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Supreme Court: Reforms on Public Demand, Not Forced

Supreme Court: Reforms on Public Demand, Not Forced

नई दिल्लीकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने समाज की जरूरतों के अनुसार प्रावधान बनाए हैं, जिन्हें नौ जजों की बेंच बदला नहीं सकती। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की बेंच सबरीमाला मंदिर समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। सुनवाई सोमवार को 14वें दिन जारी रही। जस्टिस बी वी नागरत्ना ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के नाम पर खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने संकेत दिया कि जनता की सहमति से सुधार की मांग उठे तो उस पर विचार हो सकता है। मामले की सुनवाई बुधवार को फिर होगी। 7 सवाल, जिन पर बहस हो रही… सुनवाई के दौरान केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता ने कहा कि धर्म के जरूरी पहलुओं को सामाजिक सुधार के नाम पर हटाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में पूजा का अधिकार महत्वपूर्ण है और यह पवित्र स्थानों पर होता है, इन्हें हटाना अधिकार का उल्लंघन होगा। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। धर्मों में सुधार की गुंजाइश रखी है कोर्ट में तर्क दिया गया कि राज्य सामाजिक कल्याण के लिए कानून बनाता है तो उसे धार्मिक प्रथाओं के आधार पर रद्द नहीं किया जाना चाहिए। महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि तर्कवादी हर चीज को तर्क की कसौटी पर देखते हैं। उन्होंने कहा कि संविधान में वैज्ञानिक सोच और सुधार की भावना को बढ़ावा देने की बात अनुच्छेद 51A(h) में कही गई है। स्वामी अग्निवेश की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि संविधान ने धर्मों में सुधार की गुंजाइश रखी है। उन्होंने अनुच्छेद 26 का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें “मैनेज” शब्द का इस्तेमाल किया गया है, “कंट्रोल” नहीं। इससे साफ होता है कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन है। धर्म में सुधार से सभ्यता का संतुलन नहीं बिगड़ेगा जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अल्पसंख्यकों के लिए अनुच्छेद 30 जैसे प्रावधान उनकी परिस्थितियों को देखते हुए बनाए गए थे। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या नौ जजों की बेंच इस व्यवस्था को बदल सकती है, जिसे संविधान निर्माताओं ने सोच-समझकर तय किया था। गुरुस्वामी ने जवाब में कहा कि संविधान निर्माताओं को भरोसा था कि धर्म में सुधार से सभ्यता का संतुलन नहीं बिगड़ेगा। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि अगर हर धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती दी जाएगी, तो बड़ी संख्या में याचिकाएं आएंगी और धर्मों की संरचना प्रभावित हो सकती है। सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई हुई सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है। इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। पिछली 9 सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए… 7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत 8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा 9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा 15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता 17 अप्रैल- SC बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी 21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं 22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- हिंदू एकजुट रहें, संप्रदायों में बंटे नहीं 23 अप्रैल- इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद आने पर रोक नहीं 28 अप्रैल- धार्मिक प्रथाओं के नाम पर सड़कें ब्लॉक नहीं कर सकते 29 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- धर्म के विनाश का हिस्सा नहीं बनेंगे 5 मई- सबरीमाला केस में वकीलों ने याचिका लगाई; जज ने कहा- अपने लोगों के लिए काम करें 6 मई- सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला बार-बार रुख नहीं बदल सकते 7 मई- सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला-हर धार्मिक प्रथा को चुनौती गलत ——————————————————————- ये खबर भी पढ़ें: सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला-हर धार्मिक प्रथा को चुनौती गलत:इससे धर्म और समाज दोनों टूट जाएंगे, अदालतों में सैकड़ों केस आएंगे सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं और धर्म के मामलों को अदालत में चुनौती देने लगेंगे, तो इससे धर्म और समाज पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे सैकड़ों याचिकाएं आएंगी और हर रिवाज पर सवाल उठने लगेंगे। पढ़ें पूरी खबर… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

Supreme Court Concerned Over Pending Bail Petitions

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Hindi News National Supreme Court Concerned Over Pending Bail Petitions | Auto Listing System Demand नई दिल्लीकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश के अलग-अलग हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि जमानत मामलों की जल्दी सुनवाई और फैसला करने के लिए मजबूत व्यवस्था बनानी जरूरी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि इसके लिए पेंडिंग बेल याचिकाओं की ऑटोमैटिक लिस्टिंग का सिस्टम तैयार किया जाए और मामलों के निपटारे की तय समय सीमा भी होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट, राज्य सरकारें और जांच एजेंसियां मिलकर ऐसा सिस्टम तैयार करें, जिससे जमानत मामलों का समय पर फैसला हो सके। उसका मकसद किसी हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को और बेहतर बनाना है। कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी देता है। इस प्रक्रिया में पीड़ितों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख सुझाव: ऑटोमैटिक लिस्टिंग: ऐसा सॉफ्टवेयर सिस्टम बनाएं, जिससे हर जमानत याचिका कम से कम 2 हफ्ते में एक बार अपने आप सुनवाई के लिए लिस्ट में आ जाए। नोटिस प्रक्रिया खत्म हो: जमानत याचिकाओं में नोटिस जारी और स्वीकार करने की प्रक्रिया हटाई जाए। उन्हें सीधे सुनवाई के लिए लिस्ट किया जाए। डिजिटल पोर्टल का इस्तेमाल: स्टेटस रिपोर्ट और जरूरी दस्तावेज ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किए जाएं ताकि प्रक्रिया तेज हो सके। सरकारी वकीलों की जिम्मेदारी: सरकारी वकील बिना कारण मामले की सुनवाई टालने से बचें। जांच अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि पीड़ितों को सुनवाई में शामिल होने और कानूनी मदद लेने का पूरा मौका मिले। सुप्रीम कोर्ट ने पेंडिंगज मानत याचिकाओं की जानकारी मांगी दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से पेंडिंग नियमित और अग्रिम जमानत याचिकाओं की जानकारी मांगी थी। कोर्ट ने पूछा था कि याचिका कब दाखिल हुई, उसकी सुनवाई कब हुई और फैसले की क्या स्थिति है। कोर्ट ने कहा कि ज्यादातर हाईकोर्ट ने जरूरी आंकड़े दे दिए हैं। कई जगहों पर पेंडिंग मामलों को तेजी से निपटाने की कोशिश भी शुरू कर दी गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेंडिंग जमानत याचिकाओं की संख्या को बहुत ज्यादा बताया। कोर्ट ने कहा कि वहां के जज हर दिन सैकड़ों मामलों की सुनवाई कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद पेंडिंग मामलों का दबाव काफी अधिक बना हुआ है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और प्रशासनिक समिति को सुझाव दिया कि जमानत याचिकाओं की सुनवाई के लिए पहले से तय तारीख देने की व्यवस्था बनाई जाए। कोर्ट बोला- पीड़ितों को सुनवाई में शामिल करें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नशीले पदार्थों (NDPS) के कानून से जुड़े मामलों में FSL रिपोर्ट समय पर मिलना बहुत जरूरी है। जांच अधिकारियों की जिम्मेदारी भी अहम होती है, खासकर पीड़ितों से जुड़े मामलों में। जांच अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि पीड़ितों को सुनवाई में शामिल होने और कानूनी मदद लेने का पूरा मौका मिले। यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। इससे पहले 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट सभी राज्यों को जमानत मामलों के जल्द निपटारे में हाईकोर्ट की मदद करने का निर्देश दे चुका है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

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Hindi News National Supreme Court Concerned Over Pending Bail Petitions | Auto Listing System Demand नई दिल्ली13 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश के अलग-अलग हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि जमानत मामलों की जल्दी सुनवाई और फैसला करने के लिए मजबूत व्यवस्था बनानी जरूरी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि इसके लिए पेंडिंग बेल याचिकाओं की ऑटोमैटिक लिस्टिंग का सिस्टम तैयार किया जाए और मामलों के निपटारे की तय समय सीमा भी होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट, राज्य सरकारें और जांच एजेंसियां मिलकर ऐसा सिस्टम तैयार करें, जिससे जमानत मामलों का समय पर फैसला हो सके। उसका मकसद किसी हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को और बेहतर बनाना है। कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा की गारंटी देता है। इस प्रक्रिया में पीड़ितों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने पेंडिंग जमानत याचिकाओं की जानकारी मांगी थी दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से पेंडिंग नियमित और अग्रिम जमानत याचिकाओं की जानकारी मांगी थी। कोर्ट ने पूछा था कि याचिका कब दाखिल हुई, उसकी सुनवाई कब हुई और फैसले की क्या स्थिति है। कोर्ट ने कहा कि ज्यादातर हाईकोर्ट ने जरूरी आंकड़े दे दिए हैं। कई जगहों पर पेंडिंग मामलों को तेजी से निपटाने की कोशिश भी शुरू कर दी गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेंडिंग जमानत याचिकाओं की संख्या को बहुत ज्यादा बताया। कोर्ट ने कहा कि वहां के जज हर दिन सैकड़ों मामलों की सुनवाई कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद पेंडिंग मामलों का दबाव काफी अधिक बना हुआ है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और प्रशासनिक समिति को सुझाव दिया कि जमानत याचिकाओं की सुनवाई के लिए पहले से तय तारीख देने की व्यवस्था बनाई जाए। कोर्ट बोला- पीड़ितों को सुनवाई में शामिल करें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नशीले पदार्थों (NDPS) के कानून से जुड़े मामलों में FSL रिपोर्ट समय पर मिलना बहुत जरूरी है। जांच अधिकारियों की जिम्मेदारी भी अहम होती है, खासकर पीड़ितों से जुड़े मामलों में। जांच अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि पीड़ितों को सुनवाई में शामिल होने और कानूनी मदद लेने का पूरा मौका मिले। यह मामला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। इससे पहले 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट सभी राज्यों को जमानत मामलों के जल्द निपटारे में हाईकोर्ट की मदद करने का निर्देश दे चुका है। देश के हाईकोर्ट में करीब 63 लाख मामले पेंडिंग सरकार की तरफ से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में 90,897 मामले, देश के 25 हाईकोर्ट में 63,63,406 मामले और निचली अदालतों में 4,84,57,343 मामले पेंडिंग हैं। यह आंकड़े 8 दिसंबर 2025 तक के हैं। हालांकि जमानत याचिकाओं के सटीक डेटा उपलब्ध नहीं है। दक्ष डेटाबेस के मुताबिक देश के हाईकोर्ट में हर साल लगभग 4 से 4.30 लाख से ज्यादा जमानत याचिकाएं दायर की जाती हैं। —————————- ये खबर भी पढ़ें… देश में 5.50 करोड़ केस कोर्ट में पेंडिंग, इनमें निचली अदालतों में 4.84 करोड़ केस केंद्र सरकार ने गुरुवार को राज्यसभा में बताया कि देशभर की अदालतों में कुल 5.49 करोड़ से अधिक केस पेंडिंग हैं। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक लिखित उत्तर में कहा कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों तक लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…