शिल्पा शिंदे पर सीएम फडणवीस से कानूनी कार्रवाई की मांग:प्रोड्यूसर पर सेक्सुअल हैरेसमेंट के झूठे आरोप लगाए; शिल्पा का पोस्ट- 'जो उखाड़ना है उखाड़ लो'

टेलीविजन एक्ट्रेस शिल्पा शिंदे के एक हालिया खुलासे पर ऑल इंडिया सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने कड़ी आपत्ति जताई है। शिल्पा ने कॉमेडियन भारती सिंह और हर्ष लिंबाचिया के पॉडकास्ट में माना था कि उन्होंने टीवी शो ‘भाभीजी घर पर हैं’ के प्रोड्यूसर पर सेक्सुअल हैरेसमेंट (यौन उत्पीड़न) के झूठे आरोप लगाए थे। इस बयान के बाद एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से इस मामले में हस्तक्षेप कर कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। वहीं, सोशल मीडिया पर हो रही आलोचना के बीच शिल्पा ने एक वीडियो शेयर कर आलोचकों को जवाब दिया है। झूठे आरोपों से असली पीड़ितों को नुकसान ऑल इंडिया सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने एक आधिकारिक बयान जारी कर शिल्पा शिंदे के इस कबूलनामे पर गहरी निराशा जताई है। एसोसिएशन का कहना है कि ऐसे कदमों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। एसोसिएशन ने कहा कि यौन उत्पीड़न के झूठे आरोपों से किसी भी व्यक्ति के सम्मान, परिवार, बच्चों, करियर और मानसिक स्थिति को कभी न ठीक होने वाला नुकसान पहुंचता है। इससे समाज में उस व्यक्ति की छवि हमेशा के लिए खराब हो जाती है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से दखल की मांग एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कराने की अपील की है। AICWA के मुताबिक, अगर यह साबित होता है कि किसी ने जानबूझकर झूठे आरोप लगाए हैं, तो कानून के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। एसोसिएशन ने कहा कि जब कोई जानबूझकर ऐसे झूठे केस करता है, तो इससे उन असली पीड़ितों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगते हैं जो न्याय की उम्मीद में आगे आते हैं। इससे बॉलीवुड और फिल्म इंडस्ट्री में प्रताड़ना झेलने वाले असली लोगों को अपनी बात रखने में मुश्किल होगी। ‘जो उखाड़ना है उखाड़ लो’ सोशल मीडिया पर लगातार हो रही आलोचना के बीच शिल्पा शिंदे ने इंस्टाग्राम पर एक नया वीडियो पोस्ट कर अपना बचाव किया है। उन्होंने अपनी तस्वीरों और वीडियो के साथ एक रील शेयर की, जिस पर लिखा था, “एक महिला बनो, हमेशा यह कहने के लिए तैयार रहो कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो।” इसके कैप्शन में उन्होंने लिखा कि जलने वाले जलते रहें। एक अन्य पोस्ट में शिल्पा ने कहा कि जिंदगी में सब कुछ साफ-साफ बोलने के चक्कर में आधे लोग वैसे ही साफ हो गए हैं। 2016 में मेकर्स पर लगाए थे संगीन आरोप शिल्पा शिंदे ने 2015 में टीवी शो भाभीजी घर पर हैं में अंगूरी भाभी का किरदार निभाया था। एक साल बाद शिल्पा ने मेकर्स और प्रोड्यूसर के खिलाफ कई संगीन आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज करवाई और शो छोड़ दिया। शिल्पा शिंदे ने हाल ही में पॉडकास्ट के दौरान कहा था, “यह बात कोई नहीं जानता। मैं अब सच बोलने से नहीं डरती। मैंने अपने प्रोड्यूसर के खिलाफ सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस दर्ज कराया था क्योंकि मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। कांट्रैक्ट के विवाद को सुलझाने के लिए मैंने ऐसा किया और बाद में सेटलमेंट करके मैं उस स्थिति से बाहर आ गई।” शिल्पा ने आगे दावा किया कि वे खुद लॉ बैकग्राउंड से आती हैं और पुलिस का कहना था कि अगर एफआईआर दर्ज करानी है, तो गंभीर आरोप लिखने ही होंगे।
शिल्पा शिंदे पर सीएम फडणवीस से कानूनी कार्रवाई की मांग:प्रोड्यूसर पर सेक्सुअल हैरेसमेंट के झूठे आरोप लगाए; शिल्पा का पोस्ट- 'जो उखाड़ना है उखाड़ लो'

टेलीविजन एक्ट्रेस शिल्पा शिंदे के एक हालिया खुलासे पर ऑल इंडिया सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने कड़ी आपत्ति जताई है। शिल्पा ने कॉमेडियन भारती सिंह और हर्ष लिंबाचिया के पॉडकास्ट में माना था कि उन्होंने टीवी शो ‘भाभीजी घर पर हैं’ के प्रोड्यूसर पर सेक्सुअल हैरेसमेंट (यौन उत्पीड़न) के झूठे आरोप लगाए थे। इस बयान के बाद एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से इस मामले में हस्तक्षेप कर कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। वहीं, सोशल मीडिया पर हो रही आलोचना के बीच शिल्पा ने एक वीडियो शेयर कर आलोचकों को जवाब दिया है। झूठे आरोपों से असली पीड़ितों को नुकसान ऑल इंडिया सिने वर्कर्स एसोसिएशन (AICWA) ने एक आधिकारिक बयान जारी कर शिल्पा शिंदे के इस कबूलनामे पर गहरी निराशा जताई है। एसोसिएशन का कहना है कि ऐसे कदमों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। एसोसिएशन ने कहा कि यौन उत्पीड़न के झूठे आरोपों से किसी भी व्यक्ति के सम्मान, परिवार, बच्चों, करियर और मानसिक स्थिति को कभी न ठीक होने वाला नुकसान पहुंचता है। इससे समाज में उस व्यक्ति की छवि हमेशा के लिए खराब हो जाती है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से दखल की मांग एसोसिएशन ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कराने की अपील की है। AICWA के मुताबिक, अगर यह साबित होता है कि किसी ने जानबूझकर झूठे आरोप लगाए हैं, तो कानून के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। एसोसिएशन ने कहा कि जब कोई जानबूझकर ऐसे झूठे केस करता है, तो इससे उन असली पीड़ितों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगते हैं जो न्याय की उम्मीद में आगे आते हैं। इससे बॉलीवुड और फिल्म इंडस्ट्री में प्रताड़ना झेलने वाले असली लोगों को अपनी बात रखने में मुश्किल होगी। ‘जो उखाड़ना है उखाड़ लो’ सोशल मीडिया पर लगातार हो रही आलोचना के बीच शिल्पा शिंदे ने इंस्टाग्राम पर एक नया वीडियो पोस्ट कर अपना बचाव किया है। उन्होंने अपनी तस्वीरों और वीडियो के साथ एक रील शेयर की, जिस पर लिखा था, “एक महिला बनो, हमेशा यह कहने के लिए तैयार रहो कि जो उखाड़ना है उखाड़ लो।” इसके कैप्शन में उन्होंने लिखा कि जलने वाले जलते रहें। एक अन्य पोस्ट में शिल्पा ने कहा कि जिंदगी में सब कुछ साफ-साफ बोलने के चक्कर में आधे लोग वैसे ही साफ हो गए हैं। 2016 में मेकर्स पर लगाए थे संगीन आरोप शिल्पा शिंदे ने 2015 में टीवी शो भाभीजी घर पर हैं में अंगूरी भाभी का किरदार निभाया था। एक साल बाद शिल्पा ने मेकर्स और प्रोड्यूसर के खिलाफ कई संगीन आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज करवाई और शो छोड़ दिया। शिल्पा शिंदे ने हाल ही में पॉडकास्ट के दौरान कहा था, “यह बात कोई नहीं जानता। मैं अब सच बोलने से नहीं डरती। मैंने अपने प्रोड्यूसर के खिलाफ सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस दर्ज कराया था क्योंकि मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। कांट्रैक्ट के विवाद को सुलझाने के लिए मैंने ऐसा किया और बाद में सेटलमेंट करके मैं उस स्थिति से बाहर आ गई।” शिल्पा ने आगे दावा किया कि वे खुद लॉ बैकग्राउंड से आती हैं और पुलिस का कहना था कि अगर एफआईआर दर्ज करानी है, तो गंभीर आरोप लिखने ही होंगे।
पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी विशेष: “पश्चिम बंगाल में वंशवाद की राजनीति का कोई स्थान नहीं है”

चुनाव में हार के बाद टीएमसी की आंतरिक कलह बढ़ गई है, ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि 61 विधायक अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व के खिलाफ उनके गुट का समर्थन करते हैं। जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने से पार्टी के भविष्य और ममता बनर्जी की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। n18oc_breaking-newsn18oc_ Indian18oc_politicsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube
दावा- ट्रम्प सरकार की जासूसी करा रहा इजराइल:अमेरिकी रक्षा विभाग में गंभीर खुफिया खतरे का अलर्ट; इजराइल बोला- आरोप झूठे

अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। इस बीच अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के भीतर यह चिंता बढ़ गई है कि इजराइल अमेरिकी अधिकारियों और ट्रम्प सरकार की अंदरूनी जानकारी जुटाने के लिए जासूसी की कोशिश कर रहा है। NBC न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक दो मौजूदा और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाकर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है। यह एजेंसी का सबसे गंभीर अलर्ट माना जाता है। अमेरिका और इजराइल जैसे बेहद करीबी सहयोगियों के बीच ऐसा होना बेहद असाधारण माना जाता है। हालांकि इजराइल ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इजराइली दूतावास का कहना है कि वह अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी नहीं करता और उसकी खुफिया एजेंसियां सहयोगियों नहीं, बल्कि दुश्मनों पर नजर रखती हैं। फोन-कंप्यूटर का इस्तेमाल नहीं करते अधिकारी काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाने का सबसे ज्यादा असर उन अमेरिकी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो इजराइल की यात्रा करते हैं या इजराइली अधिकारियों के साथ सीधे संपर्क में रहते हैं। हालांकि अमेरिका और इजराइल के बीच खुफिया जानकारी साझा करने का सहयोग फिलहाल जारी रहेगा। एक अमेरिकी अधिकारी ने NBC को बताया कि अमेरिका पहले से ही अपने सीनियर अधिकारियों की इजराइल यात्रा के दौरान खास सावधानी बरतता है। अमेरिकी अधिकारी इस दौरान अपने फोन-लैपटॉप का इस्तेमाल करने से बचते हैं। इसकी जगह वे अस्थायी मोबाइल फोन और अलग कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं। कई बार वे होटल के कमरों या ऐसी जगहों पर संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करने से भी बचते हैं, जहां निगरानी का खतरा हो सकता है।इसकी वजह यह है कि इजराइली खुफिया एजेंसियां जानकारी जुटाने के मामले में काफी आक्रामक मानी जाती हैं। हालांकि अधिकारियों ने यह भी कहा कि ऐसा कोई एक बड़ा घटनाक्रम नहीं था जिसकी वजह से खतरे का स्तर अचानक बढ़ाया गया हो। इसके बजाय कई घटनाओं और आकलनों के आधार पर यह फैसला लिया गया। ट्रम्प ने फोन पर नेतन्याहू को गाली दी थी यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब ईरान को लेकर ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। अप्रैल में युद्धविराम के बाद ट्रम्प ईरान के साथ एक बड़े समझौते की कोशिश कर रहे हैं, जबकि नेतन्याहू का मानना है कि ईरान किसी समझौते का पालन नहीं करेगा। इस बीच लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियानों को लेकर भी अमेरिका और इजराइल के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, हाल ही में ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच फोन पर तीखी बातचीत भी हुई थी। बाद में ट्रम्प ने स्वीकार किया कि उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री को अपशब्द कहे थे। इससे यह अटकलें और तेज हो गईं कि दोनों नेताओं के बीच मध्य पूर्व की रणनीति को लेकर गंभीर मतभेद हैं। अमेरिका-इजराइल के रिश्तों में पहले भी कड़वाहट दिखी भले ही अमेरिका और इजराइल बहुत पक्के दोस्त माने जाते हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच खुफिया स्तर पर अविश्वास और जासूसी का पुराना इतिहास रहा है। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां पहले भी कई बार इजराइल की जासूसी गतिविधियों को लेकर अलर्ट का स्तर बढ़ा चुकी हैं और दोनों के बीच बड़े विवाद हुए हैं। 1. जोनाथन पोलार्ड केस (1985) जोनाथन पोलार्ड अमेरिका की नौसेना खुफिया एजेंसी में काम करता था। 1985 में उस पर आरोप लगा कि उसने अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए। पोलार्ड का कहना था कि वह इजराइल की मदद करना चाहता था, लेकिन अमेरिका ने इसे जासूसी माना। जांच के दौरान वह इजराइल के दूतावास में शरण लेने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया। 1987 में अमेरिकी अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। इस मामले से अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में तनाव आ गया। करीब 30 साल जेल में रहने के बाद 2015 में पोलार्ड को पैरोल पर रिहा किया गया। 2020 में वह इजराइल चला गया, जहां उसका स्वागत एक राष्ट्रीय नायक की तरह किया गया। यह मामला आज भी अमेरिका में उन सबसे बड़े जासूसी मामलों में गिना जाता है, जिनमें किसी अमेरिकी नागरिक ने किसी सहयोगी देश के लिए जासूसी की थी। यह पहली बार था जब अमेरिका ने इजराइल को लेकर अपनी काउंटर-इंटेलिजेंस चौकसी को उच्चतम स्तर पर कर दिया था। 2. बेन-अमी कादिश केस (2008) बेन-अमी कादिश अमेरिकी सेना के लिए काम कर चुके एक मैकेनिकल इंजीनियर थे। 2008 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने 1980 के दशक में अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए थे। अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार, इन दस्तावेजों में मिसाइल रक्षा प्रणाली, लड़ाकू विमानों और परमाणु हथियारों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी शामिल थी। आरोप था कि कादिश ने यह जानकारी एक इजराइली संपर्क को सौंपी थी। कादिश ने बाद में एक आरोप स्वीकार किया और 2009 में उन्हें सजा सुनाई गई। हालांकि उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें जेल नहीं भेजा गया, बल्कि जुर्माना और निगरानी जैसी सजा दी गई। 3. स्टिंगरे जासूसी विवाद (2019) 2019 में अमेरिकी मीडिया में एक रिपोर्ट आई, जिसमें दावा किया गया कि व्हाइट हाउस और वाशिंगटन के कुछ संवेदनशील इलाकों के आसपास संदिग्ध ‘स्टिंगरे’ डिवाइस पाए गए थे। ये नकली मोबाइल टावर की तरह काम करके आसपास के मोबाइल फोनों से जानकारी जुटा रहे थे। जांच एजेंसियों को शक था कि इन उपकरणों के पीछे इजराइल हो सकता है और इनका मकसद राष्ट्रपति ट्रम्प और उनके करीबी अधिकारियों की गतिविधियों और बातचीत पर नजर रखना था। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने कभी सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि इजराइल दोषी साबित हो गया है। दूसरी ओर, इजराइल ने आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि वह अमेरिका में जासूसी नहीं करता।
दावा- ट्रम्प सरकार की जासूसी करा रहा इजराइल:अमेरिकी रक्षा विभाग में गंभीर खुफिया खतरे का अलर्ट; इजराइल बोला- आरोप झूठे

अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं। इस बीच अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) के भीतर यह चिंता बढ़ गई है कि इजराइल अमेरिकी अधिकारियों और ट्रम्प सरकार की अंदरूनी जानकारी जुटाने के लिए जासूसी की कोशिश कर रहा है। NBC न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक दो मौजूदा और एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) ने हाल ही में इजराइल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाकर ‘क्रिटिकल’ कर दिया है। यह एजेंसी का सबसे गंभीर अलर्ट माना जाता है। अमेरिका और इजराइल जैसे बेहद करीबी सहयोगियों के बीच ऐसा होना बेहद असाधारण माना जाता है। हालांकि इजराइल ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। इजराइली दूतावास का कहना है कि वह अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी नहीं करता और उसकी खुफिया एजेंसियां सहयोगियों नहीं, बल्कि दुश्मनों पर नजर रखती हैं। फोन-कम्प्यूटर का इस्तेमाल नहीं करते अधिकारी काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे का स्तर बढ़ाने का सबसे ज्यादा असर उन अमेरिकी अधिकारियों पर पड़ सकता है जो इजराइल की यात्रा करते हैं या इजराइली अधिकारियों के साथ सीधे संपर्क में रहते हैं। हालांकि अमेरिका और इजराइल के बीच खुफिया जानकारी साझा करने का सहयोग फिलहाल जारी रहेगा। एक अमेरिकी अधिकारी ने NBC को बताया कि अमेरिका पहले से ही अपने सीनियर अधिकारियों की इजराइल यात्रा के दौरान खास सावधानी बरतता है। अमेरिकी अधिकारी इस दौरान अपने फोन-लैपटॉप का इस्तेमाल करने से बचते हैं। इसकी जगह वे अस्थायी मोबाइल फोन और अलग कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हैं। कई बार वे होटल के कमरों या ऐसी जगहों पर संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा करने से भी बचते हैं, जहां निगरानी का खतरा हो सकता है।इसकी वजह यह है कि इजराइली खुफिया एजेंसियां जानकारी जुटाने के मामले में काफी आक्रामक मानी जाती हैं। हालांकि अधिकारियों ने यह भी कहा कि ऐसा कोई एक बड़ा घटनाक्रम नहीं था जिसकी वजह से खतरे का स्तर अचानक बढ़ाया गया हो। इसके बजाय कई घटनाओं और आकलनों के आधार पर यह फैसला लिया गया। ट्रम्प ने फोन पर नेतन्याहू को गाली दी थी यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब ईरान को लेकर ट्रम्प और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। अप्रैल में युद्धविराम के बाद ट्रम्प ईरान के साथ एक बड़े समझौते की कोशिश कर रहे हैं, जबकि नेतन्याहू का मानना है कि ईरान किसी समझौते का पालन नहीं करेगा। इस बीच लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियानों को लेकर भी अमेरिका और इजराइल के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, हाल ही में ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच फोन पर तीखी बातचीत भी हुई थी। बाद में ट्रम्प ने स्वीकार किया कि उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री को अपशब्द कहे थे। इससे यह अटकलें और तेज हो गईं कि दोनों नेताओं के बीच मध्य पूर्व की रणनीति को लेकर गंभीर मतभेद हैं। अमेरिका-इजराइल के रिश्तों में पहले भी कड़वाहट दिखी भले ही अमेरिका और इजराइल बहुत पक्के दोस्त माने जाते हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच खुफिया स्तर पर अविश्वास और जासूसी का पुराना इतिहास रहा है। अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां पहले भी कई बार इजराइल की जासूसी गतिविधियों को लेकर अलर्ट का स्तर बढ़ा चुकी हैं और दोनों के बीच बड़े विवाद हुए हैं। 1. जोनाथन पोलार्ड केस (1985) जोनाथन पोलार्ड अमेरिका की नौसेना खुफिया एजेंसी में काम करता था। 1985 में उस पर आरोप लगा कि उसने अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए। पोलार्ड का कहना था कि वह इजराइल की मदद करना चाहता था, लेकिन अमेरिका ने इसे जासूसी माना। जांच के दौरान वह इजराइल के दूतावास में शरण लेने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया। 1987 में अमेरिकी अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। इस मामले से अमेरिका और इजराइल के रिश्तों में तनाव आ गया। करीब 30 साल जेल में रहने के बाद 2015 में पोलार्ड को पैरोल पर रिहा किया गया। 2020 में वह इजराइल चला गया, जहां उसका स्वागत एक राष्ट्रीय नायक की तरह किया गया। यह मामला आज भी अमेरिका में उन सबसे बड़े जासूसी मामलों में गिना जाता है, जिनमें किसी अमेरिकी नागरिक ने किसी सहयोगी देश के लिए जासूसी की थी। यह पहली बार था जब अमेरिका ने इजराइल को लेकर अपनी काउंटर-इंटेलिजेंस चौकसी को उच्चतम स्तर पर कर दिया था। 2. बेन-अमी कादिश केस (2008) बेन-अमी कादिश अमेरिकी सेना के लिए काम कर चुके एक मैकेनिकल इंजीनियर थे। 2008 में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने 1980 के दशक में अमेरिका के कई गोपनीय दस्तावेज इजराइल को दिए थे। अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार, इन दस्तावेजों में मिसाइल रक्षा प्रणाली, लड़ाकू विमानों और परमाणु हथियारों से जुड़ी संवेदनशील जानकारी शामिल थी। आरोप था कि कादिश ने यह जानकारी एक इजराइली संपर्क को सौंपी थी। कादिश ने बाद में एक आरोप स्वीकार किया और 2009 में उन्हें सजा सुनाई गई। हालांकि उनकी उम्र को देखते हुए उन्हें जेल नहीं भेजा गया, बल्कि जुर्माना और निगरानी जैसी सजा दी गई। 3. स्टिंगरे जासूसी विवाद (2019) 2019 में अमेरिकी मीडिया में एक रिपोर्ट आई, जिसमें दावा किया गया कि व्हाइट हाउस और वाशिंगटन के कुछ संवेदनशील इलाकों के आसपास संदिग्ध ‘स्टिंगरे’ डिवाइस पाए गए थे। ये नकली मोबाइल टावर की तरह काम करके आसपास के मोबाइल फोनों से जानकारी जुटा रहे थे। जांच एजेंसियों को शक था कि इन उपकरणों के पीछे इजराइल हो सकता है और इनका मकसद राष्ट्रपति ट्रम्प और उनके करीबी अधिकारियों की गतिविधियों और बातचीत पर नजर रखना था। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने कभी सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि इजराइल दोषी साबित हो गया है। दूसरी ओर, इजराइल ने आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि वह अमेरिका में जासूसी नहीं करता।
‘अभिषेक को स्टैंडिंग ओवेशन देने के लिए कहा गया’: ऋतब्रत बनर्जी ने और अधिक टीएमसी विद्रोहियों के संकेत दिए | भारत समाचार

आखरी अपडेट:06 जून, 2026, 16:14 IST टीएमसी से निष्कासित विधायक रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि हालिया चुनाव में पार्टी की हार के बाद एक बैठक में अभिषेक बनर्जी के लिए खड़े होकर अभिनंदन करने का प्रस्ताव पारित किया गया था। टीएमसी से निष्कासित विधायक रीताब्रत बनर्जी. (पीटीआई) निष्कासित टीएमसी विधायक रीतब्रत बनर्जी ने शनिवार को पार्टी के भीतर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और संकेत दिया कि आने वाले दिनों में और अधिक नेता विद्रोही खेमे में शामिल हो सकते हैं, जबकि हाल ही में असंतोष की लहर के लिए टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने सीएनएन-न्यूज18 के साथ एक विशेष साक्षात्कार में कहा, “फिलहाल, 61 विधायक हमारे साथ हैं, इसलिए 18 जून को विधानसभा सत्र शुरू होने से पहले (बागी नेताओं की) संख्या में निश्चित रूप से वृद्धि होगी।” उनकी टिप्पणी तब आई जब पार्टी के 80 में से लगभग 60 विधायकों ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत का समर्थन किया, जो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी में सबसे बड़ी आंतरिक चुनौतियों में से एक है। ‘अभिषेक बनर्जी के लिए खड़े होकर अभिनंदन’ रीताब्रत ने ममता बनर्जी की आलोचना करने से परहेज किया, लेकिन अभिषेक को टीएमसी के भीतर आंतरिक विद्रोह का मुख्य कारण बताया। उन्होंने कहा कि हाल के चुनाव में पार्टी की हार के बाद छह मई को ममता बनर्जी के कालीघाट आवास पर एक बैठक के दौरान अभिषेक को स्टैंडिंग ओवेशन देने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया था. उन्होंने कहा, “यह भी कहा गया कि टीएमसी चुनाव नहीं हारी है। सभी को अभिषेक बनर्जी को स्टैंडिंग ओवेशन देने के लिए कहा गया था। हमने पूछा होगा कि आप (अभिषेक) कहां थे, लेकिन मेरे पास उसे टालने की हिम्मत या क्षमता नहीं थी, इसलिए मैं भी खड़ा हुआ, लेकिन यह फुल स्टैंडिंग ओवेशन नहीं था।” रीताब्रता ने आरोप लगाया कि टीएमसी विधायकों को 6 मई की बैठक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए एक पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया था, और दावा किया कि कई सांसदों के नाम भी उपस्थिति रिकॉर्ड में शामिल थे जो उपस्थित नहीं थे। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया ‘अभिषेक को स्टैंडिंग ओवेशन देने के लिए कहा गया’: ऋतब्रत बनर्जी ने और अधिक टीएमसी विद्रोहियों के संकेत दिए अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें
क्षेत्रीय फिल्में अब ऑस्कर की रेस तक पहुंच रहीं:41% सफल क्षेत्रीय फिल्मों ने अपनी लागत से 10 गुना या ज्यादा कमाई की

बाहुबली, आरआरआर, केजीएफ और पुष्पा जैसी ‘पैन-इंडिया’ फिल्मों ने सफलता के नए पैमाने गढ़े हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से ‘मल्टी इंडिया’ सिनेमा का भी उदय हुआ है। हर भाषा का सिनेमा सुपरहिट फिल्में दे रहा है। उदाहरण के लिए गुजराती फिल्म ‘लालो: कृष्ण सदा सहायते’ ने 112 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की, जबकि इसको बनाने में सिर्फ 50 लाख रुपए लगे थे। वहीं, मलयालम फिल्म ‘लोकाह चैप्टर 1: चंद्रा’ ने 30 करोड़ रुपए के बजट पर लगभग 300 करोड़ रुपए का कारोबार किया। मराठी सिनेमा भी इस बदलाव का उदाहरण है। मसलन, ‘दशावतार’ ने 12 करोड़ रुपए के बजट पर 28.47 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया और निवेश के मुकाबले 220% से अधिक रिटर्न दिया। यह फिल्म ऑस्कर 2026 के लिए एकेडमी अवॉर्ड्स की कंटेंशन लिस्ट में जगह बनाने वाली पहली मराठी फिल्म भी बनी थी। एनालिसिस: गुजराती फिल्म ने 224 गुना कमाई की, दो साल में 17 क्षेत्रीय फिल्में सुपरहिट सैकनिक ने 17 सफल क्षेत्रीय फिल्मों का विश्लेषण किया है। इनमें 7 फिल्में ऐसी थीं, जिन्होंने 10 गुना या उससे ज्यादा रिटर्न दिया… यानी लगभग 41% फिल्मों ने अपनी लागत का 10 गुना या उससे अधिक कमाया। बॉक्स ऑफिस पर बढ़ रही हिस्सेदारी पीवीआर आइनॉक्स के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में क्षेत्रीय फिल्मों की हिस्सेदारी 27% थी, जो 2025 में बढ़कर 31% हो गई। वहीं हिंदी फिल्मों की हिस्सेदारी 55-56% के आसपास स्थिर बनी रही। अंग्रेजी फिल्मों की हिस्सेदारी 18% से घटकर 14% रह गई। एक्सपर्ट व्यू- आज सिनेमा का सबसे बड़ा स्टार कंटेंट है – आज भारतीय सिनेमा में सबसे बड़ा स्टार कंटेंट है। पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि क्षेत्रीय फिल्मों ने न सिर्फ अपने राज्यों में, बल्कि देश और विदेश में भी दर्शक बनाए हैं… क्योंकि वहां कंटेंट ही सबसे बड़ा स्टार है। – किसी भी भाषा की फिल्म अगर सफल होती है, तो उसका फायदा पूरे इकोसिस्टम को मिलता है। थिएटर में दर्शक आएंगे तो निर्माता, वितरक, प्रदर्शक और फिल्म उद्योग से जुड़े हजारों लोगों को फायदा होगा। – जहां तक सिनेमैटिक यूनिवर्स का सवाल है, तो मेरे ख्याल में यह एक वैश्विक ट्रेंड है। अगर किसी फिल्म का किरदार और उसकी दुनिया दर्शकों को पसंद आती है, तो उसके अगले भाग और फ्रेंचाइजी बनना स्वाभाविक है। दर्शक उसी कंटेंट को आगे देखना चाहते हैं जिससे वे जुड़ाव महसूस करते हैं। भविष्य – अब यूनिवर्स फिल्में बनेंगी तेलुगु सिनेमा – हनुमान यूनिवर्स ‘हनुमान’ की सफलता के बाद निर्देशक प्रशांत वर्मा पौराणिक फिल्मों का यूनिवर्स बना रहे हैं। ‘जय हनुमान’ सबसे चर्चित प्रोजेक्ट है। तमिल सिनेमा में लोकदेवताओं पर जोर – लोककथाओं व क्षेत्रीय देवताओं पर फिल्में बन रही हैं। शिवकार्तिकेयन की ‘सेयोन’ चर्चा में है। मराठी में बड़े ऐतिहासिक प्रोजेक्ट – ‘राजा शिवाजी’ की सफलता ने ऐतिहासिक फिल्मों का रास्ता खोला। ‘घाबडकुंड’ जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट लाइन में हैं। मलयालम में लोकाह यूनिवर्स – ‘लोकाह चैप्टर 1: चंद्रा’ की सफलता के बाद फ्रेंचाइजी को आगे बढ़ाने की तैयारी है।
क्षेत्रीय फिल्में अब ऑस्कर की रेस तक पहुंच रहीं:41% सफल क्षेत्रीय फिल्मों ने अपनी लागत से 10 गुना या ज्यादा कमाई की

बाहुबली, आरआरआर, केजीएफ और पुष्पा जैसी ‘पैन-इंडिया’ फिल्मों ने सफलता के नए पैमाने गढ़े हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से ‘मल्टी इंडिया’ सिनेमा का भी उदय हुआ है। हर भाषा का सिनेमा सुपरहिट फिल्में दे रहा है। उदाहरण के लिए गुजराती फिल्म ‘लालो: कृष्ण सदा सहायते’ ने 112 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की, जबकि इसको बनाने में सिर्फ 50 लाख रुपए लगे थे। वहीं, मलयालम फिल्म ‘लोकाह चैप्टर 1: चंद्रा’ ने 30 करोड़ रुपए के बजट पर लगभग 300 करोड़ रुपए का कारोबार किया। मराठी सिनेमा भी इस बदलाव का उदाहरण है। मसलन, ‘दशावतार’ ने 12 करोड़ रुपए के बजट पर 28.47 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया और निवेश के मुकाबले 220% से अधिक रिटर्न दिया। यह फिल्म ऑस्कर 2026 के लिए एकेडमी अवॉर्ड्स की कंटेंशन लिस्ट में जगह बनाने वाली पहली मराठी फिल्म भी बनी थी। एनालिसिस: गुजराती फिल्म ने 224 गुना कमाई की, दो साल में 17 क्षेत्रीय फिल्में सुपरहिट सैकनिक ने 17 सफल क्षेत्रीय फिल्मों का विश्लेषण किया है। इनमें 7 फिल्में ऐसी थीं, जिन्होंने 10 गुना या उससे ज्यादा रिटर्न दिया… यानी लगभग 41% फिल्मों ने अपनी लागत का 10 गुना या उससे अधिक कमाया। बॉक्स ऑफिस पर बढ़ रही हिस्सेदारी पीवीआर आइनॉक्स के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में क्षेत्रीय फिल्मों की हिस्सेदारी 27% थी, जो 2025 में बढ़कर 31% हो गई। वहीं हिंदी फिल्मों की हिस्सेदारी 55-56% के आसपास स्थिर बनी रही। अंग्रेजी फिल्मों की हिस्सेदारी 18% से घटकर 14% रह गई। एक्सपर्ट व्यू- आज सिनेमा का सबसे बड़ा स्टार कंटेंट है – आज भारतीय सिनेमा में सबसे बड़ा स्टार कंटेंट है। पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि क्षेत्रीय फिल्मों ने न सिर्फ अपने राज्यों में, बल्कि देश और विदेश में भी दर्शक बनाए हैं… क्योंकि वहां कंटेंट ही सबसे बड़ा स्टार है। – किसी भी भाषा की फिल्म अगर सफल होती है, तो उसका फायदा पूरे इकोसिस्टम को मिलता है। थिएटर में दर्शक आएंगे तो निर्माता, वितरक, प्रदर्शक और फिल्म उद्योग से जुड़े हजारों लोगों को फायदा होगा। – जहां तक सिनेमैटिक यूनिवर्स का सवाल है, तो मेरे ख्याल में यह एक वैश्विक ट्रेंड है। अगर किसी फिल्म का किरदार और उसकी दुनिया दर्शकों को पसंद आती है, तो उसके अगले भाग और फ्रेंचाइजी बनना स्वाभाविक है। दर्शक उसी कंटेंट को आगे देखना चाहते हैं जिससे वे जुड़ाव महसूस करते हैं। भविष्य – अब यूनिवर्स फिल्में बनेंगी तेलुगु सिनेमा – हनुमान यूनिवर्स ‘हनुमान’ की सफलता के बाद निर्देशक प्रशांत वर्मा पौराणिक फिल्मों का यूनिवर्स बना रहे हैं। ‘जय हनुमान’ सबसे चर्चित प्रोजेक्ट है। तमिल सिनेमा में लोकदेवताओं पर जोर – लोककथाओं व क्षेत्रीय देवताओं पर फिल्में बन रही हैं। शिवकार्तिकेयन की ‘सेयोन’ चर्चा में है। मराठी में बड़े ऐतिहासिक प्रोजेक्ट – ‘राजा शिवाजी’ की सफलता ने ऐतिहासिक फिल्मों का रास्ता खोला। ‘घाबडकुंड’ जैसे कई बड़े प्रोजेक्ट लाइन में हैं। मलयालम में लोकाह यूनिवर्स – ‘लोकाह चैप्टर 1: चंद्रा’ की सफलता के बाद फ्रेंचाइजी को आगे बढ़ाने की तैयारी है।
Google India leases 617,000 sq ft in Atrium Place Tower 1 Gurugram, to pay ₹671 cr over 5 years

Hindi News Business Google India Leases 617,000 Sq Ft In Atrium Place Tower 1 Gurugram, To Pay ₹671 Cr Over 5 Years नई दिल्ली10 मिनट पहले कॉपी लिंक गूगल इंडिया ने गुरुग्राम के ‘एट्रियम प्लेस’ में करीब 6.17 लाख स्क्वायर फीट ऑफिस स्पेस लीज पर लिया है। प्रॉपस्टैक के ट्रांजैक्शन डॉक्युमेंट्स के मुताबिक, गूगल इस जगह के लिए अगले 5 साल में कुल 671 करोड़ रुपए का किराया चुकाएगी। यह फ्रेश लीज डील ऐसे समय में हुई है जब देश के ग्रेड ए कॉमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर की डिमांड में भारी तेजी देखी जा रही है। हर महीने ₹10.55 करोड़ रेंट, ₹63.65 करोड़ सिक्योरिटी डिपॉजिट गूगल ने गुरुग्राम के एट्रियम प्लेस के ‘टावर 1’ में कुल 6,17,448 स्क्वायर फीट ऑफिस स्पेस रेंट पर लिया है। एट्रियम प्लेस डीएलएफ (DLF) और हाइन्स का एक जॉइंट वेंचर है। इस एग्रीमेंट के तहत गूगल ₹171 प्रति स्क्वायर फीट की लीज रेट से हर महीने लगभग 10.55 करोड़ रुपए का रेंट चुकाएगी। इसके साथ ही कंपनी ने 63.65 करोड़ रुपए बतौर सिक्योरिटी डिपॉजिट जमा किए हैं। अप्रैल 2026 में रजिस्टर्ड हुए इन डॉक्युमेंट्स के अनुसार, इस लीज में हर तीन साल में किराए में 15% की बढ़ोतरी का नियम भी शामिल है। यह नई लीज 1 अक्टूबर 2025 से शुरू हो चुकी है, जो कॉमर्शियल टावर के दूसरे फ्लोर से लेकर 16वें फ्लोर तक के हिस्से को कवर करती है। पिछले साल भी गूगल ने की थी 2 बड़ी लीज डील्स गूगल लगातार भारत में अपना ऑफिस स्पेस बढ़ा रहा है। इस फ्रेश लीज से पहले साल 2025 में भी कंपनी ने मैनेज्ड वर्कस्पेस प्रोवाइडर ‘टेबलस्पेस’ से 5,50,000 स्क्वायर फीट ऑफिस स्पेस लीज पर लिया था। इतना ही नहीं, साल 2025 में ही गूगल ने ईस्ट बेंगलुरु के डोडदानेकुंडी में अपने करीब 8,70,000 स्क्वायर फीट के ऑफिस स्पेस की लीज को रिन्यू भी किया था, जिसके लिए कंपनी सालाना 90 करोड़ रुपए का रेंट कमिटमेंट दे रही है। गुरुग्राम में डीएलएफ एसेट्स की मांग तेज यह डील ऐसे समय पर सामने आई है जब गुरुग्राम में डीएलएफ के कॉमर्शियल एसेट्स की मांग में तगड़ा उछाल आया है। पिछले हफ्ते ही एयरबीएनबी ने अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) के लिए गुरुग्राम के डीएलएफ साइबर सिटी में 46,437 स्क्वायर फीट ऑफिस स्पेस 5 साल के लिए लीज पर लिया है। एयरबीएनबी इसके लिए करीब 61.53 लाख रुपए का शुरुआती मंथली रेंट चुका रही है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि टेक्नोलॉजी सेक्टर की दिग्गज कंपनियां अब ₹130 प्रति स्क्वायर फीट से ज्यादा के रेट पर लॉन्ग-टर्म और हाई-वैल्यू लीज एग्रीमेंट साइन कर रही हैं। यह इस बात का साफ संकेत है कि देश में ग्रेड ए कॉमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग बेहद मजबूत बनी हुई है। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का दबदबा कायम भारत के ऑफिस लीज मार्केट को आगे बढ़ाने में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की सबसे बड़ी भूमिका है। जनवरी से मार्च 2026 की तिमाही के दौरान भारत में कुल 20.7 मिलियन स्क्वायर फीट (msf) ऑफिस स्पेस लीज पर लिया गया। इसमें से अकेले GCCs की हिस्सेदारी 9.1 मिलियन स्क्वायर फीट रही, जो कुल एब्जॉर्प्शन का 44% हिस्सा है। क्या होते हैं ग्रेड ए कॉमर्शियल इंफ्रास्ट्रक्चर और GCC? ग्रेड ए कॉमर्शियल प्रॉपर्टी: यह रियल एस्टेट की सबसे प्रीमियम कैटेगरी होती है। इसमें बेहतरीन लोकेशन, वर्ल्ड-क्लास बिल्डिंग क्वालिटी, एडवांस सिक्योरिटी, हाई-टेक लाइफ सपोर्ट सिस्टम और टॉप-नोच एमिनिटीज (सुविधाएं) मिलती हैं। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां ऐसे ही दफ्तर चुनती हैं। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC): ये किसी विदेशी कंपनी के भारत या अन्य देशों में स्थापित वो सेंटर्स होते हैं, जो मुख्य कंपनी के लिए आईटी सपोर्ट, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, डेटा एनालिटिक्स और कस्टमाइज़्ड टेक सॉल्यूशंस का काम खुद संभालते हैं। इन्हें पहले बैक-ऑफिस भी कहा जाता था, लेकिन अब ये कोर टेक्नोलॉजी पर काम करते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
अन्नामलाई ने छोड़ी बीजेपी! | नया राजनीतिक अध्याय? भाजपा से बाहर निकलने के बाद अन्नामलाई ने स्वतंत्र राह पकड़ी | एन18

तमिलनाडु में एक बड़ा राजनीतिक विकास सामने आया है क्योंकि के. अन्नामलाई ने युवा भागीदारी, शासन सुधार और जमीनी स्तर पर जुड़ाव पर केंद्रित एक नया राजनीतिक आंदोलन शुरू करने के लिए भाजपा से किनारा कर लिया है। इस कदम ने राजनीतिक हलकों में तीव्र बहस छेड़ दी है, समर्थकों ने इसे तमिलनाडु की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा है, जबकि आलोचकों का सवाल है कि क्या भाजपा से खुद को दूर करने से उनका राजनीतिक प्रभाव सीमित हो सकता है। अन्नामलाई के फैसले से राज्य में राजनीतिक समीकरण फिर से बनने की उम्मीद है, खासकर वैकल्पिक नेतृत्व और नए राजनीतिक विचारों की तलाश करने वाले युवा मतदाताओं के बीच। राजनीतिक विश्लेषक बारीकी से देख रहे हैं कि नया आंदोलन कैसे विकसित होता है और क्या यह तमिलनाडु के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण ताकत के रूप में उभर सकता है। n18oc_breaking-newsn18oc_ Indian18oc_politicsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 06 जून, 2026, 15:39 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)बीजेपी तमिलनाडु(टी)करंट अफेयर्स(टी)शासन सुधार(टी)भारत राजनीति समाचार(टी)राजनीतिक विश्लेषण(टी)तमिल राजनीति(टी)युवा मतदाता







