Gold Silver Prices Surge | Gold Rs 1.46 Lakh, Silver Rs 2.33 Lakh

नई दिल्ली19 मिनट पहले कॉपी लिंक सोना-चांदी के दाम में आज 3 जुलाई को लगातार चौथे दिन तेजी है। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन (IBJA) के अनुसार, 10 ग्राम 24 कैरेट सोना 3,104 रुपए बढ़कर 1,46,107 रुपए पर पहुंच गया है। इससे पहले गुरुवार को इसकी कीमत 1,43,003 रुपए प्रति 10 ग्राम थी। वहीं, एक किलो चांदी 4,504 रुपए बढ़कर 2,33,354 रुपए पर पहुंच गई। इससे पहले 2 जून को इसकी कीमत 2,28,850 रुपए प्रति किलो थी। सोना पिछले चार दिन में 4,686 रुपए और चांदी 13,374 रुपए महंगी हुई है। इससे पहले सोमवार को सोना 1.41 लाख रुपए और चांदी 2.2 लाख रुपए पर थी। अलग-अलग शहरों में सोने के दाम अलग होने की 4 वजहें ट्रांसपोर्टेशन और सिक्योरिटी: एक शहर से दूसरे शहर सोना ले जाने में ईंधन और सुरक्षा खर्च जुड़ता है, जिससे दूरी बढ़ने पर दाम बढ़ते हैं। खरीदारी की मात्रा: दक्षिण भारत में ज्यादा खपत (करीब 40%) के कारण ज्वेलर्स बड़ी खरीद करते हैं, लेकिन छूट का फायदा सीमित रहता है। लोकल ज्वेलरी एसोसिएशन: राज्य और शहर के ज्वेलरी एसोसिएशन स्थानीय मांग-सप्लाई के आधार पर रेट तय करते हैं। पुराना स्टॉक और खरीद मूल्य: ज्वेलर्स का खरीदी रेट तय करता है कि वे ग्राहकों को कितनी कीमत में बेचेंगे। सोना इस साल ₹12,908 और चांदी ₹2,934 महंगी इस साल सोने-चांदी की कीमत में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। सोना 2026 में अब तक 12,908 रुपए और चांदी 2,934 रुपए महंगी हुई है। 31 दिसंबर 2025 को 10g सोना 1.33 लाख रुपए पर था, जो अब 1.46 लाख रुपए पर पहुंच गया है। वहीं, चांदी 31 दिसंबर 2025 को 2.30 लाख रुपए किलो थी, जो अब 2.33 लाख रुपए पर पहुंच गई है। इस दौरान 29 जनवरी को सोने ने 1.76 लाख रुपए और चांदी ने 3.86 लाख रुपए का ऑलटाइम हाई भी बनाया था। सोना-चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी 6% से बढ़कर 15% हुई केंद्र सरकार ने मई-2026 में सोने-चांदी के आयात पर लगने वाली ड्यूटी 6% से बढ़ाकर 15% की है। इसका मकसद विदेशी खरीद कम करना और देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे दबाव को घटाना है। सरकार ने सोने पर 10% बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5% एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट सेस (AIDC) लगाया है। इस तरह कुल प्रभावी टैक्स 15% हो गया है। इससे पहले 2024 के बजट में वित्त मंत्री सीतारमण ने इंपोर्ट ड्यूटी 15% से घटाकर 6% की थी। विदेशी जेवर मंगाने के लिए लाइसेंस लेना होगा इसके अलावा, सरकार ने सोने-चांदी और प्लेटिनम के गहनों को ‘फ्री’ कैटेगरी से हटाकर ‘रिस्ट्रिक्टेड’ कैटेगरी में डाल दिया है। इसका सीधा असर बाजार की सप्लाई पर दिख रहा है, जिससे सोना-चांदी की कीमतें बढ़ रही हैं। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) की ओर से जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक, अब इन कीमती धातुओं से बनी ज्वेलरी किसी भी देश से मंगाने के लिए सरकार से विशेष लाइसेंस या परमिशन लेना होगा। सरकार ने यह कदम फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए उठाया है। ज्वेलर्स से सोना खरीदते समय इन 2 बातों का रखें ध्यान 1. सर्टिफाइड गोल्ड ही खरीदें: हमेशा ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) का हॉलमार्क लगा हुआ सर्टिफाइड गोल्ड ही खरीदें। ये नंबर अल्फान्यूमेरिक यानी कुछ इस तरह से हो सकता है- AZ4524। हॉलमार्किंग से पता चलता है कि सोना कितने कैरेट का है। 2. कीमत क्रॉस चेक करें: सोने का सही वजन और खरीदने के दिन उसकी कीमत कई सोर्सेज (जैसे इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन की वेबसाइट) से क्रॉस चेक करें। सोने का भाव 24 कैरेट, 22 कैरेट और 18 कैरेट के हिसाब से अलग-अलग होता है। असली चांदी की पहचान करने के 4 तरीके मैग्नेट टेस्ट: असली सिल्वर चुंबक से नहीं चिपकती। अगर चिपक जाए तो फेक है। आइस टेस्ट: सिल्वर पर बर्फ रखें। असली सिल्वर पर बर्फ तेजी से पिघलती है। स्मेल टेस्ट: असली सिल्वर में गंध नहीं होती। फेक में कॉपर जैसी गंध आती है। क्लॉथ टेस्ट: चांदी को सफेद कपड़े से रगड़ें। अगर काला निशान आए तो असली है। ————————————– ये खबर भी पढ़ें… भारतीय घरों में देश की GDP से ज्यादा का सोना: 34,600 टन गोल्ड की कीमत ₹450 लाख करोड़, देश की GDP ₹370 लाख करोड़ भारतीय परिवारों के पास मौजूद कुल सोने की वैल्यू 5 ट्रिलियन डॉलर (₹450 लाख करोड़) के पार निकल गई है। यह आंकड़ा देश की कुल 4.1 ट्रिलियन डॉलर यानी, 370 लाख करोड़ रुपए की GDP से भी ज्यादा है। सोने की कीमतें रिकॉर्ड हाई पर पहुंचने के कारण ऐसा हुआ है। मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय घरों में लगभग 34,600 टन सोना जमा है। अभी सोने की वैल्यू 1.38 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के करीब चल रही है। वहीं इंटरनेशनल मार्केट में सोना 4,500 डॉलर प्रति औंस (करीब 28 ग्राम) के पार ट्रेड कर रहा है। रुपए में इसे बदलें तो इसकी वैल्यू 1.30 लाख रुपए प्रति 10 ग्राम के करीब होती है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
दिलजीत दोसांझ के बयान से निराश हुई कॉकरोच जनता पार्टी:प्रवक्ता बोले- युवाओं के मुद्दों पर बोलना चाहिए; दिलजीत ने कहा- मुझे प्रदर्शन से दूर रखो

दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरभ दास ने सिंगर और एक्टर दिलजीत दोसांझ के बयान पर निराशा जताई है। हालिया बातचीत में सौरभ दास ने कहा कि वे दिलजीत के रुख से थोड़े अपसेट हैं। दिलजीत को गानों की तरह अपने शब्दों से भी देश के युवाओं के मुद्दों और इस आंदोलन पर बात करनी चाहिए। इससे पहले दिलजीत दोसांझ ने अपने इंस्टाग्राम लाइव में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से खुद को दूर रखने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि वे राजनेता नहीं, बल्कि सिर्फ एक कलाकार हैं। युवाओं का जोश बढ़ाएं दिलजीत सोशल मीडिया सामने वीडियो में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास मीडिया से बातचीत करते नजर आ रहे हैं। शुरुआत में सौरभ ने कहा कि उनके पास एक्टर-सिंगर दिलजीत के लिए कोई संदेश नहीं है। हालांकि, जब उनसे दिलजीत के हालिया बयान को लेकर सीधा सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा, “यह बहुत दुखद है। मुझे लगता है कि उन्हें इस आंदोलन पर कुछ बोलना चाहिए ताकि युवाओं का जोश बढ़े। वे अपने गानों से तो जोश बढ़ाते ही हैं, लेकिन उन्हें अपने शब्दों से भी देश के युवाओं से जुड़े मुद्दों पर बात करनी चाहिए।” दिलजीत ने प्रदर्शन से खुद को अलग किया यह पूरा विवाद दिलजीत दोसांझ के एक इंस्टाग्राम लाइव सेशन के बाद शुरू हुआ। लाइव बातचीत के दौरान एक फैन ने दिलजीत से दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन को लेकर राय मांगी थी। इस पर दिलजीत ने जवाब दिया था, “भाई, मुझे इन प्रदर्शन जैसी चीजों से दूर ही रखो। मैं एक कलाकार हूं, कोई नेता नहीं हूं।” दिलजीत ने साफ कर दिया था कि वे खुद को केवल मनोरंजन की दुनिया तक ही सीमित रखना चाहते हैं और उनका किसी भी राजनीतिक दल या आंदोलन से कोई सीधा संबंध नहीं है। नीट पेपर लीक पर प्रदर्शन कर रही है CJP ककरोच जनता पार्टी पिछले कुछ समय से दिल्ली के जंतर मंतर पर लगातार आंदोलन कर रही है। यह संगठन नीट (NEET) परीक्षा में हुई गड़बड़ियों और पेपर लीक विवाद को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा है। इस डिजिटल सटायर ग्रुप की शुरुआत अभिजीत दिपके ने की थी, जो अब युवाओं से जुड़े मुद्दों पर जमीन पर उतरकर प्रदर्शन कर रहा है। इस आंदोलन को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी समर्थन मिला है, जिसके कारण यह मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है। किसान आंदोलन में एक्टिव थे, अब बनाई दूरी सोशल मीडिया पर दिलजीत दोसांझ के इस बदले रुख को लेकर काफी चर्चा हो रही है। साल 2020-21 में हुए किसान आंदोलन के दौरान दिलजीत ने खुलकर किसानों का समर्थन किया था। वे खुद दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे धरने में शामिल होने पहुंचे थे और उन्होंने प्रदर्शनकारियों के लिए बड़ी आर्थिक मदद भी की थी। हालांकि, उसके बाद से दिलजीत ने राजनीतिक और सामाजिक विवादों से पूरी तरह दूरी बना ली है। इसी साल मई में उन्होंने राजनीति में आने की खबरों को भी पूरी तरह खारिज कर दिया था।
मूवी रिव्यू – 'अल्फा':दमदार एक्शन, फीका इमोशन… आलिया की फिल्म में बॉबी देओल का नेगेटिव अवतार छाया, ऋतिक रोशन का कैमियो देता है सरप्राइज

यशराज स्पाई यूनिवर्स की पहली फीमेल लीड फिल्म अल्फा बड़े स्केल, हाई ऑक्टेन एक्शन और एक नए कॉन्सेप्ट के साथ सिनेमाघरों में आई है। ट्रेलर से उम्मीद थी कि यह स्पाई यूनिवर्स को नया मुकाम देगी, लेकिन फिल्म उस उम्मीद पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। निर्देशक शिव रवैल ने इसे इंटरनेशनल स्पाई थ्रिलर का लुक देने में मेहनत की है। विजुअल्स, एक्शन और प्रोडक्शन वैल्यू प्रभावित करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और कम भावनात्मक जुड़ाव फिल्म को बार बार पीछे खींचते हैं। कहानी करीब 140 मिनट लंबी फिल्म की शुरुआत 27 जुलाई 1999 से होती है। इंडियन आर्मी के विक्रांत कौल (अनिल कपूर) और फतेह सिंह लाखावत (बॉबी देओल) देश की सबसे खतरनाक सीक्रेट फोर्स बनाने का सपना देखते हैं। इसी सोच से टीम अल्फा की शुरुआत होती है, जिसके सैनिकों को अल्फा सीरम दिया जाता है। यह सीरम इंसान की ताकत, रिफ्लेक्स और रिकवरी को कई गुना बढ़ा देता है। इसी दौरान विक्रांत अपनी गर्भवती पत्नी जानकी (दिया मिर्जा) की जान बचाने के लिए उसे भी अल्फा सीरम दे देता है। यह फैसला उसकी पूरी जिंदगी बदल देता है। फतेह का मानना होता है कि इस सीरम पर सिर्फ सेना का हक था। वह विक्रांत की नवजात बेटी को उससे अलग कर देता है और उसे यकीन दिला देता है कि उसकी बेटी मर चुकी है। सालों बाद वही बेटी सीता (आलिया भट्ट) फतेह की निगरानी में एक खतरनाक हथियार बन चुकी होती है। बचपन से उसे मिशन दिए जाते हैं और वह देश के दुश्मनों को खत्म करती रहती है। लेकिन एक दिन उसे पता चलता है कि जिस इंसान को वह अपना गुरु मानती रही, वही सबसे बड़ा गुनहगार है। दूसरी तरफ स्पेन में पली विक्रांत की दूसरी बेटी दुर्गा (शरवरी) की एंट्री होती है। दोनों बहनों का आमना सामना होता है और कहानी ऑपरेशन ओडिसी के रहस्य तक पहुंचती है। आखिर फतेह का असली मिशन क्या है, ऑपरेशन ओडिसी के पीछे उसका मकसद क्या है और क्या सीता उसे रोक पाएगी, फिल्म का क्लाइमैक्स इन्हीं सवालों के जवाब देता है। एक्टिंग सीता के किरदार में आलिया भट्ट ने पूरी मेहनत की है। उन्होंने एक्शन सीक्वेंस में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है और कई दृश्यों में प्रभाव भी छोड़ती हैं। हालांकि भावनात्मक दृश्यों में उनका किरदार दर्शकों से उतना जुड़ नहीं पाता, जितनी जरूरत थी। शरवरी को स्क्रीन स्पेस कम मिला है, लेकिन जितना मौका मिला उसमें उन्होंने अच्छा काम किया है और अपने किरदार के साथ न्याय किया है। फिल्म के सबसे बड़े सरप्राइज पैकेज हैं बॉबी देओल। फतेह सिंह लाखावत के रोल में उनका जुनून, खामोशी और खतरनाक स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती है। अनिल कपूर भी अपने किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं। वहीं फिल्म के आखिर में ऋतिक रोशन का कैमियो स्पाई यूनिवर्स के फैंस के लिए एक अच्छा सरप्राइज बनकर आता है और आगे की फिल्मों के लिए उत्सुकता भी बढ़ा देता है। डायरेक्शन और तकनीकी पक्ष निर्देशक शिव रवैल ने फिल्म को हॉलीवुड स्टाइल स्पाई थ्रिलर जैसा ट्रीटमेंट देने की कोशिश की है। सिनेमैटोग्राफी शानदार है। सेपिया टोन, बड़े सेट्स और खूबसूरत लोकेशंस फिल्म को शानदार विजुअल अपील देते हैं। खासकर आलिया और शरवरी के बीच पहला फाइट सीक्वेंस फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा है। हालांकि कहानी के स्तर पर फिल्म कई जगह कमजोर पड़ जाती है। स्क्रीनप्ले ढीला है और कई घटनाएं बिना ठोस आधार के आगे बढ़ती हैं। कुछ ट्विस्ट जरूर हैं, लेकिन उनमें वह रोमांच नहीं है जो दर्शकों को पूरी फिल्म बांधकर रख सके। भावनात्मक दृश्यों में भी फिल्म असर छोड़ने में नाकाम रहती है। कई जगह स्पाई एजेंट्स को इतना सुपरह्यूमन बना दिया गया है कि कहानी वास्तविकता से दूर जाती महसूस होती है। इतना अच्छा कॉन्सेप्ट होने के बावजूद लेखन उसे पूरी तरह भुना नहीं पाता। म्यूजिक फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कहानी के टोन के मुताबिक ठीक बैठता है और एक्शन को सपोर्ट करता है। लेकिन गानों में ऐसा कोई ट्रैक नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रह जाए। फाइनल वर्डिक्ट अल्फा विजुअली शानदार है, एक्शन दमदार है और बॉबी देओल अपने किरदार से सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। आलिया भट्ट ने भी पूरी ईमानदारी से फिल्म को संभालने की कोशिश की है। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, कम भावनात्मक जुड़ाव और औसत थ्रिल इसकी सबसे बड़ी कमजोरियां बन जाती हैं। फिल्म एक नए स्पाई चैप्टर की मजबूत शुरुआत बन सकती थी, लेकिन यह मौका पूरी तरह भुना नहीं जा सका। अगर आप बड़े पर्दे पर स्टाइलिश एक्शन और यशराज स्पाई यूनिवर्स के फैन हैं तो फिल्म एक बार देख सकते हैं, लेकिन कहानी के स्तर पर यह आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी।
मूवी रिव्यू – 'अल्फा':धुरंधर की छाप लिए आगे बढ़ती है आलिया की फिल्म, लेकिन मंजिल तक पहुंचने से पहले रफ्तार खो देती है

यशराज स्पाई यूनिवर्स की पहली फीमेल लीड फिल्म अल्फा बड़े स्केल, हाई ऑक्टेन एक्शन और एक नए कॉन्सेप्ट के साथ सिनेमाघरों में आई है। ट्रेलर से उम्मीद थी कि यह स्पाई यूनिवर्स को नया मुकाम देगी, लेकिन फिल्म उस उम्मीद पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। डायरेक्टर शिव रवैल ने इसे इंटरनेशनल स्पाई थ्रिलर का लुक देने में मेहनत की है। विजुअल्स, एक्शन और प्रोडक्शन वैल्यू प्रभावित करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और कम भावनात्मक जुड़ाव फिल्म को बार बार पीछे खींचते हैं। फिल्म की कहानी करीब 140 मिनट लंबी फिल्म की शुरुआत 27 जुलाई 1999 से होती है। इंडियन आर्मी के विक्रांत कौल (अनिल कपूर) और फतेह सिंह लाखावत (बॉबी देओल) देश की सबसे खतरनाक सीक्रेट फोर्स बनाने का सपना देखते हैं। इसी सोच से टीम अल्फा की शुरुआत होती है, जिसके सैनिकों को अल्फा सीरम दिया जाता है। यह सीरम इंसान की ताकत, रिफ्लेक्स और रिकवरी को कई गुना बढ़ा देता है। इसी दौरान विक्रांत अपनी गर्भवती पत्नी जानकी (दिया मिर्जा) की जान बचाने के लिए उसे भी अल्फा सीरम दे देता है। यह फैसला उसकी पूरी जिंदगी बदल देता है। फतेह का मानना होता है कि इस सीरम पर सिर्फ सेना का हक था। वह विक्रांत की नवजात बेटी को उससे अलग कर देता है और उसे यकीन दिला देता है कि उसकी बेटी मर चुकी है। सालों बाद वही बेटी सीता (आलिया भट्ट) फतेह की निगरानी में एक खतरनाक हथियार बन चुकी होती है। बचपन से उसे मिशन दिए जाते हैं और वह देश के दुश्मनों को खत्म करती रहती है। लेकिन एक दिन उसे पता चलता है कि जिस इंसान को वह अपना गुरु मानती रही, वही सबसे बड़ा गुनहगार है। दूसरी तरफ स्पेन में पली विक्रांत की दूसरी बेटी दुर्गा (शरवरी) की एंट्री होती है। दोनों बहनों का आमना सामना होता है और कहानी ऑपरेशन ओडिसी के रहस्य तक पहुंचती है। आखिर फतेह का असली मिशन क्या है, ऑपरेशन ओडिसी के पीछे उसका मकसद क्या है और क्या सीता उसे रोक पाएगी, फिल्म का क्लाइमैक्स इन्हीं सवालों के जवाब देता है। फिल्म में एक्टिंग सीता के किरदार में आलिया भट्ट ने पूरी मेहनत की है। उन्होंने एक्शन सीक्वेंस में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है और कई दृश्यों में प्रभाव भी छोड़ती हैं। हालांकि भावनात्मक दृश्यों में उनका किरदार दर्शकों से उतना जुड़ नहीं पाता, जितनी जरूरत थी। शरवरी को स्क्रीन स्पेस कम मिला है, लेकिन जितना मौका मिला उसमें उन्होंने अच्छा काम किया है और अपने किरदार के साथ न्याय किया है। फिल्म के सबसे बड़े सरप्राइज पैकेज हैं बॉबी देओल। फतेह सिंह लाखावत के रोल में उनका जुनून, खामोशी और खतरनाक स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती है। अनिल कपूर भी अपने किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं। वहीं फिल्म के आखिर में ऋतिक रोशन का कैमियो स्पाई यूनिवर्स के फैंस के लिए एक अच्छा सरप्राइज बनकर आता है और आगे की फिल्मों के लिए उत्सुकता भी बढ़ा देता है। फिल्म में डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष निर्देशक शिव रवैल ने फिल्म को हॉलीवुड स्टाइल स्पाई थ्रिलर जैसा ट्रीटमेंट देने की कोशिश की है। सिनेमैटोग्राफी शानदार है। सेपिया टोन, बड़े सेट्स और खूबसूरत लोकेशंस फिल्म को शानदार विजुअल अपील देते हैं। खासकर आलिया और शरवरी के बीच पहला फाइट सीक्वेंस फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा है। हालांकि कहानी के स्तर पर फिल्म कई जगह कमजोर पड़ जाती है। स्क्रीनप्ले ढीला है और कई घटनाएं बिना ठोस आधार के आगे बढ़ती हैं। कुछ ट्विस्ट जरूर हैं, लेकिन उनमें वह रोमांच नहीं है जो दर्शकों को पूरी फिल्म बांधकर रख सके। भावनात्मक दृश्यों में भी फिल्म असर छोड़ने में नाकाम रहती है। कई जगह स्पाई एजेंट्स को इतना सुपरह्यूमन बना दिया गया है कि कहानी वास्तविकता से दूर जाती महसूस होती है। इतना अच्छा कॉन्सेप्ट होने के बावजूद लेखन उसे पूरी तरह भुना नहीं पाता। फिल्म का पहला हिस्सा औसत रफ्तार से आगे बढ़ता है। असली खेल इंटरवल के बाद शुरू होता है, जब बॉबी देओल के ग्रे शेड वाले किरदार का एक बड़ा सच सामने आता है। यही ट्विस्ट कहानी में नई जान डालता है और कुछ देर के लिए फिल्म धुरंधर जैसी स्पाई थ्रिलर वाली फील देने लगती है। हालांकि, इसके बाद भी कमजोर स्क्रीनप्ले फिल्म को पूरी तरह उड़ान नहीं भरने देता। इंटरवल के बाद आने वाले ट्विस्ट और बॉबी देओल के ग्रे शेड वाले किरदार की परतें फिल्म को बेहतर बनाती हैं, लेकिन कमजोर लेखन इसकी रफ्तार को आखिर तक बरकरार नहीं रख पाता। फिल्म में म्यूजिक फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कहानी के टोन के मुताबिक ठीक बैठता है और एक्शन को सपोर्ट करता है। लेकिन गानों में ऐसा कोई ट्रैक नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रह जाए। फिल्म को फाइनल वर्डिक्ट अल्फा विजुअली शानदार है, एक्शन दमदार है और बॉबी देओल अपने किरदार से सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। आलिया भट्ट ने भी पूरी ईमानदारी से फिल्म को संभालने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, कम भावनात्मक जुड़ाव और औसत थ्रिल इसकी सबसे बड़ी कमजोरियां बन जाती हैं। फिल्म एक नए स्पाई चैप्टर की मजबूत शुरुआत बन सकती थी, लेकिन यह मौका पूरी तरह भुना नहीं जा सका। अगर आप बड़े पर्दे पर स्टाइलिश एक्शन और यशराज स्पाई यूनिवर्स के फैन हैं तो फिल्म एक बार देख सकते हैं, लेकिन कहानी के स्तर पर यह आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी।
स्पोर्ट्स अपडेट:दूसरे टेस्ट से पहले श्रीलंका की मुश्किलें बढ़ीं, सिर्फ 13 फिट खिलाड़ी बचे

वेस्टइंडीज के खिलाफ दूसरे टेस्ट से पहले श्रीलंका की टीम चोट और बीमारी से बुरी तरह जूझ रही है। पहले टेस्ट में पारी से हारने के बाद अब सीरीज बचाने के लिए उसे दूसरा मैच हर हाल में जीतना होगा, लेकिन 17 सदस्यीय स्क्वॉड में सिर्फ 13 खिलाड़ी ही फिट हैं। पाथुम निसंका कलाई की चोट के कारण यूके रवाना हो गए हैं, जहां उनकी सर्जरी होगी। वे सीरीज से बाहर हो गए हैं। उनकी जगह लाहिरू उदारा ओपनिंग करेंगे। तेज गेंदबाज लाहिरू कुमारा (हैमस्ट्रिंग) और विस्वा फर्नांडो (पीठ/साइड स्ट्रेन) भी दूसरे टेस्ट से बाहर हैं। ऐसे में तेज गेंदबाज इसिथा विजेसुंदरा को टेस्ट डेब्यू का मौका मिलेगा। ऑफ स्पिन ऑलराउंडर रमेश मेंडिस बैक्टीरियल इन्फेक्शन के कारण उपलब्ध नहीं हैं। उनकी जगह स्पिनर प्रभात जयसूर्या की प्लेइंग इलेवन में वापसी होगी। जर्मनी के कोच नगेल्समैन देंगे इस्तीफा, क्लॉप बन सकते हैं नए हेड कोच फीफा वर्ल्ड कप 2026 में खराब प्रदर्शन के बाद जर्मनी के हेड कोच जूलियन नगेल्समैन पद छोड़ने की तैयारी में हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राउंड ऑफ 32 में पराग्वे से हारकर बाहर होने के बाद जर्मन फुटबॉल फेडरेशन (DFB) और नगेल्समैन के बीच इस्तीफे पर सहमति बन गई है। हालांकि, आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है। नगेल्समैन का कॉन्ट्रैक्ट यूरो 2028 तक था, लेकिन वर्ल्ड कप में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद उन पर दबाव बढ़ गया। जर्मनी को ग्रुप स्टेज के आखिरी मैच में इक्वाडोर और फिर नॉकआउट में पराग्वे से हार मिली। 2014 में वर्ल्ड कप जीतने के बाद से जर्मनी 2018 और 2022 में ग्रुप स्टेज से बाहर हुआ, जबकि 2026 में राउंड ऑफ 32 से आगे नहीं बढ़ सका। नगेल्समैन के जाने पर जुर्गन क्लॉप सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे हैं। पूर्व लिवरपूल मैनेजर फिलहाल रेड बुल के ग्लोबल हेड ऑफ फुटबॉल हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, उनके कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा रिलीज क्लॉज है, जिसके तहत जर्मनी की राष्ट्रीय टीम का प्रस्ताव मिलने पर वे यह जिम्मेदारी संभाल सकते हैं।
ओटीटी रिव्यू: प्रीतम एंड पेड्रो:दमदार स्टारकास्ट, दिलचस्प कॉन्सेप्ट… लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले फीका कर गया राजकुमार हिरानी का OTT डेब्यू

जब किसी प्रोजेक्ट से राजकुमार हिरानी का नाम जुड़ता है तो उम्मीदें बढ़ना स्वाभाविक है। अरशद वारसी, विक्रांत मैसी, बोमन ईरानी और मोना सिंह जैसे कलाकार हों तो बेहतरीन क्राइम-कॉमेडी की आस और मजबूत हो जाती है। जियोहॉटस्टार पर रिलीज हुई ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ साइबर क्राइम जैसे समकालीन विषय को कॉमेडी, थ्रिल और इमोशन के साथ पेश करने की कोशिश करती है। कॉन्सेप्ट दिलचस्प और स्टारकास्ट दमदार है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी रफ्तार के कारण सीरीज अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती। 6 एपिसोड की इस सीरीज को दैनिक भास्कर ने 5 में से 2.5 स्टार दिए हैं। सीरीज की कहानी कैसी है? ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ की कहानी गोवा में सेट है। पेड्रो गोंसाल्वेस (अरशद वारसी) पुराने ख्यालों वाला अनुभवी पुलिस अफसर है, जो अपराधियों को पकड़ने में माहिर है, लेकिन तकनीक और साइबर दुनिया से उसकी ज्यादा दोस्ती नहीं है। एक घटना के बाद उसका तबादला साइबर सेल में होता है, जहां उसकी मुलाकात युवा और टेक-सेवी अधिकारी प्रीतम पार्कर (वीर हिरानी) से होती है। दोनों की कार्यशैली बिल्कुल अलग है। पेड्रो अनुभव और जमीनी जांच पर भरोसा करता है, जबकि प्रीतम डेटा, हैकिंग और डिजिटल तकनीक के जरिए अपराध सुलझाता है। इसी बीच उन्हें मंत्री के बेटे के अपहरण और एक हाई-प्रोफाइल साइबर क्राइम की गुत्थी सुलझाने की जिम्मेदारी मिलती है। जांच के साथ ऑनलाइन फ्रॉड, हैकिंग और डिजिटल स्कैम की परतें खुलती हैं, वहीं दोनों किरदारों की निजी जिंदगी और भावनात्मक संघर्ष को भी कहानी में जोड़ा गया है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? अरशद वारसी पूरी सीरीज की सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका सहज अभिनय, शानदार कॉमिक टाइमिंग और स्क्रीन प्रेजेंस कई कमजोर दृश्यों को भी संभाल लेती है। राजकुमार हिरानी के बेटे वीर हिरानी इस सीरीज से बतौर लीड एक्टर डेब्यू कर रहे हैं। उन्होंने ईमानदारी से किरदार निभाया है। कई दृश्यों में उनका आत्मविश्वास दिखता है, लेकिन भावनात्मक हिस्सों में अनुभव की कमी महसूस होती है। शुरुआत के लिहाज से उनका प्रदर्शन संतोषजनक है। विक्रांत मैसी सीमित स्क्रीन टाइम में भी प्रभाव छोड़ते हैं। मोना सिंह, बोमन ईरानी, सत्यदीप मिश्रा और श्रुति मराठे अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा अवसर नहीं देती। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष कैसा है? निर्देशक अविनाश अरुण ने इससे पहले ‘थ्री ऑफ अस’ और ‘पाताल लोक’ जैसी बेहतरीन कृतियां दी हैं। ऐसे में उनसे उम्मीदें ज्यादा थीं, लेकिन इस बार वह कहानी की पकड़ बनाए रखने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। निर्देशन में राजकुमार हिरानी की फिल्मों वाला हल्का-फुल्का ह्यूमर और मानवीय स्पर्श जरूर नजर आता है। हालांकि सबसे बड़ी कमजोरी इसकी राइटिंग और स्क्रीनप्ले है। राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी, सुयश त्रिवेदी और अमित दुबे की लिखी कहानी का विषय प्रासंगिक है, लेकिन कई एपिसोड अनावश्यक रूप से लंबे लगते हैं। थ्रिल लगातार नहीं बनता और इमोशनल सीन भी अपेक्षित असर नहीं छोड़ते। अंत तक सीरीज मनोरंजक तो रहती है, लेकिन यादगार नहीं बनती। तकनीकी रूप से सीरीज मजबूत है। गोवा की लोकेशंस, सिनेमैटोग्राफी, कैमरा वर्क और प्रोडक्शन वैल्यू प्रभावित करते हैं। साइबर क्राइम से जुड़े विजुअल्स भी विश्वसनीय लगते हैं, लेकिन मजबूत तकनीकी पक्ष कमजोर लेखन की भरपाई नहीं कर पाता। म्यूजिक कैसा है? राजकुमार हिरानी के प्रोजेक्ट्स में संगीत हमेशा एक अहम भूमिका निभाता रहा है। ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ में भी कुछ गाने शामिल किए गए हैं। शांतनु मोइत्रा का संगीत और स्वानंद किरकिरे के गीत कहानी के साथ मेल खाते हैं। श्रेया घोषाल की आवाज में रेट्रो अंदाज वाला गीत सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन कोई भी गाना लंबे समय तक याद नहीं रहता। बैकग्राउंड स्कोर कई जगह सस्पेंस पैदा करता है, लेकिन कहानी की धीमी रफ्तार और कमजोर थ्रिल के कारण उसका असर सीमित रह जाता है। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? अगर आप अरशद वारसी के फैन हैं या साइबर क्राइम पर हल्के-फुल्के अंदाज की सीरीज देखना चाहते हैं, तो ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप राजकुमार हिरानी के नाम से उनकी फिल्मों जैसा दमदार लेखन, गहरे इमोशन और यादगार मनोरंजन की उम्मीद करेंगे, तो यह सीरीज निराश कर सकती है।
Travel insurance prices rise 10% annually, with young people leading the way

Hindi News Business Travel Insurance Prices Rise 10% Annually, With Young People Leading The Way नई दिल्ली16 मिनट पहले कॉपी लिंक टाटा एआईजी के वाइस प्रेसिडेंट के मुताबिक, छुट्टियों के व्यस्त सीजन में परिवारों, बुजुर्गों और पहली बार विदेश जाने वालों में ट्रेवल इंश्योरेंस लेने का चलन बढ़ा है। भारतीय यात्री विदेश में सुरक्षा पर सबसे अधिक ध्यान दे रहे हैं।- प्रतीकात्मक फोटो पर्यटन के लिए विदेश जाने वाले भारतीयों की पसंद बदल रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में 40% से अधिक भारतीयों ने छुट्टियों के लिए दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, मिस्र, जापान और मालदीव जैसे नए देश चुने। टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी के आंकड़ों के मुताबिक यात्रियों की उम्र, पसंदीदा जगहों और बीमा खरीद में बड़ा बदलाव आया है। हालांकि ब्रिटेन जैसे देश अब भी सबसे ज्यादा पसंदीदा हैं। लेकिन इन नई जगहों पर जाने वालों की रफ्तार सबसे तेज है। बीमा कराने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय यात्रियों में अकेले दक्षिण-पूर्व एशिया की हिस्सेदारी 26% रही। इस क्षेत्र में साल-दर-साल 10% से ज्यादा बढ़ोतरी हुई। अब यात्रा करने वालों में हर उम्र के लोग शामिल हैं। दुनिया भर की इन नई जगहों पर जाने का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी 50 वर्ष से कम उम्र के कामकाजी युवाओं की है, जो पारंपरिक तरीके छोड़ सीधे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से बीमा और बुकिंग करा रहे हैं। इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन ट्रेवल इंश्योरेंस खरीदने के चलन में हर साल औसतन 10% की बढ़त दर्ज की गई है। पिछले दो साल से भारतीयों की विदेश यात्रा के दिनों में कोई खास बदलाव नहीं आया है। भारतीय छुट्टियों के दौरान विदेशों में औसतन 24 दिन बिता रहे हैं। इसमें यूरोप और अमेरिका जैसी जगहों के लिए यह सफर सबसे लंबा यानी करीब 32 दिनों का रहा, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया की ट्रिप के लिए लोग औसतन 11 दिन दे रहे हैं। टाटा एआईजी के वाइस प्रेसिडेंट चंद्रकांत सैद के मुताबिक, छुट्टियों के व्यस्त सीजन में परिवारों, बुजुर्गों और पहली बार विदेश जाने वालों में ट्रेवल इंश्योरेंस लेने का चलन बढ़ा है। भारतीय यात्री विदेश में सुरक्षा पर सबसे अधिक ध्यान दे रहे हैं। विदेश जाने वालों में 55 साल से अधिक के बुजुर्गों की हिस्सेदारी 22% हो गई है। यह विदेश में सफर के लिए सीनियर सिटीजंस के बढ़ते भरोसे को दिखाता है। हालांकि, यात्राओं में अब भी सबसे बड़ी संख्या कामकाजी लोगों की ही है। कुल यात्रियों में 21-55 साल के बीच के लोगों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा 66% है। सीजन – मई-जून में सबसे ज्यादा विदेश यात्रा का चलन गर्मियों की छुट्टियों के कारण मई और जून विदेश यात्रा के लिए सबसे व्यस्त महीने रहे। इस दौरान विदेश जाने के लिए हवाई यात्रा ही लोगों की पहली पसंद बनी रही। बीमा कराकर बाहर जाने वाले करीब 98% यात्रियों ने फ्लाइट से सफर तय किया। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
बारिश की जगह अब गर्मी से रोके जा रहे खेल:ब्रिटेन की भीषण गर्मी विम्बलडन और महिला टी20 वर्ल्ड कप पर डाल रही असर

एक समय था जब इंग्लैंड के मैदानों पर मैच शुरू होने से पहले सबसे ज्यादा नजरें आसमान पर होती थीं। बादल घिरते ही खिलाड़ियों से लेकर दर्शकों तक की चिंता बढ़ जाती थी कि कहीं बारिश खेल न रोक दे। लेकिन अब आसमान साफ है, सूरज तेज है और खेल फिर भी मुश्किल में है। खिलाड़ी पसीने से भीगते हुए मैदान पर दौड़ रहे हैं, दर्शक छाते और पंखों के सहारे स्टैंड में टिके हैं, बच्चे मैच छोड़कर ‘कूल रूम’ में राहत तलाश रहे हैं और आयोजक हर कुछ कदम पर पानी और छांव का इंतजाम कर रहे हैं। वजह बारिश नहीं, बल्कि लगातार बढ़ती गर्मी है। जलवायु परिवर्तन ने खेलों की दुनिया में भी नया दौर शुरू कर दिया है। मैदानों पर अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं रह गया कि बारिश कब होगी, बल्कि यह है कि गर्मी कितनी बढ़ेगी। कभी स्कोरबोर्ड पर ‘रेन स्टॉप्ड प्ले’ लिखा जाता था। अब कई जगह ‘हीट स्टॉप्ड प्ले’ जैसी स्थिति बन रही है। ब्रिटेन में इस हफ्ते रिकॉर्ड गर्मी के बीच टेनिस, क्रिकेट और फुटबॉल के मुकाबले हुए। ईस्टबोर्न टेनिस और विम्बलडन क्वालिफायर में खिलाड़ी हर बदलाव के दौरान पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स लेते रहे। दर्शक तौलिया गर्दन पर रखकर, छाते खोलकर और पंखे झलते हुए मुकाबले देखते रहे। पिछले साल विम्बलडन में एक दर्शक गर्मी से बेहोश हो गया था। उस समय कार्लोस अल्कारेज ने मैच रोककर उसे पानी पहुंचाया था। उसी घटना के बाद इस बार आयोजकों ने अतिरिक्त वाटर स्टेशन, छायादार ‘गेस्ट विलेज’ और आराम के लिए विशेष जगह बनाई है। ब्रिस्टल में महिला टी20 वर्ल्ड कप के दौरान भी तस्वीर अलग नहीं थी। बच्चों के लिए ‘कूल रूम’ बनाया गया, स्प्रिंकलर लगाए गए और मेडिकल टीम पूरे दिन तैनात रही। गर्मी के कारण कई स्कूल बंद कर दिए गए, जिससे करीब दो हजार बच्चे मैच देखने नहीं पहुंच सके। फिर भी हजारों दर्शक मैदान में डटे रहे। गर्मी अब केवल खिलाड़ियों और दर्शकों की परीक्षा नहीं ले रही, बल्कि खेल की टेक्नोलॉजी भी इसकी चपेट में आ रही है। विम्बलडन क्वालिफायर में ब्रिटिश खिलाड़ी डैन इवांस का मुकाबला एक घंटे से ज्यादा समय के लिए रोकना पड़ा, क्योंकि अत्यधिक गर्मी के कारण इलेक्ट्रॉनिक लाइन कॉलिंग सिस्टम की बिजली बाधित हो गई। ब्रिटेन के मौसम विभाग ने इस हफ्ते दुर्लभ ‘रेड एक्सट्रीम हीट वार्निंग’ जारी की। खेल संगठनों ने भी मान लिया है कि यह कुछ दिनों की समस्या नहीं है। इसलिए अब हर बड़े आयोजन में अतिरिक्त पानी, कूलिंग जोन, छायादार क्षेत्र और मेडिकल सहायता को स्थायी व्यवस्था बनाया जा रहा है। विम्बलडन के संचालन से जुड़े अधिकारी भी साफ कह चुके हैं कि अत्यधिक गर्मी से निपटना अब ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुका है।
ई-रिक्शा को बीच सड़क रोकने वाला मोबाइल एप बैन:चीनी कंपनी के एप का गलत इस्तेमाल हो रहा था, ब्लूटूथ के जरिए कनेक्ट होता था

दिल्ली में ई-रिक्शा चालकों को इन दिनों एक अजीब समस्या का सामना करना पड़ रहा है। सड़क पर चलते-चलते अचानक ई-रिक्शा बंद हो जाते हैं और दोबारा स्टार्ट नहीं होते। जांच में सामने आया है कि कोई मैकेनिकल खराबी या बैटरी डिस्चार्ज होना इसकी वजह नहीं है, बल्कि ‘BAT-BMS’ नाम का एक स्मार्टफोन एप है। शरारती तत्व और सोशल मीडिया पर वायरल कंटेंट बनाने वाले लोग इस एप की मदद से दूर बैठे ही ई-रिक्शा को बंद कर रहे हैं। हालांकि आज यानी 3 जुलाई को सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा कि ‘BAT-BMS’ समेत दो मोबाइल एप्लिकेशन्स को एप स्टोर्स से हटवा दिया है। CII साइबर सुरक्षा शिखर सम्मेलन के दौरान मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने इस कार्रवाई की पुष्टि की है। सवाल 1: सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा BAT-BMS एप असल में क्या है? जवाब: ‘BAT-BMS’ रियल टाइम बैटरी मैनेजमेंट टूल है। इसे चीनी कंपनी ‘शेन्ज़ेन ग्रेनर्जी टेक्नोलॉजी’ ने डेवलप किया है। इस एप का मुख्य काम ब्लूटूथ-इनेबल्ड लिथियम बैटरी की निगरानी करना है। यह एप बैटरी के चार्ज लेवल, वोल्टेज, टेम्परेचर और सेल हेल्थ जैसी जरूरी जानकारियां डिस्प्ले करता है। इसे आप अपनी बैटरी का एक तरह का डिजिटल डैशबोर्ड मान सकते हैं। सवाल 2: यह एप कैसे काम करता है और लोग इससे चलते हुए ई-रिक्शा कैसे रोक पा रहे हैं? जवाब: यह कोई बहुत हाई-टेक हैकिंग नहीं है, बल्कि सुरक्षा की एक साधारण चूक का फायदा उठाना है। इस एप में एक ‘रिमोट कट-ऑफ’ फीचर होता है, जिसकी मदद से बैटरी के डिस्चार्ज (पावर सप्लाई) को चालू या बंद किया जा सकता है। जब कोई व्यक्ति ई-रिक्शा के 10 से 15 मीटर के दायरे (ब्लूटूथ की रेंज) में आकर इस एप के जरिए वाहन की बैटरी से कनेक्ट होता है, तो वह डिस्चार्ज फंक्शन को बंद कर देता है। इससे मोटर को मिलने वाली पावर तुरंत कट जाती है और ई-रिक्शा रुक जाता है। सवाल 3: क्या देश के सभी ई-रिक्शा या इलेक्ट्रिक वाहन इस एप के जरिए रोके जा सकते हैं? जवाब: नहीं। सोशल मीडिया पर फैल रहे डर के विपरीत सभी ई-रिक्शा इसके जोखिम में नहीं हैं। यह एप केवल उन्हीं वाहनों पर असर डाल सकता है जो कुछ खास शर्तों को पूरा करते हैं। सवाल 3: कौन से ई-रिक्शा इस एप के प्रभाव से पूरी तरह सुरक्षित हैं? जवाब: भारत में अभी भी बड़ी संख्या में ई-रिक्शा पुरानी लेड-एसिड बैटरियों पर चलते हैं। इन बैटरियों में कोई ब्लूटूथ या डिजिटल मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होता, इसलिए ये इस एप से पूरी तरह सुरक्षित हैं। इसके अलावा, जिन लिथियम बैटरियों के ब्लूटूथ सिस्टम में मैन्युफैक्चरर या डीलर द्वारा मजबूत पासवर्ड सेट किया गया है, उन्हें भी इस एप के जरिए एक्सेस नहीं किया जा सकता। सवाल 4: चीनी कंपनी ने इस एप को किस उद्देश्य से बनाया था? क्या ये ई-रिक्शा के लिए था? जवाब: नहीं, कंपनी ने इस एप को ई-रिक्शा को कंट्रोल करने के लिए नहीं बनाया था। इसका मुख्य उद्देश्य सौर ऊर्जा उपकरणों और नावों या जहाजों की बैटरी में लगी लिथियम बैटरियों की सेहत पर नजर रखना था। इस एप का डिस्चार्ज ऑन/ऑफ फीचर सुरक्षा और रखरखाव के लिहाज से दिया गया था, ताकि जरूरत पड़ने पर बैटरी ओनर पावर कट कर सके। लेकिन भारत में इसका इस्तेमाल ई-रिक्शा की बैटरियों को रिमोटली बंद करने के लिए किया जाने लगा। सवाल 5: इससे ई-रिक्शा चालकों और सड़क सुरक्षा पर क्या असर पड़ रहा है? जवाब: वायरल वीडियो में लोग इसे खराब ड्राइविंग का ‘बदला’ लेने या केवल मनोरंजन के लिए ई-रिक्शा बंद करते दिख रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह चालकों के लिए मुसीबत बन गया है। ट्रैफिक के बीच अचानक ई-रिक्शा के बंद होने से पीछे से आ रहे वाहनों से टक्कर होने का खतरा रहता है। इसके अलावा, ई-रिक्शा चालकों का समय बर्बाद होता है और उनकी कमाई पर असर पड़ता है। सवाल 6: सुरक्षा की इस बड़ी चूक के लिए असल में जिम्मेदार कौन है? जवाब: इसके लिए मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर बैटरी असेंबल करने वाले, डीलर्स और कुछ लो-कॉस्ट वाले लिथियम बैटरी मेकर्स जिम्मेदार हैं। भारत में सस्ते ई-रिक्शा पार्ट्स के बाजार में कई ऐसी लिथियम बैटरियां बेची जा रही हैं, जिनके ब्लूटूथ बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम को बिना किसी पासवर्ड या डिफॉल्ट पासवर्ड के खुला छोड़ दिया जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी ने अपने घर का मुख्य दरवाजा खुला छोड़ दिया हो और कोई भी अंदर आ जाए। सवाल 7: इस सुरक्षा खामी को ठीक करने का क्या उपाय है? जवाब: इसका समाधान बहुत सीधा और आसान है। वाहनों के डीलर्स और निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे ग्राहकों को वाहन बेचने से पहले बैटरी के मैनेजमेंट सिस्टम में एक मजबूत और यूनिक पासवर्ड सेट करें। यदि पासवर्ड सेट रहेगा, तो ब्लूटूथ रेंज में होने के बावजूद कोई बाहरी व्यक्ति एप से कनेक्ट नहीं हो पाएगा। इसके अलावा, जिन ड्राइवरों के पास पहले से ऐसी बैटरियां हैं, वे डीलर के पास जाकर अपनी बैटरी के बीएमएस सेटिंग्स में पासवर्ड लॉक लगवा सकते हैं। सवाल 8: क्या इस मामले में प्रशासन या सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई की जा रही है? जवाब: हां, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने घोषणा की है कि ई-रिक्शा को रिमोटली (दूर से) बंद करने की चिंताओं के बाद दो संदिग्ध एप्लिकेशन्स को एप स्टोर्स से हटा दिया गया है। इनमें विवादों में रहा ‘BAT-BMS’ एप भी शामिल है। इससे पहले शिकायतें बढ़ने और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली परिवहन विभाग ने ‘BAT-BMS’ के साथ-साथ इसी तरह काम करने वाले एक अन्य एप्लीकेशन ‘इपोच ली-आयन’ (Epoch Li-ion) के खिलाफ जांच शुरू की थी। सवाल 9: परिवहन विभाग इस समस्या को रोकने के लिए आगे क्या कदम उठा सकता है? जवाब: दिल्ली के परिवहन मंत्री पंकज सिंह और विभाग के सीनियर अधिकारी इस तकनीकी खामी और सुरक्षा के खतरे की गंभीरता से समीक्षा कर रहे हैं। सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि कम्यूटर्स और ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए इन असुरक्षित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम एप्स पर किस तरह के प्रतिबंध या नियम लागू किए जा सकते हैं, ताकि अनधिकृत उपयोग को
ई-रिक्शा को बीच सड़क रोकने वाला चीनी एप बैन:गलत इस्तेमाल के बाद सरकार ने हटाने का निर्देश दिया, पर अभी प्लेस्टोर में मौजूद

दिल्ली में ई-रिक्शा चालकों को इन दिनों एक अजीब समस्या का सामना करना पड़ रहा है। सड़क पर चलते-चलते ई-रिक्शा अचानक बंद हो जाते हैं और दोबारा स्टार्ट नहीं होते। जांच में सामने आया है कि इसकी वजह कोई मैकेनिकल खराबी या बैटरी डिस्चार्ज होना नहीं, बल्कि ‘BAT-BMS’ नाम का चीनी स्मार्टफोन एप है। शरारती तत्व और सोशल मीडिया पर वायरल कंटेंट बनाने वाले लोग इस एप की मदद से दूर बैठे ही ई-रिक्शा को बंद कर रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा कि ‘BAT-BMS’ समेत दो मोबाइल एप्लिकेशन्स को एप स्टोर्स से हटाने का निर्देश दिए हैं। CII साइबर सुरक्षा शिखर सम्मेलन के दौरान मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने शुक्रवार को इस कार्रवाई की पुष्टि की है। सवाल 1: सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा BAT-BMS एप असल में क्या है? जवाब: ‘BAT-BMS’ रियल टाइम बैटरी मैनेजमेंट टूल है। इसे चीनी कंपनी ‘शेन्ज़ेन ग्रेनर्जी टेक्नोलॉजी’ ने डेवलप किया है। इस एप का मुख्य काम ब्लूटूथ-इनेबल्ड लिथियम बैटरी की निगरानी करना है। यह एप बैटरी के चार्ज लेवल, वोल्टेज, टेम्परेचर और सेल हेल्थ जैसी जरूरी जानकारियां डिस्प्ले करता है। इसे आप अपनी बैटरी का एक तरह का डिजिटल डैशबोर्ड मान सकते हैं। सवाल 2: यह एप कैसे काम करता है और लोग इससे चलते हुए ई-रिक्शा कैसे रोक पा रहे हैं? जवाब: यह कोई बहुत हाई-टेक हैकिंग नहीं है, बल्कि सुरक्षा की एक साधारण चूक का फायदा उठाना है। इस एप में एक ‘रिमोट कट-ऑफ’ फीचर होता है, जिसकी मदद से बैटरी के डिस्चार्ज (पावर सप्लाई) को चालू या बंद किया जा सकता है। जब कोई व्यक्ति ई-रिक्शा के 10 से 15 मीटर के दायरे (ब्लूटूथ की रेंज) में आकर इस एप के जरिए वाहन की बैटरी से कनेक्ट होता है, तो वह डिस्चार्ज फंक्शन को बंद कर देता है। इससे मोटर को मिलने वाली पावर तुरंत कट जाती है और ई-रिक्शा रुक जाता है। सवाल 3: क्या देश के सभी ई-रिक्शा या इलेक्ट्रिक वाहन इस एप के जरिए रोके जा सकते हैं? जवाब: नहीं। सोशल मीडिया पर फैल रहे डर के विपरीत सभी ई-रिक्शा इसके जोखिम में नहीं हैं। यह एप केवल उन्हीं वाहनों पर असर डाल सकता है जो कुछ खास शर्तों को पूरा करते हैं। सवाल 3: कौन से ई-रिक्शा इस एप के प्रभाव से पूरी तरह सुरक्षित हैं? जवाब: भारत में अभी भी बड़ी संख्या में ई-रिक्शा पुरानी लेड-एसिड बैटरियों पर चलते हैं। इन बैटरियों में कोई ब्लूटूथ या डिजिटल मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होता, इसलिए ये इस एप से पूरी तरह सुरक्षित हैं। इसके अलावा, जिन लिथियम बैटरियों के ब्लूटूथ सिस्टम में मैन्युफैक्चरर या डीलर द्वारा मजबूत पासवर्ड सेट किया गया है, उन्हें भी इस एप के जरिए एक्सेस नहीं किया जा सकता। सवाल 4: चीनी कंपनी ने इस एप को किस उद्देश्य से बनाया था? क्या ये ई-रिक्शा के लिए था? जवाब: नहीं, कंपनी ने इस एप को ई-रिक्शा को कंट्रोल करने के लिए नहीं बनाया था। इसका मुख्य उद्देश्य सौर ऊर्जा उपकरणों और नावों या जहाजों की बैटरी में लगी लिथियम बैटरियों की सेहत पर नजर रखना था। इस एप का डिस्चार्ज ऑन/ऑफ फीचर सुरक्षा और रखरखाव के लिहाज से दिया गया था, ताकि जरूरत पड़ने पर बैटरी ओनर पावर कट कर सके। लेकिन भारत में इसका इस्तेमाल ई-रिक्शा की बैटरियों को रिमोटली बंद करने के लिए किया जाने लगा। सवाल 5: इससे ई-रिक्शा चालकों और सड़क सुरक्षा पर क्या असर पड़ रहा है? जवाब: वायरल वीडियो में लोग इसे खराब ड्राइविंग का ‘बदला’ लेने या केवल मनोरंजन के लिए ई-रिक्शा बंद करते दिख रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह चालकों के लिए मुसीबत बन गया है। ट्रैफिक के बीच अचानक ई-रिक्शा के बंद होने से पीछे से आ रहे वाहनों से टक्कर होने का खतरा रहता है। इसके अलावा, ई-रिक्शा चालकों का समय बर्बाद होता है और उनकी कमाई पर असर पड़ता है। सवाल 6: सुरक्षा की इस बड़ी चूक के लिए असल में जिम्मेदार कौन है? जवाब: इसके लिए मुख्य रूप से स्थानीय स्तर पर बैटरी असेंबल करने वाले, डीलर्स और कुछ लो-कॉस्ट वाले लिथियम बैटरी मेकर्स जिम्मेदार हैं। भारत में सस्ते ई-रिक्शा पार्ट्स के बाजार में कई ऐसी लिथियम बैटरियां बेची जा रही हैं, जिनके ब्लूटूथ बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम को बिना किसी पासवर्ड या डिफॉल्ट पासवर्ड के खुला छोड़ दिया जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी ने अपने घर का मुख्य दरवाजा खुला छोड़ दिया हो और कोई भी अंदर आ जाए। सवाल 7: इस सुरक्षा खामी को ठीक करने का क्या उपाय है? जवाब: इसका समाधान बहुत सीधा और आसान है। वाहनों के डीलर्स और निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे ग्राहकों को वाहन बेचने से पहले बैटरी के मैनेजमेंट सिस्टम में एक मजबूत और यूनिक पासवर्ड सेट करें। यदि पासवर्ड सेट रहेगा, तो ब्लूटूथ रेंज में होने के बावजूद कोई बाहरी व्यक्ति एप से कनेक्ट नहीं हो पाएगा। इसके अलावा, जिन ड्राइवरों के पास पहले से ऐसी बैटरियां हैं, वे डीलर के पास जाकर अपनी बैटरी के बीएमएस सेटिंग्स में पासवर्ड लॉक लगवा सकते हैं। सवाल 8: क्या इस मामले में प्रशासन या सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई की जा रही है? जवाब: हां, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने घोषणा की है कि ई-रिक्शा को रिमोटली (दूर से) बंद करने की चिंताओं के बाद दो संदिग्ध एप्लिकेशन्स को एप स्टोर्स से हटा दिया गया है। इनमें विवादों में रहा ‘BAT-BMS’ एप भी शामिल है। इससे पहले शिकायतें बढ़ने और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली परिवहन विभाग ने ‘BAT-BMS’ के साथ-साथ इसी तरह काम करने वाले एक अन्य एप्लीकेशन ‘इपोच ली-आयन’ (Epoch Li-ion) के खिलाफ जांच शुरू की थी। सवाल 9: परिवहन विभाग इस समस्या को रोकने के लिए आगे क्या कदम उठा सकता है? जवाब: दिल्ली के परिवहन मंत्री पंकज सिंह और विभाग के सीनियर अधिकारी इस तकनीकी खामी और सुरक्षा के खतरे की गंभीरता से समीक्षा कर रहे हैं। सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि कम्यूटर्स और ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए इन असुरक्षित बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम एप्स पर किस तरह के प्रतिबंध या नियम लागू किए जा सकते हैं, ताकि अनधिकृत उपयोग को रोका जा सके।







