आधी रात को फोन कर बुलाया, युवक को मारी गोली:पन्ना में ककरहाई हत्याकांड का खुलासा, खाने-पीने पर हुए विवाद में किया मर्डर; आरोपी गिरफ्तार

पन्ना के अमानगंज थाना क्षेत्र के ग्राम ककरहाई 22 फरवरी को गोली मारकर एक युवक की हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने मामले का खुलासा करते हुए आरोपी दीपेंद्र सिंह बुन्देला को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने युवक बलीराम चौधरी (22) की हत्या के आरोप में आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। उसके पास से हत्या में इस्तेमाल किया गया अवैध हथियार भी बरामद कर लिया गया है। तलाशी के दौरान लावारिश हालत में मिली बाइक पुलिस के अनुसार, मृतक बलीराम चौधरी 22 फरवरी की रात करीब 2 बजे एक फोन आने के बाद अपनी बाइक से घर से निकला था। सुबह तक वापस न लौटने पर परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की। तलाश के दौरान बलीराम की बाइक ग्राम खिरवा हार में लावारिस मिली। दाहिनी आंख में गोली लगने के मिले निशान बाइक के पास ही अमान सिंह बुन्देला के खेत की झोपड़ी के बाहर बलीराम का शव बरामद हुआ। मृतक की दाहिनी आंख में गोली लगने के निशान थे। घटना की सूचना मिलते ही थाना प्रभारी उप निरीक्षक रवि सिंह जादौन के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित की गई। खाने-पीने को लेकर दोनों में हुआ विवाद, दोस्त ने मारी गोली जांच के दौरान पुलिस ने डॉग स्क्वॉड और फिंगर प्रिंट विशेषज्ञों की मदद ली। गहन छानबीन के बाद पुलिस ने आरोपी दीपेंद्र सिंह बुन्देला को गिरफ्तार किया। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि उसने बलीराम को आधी रात को फोन कर बुलाया था। खाने-पीने को लेकर हुए विवाद के बाद उसने बलीराम की आंख में गोली मार दी। परिजनों ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए किया था चक्काजाम हत्या की जानकारी मिलने के बाद मृतक के परिजनों और ग्रामीणों में आक्रोश फैल गया। उन्होंने अमानगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर सैकड़ों की संख्या में एकत्र होकर चक्काजाम किया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि आरोपी को जल्द गिरफ्तार कर कड़ी सजा दी जाए। उन्होंने मृतक की पत्नी के लिए जीवन निर्वाह भत्ते की भी मांग की, क्योंकि बलीराम चौधरी ही अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। करीब दो घंटे तक चले प्रदर्शन के बाद पुलिस के आश्वासन पर मामला शांत हुआ। झाड़ियों में छिपाकर रखा गया देसी कट्टा भी जब्त पुलिस को सूचना मिली कि घटना के समय संदेही दीपेंद्र सिंह बुंदेला को घटनास्थल के आसपास देखा गया था। जब संदेही को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई, तो उसने अपना जुर्म कुबूल कर लिया। आरोपी की निशानदेही पर झाड़ियों में छिपाकर रखा गया 12 बोर का देसी कट्टा और खाली खोखे बरामद किए गए। मृतक के अनुसूचित जाति वर्ग से होनी की वजह से पुलिस ने हत्या (धारा 103(1) BNS) के साथ-साथ SC/ST एक्ट और आर्म्स एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। आरोपी को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया है। एएसपी बोली खाने-गुस्से में आकर किया मर्डर जब इस पूरे मामले पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक वंदना सिंह चौहान से बात की गई तो उन्होंने बताया कि मृतक बलिराम चौधरी और आरोपी दीपेंद्र सिंह बुंदेला के बीच खाने-पीने की किसी बात को लेकर विवाद हुआ था जिसके बाद आरोपी ने आवेश में आ कर बलिराम की हत्या कर दी थी।
वॉकिंग क्रिकेट, खिलाड़ियों को मिल रहा ‘बैजबॉल’ का मजा:ब्रिटेन में 87 की उम्र तक के लोग खेल रहे; बैटर आउट होने के बाद भी खेलता रहता है, आधा रन लेने की छूट

इंग्लैंड के दिग्गज तेज गेंदबाज जेम्स एंडरसन ने एक बार ‘बैजबॉल’ को परिभाषित करते हुए कहा था कि यह खेल को वैसे खेलने की कोशिश है, जैसा हमने बचपन में कल्पना की थी- रोमांचक, तेज और मजेदार। दिलचस्प बात यह है कि इस सोच की सबसे सजीव और भावुक झलक अब इंग्लैंड के लीजर सेंटरों और खेल के मैदानों पर दिख रही है, जहां 50 से 87 साल तक के लोग ‘वॉकिंग क्रिकेट’ के जरिए खेल का नया आनंद ले रहे हैं। वॉकिंग क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि अकेलेपन के खिलाफ प्रभावी हथियार है। केंट क्रिकेट कम्युनिटी ट्रस्ट की प्रोजेक्ट ऑफिसर एमी इलिज के अनुसार, हर काउंटी में इसकी टीमें फल-फूल रही हैं। लॉर्ड्स के इंडोर स्कूल में पहला इंटर-काउंटी वॉकिंग क्रिकेट फेस्टिवल आयोजित हुआ, जिसने इसकी बढ़ती लोकप्रियता पर मुहर लगा दी। केंट के फोकस्टोन स्थित थ्री हिल्स स्पोर्ट्स सेंटर में वॉकिंग क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, सामुदायिक जुड़ाव का मंच बन चुका है। यहां 87 वर्ष तक के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। सुनने में दिक्कत, डिमेंशिया या गतिशीलता संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोग भी बिना झिझक मैदान में उतरते हैं। आधा रन लेने जैसी छूट इसे और रोचक बनाती है। इस खेल ने कई जिंदगियों को नई दिशा दी है। 62 वर्षीय कप्तान मार्क कहते हैं कि यहां प्रतिभा से ज्यादा भागीदारी और खुशी मायने रखती है। साल 2022 में दोनों घुटनों के ऑपरेशन के बाद ग्राहम दो स्टिक के सहारे चलते थे। वॉकिंग क्रिकेट से जुड़ने के महज 18 महीनों में उनका वजन एक-चौथाई कम हो गया और उन्होंने एक ओवर में छह छक्के जड़कर सबको हैरान कर दिया। सेना के दिनों में माल्टा के लिए खेल चुके जॉन कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद इस खेल ने उन्हें नई जिंदगी दी है। कई बार खिलाड़ियों को यह भी याद नहीं रहता कि मैच कौन जीता क्योंकि यहां जीत से ज्यादा मायने मुस्कान के हैं। क्या है वॉकिंग क्रिकेट और नियम – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस खेल में दौड़ने की सख्त मनाही है। यह क्रिकेट का एक धीमा, सुरक्षित और सरल प्रारूप है, जिसे विशेष रूप से बुजुर्गों और चलने-फिरने में परेशानी (मोबिलिटी इश्यूज) का सामना कर रहे लोगों के लिए डिजाइन किया गया है। – इसमें चोट के जोखिम को कम करने के लिए लेदर बॉल की जगह सॉफ्ट बॉल और अक्सर प्लास्टिक के उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। – गेंदबाज चलकर गेंद फेंकता है, फील्डर चलकर गेंद पकड़ते हैं और बल्लेबाज रन लेने के लिए दौड़ता नहीं, बल्कि चलता है। सबसे मजेदार नियम यह है कि बल्लेबाज आउट होने के बाद भी खेलता रहता है, बस गेंदबाज टीम को बोनस के रूप में पांच रन मिल जाते हैं।
वॉकिंग क्रिकेट, खिलाड़ियों को मिल रहा ‘बैजबॉल’ का मजा:ब्रिटेन में 87 की उम्र तक के लोग खेल रहे; बैटर आउट होने के बाद भी खेलता रहता है, आधा रन लेने की छूट

इंग्लैंड के दिग्गज तेज गेंदबाज जेम्स एंडरसन ने एक बार ‘बैजबॉल’ को परिभाषित करते हुए कहा था कि यह खेल को वैसे खेलने की कोशिश है, जैसा हमने बचपन में कल्पना की थी- रोमांचक, तेज और मजेदार। दिलचस्प बात यह है कि इस सोच की सबसे सजीव और भावुक झलक अब इंग्लैंड के लीजर सेंटरों और खेल के मैदानों पर दिख रही है, जहां 50 से 87 साल तक के लोग ‘वॉकिंग क्रिकेट’ के जरिए खेल का नया आनंद ले रहे हैं। वॉकिंग क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि अकेलेपन के खिलाफ प्रभावी हथियार है। केंट क्रिकेट कम्युनिटी ट्रस्ट की प्रोजेक्ट ऑफिसर एमी इलिज के अनुसार, हर काउंटी में इसकी टीमें फल-फूल रही हैं। लॉर्ड्स के इंडोर स्कूल में पहला इंटर-काउंटी वॉकिंग क्रिकेट फेस्टिवल आयोजित हुआ, जिसने इसकी बढ़ती लोकप्रियता पर मुहर लगा दी। केंट के फोकस्टोन स्थित थ्री हिल्स स्पोर्ट्स सेंटर में वॉकिंग क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, सामुदायिक जुड़ाव का मंच बन चुका है। यहां 87 वर्ष तक के खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। सुनने में दिक्कत, डिमेंशिया या गतिशीलता संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोग भी बिना झिझक मैदान में उतरते हैं। आधा रन लेने जैसी छूट इसे और रोचक बनाती है। इस खेल ने कई जिंदगियों को नई दिशा दी है। 62 वर्षीय कप्तान मार्क कहते हैं कि यहां प्रतिभा से ज्यादा भागीदारी और खुशी मायने रखती है। साल 2022 में दोनों घुटनों के ऑपरेशन के बाद ग्राहम दो स्टिक के सहारे चलते थे। वॉकिंग क्रिकेट से जुड़ने के महज 18 महीनों में उनका वजन एक-चौथाई कम हो गया और उन्होंने एक ओवर में छह छक्के जड़कर सबको हैरान कर दिया। सेना के दिनों में माल्टा के लिए खेल चुके जॉन कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद इस खेल ने उन्हें नई जिंदगी दी है। कई बार खिलाड़ियों को यह भी याद नहीं रहता कि मैच कौन जीता क्योंकि यहां जीत से ज्यादा मायने मुस्कान के हैं। क्या है वॉकिंग क्रिकेट और नियम – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस खेल में दौड़ने की सख्त मनाही है। यह क्रिकेट का एक धीमा, सुरक्षित और सरल प्रारूप है, जिसे विशेष रूप से बुजुर्गों और चलने-फिरने में परेशानी (मोबिलिटी इश्यूज) का सामना कर रहे लोगों के लिए डिजाइन किया गया है। – इसमें चोट के जोखिम को कम करने के लिए लेदर बॉल की जगह सॉफ्ट बॉल और अक्सर प्लास्टिक के उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है। – गेंदबाज चलकर गेंद फेंकता है, फील्डर चलकर गेंद पकड़ते हैं और बल्लेबाज रन लेने के लिए दौड़ता नहीं, बल्कि चलता है। सबसे मजेदार नियम यह है कि बल्लेबाज आउट होने के बाद भी खेलता रहता है, बस गेंदबाज टीम को बोनस के रूप में पांच रन मिल जाते हैं।
सेलिब्रिटी शेफ ने DM-SSP की पत्नी को खाना बनाना सिखाया:पहली नौकरी में होटल खाली रहता था; तभी से ट्रेनिंग देते हुए खाना-खजाना का सफर शुरू हुआ

इंडियन सेलिब्रिटी शेफ संजीव कपूर ने बताया कि जब बनारस के एक होटल में उनकी पहली नौकरी लगी थी, तब वहां के डीएम और एसएसपी की पत्नियों को खाना बनाना सिखाया। कपूर ने बताया कि डीएम और एसएसपी अपनी पत्नियों के साथ होटल में खाना खाने आए थे। उनकी पत्नियों ने खाना सिखाने की गुजारिश की। तब मैंने जीवन में पहली बार किसी को खाना बनाना सिखाया था। तभी लगा कि आगे भी लोगों को ट्रेनिंग देनी चाहिए। वहीं से करियर ने नया मोड़ लिया और आज वे दुनिया भर में मशहूर हैं। दरअसल, संजीव कपूर एक निजी कार्यक्रम को लेकर मंगलवार को उदयपुर आए थे, इस दौरान भास्कर ने उनसे बातचीत की। उन्होंने खाने के बदलते ट्रेंड्स और हेल्दी फूड पर अपने अनुभव साझा किए। सवाल: आपका उदयपुर कैसे आना हुआ? संजीव कपूर: पिछले कुछ सालों में उदयपुर में डेस्टिनेशन वेडिंग का ट्रेंड काफी बढ़ा है। हमें पता चलता रहता है कि कभी इसकी शादी है, उसकी शादी है। सारी बड़ी शादियां उदयपुर में हो रही हैं। इस समय भी एक शादी हो रही है, लेकिन मैं यहां आराम करने आया हूं। उदयपुर में वर्ल्ड क्लास होटल्स हैं, लोग भी बहुत अच्छे हैं। हर कोई यहां आने का बहाना ढूंढ़ता है। मेरा मानना है कि लोगों को विदेश घूमने से बेहतर इंडिया घूमना चाहिए। भारत का टूरिज्म हर स्तर पर बढ़ना चाहिए। दुनिया भर से यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या कम हो गई है, लेकिन घरेलू टूरिज्म बढ़ा है। सवाल: आपने एक शेफ के तौर पर अपनी पहचान बनाई, फिर टीवी, किताबों और उद्योग की दुनिया में कदम रखा। इस सफर के पीछे क्या प्रेरणा रही? संजीव कपूर: खाना ऐसा फील्ड है जो मेरा बिजनेस है। जिसे मैं और आगे बढ़ाउंगा। जब मैंने होटल में शेफ के तौर पर काम शुरू किया, तो सीढ़ियां चढ़ता गया और धीरे-धीरे टॉप पर पहुंच गया। 28 साल की उम्र में मुझे बेस्ट एग्जीक्यूटिव शेफ ऑफ द कंट्री का अवॉर्ड मिला। समय के साथ कुछ न कुछ नया होता गया, पहले टीवी, फिर इंटरनेट, किताबें, प्रोडक्ट्स और रेस्टोरेंट। जीवन में आप कुछ भी करें, तो उसे अच्छे से करने की कोशिश करें। मैंने भी वही किया। सवाल: बीते कुछ सालों में इंडियन फूड का ट्रेंड बदला है। जेन जी की नई-नई पसंद है। हमारा किचन भी बदला है। इसको आप किस तरह से देखते हैं? संजीव कपूर: समय के साथ बदलाव जरूरी है और होगा भी, चाहे हम कितना भी विरोध करें। चेंज हमेशा होता है। लोग कितना भी कहें कि ये सही है या गलत, लेकिन हमें जजमेंटल नहीं होना चाहिए। ढाई अरब साल पहले डार्विन थ्योरी की बात करें, तो आज हम इंसान हैं, पहले बंदर थे। समय के साथ बदलाव आएगा। जिस समय में आप हैं, वही सबसे अच्छा समय है। सवाल: आपने बनारस में एक होटल से अपना कॅरियर शुरू किया। जहां से आप अपने खाना खजाना और ट्रेनिंग देने, सिखाने की शुरुआत कैसे मानते हैं? संजीव कपूर: जब बनारस में मेरी पहली जॉब लगी, तब गर्मियों में होटल की ऑक्यूपेंसी कम होती थी। हमारे होटल में उस वक्त के डीएम और एसएसपी अपनी पत्नियों के साथ खाना खाने आए थे। पत्नियों ने कहा कि हमारी नई शादी हुई है, हमें खाना बनाना नहीं आता। आप सिखा सकते हैं? मैंने सोचा होटल खाली है, तो कोई दिक्कत नहीं। वहां पहली बार किसी को खाना बनाना सिखाया। तभी सिखाने की ललक जागी। फिर धीरे-धीरे ट्रेनिंग देते हुए खाना खजाना का सफर शुरू हुआ। लोगों को खाना बनाना सिखाने की शुरुआत वहीं से हुई। बीज वहीं से पड़ा। सवाल: आपके अनुभव के अनुसार आज के दौर में एक सफल शेफ बनने के लिए कौन सी तीन बातें सबसे जरूरी है? संजीव कपूर: किसी भी फील्ड की स्किल सीखनी पड़ती हैं। चाहे म्यूजिक हो, क्रिकेट हो या कोई और। उसमें नियमित रियाज या ट्रेनिंग जरूरी है। दूसरा, उस फील्ड की गहरी जानकारी होनी चाहिए, ताकि और बेहतर कर सकें। तीसरा, सबसे जरूरी वैल्यू सिस्टम, जो घर में माता-पिता, स्कूल में टीचर या दोस्त सिखाते हैं: हार्ड वर्क करो, ईमानदारी से काम करो। ये तीन चीजें अगर करें, तो दुनिया का बेस्ट बनने से कोई नहीं रोक सकता। सवाल: पीएम मोदी भी ज्यादा ऑयल का सेवन नहीं करने का आह्वान कर चुके। आज की लाइफस्टाइल में कम तेल और मसालों के कैसे हेल्दी खाना बनाया जा सकता है? संजीव कपूर: हम नमक और चीनी बहुत ज्यादा खाते हैं। मसालों के साथ तेल भी कम करना चाहिए। घर का खाना सब्जी में ज्यादा तेल डालने से स्वादिष्ट नहीं बनता। गोल गप्पे के पानी में तेल कहां है, लेकिन स्वाद आता है। कभी-कभी ये चीजें ठीक हैं, लेकिन हमेशा कचौड़ी-समौसा या फ्रेंच फ्राइज खाना गलत है। अति कभी न करें। जंक फूड खाना है तो घर में बनाकर खाएं, बाजार से बेहतर होगा। घर में कम तेल में खाना बनाएं। आजकल ऐसे बर्तन हैं जिनमें तेल की जरूरत ही नहीं। सवाल: कई तरह की नई-नई डिशेज मार्केट में आती है जो लोगों को पसंद भी आती है। इनके डिजाइन और क्रिएशन के पीछे क्या विशेष होमवर्क होता है? संजीव कपूर: खाने में क्रिएटिविटी से पहले आप उसे विजुअलाइज करते हैं। आंख बंद करके सोचते हैं कि कैसा होगा। खाने में सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि दिखता कैसे है, खुशबू कैसी है, आवाज में क्रंची है या नहीं, सारे सेंस काम करते हैं। मैं एक शाम होटल के बाहर बैठा सूर्यास्त देख रहा था। उसके रंगों को सोचा कि प्लेट में कितने अच्छे लगेंगे। वो रंग टमाटर से नहीं आएंगे। लाल शिमला मिर्च भूनकर ग्रेवी बनाऊं तो वैसा रंग आएगा। ये विजुअलाइजेशन है। आप पेंटर है तो उसे ये स्किल आनी चाहिए कि पीला और नीला रंग मिलाएंगे तो हरा हो जाएगा। नमक डालो तो नमकीन, मीठी चीज में जरा सा नमक तो मिठास बढ़ जाती है। ये खाने का साइंस है। सवाल: भारतीय कुकिंग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए आप आने वाले वर्षों में किस दिशा में काम करना चाहेंगे? संजीव कपूर: मैं काफी सालों से इंडियन फूड का प्रचार कर रहा हूं। इसमें नई नई चीजें जोड़ी। इसमें मिलिट्स की बात शुरू हुई तो वर्ष 2017 में मिलिट्स की खिचड़ी
‘भूत बंगला’ का पहला गाना ‘रामजी आके भला करेंगे’ रिलीज:अक्षय कुमार क्लासिक कॉमिक अंदाज में नजर आए; गाने में हाई-एनर्जी विजुअल्स, भूतिया माहौल दिखा

फिल्म ‘भूत बंगला’ के पहले गाने ‘राम जी आके भला करेंगे’ को मेकर्स ने रिलीज कर दिया है। गाने में अक्षय कुमार अपने क्लासिक कॉमिक अंदाज में नजर आ रहे हैं। वीडियो में हाई-एनर्जी विजुअल्स, भूतिया माहौल और तेज बीट्स देखने को मिलती हैं। बता दें कि गाने ‘राम जी आके भला करेंगे’ को प्रीतम ने कंपोज किया है, जबकि इसके लिरिक्स कुमार ने लिखे हैं। गाने को अरमान मलिक और आरवन (देव अरिजीत) ने आवाज दी है। वहीं, मेलो डी द्वारा लिखा और परफॉर्म किया गया रैप सेगमेंट ट्रैक में कंटेम्परेरी टच जोड़ता है। देखें गाने ‘राम जी आके भला करेंगे’ की झलक गाने को दर्शकों से पॉजिटिव रिएक्शन मिल रहा गाने ‘रामजी आके भला करेंगे’ को लेकर सोशल मीडिया पर जबरदस्त उत्साह देखने को मिल रहा है। फैंस अक्षय कुमार की क्लासिक कॉमिक एनर्जी और स्क्रीन प्रेजेंस की जमकर तारीफ कर रहे हैं। कुछ ने इसे “OG खिलाडी एनर्जी” कहा, तो कई दर्शकों ने गाने को “चार्टबस्टर” करार दिया। यूट्यूब पर कमेंट्स में नॉस्टैल्जिया भी साफ झलक रहा है, जहां लोग प्रियदर्शन-अक्षय की पुरानी कॉमेडी फिल्मों को याद कर रहे हैं। हाई-एनर्जी बीट्स, फनी विजुअल्स और एंटरटेनमेंट फैक्टर को दर्शकों ने खूब पसंद किया है। कुल मिलाकर, गाने को पॉजिटिव और एंगेजिंग रिस्पॉन्स मिल रहा है। फिल्म 10 अप्रैल को रिलीज होगी गौरतलब है कि फिल्म ‘भूत बंगला’ को 2026 की बहुप्रतीक्षित फिल्मों में गिना जा रहा है। 14 साल बाद अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की हिट जोड़ी बड़े पर्दे पर साथ लौट रही है। दोनों ने पहले ‘हेरा फेरी’, ‘भागम भाग’ और ‘गरम मसाला’ जैसी सुपरहिट कॉमेडी फिल्में दी हैं, जिससे दर्शकों में खास उत्साह है। फिल्म 10 अप्रैल को रिलीज होगी। फिल्म को बालाजी मोशन पिक्चर्स और केप ऑफ गुड फिल्म्स मिलकर प्रेजेंट कर रहे हैं। फिल्म में अक्षय कुमार के साथ वामिका गब्बी, परेश रावल, तब्बू और राजपाल यादव नजर आएंगे। फिल्म का निर्देशन प्रियदर्शन ने किया है। इसे अक्षय कुमार, शोभा कपूर और एकता आर कपूर ने प्रोड्यूस किया है।
मनी-लॉन्ड्रिंग केस में ED के सामने पेश हुए अनिल अंबानी:₹40 हजार करोड़ का बैंक कर्ज; ₹3,716 करोड़ का बंगला 'अबोड' कुर्क

रिलायंस ग्रुप के पूर्व चेयरमैन अनिल अंबानी आज 26 फरवरी को दिल्ली में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के सामने पेश हुए। अंबानी सुबह करीब 11 बजे जांच एजेंसी के दफ्तर पहुंचे, जहां उनसे विदेशी मुद्रा नियमों के उल्लंघन और फंड के डायवर्जन को लेकर सवाल-जवाब किए जा रहे हैं। मामला सरकारी बैंकों से उनकी कंपनियों को मिले लोन में कथित गड़बड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है। सीबीआई की 2019 की FIR के आधार पर ED इस मामले की जांच कर रही है। एक दिन पहले ही जांच एजेंसी ने मुंबई के उनके 17 मंजिला घर ‘अबोड’ को कुर्क कर दिया था। सवालों के जवाब में समझें पूरा मामला… 1. अनिल अंबानी आज ED दफ्तर क्यों गए थे? अनिल अंबानी रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूछताछ के दूसरे दौर के लिए पहुंचे हैं। आरोप है कि उनकी कंपनियों ने बैंकों से लिए लोन का डायवर्जन किया और विदेशी मुद्रा नियमों का उल्लंघन किया। इससे पहले अगस्त 2025 में उनसे पूछताछ हुई थी। 2. RCOM और उनकी कंपनियों पर कुल कितना कर्ज है? ED के मुताबिक, रिलायंस कम्युनिकेशंस और उसकी ग्रुप कंपनियों ने देशी और विदेशी बैंकों से भारी कर्ज लिया था। वर्तमान में इन कंपनियों पर कुल बकाया ₹40,185 करोड़ है। 3. उनके मुंबई वाले घर ‘अबोड’ को कुर्क क्यों किया गया है? बैंकों से लिए गए कर्ज की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी जांच के कारण इस बंगले को अस्थाई तौर पर कुर्क किया गया है। ये घर मुंबई के पॉश पाली हिल इलाके में स्थित है। अनिल अंबानी के इस 17 मंजिला घर की कीमत ₹3,716 करोड़ बताई गई है। 4. ‘प्रोविजनल अटैचमेंट’ का क्या मतलब होता है? प्रोविजनल अटैचमेंट का मतलब है कि प्रॉपर्टी को कानूनी रूप से ‘फ्रीज’ कर दिया गया है ताकि आरोपी उसे बेचकर भाग न सके। जांच पूरी होने तक वे इस घर को किसी को ट्रांसफर भी नही कर सकते हैं। अगर कोर्ट में आरोप साबित हो जाते हैं, तब प्रॉपर्टी कब्जे में ले ली जा सकती है। 5. क्या इस घर का कुछ हिस्सा पहले भी कुर्क हुआ था? हां, नवंबर 2025 में इसी केस में ED ने इसी प्रॉपर्टी का एक हिस्सा कुर्क किया था, जिसकी कीमत ₹473.17 करोड़ थी। अब पूरी इमारत को इस कार्रवाई के दायरे में ले लिया गया है। 6. अब तक इस केस में कुल कितनी संपत्ति कुर्क की जा चुकी है? इस केस में कुर्क की गई कुल संपत्तियों की वैल्यू लगभग ₹15,700 करोड़ तक पहुंच गई है। ED प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत यह कार्रवाई कर रही है। 7. अनिल अंबानी की मुश्किलें अचानक इतनी क्यों बढ़ गईं? सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद, जांच एजेंसी ने अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (ADAG) के खिलाफ बैंक धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं के कई मामलों की जांच के लिए एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया है। इसी वजह से जांच में अब तेजी आई है। 8. क्या मुकेश अंबानी का इस केस से कोई संबंध है? नहीं। अनिल अंबानी एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी के छोटे भाई हैं, लेकिन दोनों का बिजनेस साम्राज्य 20 साल पहले अलग हो चुका है। यह केस पूरी तरह से अनिल अंबानी के ग्रुप और उनकी कंपनियों के मैनेजमेंट से जुड़ा है। मुकेश अंबानी इसमें शामिल नहीं है। 9. आगे क्या हो सकता है? अनिल अंबानी के बयानों और कंपनी के दस्तावेजों का मिलान किया जाएगा। अगर गड़बड़ी के पुख्ता सबूत मिलते हैं, तो आने वाले समय में गिरफ्तारी या नई चार्जशीट दाखिल हो सकती है।
बाजरा मोमोज रेसिपी: मैदा नहीं, अब घर में बनाएं बाजरे के आटे मोमोज, सेहत को भी नहीं होगा नुकसान; बनाना भी बहुत आसान है

यहां लोग मैदा से बनी नेवी से दूरी बना रहे हैं और दस्तावेज विकल्प अपनाना चाहते हैं। ऐसे में अगर आपको मोमोज़ पसंद हैं, तो आप घर पर बाज़ार के टिकट से आसानी से मोमोज़ बना सकते हैं। ये मोमोज स्वाद में तो लाजवाब होते हैं, साथ ही सेहत के लिए भी काफी लाजवाब होते हैं। बाजरा, आयरन और आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति होती है, जो पाचन को बेहतर बनाता है और लंबे समय तक पेट भरा रहता है। तो जानिए क्या है बाजार के आटे से मोमोज़ बनाने की सबसे आसान विधि – बाजरे के मोमोज के फायदे क्या हैं? बाजरे के मोमोज के लिए आवश्यक सामग्री आटा गूंथने के लिए: सामग्री के लिए: बाजरे के मोमोज बनाने की आसान विधि अन्य खास टिप्स बाजरे के मोमोज़ स्वाद और सेहत के बेहतरीन मेल हैं। उदाहरण के तौर पर आप ब्रेकफ़ास्ट, बांसुरी या वैश्या रेस्तरां में भी खा सकते हैं। अगली बार जब मोमोज खाने का मन करे, तो मैदा ठीक कर लें यह क्लासिक रेसिपी जरूर ट्राई कर सकते हैं। (टैग्सटूट्रांसलेट) बाजरा मोमोज कैसे बनाएं(टी)मोमोज रेसिपी(टी)बाजरा मोमोज(टी)स्वस्थ आहार युक्तियाँ(टी)स्वस्थ मोमोज(टी)बाजरा मोमोज रेसिपी
छतरपुर में सिलेंडर फटने से घर में आग:लाखों का सामान और कैश जला, खाना बनाते समय हादसा

छतरपुर जिले के गढ़ीमलहरा थाना क्षेत्र के ग्राम कुर्राहा में बुधवार शाम एक मकान में सिलेंडर फटने से आग लग गई। इस घटना में घर का लाखों का सामान और नकदी जलकर राख हो गई। हालांकि, परिवार के सदस्यों को समय रहते सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जिससे कोई जनहानि नहीं हुई। पीड़ित परिवार को करीब ढाई से तीन लाख रुपए का नुकसान होने का अनुमान है। यह घटना कुर्राहा निवासी सफीक खान के घर में शाम लगभग 6:30 से 7:00 बजे के बीच हुई। सफीक खान की पत्नी रसोई में खाना बना रही थीं, तभी अचानक गैस सिलेंडर में आग लग गई। घर में मौजूद महिलाओं ने आग बुझाने का प्रयास किया, लेकिन आग तेजी से फैलती चली गई। कुछ ही देर में सिलेंडर में जोरदार धमाका हुआ, जिसके बाद पूरे मकान में आग फैल गई। दो लाख का नुकसान हुआ धमाके की आवाज सुनकर आसपास के ग्रामीण तुरंत मौके पर पहुंचे और परिवार के सदस्यों को सुरक्षित बाहर निकालने में मदद की। आग की लपटों ने घर के अंदर रखे सभी सामान को अपनी चपेट में ले लिया। परिवार के अनुसार, इस अग्निकांड में लगभग दो लाख रुपए नकद, फ्रिज, टीवी, पलंग, गोदरेज अलमारी और दैनिक उपयोग का अन्य सारा सामान जलकर नष्ट हो गया। घटना की सूचना तत्काल डायल 112 पर दी गई। पुलिस टीम मौके पर पहुंची और स्थिति का जायजा लिया। ग्रामीणों ने प्रशासन से पीड़ित परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करने की मांग की है।
अधिकतर इंजेक्शन नसों में ही क्यों लगाए जाते हैं? क्या इससे जल्दी असर होता है या कोई अन्य वजह, डॉक्टर से समझिए

Why IV Injections Work Faster: जब भी किसी व्यक्ति की तबीयत खराब होती है, तो डॉक्टर दवाएं लेने की सलाह देते हैं. कुछ दवाएं गोली या कैप्सूल की फॉर्म में होती हैं, जबकि कुछ ड्रग्स इंजेक्शन के जरिए दिए जाते हैं. अक्सर आपने देखा होगा कि इमरजेंसी कंडीशन में जब मरीज को अस्पताल में भर्ती किया जाता है, तब डॉक्टर सबसे पहले इंट्रावेनस (IV) ड्रिप लगा देते हैं. इसके जरिए मरीज को दवाएं, सलाइन और ग्लूकोज दिया जाता है. अधिकतर मरीजों का ट्रीटमेंट अब ओरल ड्रग्स के बजाय इंजेक्टिबल ड्रग्स के जरिए किया जा रहा है. यह तरीका इलाज में ज्यादा असरदार माना जा रहा है. आपने देखा होगा कि कई इंजेक्शन लोगों की नसों में लगाए जाते हैं, जबकि कुछ मसल्स में इंजेक्ट किए जाते हैं. डॉक्टर्स बताते हैं कि नसों में दिए जाने वाले इंजेक्शन को इंट्रावेनस (IV) इंजेक्शन कहा जाता है, जबकि मांसपेशियों में लगाए जाने वाले इंजेक्शन को इंट्रामस्क्युलर कहा जाता है. अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि ज्यादातर इंजेक्शन नसों में ही क्यों लगाए जाते हैं? क्या इससे दवा जल्दी असर करती है या इसके पीछे कोई और मेडिकल कारण होता है? इन सभी सवालों के जवाब लखनऊ के मेदांता हॉस्पिटल के इमरजेंसी डिपार्टमेंट के हेड डॉ. लोकेंद्र गुप्ता से समझने की कोशिश करते हैं. नसों में इंजेक्शन लगाने की क्या है वजह? डॉक्टर लोकेंद्र ने News18 को बताया कि नसों में इंजेक्शन इसलिए लगाया जाता है, ताकि दवा का असर जल्दी हो सके. जब दवा सीधे नस के जरिए दी जाती है, तो वह तुरंत ब्लड स्ट्रीम में मिल जाती है और पूरे शरीर में तेजी से पहुंचती है. ओरल टेबलेट्स को पेट और लिवर से होकर गुजरना पड़ता है. इससे दवा का असर होने में काफी वक्त लगता है और कई बार असर कम भी हो जाता है. नस में इंजेक्ट की गई दवा इस पूरी प्रक्रिया को बायपास कर देती है. इससे इमरजेंसी कंडीशन जैसे- हार्ट अटैक, स्ट्रोक, एलर्जी रिएक्शन या गंभीर संक्रमण में जल्द असर दिखता है और मरीज की कंडीशन स्टेबल हो जाती है. एक्सपर्ट के अनुसार कुछ ओरल दवाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें खाने से उनका असर सही तरीके से नहीं होता है या पाचन तंत्र उन्हें सही से अवशोषित नहीं कर पाता है. कुछ एंटीबायोटिक्स, कीमोथेरेपी की दवाएं और सलाइन या ग्लूकोज जैसे फ्लूड सीधे नस में देने पड़ते हैं. इससे शरीर को जरूरी फ्लूड, इलेक्ट्रोलाइट्स या पोषक तत्व तेजी से मिलते हैं. डिहाइड्रेशन या खून की गंभीर कमी होन पर यह तरीका लाइफ सेविंग साबित हो सकता है. इमरजेंसी में आने वाले मरीजों के लिए यह तरीका सटीक है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. हर इंजेक्शन नस में क्यों नहीं लगाया जाता? डॉक्टर गुप्ता ने बताया कि सभी इंजेक्शन नसों में नहीं लगाए जाते हैं. कुछ दवाएं मांसपेशियों में इंजेक्ट की जाती हैं, जिन्हें इंट्रामस्क्युलर इंजेक्शन कहा जाता है. कुछ इंजेक्शन स्किन के नीचे भी दी जाती हैं, जिन्हें सबक्यूटेनियस इंजेक्शन कहा जाता है. यह इस बात पर डिपेंड करता है कि दवा किस तरह की है और उसका असर कितनी तेजी से चाहिए और मरीज की कंडीशन क्या है. नस में इंजेक्शन लगाने के लिए प्रशिक्षित हेल्थ प्रोफेशनल्स की जरूरत होती है, क्योंकि गलत तरीके से लगाने पर सूजन, संक्रमण या नस को नुकसान हो सकता है. गलत तरीके से इंजेक्शन लगाने से कंडीशन बिगड़ सकती है. डॉक्टर के अनुसार नसों में इंजेक्शन लगाने का उद्देश्य केवल तेजी से असर पाना ही नहीं, बल्कि दवा की सटीक डिलीवरी और बेहतर कंट्रोल भी है. कई बीमारियों में मसल्स में इंजेक्शन लगाना ज्यादा बेहतर होता है, जबकि कुछ परेशानियों में ओरल दवाएं ज्यादा असरदार होती हैं. डॉक्टर मरीज की हालत, दवा की प्रकृति और इलाज की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही यह निर्णय लेते हैं. इसलिए अगर आपको नस में इंजेक्शन दिया जाता है, तो यह समझिए कि यह चिकित्सकीय दृष्टि से सबसे उपयुक्त और प्रभावी तरीका चुना गया है.
'फैमिली में कोई नेगेटिविटी नहीं है':हेमा मालिनी ने धर्मेंद्र के निधन के बाद परिवार में तनाव की अफवाहों को किया खारिज

एक्टर धर्मेंद्र के निधन के बाद उनके परिवार में तनाव की चल रही अफवाहों को खारिज करते हुए एक्ट्रेस और उनकी पत्नी हेमा मालिनी ने कहा कि परिवार में किसी तरह की कोई नेगेटिविटी नहीं है। हिंदुस्तान टाइम्स के साथ बातचीत में हेमा मालिनी ने कहा, “पापा हैं ना। पापा के लिए हम सब कुछ करेंगे, चाहे ये बच्चे ईशा और अहाना हों या वो बच्चे सनी और बॉबी हों। सबको धरमजी से बहुत प्यार है और सब एक-दूसरे से भी बहुत प्यार करते हैं। परिवार में किसी तरह की कोई कड़वाहट नहीं है। जब धरमजी साथ हैं, तो नेगेटिविटी की कोई जगह ही नहीं है।” बता दें कि हाल ही में हेमा की दोनों बेटियां, ईशा और अहाना, सनी देओल की फिल्म बॉर्डर 2 की स्क्रीनिंग पर पहुंचीं और तीनों ने साथ में तस्वीरें भी क्लिक करवाईं। हालांकि, फिल्म की स्क्रीनिंग में हेमा मालिनी शामिल नहीं हुईं, जिस पर भी उन्होंने अब प्रतिक्रिया दी है। हेमा मालिनी ने इस पर कहा, “धरमजी हमेशा प्यार, हिम्मत और अच्छे संस्कार देने वाले रहे हैं। वही सब उन्होंने बच्चों को दिया है। मुझे भी बुलाया गया था, लेकिन मैं जा नहीं पाई। सब चाहते थे कि मैं आकर फिल्म देखूं। हम हर बात को पब्लिक में दिखाते नहीं हैं और दिखाएं भी क्यों? ये सब हमारे परिवार की बातें हैं। लोगों को समझना चाहिए, यूं इधर-उधर की बातें नहीं करनी चाहिए। हम सब ठीक हैं और इस कमी को मिलकर संभाल लेंगे।” BAFTA अवॉर्ड्स सेरेमनी में धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि दी गई बता दें कि 24 नवंबर 2025 को धर्मेंद्र का निधन हुआ था। पिछले रविवार लंदन में आयोजित 79वें BAFTA अवॉर्ड्स के ‘इन मेमोरियम’ सेक्शन में धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि दी गई। इस साल इस सेक्शन में शामिल होने वाले वे एकमात्र भारतीय एक्टर थे। इस सम्मान पर प्रतिक्रिया देते हुए हेमा ने कहा, “यह बहुत खूबसूरत पल था। वह इसके हकदार थे। यह सिर्फ हमारे लिए नहीं, पूरे देश के लिए गर्व की बात है। धर्मेंद्र के फैंस सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में थे।” उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अफसोस है कि वह धर्मेंद्र के साथ आखिरी बार स्क्रीन शेयर नहीं कर पाईं। उन्होंने कहा, “हमने जो काम साथ किया, वही अब दर्शकों की यादें हैं। यह मानना मुश्किल है कि वह अब नहीं हैं।”






