Foreign Investors Exit India Markets 2026

Hindi News Business Foreign Investors Exit India Markets 2026 | Rupee Weakness, Slow Earnings मुंबई11 मिनट पहले कॉपी लिंक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालने का सिलसिला मई महीने में भी जारी रहा। विदेशी निवेशकों ने मई में इक्विटी मार्केट से 32,963 करोड़ रुपए की निकासी की है। कंपनियों की सुस्त अर्निंग ग्रोथ, रुपए में आ रही कमजोरी और वैश्विक बाजारों में मिल रहे बेहतर मौकों के चलते निवेशकों ने यह कदम उठाया है। 2026 में अब तक ₹2.25 लाख करोड़ की बिकवाली NSDL के डेटा के मुताबिक, इस ताजा बिकवाली के साथ साल 2026 में अब तक FPIs की कुल बिकवाली का आंकड़ा 2.25 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा साल 2025 में पूरे साल के दौरान हुई 1.66 लाख करोड़ रुपए की कुल बिकवाली से भी काफी ज्यादा है। फरवरी को छोड़कर हर महीने नेट सेलर्स रहे विदेशी निवेशक साल 2026 में केवल फरवरी महीने को छोड़कर FPIs ने हर महीने भारतीय बाजार में लगातार बिकवाली की है। जनवरी: विदेशी निवेशकों ने जनवरी में भारतीय बाजार से 35,962 करोड़ रुपए निकाले थे। फरवरी: FPIs नेट बायर्स बने और उन्होंने 22,615 करोड़ रुपए का निवेश किया। यह पिछले 17 महीनों में किसी भी एक महीने का सबसे बड़ा इनफ्लो था। मार्च: इस महीने ट्रेंड पूरी तरह उलट गया और विदेशी निवेशकों ने रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपए की भारी-भरकम बिकवाली की। अप्रैल: बिकवाली का यह दौर अप्रैल में भी जारी रहा, जब बाजार से 60,847 करोड़ रुपए का आउटफ्लो हुआ। मई: इस महीने भी करीब 33,000 करोड़ (सटीक नंबर 32,963 करोड़) रुपए की निकासी दर्ज की गई। भारतीय बाजार से क्यों शिफ्ट हो रहे विदेशी निवेशकों? जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार ने बताया कि भारत में कॉरपोरेट अर्निंग की रफ्तार थोड़ी सुस्त रही है। इसके मुकाबले अमेरिका, जापान, साउथ कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में कंपनियों का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा है, जिसने FPIs को अपनी पूंजी वहां शिफ्ट करने के लिए प्रेरित किया है। वहीं साउथ कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित रैली की वजह से भी विदेशी फंड भारत के बजाय उन बाजारों की तरफ आकर्षित हुआ है। 2026 में अब तक 6% कमजोर हुआ रुपया सेंट्रिसिटी वेल्थटेक के फाउंडिंग पार्टनर और हेड ऑफ इक्विटीज सचिन जासूजा ने कहा कि रुपए की लगातार गिरती कीमत FPIs के बाहर जाने की दूसरी सबसे बड़ी वजह है। साल 2026 में अब तक रुपया करीब 6% और पिछले पूरे एक साल में करीब 10% तक कमजोर हो चुका है। आरबीआई के प्रयासों के बावजूद रुपया मिड-80 (85 के करीब) के स्तर से गिरकर डॉलर के मुकाबले 95.5 के स्तर तक पहुंच गया है। कमजोर रुपए की वजह से विदेशी निवेशकों का डॉलर-डिनॉमिनेटेड रिटर्न (डॉलर के टर्म में मुनाफा) सीधे तौर पर प्रभावित होता है। तेल की बढ़ती कीमतों और होर्मुज में तनाव से चिंता बढ़ी सचिन जासूजा के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, जिससे मुश्किलें और बढ़ गई हैं। ‘स्ट्रैट ऑफ होर्मुज’ के आसपास जारी तनाव और बाधाओं के कारण ब्रेंट क्रूड के दाम 70 डॉलर प्रति बैरल की रेंज से उछलकर 95-105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए हैं। इससे भारत का इम्पोर्ट बिल और करंट अकाउंट डेफिसिट दोनों बढ़ गए हैं। मई में बिकवाली की रफ्तार हुई धीमी, ग्लोबल सेंटिमेंट सुधरे हालांकि, पिछले महीनों की तुलना में मई में बिकवाली की रफ्तार थोड़ी थमी है। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल-मैनेजर रिसर्च हिमांशु श्रीवास्तव ने बताया कि आउटफ्लो में आई यह कमी दर्शाती है कि विदेशी निवेशक अब साल की शुरुआत जैसी आक्रामक बिकवाली नहीं कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण वैश्विक जोखिमों और सेंटिमेंट में धीरे-धीरे हुआ सुधार है। वैश्विक व्यापार तनाव, टैरिफ से जुड़े घटनाक्रम और ग्रोथ को लेकर अनिश्चितताएं अभी बनी हुई हैं, लेकिन कुछ महीने पहले के मुकाबले इनका दबाव थोड़ा कम हुआ है। फ्यूचर आउटलुक: जल्द सुधार की उम्मीद कम बाजार के आगे के रुख पर बात करते हुए सचिन जासूजा ने कहा कि जब तक देश की मैक्रो-इकोनॉमिक स्थितियों (कच्चे तेल, रुपए और घाटे की स्थिति) में कोई बड़ा और ठोस सुधार नहीं आता, तब तक शॉर्ट टर्म यानी निकट भविष्य में FPIs के इनफ्लो में किसी बड़े यू-टर्न (वापसी) की उम्मीद कम ही है। क्या होते हैं FPIs और क्यों अहम है इनका आना-जाना? FPI यानी फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स उन विदेशी निवेशकों, कंपनियों या संस्थाओं को कहा जाता है जो किसी दूसरे देश के शेयर बाजार, बॉन्ड्स या अन्य वित्तीय एसेट्स में निवेश करते हैं। भारतीय शेयर बाजार में इन्हें ‘हॉट मनी’ भी माना जाता है, क्योंकि ये बाजार की तेजी-मंदी को बड़े स्तर पर प्रभावित करते हैं। जब देश में अर्निंग ग्रोथ कमजोर हो या करेंसी गिर रही हो, तो ये अपना निवेश डॉलर में सुरक्षित करने के लिए पैसे निकाल लेते हैं। ये खबर भी पढ़ें… टॉप-10-कंपनियों में से 7 की वैल्यू ₹1.54 लाख करोड़ घटी: रिलायंस टॉप लूजर रही, वैल्यू ₹46,078 करोड़ कम हुई; HDFC बैंक-एयरटेल का मार्केट कैप भी घटा मार्केट कैप के लिहाज से देश की 10 सबसे बड़ी कंपनियों में से 7 की वैल्यू बीते हफ्ते के कारोबार में 1.54 लाख करोड़ रुपए घट गई। इस दौरान रिलायंस इंडस्ट्रीज की मार्केट वैल्यू सबसे ज्यादा कम हुई है। रिलायंस की मार्केट वैल्यू ₹46,078 करोड़ घटकर ₹17.87 लाख करोड़ पर आ गई है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Foreign investors pull Rs 27,000 crore in May from Indian Market; 2026 outflows cross Rs 2.2 lakh crore mark

Hindi News Business Foreign Investors Pull Rs 27,000 Crore In May From Indian Market; 2026 Outflows Cross Rs 2.2 Lakh Crore Mark मुंबई9 मिनट पहले कॉपी लिंक विदेशी निवेशकों (FPIs) ने इस महीने (मई) भारतीय शेयर बाजार से अब तक ₹27,048 करोड़ की नकदी निकाल ली है। ग्लोबल इकोनॉमिक एनवायरमेंट और जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगातार भारतीय इक्विटी बाजार में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहे हैं। इस ताजा बिकवाली के साथ साल 2026 में अब तक कुल आउटफ्लो ₹2.2 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है, जो साल 2025 की कुल बिकवाली से भी ज्यादा है। FPI ने फरवरी छोड़कर हर महीने बिकवाली की नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के डेटा के मुताबिक, साल 2026 में फरवरी महीने को छोड़कर विदेशी निवेशक हर महीने नेट सेलर्स (बिकवाल) रहे हैं। जनवरी में निवेशकों ने ₹35,962 करोड़ बाजार से निकाले थे। इसके बाद फरवरी में ट्रेंड बदला और उन्होंने ₹22,615 करोड़ का निवेश किया, जो पिछले 17 महीनों में किसी एक महीने का सबसे बड़ा इनफ्लो था। मार्च में बना था ₹1.17 लाख करोड़ का रिकॉर्ड फरवरी की राहत के बाद मार्च में विदेशी निवेशकों ने रिकॉर्ड ₹1.17 लाख करोड़ के शेयर बेचे। बिकवाली का यह सिलसिला अप्रैल में भी जारी रहा, जब बाजार से ₹60,847 करोड़ का नेट आउटफ्लो हुआ। मई में भी यह कमजोरी बनी रही और अब तक ₹27,048 करोड़ से ज्यादा की रकम निकाली जा चुकी है। साल 2026 में अब तक हुई ₹2.2 लाख करोड़ की कुल बिकवाली पिछले पूरे साल के मुकाबले काफी ज्यादा है। साल 2025 में पूरे साल के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से कुल ₹1.66 लाख करोड़ रुपए निकाले थे। इस साल पांच महीनों में ही यह आंकड़ा पार हो गया है। डॉलर-अमेरिकी बॉन्ड यील्ड मजबूत होने से दबाव बढ़ा मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल – मैनेजर रिसर्च, हिमांशु श्रीवास्तव ने इस ट्रेंड पर कहा कि वैश्विक विकास (ग्लोबल ग्रोथ) को लेकर बनी अनिश्चितता, मुख्य क्षेत्रों में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की अस्थिर कीमतों की वजह से उभरते बाजारों (इमर्जिंग मार्केट्स) के प्रति निवेशकों का सेंटिमेंट कमजोर हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि मजबूत अमेरिकी डॉलर और बढ़ी हुई यूएस बॉन्ड यील्ड इस बिकवाली के मुख्य कारण हैं। विकसित बाजारों में बेहतर रिटर्न मिलने से सुरक्षित संपत्तियों का आकर्षण बढ़ा है और निवेशक डिफेंसिव रुख अपना रहे हैं। इसके अलावा ग्लोबल इन्फ्लेशन (महंगाई) और केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती के समय को लेकर बनी अनिश्चितता भी फंड एलोकेशन के फैसलों को प्रभावित कर रही है। रुपए पर दबाव बढ़ा, ₹96.14 के स्तर पर पहुंचा जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजिस्ट वी के विजयकुमार के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और बढ़ते करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा) के कारण रुपए पर भारी दबाव देखा जा रहा है। साल की शुरुआत में डॉलर के मुकाबले रुपया 90 के स्तर पर था, जो 15 मई को 96 के स्तर को पार करते हुए 96.14 पर पहुंच गया है। AI कंपनियों की तरफ डायवर्ट हो रहा है फंड वी के विजयकुमार ने बताया कि अगर विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रही और कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रहे, तो रुपया आगे और कमजोर हो सकता है। इसके साथ ही दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर फोकस करने वाली कंपनियों में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है। इस वजह से भारत जैसे देशों से फंड डायवर्ट हो रहा है, जिन्हें AI के क्षेत्र में थोड़ा पीछे माना जा रहा है। हालांकि, जब AI ट्रेड का मौजूदा बबल शांत होगा, तब यह ट्रेंड वापस बदल सकता है। FPI और बॉन्ड यील्ड क्या होते हैं? फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI): जब किसी देश के नागरिक या कंपनियां दूसरे देश के शेयर बाजार, बॉन्ड या म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो उसे फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट कहा जाता है। इन्हें शॉर्ट-टर्म इन्वेस्टर भी माना जाता है जो बाजार के हालातों को देखकर तेजी से पैसा निकालते या निवेश करते हैं। बॉन्ड यील्ड: बॉन्ड यील्ड वह रिटर्न या ब्याज होता है जो एक निवेशक को बॉन्ड में निवेश करने पर मिलता है। जब अमेरिका जैसे विकसित देशों में सरकारी बॉन्ड की यील्ड (रिटर्न) बढ़ती है, तो विदेशी निवेशक भारतीय बाजार जैसे जोखिम वाले शेयर बाजारों से पैसा निकालकर वहां सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में निवेश करने लगते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Foreign investors pull Rs 27,000 crore in May from Indian Market; 2026 outflows cross Rs 2.2 lakh crore mark

Hindi News Business Foreign Investors Pull Rs 27,000 Crore In May From Indian Market; 2026 Outflows Cross Rs 2.2 Lakh Crore Mark मुंबई42 मिनट पहले कॉपी लिंक विदेशी निवेशकों (FPIs) ने इस महीने (मई) भारतीय शेयर बाजार से अब तक ₹27,048 करोड़ की नकदी निकाल ली है। ग्लोबल इकोनॉमिक एनवायरमेंट और जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगातार भारतीय इक्विटी बाजार में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहे हैं। इस ताजा बिकवाली के साथ साल 2026 में अब तक कुल आउटफ्लो ₹2.2 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है, जो साल 2025 की कुल बिकवाली से भी ज्यादा है। FPI ने फरवरी छोड़कर हर महीने बिकवाली की नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के डेटा के मुताबिक, साल 2026 में फरवरी महीने को छोड़कर विदेशी निवेशक हर महीने नेट सेलर्स (बिकवाल) रहे हैं। जनवरी में निवेशकों ने ₹35,962 करोड़ बाजार से निकाले थे। इसके बाद फरवरी में ट्रेंड बदला और उन्होंने ₹22,615 करोड़ का निवेश किया, जो पिछले 17 महीनों में किसी एक महीने का सबसे बड़ा इनफ्लो था। मार्च में बना था ₹1.17 लाख करोड़ का रिकॉर्ड फरवरी की राहत के बाद मार्च में विदेशी निवेशकों ने रिकॉर्ड ₹1.17 लाख करोड़ के शेयर बेचे। बिकवाली का यह सिलसिला अप्रैल में भी जारी रहा, जब बाजार से ₹60,847 करोड़ का नेट आउटफ्लो हुआ। मई में भी यह कमजोरी बनी रही और अब तक ₹27,048 करोड़ से ज्यादा की रकम निकाली जा चुकी है। साल 2026 में अब तक हुई ₹2.2 लाख करोड़ की कुल बिकवाली पिछले पूरे साल के मुकाबले काफी ज्यादा है। साल 2025 में पूरे साल के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से कुल ₹1.66 लाख करोड़ रुपए निकाले थे। इस साल पांच महीनों में ही यह आंकड़ा पार हो गया है। डॉलर-अमेरिकी बॉन्ड यील्ड मजबूत होने से दबाव बढ़ा मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल – मैनेजर रिसर्च, हिमांशु श्रीवास्तव ने इस ट्रेंड पर कहा कि वैश्विक विकास (ग्लोबल ग्रोथ) को लेकर बनी अनिश्चितता, मुख्य क्षेत्रों में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की अस्थिर कीमतों की वजह से उभरते बाजारों (इमर्जिंग मार्केट्स) के प्रति निवेशकों का सेंटिमेंट कमजोर हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि मजबूत अमेरिकी डॉलर और बढ़ी हुई यूएस बॉन्ड यील्ड इस बिकवाली के मुख्य कारण हैं। विकसित बाजारों में बेहतर रिटर्न मिलने से सुरक्षित संपत्तियों का आकर्षण बढ़ा है और निवेशक डिफेंसिव रुख अपना रहे हैं। इसके अलावा ग्लोबल इन्फ्लेशन (महंगाई) और केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में कटौती के समय को लेकर बनी अनिश्चितता भी फंड एलोकेशन के फैसलों को प्रभावित कर रही है। रुपए पर दबाव बढ़ा, ₹96.14 के स्तर पर पहुंचा जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजिस्ट वी के विजयकुमार के मुताबिक, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और बढ़ते करंट अकाउंट डेफिसिट (चालू खाता घाटा) के कारण रुपए पर भारी दबाव देखा जा रहा है। साल की शुरुआत में डॉलर के मुकाबले रुपया 90 के स्तर पर था, जो 15 मई को 96 के स्तर को पार करते हुए 96.14 पर पहुंच गया है। AI कंपनियों की तरफ डायवर्ट हो रहा है फंड वी के विजयकुमार ने बताया कि अगर विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी रही और कच्चे तेल के दाम ऊंचे बने रहे, तो रुपया आगे और कमजोर हो सकता है। इसके साथ ही दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर फोकस करने वाली कंपनियों में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है। इस वजह से भारत जैसे देशों से फंड डायवर्ट हो रहा है, जिन्हें AI के क्षेत्र में थोड़ा पीछे माना जा रहा है। हालांकि, जब AI ट्रेड का मौजूदा बबल शांत होगा, तब यह ट्रेंड वापस बदल सकता है। FPI और बॉन्ड यील्ड क्या होते हैं? फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI): जब किसी देश के नागरिक या कंपनियां दूसरे देश के शेयर बाजार, बॉन्ड या म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो उसे फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट कहा जाता है। इन्हें शॉर्ट-टर्म इन्वेस्टर भी माना जाता है जो बाजार के हालातों को देखकर तेजी से पैसा निकालते या निवेश करते हैं। बॉन्ड यील्ड: बॉन्ड यील्ड वह रिटर्न या ब्याज होता है जो एक निवेशक को बॉन्ड में निवेश करने पर मिलता है। जब अमेरिका जैसे विकसित देशों में सरकारी बॉन्ड की यील्ड (रिटर्न) बढ़ती है, तो विदेशी निवेशक भारतीय बाजार जैसे जोखिम वाले शेयर बाजारों से पैसा निकालकर वहां सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में निवेश करने लगते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
₹2 Lakh Crore Sold Amidst Global Market Uncertainty

मुंबई28 मिनट पहले कॉपी लिंक मई महीने में भारतीय शेयर बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की निकासी जारी है। वैश्विक आर्थिक चिंताओं के कारण इस साल अब तक विदेशी निवेशक बाजार से ₹2 लाख करोड़ से ज्यादा निकाल चुके हैं। एनएसडीएल (NSDL) के डेटा के अनुसार, अकेले मई महीने में विदेशी निवेशकों ने अब तक ₹14,231 करोड़ की बिकवाली की है। 2025 के मुकाबले इस साल ज्यादा दबाव साल 2026 में अब तक की कुल निकासी पिछले पूरे साल के मुकाबले काफी ज्यादा है। साल 2025 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से कुल ₹1.66 लाख करोड़ निकाले थे। इस साल अब तक यह आंकड़ा ₹2 लाख करोड़ के पार जा चुका है, जो बाजार पर निरंतर बने बिकवाली के दबाव को दर्शाता है। सिर्फ फरवरी में आई थी खरीदारी, मार्च में हुई रिकॉर्ड बिकवाली इस साल विदेशी निवेशकों का रुख ज्यादातर निगेटिव ही रहा है। जनवरी में ₹35,962 करोड़ के शेयर बेचे गए थे। हालांकि, फरवरी एक अपवाद रहा जब निवेशकों ने ₹22,615 करोड़ का निवेश किया, जो पिछले 17 महीनों का सबसे बड़ा मंथली निवेश था। लेकिन यह बढ़त ज्यादा समय तक नहीं टिक पाई। मार्च में अब तक का सबसे बड़ा उलटफेर दिखा और रिकॉर्ड ₹1.17 लाख करोड़ बाजार से बाहर निकल गए। इसके बाद अप्रैल में भी ₹60,847 करोड़ की निकासी दर्ज की गई है। महंगाई और ब्याज दरें बनी बड़ी वजह मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल मैनेजर रिसर्च, हिमांशु श्रीवास्तव के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई, ब्याज दरों में बदलाव की आशंका और जियोपॉलिटिकल रिस्क इस बिकवाली के मुख्य कारण हैं। मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने महंगाई की चिंता बढ़ा दी है। इसी वजह से निवेशक अब जल्द ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद छोड़ रहे हैं और विकसित बाजारों के डेट इंस्ट्रूमेंट्स की ओर रुख कर रहे हैं। रुपए की कमजोरी से भी बढ़ा असर डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए में आने वाली अस्थिरता और कमजोरी भी विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय है। इससे डॉलर के संदर्भ में उनका रिटर्न प्रभावित होता है। जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार का कहना है कि रुपए की गिरावट और भारत की अर्निंग ग्रोथ को लेकर चिंताओं ने इस साल आउटफ्लो बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। पावर-कंस्ट्रक्शन सेक्टर में अभी भी रुचि लगातार हो रही बिकवाली के बावजूद विदेशी निवेशक पूरी तरह बाजार से बाहर नहीं हुए हैं। वे पावर, कंस्ट्रक्शन और कैपिटल गुड्स जैसे चुनिंदा सेक्टर्स में अभी भी निवेश कर रहे हैं। इसके अलावा मजबूत कमाई और अच्छी ग्रोथ वाले मिड-कैप और कुछ स्मॉल-कैप शेयरों में भी वे खरीदारी कर रहे हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर अब निवेशकों का रुझान दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों की ओर बढ़ रहा है, जहां AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के कारण बेहतर कमाई की उम्मीद है। क्या होता है FPI और डॉलर रिटर्न? FPI (विदेशी पोर्टफोलियो निवेश): जब विदेशी नागरिक या कंपनियां किसी दूसरे देश के शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में पैसा लगाते हैं, तो उसे FPI कहा जाता है। ये निवेशक मुनाफा होते ही जल्दी पैसा निकाल भी सकते हैं। डॉलर रिटर्न: विदेशी निवेशक भारत में रुपए में निवेश करते हैं। अगर रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरती है, तो उन्हें अपना पैसा वापस डॉलर में बदलने पर कम मुनाफा होता है, जिसे डॉलर रिटर्न का नुकसान कहते हैं। ये खबर भी पढ़ें… इस हफ्ते ईरान-अमेरिका तनाव पर होगी निवेशकों की नजर: चौथी तिमाही के नतीजों समेत 5 फैक्टर्स तय करेंगे चाल; निफ्टी के लिए 24,500 पर रेजिस्टेंस कल 11 मई से शुरू होने वाले हफ्ते में शेयर बाजार में काफी हलचल रहने वाली है। कंपनियों के चौथी तिमाही के नतीजे, अमेरिका-ईरान तनाव और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जैसे फैक्टर बाजार की दिशा तय करेंगे। चलिए समझते हैं अगले हफ्ते बाजार में क्या हो सकता है। पूरी खबर पढ़ें…. दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…









