Sunday, 12 Apr 2026 | 10:38 PM

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जस्टिस नागरत्ना बोलीं- चुनाव आयोग को स्वतंत्र रहना चाहिए:कोई भी राजनीतिक प्रभाव न हो; 2027 में चीफ जस्टिस बन सकती हैं

जस्टिस नागरत्ना बोलीं- चुनाव आयोग को स्वतंत्र रहना चाहिए:कोई भी राजनीतिक प्रभाव न हो; 2027 में चीफ जस्टिस बन सकती हैं

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को कहा कि चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र रहना चाहिए और उस पर किसी भी तरह का राजनीतिक प्रभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरे संवैधानिक संस्थाओं को भी अपनी गरिमा बनाकर रखनी चाहिए। उन्होंने पटना की चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में ‘कॉन्स्टीट्यूशनलिज्म बियॉन्ड राइट्स: व्हाई स्ट्रक्चर मैटर्स’ पर बात की। जस्टिस नागरत्ना ने कहा- यदि संवैधानिक ढांचा धीरे-धीरे कमजोर होता है, तो इससे संवैधानिक ब्रेकडाउन की स्थिति पैदा हो सकती है, भले ही अधिकार औपचारिक रूप से मौजूद रहें। जस्टिस नागरत्ना सितंबर 2027 में सीनियरिटी के आधार पर देश की चीफ जस्टिस बन सकती हैं। जस्टिस नागरत्ना बोलीं- संस्थान एक-दूसरे की जांच करें जस्टिस बीवी नागरत्ना ने आगे कहा कि जब संस्थाएं एक-दूसरे की जांच और निगरानी करना बंद कर देती हैं, तभी असली समस्या शुरू होती है। चुनाव आयोग, कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (CAG) और वित्त आयोग जैसी संस्थाएं निष्पक्ष व्यवस्था बनाए रखने में जरूरी भूमिका निभाती हैं। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया पर कहा कि हमारे लोकतंत्र में समय पर चुनाव होने से सरकारें सही तरीके से बदलती रहती हैं। इस प्रक्रिया पर नियंत्रण का मतलब राजनीतिक मुकाबले के नियमों को अपने हाथ में लेना है। 2 अप्रैल: बंगाल में चुनाव अधिकारियों को बंधक बनाया, सुप्रीम कोर्ट नाराज इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों के संबंध में टिप्पणी की थी। दरअसल गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बना लिया गया था। इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कहा था- उन्हें नौ घंटे बंधक बनाकर रखा। खाना-पानी तक नहीं मिला। यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। हमें पता है उपद्रवी कौन हैं, इनका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। CEC ज्ञानेश कुमार ने मामले की जांच NIA को सौंप दी। NIA टीम शुक्रवार को पश्चिम बंगाल पहुंचेगी। ———————————— ये खबर भी पढ़ें… केरलम में 339 करोड़पति कैंडिडेट, 38% पर क्रिमिनल केस, 5 साल में 48% बढ़े करोड़पति उम्मीदवार केरलम विधानसभा चुनाव में 38% उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें सबसे ज्यादा 72 उम्मीदवार कांग्रेस से हैं। BJP के 59 और CPI(M) के 51 उम्मीदवार हैं। वहीं, 23% पर हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर केस दर्ज हैं। पूरी खबर पढ़ें…

जस्टिस नागरत्ना बोलीं- चुनाव आयोग को स्वतंत्र रहना चाहिए:कोई भी राजनीतिक प्रभाव न हो; 2027 में चीफ जस्टिस बन सकती हैं

जस्टिस नागरत्ना बोलीं- चुनाव आयोग को स्वतंत्र रहना चाहिए:कोई भी राजनीतिक प्रभाव न हो; 2027 में चीफ जस्टिस बन सकती हैं

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को कहा कि चुनाव आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र रहना चाहिए और उस पर किसी भी तरह का राजनीतिक प्रभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरे संवैधानिक संस्थाओं को भी अपनी गरिमा बनाकर रखनी चाहिए। उन्होंने पटना की चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में ‘कॉन्स्टीट्यूशनलिज्म बियॉन्ड राइट्स: व्हाई स्ट्रक्चर मैटर्स’ पर बात की। जस्टिस नागरत्ना ने कहा- यदि संवैधानिक ढांचा धीरे-धीरे कमजोर होता है, तो इससे संवैधानिक ब्रेकडाउन की स्थिति पैदा हो सकती है, भले ही अधिकार औपचारिक रूप से मौजूद रहें। जस्टिस नागरत्ना सितंबर 2027 में सीनियरिटी के आधार पर देश की चीफ जस्टिस बन सकती हैं। जस्टिस नागरत्ना बोलीं- संस्थान एक-दूसरे की जांच करें जस्टिस बीवी नागरत्ना ने आगे कहा कि जब संस्थाएं एक-दूसरे की जांच और निगरानी करना बंद कर देती हैं, तभी असली समस्या शुरू होती है। चुनाव आयोग, कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (CAG) और वित्त आयोग जैसी संस्थाएं निष्पक्ष व्यवस्था बनाए रखने में जरूरी भूमिका निभाती हैं। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया पर कहा कि हमारे लोकतंत्र में समय पर चुनाव होने से सरकारें सही तरीके से बदलती रहती हैं। इस प्रक्रिया पर नियंत्रण का मतलब राजनीतिक मुकाबले के नियमों को अपने हाथ में लेना है। 2 अप्रैल: बंगाल में चुनाव अधिकारियों को बंधक बनाया, सुप्रीम कोर्ट नाराज इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों के संबंध में टिप्पणी की थी। दरअसल गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बना लिया गया था। इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कहा था- उन्हें नौ घंटे बंधक बनाकर रखा। खाना-पानी तक नहीं मिला। यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। हमें पता है उपद्रवी कौन हैं, इनका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। CEC ज्ञानेश कुमार ने मामले की जांच NIA को सौंप दी। NIA टीम शुक्रवार को पश्चिम बंगाल पहुंचेगी। ———————————— ये खबर भी पढ़ें… केरलम में 339 करोड़पति कैंडिडेट, 38% पर क्रिमिनल केस, 5 साल में 48% बढ़े करोड़पति उम्मीदवार केरलम विधानसभा चुनाव में 38% उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं। इनमें सबसे ज्यादा 72 उम्मीदवार कांग्रेस से हैं। BJP के 59 और CPI(M) के 51 उम्मीदवार हैं। वहीं, 23% पर हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर केस दर्ज हैं। पूरी खबर पढ़ें…

Bhojshala Case Hearing Today | Indore High Court to Review Survey Report, Objections

Bhojshala Case Hearing Today | Indore High Court to Review Survey Report, Objections

इंदौर/धार7 घंटे पहले कॉपी लिंक भोजशाला को लेकर ASI की सर्वे रिपोर्ट पर अदालत में आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। धार के भोजशाला विवाद मामले में 6 अप्रैल से रोज सुनवाई होगी। हाईकोर्ट के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच सोमवार दोपहर ढाई बजे से सभी याचिकाओं को एक साथ सुनेगी। गुरुवार को हुई सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया है कि पहले याचिकाकर्ताओं के तर्क सुने जाएंगे, फिर आपत्ति लगाने वालों को दलील रखने का अवसर दिया जाएगा। सुनवाई के दौरान हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन, विनय जोशी मौजूद रहे जबकि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से एडवोकेट सलमान खुर्शीद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- हाईकोर्ट ही करेगा अंतिम फैसला इससे पहले बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने भोजशाला विवाद में अहम आदेश देते हुए स्पष्ट किया था कि मामले का अंतिम निर्णय अब हाईकोर्ट ही करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट, वीडियोग्राफी और पक्षकारों की आपत्तियों पर हाईकोर्ट अंतिम सुनवाई में विचार करेगा। सभी मुद्दे हाईकोर्ट के समक्ष खुले रहेंगे और वहीं तय किए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- ASI द्वारा तैयार की गई सर्वे रिपोर्ट सभी पक्षों को उपलब्ध करा दी गई है। कई पक्षों ने इस पर अपनी आपत्तियां भी दर्ज कराई हैं। ASI द्वारा की गई साइट की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी से जुड़े बिंदुओं को भी हाईकोर्ट गंभीरता से देखेगा। यदि वीडियोग्राफी के आधार पर कोई नई आपत्तियां उठती हैं, तो उन पर भी सुनवाई के दौरान विचार किया जाएगा। इसके अलावा शीर्ष कोर्ट ने पहले दिए गए निर्देश को बरकरार रखते हुए कहा था कि भोजशाला परिसर के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। साथ ही, 7 अप्रैल 2003 को ASI द्वारा जारी आदेश का पालन जारी रहेगा। हाईकोर्ट में पेश की जा चुकी ASI की सर्वेक्षण रिपोर्ट मध्य प्रदेश में धार स्थित भोजशाला को लेकर पुरातात्विक सर्वेक्षण रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश की जा चुकी है। रिपोर्ट में परिसर के ऐतिहासिक स्वरूप, स्थापत्य और शिलालेखों से जुड़े कई बड़े खुलासे सामने आए हैं। विशेष रूप से 10वीं से 13वीं शताब्दी के दौरान राजा भोज और राजा अर्जुन वर्मन द्वारा कराए गए निर्माण और सांस्कृतिक कार्यों के सबूत मिले हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पूरे परिसर में कुल 106 स्तंभ मिले हैं, जिन पर अलग-अलग प्रकार की नक्काशी और डिजाइन हैं। इसके अलावा 32 शिलालेख भी हैं। इन शिलालेखों में राजा भोज के समय लिखित और अर्जुन वर्मन के राजगुरु मदन द्वारा रचित ‘पारिजलमंजरी नाटिका’ और ‘विजयश्री’ नाटक के पहले दो अंकों का उल्लेख है। अलग-अलग पत्थरों पर ऐसी कई रचनाएं और नाट्यांश लिखे हैं। परिसर से मिले कुछ शिलालेखों में 14वीं शताब्दी के दौरान मालवा में मुसलमानों के आने और मुस्लिम शासन की स्थापना का जिक्र भी है। बता दें कि 1389 ईस्वी में दिलावर खान, जिसका मूल नाम हुसैन था, को दिल्ली से मालवा प्रांत का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। बाद में दिलावर खान ने धार में स्वतंत्रता की घोषणा की। इसे अपनी राजधानी बनाया और 1401 ईस्वी में शाही उपाधि धारण कर स्वतंत्र रूप से राज्य चलाया। रिपोर्ट में दर्ज इन तथ्यों को लेकर ऐतिहासिक और कानूनी परिप्रेक्ष्य में आगे बहस की संभावना जताई जा रही है। तस्वीरों में समझिए, भोजशाला परिसर में क्या-क्या मिला पूरे परिसर में ऐसे कुल 106 पिलर खड़े हैं। सभी अलग-अलग स्थानों पर हैं और अलग-अलग दिशाओं में हैं। पुरातत्व विभाग ने इन 106 पिलर्स की वास्तविक डिजाइन की ड्रॉइंग भी कोर्ट में पेश की है। परिसर में 56 अरबी और फारसी शिलालेख भी मिले नागपुर के शिलालेख विज्ञान विभाग के एक पुरातत्वविद् ने भोजशाला परिसर की कमाल मौला मस्जिद और कमाल मौला मकबरे में मिले 56 अरबी और फारसी शिलालेखों का अध्ययन किया। इनमें 43 स्याही से लिखे शिलालेख हैं, जिनमें यहां आने वाले लोगों का विवरण है। कुछ शिलालेखों में इस्लामी मत, प्रार्थना और ईश्वर के गुणों जैसे धार्मिक ग्रंथों के अंश भी हैं जबकि कुछ में फारसी कविता के दोहे और व्यक्तियों के नाम हैं। अरबी और फारसी शिलालेख मालवा के मुस्लिम इतिहास को समझने में सहायक हैं, जो यहां मुसलमानों के आने और धार को राजधानी बनाकर मालवा में शासन की स्थापना के बारे में बताते हैं। शिलालेखों पर लिखीं कुरान की आयतें एएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक, कमाल मौला मकबरे के परिसर के अंदर शिलालेख मिले हैं। इन पर कुरान की आयतें लिखी हैं, जो ईश्वर के गुणों और एकेश्वरवाद पर आधारित हैं। ये शिलालेख दो प्रकार के हैं। अलाउद्दीन महमूद शाह ने बनवाई थी कुछ संरचना ASI की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां मिला एपी-48 शिलालेख मालवा के सुल्तान महमूद शाह प्रथम का है, जिसे इतिहास में अलाउद्दीन महमूद शाह के नाम से भी जाना जाता है। जिसने हिजरी 861 (1456-57 ईस्वी) में मकबरे के परिसर में गैलरी, आंगन, द्वार का गुंबद, पत्थर की जाली, कोठरियां, कुआं, आंतरिक भाग में एक ऊंचा चबूतरा, मठ, प्रवेश कक्ष, कंगूरे आदि जैसी संरचनाएं बनवाई थीं। इस शिलालेख को हिजरी 866 (1461-62 ईस्वी) में हबी अल-हाफिज अश-शिराजी अल-मुर्शिदी द्वारा बनवाया गया था। शिलालेख AP-01 कमाल मौला मस्जिद के केंद्रीय मेहराब के आसपास से मिला है। शिलालेख AP-02 उपदेश मंच के ऊपर स्थित है, जबकि शिलालेख AP-03 दक्षिणी दीवार पर मिला है। ये तीनों कुरान के शिलालेख हैं, जो इस संरचना को इस्लामी पहचान देते हैं। शिलालेख AP-02 कुरान के अध्याय 51 की आयत 55 का आंशिक भाग है। इसे पता चलता है कि यह संरचना इस्लाम धर्म के प्रचार, सांस्कृतिक मूल्यों और शिष्टाचार के संवर्धन और व्यापारिक केंद्र के रूप में काम करती रही है। ये खबर भी पढ़ें… भोजशाला पर अलाउद्दीन खिलजी के हमले के 700 साल भोजशाला का इतिहास करीब 990 साल पुराना है। 1034 ई. में राजा भोज ने इसका निर्माण कराया था और यहां मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की थी। 200 सालों से ज्यादा समय तक भोजशाला का वैभव कायम रहा, लेकिन 1305 ई में मोहम्मद खिलजी ने भोजशाला पर आक्रमण कर इसे नेस्तनाबूत करने की कोशिश की। पढ़ें पूरी खबर… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

दतिया विधायक राजेंद्र भारती दोषी करार:सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विकास बैंक मामले में धारा 420 के तहत दोषी ठहराया

दतिया विधायक राजेंद्र भारती दोषी करार:सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विकास बैंक मामले में धारा 420 के तहत दोषी ठहराया

दतिया विधायक राजेंद्र भारती को सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भूमि विकास बैंक से जुड़े एक मामले में धारा 420 के तहत दोषी करार दिया है। न्यायालय के आदेश के बाद उन्हें गिरफ्तार कर दिल्ली की जेल भेज दिया गया है।

बंगाल SIR- 60 लाख में 47 लाख आपत्तियां निपटीं:SC बोला- 7 अप्रैल तक सबका निपटारा होगा; ट्रिब्यूनल गलत तरीके से जोड़े-हटाए नामों को सुधारेंगे

बंगाल SIR- 60 लाख में 47 लाख आपत्तियां निपटीं:SC बोला- 7 अप्रैल तक सबका निपटारा होगा; ट्रिब्यूनल गलत तरीके से जोड़े-हटाए नामों को सुधारेंगे

पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ लोगों की अपील सुन रहे अपीलीय ट्रिब्यूनल नए दस्तावेजों को स्वीकार कर सकते हैं। हालांकि बिना वेरिफिकेशन दस्तावेज स्वीकार नहीं किए जाएंगे। पहले कोर्ट ने कहा था कि अपीलीय ट्रिब्यूनल ऐसे नए दस्तावेज स्वीकार नहीं करेंगे, जो पहले जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं किए गए थे। हालांकि अब कोर्ट ने अपने आदेश में बदलाव किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में गलत तरीके से जोड़े गए या हटाए गए नामों को ट्रिब्यूनल सुधार सकता है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने चिंता जताई कि नए वोटर के रूप में रजिस्ट्रेशन के लिए एक साथ बड़ी संख्या में फॉर्म-6 जमा किए जा रहे हैं। इसपर कोर्ट ने कहा- जब तक कोई चीज रिकॉर्ड में न हो, हम जुबानी दलीलों के आधार पर कोई फैसला नहीं कर सकते। यह खबर लगातार अपडेट हो रही है…

Vande Mataram Not Mandatory for Public Events

Vande Mataram Not Mandatory for Public Events

नई दिल्ली14 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाने के संबंध में MHA के सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह निर्देश अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सर्कुलर को चुनौती देने वाली याचिका समय से पहले दायर की गई है और यह भेदभाव की अस्पष्ट आशंका पर आधारित है। CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी में वंदेमातरम न गाने पर किसी भी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है। बेंच ने कहा- ये दिशानिर्देश केवल एक प्रोटोकॉल हैं और इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है। जब दंडात्मक कार्रवाई होगी या इसे गाना अनिवार्य किया जाएगा, तब हम इन सब बातों पर ध्यान देंगे। याचिकाकर्ता का दावा- सलाह देने के बहाने साथ गाने मजबूर किया जाएगा याचिका मुहम्मद सईद नूरी ने दायर की थी। याचिकाकर्ता के वकील संजय हेगड़े ने कहा कि वंदेमातरम गाते समय व्यवधान करने पर सजा का प्रावधान है। उन्होंने कहा- “जो व्यक्ति वंदेमातरम गाने या राष्ट्रगीत के समय खड़े होने से इनकार करता है, उस पर हमेशा बहुत बड़ा बोझ होता है। सलाह देने के बहाने लोगों को साथ गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।” गणतंत्र दिवस के बाद जारी किए गए थे दिशा-निर्देश गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा। यह आदेश 28 जनवरी को जारी हुआ, लेकिन मीडिया में इसकी जानकारी 11 फरवरी को आई। आदेश में साफ लिखा है कि अगर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ साथ में गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा। इस दौरान गाने या सुनने वालों को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा। नए नियमों के अनुसार, राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे। पढ़ें पूरी खबर… बंकिम चंद्र ने 1875 में लिखा था, आनंदमठ में छपा था भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के पावन अवसर पर लिखा था। यह 1882 में पहली बार उनकी पत्रिका बंगदर्शन में उनके उपन्यास आनंदमठ के हिस्से के रूप में छपा था। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम गाया। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम हो गई थीं। ‘वंदे मातरम’ एक संस्कृत वाक्यांश है, जिसका मतलब है- हे मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘वंदे मातरम’ भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों का नारा बन गया था। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

kolkata i-pac ed raid supreme court mamata banerjee tmc west bengal

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नई दिल्ली2 घंटे पहले कॉपी लिंक तस्वीर 8 जनवरी की है, जब बंगाल CM ममता ने कोलकाता में ED की छापेमारी के बीच मीडिया को संबोधित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में I-PAC के ऑफिस में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रेड के मामले में सुनवाई की। कोर्ट ने मंगलवार को ममता बनर्जी की बंगाल सरकार से पूछा कि अगर केंद्र में आपकी सरकार होती और कोई राज्य ऐसी कार्रवाई करता तो आपका रुख क्या होता। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने पूछा कि क्या ड्यूटी पर मौजूद ED अधिकारी अपने अधिकार खो देते हैं। कोर्ट ने बताया कि ED के कुछ अधिकारियों ने निजी तौर पर भी याचिका दायर की है। राज्य की ओर से सीनीयर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि ED के पास अन्य कानूनी विकल्प हैं, इसलिए वह आर्टिकल 32 के तहत याचिका नहीं दे सकती। जांच करना अधिकारी का मौलिक अधिकार नहीं, सिर्फ कानूनी अधिकार है। इस पर कोर्ट ने कहा कि ED अधिकारियों के मौलिक अधिकार भी हैं। सिर्फ यह न कहें कि वे अधिकारी हैं, इसलिए नागरिक नहीं हैं। उनकी याचिकाओं को भी महत्व देना होगा। कोर्ट रूम लाइव : सिब्बल- ED आर्टिकल 32 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास दूसरे कानूनी उपाय मौजूद हैं। किसी अधिकारी के पास जांच करने का मौलिक अधिकार नहीं होता। यह सिर्फ कानून से मिला अधिकार है, इसलिए इसमें दखल देने को मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। सिब्बल- अगर ऐसा माना गया तो हर पुलिस अधिकारी सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने लगेगा, जिससे आपराधिक कानून की मूल संरचना प्रभावित होगी। जस्टिस मिश्रा- ED अधिकारियों के मौलिक अधिकारों पर भी ध्यान दें। सिर्फ यह न कहें कि वे अधिकारी हैं, इसलिए नागरिक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग अधिकारियों की याचिकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अब पूरे मामले को समझिए 8 जनवरी को ED की टीम ने प्रतीक जैन के कोलकाता के गुलाउडन स्ट्रीट स्थित घर और दूसरी टीम सॉल्टलेक स्थित दफ्तर पर छापा मारा था। प्रतीक जैन ही ममता बनर्जी के लिए पॉलिटिकल स्ट्रैटजी तैयार करते हैं। कार्रवाई सुबह 6 बजे से शुरू हुई थी, लेकिन करीब 11:30 बजे के बाद मामला बढ़ा। सबसे पहले कोलकाता पुलिस कमिश्नर, प्रतीक के आवास पर पहुंचे। कुछ समय बाद सीएम ममता बनर्जी खुद लाउडन स्ट्रीट स्थित उनके घर पहुंच गईं। ममता वहां कुछ देर रुकीं। जब बाहर निकलीं, तो उनके हाथ में एक हरी फाइल दिखाई दी। इसके बाद वे I-PAC के ऑफिस भी गईं। उन्होंने कहा- गृहमंत्री मेरी पार्टी के दस्तावेज उठवा रहे हैं। ED ने कहा कि पश्चिम बंगाल में 6 और दिल्ली में 4 ठिकानों पर छापेमारी की गई। ममता 8 जनवरी की दोपहर 12 बजे I-PAC के डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर पहुंची थीं। I-PAC रेड मामला : 2,742 करोड़ का मनी लॉन्ड्रिंग केस I-PAC यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी एक पॉलिटिकल कंसल्टेंसी कंपनी है। यह राजनीतिक दलों के लिए बड़े स्तर पर चुनावी अभियानों का काम करती है। कंपनी और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन पर करोड़ों रुपए के कोयला चोरी घोटाले में मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। CBI ने इस मामले में 27 नवंबर 2020 को FIR दर्ज की थी। पूरा मामला ₹2,742 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। आरोप है कि ₹20 करोड़ हवाला के जरिए I-PAC तक ट्रांसफर हुए। ED ने 28 नवंबर 2020 को इसकी जांच शुरू की थी। 8 जनवरी 2026 को ED ने कोलकाता में I-PAC और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर और ऑफिस पर छापा मारा था। ED के अफसरों ने प्रतीक के घर और ऑफिस से कई डॉक्यूमेंट्स जब्त किए। रेड के दौरान फाइलें लेकर चली गईं थी CM ममता सर्च ऑपरेशन के दौरान, CM ममता बनर्जी अन्य TMC नेताओं के साथ I-PAC ऑफिस पहुंचीं। इसके बाद काफी हंगामा हुआ। ममता ऑफिस से कई फाइलें लेकर बाहर निकलीं और मीडिया से बात की। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय एजेंसी पर हद से ज्यादा दखलंदाजी का आरोप लगाया। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया है कि I-PAC पार्टी के चुनाव रणनीतिकार के रूप में काम करता है और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ED ने गोपनीय चुनाव रणनीति से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए रेड डाली। पश्चिम बंगाल में कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। TMC ने ED की कार्रवाई में बाधा डालने के आरोप का खंडन किया। वहीं पश्चिम बंगाल पुलिस ने ED अधिकारियों के खिलाफ FIR भी दर्ज की। —————————————- ये खबर भी पढ़ें… जहां चुनाव, वहां ED ने फाइलें खोलीं, बंगाल से पहले 3 राज्यों महाराष्ट्र-दिल्ली-झारखंड में यही पैटर्न पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले प्रवर्तन निदेशालय (ED) की बढ़ती सक्रियता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। ED का काम आर्थिक अपराधों की जांच करना, काले धन और मनी लॉन्ड्रिंग पर रोक लगाना है, लेकिन कई बार उसकी कार्रवाई की टाइमिंग सवालों के घेरे में आ जाती है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

First euthanasia in India Ghaziabad Harish Rana case Delhi AIIMS

First euthanasia in India Ghaziabad Harish Rana case Delhi AIIMS

31 साल के हरीश 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी। हरीश राणा ने मंगलवार को दिल्ली एम्स में अंतिम सांस ली। PTI ने सूत्रों के हवाले से इसकी पुष्टि की है। 31 साल के हरीश 13 साल से कोमा में थे। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु की इजाजत दी थी। . ये देश का पहला मामला है, जिसमें किसी को इच्छामृत्यु दी गई है। 14 मार्च को हरीश को दिल्ली एम्स में शिफ्ट किया गया था। एम्स प्रशासन ने 16 मार्च को हरीश राणा की फीडिंग ट्यूब हटा दी थी। एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया दिया गया। इसका मतलब होता है कि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को जिंदा रखने के लिए जो बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि मरीज की प्राकृतिक रूप से मौत हो सके। हरीश राणा की ये तस्वीर उस दौरान की है जब उन्हें एम्स शिफ्ट नहीं किया गया था। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था फैसला सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को इच्छामृत्यु मामले में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दी थी। फैसले के बाद मां निर्मला देवी ने कहा था कि ‘बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किए। बड़े-बड़े अस्पतालों में दिखाया और कई डॉक्टरों से इलाज भी कराया, लेकिन उम्मीदें लगभग खत्म हो गई हैं। अब तो बस भगवान से यही प्रार्थना है कि उसे इस पीड़ा से जल्द मुक्ति मिल जाए।’ हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरे थे, तब से बिस्तर पर दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यू्निवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। इसकी वजह से उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वह कोमा में चले गए। वह न कुछ बोल सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं। डॉक्टर्स ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित करार दिया। इसमें मरीज पूरी तरह से फीडिंग ट्यूब यानी खाने-पीने की नली और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इसमें रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है। यह स्थिति हरीश के लिए बहुत दर्दनाक है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है। इच्छामृत्यु के 2 तरीके होते हैं… पैसिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें डॉक्टर कोई नया काम नहीं करते, सिर्फ इलाज बंद कर देते हैं। मौत का कारण बीमारी ही रहती है। कोर्ट ने हरीश राणा के लिए पैशिव यूथेनेशिया देने के निर्देश दिए थे। एक्टिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवाई या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यह गैर-कानूनी है। अगर कोई जान-बूझकर किसी मरीज को दवाई देकर मारता है, तो इसे BNS की धारा के तहत हत्या या के तहत आत्महत्या में मदद माना जाता है। भारत के संविधान में इच्छामृत्यु का क्या कानून है 2005 में कॉमन कॉज नाम की एक NGO ने पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु के अधिकार की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस पर 9 मार्च 2018 को CJI दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच ने इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, अगर किसी मरीज को लाइलाज बीमारी हो या वेजिटेटिव स्टेट में यानी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ही जिंदा हो, तो प्राकृतिक तरीके से मृत्यु के लिए उसका इलाज बंद किया जा सकता है। इसे इच्छामृत्यु नहीं, बल्कि सम्मान के साथ मृत्यु का अधिकार माना जाएगा। यह अधिकार संविधान के आर्टिकल 21 का हिस्सा है, जिसमें सम्मान से जीने के साथ सम्मान से मरने का अधिकार है। 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर बेडसोर्स यानी गहरे घाव बन गए हैं। -फाइल फोटो इच्छामृत्यु को लेकर क्या नियम है 2018 में पैसिव यूथेनेशिया को वैधता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए 2 तरह के नियम बनाए… 1. जब मरीज ने पहले ही ‘लिविंग विल’ लिख रखी हो: जब मरीज ने मेंटली फिट रहते हुए अपनी इच्छा से लिविंग विल लिखी हो। इस लिविंग विल में साफ तौर पर लिखा जाता है कि मरीज की बीमारी अगर लाइलाज हो जाए यानी अगर वह अब कभी ठीक होने लायक न बचे तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए भी कुछ नियम बनाए हैं… 18 साल से ज्यादा उम्र और स्वस्थ व्यक्ति ही लिविंग विल लिख सकता है। मरीज ने 2 गवाहों के सामने लिविंग विल साइन की हो। डॉक्यूमेंट्स को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने वेरिफाई किया हो। इलाज करने वाले डॉक्टर, हॉस्पिटल के मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर के एक बाहरी मेडिकल बोर्ड की मंजूरी ली गई हो। दोनों बोर्डों की मंजूरी मिलने के बाद वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम को बंद किया जा सकता हो। इस पूरी प्रक्रिया के बारे में परिवार को जानकारी दी जाती है। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है। 2. जब कोई लिविंग विल न हो: जब मरीज अपने होश में रहते हुए लिविंग विल नहीं बनाता तो उसका परिवार या करीबी ये फैसला ले सकते हैं। हालांकि, ये इतना आसान नहीं है। इसके लिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट के बनाए गए इन नियमों का पालन करना होता है… अस्पताल के डॉक्टरों का एक बोर्ड मरीज की कंडीशन चेक कर रिपोर्ट बनाता है। कलेक्टर 3-5 एक्सपर्ट्स का दूसरा मेडिकल बोर्ड बनाते हैं, जो ये रिपोर्ट चेक करता है। दोनों बोर्ड के सहमत होने पर इस फैसले को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास

Supreme Court: Caste Status Lost on Religious Conversion

Supreme Court: Caste Status Lost on Religious Conversion

Hindi News National Supreme Court: Caste Status Lost On Religious Conversion | Hindu, Buddhist, Sikh Only नई दिल्ली1 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोग ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। अगर कोई ईसाई या किसी और धर्म में धर्मांतरण करता है तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देगा। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाला दलित व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाले किसी भी लाभ का दावा नहीं कर सकता है। यह फैसला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मई 2025 के फैसले के खिलाफ सुनाया गया। धर्म परिवर्तन के बाद पादरी बने चिंथदा आनंद ने याचिका लगाई थी कि उन्हें अक्काला रामिरेड्डी समेत कुछ लोगों से जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। चिंथदा ने SC-ST एक्ट के तहत मामला दर्ज करवाया था। मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर इस पर सुनवाई से इनकार कर दिया था। इसके बाद चिंथदा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। यह था पूरा मामला यह मामला विशाखापट्टनम जिले के अनाकापल्ली का है, जहां मूल रूप से एससी (माला समुदाय) के चिंथदा ने ईसाई धर्म अपना लिया और पादरी बन गया। केस की जांच के दौरान पता चला था कि ईसाई धर्म अपनाने के कारण चिंथदा का अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया था। चिंथदा एक चर्च में करीब 10 साल से पादरी के तौर पर काम कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका- आरक्षण का लाभ लेने धर्म बदलना, संविधान से धोखा कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मामले में स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाने के बाद दोबारा हिंदू धर्म में लौटता है, तो उसे एससी दर्जा प्राप्त करने के लिए विश्वसनीय प्रमाण और समुदाय की स्वीकृति की जरूरत होगी। केवल लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करने को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के साथ धोखा करार दिया। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने क्या कहा था… जब पीड़ित ने खुद कहा कि वह पिछले 10 साल से ईसाई धर्म का पालन कर रहा है, तो पुलिस को आरोपियों पर एससी/एसटी अधिनियम नहीं लगाना चाहिए था। एससी/एसटी अधिनियम का उद्देश्य उन समूहों (अनुसूचित जातियों) से जुड़े लोगों की रक्षा करना है, न कि उन लोगों की जो दूसरे धर्मों में परिवर्तित हो गए हैं। केवल इस आधार पर एससी/एसटी अधिनियम लागू करना कि उसका जाति प्रमाण पत्र रद्द नहीं किया गया है, वैध आधार नहीं हो सकता। संविधान में क्या प्रावधान है संविधान (अनुसूचित जातियों) आदेश, 1950 के अनुसार केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुसूचित जाति समुदायों को एससी का दर्जा प्राप्त है। अगर कोई ईसाई या मुस्लिम धर्म अपना लेता है तो उनका यह दर्जा समाप्त हो जाता है। ​ आंध्र प्रदेश विधानसभा ने भी मार्च 2023 में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें केंद्र सरकार से अनुरोध किया गया कि ईसाई धर्म अपना चुके दलितों को भी एससी दर्जा प्रदान किया जाए। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

सुप्रीम कोर्ट बोला-महिला अफसर सेना में स्थायी कमीशन की हकदार:इससे इनकार करना भेदभाव था; 23 साल से केस लड़ रही थीं

सुप्रीम कोर्ट बोला-महिला अफसर सेना में स्थायी कमीशन की हकदार:इससे इनकार करना भेदभाव था; 23 साल से केस लड़ रही थीं

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा, ‘आर्मी, नेवी और एयर फोर्स की महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारियों को स्थायी कमीशन न देना उनकी योग्यता की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद भेदभाव का नतीजा था।’ कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारियों के काम का आकलन इस सोच के साथ किया गया कि उन्हें परमानेंट कमीशन नहीं मिलेगा। जिन महिला अफसरों को गलत या मनमाने मूल्यांकन के कारण परमानेंट कमीशन नहीं मिला, उन्हें अब पूरा पेंशन लाभ मिलेगा। जस्टिस सूर्यकांत, उज्जल भुयान और एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि इन अधिकारियों की 20 साल की न्यूनतम सेवा पूरी मानी जाएगी, भले ही वे इससे पहले ही सेवा से बाहर हो गई हों। बेंच ने केंद्र सरकार को आगे के लिए साफ और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाने और मूल्यांकन के सभी नियम पहले से बताने का निर्देश दिया, ताकि भविष्य में भेदभाव न हो। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने के मामले में सुनवाई की। सुचेता ईडन समेत अन्य महिला अधिकारियों ने याचिका लगाई थीं, जिनमें 2019 की नीति और आर्मर्ड फोर्सेस ट्रिव्यूनल के फैसलों को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 3 राहत दी… 1. जिन SSC अफसरों को 2020–21 में नंबर 5 सेलेक्शन बोर्ड या AFT (ट्रिब्यूनल) के फैसले के आधार पर पहले ही स्थायी कमीशन (PC) मिल चुका है, उनका स्टेटस नहीं बदला जाएगा। 2. जो महिला SSC अफसर (अपीलकर्ता) इस केस के दौरान सेवा से बाहर हो गईं, उन्हें मान लिया जाएगा कि उन्होंने 20 साल की जरूरी सेवा पूरी कर ली है। उन्हें पेंशन और उससे जुड़े सभी लाभ मिलेंगे, लेकिन पिछला वेतन (एरियर) नहीं मिलेगा। 3. वर्तमान में जो महिला अफसर सेवा में हैं, उन्हें कटऑफ पूरा करने पर परमानेंट कमीशन मिलेगा। यह आदेश उन महिला अधिकारियों पर लागू नहीं होगा जो JAG (जज एडवोकेट जनरल) और AEC (एजुकेशन कॉर्प्स) में हैं, क्योंकि उन्हें 2010 से ही स्थायी कमीशन के लिए विचार का मौका मिलता रहा है। कोर्ट रूम लाइव…. सीजेआई: आज 3 मामलों में फैसला सुनाया जा रहा है- आर्मी, नेवी और एयर फोर्स पर… इसके बाद सीजेआई ने एक-एक कर तीनों सेनाओं के मामलों पर आदेश सुनाया… आर्मी केस नेवी केस एयर फोर्स कोर्ट के फैसले पर किसने क्या कहा… ……………………..