मूवी रिव्यू – गवर्नर:देश को दिवालिया होने से बचाने की कहानी, मनोज बाजपेयी ने कठिन विषय को भी दिलचस्प बना दिया

आज का भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब देश के पास जरूरी सामान आयात करने तक के पैसे नहीं बचे थे। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था और देश आर्थिक संकट के कगार पर खड़ा था। ‘गवर्नर’ उसी दौर की कहानी लेकर आती है। यह फिल्म बंदूक, बम और एक्शन की नहीं, बल्कि फाइलों, बैठकों और फैसलों की लड़ाई दिखाती है। हैरानी की बात यह है कि इतना गंभीर विषय होने के बावजूद फिल्म कई जगह दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहती है। फिल्म की कहानी फिल्म की कहानी 1990-91 के उस आर्थिक संकट पर आधारित है जब भारत दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच गया था। ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ए. रामानन को देश की आर्थिक व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी मिलती है। एक तरफ बढ़ती महंगाई, घटता विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय दबाव है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक अस्थिरता। ऐसे हालात में रामानन और उनकी टीम ऐसे फैसले लेने की कोशिश करती है जो देश को आर्थिक संकट से बाहर निकाल सकें। कहानी का बड़ा हिस्सा इसी संघर्ष और रणनीति पर आधारित है। फिल्म की अच्छी बात यह है कि यह इतिहास की किताब जैसा महसूस नहीं होती। जटिल आर्थिक मुद्दों को भी आसान तरीके से समझाने की कोशिश की गई है। फिल्म में एक्टिंग मनोज बाजपेयी पूरी फिल्म की जान हैं। लगभग हर दृश्य उनके कंधों पर टिका है और वह इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हैं। एक ऐसे व्यक्ति का दबाव, चिंता और जिम्मेदारी वह बिना ज्यादा शोर किए दर्शकों तक पहुंचा देते हैं। अदा शर्मा पत्रकार की भूमिका में ठीक लगती हैं। हालांकि उनके हिस्से में बहुत ज्यादा प्रभावशाली दृश्य नहीं आए हैं, लेकिन वह कहानी को आगे बढ़ाने का काम करती हैं। मधु ने सीमित स्क्रीन टाइम में अच्छा काम किया है। वहीं सहायक कलाकार भी अपने-अपने किरदारों में विश्वसनीय लगते हैं। फिल्म में डायरेक्शन निर्देशक चिन्मय डी. मांडलेकर का सबसे बड़ा काम यह है कि उन्होंने अर्थव्यवस्था जैसे कठिन विषय को समझने लायक बनाया है। फिल्म कई बार डॉक्यूमेंट्री बनने के खतरे के करीब पहुंचती है, लेकिन निर्देशन उसे नीरस होने से बचा लेता है। हालांकि कुछ जगह फिल्म जरूरत से ज्यादा सरल समाधान पेश करती हुई महसूस होती है। कुछ घटनाओं और फैसलों के पीछे की जटिलता को और विस्तार से दिखाया जा सकता था। फिल्म का तकनीकी पहलू फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन उस दौर का माहौल बनाने में सफल रहता है। दफ्तर, सरकारी बैठकें और उस समय का माहौल विश्वसनीय लगता है। छायांकन साधारण है, लेकिन कहानी की जरूरत पूरी करता है। संपादन भी ठीक है, हालांकि कुछ हिस्सों में फिल्म थोड़ी लंबी महसूस होती है। फिल्म में कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी गति है। कुछ दृश्यों में कहानी ठहरती हुई लगती है। आर्थिक फैसलों को लेकर जो तनाव महसूस होना चाहिए था, वह हर जगह पूरी तरह नहीं बन पाता। इसके अलावा कुछ दर्शकों को लग सकता है कि फिल्म कई जटिल राजनीतिक पहलुओं को छूकर आगे बढ़ जाती है। अगर उन हिस्सों को थोड़ा और विस्तार मिलता तो कहानी और मजबूत बन सकती थी। फिल्म में म्यूजिक फिल्म में संगीत कहानी का मुख्य हिस्सा नहीं है। पृष्ठभूमि संगीत माहौल बनाने में मदद करता है और जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किया गया है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। फिल्म क्यों देखें? ‘गवर्नर’ उन फिल्मों में से है जो मनोरंजन के साथ-साथ जानकारी भी देती हैं। यह फिल्म बताती है कि देश का भविष्य सिर्फ सीमा पर लड़ी जाने वाली लड़ाइयों से नहीं, बल्कि बंद कमरों में लिए गए फैसलों से भी तय होता है। मनोज बाजपेयी का मजबूत अभिनय और एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण विषय इसे देखने लायक बनाता है। हालांकि इसकी धीमी रफ्तार और कुछ सतही हिस्से इसे बहुत ऊंचाई तक नहीं ले जा पाते, लेकिन फिर भी यह एक ईमानदार और दिलचस्प कोशिश है।
मूवी रिव्यू – गवर्नर:देश को दिवालिया होने से बचाने की कहानी, मनोज बाजपेयी ने कठिन विषय को भी दिलचस्प बना दिया

आज का भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब देश के पास जरूरी सामान आयात करने तक के पैसे नहीं बचे थे। विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घट रहा था और देश आर्थिक संकट के कगार पर खड़ा था। ‘गवर्नर’ उसी दौर की कहानी लेकर आती है। यह फिल्म बंदूक, बम और एक्शन की नहीं, बल्कि फाइलों, बैठकों और फैसलों की लड़ाई दिखाती है। हैरानी की बात यह है कि इतना गंभीर विषय होने के बावजूद फिल्म कई जगह दर्शकों को बांधे रखने में सफल रहती है। फिल्म की कहानी फिल्म की कहानी 1990-91 के उस आर्थिक संकट पर आधारित है जब भारत दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच गया था। ऐसे समय में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ए. रामानन को देश की आर्थिक व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी मिलती है। एक तरफ बढ़ती महंगाई, घटता विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय दबाव है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक अस्थिरता। ऐसे हालात में रामानन और उनकी टीम ऐसे फैसले लेने की कोशिश करती है जो देश को आर्थिक संकट से बाहर निकाल सकें। कहानी का बड़ा हिस्सा इसी संघर्ष और रणनीति पर आधारित है। फिल्म की अच्छी बात यह है कि यह इतिहास की किताब जैसा महसूस नहीं होती। जटिल आर्थिक मुद्दों को भी आसान तरीके से समझाने की कोशिश की गई है। फिल्म में एक्टिंग मनोज बाजपेयी पूरी फिल्म की जान हैं। लगभग हर दृश्य उनके कंधों पर टिका है और वह इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हैं। एक ऐसे व्यक्ति का दबाव, चिंता और जिम्मेदारी वह बिना ज्यादा शोर किए दर्शकों तक पहुंचा देते हैं। अदा शर्मा पत्रकार की भूमिका में ठीक लगती हैं। हालांकि उनके हिस्से में बहुत ज्यादा प्रभावशाली दृश्य नहीं आए हैं, लेकिन वह कहानी को आगे बढ़ाने का काम करती हैं। मधु ने सीमित स्क्रीन टाइम में अच्छा काम किया है। वहीं सहायक कलाकार भी अपने-अपने किरदारों में विश्वसनीय लगते हैं। फिल्म में डायरेक्शन निर्देशक चिन्मय डी. मांडलेकर का सबसे बड़ा काम यह है कि उन्होंने अर्थव्यवस्था जैसे कठिन विषय को समझने लायक बनाया है। फिल्म कई बार डॉक्यूमेंट्री बनने के खतरे के करीब पहुंचती है, लेकिन निर्देशन उसे नीरस होने से बचा लेता है। हालांकि कुछ जगह फिल्म जरूरत से ज्यादा सरल समाधान पेश करती हुई महसूस होती है। कुछ घटनाओं और फैसलों के पीछे की जटिलता को और विस्तार से दिखाया जा सकता था। फिल्म का तकनीकी पहलू फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन उस दौर का माहौल बनाने में सफल रहता है। दफ्तर, सरकारी बैठकें और उस समय का माहौल विश्वसनीय लगता है। छायांकन साधारण है, लेकिन कहानी की जरूरत पूरी करता है। संपादन भी ठीक है, हालांकि कुछ हिस्सों में फिल्म थोड़ी लंबी महसूस होती है। फिल्म में कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी गति है। कुछ दृश्यों में कहानी ठहरती हुई लगती है। आर्थिक फैसलों को लेकर जो तनाव महसूस होना चाहिए था, वह हर जगह पूरी तरह नहीं बन पाता। इसके अलावा कुछ दर्शकों को लग सकता है कि फिल्म कई जटिल राजनीतिक पहलुओं को छूकर आगे बढ़ जाती है। अगर उन हिस्सों को थोड़ा और विस्तार मिलता तो कहानी और मजबूत बन सकती थी। फिल्म में म्यूजिक फिल्म में संगीत कहानी का मुख्य हिस्सा नहीं है। पृष्ठभूमि संगीत माहौल बनाने में मदद करता है और जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किया गया है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी है। फिल्म क्यों देखें? ‘गवर्नर’ उन फिल्मों में से है जो मनोरंजन के साथ-साथ जानकारी भी देती हैं। यह फिल्म बताती है कि देश का भविष्य सिर्फ सीमा पर लड़ी जाने वाली लड़ाइयों से नहीं, बल्कि बंद कमरों में लिए गए फैसलों से भी तय होता है। मनोज बाजपेयी का मजबूत अभिनय और एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण विषय इसे देखने लायक बनाता है। हालांकि इसकी धीमी रफ्तार और कुछ सतही हिस्से इसे बहुत ऊंचाई तक नहीं ले जा पाते, लेकिन फिर भी यह एक ईमानदार और दिलचस्प कोशिश है।
वर्ल्ड अपडेट्स:POK के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की गोलीबारी से 16 की मौत

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के रावलाकोट में प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की फायरिंग में कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई, जबकि 37 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। यह घटना उस समय हुई जब हजारों लोग महंगाई, बिजली दरों में वृद्धि और बुनियादी राजनीतिक-आर्थिक अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक रावलाकोट के ईदगाह मैदान में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे। इसी दौरान सुरक्षा बलों ने भीड़ पर गोलीबारी की। फायरिंग के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। POK में पिछले कई दिनों से सस्ती बिजली, सब्सिडी वाला गेहूं-चावल और अधिक अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा है। हाल ही में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद तनाव और बढ़ गया। प्रशासन ने कई गिरफ्तारियां की हैं तथा कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी हैं। रावलाकोट की घटना के बाद खाई गाला समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। बाजार बंद रहे और लोगों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ मार्च निकाला। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों ने भी प्रदर्शन में भाग लिया। स्थानीय दावों के अनुसार 5 जून से जारी आंदोलन के दौरान अब तक 53 नागरिकों की मौत हो चुकी है। प्रदर्शन नेताओं ने कहा है कि वे आर्थिक राहत और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखेंगे। भारत ने इस घटना की निंदा करते हुए इसे “नरसंहार” बताया है और कहा है कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में लोगों के अधिकारों के दमन को दर्शाता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मामले का संज्ञान लेने और पाकिस्तान से लोगों के अधिकारों का सम्मान करने की अपील की है।
वर्ल्ड अपडेट्स:POK के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की गोलीबारी से 16 की मौत

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों पर पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की फायरिंग में कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई, जबकि 37 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। यह घटना उस समय हुई जब हजारों लोग महंगाई, बिजली दरों में वृद्धि और बुनियादी राजनीतिक-आर्थिक अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक रावलकोट के ईदगाह मैदान में बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे। इसी दौरान सुरक्षा बलों ने भीड़ पर गोलीबारी की। फायरिंग के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई और घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। POK में पिछले कई दिनों से सस्ती बिजली, सब्सिडी वाला गेहूं-चावल और अधिक अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा है। हाल ही में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद तनाव और बढ़ गया। प्रशासन ने कई गिरफ्तारियां की हैं तथा कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी हैं। रावलकोट की घटना के बाद खाई गाला समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। बाजार बंद रहे और लोगों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ मार्च निकाला। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों ने भी प्रदर्शन में भाग लिया। स्थानीय दावों के अनुसार 5 जून से जारी आंदोलन के दौरान अब तक 53 नागरिकों की मौत हो चुकी है। प्रदर्शन नेताओं ने कहा है कि वे आर्थिक राहत और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखेंगे। भारत ने इस घटना की निंदा करते हुए इसे “नरसंहार” बताया है और कहा है कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में लोगों के अधिकारों के दमन को दर्शाता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मामले का संज्ञान लेने और पाकिस्तान से लोगों के अधिकारों का सम्मान करने की अपील की है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी अन्य बड़ी खबरें… 3 साल से ज्यादा समय तक कोमा में रहीं थाई राजकुमारी बज्रकिटियाभा का निधन थाईलैंड की राजकुमारी बज्रकिटियाभा का 47 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह दिसंबर 2022 से कोमा में थीं। थाई शाही परिवार ने शुक्रवार को इसकी घोषणा करते हुए बताया कि लगातार चिकित्सा प्रयासों के बावजूद उनकी हालत बिगड़ती रही और गुरुवार शाम बैंकॉक के चुलालॉन्गकॉर्न अस्पताल में उनका निधन हो गया। राजकुमारी बज्रकिटियाभा दिसंबर 2022 में अपने कुत्तों के साथ व्यायाम कर रही थीं, तभी अचानक बेहोश हो गई थीं। डॉक्टरों ने बाद में बताया कि उनके हृदय में मायकोप्लाज्मा संक्रमण हुआ था, जिससे गंभीर अनियमित धड़कन की समस्या पैदा हुई और वह कोमा में चली गईं। 7 दिसंबर 1978 को जन्मीं बज्रकिटियाभा, थाईलैंड के राजा महा वजिरालोंगकोर्न की सबसे बड़ी संतान थीं। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से दो स्नातकोत्तर डिग्रियां हासिल कीं। संयुक्त राष्ट्र में थाई मिशन के साथ काम करने के बाद उन्होंने थाईलैंड में अटॉर्नी जनरल कार्यालय में सेवाएं दीं। वर्ष 2012 से 2014 तक वह ऑस्ट्रिया में थाईलैंड की राजदूत रहीं। इस दौरान उन्होंने जेल सुधार और महिला कैदियों के अधिकारों के मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में वह संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स एवं अपराध कार्यालय (UNODC) की ‘रूल ऑफ लॉ’ एम्बेसडर भी रहीं। 2021 में राजा वजिरालोंगकोर्न ने उन्हें अपनी निजी सुरक्षा इकाई का चीफ ऑफ स्टाफ नियुक्त किया और जनरल का दर्जा दिया। उनकी प्रशासनिक क्षमता और सार्वजनिक छवि के कारण उन्हें थाई राजशाही के संभावित उत्तराधिकारियों में भी देखा जाता था। राजा ने अब तक अपना आधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया है। ऐसे में राजकुमारी बज्रकिटियाभा के निधन ने थाई राजपरिवार में उत्तराधिकार को लेकर नई अनिश्चितता पैदा कर दी है। कई राजभक्त उन्हें भविष्य में रानी या रीजेंट की भूमिका निभाने वाली संभावित शख्सियत मानते थे। उ. कोरिया में ड्रोन भेजने पर द. कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति को 30 साल अतिरिक्त जेल दक्षिण कोरिया की सियोल जिला अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति यून सुक योल को उत्तर कोरिया में ड्रोन भेजकर तनाव भड़काने के मामले में 30 साल अतिरिक्त जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने माना कि इस अभियान का मकसद उत्तर कोरिया को उकसाकर आपात स्थिति पैदा करना और बाद में मार्शल लॉ लागू करने के लिए माहौल तैयार करना था। अदालत ने यून सुक योल, पूर्व रक्षा मंत्री किम योंग-ह्यून, डिफेंस काउंटर इंटेलिजेंस कमांड के पूर्व प्रमुख यो इन-ह्युंग और ड्रोन ऑपरेशन कमांड के पूर्व प्रमुख किम योंग-डे को देशद्रोह और सत्ता के दुरुपयोग का दोषी ठहराया। अदालत ने कहा कि इन अधिकारियों ने सैन्य अभियान की आड़ में उत्तर कोरिया को उकसाया, जिससे दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष का खतरा बढ़ गया। फैसले में कहा गया कि अक्टूबर 2024 में प्योंगयांग में प्रचार सामग्री गिराने के लिए ड्रोन भेजे गए थे। अदालत के अनुसार यह कार्रवाई यून सुक योल के निर्देश पर हुई थी और उन्हें उम्मीद थी कि उत्तर कोरिया जवाबी प्रतिक्रिया देगा। अभियोजन पक्ष का दावा था कि यह अभियान दिसंबर 2024 में मार्शल लॉ लागू करने की तैयारी का हिस्सा था। यून ने 3 दिसंबर को मार्शल लॉ लागू करते हुए कहा था कि देश को “राष्ट्र-विरोधी ताकतों” से बचाने की जरूरत है, लेकिन भारी जनविरोध के बाद उन्हें फैसला वापस लेना पड़ा। यून सुक योल पहले ही विद्रोह के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं। इसके अलावा उन्हें सत्ता के दुरुपयोग और गिरफ्तारी में बाधा डालने के मामले में पांच साल की अलग सजा भी मिल चुकी है। बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि ड्रोन अभियान उत्तर कोरिया द्वारा कचरे से भरे गुब्बारे भेजने की कार्रवाई का जवाब था। हालांकि अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए अभियोजन पक्ष के आरोपों को सही माना। इस मामले ने दक्षिण कोरिया में राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया था। बाद में हुए चुनाव में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता ली जे-म्युंग सत्ता में आए और देश में राजनीतिक नेतृत्व बदल गया।
मूवी रिव्यू – भारत भाग्य विधाता रिव्यू:26/11 की अनसुनी बहादुरी को सामने लाती है फिल्म, कंगना रनोट ने सादगी से जीता दिल

26/11 मुंबई हमलों पर पहले भी कई फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं। ज्यादातर कहानियां पुलिस, आतंकियों या सुरक्षा बलों के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं। लेकिन उस रात कामा अस्पताल के भीतर क्या चल रहा था, वहां मौजूद डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों ने किन हालात में मरीजों को बचाया, इस पर बहुत कम बात हुई। ‘भारत भाग्य विधाता’ उसी भूले हुए अध्याय को सामने लाती है। यह सिर्फ एक हमले की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानी है जो सुर्खियों में कभी नहीं आए, लेकिन जिनकी वजह से सैकड़ों लोग सुरक्षित घर लौट सके। फिल्म की कहानी फिल्म की कहानी 26 नवंबर 2008 की उस रात पर आधारित है जब मुंबई दहशत के साए में थी। शहर के अलग-अलग हिस्सों में गोलियां चल रही थीं और उसी दौरान कामा अस्पताल भी खतरे के दायरे में आ गया। अस्पताल के भीतर मौजूद नर्सें, वार्ड स्टाफ और दूसरे कर्मचारी अचानक ऐसे हालात में फंस जाते हैं जिनके लिए कोई प्रशिक्षण काफी नहीं होता। कहानी का केंद्र एक नर्स और उसके साथ काम करने वाले लोग हैं, जो अपनी जान बचाने से पहले मरीजों की सुरक्षा के बारे में सोचते हैं। फिल्म का अच्छा पक्ष यह है कि यह किसी एक किरदार को सुपरहीरो नहीं बनाती। यहां बहादुरी सामूहिक है। हर व्यक्ति अपनी क्षमता के हिसाब से लड़ता है और यही बात कहानी को विश्वसनीय बनाती है। हालांकि फिल्म की पटकथा शुरुआत में थोड़ा समय लेती है। पहले आधे घंटे में किरदारों और उनके रिश्तों को स्थापित करने की कोशिश की गई है, जिससे गति कुछ धीमी महसूस होती है। लेकिन जैसे-जैसे खतरा करीब आता है, फिल्म पकड़ बनाती चली जाती है। फिल्म में एक्टिंग कंगना रनोट इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक हैं। दिलचस्प बात यह है कि यहां वह अपने स्टारडम पर नहीं, बल्कि किरदार पर भरोसा करती दिखाई देती हैं। लंबे समय बाद उन्हें ऐसे रोल में देखा गया है जहां ऊंची आवाज, लंबे भाषण या नाटकीयता नहीं है। उनका अभिनय संयमित है और यही बात असर छोड़ती है। कई दृश्यों में कंगना सिर्फ आंखों और चेहरे के भावों से डर, बेचैनी और जिम्मेदारी को व्यक्त कर देती हैं। यह उनके हालिया कामों से अलग प्रदर्शन है। गिरिजा ओक, स्मिता तांबे और बाकी कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं। फिल्म का एक बड़ा गुण यह है कि सहायक कलाकार सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं बनते, बल्कि कहानी का जरूरी हिस्सा लगते हैं। कई बार ऐसा महसूस होता है कि फिल्म किसी एक कलाकार की नहीं, पूरी टीम की है। फिल्म का डायरेक्शन निर्देशक मनोज तापड़िया ने विषय की संवेदनशीलता को समझते हुए काम किया है। उन्होंने 26/11 को तमाशे की तरह पेश करने के बजाय इंसानी नजरिए से देखने की कोशिश की है। फिल्म आतंकियों से ज्यादा उन लोगों पर फोकस करती है जिन्होंने मुश्किल समय में अपना कर्तव्य निभाया। निर्देशन की सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म लगातार सम्मानजनक बनी रहती है। कहीं भी अनावश्यक देशभक्ति या भावनाओं का दबाव डालने की कोशिश नहीं की गई। कई दृश्य स्वाभाविक रूप से असर छोड़ते हैं। हालांकि कुछ जगहों पर फिल्म और ज्यादा तीखी हो सकती थी। कुछ घटनाएं पर्दे पर जितना तनाव पैदा कर सकती थीं, उतना नहीं कर पातीं। फिल्म का तकनीकी पहलू फिल्म की सिनेमैटोग्राफी माहौल बनाने में सफल रहता है। अस्पताल के गलियारों, बंद कमरों और भय के माहौल को कैमरा प्रभावी ढंग से पकड़ता है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां दर्शक जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है, फिर भी तनाव बना रहता है। फिल्म की एडिटिंग भी काफी टाइट है। फिल्म बेवजह लंबी नहीं लगती, हालांकि पहले हिस्से में थोड़ी काट-छांट की जा सकती थी। प्रोडक्शन डिजाइन और कॉस्ट्यूम कहानी को असलियत के करीब लाते हैं। हॉस्पिटल का माहौल बनावटी नहीं लगता। फिल्म का म्यूजिक फिल्म का म्यूजिक याद रह जाने वाला नहीं है, लेकिन यह शिकायत भी नहीं बनता। पृष्ठभूमि संगीत कई महत्वपूर्ण दृश्यों में भावनात्मक असर बढ़ाता है। अच्छी बात यह है कि संगीत कहानी पर हावी नहीं होता। फिल्म की कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी धीमी शुरुआत है। कुछ दर्शकों को लग सकता है कि कहानी मुख्य संघर्ष तक पहुंचने में ज्यादा समय लेती है। इसके अलावा कुछ सहायक किरदारों को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था। जो दर्शक पूरी तरह थ्रिलर देखने की उम्मीद से जाएंगे, उन्हें फिल्म कुछ जगहों पर अपेक्षा से ज्यादा भावनात्मक और कम रोमांचक लग सकती है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘भारत भाग्य विधाता’ उन लोगों को याद करने की कोशिश है जिनका नाम इतिहास के बड़े पन्नों में शायद नहीं लिखा गया, लेकिन जिन्होंने अपने हिस्से की बहादुरी पूरी ईमानदारी से निभाई। फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह आतंक की कहानी सुनाते-सुनाते इंसानियत की कहानी बन जाती है। कंगना रनोट का सधा हुआ अभिनय, मजबूत सहायक कलाकार और संवेदनशील निर्देशन इसे एक असरदार अनुभव बनाते हैं। यह परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन दिल से बनाई गई फिल्म जरूर है। अगर आप सच्ची घटनाओं पर आधारित और भावनात्मक मानवीय कहानियां पसंद करते हैं, तो ‘भारत भाग्य विधाता’ एक बार देखी जा सकती है।
मूवी रिव्यू – भारत भाग्य विधाता रिव्यू:26/11 की अनसुनी बहादुरी को सामने लाती है फिल्म, कंगना रनोट ने सादगी से जीता दिल

26/11 मुंबई हमलों पर पहले भी कई फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं। ज्यादातर कहानियां पुलिस, आतंकियों या सुरक्षा बलों के इर्द-गिर्द घूमती रही हैं। लेकिन उस रात कामा अस्पताल के भीतर क्या चल रहा था, वहां मौजूद डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों ने किन हालात में मरीजों को बचाया, इस पर बहुत कम बात हुई। ‘भारत भाग्य विधाता’ उसी भूले हुए अध्याय को सामने लाती है। यह सिर्फ एक हमले की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानी है जो सुर्खियों में कभी नहीं आए, लेकिन जिनकी वजह से सैकड़ों लोग सुरक्षित घर लौट सके। फिल्म की कहानी फिल्म की कहानी 26 नवंबर 2008 की उस रात पर आधारित है जब मुंबई दहशत के साए में थी। शहर के अलग-अलग हिस्सों में गोलियां चल रही थीं और उसी दौरान कामा अस्पताल भी खतरे के दायरे में आ गया। अस्पताल के भीतर मौजूद नर्सें, वार्ड स्टाफ और दूसरे कर्मचारी अचानक ऐसे हालात में फंस जाते हैं जिनके लिए कोई प्रशिक्षण काफी नहीं होता। कहानी का केंद्र एक नर्स और उसके साथ काम करने वाले लोग हैं, जो अपनी जान बचाने से पहले मरीजों की सुरक्षा के बारे में सोचते हैं। फिल्म का अच्छा पक्ष यह है कि यह किसी एक किरदार को सुपरहीरो नहीं बनाती। यहां बहादुरी सामूहिक है। हर व्यक्ति अपनी क्षमता के हिसाब से लड़ता है और यही बात कहानी को विश्वसनीय बनाती है। हालांकि फिल्म की पटकथा शुरुआत में थोड़ा समय लेती है। पहले आधे घंटे में किरदारों और उनके रिश्तों को स्थापित करने की कोशिश की गई है, जिससे गति कुछ धीमी महसूस होती है। लेकिन जैसे-जैसे खतरा करीब आता है, फिल्म पकड़ बनाती चली जाती है। फिल्म में एक्टिंग कंगना रनोट इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक हैं। दिलचस्प बात यह है कि यहां वह अपने स्टारडम पर नहीं, बल्कि किरदार पर भरोसा करती दिखाई देती हैं। लंबे समय बाद उन्हें ऐसे रोल में देखा गया है जहां ऊंची आवाज, लंबे भाषण या नाटकीयता नहीं है। उनका अभिनय संयमित है और यही बात असर छोड़ती है। कई दृश्यों में कंगना सिर्फ आंखों और चेहरे के भावों से डर, बेचैनी और जिम्मेदारी को व्यक्त कर देती हैं। यह उनके हालिया कामों से अलग प्रदर्शन है। गिरिजा ओक, स्मिता तांबे और बाकी कलाकार भी कहानी को मजबूती देते हैं। फिल्म का एक बड़ा गुण यह है कि सहायक कलाकार सिर्फ पृष्ठभूमि नहीं बनते, बल्कि कहानी का जरूरी हिस्सा लगते हैं। कई बार ऐसा महसूस होता है कि फिल्म किसी एक कलाकार की नहीं, पूरी टीम की है। फिल्म का डायरेक्शन निर्देशक मनोज तापड़िया ने विषय की संवेदनशीलता को समझते हुए काम किया है। उन्होंने 26/11 को तमाशे की तरह पेश करने के बजाय इंसानी नजरिए से देखने की कोशिश की है। फिल्म आतंकियों से ज्यादा उन लोगों पर फोकस करती है जिन्होंने मुश्किल समय में अपना कर्तव्य निभाया। निर्देशन की सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म लगातार सम्मानजनक बनी रहती है। कहीं भी अनावश्यक देशभक्ति या भावनाओं का दबाव डालने की कोशिश नहीं की गई। कई दृश्य स्वाभाविक रूप से असर छोड़ते हैं। हालांकि कुछ जगहों पर फिल्म और ज्यादा तीखी हो सकती थी। कुछ घटनाएं पर्दे पर जितना तनाव पैदा कर सकती थीं, उतना नहीं कर पातीं। फिल्म का तकनीकी पहलू फिल्म की सिनेमैटोग्राफी माहौल बनाने में सफल रहता है। अस्पताल के गलियारों, बंद कमरों और भय के माहौल को कैमरा प्रभावी ढंग से पकड़ता है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां दर्शक जानते हैं कि आगे क्या होने वाला है, फिर भी तनाव बना रहता है। फिल्म की एडिटिंग भी काफी टाइट है। फिल्म बेवजह लंबी नहीं लगती, हालांकि पहले हिस्से में थोड़ी काट-छांट की जा सकती थी। प्रोडक्शन डिजाइन और कॉस्ट्यूम कहानी को असलियत के करीब लाते हैं। हॉस्पिटल का माहौल बनावटी नहीं लगता। फिल्म का म्यूजिक फिल्म का म्यूजिक याद रह जाने वाला नहीं है, लेकिन यह शिकायत भी नहीं बनता। पृष्ठभूमि संगीत कई महत्वपूर्ण दृश्यों में भावनात्मक असर बढ़ाता है। अच्छी बात यह है कि संगीत कहानी पर हावी नहीं होता। फिल्म की कमियां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी धीमी शुरुआत है। कुछ दर्शकों को लग सकता है कि कहानी मुख्य संघर्ष तक पहुंचने में ज्यादा समय लेती है। इसके अलावा कुछ सहायक किरदारों को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था। जो दर्शक पूरी तरह थ्रिलर देखने की उम्मीद से जाएंगे, उन्हें फिल्म कुछ जगहों पर अपेक्षा से ज्यादा भावनात्मक और कम रोमांचक लग सकती है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘भारत भाग्य विधाता’ उन लोगों को याद करने की कोशिश है जिनका नाम इतिहास के बड़े पन्नों में शायद नहीं लिखा गया, लेकिन जिन्होंने अपने हिस्से की बहादुरी पूरी ईमानदारी से निभाई। फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह आतंक की कहानी सुनाते-सुनाते इंसानियत की कहानी बन जाती है। कंगना रनोट का सधा हुआ अभिनय, मजबूत सहायक कलाकार और संवेदनशील निर्देशन इसे एक असरदार अनुभव बनाते हैं। यह परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन दिल से बनाई गई फिल्म जरूर है। अगर आप सच्ची घटनाओं पर आधारित और भावनात्मक मानवीय कहानियां पसंद करते हैं, तो ‘भारत भाग्य विधाता’ एक बार देखी जा सकती है।
नेशनल कंज्यूमर फोरम से भी सलमान खान को राहत:कोटा कंज्यूमर फोरम में चल रही कार्रवाई पर स्टे; अगली सुनवाई 14 जुलाई को

राजश्री पान मसाला के भ्रामक विज्ञापन के मामले में सलमान खान को नेशनल कंज्यूमर फोरम (NCDC) से भी राहत मिली है। फिलहाल सलमान खान को FSL जांच के लिए कोटा नहीं आना पड़ेगा। नेशनल कंज्यूमर फोरम ने सलमान खान के खिलाफ कोटा कंज्यूमर फोरम में चल रही कार्रवाई पर स्टे दे दिया है। मामले की अगली सुनवाई 22 जून को होगी। इसी मामले में हाईकोर्ट ने 27 मई को स्टे जारी किया था। जिसकी अगली सुनवाई 14 जुलाई को होनी है। सलमान खान को पेश होने का था आदेश पान मसाला कंपनी की ओर से वकील राकेश सुवालका ने बताया कि सलमान खान की ओर से कोटा कंज्यूमर फोरम में पेश वकालतनामा और जवाब पर सलमान खान के हस्ताक्षर को लेकर याचिकाकर्ता भाजपा नेता और एडवोकेट इंद्रमोहन सिंह हनी ने आपत्ति जताई थी। इस पर जिला उपभोक्ता अदालत ने 26 दिसंबर 2025 को एक आदेश पारित किया था, जिसमें सलमान खान के हस्ताक्षरों की जांच FSL से कराने और उन्हें खुद उपस्थित होकर अपना हस्ताक्षरित शपथ पत्र पेश करने का निर्देश दिया गया था। सलमान खान के कोर्ट में पेश नहीं होने पर याचिकाकर्ता ने कोर्ट की अवमानना का प्रार्थना-पत्र पेश किया था। इसी कार्रवाई के विरोध में सलमान खान की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट और नेशनल कंज्यूमर फोरम प्रार्थना-पत्र पेश किया था। 26 दिसंबर 2025 को कोटा कंज्यूमर कोर्ट के ऑर्डर पर रोक लगाने की मांग की। अगली सुनवाई 14 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 27 मई को स्टे जारी किया था। सलमान खान के वकील की ओर से हाईकोर्ट के ऑर्डर की कॉपी कोटा कंज्यूमर फोरम में पेश की थी। वहीं अब नेशनल कंज्यूमर फोरम ने मामले में सुनवाई करते हुए 10 जून को स्टे जारी कर दिया है। नेशनल कंज्यूमर फोरम के ऑर्डर की कॉपी 11 जून को कोटा कंज्यूमर फोरम में पेश की। सलमान खान के वकील की ओर से नेशनल कंज्यूमर फोरम में परिवादी इंद्र मोहन सिंह हनी द्वारा जून 25 में विमल पान मसाला के खिलाफ परिवाद विड्रो करने का प्रार्थना पत्र भी पेश किया। कोटा कंज्यूमर फोरम में इस मामले में अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी। —————————————– ये खबर भी पढ़े सलमान खान को FSL-जांच के लिए नहीं आना पड़ेगा कोटा:वकील ने हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर किया पेश; कोटा कंज्यूमर कोर्ट से मिली राहत फिल्म स्टार सलमान खान के डॉक्यूमेंट्स FSL ने किए खारिज:कोटा कंज्यूमर कोर्ट ने कमियों को दूर करने को कहा; 21 अप्रैल को अगली सुनवाई
नेशनल कंज्यूमर फोरम से भी सलमान खान को राहत:कोटा कंज्यूमर फोरम में चल रही कार्रवाई पर स्टे; अगली सुनवाई 14 जुलाई को

राजश्री पान मसाला के भ्रामक विज्ञापन के मामले में सलमान खान को नेशनल कंज्यूमर फोरम (NCDC) से भी राहत मिली है। फिलहाल सलमान खान को FSL जांच के लिए कोटा नहीं आना पड़ेगा। नेशनल कंज्यूमर फोरम ने सलमान खान के खिलाफ कोटा कंज्यूमर फोरम में चल रही कार्रवाई पर स्टे दे दिया है। मामले की अगली सुनवाई 22 जून को होगी। इसी मामले में हाईकोर्ट ने 27 मई को स्टे जारी किया था। जिसकी अगली सुनवाई 14 जुलाई को होनी है। सलमान खान को पेश होने का था आदेश पान मसाला कंपनी की ओर से वकील राकेश सुवालका ने बताया कि सलमान खान की ओर से कोटा कंज्यूमर फोरम में पेश वकालतनामा और जवाब पर सलमान खान के हस्ताक्षर को लेकर याचिकाकर्ता भाजपा नेता और एडवोकेट इंद्रमोहन सिंह हनी ने आपत्ति जताई थी। इस पर जिला उपभोक्ता अदालत ने 26 दिसंबर 2025 को एक आदेश पारित किया था, जिसमें सलमान खान के हस्ताक्षरों की जांच FSL से कराने और उन्हें खुद उपस्थित होकर अपना हस्ताक्षरित शपथ पत्र पेश करने का निर्देश दिया गया था। सलमान खान के कोर्ट में पेश नहीं होने पर याचिकाकर्ता ने कोर्ट की अवमानना का प्रार्थना-पत्र पेश किया था। इसी कार्रवाई के विरोध में सलमान खान की ओर से राजस्थान हाईकोर्ट और नेशनल कंज्यूमर फोरम प्रार्थना-पत्र पेश किया था। 26 दिसंबर 2025 को कोटा कंज्यूमर कोर्ट के ऑर्डर पर रोक लगाने की मांग की। अगली सुनवाई 14 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 27 मई को स्टे जारी किया था। सलमान खान के वकील की ओर से हाईकोर्ट के ऑर्डर की कॉपी कोटा कंज्यूमर फोरम में पेश की थी। वहीं अब नेशनल कंज्यूमर फोरम ने मामले में सुनवाई करते हुए 10 जून को स्टे जारी कर दिया है। नेशनल कंज्यूमर फोरम के ऑर्डर की कॉपी 11 जून को कोटा कंज्यूमर फोरम में पेश की। सलमान खान के वकील की ओर से नेशनल कंज्यूमर फोरम में परिवादी इंद्र मोहन सिंह हनी द्वारा जून 25 में विमल पान मसाला के खिलाफ परिवाद विड्रो करने का प्रार्थना पत्र भी पेश किया। कोटा कंज्यूमर फोरम में इस मामले में अगली सुनवाई 14 जुलाई को होगी। —————————————– ये खबर भी पढ़े सलमान खान को FSL-जांच के लिए नहीं आना पड़ेगा कोटा:वकील ने हाईकोर्ट का स्टे ऑर्डर किया पेश; कोटा कंज्यूमर कोर्ट से मिली राहत फिल्म स्टार सलमान खान के डॉक्यूमेंट्स FSL ने किए खारिज:कोटा कंज्यूमर कोर्ट ने कमियों को दूर करने को कहा; 21 अप्रैल को अगली सुनवाई
उत्तराखंड के शूटर जसपाल राणा का निधन:जर्मनी से लौटते वक्त फ्लाइट में तबियत बिगड़ी; कल वाराणसी में होगा अंतिम संस्कार

पद्मश्री से सम्मानित उत्तराखंड के दिग्गज शूटर जसपाल राणा का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। 49 वर्षीय राणा पिछले 11 दिनों से दिल्ली के मैक्स साकेत अस्पताल में भर्ती थे। जर्मनी से लौटते समय फ्लाइट में उनकी तबीयत बिगड़ गई थी। जसपाल राणा के पार्थिव शरीर को दिल्ली से बाय रोड देहरादून में उनके आवास में लाया जा रहा है। कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में 23 पदक जीतने वाले राणा को भारतीय शूटिंग की सबसे बड़ी हस्तियों में गिना जाता है। उन्हें महज 18 साल की उम्र में अर्जुन पुरस्कार मिला था, जबकि बाद में पद्मश्री और द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। पेरिस ओलिंपिक में दो कांस्य पदक जीतने वाली मनु भाकर समेत कई अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजों को तैयार करने वाले राणा के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शोक जताया है। उनका पार्थिव शरीर आज शाम करीब 7 बजे तक देहरादून स्थित उनके आवास लाया जाएगा। शनिवार को उनका अंतिम संस्कार वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर किया जाएगा। तस्वीरें देखिए- पिता ITBP में रहे, बचपन में राणा को थमाई पिस्टल जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तरकाशी में हुआ था। हालांकि मूल रूप से वह टिहरी के रहने वाले थे। उनके पिता नारायण सिंह राणा इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस, यानी ITBP में तैनात थे। बाद में वे उत्तराखंड के पहले खेल मंत्री भी बने। शूटिंग के प्रति उनका विशेष लगाव था और उन्होंने ही बेटे को महज 10 साल की उम्र में पिस्टल पकड़ा दी थी। परिवार में खेल का माहौल इतना मजबूत था कि उनकी बहन सुषमा सिंह और भाई सुभाष राणा भी राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाज बने। कम उम्र से ही जसपाल का अधिकांश समय शूटिंग रेंज में बीतने लगा और यहीं से उस सफर की शुरुआत हुई जिसने उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ निशानेबाजों की कतार में खड़ा कर दिया। 12 साल की उम्र में पहला मेडल, 18 साल में अर्जुन पुरस्कार 1988 में अहमदाबाद में आयोजित राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप में 12 साल के जसपाल राणा ने सिल्वर मेडल जीतकर देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसके बाद उन्होंने लगातार राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया और भारतीय शूटिंग का नया चेहरा बनकर उभरे। उनकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज 18 साल की उम्र में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उस दौर में इतनी कम उम्र में यह उपलब्धि हासिल करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी गई। राणा के घर से पल-पल के अपडेट्स जानने के लिए लाइव ब्लॉग से गुजर जाइए…
भारतीय शूटर जसपाल राणा का 49 की उम्र में निधन:6 जून को जर्मनी से लौटते वक्त तबीयत बिगड़ी थी; कॉमनवेल्थ गेम्स में 9 गोल्ड जीते

भारत के दिग्गज शूटर जसपाल राणा का निधन हो गया है। वे 49 साल के थे। उन्हें दिल्ली के मैक्स साकेत हास्पिटल में एडमिट कराया गया था। जहां शुक्रवार सुबह जसपाल ने आखिरी सांस ली। (हम इस खबर को लगातार अपडेट कर रहे हैं।)









