'रामायण को ऑस्कर नहीं मिला तो मुझे निराशा होगी':सीएम फडणवीस बोले- यह एक डिकेड की नहीं, बल्कि पूरे मिलेनियम की फिल्म

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि फिल्म रामायण को ऑस्कर नहीं मिलता है, तो उन्हें निराशा होगी। उन्होंने यह बात गुरुवार को फिल्म रामायण के प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा के प्राइम फोकस स्टूडियो के उद्घाटन के दौरान कही। सीएम फडणवीस ने कहा, ‘रामायण सिर्फ एक डिकेड (10 साल) की नहीं, बल्कि पूरे मिलेनियम (1000 साल) की फिल्म है। अगर इसे ऑस्कर नहीं मिला, तो मुझे अकादमी की ज्यूरी से निराशा होगी।’ उन्होंने मेकर्स से कहा, ‘मैं आप सभी को बधाई देना चाहूंगा जिन्होंने रामायण के निर्माण में अपना प्रयास किया और अब हम रामायण की रिलीज का इंतजार कर रहे हैं और साथ ही हम प्राइम फोकस’ के फेज 2 के उद्घाटन का भी इंतजार कर रहे हैं। फडणवीस ने इससे पहले मुंबई में WAVES समिट 2025 के दौरान फिल्म की क्वालिटी और टेक्नोलॉजी की तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि भारत में कहानी कहने का एक पुराना रिवाज है और इन कहानियों को नई टेक्नोलॉजी की मदद से अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए। 30 जुलाई को ट्रेलर आया था फिल्म रामायण के पहले पार्ट का ट्रेलर 30 जुलाई को सुबह 4:15 बजे, ब्रह्म मुहूर्त के शुभ अवसर पर दुनियाभर में लॉन्च किया गया था। ‘रामायण’ के ट्रेलर को हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम समेत कई भाषाओं में एक साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज किया गया। देखें ट्रेलर की झलक- एआर रहमान और हैंस जिमर दे रहे म्यूजिक फिल्म के संगीत को लेकर भी काफी समय से चर्चा बनी हुई है। इस फिल्म में दो दिग्गज म्यूजिशियन एआर रहमान और ऑस्कर विजेता हैंस जिमर पहली बार एक साथ मिलकर बैकग्राउंड स्कोर और संगीत तैयार कर रहे हैं। फिल्म का निर्माण नमित मल्होत्रा के प्राइम फोकस स्टूडियोज और एक्टर यश के मॉन्स्टर माइंड क्रिएशंस के तहत किया जा रहा है। इस ग्रैंड प्रोजेक्ट को दो भागों में बनाया जा रहा है, जिसका पहला पार्ट नवंबर 2026 में दिवाली के मौके पर सिनेमाघरों में रिलीज होगा। 4000 करोड़ के बजट में बन रही फिल्म ‘दंगल’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म बना चुके डायरेक्टर नितेश तिवारी पिछले कई सालों से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दो भागों में बनने वाली इस फिल्म का कुल बजट 4000 करोड़ रुपए के करीब है, जो इसे भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे महंगी फिल्म बनाता है। फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स (VFX) की जिम्मेदारी ऑस्कर विनिंग कंपनी DNEG संभाल रही है। फिल्म ‘रामायण’ से जुड़ी अहम बातें-
'रामायण को ऑस्कर नहीं मिला तो मुझे निराशा होगी':सीएम फडणवीस बोले- यह एक डिकेड की नहीं, बल्कि पूरे मिलेनियम की फिल्म

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि फिल्म रामायण को ऑस्कर नहीं मिलता है, तो उन्हें निराशा होगी। उन्होंने यह बात गुरुवार को फिल्म रामायण के प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा के प्राइम फोकस स्टूडियो के उद्घाटन के दौरान कही। सीएम फडणवीस ने कहा, ‘रामायण सिर्फ एक डिकेड (10 साल) की नहीं, बल्कि पूरे मिलेनियम (1000 साल) की फिल्म है। अगर इसे ऑस्कर नहीं मिला, तो मुझे अकादमी की ज्यूरी से निराशा होगी।’ उन्होंने मेकर्स से कहा, ‘मैं आप सभी को बधाई देना चाहूंगा जिन्होंने रामायण के निर्माण में अपना प्रयास किया और अब हम रामायण की रिलीज का इंतजार कर रहे हैं और साथ ही हम प्राइम फोकस’ के फेज 2 के उद्घाटन का भी इंतजार कर रहे हैं। फडणवीस ने इससे पहले मुंबई में WAVES समिट 2025 के दौरान फिल्म की क्वालिटी और टेक्नोलॉजी की तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि भारत में कहानी कहने का एक पुराना रिवाज है और इन कहानियों को नई टेक्नोलॉजी की मदद से अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए। 30 जुलाई को ट्रेलर आया था फिल्म रामायण के पहले पार्ट का ट्रेलर 30 जुलाई को सुबह 4:15 बजे, ब्रह्म मुहूर्त के शुभ अवसर पर दुनियाभर में लॉन्च किया गया था। ‘रामायण’ के ट्रेलर को हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम समेत कई भाषाओं में एक साथ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर रिलीज किया गया। देखें ट्रेलर की झलक- एआर रहमान और हैंस जिमर दे रहे म्यूजिक फिल्म के संगीत को लेकर भी काफी समय से चर्चा बनी हुई है। इस फिल्म में दो दिग्गज म्यूजिशियन एआर रहमान और ऑस्कर विजेता हैंस जिमर पहली बार एक साथ मिलकर बैकग्राउंड स्कोर और संगीत तैयार कर रहे हैं। फिल्म का निर्माण नमित मल्होत्रा के प्राइम फोकस स्टूडियोज और एक्टर यश के मॉन्स्टर माइंड क्रिएशंस के तहत किया जा रहा है। इस ग्रैंड प्रोजेक्ट को दो भागों में बनाया जा रहा है, जिसका पहला पार्ट नवंबर 2026 में दिवाली के मौके पर सिनेमाघरों में रिलीज होगा। 4000 करोड़ के बजट में बन रही फिल्म ‘दंगल’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म बना चुके डायरेक्टर नितेश तिवारी पिछले कई सालों से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दो भागों में बनने वाली इस फिल्म का कुल बजट 4000 करोड़ रुपए के करीब है, जो इसे भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे महंगी फिल्म बनाता है। फिल्म के विजुअल इफेक्ट्स (VFX) की जिम्मेदारी ऑस्कर विनिंग कंपनी DNEG संभाल रही है। फिल्म ‘रामायण’ से जुड़ी अहम बातें-
UPI Payment Controversy | Finance Minister Nirmala Sitharaman Statement

नई दिल्ली12 मिनट पहले कॉपी लिंक भारत में रोजाना फल-सब्जी खरीदने से लेकर कैब के किराए तक के लिए करोड़ों लोग यूपीआई (UPI) का इस्तेमाल करते हैं। हाल ही में संसद में पेश हुए नए बिल के बाद एक बहस शुरू हो गई है कि क्या भविष्य में यूपीआई पेमेंट करने पर ग्राहकों को शुल्क देना होगा। इस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्थिति साफ की है। वित्त मंत्री ने कहा है कि आम ग्राहकों को डरने की कोई जरूरत नहीं है, यूपीआई उनके लिए फ्री ही रहेगा। जानिए क्या है पूरा मामला, संसद में पेश नया बिल, एमडीआर का नियम और आम यूजर्स पर इसका क्या असर होगा… सवाल: क्या आम ग्राहकों को अब UPI से पेमेंट करने पर कोई चार्ज देना होगा? जवाब: नहीं, बिल्कुल नहीं। सरकार और आरबीआई दोनों ने साफ किया है कि आम ग्राहकों से यूपीआई पेमेंट पर कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। आप पहले की तरह ही किसी भी क्यूआर कोड को स्कैन करके फ्री में पैसों का ट्रांसफर और खरीदारी कर सकेंगे। सवाल: फिर यूपीआई पर चार्ज लगने की चर्चा क्यों शुरू हुई? जवाब: सरकार ने संसद में टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल-2026 पेश किया है। इसमें पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट- 2007 की धारा 10A में संशोधन का प्रस्ताव है। इसके तहत भविष्य में कुछ खास यूपीआई लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का कानूनी ढांचा तैयार किया जा रहा है। इसी के बाद विपक्ष ने सवाल उठाए कि इससे आम जनता पर बोझ पड़ेगा। सवाल: कांग्रेस और विपक्ष का इस नए संशोधन बिल पर क्या आरोप है? जवाब: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह संशोधन उस कानूनी सुरक्षा को हटाता है जिसने अब तक यूपीआई ट्रांजेक्शन को पूरी तरह मुफ्त रखा है। उनका आरोप है कि इससे भविष्य में यूपीआई पर एमडीआर लगाने का रास्ता साफ होगा और इसका अंतिम बोझ आम जनता पर ही पड़ेगा। सवाल: विपक्ष के आरोपों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने क्या सफाई दी? जवाब: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विपक्ष के दावों को खारिज करते हुए X पर कहा कि एमडीआर केवल मर्चेंट्स (दुकानदारों/व्यापारियों) पर लागू होता है, न कि अंतिम उपभोक्ता या ग्राहकों पर। इससे मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल बैंक और फिनटेक कंपनियां अपने इंफ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन और सिक्योरिटी को मजबूत करने में करेंगी, जिसका फायदा अंततः सभी यूपीआई यूजर्स को ही मिलेगा। सवाल: क्या अभी से यूपीआई ट्रांजेक्शन पर एमडीआर लागू कर दिया गया है? जवाब: नहीं, अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि संसद से बिल पास होने के बाद नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की ‘यूपीआई एंड सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी’ इस पर अंतिम फैसला लेगी। अभी यह केवल एक प्रस्ताव के स्तर पर है। सवाल: यह एमडीआर आखिर होता क्या है और यह कौन देता है? जवाब: एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह फीस होती है जो कोई व्यापारी या दुकानदार डिजिटल पेमेंट प्रोसेस करने के बदले बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को देता है। यह शुल्क ग्राहक की जेब से नहीं कटता, बल्कि दुकानदारों के डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के बदले चुकाया जाता है। वर्तमान नियमों के तहत यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड पर एमडीआर 0% है। सवाल: RBI गवर्नर का इस पूरे मुद्दे पर क्या रुख है? जवाब: आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मॉनेटरी पॉलिसी के बाद कहा कि इस पर अभी से किसी नतीजे पर पहुंचना बहुत जल्दबाजी होगी। सरकार कानून में संशोधन कर रही है और चर्चा जारी है। डिजिटल पेमेंट सिस्टम को चलाने का खर्च किसी न किसी को तो उठाना ही होगा। उन्होंने कहा कि आरबीआई की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि डिजिटल पेमेंट सुरक्षित, टिकाऊ और सभी के लिए किफायती बना रहे। सवाल: प्रस्तावित योजना के तहत किन दुकानों और ट्रांजेक्शन पर चार्ज लग सकता है? जवाब: विचाराधीन प्रस्ताव के अनुसार, ₹2,000 से ज्यादा के यूपीआई ट्रांजेक्शन पर 0.3% से 0.5% तक का एमडीआर (MDR) लगाया जा सकता है। राहत की बात यह है कि यह नियम केवल ₹1.5 करोड़ से ज्यादा के सालाना टर्नओवर वाले बड़े मर्चेंट्स/दुकानदारों पर ही लागू करने का प्लान है। छोटे व्यापारी और सब्जी-किराना वाले इसके दायरे से बाहर रहेंगे। सवाल: अगर एमडीआर लागू भी हो जाता है, तो दुकानदारों पर क्या असर पड़ेगा? जवाब: अगर यह प्रस्ताव पास होता है, तो केवल ₹1.5 करोड़ से ज्यादा का टर्नओवर रखने वाले बड़े कारोबारियों को ही ₹2,000 से ज्यादा के यूपीआई लेन-देन पर 0.3% से 0.5% तक फीस देनी होगी। छोटे दुकानदारों और आम ग्राहकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। सवाल: यूपीआई के भविष्य और इसकी फंडिंग को लेकर असली विवाद क्या है? जवाब: भारत में तेजी से बढ़ते डिजिटल पेमेंट्स नेटवर्क का खर्च कौन उठाएगा। यह इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ है। बैंक और फिनटेक कंपनियों का कहना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और साइबर सुरक्षा बनाए रखने के लिए भारी लागत आती है। सरकार चाहती है कि आम यूजर्स पर बोझ डाले बिना बैंकों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाया जाए, ताकि यूपीआई सर्विस बिना किसी रुकावट के चलती रहे। नॉलेज पार्ट: जानें क्या है पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट? धारा 10A का नियम: भारत सरकार ने डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए इस कानून में धारा 10A जोड़ी थी, जिसके तहत यूपीआई और रूपे कार्ड लेन-देन पर किसी भी प्रकार का एमडीआर लगाने पर रोक लगा दी गई थी। संशोधन की जरूरत क्यों: धारा 10A में संशोधन के बाद सरकार और एनपीसीआई (NPCI) को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे जरूरत पड़ने पर बड़े व्यावसायिक लेन-देन पर सीमित शुल्क (MDR) तय कर सकें, ताकि डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च निकाला जा सके। ये खबर भी पढ़ें… मैगी विवाद में दुकानदारों पर लगे सभी क्रिमिनल केस हटे: हाईकोर्ट बोला- लैब जांच में लेड लिमिट में मिला, अब केस का कोई आधार नहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के मैगी विवाद में दुकानदारों के खिलाफ दर्ज सभी केस रद्द कर दिए हैं। यह सभी क्रिमिनल केस मैगी में लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने के आरोपों के बाद दर्ज किए गए थे। जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि
Odisha Hostel Protest | Students Walk 12km Over Poor Food & Conditions

Hindi News Career Odisha Hostel Protest | Students Walk 12km Over Poor Food & Conditions 4 मिनट पहले कॉपी लिंक ओडिशा के एक हॉस्टल में लगभग 180 छात्र रह रहे थे। छात्रों ने आरोप लगाया कि उन्हें केवल दो कमरों में ठूंसकर रखा गया है। खाने की क्वालिटी खराब है। यहां तक कि चावल-दाल में कीड़े मिलने की शिकायत भी की। यह घटना ओडिशा के नबरंगपुर जिले के झरिगांव ब्लॉक स्थित सांतेमारा सरकारी उच्च विद्यालय के हॉस्टल से जुड़ी है। अधिकारियों ने दिया समस्या के समाधान का आश्वासन हॉस्टल की छत से बारिश का पानी टपकने, गंदे टॉयलेट और पानी की समस्याओं व खेल सामग्री की कमी की भी शिकायत की गई। नाराज छात्र अपने बैग लेकर हॉस्टल छोड़कर घरों की ओर निकल पड़े। ये सब देखकर शिक्षा एवं जनजातीय कल्याण विभाग के अधिकारियों ने पहुंचकर छात्रों और उनके माता-पिता से बातचीत की। उन्हें समस्याओं के समाधान का आश्वासन दिया। 12 किमी तक पैदल चले छात्र हॉस्टल के बदतर हालातों को बताते हुए छात्रों ने कहा – हॉस्टल में कमरों की संख्या कम होने के कारण कई छात्रों को भीड़भाड़ के बीच रहना पड़ता है। इन छात्रों ने हॉस्टल से अपने गांव तक का 12 किमी सफर पैदल चलकर तय किया। ओडिशा के नबरंगपुर जिले के झरिगांव ब्लॉक स्थित सांतेमारा सरकारी उच्च विद्यालय के मेन गेट की फोटो प्रिंसिपल ने खराब खाने की बात से किया इंकार सूचना मिलने के बाद कई अभिभावक भी मौके पर पहुंचे और अपने बच्चों को अपने साथ घर ले गए। इस घटना के बाद राज्य में सरकारी आवासीय छात्रावासों की व्यवस्था और वहां उपलब्ध सुविधाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस बारे में जब स्कूल की प्रिंसिपल राजलक्ष्मी महाराणा से बात की तो उन्होंने छात्रों के अधिकांश आरोपों से इनकार किया। हालांकि उन्होंने हॉस्टल में कुछ अव्यवस्थाओं की बात जरूर स्वीकार की। इस बात को उन्होंने खारिज कर दिया कि हॉस्टल में छात्रों को सड़ा हुआ चावल परोसे जाता है। फिलहाल इस घटना ने सरकारी हॉस्टलों में छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं और खाने की क्वालिटी पर बहस छेड़ दी है। हॉस्टल छोड़कर घर के लिए निकले 180 छात्रों का समूह नए प्रिंसिपल की नियुक्ति की गई असिस्टेंट ब्लॉक ऑफिसर दशरथ गोंड ने घटना के बारे में बताते हुए कहा, “हमें जब सूचना मिली तो हम तुरंत मौके पर पहुंचे। हमनें देखा कि बच्चे चल चलकर आ रहे थे। हमनें उन्हें दुकलपाड़ा स्कूल में रुकने को कहा। वहां उन्हें खाने पीने की सुविधा दी गई। बच्चों से बात करने के बाद हमनें प्रिंसिपल का ट्रांसफर कर दिया है। यहां नए प्रिंसिपल की नियुक्ति की गई है जिनका नाम जिनका नाम गणेशराम नायक है। इसके बाद बच्चों के लिए गाड़ी की व्यवस्था कर उन्हें वापस स्कूल भेजा गया। हॉस्टल में मूक-बधिर छात्रों के हालात भी बदतर जयपुर के राजकीय सेठ आनंदीलाल पोद्दार मूक-बधिर उच्च माध्यमिक स्कूल में भी दो दिन पहले हंगामा हुआ। दिव्यांग छात्र-छात्राओं ने स्कूल में टॉयलेट की बदहाल स्थिति, पानी का संकट और जर्जर भवन की समस्या से परेशान होकर प्रदर्शन किया। मामले की सूचना पर शिक्षा विभाग की टीम, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी स्कूल पहुंचे। गहलोत ने कहा कि बच्चों की समस्या को लेकर मैं खुद सीएम भजनलाल शर्मा को पत्र लिखूंगा। उन्हें बताऊंगा कि स्कूल में ऐसे टीचर्स की नियुक्ति की गई है, जिन्हें खुद साइन लैंग्वेज नहीं आती है। वहीं हालात भी बद से बदतर है। निरीक्षण में कई खामियां सामने आने के बाद विभाग ने तत्काल प्रिंसिपल को हटा दिया। वहीं एक टीचर और एक फोर्थ ग्रेड कर्मचारी को भी APO कर दिया गया। क्लासरूम की दीवारों पर दरार जवाहरलाल नेहरू मार्ग में स्थित राजकीय सेठ आनंदीलाल पोद्दार स्कूल के छात्र प्रदर्शन करते गेट पर बैठ गए। छात्रों का कहना है कि स्कूल में लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। कई क्लासरूम की दीवारों और कमरों में दरारें पड़ चुकी हैं। इसके साथ ही पीने के पानी की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। स्टूडेंट्स का आरोप है कि इन समस्याओं को लेकर कई बार स्कूल प्रशासन और प्रिंसिपल को अवगत कराया गया, लेकिन शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। समस्याओं का समाधान नहीं होने पर मजबूरन प्रदर्शन करना पड़ा। विशेष कमेटी का भी गठन, स्कूल में होगा काम शिक्षा विभाग ने स्कूल में व्याप्त समस्याओं के समाधान के लिए एक विशेष कमेटी का भी गठन किया है। यह कमेटी स्कूल की सफाई व्यवस्था, पेयजल, भवन की स्थिति और अन्य मूलभूत सुविधाओं का आकलन कर जल्द रिपोर्ट देगी। रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक मरम्मत और सुधार कार्य कराए जाएंगे, ताकि विद्यार्थियों को सुरक्षित और बेहतर शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। शिक्षा विभाग का कहना है कि विद्यार्थियों की सुविधाओं से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। स्कूल में सामने आई कमियों को प्राथमिकता के आधार पर दूर किया जाएगा और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए भी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। ये खबर भी पढ़ें TGT भर्ती परीक्षा में 33 सवाल गलत:सचिव, परीक्षा नियंत्रक को अदालत में पेश होने के आदेश, कोर्ट ने कहा- परीक्षा प्रक्रिया बताए आयोग इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परीक्षा में बड़ी संख्या में गलत प्रश्न पाए जाने पर उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPESSC) के सचिव और परीक्षा नियंत्रक को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि आयोग यह बताए कि प्रश्नपत्र कैसे तैयार किया जाता है और परीक्षा कराने की पूरी प्रक्रिया क्या है। पूरी खबर यहां पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Delhi High Court Stays FSSAI Ban on Dabur Pure Natural Products

नई दिल्ली8 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली हाईकोर्ट ने डाबर को अंतरिम राहत दी है। कोर्ट ने FSSAI के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें ‘100% प्योर’, ‘100% नेचुरल’ और ‘100% ऑर्गेनिक’ जैसे दावों वाले उत्पादों की बिक्री तुरंत रोकने को कहा था। जस्टिस अमित महाजन की बेंच ने केंद्र और FSSAI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जब तक मामले में अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक FSSAI का बैन ऑर्डर सस्पेंड रहेगा। इस पूरे मामले, कोर्ट के फैसले, डाबर की दलीलों और FSSAI की कार्रवाई पर सवाल-जवाब… सवाल 1. FSSAI ने डाबर के किन-किन प्रोडक्ट्स और दावों पर रोक लगाई थी? जवाब: FSSAI ने डाबर के उन प्रोडक्ट्स पर कार्रवाई की थी जिनके लेबल पर “100% प्योर”, “100% नेचुरल” और “100% ऑर्गेनिक” लिखा होता है। इनमें प्रमुख रूप से डाबर हनी , डाबर हनी स्क्वीजी, डाबर सुंदरबंस हनी, डाबर हिमालयन एपल साइडर विनेगर, डाबर वर्जिन कोकोनट ऑयल, डाबर काउ घी, रियल एक्टिव 100% टेंडर कोकोनट वॉटर, डाबर होममेड कोकोनट मिल्क और डाबर ऑर्गेनिक हनी शामिल हैं। सवाल 2. FSSAI का डाबर के इन दावों पर क्या एतराज था? जवाब: FSSAI का कहना था कि लेबल पर “100%” जैसे दावों का इस्तेमाल अस्पष्ट और भ्रमित करने वाला है। नियामक का तर्क था कि इन दावों की कोई वेरिफिकेशन नहीं की जा सकती। इससे ग्राहकों को गलत जानकारी मिलने की संभावना बनी रहती है। सवाल 3. डाबर ने FSSAI के इस आदेश को कोर्ट में चुनौती क्यों दी? जवाब: डाबर का मुख्य तर्क यह था कि FSSAI ने फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स रेगुलेशंस, 2018 के तहत तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया। डाबर के अनुसार, कार्रवाई करने से पहले कंपनी को न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और ना ही कोई सुधार नोटिस। कंपनी को अपना पक्ष रखने या स्पष्टीकरण देने का मौका दिए बिना ही अचानक बिक्री रोकने का आदेश जारी कर दिया गया। सवाल 4. डाबर ने कानूनी और तकनीकी आधार पर FSSAI के आदेश में क्या कमियां बताईं? जवाब: डाबर ने तर्क दिया कि FSSAI एक्ट, 2006 की धारा 18 केवल मार्गदर्शक सिद्धांत तय करती है, यह किसी अधिकारी को सीधे बिक्री रोकने का अधिकार नहीं देती। इसके अलावा, आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि “100% प्योर” या “100% नेचुरल” जैसे शब्द नियमों का उल्लंघन कैसे करते हैं। कंपनी ने कहा कि सिंगल-इन्ग्रीडिएंट या पूरी तरह प्राकृतिक उत्पादों के लिए “100% प्योर” कहना अपने आप में भ्रामक नहीं माना जा सकता। सवाल 5. क्या डाबर के इन उत्पादों की क्वालिटी या सेफ्टी में कोई खराबी पाई गई है? जवाब: नहीं, यह मामला उत्पाद की गुणवत्ता या सुरक्षा से जुड़ा नहीं है। डाबर ने कोर्ट में स्पष्ट किया कि FSSAI ने अपने आदेश में यह कहीं नहीं कहा है कि ये उत्पाद मिलावटी, असुरक्षित, नकली या घटिया हैं। यह विवाद केवल पैकेट के लेबल और विज्ञापनों पर लिखे शब्दों तक सीमित है। सवाल 6. FSSAI के इस अचानक लगे बैन से डाबर के बिजनेस पर क्या असर पड़ रहा था? जवाब: डाबर ने कोर्ट को बताया कि इस आदेश से कंपनी को भारी व्यावसायिक नुकसान हो रहा था। बाजार में पहले से मौजूद स्टॉक को वापस मंगाने या उनकी रिपैकेजिंग करने की नौबत आ गई थी। साथ ही FSSAI द्वारा सोशल मीडिया पर इस आदेश को सार्वजनिक करने और ऑनलाइन रिटेलर्स/चैनल पार्टनर्स को बिक्री रोकने की सलाह देने से कंपनी के व्यापार और साख पर तुरंत बुरा असर पड़ा। सवाल 7. हाईकोर्ट के इस स्टे ऑर्डर के बाद अब मार्केट में क्या स्थिति रहेगी? जवाब: इस अंतरिम आदेश के बाद अब डाबर अपने सभी प्रभावित प्रोडक्ट्स की बिक्री पहले की तरह जारी रख सकेगी। ऑनलाइन और ऑफलाइन रिटेलर्स इन प्रोडक्ट्स को बेचने से नहीं रोकेंगे। कंपनी को फिलहाल रिपैकेजिंग या बाजार से पुराना स्टॉक वापस मंगाने की जरूरत नहीं होगी। सवाल 8. आगे क्या होगा? FSSAI और डाबर के बीच कानूनी प्रक्रिया का अगला कदम क्या है? जवाब: दिल्ली हाईकोर्ट के नोटिस के बाद अब FSSAI और केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करना होगा। इसके बाद कोर्ट डाबर याचिका पर अगली सुनवाई करेगी और यह तय करेगी कि FSSAI का 3 अगस्त का आदेश कानूनन सही था या उसे पूरी तरह रद्द किया जाना चाहिए। सवाल 9. FMCG सेक्टर और कंज्यूमर्स के लिए इस मामले का क्या महत्व है? जवाब: यह मामला FMCG कंपनियों के लिए रेगुलेटरी कंप्लायंस और ब्रांडिंग के लिहाज से काफी अहम है। FSSAI पिछले कुछ समय से ‘100%’ और ‘नेचुरल’ जैसे दावों पर सख्त रुख अपना रहा है। हालांकि, हाईकोर्ट के इस कदम से कंपनियों को प्रक्रियात्मक न्याय और अपना पक्ष रखने का अधिकार मिला है। ग्राहकों के लिए भी यह समझना महत्वपूर्ण है कि विवाद उत्पाद की सुरक्षा का नहीं बल्कि लेबलिंग की तकनीकी भाषा का है। नॉलेज पार्ट: जानें क्या कहता है FSSAI का ‘क्लेम्स रेगुलेशन’? शो-कॉज नोटिस अनिवार्य: खाद्य सुरक्षा नियमों के अनुसार, अगर FSSAI को किसी प्रोडक्ट के विज्ञापन या क्लेम पर आपत्ति होती है, तो पहले फूड बिजनेस ऑपरेटर (FBO) को स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस देना होता है। सिंगल बनाम मल्टी-इन्ग्रीडिएंट: FSSAI का मानना है कि प्रोसेस्ड या मल्टी-इन्ग्रीडिएंट फूड में ‘100% Pure’ लिखना गलत है, जबकि कंपनियां तर्क देती हैं कि शहद या शुद्ध नारियल पानी जैसे प्राकृतिक प्रोडक्ट्स में यह दावा जायज है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed

Hindi News Business Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed नई दिल्ली3 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के मैगी विवाद में दुकानदारों के खिलाफ दर्ज सभी केस रद्द कर दिए हैं। यह सभी क्रिमिनल केस मैगी में लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने के आरोपों के बाद दर्ज किए गए थे। जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) की जांच में मैगी के सैंपल सुरक्षित पाए जा चुके हैं, तो दुकानदारों पर मुकदमा चलाना उनके साथ अन्याय होगा। इस फैसले और पूरे मामले के हर पहलू को सवाल-जवाब के जरिए जानिए… सवाल: दिल्ली हाईकोर्ट ने मैगी से जुड़ा क्या फैसला सुनाया है? जवाब: दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के चर्चित मैगी विवाद में दुकानदारों (रिटेलर्स और सप्लायर्स) के खिलाफ दर्ज सभी क्रिमिनल केस रद्द कर दिए हैं। फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने 2015 में जिन दुकानों से सैंपल लिए थे, उनके मालिकों पर मुकदमे चलाए जा रहे थे। कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए कानूनी कार्यवाही को समाप्त कर दिया है। सवाल: अदालत ने मुकदमों को खारिज करने का क्या कारण बताया? जवाब: जस्टिस मधु जैन ने कहा कि जब जांच का मूल आधार ही वैज्ञानिक रूप से खत्म हो चुका है, तो एक लंबा आपराधिक ट्रायल सही नहीं होगा। कोर्ट के मुताबिक, फूड सेफ्टी एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट के अलावा मिलावट का कोई सबूत मौजूद नहीं है। सवाल: यह पूरा मामला कब और कैसे शुरू हुआ था? जवाब: मई 2015 में देशभर में मैगी के सैंपल लिए गए थे। फूड एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मैगी के मसाला टेस्टमेकर में लेड की मात्रा तय सीमा 2.5 पार्ट्स पर मिलियन (PPM) से ज्यादा थी। इसके अलावा पैकेट पर नो एडेड मैसेज का दावा करने के बावजूद इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट यानी अजीनोमोटो मिलने का आरोप लगाया गया था। साथ ही इसे इंसान के खाने के लिए असुरक्षित बताया गया था। सवाल: मामले में दुकानदारों और सप्लायरों को कैसे आरोपी बनाया गया था? जवाब: फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने जांच के दौरान मैगी की सप्लाई चेन का पता लगाया। दुकानदारों के अलावा सप्लायर फर्म मेसर्स धींगरा ब्रदर्स और मैन्युफैक्चरर कंपनी नेस्ले इंडिया लिमिटेड के जिम्मेदार प्रतिनिधियों के खिलाफ फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत FIR दर्ज कर समन जारी किए गए थे। सवाल: दुकानदारों के वकीलों ने कोर्ट में क्या दलीलें दीं? जवाब: आरोपियों की तरफ से पेश वकील राजेश बत्रा और सोनिया कुकरेजा ने दलील दी कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2015 को ही मैगी पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। इसके बाद तीन मान्यता प्राप्त लैब में नए सैंपलों की जांच हुई थी, जिसमें लीड की मात्रा तय सीमा के भीतर पाई गई थी। इसलिए अब केस का कोई आधार ही नहीं बचता। सवाल: सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय प्रयोगशाला (CFTRI) की क्या भूमिका रही? जवाब: मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने 16 जनवरी 2016 को मैसुरु स्थित ‘सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (CFTRI) को मैगी के सैंपलों की दोबारा जांच का आदेश दिया। CFTRI की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि मैगी में लीड और ग्लूटामिक एसिड (MSG) की मात्रा तय नियमों और तय मानकों के भीतर ही थी। सवाल: राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC) ने इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया था? जवाब: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CFTRI की रिपोर्ट को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के समक्ष रखा गया था। NCDRC ने केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि मैगी असुरक्षित थी, इसका कोई प्रमाण नहीं है और रेफरल लैब की रिपोर्ट ही अंतिम मानी जाएगी। सवाल: सरकारी पक्ष (राज्य सरकार) की क्या दलील थी? जवाब: राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील दिगम सिंह डागर ने तर्क दिया कि सैंपल लेने की प्रक्रिया FSS एक्ट के नियमों के अनुसार हुई थी। उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और NCDRC के फैसले अलग संदर्भ में थे, इसलिए दुकानदारों के खिलाफ चल रहे केस स्वतः रद्द नहीं होने चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। सवाल: इस फैसले का आम दुकानदारों और आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जवाब: इस फैसले से उन छोटे दुकानदारों को बड़ी राहत मिली है, जो पिछले 9 सालों से सिर्फ सामान बेचने की वजह से अदालती चक्कर काट रहे थे। आम उपभोक्ताओं के लिए भी यह फैसला साफ करता है कि देश की सर्वोच्च अदालतों और वैज्ञानिक लैब की जांच में मैगी में सीसे और हानिकारक तत्वों का दावा खारिज हो चुका है। जानें क्या है मोनोसोडियम ग्लूटामेट और पार्स पर मिलियन मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG): यह एक फ्लेवर एन्हांसर है, जो खाने के स्वाद को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह कई प्राकृतिक चीजों (जैसे टमाटर, पनीर) में भी पाया जाता है। पार्स पर मिलियन (PPM): यह किसी तत्व की शुद्धता या मिलावट मापने की इकाई है। 1 PPM का मतलब 10 लाख हिस्सों में से 1 हिस्सा होता है। खाद्य नियमों के तहत मैगी में सीसे की सीमा 2.5 PPM निर्धारित है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed

Hindi News Business Delhi High Court Relief | Maggi Controversy Retailers Criminal Case Quashed नई दिल्ली20 मिनट पहले कॉपी लिंक दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के मैगी विवाद में दुकानदारों के खिलाफ दर्ज सभी केस रद्द कर दिए हैं। यह सभी क्रिमिनल केस मैगी में लेड और मोनोसोडियम ग्लूटामेट की ज्यादा मात्रा पाए जाने के आरोपों के बाद दर्ज किए गए थे। जस्टिस मधु जैन की बेंच ने कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट और सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) की जांच में मैगी के सैंपल सुरक्षित पाए जा चुके हैं, तो दुकानदारों पर मुकदमा चलाना उनके साथ अन्याय होगा। इस फैसले और पूरे मामले के हर पहलू को सवाल-जवाब के जरिए जानिए… सवाल: दिल्ली हाईकोर्ट ने मैगी से जुड़ा क्या फैसला सुनाया है? जवाब: दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2015 के चर्चित मैगी विवाद में दुकानदारों (रिटेलर्स और सप्लायर्स) के खिलाफ दर्ज सभी क्रिमिनल केस रद्द कर दिए हैं। फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने 2015 में जिन दुकानों से सैंपल लिए थे, उनके मालिकों पर मुकदमे चलाए जा रहे थे। कोर्ट ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए कानूनी कार्यवाही को समाप्त कर दिया है। सवाल: अदालत ने मुकदमों को खारिज करने का क्या कारण बताया? जवाब: जस्टिस मधु जैन ने कहा कि जब जांच का मूल आधार ही वैज्ञानिक रूप से खत्म हो चुका है, तो एक लंबा आपराधिक ट्रायल सही नहीं होगा। कोर्ट के मुताबिक, फूड सेफ्टी एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट के अलावा मिलावट का कोई सबूत मौजूद नहीं है। सवाल: यह पूरा मामला कब और कैसे शुरू हुआ था? जवाब: मई 2015 में देशभर में मैगी के सैंपल लिए गए थे। फूड एनालिस्ट की शुरुआती रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मैगी के मसाला टेस्टमेकर में लेड की मात्रा तय सीमा 2.5 पार्ट्स पर मिलियन (PPM) से ज्यादा थी। इसके अलावा पैकेट पर नो एडेड मैसेज का दावा करने के बावजूद इसमें मोनोसोडियम ग्लूटामेट यानी अजीनोमोटो मिलने का आरोप लगाया गया था। साथ ही इसे इंसान के खाने के लिए असुरक्षित बताया गया था। सवाल: मामले में दुकानदारों और सप्लायरों को कैसे आरोपी बनाया गया था? जवाब: फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने जांच के दौरान मैगी की सप्लाई चेन का पता लगाया। दुकानदारों के अलावा सप्लायर फर्म मेसर्स धींगरा ब्रदर्स और मैन्युफैक्चरर कंपनी नेस्ले इंडिया लिमिटेड के जिम्मेदार प्रतिनिधियों के खिलाफ फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत FIR दर्ज कर समन जारी किए गए थे। सवाल: दुकानदारों के वकीलों ने कोर्ट में क्या दलीलें दीं? जवाब: आरोपियों की तरफ से पेश वकील राजेश बत्रा और सोनिया कुकरेजा ने दलील दी कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 13 अगस्त 2015 को ही मैगी पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था। इसके बाद तीन मान्यता प्राप्त लैब में नए सैंपलों की जांच हुई थी, जिसमें लेड की मात्रा तय सीमा के भीतर पाई गई थी। इसलिए अब केस का कोई आधार ही नहीं बचता। सवाल: सुप्रीम कोर्ट और सरकारी लैब की क्या भूमिका रही? जवाब: मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो हाई कोर्ट ने 16 जनवरी 2016 को मैसुरु स्थित सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI) को मैगी के सैंपलों की दोबारा जांच का आदेश दिया। सरकारी लैब की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि मैगी में लेड और अजीनोमोटो की मात्रा तय नियमों और तय मानकों के भीतर ही थी। सवाल: राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाया था? जवाब: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर CFTRI की रिपोर्ट को नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के समक्ष रखा गया था। NCDRC ने केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि मैगी असुरक्षित थी, इसका कोई प्रमाण नहीं है और रेफरल लैब की रिपोर्ट ही अंतिम मानी जाएगी। सवाल: मामले पर सरकारी पक्ष की क्या दलील थी? जवाब: राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील दिगम सिंह डागर ने तर्क दिया कि सैंपल लेने की प्रक्रिया FSS एक्ट के नियमों के अनुसार हुई थी। उन्होंने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और NCDRC के फैसले अलग संदर्भ में थे, इसलिए दुकानदारों के खिलाफ चल रहे केस रद्द नहीं होने चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। सवाल: इस फैसले का आम दुकानदारों और आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा? जवाब: इस फैसले से उन छोटे दुकानदारों को बड़ी राहत मिली है, जो पिछले 9 सालों से सिर्फ सामान बेचने की वजह से अदालती चक्कर काट रहे थे। आम उपभोक्ताओं के लिए भी यह फैसला साफ करता है कि देश की सर्वोच्च अदालतों और वैज्ञानिक लैब की जांच में मैगी में लेड और हानिकारक तत्वों का दावा खारिज हो चुका है। जानें क्या है मोनोसोडियम ग्लूटामेट और पार्स पर मिलियन मोनोसोडियम ग्लूटामेट (MSG): यह एक फ्लेवर एन्हांसर है, जो खाने के स्वाद को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होता है। यह कई प्राकृतिक चीजों (जैसे टमाटर, पनीर) में भी पाया जाता है। पार्स पर मिलियन (PPM): यह किसी तत्व की शुद्धता या मिलावट मापने की इकाई है। 1 PPM का मतलब 10 लाख हिस्सों में से 1 हिस्सा होता है। खाद्य नियमों के तहत मैगी में सीसे की सीमा 2.5 PPM निर्धारित है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
अफ्रीका में चीनी एआई का दबदबा, सिलिकॉन वैली पर दबाव:युगांडा, केन्या में डेवलपर्स महंगे अमेरिकी मॉडल छोड़ सस्ते, ओपन-सोर्स चीनी एआई अपना रहे

पिछले साल ऐसा एआई सिस्टम बनाने के दौरान अमेरिकी और चीनी टूल्स परखे थे। चीन का मॉडल बेहतर साबित हुआ क्योंकि यह युगांडा की दर्जनों भाषाओं को बेहतर ढंग से संभालता है। यह सस्ता भी था और इसे अपने डेटा से कस्टमाइज किया जा सकता था। म्वेबाजे का ‘सनफ्लॉवर’’ सिस्टम अब पूरे युगांडा में इस्तेमाल हो रहा है। किसान स्थानीय बोलियों में मौसम की जानकारी और खेती की सलाह ले रहे हैं। केन्या में उद्यमी कानूनी और बिजनेस सेवाओं को सुगम बना रहे हैं। नाइजीरिया में छात्रों को पढ़ाने वाले एजुकेशनल टूल्स बनाए गए हैं। घाना में डेवलपर्स स्थानीय चैटबॉट्स तैयार कर रहे हैं। कम लागत में बेहतरीन सिस्टम चाहने वाले विकासशील देशों में चीनी एआई तेजी से आगे बढ़ रही है। ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी अमेरिकी कंपनियों के मॉडल बंद और शुल्क वाले हैं। इसके विपरीत चीनी सिस्टम बिना किसी शुल्क या मंजूरी के डाउनलोड और संशोधित किए जा सकते हैं। ओपनरोटर पर कुल एआई उपयोग का लगभग आधा हिस्सा चीनी ओपन-सोर्स मॉडल का है। एक साल पहले यह 25% से कम था। आठ करोड़ ग्राहकों के डेटा विश्लेषण से यह बात सामने आई है। हगिंग फेस पर भी सबसे ज्यादा डाउनलोड होने वाले सिस्टम में चीनी मॉडल आगे हैं। केन्या और युगांडा के साक्षात्कारों में डेवलपर्स ने इसकी पुष्टि की है। उनके लिए मॉडल कहां बना यह मायने नहीं रखता। लागत, कंप्यूटिंग संसाधन और डेटा नियंत्रण सबसे जरूरी हैं। अमेरिकी मॉडल किराए के घर जैसे हैं जबकि चीनी मॉडल अपने घर जैसे हैं। स्क्रैच से मॉडल प्रशिक्षित करने पर लाखों खर्च होते हैं। इसके उलट चीनी सिस्टम डाउनलोड कर उसके ऊपर नया उत्पाद बनाया जा सकता है। इसमें केवल सर्वर का खर्च देना होता है। अमेरिकी मॉडल सब्सक्रिप्शन और फीस पर आधारित होते हैं। एक डिजिटल एजेंसी चलाने वाले मोसेस केमिबारो ने कहा कि टोयोटा हैचबैक से काम चल सकता है तो फेरारी क्यों चलाएं। कम्प्यूटिंग लागत मिलाने पर चीनी मॉडल 90% तक सस्ते पड़ते हैं। अमेरिकी कंपनियां भी जोर-आजमाइश कर रहीं अफ्रीका का अनुभव बताता है कि वैश्विक एआई प्रतियोगिता अब दो हॉर्स की रेस है। क्राफ्ट सिलिकॉन के चीफ एग्जीक्यूटिव कमल बुधाभट्टी दोनों तरफ खिंचाव महसूस करते हैं। उन्होंने एंथ्रोपिक के प्रोग्रामिंग टूल क्लाउड कोड से अपनी फर्म के सिस्टम फिर से तैयार किए। सौ इंजीनियरों का काम 10 लोगों की टीम ने आधे समय में पूरा कर लिया। बिल भारी था, लेकिन गति इसके लायक थी। हुआवे ने भी चीनी सिस्टम अपनाने के लिए एक साल की मुफ्त कम्प्यूटिंग जैसे कई बड़े प्रोत्साहन दिए।
विंक गर्ल प्रिया प्रकाश वॉरियल की भगवा ड्रेस पर सवाल:पूछा गया- ये रंग क्यों पहना, फैंस हुए नाराज, एक्ट्रेस के जवाब को मिलीं सराहना

फिल्म ‘ओरु अदार लव’ में अपनी मशहूर विंक से चर्चा में आईं एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर हाल ही में एक प्रमोशनल इवेंट में शामिल हुईं। प्रिया को हाल ही में क्यूटीकुरा का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है। इस इवेंट के दौरान एक यूट्यूबर ने उनके कपड़ों के रंग को लेकर सवाल किया, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। इवेंट में प्रिया ने नारंगी यानी केसरिया रंग की ड्रेस पहनी थी। मीडिया से बातचीत के दौरान एक यूट्यूबर ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने किसी खास वजह से केसरिया रंग की ड्रेस चुनी है। इस पर प्रिया ने शांति से जवाब देते हुए पूछा, “ड्रेस में समस्या क्या है?” यूट्यूबर ने यह भी पूछा कि क्या केरल में जारी ‘ऑरेंज अलर्ट’ का असर उनके कपड़ों के चुनाव पर पड़ा है। प्रिया ने साफ किया कि उन्होंने यह रंग सिर्फ इसलिए चुना क्योंकि यह उस ब्रांड से मेल खाता था जिसका वह प्रचार कर रही थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके इस फैशन चुनाव के पीछे कोई राजनीतिक या धार्मिक संदेश नहीं था। सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है। कई लोगों ने ड्रेस के रंग पर पूछे गए इस सवाल को अनावश्यक और अनुचित बताया है। यूजर्स का कहना है कि किसी के कपड़ों के रंग को राजनीतिक या वैचारिक जुड़ाव से नहीं जोड़ना चाहिए। एक यूजर ने लिखा कि लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी है। सवाल काम, विचारों या बयानों पर होने चाहिए, न कि कपड़ों के रंग पर। वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा कि प्रिया ने शांत और सभ्य तरीके से जवाब देकर अच्छा उदाहरण पेश किया है।
विंक गर्ल प्रिया प्रकाश वॉरियल की भगवा ड्रेस पर सवाल:पूछा गया- ये रंग क्यों पहना, फैंस हुए नाराज, एक्ट्रेस के जवाब को मिलीं सराहना

फिल्म ‘ओरु अदार लव’ में अपनी मशहूर विंक से चर्चा में आईं एक्ट्रेस प्रिया प्रकाश वारियर हाल ही में एक प्रमोशनल इवेंट में शामिल हुईं। प्रिया को हाल ही में क्यूटीकुरा का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है। इस इवेंट के दौरान एक यूट्यूबर ने उनके कपड़ों के रंग को लेकर सवाल किया, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। इवेंट में प्रिया ने नारंगी यानी केसरिया रंग की ड्रेस पहनी थी। मीडिया से बातचीत के दौरान एक यूट्यूबर ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने किसी खास वजह से केसरिया रंग की ड्रेस चुनी है। इस पर प्रिया ने शांति से जवाब देते हुए पूछा, “ड्रेस में समस्या क्या है?” यूट्यूबर ने यह भी पूछा कि क्या केरल में जारी ‘ऑरेंज अलर्ट’ का असर उनके कपड़ों के चुनाव पर पड़ा है। प्रिया ने साफ किया कि उन्होंने यह रंग सिर्फ इसलिए चुना क्योंकि यह उस ब्रांड से मेल खाता था जिसका वह प्रचार कर रही थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके इस फैशन चुनाव के पीछे कोई राजनीतिक या धार्मिक संदेश नहीं था। सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया इस बातचीत का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है। कई लोगों ने ड्रेस के रंग पर पूछे गए इस सवाल को अनावश्यक और अनुचित बताया है। यूजर्स का कहना है कि किसी के कपड़ों के रंग को राजनीतिक या वैचारिक जुड़ाव से नहीं जोड़ना चाहिए। एक यूजर ने लिखा कि लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आजादी है। सवाल काम, विचारों या बयानों पर होने चाहिए, न कि कपड़ों के रंग पर। वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा कि प्रिया ने शांत और सभ्य तरीके से जवाब देकर अच्छा उदाहरण पेश किया है।







