Companies to Get ₹14.5 Lakh Crore Refund, Supreme Court Slams Trump

Hindi News Business US Trade Tariffs: Companies To Get ₹14.5 Lakh Crore Refund, Supreme Court Slams Trump वॉशिंगटन32 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिका की इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को आदेश दिया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ का पैसा कंपनियों को लौटाया जाए। टैरिफ से दिसंबर तक 10.79 लाख करोड़ रुपए वसूले गए थे और कुल रिफंड 14.5 लाख करोड़ रु. तक पहुंच सकता है। जज रिचर्ड ईटन ने ने लंबित मामलों में टैरिफ हटाकर दोबारा गणना करने को कहा। ट्रम्प ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट-1977 के तहत कई देशों पर टैरिफ लगाए थे। अमेरिकी कंपनियों ने कोर्ट में चुनौती दी। 20 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ रद्द करते हुए कहा कि टैरिफ तय करने का अधिकार कांग्रेस के पास है राष्ट्रपति के पास नहीं। तब रिफंड पर स्पष्टता नहीं थी। टेनेसी की एटमस फिल्ट्रेशन की याचिका पर जज ने रिफंड का आदेश दिया है। क्लिंटन ने की थी ईटन की नियुक्ति, टैरिफ रिफंड के केस भी वही सुनेंगे पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 1999 में जज ईटन की नियुक्ति की थी। ईटन ने कहा कि टैरिफ रिफंड की सुनवाई वही करेंगे, ताकि रिफंड प्रक्रिया उलझे नहीं। ट्रम्प सरकार के पास अब ये 3 विकल्प 1. अपील: सरकार ऊपरी कोर्ट में चुनौती दे। 2. स्टे: सरकार अस्थायी रोक मांग सकती है। 3. देरी: कस्टम्स में लिक्विडेशन (अंतिम हिसाब) के बाद आयातक को दावा/चुनौती के लिए 180 दिन मिलते हैं। इससे सरकार भी रिफंड 6 माह तक टाल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प को लगाई थी फटकार, कहा- हर देश से युद्ध की स्थिति में नहीं ट्रम्प ने पिछले साल अप्रैल में ग्लोबल टैरिफ का ऐलान किया था। (फाइल फोटो) इससे पहले 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को फटकारते हुए कहा था कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध की स्थिति में नहीं है। हालांकि फैसले को लेकर 3 जजों जस्टिस सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ ने इस फैसले से असहमति जताई। कैवनॉ ने अपने नोट में लिखा कि टैरिफ नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग सवाल है, लेकिन उनके मुताबिक यह कानूनी तौर पर वैध थी। कैवनॉ ने अपने नोट में भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर लगाए गए टैरिफ का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि ये टैरिफ विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के तहत लगाए गए थे। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 जज हैं। इनमें से 6 जजों को रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किया है, जबकि 3 जज डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किए। फैसले के खिलाफ वोट करने वाले तीनों जज रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किए थे। ट्रम्प ने 24 घंटे में ग्लोबल टैरिफ बढ़ाकर 15% कर दिया था सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाराज होकर ट्रंप ने अगले ही दिन ग्लोबल टैरिफ 10% से बढ़ाकर 15% करने का ऐलान कर दिया था। ट्रम्प ने एक आदेश पर हस्ताक्षर कर दुनियाभर के देशों पर नया टैरिफ लगा दिया था। यह 15% टैरिफ 24 फरवरी से लागू हो गया है। इससे पहले उन्होंने कल टैरिफ को अवैध बताने वाले जजों की भी आलोचना की। ट्रम्प ने कहा था- मुझे कोर्ट के कुछ जजों पर शर्म आ रही है। वे देश के लिए कलंक हैं, उनमें हमारे देश के लिए सही काम करने की हिम्मत नहीं है। ट्रम्प ने 49 साल पुराने कानून के इस्तेमाल कर टैरिफ लगाया था ट्रम्प के टैरिफ विवाद के केंद्र में एक कानून है, जिसका नाम इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) है। यह कानून 1977 में बनाया गया था। इसका मकसद यह था कि अगर देश पर कोई गंभीर खतरा जैसे युद्ध जैसी स्थिति, विदेशी दुश्मन से बड़ा आर्थिक खतरा या असाधारण अंतरराष्ट्रीय संकट आए तो राष्ट्रपति को कुछ खास शक्तियां दी जा सकें। इन शक्तियों के तहत राष्ट्रपति विदेशी लेन-देन पर रोक लगा सकता है, उन्हें नियंत्रित कर सकता है या कुछ आर्थिक फैसले तुरंत लागू कर सकता है। ट्रम्प ने टैरिफ लगाने के लिए IEEPA का ही सहारा लिया था। निचली अदालतों ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था इससे पहले निचली अदालतों (कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड और फेडरल सर्किट कोर्ट) ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था। उनका मानना था कि IEEPA टैरिफ लगाने की इतनी व्यापक शक्ति नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में मौखिक बहस सुनी थी, जहां जजों ने ट्रम्प की ओर से पेश की गईं दलीलों पर संदेह जताया था। कोर्ट के 6-3 बहुमत के बावजूद, जस्टिस ने पूछा था कि क्या राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना इतने बड़े पैमाने पर टैरिफ लगा सकता है, क्योंकि टैरिफ टैक्स का रूप हैं और यह संसद की जिम्मेदारी हैं। ——————- ट्रम्प के टैरिफ से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के इमरजेंसी टैरिफ की वसूली बंद:समझौते से पीछे हटने वाले देशों को ट्रम्प की धमकी, कहा- गेम मत खेलो, ऊंचे टैरिफ लगाऊंगा अमेरिकी सरकार आज से राष्ट्रपति ट्रम्प की तरफ से लगाए गए इमरजेंसी टैरिफ की वसूली बंद कर देगी। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को टैरिफ समझौते से पीछे हटने वाले देशों को चेतावनी दी है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Supreme Court Ban NCERT Book Chapter

नई दिल्ली6 घंटे पहले कॉपी लिंक NCERT ने शुक्रवार को एडवाइजरी जारी की है। इसमें कहा गया है कि कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक ‘Exploring Society: India and Beyond – Part 2’ जिन व्यक्तियों या संगठनों के पास है वे इस किताब को तुरंत लौटाएं। इसमें कहा गया है कि कक्षा 8 की जिस किताब में “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” वाला अध्याय था और जिस पर रोक लगा दी गई है, उसकी सभी प्रतियां वापस NCERT मुख्यालय में जमा कराई जाएं। NCERT ने यह भी कहा कि इस किताब के ‘The Role of the Judiciary in Our Society’ अध्याय से जुड़ा कोई भी कंटेंट यदि सोशल मीडिया या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शेयर किया गया है, तो उसे तुरंत हटा दिया जाए। शिक्षा मंत्रालय ने रोक लगाने को कहा इससे पहले गुरुवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय को पत्र लिखकर कहा था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा किताब पर रोक लगाए जाने के बाद उसे डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से फैलने से रोका जाए। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़ी “आपत्तिजनक” बातें हैं। अदालत ने टिप्पणी की थी कि इससे संस्था की छवि को नुकसान पहुंचा है। इस किताब में लिखा गया था कि न्याय व्यवस्था के सामने भ्रष्टाचार, मामलों का लंबा लंबित रहना और जजों की कमी जैसी चुनौतियां हैं। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद NCERT ने “अनुचित सामग्री” के लिए माफी मांगी है और कहा है कि किताब को संबंधित अधिकारियों से सलाह लेकर फिर से लिखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने 4 बड़े निर्देश दिए थे केंद्र और राज्यों के शिक्षा विभाग तय करें कि किताब चाहे स्कूलों में हो, छपी हुई हों या डिजिटल, तुरंत लोगों की पहुंच से हटाई जाए। किताब के प्रिंटेड या डिजिटल वर्जन को बांटना कोर्ट के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन माना जाएगा। सभी राज्यों के शिक्षा विभाग के मुख्य सचिव 2 हफ्ते में इस मामले में कार्रवाई की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपें। जांच रिपोर्ट मिलने के बाद कोर्ट कमेटी बनाएगा, जो पूरे मामले की जांच करेगी और जिम्मेदार लोगों की पहचान करेगी। —————————————— ये खबर भी पढ़ें ‘करप्शन इन ज्यूडीशियरी’ वाली NCERT किताब पर SC का बैन:कहा- हार्ड कॉपी वापस लें, डिजिटल कॉपी हटाएं; शिक्षा मंत्री बोले- जो जिम्मेदार, उनपर कार्रवाई होगी सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ चैप्टर वाली NCERT के 8वीं क्लास की सोशल साइंस की किताब बैन कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने किताब छापने और बिक्री पर रोक लगाने का आदेश दिया। साथ ही कहा कि जो किताबें छप चुकी हैं, उसे जब्त कीजिए और डिजिटल कॉपियों को भी हटाइए। पढ़ें पूरी खबर… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
बनभूलपुरा में 'घर खाली कराने’ की खबरों से डर:वकील बोले- सुप्रीम कोर्ट का ये अंतिम आदेश नहीं; 150 सालों से बसे परिवार भविष्य को लेकर चिंतित

“मेरे दादा करीब 150 साल पहले यहां आकर बसे थे और अब मेरे परिवार की चौथी पीढ़ी बनभूलपुरा में रह रही है… लेकिन अब बच्चों के भविष्य की चिंता सता रही है।” हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रह रहे मोहम्मद जावेद की यह बात उस बेचैनी को बयां करती है जो सुप्रीम कोर्ट की हालिया सुनवाई के बाद पूरे इलाके में महसूस की जा रही है। दशकों से बसे हजारों परिवार अपने भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। सुनवाई के बाद क्षेत्र में यह खबर तेजी से फैल गई कि लोगों को जमीन खाली करनी होगी, जबकि अदालत ने अभी कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया है। कोर्ट ने पुनर्वास प्रक्रिया आगे बढ़ाने, पात्रता की जांच करने और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन व्यवस्था करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होनी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक करीब 5 हजार परिवारों और लगभग 27000 लोगों की जिंदगी से जुड़े इस मुद्दे ने लोगों को चिंता में डाल दिया है। रोजगार, बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक ढांचे के टूटने की आशंका के बीच लोग अदालत के फैसले का सम्मान करने की बात तो करते हैं, लेकिन पुनर्वास यदि दूर हुआ तो जीवन व्यवस्था प्रभावित होने का डर भी साफ दिखाई देता है। 24 फरवरी को हुई सुनवाई के बाद बनभूलपुर के लोगों का हाल जानने के लिए पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट… वकील बोले- अंतिम फैसला नहीं, आदेश से भ्रम फैला रहे मामले से जुड़े अधिवक्ता सनप्रीत सिंह आजमानी ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया है और न ही तत्काल बेदखली के निर्देश दिए हैं। लोगों में भ्रम की स्थिति बन गई है। उन्होंने बताया कि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार, रेलवे और याचिकाकर्ताओं ने अपने-अपने पक्ष रखे। प्रधानमंत्री आवास योजना समेत विभिन्न नीतियों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि पात्र लोग पुनर्वास योजनाओं के तहत आवेदन कर सकते हैं। कोर्ट ने 19 मार्च के बाद आवेदन प्रक्रिया संचालित करने, पात्रता की जांच करने और 31 मार्च तक स्थिति स्पष्ट कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। हम कोर्ट का सम्मान करेंगे, लेकिन पुनर्वास यहीं हो “सुप्रीम कोर्ट ने जो ऑर्डर दिया है, हम उसका सम्मान करते हैं। कोर्ट का जो भी आदेश होगा, हम उसे मानेंगे। कोर्ट के साथ-साथ हम उत्तराखंड सरकार से भी अपील करते हैं कि मानवता के आधार पर लोगों को सुविधाएं दी जाएं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोगों को आवास दिया जाए। हमारा रोजगार, कारोबार, बच्चों की पढ़ाई सब यहीं से जुड़ा है। हम चिंता में हैं, लेकिन निगाहें कोर्ट पर टिकी हैं। जो फैसला होगा, उसे मानेंगे।” ‘मेरे परिवार की चौथी पीढ़ी यहां रह रही है’ स्थानीय निवासी मोहम्मद जावेद कहते हैं, ‘मेरे दादा करीब 150 साल पहले यहां आकर बसे थे। इस जमीन पर मेरे परिवार की चौथी पीढ़ी रह रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हम सम्मान करेंगे, लेकिन बच्चे यहां पढ़ रहे हैं। कई बच्चे यहां से पढ़कर डॉक्टर और वकील बने हैं। उनके भविष्य का क्या होगा? ‘रोजगार और बच्चों की पढ़ाई यहीं से जुड़ी है’ स्थानीय निवासी फरीद खान ने कहा- सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करना ही पड़ेगा, हम उससे ऊपर नहीं जा सकते। लेकिन यहां लोग लंबे समय से रह रहे हैं। यहीं रोजगार है, बच्चों की पढ़ाई है। अगर कहीं और बसाया जाएगा तो पता नहीं कितनी दूर ले जाया जाएगा। जहां भी बसाया जाए, आसपास ही बसाया जाए। 50-50 साल से लोग यहां रह रहे हैं। ‘गरीबों का मन टूट गया है’ स्थानीय जनप्रतिनिधि इशरत अली कहते हैं- “सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला बताया जा रहा है, उसे सुनकर गरीब लोगों का मन टूट गया है। रमजान का महीना चल रहा है, लेकिन लोग ईद की खुशियां भूल चुके हैं। घर-घर मातम जैसा माहौल है। हमारे बनभूलपुरा में हमेशा खुशियां रहती थीं, लेकिन अब माहौल बोझिल है।” वह आगे कहते हैं- यह क्षेत्र हमेशा कांग्रेस का गढ़ रहा है। मुझे लगता है कि राजनीति के तहत बनभूलपुरा को निशाना बनाया गया है और मुस्लिम समाज के वोट खत्म करने की साजिश की जा रही है। यहां ज्यादातर मकान मुस्लिम समाज के हैं। अब समझिए इस पूरे मामले में कब कब क्या हुआ… ————- ये खबर भी पढ़ें… उत्तराखंड में 4 दिन में तैयार हुआ फर्जी स्थायी निवास:बरेली के युवक को हल्द्वानी का बनाया; रिश्तेदार ने खोली CSC संचालक की पोल उत्तराखंड में एक कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) संचालक ने उत्तरप्रदेश के रईस अहमद को हल्द्वानी का दिखाकर 4 दिनों में फर्जी स्थायी निवास प्रमाण पत्र बना दिया। मामला तब सामने आया जब 13 नवंबर की शाम एक व्यक्ति की शिकायत पर कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत ने इस फर्जी CSC सेंटर पर छापा मारा। (पढ़ें पूरी खबर)
NCERT किताब में ‘ज्यूडीशियल करप्शन’ चैप्टर पर आज सुनवाई:सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया; CJI बोले- न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं देंगे

सुप्रीम कोर्ट गुरुवार को NCERT के क्लास 8 की सोशल साइंस की किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े चैप्टर को लेकर विवाद पर सुनवाई करेगा। कोर्ट ने बुधवार को मामले पर खुद संज्ञान लिया था। CJI सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच सुनवाई करेगी। बुधवार को CJI ने इस मामले पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को बदनाम करने या उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाने की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी। इससे पहले सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने अभिषेक सिंघवी के साथ मामले का जिक्र करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर स्वत: संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद बुधवार शाम NCERT ने अपनी वेबसाइट से किताब को हटा लिया। सूत्रों के अनुसार, किताब से विवादित चैप्टर हटाया जा सकता है। सरकार ने भी किताब में ज्यूडीशियल करप्शन शामिल करने पर आपत्ति जताई है। सरकार ने कहा- शासन के तीनों अंगों को जोड़ना चाहिए था NCERT चेयरमैन दिनेश प्रसाद सकलानी का इस मुद्दे पर कोई जवाब नहीं आया है। काउंसिल के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि मामला अब कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए वे इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोंलेंगे। इस बीच सरकारी सूत्रों ने कहा कि भले ही NCERT एक ऑटोनॉमस संस्था है, लेकिन चैप्टर जोड़ने से पहले अधिकारियों को ध्यान देना चाहिए था। सरकारी सूत्रों ने कहा कि अगर भ्रष्टाचार का मुद्दा शामिल करना था, तो उसमें शासन के तीनों अंगों- कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को भी जोड़ा जाना चाहिए था। सरकारी सूत्रों ने कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित आंकड़े संसदीय अभिलेखों और नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड में मौजूद हैं, लेकिन फैक्ट्स के क्रॉस वेरिफिकेशन के लिए केंद्र से परामर्श नहीं लिया गया। विवादित चैप्टर NCERT की नई सोशल साइंस टेक्स्टबुक में था NCERT ने 23 फरवरी को क्लास 8 के स्टूडेंट्स के लिए सोशल साइंस की नई टेक्स्टबुक जारी की थी। किताब का नाम ‘एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट 2’ है। इसमें ‘द रोल ऑफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी’ चैप्टर के अंदर ‘करप्शन इन द ज्यूडिशियरी’ का टॉपिक जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार, बड़ी संख्या में पेंडिंग मामले और जजों की भारी कमी ज्यूडिशियल सिस्टम के सामने प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं। जज आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो न केवल कोर्ट में उनके व्यवहार को कंट्रोल करता है, बल्कि कोर्च के बाहर उनके आचरण को भी तय करती है। एक टॉपिक का टाइटल- इंसाफ में देरी इंसाफ न मिलने जैसा किताब के एक सेक्शन का टाइटल ‘Justice delayed is justice denied’ है। इसका मतलब है- इंसाफ में देरी इंसाफ न मिलने जैसा है। यहां सुप्रीम कोर्ट में 81 हजार, हाईकोर्ट्स में 62 लाख 40 हजार, डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट के 4 करोड़ 70 लाख पेंडिंग केस की संख्या भी बताई गई है। ये किताब एकेडमिक सेशन 2026-27 से स्कूलों में पढ़ाई जानी थी। इसका पहला पार्ट जुलाई 2025 में रिलीज किया गया था। NCERT ने नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क यानी NCF और NEP-2020 के तहत सभी क्लासेज की नई किताबें तैयार की हैं। कोरोना महामारी के बाद पुरानी किताबों के टॉपिक्स को बदलकर नए टॉपिक्स किताबों में जोड़े जा रहे हैं। पहली से 8वीं क्लास तक की नई किताबें 2025 में ही पब्लिश की जा चुकी हैं। किताब का वो हिस्सा जिसमें करप्शन और पेंडिंग केस का जिक्र… नई किताब में ज्यूडीशियरी से जुड़े अहम पॉइंट्स… किताब में पूर्व CJI बीआर गवई का भी जिक्र किताब में भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई का भी जिक्र है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि ज्यूडिशियरी के अंदर करप्शन और गलत कामों के मामलों का पब्लिक ट्रस्ट पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा था, “हालांकि, इस ट्रस्ट को फिर से बनाने का रास्ता इन मुद्दों को सुलझाने के लिए उठाए गए तेज, निर्णायक और ट्रांसपेरेंट एक्शन में है… ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी डेमोक्रेटिक गुण हैं।” —————————— ये खबर भी पढ़ें… NCERT ने 8वीं क्लास की सोशल साइंस की किताब में जोड़ा न्यायपालिक से जुड़ा सेक्शन नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) ने पहली बार 8वीं के बच्चों के लिए ज्यूडीशियरी में करप्शन के बारे में पढ़ाने का फैसला लिया गया। यह पिछले एडिशन के मुकाबले बड़ा बदलाव था। पिछले चैप्टर में ज्यादातर कोर्ट के स्ट्रक्चर और रोल पर फोकस किया गया था। बदले हुए चैप्टर का नाम ‘हमारे समाज में ज्यूडिशियरी की भूमिका’ रखा गया। पढ़ें पूरी खबर…
'बड़े नेता-अफसर समुदाय विशेष को टारगेट नहीं कर सकते':सुप्रीम कोर्ट ने कहा- धर्म या जाति के आधार पर बदनाम करने का अधिकार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे नेता-अफसर किसी समुदाय को धर्म-जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर निशाना नहीं बना सकते। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना संविधान के खिलाफ है। किसी भी माध्यम से समुदाय को बदनाम करना अस्वीकार्य है। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुसार राज्य या गैर-राज्य अभिनेता सहित कोई भी व्यक्ति भाषण, मीम, कार्टून या दृश्य कला जैसे किसी भी माध्यम से किसी समुदाय को बदनाम या अपमानित नहीं कर सकता। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जवल भुयान की बेंच ने नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने वाली फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ पर रोक की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए अलग से यह टिप्पणी की। बेंच ने 19 फरवरी को फिल्म निर्माता नीरज पांडे के हलफनामे को रिकॉर्ड में लेकर याचिका खत्म कर दी। अदालत ने उम्मीद जताई कि विवाद अब खत्म हो जाएगा। जस्टिस भुयान ने अपने 39 पन्नों के अलग फैसले में कहा कि संविधान की प्रस्तावना में सभी नागरिकों के बीच भाईचारा बढ़ाने और देश की एकता व अखंडता बनाए रखने का वादा किया गया है। मामले से जुड़ी पिछली सुनवाई- 19 फरवरी : SC के आदेश पर ‘घूसखोर पंडत’ नाम हटाया गया, नीरज पांडेय बोले- नया टाइटल अभी तय नहीं मनोज बाजपेयी की फिल्म घूसखोर पंडत का नाम बदल दिया गया है। फिल्ममेकर नीरज पांडेय ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दाखिल करके इसकी जानकारी दी। जिसमें बताया गया कि फिल्म का विवादित टाइटल हटा दिया गया है। अब इसका कहीं इस्तेमाल नहीं होगा। नया नाम अभी तय नहीं हुआ है, लेकिन जो भी रखा जाएगा, वह पुराने नाम जैसा या उससे मिलता-जुलता नहीं होगा। पूरी खबर पढ़ें… 3 फरवरी को टीजर के साथ फिल्म के नाम का ऐलान हुआ था नेटफ्लिक्स ने 3 फरवरी 2026 को मनोज बाजपेयी की ‘घूसखोर पंडत’ का ऐलान भी टीजर रिलीज करके किया गया था। लेकिन जैसे ही इसका टीजर जारी किया गया तो इसके टाइटल को लेकर विवाद शुरू हो गया है। लोग सड़कों पर उतर गए। इसके बाद यह मामला कोर्ट तक पहुंच गया। ब्राह्मण समाज ने फिल्म का विरोध किया अलग-अलगह जगहों पर ब्राह्मण समाज ने नेटफ्लिक्स की ‘घूसखोर पंडत’ के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। इसके अलावा मुंबई के वकील आशुतोष दुबे का आरोप है कि ‘पंडत’ जैसे सम्मानजनक शब्द को भ्रष्टाचार के साथ जोड़ना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि इससे पूरे समुदाय की गरिमा को ठेस पहुंचती है। नोटिस में कहा गया है कि यह फिल्म जानबूझकर एक समुदाय की छवि को खराब करने की कोशिश कर रही है।
फिल्म यादव जी की लव स्टोरी पर रोक नहीं:SC बोला- निगेटिव मैसेज नहीं, क्या हिंदू लड़की की मुस्लिम से शादी सामाजिक ताना-बाना तोड़ती है

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ‘यादव जी की लव स्टोरी’ फिल्म पर रोक लगाने की मांग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि फिल्म के नाम में ऐसा कोई शब्द नहीं है, जिससे यादव समाज की छवि खराब होती हो। विश्व यादव परिषद के प्रमुख ने याचिका में कहा था कि फिल्म का नाम यादव समाज को गलत तरीके से दिखाता है। साथ ही फिल्म में यादव समाज की एक हिंदू लड़की और एक मुस्लिम लड़के की प्रेम कहानी दिखाई गई है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने सुनवाई के दौरान पूछा, “क्या किसी हिंदू लड़की की मुस्लिम लड़के से शादी सामाजिक ताना-बाना तोड़ती है?” कोर्ट ने ‘घूसखोर पंडित’ मामले से अलग बताया बेंच ने हाल में ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म से जुड़े आदेश से इस मामले को अलग बताया। कोर्ट ने कहा कि ‘घूसखोर’ शब्द का अर्थ भ्रष्ट होता है, जो सीधे तौर पर नकारात्मक अर्थ जोड़ता है। जबकि मौजूदा फिल्म के नाम में ऐसा कोई नकारात्मक संकेत नहीं है। कोर्ट ने कहा- रिलीज के बाद आपत्ति हो तो फिर आएं याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि फिल्म खुद को एक सच्ची कहानी पर आधारित बताती है। इस पर कोर्ट ने जवाब दिया, “फिल्म बैंडिट क्वीन में भी गुर्जर समुदाय को गलत तरीके से दिखाने की बात उठी थी, तब भी कोर्ट ने बैन से इनकार किया था।” वकील ने कहा कि फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई है और अगर रिलीज के बाद कुछ आपत्तिजनक लगे तो वे फिर कोर्ट आ सकते हैं। इस पर बेंच ने कहा, “जरा सहनशील बनिए। यह फिक्शन है। एक हफ्ते में सब खत्म हो जाएगा। आजकल लोग थिएटर नहीं, मोबाइल पर देख रहे हैं।” फिल्म 27 फरवरी को रिलीज होगी फिल्म यादव जी की लव स्टोरी 27 फरवरी को रिलीज होनी है। इसमें प्रगति तिवारी मुख्य अभिनेत्री हैं, जो ‘सिंपल यादव’ का किरदार निभा रही हैं। विशाल मोहन ‘वसीम अख्तर’ की भूमिका में नजर आएंगे। फिल्म के निर्देशक अंकित भड़ाना हैं और निर्माता संदीप तोमर हैं। कई शहरों में फिल्म को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं फिल्म को लेकर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में विरोध हो रहा है। कई यादव संगठन इसके नाम और कहानी पर आपत्ति जता रहे हैं। विरोध का मुख्य कारण फिल्म की कहानी बताई जा रही है। संगठनों का कहना है कि फिल्म में यादव समाज की एक हिंदू लड़की और मुस्लिम युवक की प्रेम कहानी दिखाई गई है। यादव समाज के कुछ लोगों का कहना है कि इससे उनकी छवि खराब हो रही है और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची है। उनका आरोप है कि फिल्म का नाम और कहानी खास तौर पर यादव समाज को निशाना बनाती है। प्रदर्शन करने वालों का कहना है कि ऐसी कहानी समाज की संस्कृति, आस्था और इतिहास के खिलाफ है। कुछ संगठनों ने इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़ते हुए भी आपत्ति जताई है। फिल्म के नाम पर भी सवाल उठाए गए हैं। विरोध करने वालों का कहना है कि ‘यादव जी’ शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर प्रचार के लिए किया गया है और इससे जातिगत पहचान का गलत इस्तेमाल हो रहा है। उनका कहना है कि इससे यादव समाज की छवि पर बुरा असर पड़ सकता है। —————— ये खबर भी पढ़ें… ‘घूसखोर पंडत’ के बाद ‘यादवजी की लव स्टोरी’ पर बवाल:खेसारी लाल बोले-टाइटल बदलने यहां भी दिखाएं एकजुटता, सही-गलत का पैमाना एक जैसा हो फिल्म ‘यादव जी की लव स्टोरी’ को लेकर बवाल खड़ा हो गया है। इसमें एक विशेष जाति का जिक्र है। फिल्म के नाम को लेकर विवाद बढ़ने पर खेसारी लाल यादव ने इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी। भोजपुरी के ट्रेडिंग स्टार खेसारी लाल यादव भड़क गए हैं। पूरी खबर पढ़ें…
supreme court on NOTA in election voting leader quality

नई दिल्ली1 घंटे पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को NOTA (इनमें से कोई नहीं) विकल्प की उपयोगिता और असर पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने मंगलवार को सरकार से पूछा कि इसका क्या फायदा है, क्या NOTA के आने से चुने गए नेताओं की क्वालिटी में सुधार हुआ है? कोर्ट ने कहा कि NOTA किसी भी सीट को भर नहीं सकता और इसीलिए इसका प्रभाव सीमित है। यदि किसी सीट पर सिर्फ एक ही उम्मीदवार होता है तो क्या इसके बाद भी इसकी जरूरत है? चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जो 1951 के रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट के उस प्रावधान को चुनौती देती है जो निर्विरोध (एकल) प्रत्याशी वाले चुनावों में मतदाताओं को NOTA का विकल्प नहीं देता। याचिका में मांग की गई है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ही नहीं, बल्कि अगर चुनाव में सिर्फ एक ही उम्मीदवार खड़ा हो, तब भी NOTA का विकल्प दिया जाए। मामले में अगली सुनवाई 17 मार्च को होगी। जस्टिस बागची ने पूछा- NOTA से कितना असर होता है सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा- क्या इसके आने के बाद से अच्छे नेता चुनकर आए हैं? एक चिंता की बात यह है कि पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से मजबूत लोग अक्सर कम वोट डालते हैं। वहीं महिलाएं और कम पढ़े-लिखे लोग ज्यादा संख्या में मतदान करते हैं। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि NOTA का असली असर कितना पड़ता है और क्या यह सच में चुनाव के नतीजों या नेताओं की गुणवत्ता को प्रभावित कर पा रहा है। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने इस याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह याचिका केवल कल्पना और अंदाजों पर आधारित है, इसके पीछे ठोस वजह नहीं है। वोट डालना एक संवैधानिक अधिकार है और चुनाव से जुड़े नियम कानून के अनुसार तय होते हैं। NOTA के बारे में जानें… इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के जरिए मतदान के दौरान वोटर्स को NOTA का विकल्प मिलता है जो सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने की सुविधा देता है। साथ ही उनके वोट की गोपनीयता को बनाए रखता है। तकनीकी रूप से यह चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं करता है। मतलब यह हुआ कि यदि NOTA को किसी भी उम्मीदवार से ज्यादा वोट मिलते हैं तब भी सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत जाता है। लेकिन यह नागरिकों को यह शक्ति देता है कि वे चुनावी प्रक्रिया से दूर रहे बिना अपने असंतोष को जाहिर कर सकें। ——————————————— ये खबर भी पढ़ें… पश्चिम बंगाल SIR-ओडिशा-झारखंड के सिविल जज करेंगे वेरिफिकेशन में मदद, सुप्रीम कोर्ट बोला- इनका खर्च चुनाव आयोग उठाए सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया में सामने आए 80 लाख क्लेम निपटाने के लिए 2 राज्यों से सिविल जजों को तैनात करने की परमिशन दे दी है। कोर्ट ने आदेश दिया कि कलकत्ता हाईकोर्ट पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट SIR प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए झारखंड-ओडिशा के सिविल जजों की मदद ले सकता है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Delhi NCR Air Pollution; Coal Power Plants Shifting

नई दिल्ली20 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में बढ़ते प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से पूछा कि क्या कोयले से चलने वाले उद्योगों को NCR से बाहर शिफ्ट किया जा सकता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने दिल्ली से 300 किलोमीटर के अंदर नए कोयला आधारित पावर प्लांट खोलने पर रोक लगाने के प्रस्ताव पर सरकार से जवाब भी मांगा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निर्माण और तोड़-फोड़ (डिमोलिशन) के काम से उड़ने वाली धूल को कैसे रोका जाए, इस पर भी सभी पक्ष अपनी राय दें। इसके लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने कुछ उपाय सुझाए हैं। बेंच ने सभी पक्षों को 12 मार्च से पहले अपनी-अपनी रिपोर्ट और प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट में जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि CAQM के सुझावों के आधार पर 12 मार्च को गाड़ियों से होने वाले एयर पॉल्यूशन के मुद्दे की जांच करेगा। कोर्ट के अन्य आदेश… कोर्ट ने कहा कि इन नोटिसों को ही आधिकारिक सूचना माना जाएगा। राज्यों को मिले सुझावों के आधार पर आगे का एक्शन प्लान भी कोर्ट में जमा करना होगा। कोर्ट ने पर्यावरण, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और ऊर्जा मंत्रालय से कहा कि वे मिलकर एक ऐसा प्रस्ताव तैयार करें, जिसमें NCR के कोयला आधारित उद्योगों को धीरे-धीरे बंद करने की योजना हो। इस योजना में यह भी बताया जाए कि कौन-कौन से उद्योग प्रभावित होंगे, उन्हें कौन सा वैकल्पिक ईंधन दिया जा सकता है, और यह बदलाव किस तरह से और कितने समय में होगा। कोर्ट ने दिल्ली सरकार (GNCTD) से भी कहा कि वह CAQM की लंबे समय वाली सिफारिशों को लागू करने के लिए अपनी डिटेल योजना पेश करे। सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई की खबरें… 17 दिसंबर 2025: सरकार लॉन्ग टर्म प्लान बनाए:स्टेट बॉर्डर के 9 टोल प्लाजा बंद करें; पुराने वाहनों पर बैन को मंजूरी दी सुप्रीम कोर्ट ने NHAI और MCD को आदेश दिए कि दिल्ली बॉर्डर पर बने 9 टोल प्लाजा थोड़े समय के लिए बंद किए जाएं या किसी दूसरी जगह शिफ्ट किए जाएं। कोर्ट ने कहा कि इससे ट्रैफिक जाम कम होगा और पॉल्यूशन पर कंट्रोल होगा। कोर्ट ने MCD को एक हफ्ते में अपना फैसला लेने का समय दिया। पूरी खबर पढ़ें… 1 दिसंबर 2025: दिल्ली-NCR प्रदूषण के लिए सिर्फ किसान जिम्मेदार नहीं, सरकार एक्शन प्लान पर दोबारा विचार करे सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में बढ़ रहे वायु प्रदूषण पर केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियों को फटकार लगाई। अदालत ने वायु प्रदूषण के लिए सिर्फ किसानों को जिम्मेदार ठहराने पर आपत्ति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने एमसी मेहता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पराली जलाना नया नहीं है। 4-5 साल पहले कोविड और लॉकडाउन के दौरान भी पराली जलाई जा रही थी फिर भी आसमान साफ और नीला दिखाई देता था, अब क्यों नहीं? पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Supreme Court Meta WhatsApp Privacy Hearing Today

Hindi News National Supreme Court Meta WhatsApp Privacy Hearing Today | 213 Cr Fine Decision नई दिल्ली1 घंटे पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट में मेटा और वॉट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी मामले पर आज सुनवाई होगी। मेटा ने अपनी 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर उसपर लगाए गए 213 करोड़ के जुर्माने के खिलाफ याचिका दायर की थी। कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया (CCI) ने नवंबर 2024 में मेटा पर 213.14 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था। 3 फरवरी को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने मेटा और वॉट्सएप को उनकी प्राइवेसी पॉलिसी पर कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि हम आपको एक भी जानकारी शेयर करने की इजाजत नहीं देंगे। आप इस देशवासियों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। मामला पर मुख्य न्यायाधीश सूर्याकांत की बेंच के सुनवाई कर रही है। बेंच में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस एन वी अंजारिया भी शामिल हैं। इसको लेकर 9 फरवरी को सुनवाई होनी थी लेकिन वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की तबीयत खराब होने के कारण सुनवाई टाल दी गई थी। पिछली सुनवाई… 3 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट बोला- मेटा-वॉट्सएप कानून मानें या भारत छोड़ें सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मेटा और वॉट्सएप को उनकी प्राइवेसी पॉलिसी पर कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि हम आपको एक भी जानकारी शेयर करने की इजाजत नहीं देंगे। CJI सूर्यकांत ने कहा कि देश में लोगों के प्राइवेसी के अधिकार की कड़ी सुरक्षा की जाती है। कोर्ट ने कहा कि इन एप्स में गोपनीयता से जुड़ी शर्तें इतनी चालाकी से लिखी जाती हैं कि आम आदमी उन्हें समझ ही नहीं पाता। यह लोगों की निजी जानकारी चोरी करने का शालीन तरीका है। कोर्ट ने कहा कि हम आपको ऐसा करने की अनुमति नहीं देंगे। आपको इस पर साफ-साफ भरोसा दिलाना होगा, नहीं तो कोर्ट को आदेश जारी करना पड़ेगा। पूरी खबर पढ़ें… ————- ये खबर भी पढ़ें… भास्कर एक्सप्लेनर- क्या वॉट्सएप भारत में नहीं चलेगा: प्राइवेसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चेताया; चोरी से यूजर्स का डेटा बेचने का क्या मामला 140 करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान में सोशल मैसेजिंग एप ‘वॉट्सएप’ के 85 करोड़ से ज्यादा यूजर हैं। अब इसी वॉट्सएप को सुप्रीम कोर्ट ने भारत छोड़ने की चेतावनी दे दी है। वजह है- एड, यूजर डेटा और प्राइवेसी। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Trump Tariffs Cancelled by Supreme Court; 10% Hike Announced

वॉशिंगटन डीसी1 घंटे पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्लोबल टैरिफ 10% से बढ़ाकर 15% करने का ऐलान किया है। उन्होंने शनिवार को ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर इसकी जानकारी दी। इससे पहले ट्रम्प ने शुक्रवार रात प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सभी देशों पर 10% टैरिफ लगाने की बात कही थी। दरअसल अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को ट्रम्प के दुनियाभर के देशों पर लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि ट्रम्प को IEEPA कानून का इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार राष्ट्रपति को नहीं, सिर्फ संसद को है। इससे नाराज होकर ट्रम्प ने दुनियाभर के देशों पर नए कानून (सेक्शन-122) का इस्तेमाल कर 10% टैरिफ लगा दिया था। इस कानून के तहत अधिकतम 15% टैरिफ ही लगाया जा सकता है।हालांकि यह टैरिफ सिर्फ 150 दिन के लिए ही लागू रहेगा। अगर इन्हें आगे बढ़ाना है तो कांग्रेस की मंजूरी लेनी होगी। 24 फरवरी से लागू होगा 15% टैरिफ ट्रम्प ने एक आदेश पर हस्ताक्षर कर दुनियाभर के देशों पर नया टैरिफ लगाया है। यह 15% टैरिफ 24 फरवरी से लागू हो जाएगा। इससे पहले उन्होंने कल टैरिफ को अवैध बताने वाले जजों की भी आलोचना की। ट्रम्प ने कहा- मुझे कोर्ट के कुछ जजों पर शर्म आ रही है। वे देश के लिए कलंक हैं, उनमें हमारे देश के लिए सही काम करने की हिम्मत नहीं है। भारत के साथ ट्रेड डील पर ट्रम्प ने कहा कि, इस डील में कोई बदलाव नहीं होगा। पीएम मोदी मेरे अच्छे दोस्त हैं। ट्रम्प ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट के टैरिफ रद्द करने के फैसले के 3 घंटे बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस की। ट्रम्प के प्रेस कॉन्फ्रेंस की 5 अहम बातें… सुप्रीम कोर्ट के रद्द किए गए टैरिफ लागू करने के लिए मुझे संसद की जरूरत नहीं है। मैं इन्हें राष्ट्रपति के मिले अधिकारों के जरिए लागू कर सकता हूं। सुप्रीम कोर्ट में रिफंड को लेकर कोई साफ बात नहीं कही गई है। इसलिए अमेरिकी सरकार किसी भी कंपनी को टैरिफ के रूप में वसूला गया पैसा वापस नहीं करेगी। जज ने बहुत ही घटिया फैसला सुनाया है। मुझे लगता है कि अब इस मामले पर अगले दो साल तक कोर्ट में मुकदमा चलेगा। हम अगले 5 साल तक कोर्ट में ही रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विदेशी ताकतों का असर पड़ा है। अगर टैरिफ नहीं लगाए गए, तो विदेशी देश कुछ उद्योगों में अमेरिका से आगे निकलते रहेंगे। टैरिफ लगाने का यह कदम कई साल पहले के राष्ट्रपतियों को उठा लेना चाहिए था। उन्होंने हमारे देश को कमजोर होने दिया और दूसरे देशों को फायदा उठाने दिया। सेक्शन 122 के जरिए नया टैरिफ लगाएंगे ट्रम्प सेक्शन 122 अमेरिका के एक कानून का हिस्सा है, जिसे ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 कहा जाता है। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि अगर देश को अचानक व्यापार घाटे या आर्थिक संकट का खतरा हो, तो वे तुरंत आयात पर टैरिफ लगा सकते हैं। इसके तहत राष्ट्रपति बिना लंबी जांच प्रक्रिया के अस्थायी तौर पर टैरिफ लगा सकते हैं। आमतौर पर यह टैरिफ 150 दिनों तक लागू रह सकता है। इस दौरान सरकार स्थिति की समीक्षा करती है और आगे का फैसला लेती है। NBC न्यूज के मुताबिक दुनिया के सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर 15% का एक जैसा ग्लोबल टैरिफ लगाने का मतलब होगा कि जिन देशों पर ज्यादा टैरिफ लगा है वह खुद घट जाएगा। कुछ उत्पादों को छूट दी गई है, जैसे कुछ कृषि उत्पाद (बीफ, टमाटर, संतरा), महत्वपूर्ण खनिज, दवाइयां, कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स और पैसेंजर वाहन। ट्रम्प प्रशासन ने कहा कि यह टैरिफ पुराने वाले की जगह लेगा और वे अधिक पैसा कमाने की कोशिश जारी रखेंगे। निक्सन ने 55 साल पहले लगाया था 10% ग्लोबल टैरिफ साल 1971 में अमेरिका और दुनिया के बीच व्यापार और भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) में भारी असंतुलन हो गया था। अमेरिका लगातार ज्यादा आयात कर रहा था और निर्यात कम कर पा रहा था, जिससे डॉलर पर दबाव बढ़ रहा था। इसके बाद निक्सन ने दुनियाभर के देशों पर 10% का ग्लोबल टैरिफ लगा दिया था। इसके बाद यह महसूस किया गया कि भविष्य में अगर ऐसी आर्थिक आपात स्थिति आती है, तो राष्ट्रपति के पास ऐसी चीजों से निपटने के लिए कानूनी अधिकार होने चाहिए। इसी मकसद से 1974 में “ट्रेड एक्ट 1974” पारित किया गया था। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सेक्शन 122 का पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए यह भी साफ नहीं है कि अगर इसे अदालत में चुनौती दी गई, तो अदालतें इसकी व्याख्या किस तरह करेंगी। ट्रम्प ने पिछले साल अप्रैल में ग्लोबल टैरिफ का ऐलान किया था। (फाइल फोटो) कोर्ट की ट्रम्प को फटकार, कहा- हर देश से युद्ध की स्थिति में नहीं इससे पहले शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को फटकारते हुए कहा था कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध की स्थिति में नहीं है। हालांकि फैसले को लेकर 3 जजों जस्टिस सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ ने इस फैसले से असहमति जताई। कैवनॉ ने अपने नोट में लिखा कि टैरिफ नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग सवाल है, लेकिन उनके मुताबिक यह कानूनी तौर पर वैध थी। कैवनॉ ने अपने नोट में भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर लगाए गए टैरिफ का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि ये टैरिफ विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के तहत लगाए गए थे। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 जज हैं। इनमें से 6 जजों को रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किया है, जबकि 3 जज डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किए। फैसले के खिलाफ वोट करने वाले तीनों जज रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किए थे। जस्टिस ब्रेट कैवनॉ को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में 6 अक्टूबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था। कोर्ट के फैसले से सभी टैरिफ खत्म नहीं हुए हैं कोर्ट के आदेश से ट्रम्प के सभी टैरिफ खत्म नहीं हुए हैं। स्टील और एल्युमिनियम पर लगाए गए टैरिफ अलग कानूनों के तहत लगाए गए थे, इसलिए वे अभी भी लागू रहेंगे। हालांकि, दो बड़े कैटेगरी









