Friday, 16 Oct 2026 | 05:07 PM

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रुबीना दिलाइक ने पहले ठुकराया था ‘खतरों के खिलाड़ी 15’:परिवार से दूर नहीं जाना चाहती थीं, जानिए फिर कैसे बदला फैसला

रुबीना दिलाइक ने पहले ठुकराया था ‘खतरों के खिलाड़ी 15’:परिवार से दूर नहीं जाना चाहती थीं, जानिए फिर कैसे बदला फैसला

टीवी एक्ट्रेस रुबीना दिलाइक एक बार फिर टीवी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ में वापसी करने जा रही हैं। रुबीना इससे पहले शो के 12वें सीजन में भाग ले चुकी हैं। अब वह एक बार फिर ‘खतरों के खिलाड़ी’ के सीजन 15 में नजर आएंगी। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में रुबीना ने बताया कि मां बनने के बाद उनकी जिंदगी और सोच दोनों बदल चुकी हैं। बातचीत में रुबीना ने इंडस्ट्री में अपने शुरुआती संघर्ष, लोगों की जजमेंट, स्ट्रॉन्ग महिलाओं को लेकर बनी सोच और अपने डर पर भी बात की। सवाल: आप हमेशा एक स्ट्रॉन्ग, बोल्ड और टफ पर्सनैलिटी के तौर पर देखी जाती हैं। क्या इस इमेज का प्रेशर भी रहता है? जवाब: अगर मैं यह सोचने लगूं कि लोग मुझसे क्या उम्मीद कर रहे हैं, तो वह प्रेशर मेरे गेम को खराब कर सकता है। मुझे लगता है कि आपको बस अपनी जगह समझनी चाहिए और उसी सम्मान के साथ खेलना चाहिए। अगर मैं एक्सपेक्टेशन का बोझ लेकर स्टंट करूंगी, तो वह मुझे और ज्यादा परेशान करेगा। इसलिए जितना हो सके, उस प्रेशर को खुद से दूर रखना जरूरी है। सवाल: क्या कॉम्पिटिटिव होना इस शो के लिए जरूरी है? जवाब: बिल्कुल। हर इंसान के अंदर एक कॉम्पिटिटिव स्पिरिट होती है। कोई खुद से मुकाबला करता है, कोई दूसरों से। जब आप ऐसे शो में जाते हैं, तो आप अपनी बेस्ट फिजिकल और मेंटल कैपेसिटी दिखाना चाहते हैं। अगर आपके अंदर कॉम्पिटिटिवनेस नहीं है, तो शायद आप कहीं न कहीं फ्लैट पड़ जाएंगे। सवाल: कुछ लोगों का परसेप्शन है कि मां बनने के बाद महिलाएं कमजोर हो जाती हैं, आप इसे कैसे देखती हैं? जवाब: मुझे लगता है कि मदरहुड कमजोरी नहीं, बल्कि बहुत बड़ी ताकत है। लोग कहते हैं कि अब शायद आपके अंदर पहले जैसी स्टैमिना या ताकत नहीं होगी, लेकिन वही बातें मुझे खुद को साबित करने का और मोटिवेशन देती हैं। ताकत सिर्फ फिजिकल नहीं होती, मानसिक मजबूती और रेजिलिएंस भी बहुत मायने रखता है और एक मां के अंदर यह ताकत और ज्यादा बढ़ जाती है। सवाल: डर को आप कैसे देखती हैं? जवाब: डर ही तय करता है कि आप कितने मजबूत हैं। जिंदगी में हर इंसान किसी न किसी डर से लड़ रहा होता है। सवाल यह नहीं है कि डर है या नहीं, सवाल यह है कि आप डर को खुद पर हावी होने देते हैं या खुद उस डर पर जीत हासिल करते हैं। सवाल: इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में सबसे बड़ा डर क्या था? जवाब: मैं गांव और बहुत कंजर्वेटिव माहौल से आती हूं। उस समय इस इंडस्ट्री को बहुत अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। जब मैं पहली बार मुंबई आई, तो मेरे अंदर बहुत डर था। पढ़ाई, करियर, नए शहर में खुद को स्थापित करना… हर चीज डराती थी, लेकिन शायद हर डर को पार करने की कोशिश ने मुझे मजबूत बनाया। सवाल: पहली बार ‘खतरों के खिलाड़ी’ करने के दौरान आपका सबसे बड़ा डर क्या था? जवाब: जब आप जिंदगी में पहली बार 80 फीट ऊंचाई से कूदते हैं या समुद्र में स्टंट करते हैं, तब समझ आता है कि डर क्या होता है। पानी तो पानी ही होता है, चाहे गिलास में हो या समुद्र में, लेकिन उसकी विशालता आपका डर तय करती है। उस पूरे सीजन में मैं लगातार अपने डर से जूझ रही थी। सवाल: क्या इस बार का अनुभव पहले से अलग होगा? जवाब: बिल्कुल। मां बनने के बाद बहुत कुछ बदल गया है। पिछले चार सालों में मैंने खुद को उस तरह से टेस्ट नहीं किया है। इसलिए मुझे खुद नहीं पता कि इस बार मैं अपने डर को उसी तरह फेस कर पाऊंगी या नहीं। लेकिन यह जर्नी मेरे लिए बहुत अलग होने वाली है। सवाल: स्ट्रॉन्ग और ओपिनियन रखने वाली महिलाओं को अक्सर जज किया जाता है। क्या आपने भी यह महसूस किया है? जवाब: हां, लेकिन यह मेरी जिंदगी जीने का तरीका है। अगर मैं खुद को सिर्फ लोगों को खुश करने के लिए बदल दूं, तो फिर मैं अपनी असली जिंदगी नहीं जी रही हूं। भगवान ने हर इंसान को अलग बनाया है। अगर मैं अपनी यूनिकनेस छोड़कर लोगों की उम्मीदों में फिट होने लगूं, तो मैं ऑथेंटिक नहीं रहूंगी। हां, ऐसा करने से कई लोग आपसे नाराज भी होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप खुद को बदल दें। सवाल: जब आपको दोबारा ‘खतरों के खिलाड़ी’ का ऑफर मिला, तब आपका पहला रिएक्शन क्या था? जवाब: मैंने शुरुआत में मना कर दिया था, क्योंकि यह बहुत लंबा इंटरनेशनल शेड्यूल है और अब मेरी बेटियां हैं। उन्हें छोड़कर इतनी दूर जाना आसान नहीं था। लगभग तीन महीने तक मैं यही सोचती रही कि करूं या नहीं, लेकिन फिर अभिनव ने कहा कि ‘रुबीना, यह मौका दोबारा नहीं मिलेगा। हम सब संभाल लेंगे।’ तब मुझे लगा कि मेरे पास बहुत मजबूत सपोर्ट सिस्टम है और मैं यह कर सकती हूं। सवाल: अब जीत और हार को किस नजरिए से देखती हैं? जवाब: अब मेरे लिए जीत-हार का मतलब बदल चुका है। अब मैं यह सोचती हूं कि हमारी चॉइसेस हमारी बेटियों को क्या सिखाएंगी। हम उनके पहले टीचर हैं। इसलिए हम उन्हें यह नहीं सिखाना चाहते कि सिर्फ जीतना जरूरी है। हम उन्हें यह सिखाना चाहते हैं कि कोशिश करना और हिम्मत दिखाना ज्यादा जरूरी है। सवाल: इस बार के कंटेस्टेंट्स को लेकर क्या सोचती हैं? जवाब: हर कोई अपने साथ एक अलग एनर्जी लेकर आया है। अविका गोर बहुत स्ट्रॉन्ग हैं। जैस्मिन भसीन के साथ मैंने बिग बॉस में काफी वक्त बिताया है और वह बहुत अच्छी इंसान हैं। करण वाही और ऋत्विक धनजानी यह शो तीसरी बार कर रहे हैं, इसलिए उनके पास अलग अनुभव है। वहीं रुहानिका धवन और शगुन शर्मा जैसे यंग कंटेस्टेंट्स का नजरिया अलग होगा। मुझे लोगों को ऑब्जर्व करना और उनकी बॉडी लैंग्वेज समझना बहुत पसंद है। इसलिए यह सफर मेरे लिए काफी दिलचस्प रहेगा।

रुबीना दिलाइक ने पहले ठुकराया था ‘खतरों के खिलाड़ी 15’:परिवार से दूर नहीं जाना चाहती थीं, जानिए फिर कैसे बदला फैसला

रुबीना दिलाइक ने पहले ठुकराया था ‘खतरों के खिलाड़ी 15’:परिवार से दूर नहीं जाना चाहती थीं, जानिए फिर कैसे बदला फैसला

टीवी एक्ट्रेस रुबीना दिलाइक एक बार फिर टीवी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ में वापसी करने जा रही हैं। रुबीना इससे पहले शो के 12वें सीजन में भाग ले चुकी हैं। अब वह एक बार फिर ‘खतरों के खिलाड़ी’ के सीजन 15 में नजर आएंगी। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में रुबीना ने बताया कि मां बनने के बाद उनकी जिंदगी और सोच दोनों बदल चुकी हैं। बातचीत में रुबीना ने इंडस्ट्री में अपने शुरुआती संघर्ष, लोगों की जजमेंट, स्ट्रॉन्ग महिलाओं को लेकर बनी सोच और अपने डर पर भी बात की। सवाल: आप हमेशा एक स्ट्रॉन्ग, बोल्ड और टफ पर्सनैलिटी के तौर पर देखी जाती हैं। क्या इस इमेज का प्रेशर भी रहता है? जवाब: अगर मैं यह सोचने लगूं कि लोग मुझसे क्या उम्मीद कर रहे हैं, तो वह प्रेशर मेरे गेम को खराब कर सकता है। मुझे लगता है कि आपको बस अपनी जगह समझनी चाहिए और उसी सम्मान के साथ खेलना चाहिए। अगर मैं एक्सपेक्टेशन का बोझ लेकर स्टंट करूंगी, तो वह मुझे और ज्यादा परेशान करेगा। इसलिए जितना हो सके, उस प्रेशर को खुद से दूर रखना जरूरी है। सवाल: क्या कॉम्पिटिटिव होना इस शो के लिए जरूरी है? जवाब: बिल्कुल। हर इंसान के अंदर एक कॉम्पिटिटिव स्पिरिट होती है। कोई खुद से मुकाबला करता है, कोई दूसरों से। जब आप ऐसे शो में जाते हैं, तो आप अपनी बेस्ट फिजिकल और मेंटल कैपेसिटी दिखाना चाहते हैं। अगर आपके अंदर कॉम्पिटिटिवनेस नहीं है, तो शायद आप कहीं न कहीं फ्लैट पड़ जाएंगे। सवाल: कुछ लोगों का परसेप्शन है कि मां बनने के बाद महिलाएं कमजोर हो जाती हैं, आप इसे कैसे देखती हैं? जवाब: मुझे लगता है कि मदरहुड कमजोरी नहीं, बल्कि बहुत बड़ी ताकत है। लोग कहते हैं कि अब शायद आपके अंदर पहले जैसी स्टैमिना या ताकत नहीं होगी, लेकिन वही बातें मुझे खुद को साबित करने का और मोटिवेशन देती हैं। ताकत सिर्फ फिजिकल नहीं होती, मानसिक मजबूती और रेजिलिएंस भी बहुत मायने रखता है और एक मां के अंदर यह ताकत और ज्यादा बढ़ जाती है। सवाल: डर को आप कैसे देखती हैं? जवाब: डर ही तय करता है कि आप कितने मजबूत हैं। जिंदगी में हर इंसान किसी न किसी डर से लड़ रहा होता है। सवाल यह नहीं है कि डर है या नहीं, सवाल यह है कि आप डर को खुद पर हावी होने देते हैं या खुद उस डर पर जीत हासिल करते हैं। सवाल: इंडस्ट्री में शुरुआती दौर में सबसे बड़ा डर क्या था? जवाब: मैं गांव और बहुत कंजर्वेटिव माहौल से आती हूं। उस समय इस इंडस्ट्री को बहुत अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। जब मैं पहली बार मुंबई आई, तो मेरे अंदर बहुत डर था। पढ़ाई, करियर, नए शहर में खुद को स्थापित करना… हर चीज डराती थी, लेकिन शायद हर डर को पार करने की कोशिश ने मुझे मजबूत बनाया। सवाल: पहली बार ‘खतरों के खिलाड़ी’ करने के दौरान आपका सबसे बड़ा डर क्या था? जवाब: जब आप जिंदगी में पहली बार 80 फीट ऊंचाई से कूदते हैं या समुद्र में स्टंट करते हैं, तब समझ आता है कि डर क्या होता है। पानी तो पानी ही होता है, चाहे गिलास में हो या समुद्र में, लेकिन उसकी विशालता आपका डर तय करती है। उस पूरे सीजन में मैं लगातार अपने डर से जूझ रही थी। सवाल: क्या इस बार का अनुभव पहले से अलग होगा? जवाब: बिल्कुल। मां बनने के बाद बहुत कुछ बदल गया है। पिछले चार सालों में मैंने खुद को उस तरह से टेस्ट नहीं किया है। इसलिए मुझे खुद नहीं पता कि इस बार मैं अपने डर को उसी तरह फेस कर पाऊंगी या नहीं। लेकिन यह जर्नी मेरे लिए बहुत अलग होने वाली है। सवाल: स्ट्रॉन्ग और ओपिनियन रखने वाली महिलाओं को अक्सर जज किया जाता है। क्या आपने भी यह महसूस किया है? जवाब: हां, लेकिन यह मेरी जिंदगी जीने का तरीका है। अगर मैं खुद को सिर्फ लोगों को खुश करने के लिए बदल दूं, तो फिर मैं अपनी असली जिंदगी नहीं जी रही हूं। भगवान ने हर इंसान को अलग बनाया है। अगर मैं अपनी यूनिकनेस छोड़कर लोगों की उम्मीदों में फिट होने लगूं, तो मैं ऑथेंटिक नहीं रहूंगी। हां, ऐसा करने से कई लोग आपसे नाराज भी होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप खुद को बदल दें। सवाल: जब आपको दोबारा ‘खतरों के खिलाड़ी’ का ऑफर मिला, तब आपका पहला रिएक्शन क्या था? जवाब: मैंने शुरुआत में मना कर दिया था, क्योंकि यह बहुत लंबा इंटरनेशनल शेड्यूल है और अब मेरी बेटियां हैं। उन्हें छोड़कर इतनी दूर जाना आसान नहीं था। लगभग तीन महीने तक मैं यही सोचती रही कि करूं या नहीं, लेकिन फिर अभिनव ने कहा कि ‘रुबीना, यह मौका दोबारा नहीं मिलेगा। हम सब संभाल लेंगे।’ तब मुझे लगा कि मेरे पास बहुत मजबूत सपोर्ट सिस्टम है और मैं यह कर सकती हूं। सवाल: अब जीत और हार को किस नजरिए से देखती हैं? जवाब: अब मेरे लिए जीत-हार का मतलब बदल चुका है। अब मैं यह सोचती हूं कि हमारी चॉइसेस हमारी बेटियों को क्या सिखाएंगी। हम उनके पहले टीचर हैं। इसलिए हम उन्हें यह नहीं सिखाना चाहते कि सिर्फ जीतना जरूरी है। हम उन्हें यह सिखाना चाहते हैं कि कोशिश करना और हिम्मत दिखाना ज्यादा जरूरी है। सवाल: इस बार के कंटेस्टेंट्स को लेकर क्या सोचती हैं? जवाब: हर कोई अपने साथ एक अलग एनर्जी लेकर आया है। अविका गोर बहुत स्ट्रॉन्ग हैं। जैस्मिन भसीन के साथ मैंने बिग बॉस में काफी वक्त बिताया है और वह बहुत अच्छी इंसान हैं। करण वाही और ऋत्विक धनजानी यह शो तीसरी बार कर रहे हैं, इसलिए उनके पास अलग अनुभव है। वहीं रुहानिका धवन और शगुन शर्मा जैसे यंग कंटेस्टेंट्स का नजरिया अलग होगा। मुझे लोगों को ऑब्जर्व करना और उनकी बॉडी लैंग्वेज समझना बहुत पसंद है। इसलिए यह सफर मेरे लिए काफी दिलचस्प रहेगा।

चेस कोई सस्ता खेल नहीं:एक ग्रैंडमास्टर बनने में खर्च होते हैं 50 से 70 लाख रुपए, हालिया ग्रैंडमास्टर्स के माता-पिता को बेचने पड़े गहने

चेस कोई सस्ता खेल नहीं:एक ग्रैंडमास्टर बनने में खर्च होते हैं 50 से 70 लाख रुपए, हालिया ग्रैंडमास्टर्स के माता-पिता को बेचने पड़े गहने

अक्सर लोगों को लगता है कि शतरंज एक सस्ता खेल है, क्योंकि इसमें अन्य खेलों की तरह महंगे उपकरण, बड़े स्टेडियम या स्पोर्ट्स साइंस टीम की जरूरत नहीं होती। लेकिन भारत के नए शतरंज ग्रैंडमास्टर्स की सफलता की सच्चाई ने इस मिथक को पूरी तरह तोड़ दिया है। असलियत यह है कि आज एक बच्चे को ग्रैंडमास्टर (जीएम) बनाने में 50 से 70 लाख रुपए का भारी खर्च आता है। हाल ही में भारत के 95वें ग्रैंडमास्टर बने आरोन्यक घोष और 94वें ग्रैंडमास्टर मयंक चक्रवर्ती के परिवारों का संघर्ष इसका जीता-जागता प्रमाण है। आरोन्यक के पिता मृणाल घोष बताते हैं कि उन्होंने अपने बेटे के ऊपर पिछले 15 सालों में लगभग 46 लाख रुपए खर्च किए। उनका मानना है कि भारत में जीएम बनने के लिए यह शायद सबसे कम राशि है। बैंकॉक चेस क्लब ओपन में तीसरा और अंतिम जीएम नॉर्म हासिल करने वाले आरोन्यक के लिए पिता को पुश्तैनी जमीन और मां संचिता को शादी के गहने बेचने पड़े। इनामी राशि की पाई-पाई खेल में वापस लगा दी गई। वहीं, पूर्वोत्तर भारत के इकलौते जीएम मयंक की मां मोनोमिता चक्रवर्ती कहती हैं कि शुरुआत से जीएम बनने तक माता-पिता को 70 लाख रुपए तैयार रखने चाहिए। यह सिर्फ जीएम बनने तक का खर्च है। 12 वर्षीय फीडे मास्टर (जीएम से दो कदम पीछे) आरव सरबलिया के पिता यतिन का अनुमान है कि केवल 2025 में उन्होंने आरव पर 25-30 लाख रुपए खर्च किए। वे टूर्नामेंट के लिए 4 महीने तक विदेश में रहे। स्पॉन्सरशिप न मिलने पर उन्होंने कमाई के लिए सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाना शुरू कर दिया। चेस में सबसे बड़ा खर्च कोचिंग है। ग्रैंडमास्टर कोच की फीस 10,000 से 20,000 रुपए प्रति घंटा होती है और एक से ज्यादा कोच रखने पड़ते हैं। नॉर्म्स के लिए साल में 6-8 यूरोप दौरों का खर्च 15-20 लाख रुपए आता है। प्रैक्टिस के लिए ट्रेनिंग पार्टनर और ‘सेकेंड्स’ (जो मैच की तैयारी कराते हैं) को घंटे के हिसाब से भारी फीस देनी पड़ती है। कई बार ये कोच इनामी राशि में भी हिस्सा मांगते हैं। मृणाल घोष कहते हैं कि 2500 रेटिंग पार कर जीएम बनने पर आयोजक रुकने व फ्लाइट का खर्च उठाते हैं, लेकिन मेरा बेटा 2550 रेटिंग पर है। इसे 2650 तक ले जाने में इतना पैसा लगेगा कि मैं सपने देखने से भी डरता हूं। स्पॉन्सरशिप मुश्किल, शेयरिंग अपार्टमेंट्स में रहते हैं – चेस के खेल में स्पॉन्सर मिलना मुश्किल है। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया की प्रोत्साहन राशि भी बंद हो गई है। ऐसे में गुवाहाटी से आने वाले मयंक को विदेशी दौरे पर कनेक्टिंग फ्लाइट का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। – खर्च बचाने के लिए परिवार यूरोप में सस्ते शेयरिंग अपार्टमेंट में रुकते हैं और घर का खाना ले जाते हैं।

विजय को कमल हासन और प्रकाश राज ने बधाई दी:एक्ट्रेस त्रिशा शपथ ग्रहण में शामिल हुईं, थलापति की मां और बहन से गले मिलीं

विजय को कमल हासन और प्रकाश राज ने बधाई दी:एक्ट्रेस त्रिशा शपथ ग्रहण में शामिल हुईं, थलापति की मां और बहन से गले मिलीं

अभिनेता से नेता बने थलापति विजय ने रविवार को तमिलनाडु के 9वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित समारोह में राहुल गांधी और तृषा समेत कई हस्तियां मौजूद रहीं। विजय के सीएम की शपथ लेने के बाद साउथ सुपरस्टार कमल हासन और एक्टर प्रकाश राज ने उन्हें बधाई दी। कमल हासन ने कहा, ‘तमिलगा वेत्री कड़गम के अध्यक्ष और तमिलनाडु के माननीय मुख्यमंत्री मेरे भाई थिरु विजय को शुभकामनाएं। उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में तमिलनाडु नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूं।’ वहीं प्रकाश राज ने ट्वीट कर लिखा, ‘मुख्यमंत्री विजय को बहुत-बहुत बधाई। नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं। उम्मीद है कि आपके नेतृत्व में राज्य और तरक्की करेगा।’ तृषा ने विजय की मां से मुलाकात की शपथ ग्रहण समारोह में एक्ट्रेस तृषा कृष्णन भी पहुंचीं। उन्होंने विजय के परिवार से मुलाकात की और उनकी मां से गले मिलती नजर आईं। विजय ने सुबह 10.15 बजे तमिल में शपथ ली तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) चीफ और एक्टर से नेता बने सी जोसेफ विजय तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं। उन्होंने रविवार सुबह 10.15 बजे तमिल में शपथ ली। इस दौरान राहुल गांधी भी मौजूद रहे। थलापित विजय शपथ लेते समय निर्धारित लाइनों के अलावा और बातें बोलने लगे। इस पर राज्यपाल अर्लेकर ने उन्हें टोक दिया और कहा कि वही पढ़ें जो लिखकर दिया है। CM विजय के साथ 9 और मंत्रियों ने भी शपथ ली। इनमें एन आनंद, आधव अर्जुन, डॉ. केजी अरुणराज, केए सेंगोट्टैयन, पी वेंकटरमणन, आर निर्मलकुमार, राजमोहन, डॉ. टीके प्रभु, सेल्वी एस कीर्तना शामिल है। ये सभी विजय की पार्टी TVK के विधायक हैं। सहयोगी दलों के किसी विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है। 3 तस्वीरों में देखिए पूरा घटनाक्रम… विजय ने शपथ के दौरान कहा… मैं सी. जोसेफ विजय भारत की संविधान के प्रति सच्ची आस्था और निष्ठा रखूंगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में भारत की एकता, अखंडता को बनाए रखूंगा और अपने विवेक के अनुसार कर्तव्यों और कानून का पालन करूंगा। किसी से डरूंगा नहीं और ना ही एकतरफा आदेश मानूंगा। मैं न्याय करूंगा, सभी लोगों के साथ न्याय करूंगा। शपथ के दौरान CM विजय की 4 तस्वीरें… शनिवार को चौथी बार राज्यपाल से मिले थे विजय इससे पहले शनिवार को विजय ने राज्यपाल अर्लेकर को TVK, कांग्रेस, CPI, CPM, VCK और IUML के विधायकों के समर्थन पत्र सौंपे। इसके बाद राज्यपाल ने उन्हें सरकार बनाने का न्योता दिया। विजय की दो साल पुरानी पार्टी TVK ने अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में 234 में 108 सीटें जीतीं। तमिलनाडु में 1967 के बाद पहली बार गैर-द्रविड़ दल (DMK या AIADMK) का मुख्यमंत्री बना है।

सतीसन, वेणुगोपाल, चेन्निथला: केरल में कांग्रेस की म्यूजिकल चेयर में सिर्फ एक कुर्सी है | भारत समाचार

Ruturaj Gaikwad's CSK will take on LSG (Picture credit: AP)

आखरी अपडेट:10 मई, 2026, 14:05 IST केरल के लिए एआईसीसी प्रभारी दीपा दासमुंशी ने कहा है कि कांग्रेस आलाकमान “बहुत जल्द” फैसला करेगा कि पार्टी का मुख्यमंत्री कौन होगा। केरल की स्थिति कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन गई है, जो पार्टी की जीत के बाद कर्नाटक में सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता संघर्ष की याद दिलाती है। (एआई-जनरेटेड फोटो) 4 मई को चार राज्यों और पुडुचेरी के लिए चुनावी नतीजे घोषित होने के छह दिन बाद, दो राज्यों ने पहले ही अपने मुख्यमंत्रियों की शपथ ले ली है, और दो अन्य ने अपने सीएम पद की घोषणा कर दी है। लेकिन “गॉड्स ओन कंट्री” में पिनाराई विजयन का उत्तराधिकारी कौन होगा, इस पर सस्पेंस जारी है। नई विधानसभा का गठन 23 मई की समय सीमा से पहले किया जाना आवश्यक है, लेकिन कांग्रेस के पास अभी भी बढ़ते आंतरिक संकट को हल करने के लिए कांग्रेस आलाकमान के पास लगभग दो सप्ताह का समय है। केरल के लिए एआईसीसी प्रभारी दीपा दासमुंशी ने कहा है कि कांग्रेस आलाकमान “बहुत जल्द” फैसला करेगा कि पार्टी का मुख्यमंत्री कौन होगा। हालांकि, सभी इस बात पर सहमत हैं कि आलाकमान का जो भी फैसला होगा, वह सभी को स्वीकार्य होगा. केरल के कांग्रेस नेता पार्टी आलाकमान से मिलने के लिए लगातार नई दिल्ली की यात्रा कर रहे हैं, जबकि उनके समर्थक अपने पसंदीदा मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के समर्थन में सड़कों पर पोस्टर और विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। बढ़ती गुटीय खींचतान के बीच, राहुल गांधी ने कथित तौर पर उम्मीदवारों- वीडी सतीसन, केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला से अपने समर्थकों पर लगाम लगाने और आंतरिक कलह को खत्म करने के लिए कहा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के बाद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच कर्नाटक में सत्ता संघर्ष की याद ताजा करते हुए, कांग्रेस के लिए स्थिति मुश्किल हो गई है। हालाँकि, केरल में एक्स-फैक्टर वेणुगोपाल हैं – शक्तिशाली कांग्रेस महासचिव (संगठन) और अलाप्पुझा से लोकसभा सांसद – जो विधानसभा चुनाव नहीं लड़ने के बावजूद दौड़ में शामिल हो गए हैं। शनिवार को मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर एक बैठक के दौरान केंद्रीय पर्यवेक्षकों द्वारा साझा किए गए इनपुट के अनुसार, राहुल गांधी के बाद पार्टी में सबसे प्रभावशाली नेताओं में माने जाने वाले वेणुगोपाल को लगभग 43 नवनिर्वाचित कांग्रेस विधायकों का समर्थन प्राप्त है। हालाँकि, अंतिम निर्णय राहुल गांधी पर निर्भर करता है, जिन्हें चुनना होगा कि क्या अपने करीबी विश्वासपात्र को केरल की राजनीति में वापस भेजना है या आगामी राजनीतिक चुनौतियों के माध्यम से पार्टी को चलाने में मदद करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें बनाए रखना है। वहीं, निवर्तमान विधानसभा में विपक्ष के नेता सतीसन और सोनिया गांधी के करीबी माने जाने वाले पूर्व नेता प्रतिपक्ष चेन्निथला के दावे मजबूत बने हुए हैं। दोनों नेता पूरे केरल में महत्वपूर्ण प्रभाव रखते हैं। कांग्रेस की सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने मुख्यमंत्री पद के लिए सतीसन का खुलकर समर्थन किया है। इस बीच, चेन्निथला के समर्थकों का तर्क है कि उन्होंने पिछली कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान वरिष्ठता का सम्मान करते हुए ओमन चांडी के पक्ष में कदम उठाया था, और अब भी इसी तरह के विचार के पात्र हैं। चेन्निथला 69 साल के हैं, जबकि सतीसन 61 और वेणुगोपाल 63 साल के हैं। सतीसन के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार का मुकाबला करने और पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाले एलडीएफ की हार के लिए आधार तैयार करने में विपक्ष के नेता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चुनावों से पहले, कन्नूर के सांसद के. सुधाकरन भी विधानसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक थे, लेकिन कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व और पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने उन्हें दौड़ से बाहर रहने के लिए मना लिया। कांग्रेस ने सैद्धांतिक रुख अपनाया था कि कोई भी मौजूदा सांसद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगा। क्या नतीजों के बाद भी किसी सांसद को मुख्यमंत्री के रूप में चुना जा सकता है, यह अब एक सवाल है जिसका जवाब पार्टी आलाकमान को देना होगा। 140 सदस्यीय केरल विधानसभा में कांग्रेस ने 63 सीटें जीतीं। इसके सहयोगियों – आईयूएमएल (22), केरल कांग्रेस (8), और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (3) – ने यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को कुल मिलाकर 102 सीटें हासिल करने में मदद की, जो आराम से दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े को पार कर गई। (पीटीआई से इनपुट्स के साथ) चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना जगह : तिरुवनंतपुरम (त्रिवेंद्रम), भारत, भारत न्यूज़ इंडिया सतीसन, वेणुगोपाल, चेन्निथला: केरल में कांग्रेस की म्यूजिकल चेयर में सिर्फ एक कुर्सी है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)केरल के मुख्यमंत्री की दौड़(टी)कांग्रेस नेतृत्व संकट(टी)केरल कांग्रेस गुट(टी)राहुल गांधी निर्णय(टी)केसी वेणुगोपाल केरल(टी)वीडी सतीसन सीएम दावेदार(टी)रमेश चेन्निथला नेतृत्व(टी)आईयूएमएल सतीसन का समर्थन करता है

इस हफ्ते ईरान-अमेरिका तनाव पर होगी निवेशकों की नजर:चौथी तिमाही के नतीजों समेत 5 फैक्टर्स तय करेंगे चाल; निफ्टी के लिए 24,500 पर रेजिस्टेंस

इस हफ्ते ईरान-अमेरिका तनाव पर होगी निवेशकों की नजर:चौथी तिमाही के नतीजों समेत 5 फैक्टर्स तय करेंगे चाल; निफ्टी के लिए 24,500 पर रेजिस्टेंस

कल 11 मई से शुरू होने वाले हफ्ते में शेयर बाजार में काफी हलचल रहने वाली है। कंपनियों के चौथी तिमाही के नतीजे, अमेरिका-ईरान तनाव और विदेशी निवेशकों की बिकवाली जैसे फैक्टर बाजार की दिशा तय करेंगे। चलिए समझते हैं अगले हफ्ते बाजार में क्या हो सकता है… सपोर्ट और रेजिस्टेंस सपोर्ट जोन: 23,936 | 23,870 | 23,820 | 23,466 | 23,335 | 22,858 सपोर्ट यानी, वह स्तर जहां शेयर या इंडेक्स को नीचे गिरने से सहारा मिलता है। यहां खरीदारी बढ़ने से कीमत आसानी से नीचे नहीं जाती। यहां खरीदारी का मौका हो सकता है। रेजिस्टेंस जोन: 24,380 | 24,450 | 24,480 | 24,535 | 24,646 | 24,685 रेजिस्टेंस यानी, वह स्तर जहां शेयर या इंडेक्स को ऊपर जाने में रुकावट आती है। ऐसा बिकवाली बढ़ने से होता है। रजिस्टेंस जोन पार करने पर तेजी की उम्मीद रहती है। नोट: सपोर्ट और रेजिस्टेंस के लेवल्स वेल्थ व्यू एनालिटिक्स की रिपोर्ट के अनुसार है। अब 5 फैक्टर्स जो बाजार की दिशा तय कर सकते हैं… 1. ईरान-इजराइल जंग से बनी ग्लोबल टेंशन अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष जारी है, जिससे स्ट्रैट ऑफ होर्मुज के पास अस्थिरता बनी हुई है। वॉशिंगटन अभी भी तेहरान के जवाब का इंतजार कर रहा है ताकि शांति वार्ता आगे बढ़ सके। इस भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारतीय बाजार के सेंटिमेंट्स पर पड़ेगा। 2. विदेशी निवेशकों (FIIs) की बिकवाली विदेशी निवेशक (FIIs) लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने ₹11,072 करोड़ के शेयर बेचे। मई महीने में अब तक यह आंकड़ा ₹14,231 करोड़ तक पहुंच गया है। 2026 में अब तक विदेशी निवेशक कुल ₹2.06 लाख करोड़ की निकासी कर चुके हैं। नोट: FIIs और DIIs की नेट खरीदारी/बिकवाली के आंकड़े करोड़ रुपए में हैं। 3. 400 से ज्यादा कंपनियों के तिमाही नतीजे निफ्टी की ज्यादातर बड़ी कंपनियां अपने नतीजे दे चुकी हैं, लेकिन अब मझोली कंपनियों की बारी है। अगले छह दिनों में 400 से ज्यादा कंपनियां जनवरी-मार्च तिमाही के नतीजे घोषित करेंगी। इनमें टाटा मोटर्स, भारती एयरटेल, सिप्ला, टाटा स्टील और केनरा बैंक जैसे बड़े नाम शामिल हैं। 4. कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें घरेलू बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। अगर तनाव बढ़ेगा तो तेल की कीमतें ऊपर जाएंगे। यह भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार के लिए निगेटिव होगा। 5. ग्लोबल बाजारों का भारत पर असर शुक्रवार को अमेरिकी बाजार बढ़त के साथ बंद हुए। नैस्डैक में 1.71% की तेजी रही। वहां चिप बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में सुधार और रोजगार के अच्छे आंकड़ों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। भारतीय बाजार सोमवार को अमेरिकी बाजारों की इस तेजी से संकेत ले सकते हैं। अगले हफ्ते के लिए टेक्निकल लेवल निफ्टी मास्टर कैपिटल सर्विसेज के रिसर्च हेड डॉ. रवि सिंह के मुताबिक, बाजार में अभी ‘बाय ऑन डिप्स’ की रणनीति अपनाई जा सकती है। उनके अनुसार, जब तक निफ्ती 24,000 के ऊपर बना हुआ है, तब तक रिकवरी की उम्मीद है। ऊपर की तरफ 24,500 पर कड़ा रेजिस्टेंस है। चॉइस ब्रोकिंग के टेक्निकल रिसर्च एनालिस्ट आकाश शाह ने कहा कि ऊपर की तरफ 24,500 और 24,600 पर रेजिस्टेंस है। वहीं, नीचे की तरफ 24,000 और 23,800 पर सपोर्ट दिख रहा है। अगर 23,800 का लेवल टूटता है, तो बिकवाली का दबाव और बढ़ सकता है। सेंसेक्स सेंसेक्स के नजरिए पर चॉइस इक्विटी के टेक्निकल रिसर्च एनालिस्ट हितेश टेलर ने कहा कि 76,800–77,000 के जोन में अच्छा सपोर्ट है। अगर बाजार गिरता है, तो इस लेवल पर खरीदारी लौट सकती है। वहीं, ऊपर की तरफ 78,000–78,300 के आसपास रेजिस्टेंस दिख रहा है। डिस्क्लेमर: ये लेख सिर्फ जानकारी के लिए है। ऊपर दी गई राय और सलाह व्यक्तिगत विश्लेषकों या ब्रोकिंग कंपनियों की हैं, न कि दैनिक भास्कर की। हम निवेशकों को सलाह देते हैं कि कोई भी निवेश फैसला लेने से पहले सर्टिफाइड विशेषज्ञों से सलाह जरूर लें।

अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामा का लेख:मां होने का अर्थ बच्चों को मुश्किलों से बचाना नहीं, उनसे लड़ना सिखाना है

अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामा का लेख:मां होने का अर्थ बच्चों को मुश्किलों से बचाना नहीं, उनसे लड़ना सिखाना है

मैंने नहीं सोचा था कि मां बनना मुझे एक साथ सबसे मजबूत और सबसे संवेदनशील दोनों महसूस कराएगा। बेटियों के आने के बाद मेरी जिंदगी का केंद्र बदल गया। मेरा हर फैसला, हर जॉब, हर रूटीन, हर जोखिम एक ही सवाल से गुजरने लगा- मैं उनके लिए कैसी दुनिया बनाने जा रही हूं? मेरी इच्छा थी कि मेरी बेटियां इस बात को समझते हुए बड़ी हों कि वे जैसी हैं, वैसी ही अच्छी हैं। वे बुद्धिमान, आत्मनिर्भर, अनुशासित, संवेदनशील हों और अपनी आवाज उठाने से भी न डरें। मैं नहीं चाहती थी कि मशहूर होना या व्हाइट हाउस में रहना उन्हें खास बना दे और वे जिम्मेदारियों से बचने लगें। बराक और मैं सजग थे। हमारी बेटियां बिस्तर खुद ठीक करती थीं। सफाई खुद करती थीं। मैं उन्हें कहती थी कि दुनिया खुद को तुम्हारे हिसाब से नहीं बदलेगी। मैं राजकुमारियां नहीं, जिम्मेदार इंसान तैयार करना चाहती थी। एक मां होने की सबसे कठिन बात यह समझना है कि आपका काम अस्थायी है। आप बच्चों की रक्षा करते हैं, उन्हें दिशा देते हैं, सुधारते हैं, उनकी चिंता करते हैं और फिर धीरे-धीरे आपको उन्हें छोड़ना पड़ता है। माता-पिता होने का अर्थ है बच्चों को आत्मनिर्भर बनने के लिए तैयार करना। यह दर्दनाक होता है, क्योंकि एक समय के बाद बच्चे पूरी तरह आपके नहीं रहते। वे अलग पहचान वाले इंसान बन जाते हैं। बेटियों के जन्म से पहले मैंने गर्भपात का दर्द झेला था। मैं आहत और शर्मिंदा महसूस करती थी। लगता था कि मैं असफल हो गई हूं। बाद में एहसास हुआ कि कितनी ही महिलाएं अपने भीतर कई दर्द लिए रहती हैं, जबकि बाहर से प्रकट करती हैं कि सबकुछ ठीक है। महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे यह सब चुपचाप सहें और फिर भी सहज और संतुलित दिखाई दें। और फिर लगातार बना रहने वाला अपराधबोध भी है। मां हमेशा खुद को असंभव पैमानों पर परखती रहती है। क्या मैं पर्याप्त समय दे रही हूं? क्या मैं बहुत सख्त हूं? या बहुत नरम? हमेशा कोई न कोई ऐसा दिखता है जो आपसे बेहतर तरीके से मां की भूमिका निभा रहा है। दूसरी तरफ मैंने कभी यह नहीं माना कि मां बनने का मतलब अपने व्यक्तित्व को मिटा देना है। मैं चाहती थी कि मेरी बेटियां मुझे एक पूर्ण इंसान के रूप में देखें, जिसकी अपनी महत्वाकांक्षाएं हों, जिम्मेदारियां हों, दोस्त हों, विचार हों और ऐसा काम हो जिसकी उसे गहरी परवाह हो। मां बनने ने मुझे बेहतर पेशेवर बनाया और पेशेवर जीवन ने मुझे बेहतर मां बनाया। आज बेटियों को बड़ा करना आसान नहीं है। वे ऐसी दुनिया में बढ़ रही हैं जो पहले से ज्यादा शोर, दबाव और दखल से भरी हुई है। सोशल मीडिया है, लगातार मूल्यांकन है, सौंदर्य मानक हैं, डर है और हर दिशा से लड़कियों पर पड़ता दबाव है। एक मां के रूप में आप बच्चों को इन सबसे पूरी तरह बचा नहीं सकतीं। लेकिन आप उन्हें मजबूत आधार दे सकती हैं। उन्हें आलोचनात्मक सोच, गरिमा और संघर्ष से उबरने की शक्ति सिखाती हैं। मैंने सीखा कि डर परवरिश का आधार नहीं हो सकता। हम बच्चों को सुरक्षित घेरे में बंद कर उनके रास्ते की हर बाधा नहीं हटा सकते। बच्चों को निराशा का अनुभव होना चाहिए। उन्हें जवाबदेही सीखनी चाहिए। उन्हें कभी-कभी असफल भी होना चाहिए ताकि वे दोबारा उठना सीख सकें। ताकत कठिनाइयों से बचने में नहीं आती। ताकत तब आती है जब आप कठिनाइयों से गुजरते हैं और उनसे उबरते हैं। मातृत्व के बारे में जो कुछ मैंने सीखा, उसका बड़ा हिस्सा मुझे अपनी मां मेरियन रॉबिन्सन से मिला। उन्होंने परिवार को स्थिरता दी। वे शांत रहती थीं और मुझे शांति बनाए रखने में अक्सर कठिनाई होती थी। उन्होंने मुझे सिखाया कि बच्चों को हर समय दखल की जरूरत नहीं होती। कई बार उन्हें सिर्फ सुरक्षा, ध्यान और बिना शर्त प्यार चाहिए होता है। समय के साथ मुझे एहसास हुआ कि मातृत्व राह दिखाने का नाम है। मेरा मानना है कि मांएं केवल परिवार नहीं बनातीं, वे भावनात्मक संस्कृति भी गढ़ती हैं। बच्चे दुनिया में जो मूल्य लेकर जाते हैं, उनकी शुरुआत घर से होती है। मातृत्व सुंदर है, लेकिन यह अनिश्चित, भावनात्मक और विनम्र बना देने वाला अनुभव भी है। कई बार मुझे खुद पर संदेह हुआ। लगा कि मैं सबको निराश कर रही हूं। लेकिन मां होने के एहसास ने मुझे ऐसी दृढ़ता सिखाई, जैसी किसी और अनुभव ने नहीं सिखाई। अगर एक चीज थी जो मैं अपनी बेटियों को देना चाहती थी, तो वह पूर्णता नहीं थी। वह था- अपनी कहानी को स्वीकार करने का आत्मविश्वास, अपनी आवाज पर भरोसा, असफलताओं से उबरने की क्षमता और दुनिया में यह जानते हुए आगे बढ़ना कि हम वास्तव में कौन हैं।

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा… ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा... ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार

Hindi News National Harsh Goenka, Harsh Goenka’s Article, Standing At A Turning Point In History… ‘Amar Sonar Bangla’ Is Not Just Nostalgia, It Deserves A Golden Future. हर्ष गोयनका. कोलकाता35 मिनट पहले कॉपी लिंक आरपीजी इंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका। – फाइल फोटो ‘समय बदलता है, जिंदगी कई मोड़ लेती है, लेकिन कुछ जगहें ऐसी हैं जो कभी साथ नहीं छोड़तीं। वे चुपचाप हमारी यादों, हमारी सोच और हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनी रहती हैं। ऐसी जगह मेरे लिए बंगाल है। यह मेरी जन्मभूमि है और आज भी ऐसी जगह है जो मुझे सुकून देती है, चाहे मैं दुनिया में कहीं भी चला जाऊं। संकरी गलियां, पुराने औपनिवेशिक भवन, दोपहर की खामोशी को चीरती ट्राम की घंटियां, स्कूल के मैदानों में गूंजती दोस्तों की हंसी, ये सब मेरी पहचान का हिस्सा हैं। मेरा बचपन बंगाल की उसी लय में बीता। मैदान में क्रिकेट, चाय पर गरमागरम बहस या बस उन सड़कों पर चलना जो कहानियों से भरी लगती थीं। सेंट जेवियर्स कॉलेज की कैंटीन में मेरे विचारों की दुनिया बसती थी। हम बहस करते थे, सवाल पूछते थे, सपने देखते थे। वो स्वर्णिम काल जब बंगाल सबसे आगे था बंगाल कभी भी सिर्फ भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। एक समय था जब यह पूरे भारत की औद्योगिक धड़कन था। हुगली नदी के किनारे खड़े जूट के कारखाने, हावड़ा के इस्पात संयंत्र, बर्नपुर की कोयला खदानें, ये सब इस राज्य की महत्वाकांक्षा के जीवित प्रतीक थे। आजादी के बाद के दो दशकों में पश्चिम बंगाल भारत के औद्योगिक रूप से सबसे विकसित राज्यों में गिना जाता था। चितरंजन में रेलवे इंजन बनते थे, दुर्गापुर में इस्पात ढलता था। टाटा, बिड़ला, सिंघानिया, मार्टिन बर्न जैसे व्यापारिक घराने यहीं से पले-बढ़े थे। कोलकाता भारत का व्यापारिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक मुख्यालय था। देश के किसी भी कोने में जाइए, ‘बंगाली बाबू’ की बुद्धिमत्ता और ‘कोलकाता के व्यापारी’ का रुतबा, दोनों का सम्मान होता था। वाम मोर्चा का लंबा अध्याय और उद्योग का पलायन फिर 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया। धीरे-धीरे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई जिसमें उद्योग को संदेह की नजर से देखा जाने लगा। तीन दशकों से ज्यादा चले इस शासन में श्रमिक आंदोलनों ने हिंसक रूप लिया, कारखानों में ‘काम बंद, हड़ताल जारी’ की संस्कृति जड़ें जमाने लगीं। उद्योगपतियों ने एक-एक करके कोलकाता छोड़ना शुरू किया। जो कारखाने कभी राज्य की शान थे, वे बंद होने लगे। निवेश मुंबई, दिल्ली और बाद में बेंगलुरु की ओर चला गया। वाम मोर्चे ने बौद्धिक गर्व तो बनाए रखा, लेकिन आर्थिक उद्यमिता को किनारे पर धकेल दिया। बंगाल में नया निवेश आना लगभग बंद हो गया। बंगाल के सर्वश्रेष्ठ दिमाग बाहर जाने लगे चाहे वो इंजीनियर, डॉक्टर, उद्यमी या कलाकार हों। यह उनकी पसंद नहीं, मजबूरी थी। तृणमूल का दौर- उम्मीदें, और फिर निराशा 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। जनता को उम्मीद थी कि अब बदलाव आएगा। और कुछ हद तक आया भी। बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ, कनेक्टिविटी बढ़ी। लेकिन उद्योग के मोर्चे पर जो होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। बंगाल बिजनेस समिट जैसे आयोजन भव्य होते रहे। हजारों करोड़ के निवेश के वादे, विदेशी प्रतिनिधिमंडल, बड़े मंच और चमकदार घोषणाएं। लेकिन जमीन पर उतरता क्या था? बहुत कम। और इसका सबसे बड़ा कारण था- जमीन। सिंगूर और नंदीग्राम का जख्म अभी भरा नहीं था। टाटा का नैनो प्रोजेक्ट, जो बंगाल के औद्योगिक पुनर्जन्म का प्रतीक बन सकता था, राजनीतिक हिंसा और अनिश्चितता की भेंट चढ़ गया। यह सिर्फ एक कारखाने का जाना नहीं था, यह एक संदेश था जो पूरे देश के निवेशकों तक पहुंचा कि बंगाल में पूंजी सुरक्षित नहीं है। उसके बाद से हर बड़े निवेशक ने बंगाल की फाइल खोलने से पहले दो बार सोचा। तृणमूल के शासन में राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक पक्षपात और एकाधिकार की शिकायतें भी बढ़ती रहीं। उद्योग को यह भरोसा कभी नहीं मिला कि सरकार उनकी साझेदार है। बंगाल फिर अवसरों की दौड़ में पीछे रहा। अब एक नई सुबह- भाजपा की जीत और उम्मीद का उजाला और अब, ऐतिहासिक चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में एक नई भावना जागी है। यह राजनीतिक बदलाव उस बंगाल की करवट है जो दशकों से सोया हुआ था। वो जानता था कि उसके भीतर कितनी ताकत है, लेकिन उसे मौका नहीं मिला। राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार को लेकर भाजपा जिस ‘डबल इंजन’ की बात करती रही है, उसका असली असर अब दिखना चाहिए। यह पल उम्मीद भी लाता है और जिम्मेदारी भी, लेकिन उम्मीद से काम नहीं चलता। नारों से कारखाने नहीं खुलते। इस बार बंगाल को ठोस और साहसी फैसले चाहिए। सबसे पहले जमीन का सवाल हल करना होगा- पारदर्शी, विवाद-मुक्त और डिजिटल। सिंगूर का सबक याद रहे। कोई भी निवेशक वहां नहीं जाता जहां उसकी जमीन कल छिन सकती है। दूसरा, प्रशासनिक संस्कृति बदलनी होगी। नौकरशाही को ‘ना’ कहने की आदत से ‘हां, और कैसे?’ की आदत में लाना होगा। तीसरा, केमिकल्स, फार्मास्यूटिकल्स, लेदर, फूड प्रोसेसिंग व पोर्ट-आधारित लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में जहां बंगाल की स्वाभाविक ताकत है, वहां केंद्रित निवेश लाना होगा। और सबसे बड़ा काम, प्रवासी बंगालियों को वापस जोड़ना। मुंबई के बोर्डरूम से लेकर सिलिकॉन वैली के स्टार्टअप तक, बंगाली प्रतिभा हर जगह है। उन्हें बुलाइए, भरोसा दीजिए, और उनके लिए घर वापसी को सार्थक बनाइए। वो बंगाल जो मेरे भीतर बसा है मेरे मन में फिर वही बंगाल उभरता है जो जिज्ञासु, संवेदनशील और संभावनाओं से भरा हुआ था। वो कोलकाता जहां दोपहर की धूप में चाय की चुस्की के साथ दुनिया बदलने की बातें होती थीं। वो बंगाल जो टैगोर की कविता में था, विवेकानंद के संकल्प में था, बोस की प्रयोगशाला में था। वो बंगाल मरा नहीं है। वो इंतजार कर रहा था। बंगाल पहले भी मुश्किलों से उबर चुका है, विभाजन से, हिंसा से, निराशा से। उसने हर बार अपनी आत्मा बचाई है। और आज, शायद हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं जहां से इतिहास मुड़ता है। भावना शुरुआत कर सकती है, लेकिन असली बदलाव के लिए उसे काम में बदलना होगा… और बदलना होगा बहस को निर्णय में, विचार को क्रियान्वयन में, और स्वप्न को वास्तविकता में। बंगाल

एक्टर विजय की शपथ में माता-पिता हाथ जोड़े रहे:पहली बार किसी नेता ने पैंट, शर्ट, सूट में शपथ ली, राहुल के साथ सेल्फी ली; 6 मोमेंट्स

एक्टर विजय की शपथ में माता-पिता हाथ जोड़े रहे:पहली बार किसी नेता ने पैंट, शर्ट, सूट में शपथ ली, राहुल के साथ सेल्फी ली; 6 मोमेंट्स

तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) चीफ और एक्टर से नेता बने सी जोसेफ विजय रविवार को तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं। शपथ के दौरान कुछ मोमेंट्स ऐसे भी रहे जो चर्चा में हैं। शपथ पत्र ना पढ़कर स्पीच देने लगे, जैसे ही बोला- ‘मैं जोसेफ विजय…..’ समर्थक 3 मिनट तक तालियां बजाते रहे। माता-पिता हाथ जोड़े दिखे। इस बीच गवर्नर ने टोक दिया। तमिलनाडु में शपथ के टॉप 5 मोमेंट्स… 1. सफेद शर्ट, ब्लैक पेंट और सूट में शपथ ली विजय ने शपथ ग्रहण समारोह के लिए ट्रेडिशनल धोती और शर्ट (वेष्टी)की बजाय फॉर्मल लुक को चुना। इससे पहले नेता पारंपरिक तमिल पहनावा को ही चुनते थे। एमजी रामचंद्रन हमेशा अपनी प्रसिद्ध टोपी, चश्मे और सफेद वेष्टी-शर्ट में शपथ लेते थे। एम करुणानिधि भी अपनी पीली शॉल और सफेद पारंपरिक पहनावे के लिए जाने जाते थे। उनका ये मॉडर्न लुक तमिलनाडु के युवाओं के साथ जुड़ने और बदलाव के लिए उनकी कोशिश का हिस्सा हो सकता है। 2. शपथ लेने के दौरान विजय को गवर्नर ने टोका एक्टर विजय ने तमिल भाषा में शपथ ली। विजय शपथ पत्र की जगह निर्धारित लाइनों के अलावा और बातें बोलने लगे। इस पर राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उन्हें टोक दिया। कहा कि वही पढ़ें जो लिखकर दिया है। इसके बाद इन्होंने लिखित शपथ पत्र को पढ़ा। गवर्नर ने उन्होंने शपथ के पहले और शपथ के बाद भी समझाया। 3. शपथ के दौरान विजय की माता-पिता हाथ जोड़े रहे विजय जब शपथ ले रहे थे तब उनके माता-पिता भावुक हो गए। दोनों हाथ जोड़कर उन्हें सुनते दिखे। पिता एसए चंद्रशेखर प्रसिद्ध तमिल फिल्म निर्देशक और निर्माता हैं। उनकी माता का नाम शोभा चंद्रशेखर है, जो एक जानी-मानी पार्श्व गायिका और लेखिका हैं। 4. शपथ पहली बार स्टेडियम में, समर्थक ताली बजाते रहे तमिलनाडु में आमतौर पर शपथ खुले मैदान में होती है। पहली बार ऐसा हुआ कि किसी सरकार ने शपथ ग्रहण के लिए स्टेडियम को चुना। एक्टर विजय जैसे शपथ पत्र के पहले शब्द, ‘मैं सी जोसेफ विजय ….’ बोला स्टेडियम तालियों से गूंज गया। उन्हें कुछ सेकेंड रुकना पड़ा और फिर शपथ पूरी की। 5. राहुल इकलौते बड़े नेता जो शपथ में पहुंचे रहे,सेल्फी ली शपथ ग्रहण समारोह में राहुल गांधी इकलौते बड़े नेता थे, जो मंच पर मौजूद रहे। विजय ने राहुल के साथ सेल्फी भी ली। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विजय 2009 में कांग्रेस ज्वाइन करना चाहते थे। वह विधायक का चुनाव लड़ना चाहते थे। इसके लिए वे दिल्ली मिलने पहुंचे थे, तब राहुल कांग्रेस में महासचिव थे। उस वक्त राहुल ने उन्हें सुझाव दिया था कि वे पहले यूथ कांग्रेस का चुनाव लड़कर खुद को साबित करें। विजय चेन्नई लौट आए और अपनी पार्टी बना ली। इसलिए उनका कांग्रेस से जुड़ाव रहा है। 6. सीएम बनते ही विजय ने 3 ऑर्डर दिए पहला ऑर्डर 200 यूनिट बिजली फ्री CM जोसेफ विजय ने शपथ के एक घंटे में 3 बड़े ऑर्डर जारी किए। उन्होंने घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 200 यूनिट फ्री बिजली देने वाली फाइल पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक विशेष बल बनाने वाली फाइल साइन की।

विजय ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में पहले आदेश पर हस्ताक्षर किए। यह क्या है? | भारत समाचार

Bangladesh Vs Pakistan 1st Test Day 3 Live Updates (AFP)

आखरी अपडेट:10 मई, 2026, 11:36 IST विजय ने नशीली दवाओं के खतरे से निपटने के लिए एक टास्क फोर्स और महिला सुरक्षा के लिए एक समर्पित बल स्थापित करने के आदेश पर भी हस्ताक्षर किए। चेन्नई स्टेडियम में विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के तुरंत बाद, थलपति विजय ने 200 मुफ्त यूनिट बिजली प्रदान करने के अपने पहले आदेश पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने नशीली दवाओं के खतरे से निपटने के लिए एक टास्क फोर्स और महिला सुरक्षा के लिए एक समर्पित बल स्थापित करने के आदेश पर भी हस्ताक्षर किए। शपथ ग्रहण समारोह पूरा होने के बाद तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर के चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम से निकलने के बाद विजय ने यह घोषणा की। अपने भाषण में उन्होंने कहा, “मैं इस राज्य की हर महिला को आश्वस्त करता हूं कि उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होगी और महिलाओं को निशाना बनाने वाले अपराधों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाएगी। नशीली दवाओं से प्रभावित लोगों को नहीं छोड़ा जाएगा। हम उन्हें बचाने और पुनर्वास करने और एक स्वस्थ समाज बनाने के लिए काम करेंगे।” विजय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि तमिलनाडु लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का सामना कर रहा है और कहा कि उनकी सरकार पारदर्शी सरकार के लिए एक श्वेत पत्र जारी करेगी, जिसमें जनता को तमिलनाडु की वर्तमान स्थिति के बारे में बताया जाएगा। उन्होंने कहा, “प्रशासन में प्रवेश करने के बाद ही कोई हमारे सामने मौजूद स्थिति और चुनौतियों को सही मायने में समझ सकता है। लेकिन मैं ईमानदारी और दृढ़ संकल्प के साथ तमिलनाडु को आगे ले जाना चाहता हूं।” मुख्यमंत्री ने लोगों से उनकी सरकार का समर्थन करने का आह्वान किया। “मुझे नहीं पता कि इस भावनात्मक क्षण में कैसे शुरुआत करूं या क्या कहूं। मैं किसी राजकुमार के परिवार से नहीं आया हूं। मैं आपके परिवार के सदस्य की तरह, आपके भाई की तरह आपके बीच से आया हूं। आपने मुझे प्यार से गले लगाया और मुझे सिनेमा में एक बड़ी जगह दी… मैंने जो भी दर्द और बाधा का सामना किया, आपने उसे अपना दर्द और बाधा महसूस की और इस पूरी यात्रा में मेरे साथ खड़े रहे। मैं भगवान का दूत नहीं हूं। मैं सिर्फ एक सामान्य इंसान हूं। लेकिन जब लोग मेरे साथ खड़े होते हैं, तो मेरा मानना ​​है कि हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं और हर चुनौती का सामना कर सकते हैं। एक साथ, जो कुछ भी आता है।” चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया विजय ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के रूप में पहले आदेश पर हस्ताक्षर किए। यह क्या है? अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)थलपति विजय मुख्यमंत्री(टी)तमिलनाडु राजनीति(टी)मुफ्त बिजली योजना(टी)200 मुफ्त यूनिट(टी)तमिलनाडु मुख्यमंत्री(टी)महिला सुरक्षा बल(टी)नशा-विरोधी कार्य बल(टी)कल्याण योजनाएं तमिलनाडु