है। इसलिए अगर अमेरिका या चीन जैसी बड़ी ताकत के किसी बड़े नेता को यह पद मिल जाए, तो दूसरे देशों को डर हो सकता है कि संयुक्त राष्ट्र पर उस देश का असर बढ़ जाएगा। इसी वजह से ऐसे व्यक्ति को तरजीह मिलती है, जिसे किसी एक बड़ी ताकत के करीब न माना जाए। 3. एशिया-अफ्रीका के देशों की संख्या ज्यादा संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 देश हैं। इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बहुत से देश हैं। इन देशों की भी इच्छा रहती है कि संयुक्त राष्ट्र का मुखिया सिर्फ यूरोप या अमेरिका की सोच वाला न हो, बल्कि दुनिया के बाकी हिस्सों की आवाज भी समझता हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि विकसित देशों के लोगों को कभी मौका ही नहीं मिला। 1991 में कनाडा, नीदरलैंड और नॉर्वे के उम्मीदवार भी महासचिव पद की दौड़ में थे। 2016 में पुर्तगाल के एंतोनियो गुटेरेस महासचिव बने। उस समय पूर्वी यूरोप से महासचिव बनाने की मांग भी काफी जोर पकड़ रही थी। 2006 में शशि थरूर भी भारत से दावेदार रहे भारत के सांसद शशि थरूर भी UN महासचिव पद के दावेदार रह चुके हैं। 2006 में मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें UN महासचिव पद के लिए उम्मीदवार बनाया था। थरूर 1978 से UN में काम कर रहे थे। भारत ने उनके लंबे UN अनुभव और अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ को उनकी ताकत बताया। साथ ही, भारत ने कहा कि अब अगला महासचिव एशिया से होना चाहिए। भारत ने दुनियाभर में थरूर के लिए समर्थन जुटाया। मनमोहन सिंह ने कई देशों के नेताओं को पत्र लिखे, जबकि थरूर ने खुद भी अलग-अलग देशों के नेताओं से मुलाकात की। हालांकि, वे महासचिव नहीं बन सके। अनौपचारिक वोटिंग में थरूर दूसरे नंबर पर रहे, जबकि दक्षिण कोरिया के बान की-मून लगातार सबसे आगे रहे। —————— यह खबर भी पढ़ें… UN में चीफ गुटेरेस की जगह किसे मिलेगी:आज दूसरे दौर की वोटिंग, रेस में 8 दावेदार, कोस्टा रिका की ग्रिन्सपैन सबसे आगे
Bangladesh Presidential Election LIVE | BNP Candidate Victory Expected

ढाका1 मिनट पहले कॉपी लिंक बांग्लादेश में 35 साल बाद आज राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं। बांग्लादेश में राष्ट्रपति को जनता सीधे नहीं चुनती। संसद के सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। इसमें संसद के कुल 349 सांसद वोट डाल सकेंगे। बांग्लादेश के मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन ने बताया कि चुनाव में पारदर्शिता के लिए वोटों की गिनती लाइव प्रसारित की जाएगी। राष्ट्रपति पद के लिए रूलिंग पार्टी BNP के उम्मीदवार मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर और मुख्य विपक्षी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन के प्रत्याशी कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद आमने सामने होंगे। फरवरी में हुए आम चुनाव में BNP को संसद में दो-तिहाई बहुमत मिली थी। इसलिए फखरुल की जीत लगभग तय मानी जा रही है। दोपहर 2 से शाम 5 बजे तक मतदान होगा राष्ट्रपति चुनाव के लिए गुरुवार को दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक मतदान होगा। वोट राष्ट्रीय संसद के सत्र कक्ष में डाले जाएंगे। मतदान शुरू होने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन सांसदों को वोट डालने का तरीका समझाएंगे। बांग्लादेशी मीडिया के मुताबिक, चुनाव आयोग ने मंगलवार को बैलेट पेपर तैयार करने का काम शुरू कर दिया था। हर बैलेट पेपर में एक हिस्सा रिकॉर्ड के लिए और दूसरा वोट डालने के लिए होगा। सांसद को बैलेट पेपर लेने से पहले तय जगह पर अपना नाम लिखकर हस्ताक्षर करना होगा। इसके बाद वह अपनी पसंद के उम्मीदवार के नाम के सामने अपना नाम लिखकर हस्ताक्षर करेंगे। चुनाव आयोग के सीनियर सेक्रेटरी अख्तर अहमद ने मंगलवार को बताया कि दोनों उम्मीदवारों का नामांकन वैध पाया गया है। नाम वापस लेने की समय सीमा मंगलवार शाम 4 बजे खत्म हो गई, लेकिन दोनों में से किसी ने भी नाम वापस नहीं लिया। आखिरी बार 1991 में चुनाव में मुकाबला हुआ था बांग्लादेश में अब तक 12 राष्ट्रपति चुनाव हुए हैं। इनमें 8 बार राष्ट्रपति निर्विरोध चुने गए। संविधान लागू होने के बाद पहला राष्ट्रपति चुनाव 1974 में हुआ, जिसमें सांसदों ने वोट देकर मोहम्मद मोहम्मदुल्लाह को चुना। 1975 में संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता से कराने की व्यवस्था हुई। इसके तहत 1978, 1981 और 1986 में लगातार तीन बार जनता ने राष्ट्रपति चुना। 1991 में फिर संसदीय व्यवस्था लागू हुई और राष्ट्रपति का चुनाव दोबारा सांसदों के जरिए होने लगा। 1991 में दो उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ। इसके बाद 2023 तक सभी चुनाव निर्विरोध रहे, क्योंकि हार के डर से विपक्ष ने उम्मीदवार नहीं उतारा। 1991 के बाद 35 साल में पहली बार बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबला हो रहा है। यानी सांसदों को मतदान करना होगा। BNP ने चुनाव से पहले बैठक बुलाई राष्ट्रपति चुनाव से पहले बुधवार को राष्ट्रीय संसद में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के सांसदों की बैठक हुई। प्रधानमंत्री के डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी जाहिदुल इस्लाम रोनी ने बताया कि बैठक दोपहर 4 बजे संसद में हुई। बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने की। BNP के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार फखरुल इस्लाम आलमगीर भी बैठक में शामिल हुए। पूर्व राष्ट्रपति शहाबुद्दीन के इस्तीफे के बाद हो रहे चुनाव बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने 24 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इस्तीफे की वजह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को बताया था। हालांकि, कई रिपोर्टों में दावा किया गया था कि उन्होंने पूर्व पीएम शेख हसीना से फोन पर बातचीत की कोशिश की थी। इस खबर के बाहर आने के बाद प्रधानमंत्री नाराज हो गए थे। पूरी खबर पढ़ें… ——————– बांग्लादेश से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश बोला- भारत से गंगा जल समझौते में गारंटी मांगेंगे: जरूरत पड़ी तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाएंगे; 1996 का समझौता दिसंबर में खत्म होगा बांग्लादेश गंगा जल संधि में भारत से ‘गारंटी क्लॉज’ शामिल करने की मांग कर रहा है। बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री शाहिदुद्दीन चौधरी एनी ने मंगलवार को ढाका में यह बात कही। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Donald Trump Claims 2020 Election Fraud

वॉशिंगटन डीसी38 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर दावा किया है कि 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में धांधली हुई थी। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि मतदाता और नागरिकता रिकॉर्ड की जांच में 24 हजार से ज्यादा गैर-अमेरिकी नागरिकों के वोट डालने का पता चला है। ट्रम्प ने आगे कहा कि अमेरिकी जनगणना ब्यूरो मतदाता रिकॉर्ड और नागरिकता रिकॉर्ड का मिलान कर रहा है। अब तक 12.8 करोड़ मतदाताओं की जांच की जा चुकी है। अभी 3.2 करोड़ और मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच होनी बाकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, अवैध मतदान के मामलों की संख्या और बढ़ सकती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि 2020 के चुनाव में उनकी ही जीत हुई थी। ट्रम्प ने कहा कि चुनाव में फर्जीवाड़ा रोकने के लिए वे ‘सेव अमेरिका एक्ट’ लाने वाले हैं। ट्रम्प क्यों उठा रहे हैं यह मुद्दा? अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोटिंग के लिए पहचान संबंधी जानकारी देनी होती है। हालांकि पूरे देश में एक जैसा नियम नहीं है। हर राज्य के अपने चुनावी नियम हैं। इसलिए वोट डालने के लिए मांगे जाने वाले दस्तावेज भी राज्य के हिसाब से बदलते हैं। वॉशिंगटन डीसी समेत 15 ऐसे राज्य हैं जहां वोट डालने के लिए फोटो आईडी जरूरी नहीं है। इनमें से ज्यादातर राज्य ऐसे हैं जहां चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत होती है। ट्रम्प और उनकी पार्टी के नेता का आरोप है कि जिन राज्यों में फोटो आईडी जरूरी नहीं है, वहां किसी और के नाम पर वोट डालने या गैर-नागरिकों के मतदान का खतरा रहता है। इसलिए वे सख्त पहचान और नागरिकता जांच की मांग कर रहे हैं। सेव अमेरिका ऐक्ट के लिए समर्थन जुटा रहे ट्रम्प डोनाल्ड ट्रम्प ने 24 हजार गैर-नागरिकों के कथित अवैध मतदान का मुद्दा ऐसे समय उठाया है, जब वह सेव अमेरिका ऐक्ट के लिए समर्थन जुटा रहे हैं। अगर ये कानून पास होता है तो वोटर रजिस्ट्रेशन के समय नागरिकता का प्रमाण देना अनिवार्य होगा। ट्रंप और उनके समर्थकों का कहना है कि इससे गैर-नागरिकों के मतदान पर रोक लगेगी और चुनावी प्रक्रिया ज्यादा सुरक्षित होगी। 2020 में राष्ट्रपति चुनाव हार गए थे ट्रम्प अमेरिका में 2020 का राष्ट्रपति चुनाव जो बाइडेन ने जीता था। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रम्प को हराया था। इस चुनाव में बाइडेन को 8.1 करोड़ वोट मिले, जबकि ट्रम्प को 7.4 करोड़ वोट मिले। इलेक्टोरल कॉलेज में बाइडेन को 306 वोट जबकि ट्रम्प को 232 वोट मिले। वहां राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा इलेक्टोरल वोट से ही तय होता है। हर राज्य को उसकी आबादी और संसद में उसके प्रतिनिधित्व के आधार पर कुछ इलेक्टोरल वोट मिलते हैं। अमेरिका में सभी राज्यों को मिलाकर 538 इलेक्टोरल वोट हैं। राष्ट्रपति बनने के लिए किसी उम्मीदवार को 270 वोट चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर किसी उम्मीदवार को किसी राज्य में सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, तो आम तौर पर उस राज्य के सभी इलेक्टोरल वोट उस उम्मीदवार को मिल जाते हैं। ————————– यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- अमेरिका में भारत जैसा चुनावी सिस्टम हो:हर भारतीय वोटर के पास फोटो ID अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मंगलवार को भारत की चुनाव व्यवस्था का हवाला देते हुए ‘सेव अमेरिका एक्ट’ को पास कराने की अपील की है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
DUSU Election 2026 Guidelines | 75% Attendance & Paperless Campaign Rules

Hindi News Career DUSU Election 2026 Guidelines | 75% Attendance & Paperless Campaign Rules 2 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन (DUSU) चुनाव 2026 के लिए मतदान 18 सितंबर को होगा, जबकि वोटों की गिनती 19 सितंबर को की जाएगी। नॉमिनेशन फाइल करने की लास्ट डेट 13 सितंबर को दोपहर 3 बजे तक है। इसके बाद नॉमिनेशन पेपर्स की जांच तीन बजकर 15 मिनट तक की जाएगी और नॉमिनेटेड कैंडिडेट्स की फाइनल लिस्ट उसी दिन शाम 6 बजे तक जारी कर दी जाएगी। चुनाव से जुड़ी तारीखें जारी करने के साथ ही यूनिवर्सिटी ने आचार संहिता भी जारी कर दी है। डीयू चुनाव कैंपेन को लेकर इस साल के नियम : यूनियन या प्रतिनिधि संस्था में सिर्फ फुल टाइम कोर्स में एनरोल्ड रेगुलर स्टूडेंट्स ही चुनाव में शामिल हो सकते हैं। 17 से 22 साल की उम्र के UG स्टूडेंट्स आवेदन कर सकते हैं, जबकि, PG स्टूडेंट्स के लिए अधिकतम उम्र 25 साल है। न्यूनतम अटेंडेंस 75% होनी चाहिए। कैंडिडेट्स 12 सितंबर, 2026 को दोपहर 2 बजे तक चीफ इलेक्शन ऑफिसर के ऑफिस में 10 मिनट से कम का चुनावी भाषण वाला वीडियो क्लिप जमा कर सकते हैं। चीफ इलेक्शन ऑफिसर की मंजूरी के बाद वीडियो DU की वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। कैंडिडेट्स प्रचार के लिए कागज के बजाय सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर सकते हैं। प्रत्याशी के किसी भी विषय में पेपर लंबित नहीं होना चाहिए। पिछले वर्ष में फेल होने या मौजूदा साल में दोबारा एडमिशन लेने वाले छात्र भी चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। कार्यकारी सदस्य के पद के लिए अधिकतम दो बार चुनाव लड़ने का मौका मिलेगा। कोई प्रत्याशी एक साथ दो पदों पर चुनाव नहीं लड़ सकेगा। प्रचार के लिए लाउडस्पीकर, वाहन और जानवरों का इस्तेमाल मना है। मनोरंजन या किसी चीज का प्रतिनिधित्व करने के लिए मैस्कॉट या कॉस्ट्यूम का इस्तेमाल करना सख्त मना है। कैंडिडेट्स को प्रचार के लिए प्रिंटेड पोस्टर, पैम्फलेट या किसी अन्य प्रिंटेड सामग्री का इस्तेमाल करने की परमिशन नहीं दी जाएगी। कैंडिडेट्स केवल हाथ से बने पोस्टर का इस्तेमाल कर सकते हैं। प्रति कैंडिडेट अधिकतम खर्च 5000 रुपए है। DUSU चुनावों के लिए प्रचार का समय सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक है। कॉलेज कैंपस में प्रचार करते समय हर कैंडिडेट के साथ चार से ज्यादा छात्र नहीं हो सकते। उम्मीदवारों को प्रॉक्टर्स ऑफिस से ऑथराइज्ड व्हीकल स्टिकर लेना होगा। बिना स्टिकर वाले वाहनों को कैंपस/कॉलेज में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। फुटपाथ या सड़क पर ऐसी पार्किंग नहीं की जा सकती जिससे ट्रैफिक की दिक्क्त हो। किसी उम्मीदवार या उसके समर्थक को वाहन, पार्किंग ऐरिया, कैंपस या रोड़ साइड पर शराब या किसी नशीली चीजों का सेवन करते पाया गया, तो उम्मीदवार का नॉमिनेशनल कैंसिल किया जा सकता है। डीयू ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर कैंपेन के दौरान नियम लगातार तोड़े गए तो चुनाव रद्द करने तक की कार्रवाई हो सकती है। शिकायतों के लिए बनेगी सेल डूसू चुनाव से संबंधित शिकायतें दूर करने के लिए सेल बनाया जाएगा। इसकी अध्यक्षता डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर करेंगे। सेल में एक सीनियर टीचर, एक सीनियर प्रशासनिक अधिकारी और फाइनल ईयर का एक छात्र व एक छात्रा को शामिल किया जाएगा। चुनाव से जुड़ी आपत्तिजनक घटनाओं की सूचना पुलिस को 12 घंटे के अंदर देने का प्रावधान भी किया गया है। साल 2024 में पोस्टर हटाने का खर्च 1 करोड़ दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव में प्रचार के लिए इस्तेमाल पोस्टर को हटाने में खर्च हुए राशि की सीमा दिल्ली नगर निगम ने एक करोड़ रुपये बताई थी। इसकी जानकारी हाई कोर्ट को देते हुए भुगतान की मांग दिल्ली विश्वविद्यालय से की गई। इस विषय पर विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि उम्मीदवारों और छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालय परिसर और आसपास की सार्वजनिक संपत्तियों पर बड़े पैमाने पर प्रचार सामग्री लगाई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले दीवारों और सार्वजनिक संपत्ति को साफ किए जाने तक DUSU चुनाव की मतगणना पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि पहले पोस्टर-बैनर हटाकर संपत्ति को साफ किया जाए, उसके बाद मतगणना आगे बढ़े। MCD के अलावा DMRC ने भी सफाई पर लगभग ₹1 लाख खर्च होने की बात कही थी। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया था कि सफाई का खर्च संबंधित उम्मीदवारों से वसूलने का विकल्प देखा जा सकता है। 2025 के चुनाव के लिए ₹1 लाख का एंटी-डिफेसमेंट बॉन्ड लागू किया गया था। यह पोस्टर हटाने का खर्च नहीं, बल्कि उम्मीदवार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए था। इसके पीछे 2024 DUSU चुनाव के दौरान हुई भारी तोड़फोड़/पोस्टरबाजी की सफाई का खर्च था। ये खबर भी पढ़ें जर्जर स्कूल में पढ़ने को मजबूर स्टूडेंट्स ने धरना दिया:अधिकारियों से पूछा- अगर आपके बच्चे होते, तो क्या आप उन्हें ऐसी ही सुविधा देते अलवर के थानागाजी क्षेत्र के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, जोधावास में छात्र-छात्राओं ने धरना शुरू कर दिया। 13–14 अगस्त 2026 को जर्जर भवन और स्कूल की दूसरी बुनियादी समस्याओं को लेकर विद्यार्थियों ने विरोध किया। पूरी खबर यहां पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Israel Election 2026 | PM Netanyahu Faces Challenge From Gadi Eizenkot

तेल अवीव2 मिनट पहले कॉपी लिंक इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट से बड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। गुरुवार को सामने आए जमान इजराइल के नए सर्वे में आइजेनकोट की विपक्षी पार्टी यशार को 25 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। वहीं नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 21 सीटों पर सिमट सकती है। यानी यशार ने लिकुड पर 4 सीट की बढ़त बना ली है। पिछले कुछ हफ्तों के ज्यादातर सर्वे में भी यशार आगे रही है, लेकिन अंतर बहुत कम था। कई सर्वे में लिकुड बराबरी पर थी या सिर्फ 1-2 सीट पीछे थी। नए सर्वे में यह अंतर बढ़कर 4 सीट हो गया है। 120 सीटों वाली संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी यशार के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद चुनाव के बाद सरकार बनना आसान नहीं होगा। इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और बहुमत के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। सर्वे में नेतन्याहू विरोधी दलों के ‘चेंज ब्लॉक’ को 58 सीटें मिलने का अनुमान है। यानी यह गठबंधन बहुमत से सिर्फ 3 सीट दूर नजर आ रहा है। दूसरी ओर नेतन्याहू के समर्थक दलों को कुल 50 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब पार्टियों को 12 सीटें मिल सकती हैं। इनमें राम पार्टी और हदाश-ताल को 6-6 सीटें मिलने का अनुमान है। इसका मतलब है कि चुनाव से पहले किसी भी बड़े खेमे के पास सरकार बनाने लायक साफ बहुमत नहीं है। आइजेनकोट बोले- सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मौका मिलना चाहिए आइजेनकोट की बढ़त के बीच नेतन्याहू विरोधी खेमे के विपक्षी नेता याइर लैपिड की पार्टी बीयाचद ने कहा है कि वह विपक्षी सरकार बनने के रास्ते में रुकावट नहीं डालेगी। लेकिन जब लैपिड से पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन करेगी, तो उन्होंने सीधा जवाब नहीं दिया। बीयाचद में लैपिड दूसरे नंबर के नेता हैं। पार्टी का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के हाथ में है। वह खुद भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर सामने आते रहे हैं। आइजेनकोट ने इससे पहले कहा था कि अगला प्रधानमंत्री उसी व्यक्ति को होना चाहिए जो नेतन्याहू विरोधी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी का नेता हो। उनका यह बयान 2021 से 2022 तक प्रधानमंत्री रहे नफ्ताली बेनेट के कार्यकाल की ओर भी इशारा करता है। उस समय बेनेट की पार्टी के पास नेसेट में सिर्फ 7 सीटें थीं। इसके बावजूद गठबंधन के जरिए वह प्रधानमंत्री बने थे। इसी वजह से उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर उस समय काफी बहस हुई थी। विपक्षी यशार पार्टी के नेता गादी आइजेनकोट। (फाइल फोटो) रिपोर्ट- ईरान इजराइली नेताओं को नुकसान पहुंचा सकता है चैनल 12 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की ओर से इजराइली नेताओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिशों के संकेत मिले हैं। पीएम नेतन्याहू के पास सराकरी सुरक्षा है लेकिन आइजेनकोट को फिलहाल सरकारी सुरक्षा का औपचारिक अधिकार नहीं है। इसी वजह से आइजेनकोट की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत के बीच भी उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता सामने आई है। चुनाव अभियान तेज होने के साथ इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी ‘शिन बेट’ उन्हें हथियारबंद सुरक्षा देने पर विचार कर रही है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Clacton UK Election | Count Binface vs Nigel Farage Bizarre Candidate

लंदनकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक ब्रिटेन के क्लैक्टन संसदीय क्षेत्र में होने वाला उपचुनाव इस बार एक अनोखे उम्मीदवार की वजह से चर्चा में है। यहां दक्षिणपंथी पार्टी रिफॉर्म यूके के नेता नाइजेल फराज के सामने काउंट बिनफेस चुनाव लड़ रहे हैं। बिनफेस की खास बात यह है कि वे चुनाव प्रचार के दौरान कचरे के डिब्बे जैसी पोशाक पहनते हैं और खुद को मजाकिया अंदाज में ‘ग्रह सिग्मा IX का एलियन’ बताते हैं। काउंट बिनफेस का दावा है कि चुनाव का नतीजा चाहे जो भी हो, जीत आखिर उनकी ही होगी। काउंट बिनफेस अपने अजीबोगरीब वादों की वजह से खूब चर्चा में है। वह हर नागरिक को सस्ता घर देने का वादा कर रहे हैं। लंदन के एक स्टूडियो में पिछले महीने इंटरव्यू के दौरान काउंट बिनफेस। उनका किरदार कॉमेडियन जॉन हार्वे निभाते हैं। कॉपीराइट को लेकर विवाद हुआ, फिर नाम पड़ा काउंट बिनफेस काउंट बिनफेस का किरदार 46 वर्षीय लेखक और कॉमेडियन जॉन हार्वे निभाते हैं। वे काउंट बिनफेस नाम से कई बार चुनाव लड़ चुके हैं। हार्वे ने पहली बार 2017 के ब्रिटिश आम चुनाव में लॉर्ड बकेटहेड नाम से तत्कालीन पीएम थेरेसा मे के खिलाफ चुनाव लड़ा था। इस नाम को लेकर कॉपीराइट विवाद हो गया। दरअसल, लॉर्ड बकेटहेड भी एक व्यंग्यात्मक काल्पनिक किरदार है। यह काले रंग की टोपी पहनता है जो कि बाल्टी जैसा दिखता है। सबसे पहले 1984 में माइक ली नाम के एक शख्स ने लॉर्ड बकेटहेड नाम से यह चुनाव लड़ा था। इसके बाद हार्वे को लॉर्ड बकेटहेड नाम छोड़ना पड़ा। इसके बाद हार्वे ने काउंट बिनफेस को 2018 में चुनाव से कुछ महीने पहले लॉन्च किया। काउंट बिनफेस नाम का मतलब क्या है यह नाम 3 शब्दों से मिलकर बना है। काउंट, बिन और फेस। काउंट राजशाही से जुड़ी एक उपाधि है। जैसे कि लॉर्ड, अर्ल या बैरन भी एक उपाधि है। ऐसे में काउंट बिन फेस का मतलब है- कूड़ेदान के चेहरे वाला काउंट। काउंट बिनफेस ने 2019 में तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के खिलाफ चुनाव लड़ा। इसके बाद वे 2021 और 2024 के लंदन मेयर चुनाव, 2023 उपचुनाव, 2024 आम चुनाव और 2026 में एक उपचुनाव में भी उम्मीदवार रहे। इस साल मेकरफील्ड उपचुनाव में ब्रिटेन के मौजूदा प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम (बीच में), काउंट बिनफेस (बाएं) और लोमड़ी की पोशाक पहनने वाले एनिमल राइट एक्टिविस्ट रॉबर्ट पाउनॉल भी उम्मीदवार थे। काउंट बिनफेस क्या चुनाव जीत पाएंगे? मौजूदा हालात में काउंट बिनफेस चुनाव जीत जाएंगे इसकी संभावना बहुत कम है। दरअसल, क्लैक्टन सीट से फराज सांसद रह चुके हैं। पिछले चुनाव में उन्हें 46% वोट मिले थे। हालिया सर्वेक्षणों में उन्हें करीब 73% वोट मिलने का अनुमान जताया गया है। ब्रिटेन की लेबर, कंजर्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेट जैसी बड़ी पार्टियों ने इस उपचुनाव में उम्मीदवार नहीं उतारा है। इससे फराज की जीत की संभावना और मजबूत हो गई है। काउंट बिनफेस इस चुनाव में फराज के सबसे चर्चित प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन वे अकेले नहीं हैं। इस उपचुनाव में कुल 33 उम्मीदवार मैदान में हैं। काउंट बिनफेस के लिए असली जीत सीट जीतना नहीं, बल्कि अच्छा वोट हासिल करना होगा। अब तक उन्हें सबसे ज्यादा 2021 के लंदन मेयर चुनाव में करीब 1% वोट मिले थे। क्लैक्टन उपचुनाव में बड़ी पार्टियों शामिल नहीं होने से काउंट बिनफेस फराज के सबसे चर्चित प्रतिद्वंद्वी बन गए हैं। अगर उन्हें 5% या उससे ज्यादा वोट मिल जाते हैं, तो उनकी 500 पाउंड की जमानत राशि वापस मिल जाएगी। इसे उनके लिए बड़ी सफलता माना जाएगा। काउंट बिनफेस के चर्चित चुनावी वादे काउंट बिनफेस के चुनावी वादे भी पूरी तरह मजाक और व्यंग्य से भरे होते हैं। वे कहते हैं कि अगर जीत गए तो कम से कम एक सस्ता घर जरूर बनवाएंगे। यह उन सरकारों पर तंज है, जो हर चुनाव में लाखों सस्ते घर बनाने का वादा करती हैं, लेकिन अक्सर अपने लक्ष्य पूरे नहीं कर पातीं। वे यह भी कहते हैं, ‘आपका टैक्स कम करेंगे और बाकी सभी का बढ़ा देंगे।’ यह भी एक व्यंग्य है, क्योंकि हर नेता जनता से टैक्स कम करने का वादा करता है। उनका एक और मजाकिया वादा है कि वे ब्रिटेन की मशहूर गायिका एडेल को सरकारी संपत्ति घोषित कर देंगे। एडेल ब्रिटेन की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली गायिका हैं। काउंट उनके नाम का इस्तेमाल एक असंभव वादा करके राजनीतिक व्यंग्य करने के लिए करते हैं। पिछले महीने मध्य लंदन स्थित डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर एक शख्स काउंट बिनफेस का पोस्टर दिखाता हुआ। काउंट बिनफेस जैसे 3 और उम्मीदवार फराज के खिलाफ काउंट बिनफेस के अलावा 3 और उम्मीदवार हैं जो अपने व्यंग्यात्मक अंदाज के लिए जाने जाते हैं। ये तीनों उम्मीदवार ऑफिशियल मॉन्स्टर रेविंग लूनी पार्टी से हैं। यह ब्रिटेन की व्यंग्यात्मक राजनीतिक पार्टी है जो चुनाव में ऐसे उम्मीदवार उतारने के लिए जानी जाती है।इसकी स्थापना 1983 में संगीतकार डेविड सैच ने की थी। इस पार्टी के उम्मीदवार अक्सर अजीब पोशाक पहनते हैं और ऐसे चुनावी वादे करते हैं, जिनका मकसद लोगों को हंसाने के साथ-साथ राजनीतिक व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान दिलाना होता है। हालांकि पार्टी के कई मजाकिया सुझाव बाद में सच भी साबित हुए। इनमें 24 घंटे पब खोलने की अनुमति, पालतू जानवरों के पासपोर्ट और जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के जरिए फैसले जैसे विचार शामिल हैं, जिन्हें बाद में ब्रिटिश सरकारों ने अलग-अलग समय पर लागू किया। ब्रिटेन में ऐसे उम्मीदवारों की पुरानी परंपरा ब्रिटेन में 18 साल या उससे अधिक उम्र का कोई भी ब्रिटिश, आयरिश या पात्र कॉमनवेल्थ नागरिक संसदीय चुनाव लड़ सकता है। इसके लिए 500 पाउंड की जमानत राशि जमा करनी होती है और स्थानीय क्षेत्र के 10 लोगों का समर्थन चाहिए। इसी वजह से ब्रिटेन के चुनावों में अक्सर मजाकिया या व्यंग्यात्मक उम्मीदवार भी मैदान में उतरते हैं। कोई कार्टून किरदार की पोशाक पहनता है तो कोई अजीब वेशभूषा में प्रचार करता है। इनका मकसद चुनाव जीतने से ज्यादा चर्चा में आना और राजनीति पर व्यंग्य करना होता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…






