Open Relationship Marriage Stress; Psychiatrist Advice

Hindi News Lifestyle Open Relationship Marriage Stress; Psychiatrist Advice | Consent Power Balance 17 घंटे पहले कॉपी लिंक सवाल– मेरी उम्र 35 साल है। मैं बेंगलुरू में रहती हूं। मेरी शादी को तीन साल हो चुके हैं और पिछले दो साल से हम ओपन रिलेशनशिप में हैं। हमारी लव मैरिज थी, लेकिन हसबैंड इस बात को लेकर हमेशा ओपन थे कि उसे मेरे अलावा दूसरी महिलाएं भी अच्छी लग सकती हैं। पहले ये बात मुझे मजाक लगती थी, लेकिन फिर एक दिन उसने शादी को ओपन रिलेशनशिप की तरह ट्रीट करने की डिमांड कर दी। उसकी पर्सनैलिटी और चार्म ही ऐसा है कि वो हमेशा अपनी बातों से कन्विंस कर लेता है। मैं राजी तो हो गई, लेकिन वो सब कभी कर नहीं पाई, जो वो कर रहा है। ये उसका ही एकतरफा डिसिजन था, जो मुझ पर थोप दिया गया। अब मैं एक अजीब सी घुटन महसूस करती हूं। हमेशा स्ट्रेस में रहती हूं। मैं क्या करूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए आपका शुक्रिया। भारत में अधिकांश विवाह कमिटेड मोनोगैमी (एकनिष्ठ संबंध) ही समझे और माने जाते हैं। अगर शादी के बाद एक साथी ओपन रिलेशनशिप की डिमांड करे, तो यह केवल लाइफस्टाइल का मुद्दा नहीं रहता। यहां सहमति, पावर–बैलेंस और मेंटल हेल्थ जैसे बहुत से जरूरी और बुनियादी सवाल भी मौजूं हो जाते हैं। किसी भी स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद आपसी सम्मान, अपनी स्वायत्तता और इच्छा से दी गई सहमति और फैसलों में बराबरी पर टिकी होती है। यदि इन चीजों में से कोई एक भी अनुपस्थित हो, तो रिश्तों में तनाव और असंतुलन पैदा हो सकता है। सहमति के पीछे का मनोविज्ञान ऐसी परिस्थितियों की शुरुआत अक्सर हल्के–फुल्के मजाक के साथ होती है। एक पार्टनर मजाक में यह कह सकता है कि ‘मुझे दूसरे लोग भी आकर्षक लगते हैं’ या ‘ओपन रिलेशनशिप का आइडिया भी कितना इंटरेस्टिंग हो सकता है।’ साइकोलॉजी में इसे ‘चेकिंग बाउंड्रीज’ (सीमा चेक करना) कहा जाता है। मनोविज्ञान में ‘बाउंड्रीज चेक करने’ का मतलब है, अपनी या दूसरे व्यक्ति की सीमाएं देखना, समझना, तय करना, उसे डिफाइन करना। कोई व्यक्ति पहले हंसी–मजाक में अपने विचार रखता है और दूसरे की प्रतिक्रिया देखता है। अगर दूसरा साथी इसे गंभीरता से नहीं लेता, तो धीरे-धीरे यही बात रीअल प्रपोजल में बदल सकती है। कई लोग बाद में सोचते हैं कि उन्होंने उस समय इस बात को गंभीरता से क्यों नहीं लिया। इसके पीछे कुछ सामान्य मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। जैसेकि– कभी-कभी व्यक्ति रिश्ते को खोने से डरता है। कभी वह संघर्ष से बचना चाहता है। कभी उसे लगता है कि साथी को खुश रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। कई समाजों में यह भी सिखाया जाता है कि रिश्ते को बनाए रखने के लिए एडजस्टमेंट करना जरूरी होता है। परसुएशन या मैनिपुलेशन: एक बारीक रेखा इसी तरह कई बार एक पार्टनर कहता है कि दूसरा पार्टनर हमेशा अपनी बातें मनवा लेता है। जैसाकि आपने भी अपने पार्टनर के लिए लिखा है, “उसकी पर्सनैलिटी और चार्म ही ऐसा है कि वो हमेशा अपनी बातों से कन्विंस कर लेता है।” लेकिन यहां इस बात के गहरे निहितार्थ को समझना जरूरी है। इसका एक अर्थ यह हो सकता है कि पार्टनर का व्यक्तित्व बहुत प्रभावी है। लेकिन दूसरी संभावना यह भी हो सकती है कि वह इनडायरेक्ट तरीके से भावनात्मक दबाव बना रहा हो। या लगातार ‘परसुएशन’ कर रहा हो। परसुएशन का अर्थ है कि एक बात को अनेकों बार कहना, अनुनय–विनय, याचना करना और आखिरकार अपनी बात मनवा ही लेना। कई बार परसुएशन और मैनिपुलेशन के बीच की रेखा बहुत धुंधली होती है। व्यक्ति को बाद में यह महसूस होता है कि उसने सहमति तो दी थी, लेकिन यह सहमति वास्तव में उसकी अपनी मर्जी, खुशी और इच्छा से नहीं दी गई थी। रिश्तों में पावर इंबैलेंस जब कोई व्यक्ति कहता है कि निर्णय उस पर थोपा गया तो यह रिश्ते में पावर इंबैलेंस (शक्ति के असंतुलन) का संकेत हो सकता है। हेल्दी रिश्तों में महत्वपूर्ण फैसले बातचीत और आपसी सहमति से लिए जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके पास सहमत होने के अलावा वास्तव में कोई दूसरा विकल्प नहीं है तो वह कई कारणों से पार्टनर के फैसलेे में हामी भर सकता है। जैसेकि– हो सकता है कि उसे रिश्ते के टूट जाने का डर हो। हो सकता है कि वह पार्टनर पर इमोशनली पूरी तरह डिपेंडेंट हों। हो सकता है कि उसमें आत्मविश्वास की कमी हो। हो सकता है कि वो खुद को बहुत कमजोर और वलनरेबल महसूस करता हो। ऐसी परिस्थितियों में लगातार घुटन और तनाव महसूस होना बहुत स्वाभाविक इमोशनल रिएक्शन है। अगर संबंधों में लंबे समय तक तनाव रहे तो इससे नींद की समस्या, एंग्जाइटी, इमोशनल फटीग, आत्मसम्मान में कमी जैसे अनुभव हो सकते हैं। ये सारे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि व्यक्ति की भावनात्मक जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। सबसे पहले जरूरी है खुद को समझना आपके सवाल ने बहुत से तथ्य साफ कर दिए हैं, लेकिन फिर भी आपकी स्थिति का मूल्यांकन आपसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। आपको खुद से कुछ सवाल पूछने और अपना सेल्फ इवैल्यूएशन करने की जरूरत है। ये पहला कदम है। जब जमीनी स्थिति साफ समझ में आएगी तभी आप ये तय कर पाएंगी कि आगे आपको कौन–सा रास्ता चुनना चाहिए, कौन से फैसले करने चाहिए। तो आइए शुरू करते हैं। सेल्फ इवैल्यूएशन टेस्ट 1 मैंने ओपन रिलेशनशिप के लिए सहमति क्यों दी? यहां पहला और सबसे जरूरी सवाल ये है कि आप अपनी मर्जी के खिलाफ जाकर ओपन रिलेशनशिप के लिए राजी क्यों हुईं। आपने हामी क्यों भरी। यह सवाल किसी तरह का आरोप नहीं है। यह अपने आत्म–मूल्यांकन का पहला सबसे जरूरी कदम है। मैंने सहमति दिए जाने के पीछे कुछ संभावित कारणों का ऊपर जिक्र किया है। लेकिन आपको अपना इवैल्यूएशन करके यह समझना है कि आपके फैसले के पीछे सबसे बड़ा और ठोस कारण क्या था। नीचे ग्राफिक में कुछ 6 सवाल दिए हैं। आपको इन सवालों को 1 से 10 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपको लगता है कि
Child Maths Anxiety Reasons: Dr Amita Shringi Parenting Advice

Hindi News Lifestyle Child Maths Anxiety Reasons: Dr Amita Shringi Parenting Advice | Kids Psychology 1 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक सवाल- मैं उत्तर प्रदेश से हूं। मेरा 11 साल का बेटा छठवीं क्लास में पढ़ता है। वह पढ़ाई में अच्छा है, लेकिन मैथ्स से बहुत डरता है। कहता है, मैथ समझ में नहीं आती है। हमेशा मैथ टेस्ट से पहले उसे पेट दर्द, घबराहट होने लगती है। एक मां के रूप में मैं उसे कैसे समझाऊं, कैसे सपोर्ट करूं कि उसका डर कम हो और आत्मविश्वास बढ़े? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। अच्छी बात यह है कि आपका बेटा अन्य विषयों में अच्छा है। इसका मतलब है कि उसकी सीखने की क्षमता अच्छी है। समस्या केवल मैथ्स को लेकर बने डर की है। साइकोलॉजी में इसे ‘मैथ एंग्जाइटी’ कहते हैं। दरअसल इस उम्र में बच्चों पर ग्रेड्स, टेस्ट और परफॉर्मेंस का दबाव बढ़ने लगता है। ऐसे में अगर किसी कारण से बच्चे को कोई विषय कठिन लगता है तो ये धीरे-धीरे उसके कॉन्फिडेंस को भी प्रभावित करता है। यही वजह है कि आपका बेटा टेस्ट से पहले पेट दर्द व घबराहट जैसे लक्षण महसूस कर रहा है। मैथ एंग्जाइटी के कारणों को करें आइडेंटिफाई जब बच्चा पढ़ाई से बचने के लिए बहाने बनाता है तो उसके पीछे कोई-न-कोई कारण छिपा होता है। ऐसे में समस्या का हल जानने से पहले उस कारण को आइडेंटिफाई करना जरूरी है। जब तक यह क्लीयर नहीं होगा कि उसे किस बात से सबसे ज्यादा डर लग रहा है, तब तक सही समाधान मिलना मुश्किल है। बच्चे की बहानेबाजी या डर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ग्राफिक में देखिए- ग्राफिक में दिए कारणों से समझें कि आखिर आपके बेटे के डर और एंग्जाइटी के पीछे कौन-सी वजहें हो सकती हैं। आइए, अब इसके आधार पर बच्चे की मैथ एंग्जाइटी के समाधान पर बात करते हैं। बच्चों में मैथ के प्रति इंटरेस्ट कैसे जगाएं? याद रखिए, बच्चों को अगर कोई भी चीज सिखानी है तो वह मजेदार होनी चाहिए। बच्चों को जो चीजें मजेदार लगती हैं, उसे वे इंटरेस्ट के साथ पढ़ते व समझते हैं। वहीं दबाव और जबरदस्ती करने से बच्चे उससे दूर भागते हैं। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। आइए अब इन पॉइंट्स के बारे में थोड़ा विस्तार से बात करते हैं। मैथ को मजेदार बनाएं मैथ्स को बोरिंग बनाने के बजाय एक ‘गेम’ की तरह पेश करें। जब बच्चा इसे ‘टेस्ट का विषय’ मानता है तो डर बढ़ता है। लेकिन जब वही चीज गेम, क्विज या चैलेंज बन जाती है तो बच्चे का नजरिया बदलता है। इसके लिए आप घर पर टाइमर लगाकर 5 सवाल हल करने का छोटा गेम बना सकती हैं या सही जवाब पर स्टार सिस्टम रख सकती हैं। इससे बच्चा मैथ को बोझ नहीं, मजेदार एक्टिविटी के रूप में देखेगा। मैथ को रियल लाइफ से जोड़ें बच्चा जब तक यह नहीं समझेगा कि वह मैथ्स क्यों पढ़ रहा है, तब तक उसे इसमें दिलचस्पी नहीं आएगी। उसे बताएं कि मैथ कैसे हमारे रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा हुआ है। इसके लिए उसे साथ बाजार ले जाएं और छोटे-छोटे हिसाब कराएं। इससे बच्चा मैथ का महत्व समझेगा। बच्चा तब तेजी से सीखता है, जब उसे समझ आता है कि मैथ रोजमर्रा की जिंदगी में काम आती है। बाजार में खरीदारी करते समय उसे बिल जोड़ने दें, जेब खर्च में बचत का हिसाब खुद करने दें। खेल के मैदान में स्कोर, टाइम और डिस्टेंस की काउंटिंग कराएं। जब उसे महसूस होगा कि मैथ ‘जिंदगी का हिस्सा’ है, तो उसका जुड़ाव अपने-आप बढ़ेगा। प्रेशर बिल्कुल न डालें और छोटे गोल सेट करें एक साथ पूरे सवाल खत्म करने का दबाव न बनाएं। उसे कहें, “आज हम सिर्फ 2 सवाल करेंगे, लेकिन उसे अच्छे से समझेंगे।” जब बच्चा छोटा लक्ष्य हासिल करता है, तो उसके ब्रेन में डोपामिन (हैप्पी हॉर्मोन) रिलीज होता है, जिससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। याद रखें, धीमी लेकिन निरंतर गति पहाड़ जैसे सिलेबस को भी छोटा कर देती है। रिजल्ट नहीं, एफर्ट पर फोकस करें अक्सर हम बच्चे की तारीफ तभी करते हैं, जब उसके 10 में से 10 नंबर आते हैं। ऐसा न करके उसकी हर छोटी–छोटी कोशिश की तारीफ करें। अगर उसने एक कठिन सवाल को हल करने में 15 मिनट मेहनत की, भले ही उत्तर गलत आया हो, तो कहें, “मुझे खुशी है कि तुमने हार नहीं मानी और इसे हल करने का पूरा प्रयास किया।” इससे उसका ‘फेल होने का डर’ खत्म होगा। गलतियों को सीखने का हिस्सा बताएं जब वह गलती करे, तो उसे डांटने के बजाय कहें, ‘’कोई बात नहीं, हम गलतियों से ही सीखते हैं।’’ जब हम गलतियों को ‘नॉर्मलाइज’ कर देते हैं, तो बच्चा क्लास में सवाल पूछने से नहीं डरता है। विजुअल मेथड का इस्तेमाल करें आजकल यूट्यूब पर कई ऐसे चैनल्स हैं, जो एनिमेशन के जरिए मैथ समझाते-सिखाते हैं। साथ में बैठकर इसे बच्चे को दिखाएं। जो चीज दिखती है, वह जल्दी समझ में आती है। टीचर से मिलकर बात करें चूंकि बच्चा क्लास में बैठने से डर रहा है, इसलिए स्कूल का माहौल भी ठीक होना जरूरी है। इसके लिए टीचर से मिलें और उन्हें बताएं कि बच्चा ‘मैथ एंग्जाइटी’ से जूझ रहा है। उनसे कहें कि वे क्लास में उसे प्रोत्साहित करें और अचानक सबके सामने सवाल पूछकर उसे असहज न करें। टीचर बच्चे का डर आधा कर सकता है। जरूरत पड़ने पर ट्यूटर रखें कई बार स्कूल टीचर से बच्चे डरते हैं। इसके लिए एक शांत और इंटेलिजेंट ट्यूटर की मदद लें। ट्यूटर ऐसा होना चाहिए, जो सिलेबस पूरा करवाने के बजाय बच्चे के ‘बेसिक्स’ और ‘कॉन्फिडेंस’ पर काम करे। कभी-कभी बच्चे अपनों के बजाय किसी तीसरे व्यक्ति से ज्यादा शांति से सीखते हैं। मैथ्स को ‘इंटेलिजेंस’ का पैमाना न बनाएं अगर आपका बेटा बाकी विषयों में अच्छा है, तो इसका मतलब है कि वह होनहार है। हर बच्चे का दिमाग अलग होता है। कोई साइंस में अच्छा होता है तो कोई आर्ट में। जरूरी नहीं कि हर बच्चा ‘मैथ्स जीनियस’ ही बने। उसे यह भरोसा दिलाएं कि गणित में औसत रहना कोई अपराध नहीं है। जब
Mental Health Relationship Issue; Dr Jaya Sukul Clinical Psychologist Advice

Hindi News Lifestyle Mental Health Relationship Issue; Dr Jaya Sukul Clinical Psychologist Advice | Husband Wife 50 मिनट पहले कॉपी लिंक सवाल: मैं दिल्ली में रहती हूं। मेरी शादी को 3 साल हो गए हैं। मेरे हसबैंड बहुत समझदार हैं, लेकिन हर बात को मेंटल हेल्थ के फ्रेम में देखने लगते हैं। अगर मैं गुस्सा करती हूं तो कहते हैं, “ये कोई पुराना ट्रॉमा है।” मैं उदास होती हूं तो कहते हैं, “तुम्हें हीलिंग की जरूरत है।” वह मेरे बहुत नॉर्मल इमोशंस को भी मेंटल हेल्थ से लेबल कर देते हैं। पहले मैं उनकी बातों को इग्नोर कर देती थी। लेकिन अब मुझे बहुत फ्रस्ट्रेशन होता है। मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा जवाब: सबसे पहले तो शुक्रिया कि आपने अपनी फीलिंग्स को इतने साफ शब्दों में लिखा है। दूसरी बात ये कि ज्यादातर औरतें ऐसी परेशानियों में चुप बनी रहती हैं। सोचती हैं कि शायद मैं ही ओवररिएक्ट कर रही हूं। लेकिन आपने ये सवाल पूछा यानी आप अपनी भावनाओं को लेकर सजग हैं और खुद के बारे में भी सोच रही हैं। ये तारीफ की बात है। आपकी शादी को 3 साल हुए हैं। ये वो वक्त है, जब रिश्ता या तो मजबूती की ओर बढ़ रहा होता है या छोटी-छोटी दरारें दिखने लगती हैं। आपके सवाल से आपके हसबैंड समझदार लगते हैं, लेकिन हर इमोशन को ट्रॉमा कहने की उनकी आदत आपको फ्रस्ट्रेट कर रही है। चलिए, समझते हैं कि ये क्यों हो रहा है और आप क्या कर सकती हैं। ट्रॉमा क्या है? आमतौर पर लोग ट्रॉमा शब्द सुनते ही सोचते हैं कि ट्रॉमा का मतलब है, कोई बड़ा हादसा, जैसे एक्सिडेंट, हिंसा या मारपीट से हुई तकलीफ। जैसे हॉस्पिटल में ट्रॉमा सेंटर होता है, जहां गंभीर चोट वाले पेशेंट्स आते हैं। लेकिन साइकोलॉजी में ट्रॉमा की परिभाषा इससे कहीं ज्यादा विस्तृत है। ट्रॉमा सिर्फ ‘बुरा अनुभव’ भर नहीं है। जरूरी और बुनियादी चीजों की अनुपस्थिति भी ट्रॉमा ही है। इसे ऐसे समझिए कि मान लीजिए एक पेड़ है। उसे स्वस्थ रहने के लिए धूप, पानी, हवा और अच्छी मिट्टी चाहिए। भले ही उसे कोई काटे नहीं, तोड़े नहीं, लेकिन ये सारी जरूरी चीजें न मिलें, तो वो कमजोर हो जाएगा। ये पेड़ का ट्रॉमा है। इसी तरह बच्चे को प्यार, सुरक्षा, दया, प्रोटेक्शन और बिना शर्त का सपोर्ट चाहिए। अगर ये सबकुछ न मिले, तो भी ये ट्रॉमा है। भले ही उसके साथ कोई मारपीट न हुई हो। इस तरह देखें तो हर इंसान के जीवन में कोई-न-कोई ट्रॉमा होता है, क्योंकि हममें से कोई भी परफेक्ट वातावरण में नहीं पला–बढ़ा होता है। आपके हसबैंड इस बारे में अवेयर हैं आपके हसबैंड इस बारे में जागरूक हैं। इसका मतलब है कि वो शायद किताबें पढ़कर ट्रॉमा के बारे में सीख रहे हैं। ये भी हो सकता है कि उन्होंने कभी इसके लिए थेरेपी ली हो, जिससे उन्हें मदद मिली हो। ये अच्छी बात है, लेकिन समस्या ये है कि वो इसे हर छोटी बात पर अप्लाई कर देते हैं। आप कह रही हैं कि वह आपके सामान्य गुस्से या उदासी को भी ट्रॉमा कहकर लेबल कर देते हैं। इससे आपको लगता है कि वो आपकी फीलिंग्स को इग्नोर कर रहे हैं। क्या आपके हसबैंड ‘जज’ कर रहे हैं? अगर आपके हसबैंड बात-बात पर आपकी भावनाओं को ‘ट्रॉमा’ कहने लगे, तो थोड़ी सावधानी जरूरी है। मनोविज्ञान का ज्ञान अच्छी बात है, लेकिन अगर वो इसे सिर्फ आप पर थोप रहे हैं और खुद को ‘ज्ञानी’ मान रहे हैं, तो यह रिश्ते के लिए सही नहीं है। ये संवाद कब हेल्दी है और कब रेड फ्लैग, इसे ग्राफिक से समझिए- अगर ये रेड फ्लैग्स आपकी लाइफ से मैच करते हैं, तो ये रिश्ते को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, अच्छी बात ये है कि यह सबकुछ ठीक किया जा सकता है। आपके हसबैंड समझदार हैं, तो वो सुन सकते हैं। उनके बैकग्राउंड को समझें किसी के खास बिहेवियर की वजह समझने के लिए उसके बैकग्राउंड को समझना जरूरी है। ऐसा हो सकता है आपके हसबैंड ने खुद कोई ट्रॉमा फेस किया हो या किताबें पढ़कर खुद को हील किया हो। वो सोचते होंगे कि ये ज्ञान शेयर करके वो आपकी मदद कर रहे हैं। हर किसी की हीलिंग जर्नी अलग है यहां आपके हसबैंड को ये समझना चाहिए कि हर किसी की हीलिंग की जर्नी पर्सनल होती है। अगर कोई भी दूसरा शख्स किसी को बताए कि तुम्हें कोई ‘ट्रॉमा’ है तो वो पावर गेम जैसा लग सकता है। किसी को तकलीफ हो सकती है। बेहतर है कि खुद अपने ट्रॉमा को पहचानें और स्वीकारें, फिर खुद ही हीलिंग के लिए आगे बढ़ें। अपने हसबैंड से बात करें सबसे जरूरी है खुलकर बात करना, लेकिन गुस्से में नहीं, बल्कि शांति से। हसबैंड पर आरोप लगाने की बजाय उन्हें अपनी भावनाएं समझाएं। आप कुछ इस तरह कह सकती हैं- “मैं जानती हूं कि आपने साइकोलॉजी से बहुत कुछ सीखा है और आप मेरी मदद करना चाहते हो। लेकिन जब आप मेरी हर बात को ‘ट्रॉमा’ का नाम दे देते हो, तो मुझे लगता है कि मेरी भावनाओं की कोई कद्र नहीं है। मुझे चाहिए कि आप सिर्फ मुझे समझने की कोशिश करो।” अपनी समझ भी बढ़ाएं इस बारे में कुछ चीजें पढ़ें, खुद थोड़ा एक्टिव रहें। आप चाहें तो खुद मनोविज्ञान की कुछ अच्छी किताबें पढ़ सकती हैं, जैसे ‘बॉडी कीप्स द स्कोर’ या ‘द साइकोलॉजी ऑफ ट्रॉमा।’ इससे आपको समझ में आएगा कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। शायद आपकी नाराजगी कम हो जाए क्योंकि अब आप उनकी भाषा समझ पाएंगी। उनसे उसी भाषा में बात कर पाएंगी। याद रखें कि यह सब अपनी मर्जी और अपनी रफ्तार से करें। किसी के दबाव में आकर नहीं। जब बातचीत से हल न निकले तो क्या करें? अगर बार-बार समझाने के बाद भी उनका बर्ताव नहीं बदलता, तो बहुत परेशान न हों, एक्सपर्ट की मदद लें। एक्सपर्ट की हेल्प लें- आप दोनों ‘कपल थेरेपी’ ले सकते हैं। एक प्रोफेशनल थेरेपिस्ट आप दोनों को सही तालमेल बिठाना सिखा सकता है। एहसास जरूरी है, नाम नहीं- प्यार में एक-दूसरे की भावनाओं को समझना जरूरी है, उन पर कोई ‘ठप्पा’ या लेबल लगाना नहीं।
Digestion Brain Metabolism Health Advice

2 दिन पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक हम हमेशा से ये सुनते आए हैं कि सुबह खाली पेट पानी पीना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ये आदत बॉडी को रीस्टार्ट का मैसेज देती है। कुछ हेल्थ एक्सपर्ट्स इस आदत को ‘साइलेंट हीलर’ भी कहते हैं। इंग्लैंड की लॉफबोरो यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार, सुबह उठने के 30 मिनट के अंदर लगभग आधा लीटर पानी पीने से ब्रेन की फंक्शनिंग सुधरती है। आज जरूरत की खबर में हम इसका साइंस समझेंगे। साथ ही जानेंगे कि- यह डाइजेशन, वजन और मेंटल हेल्थ को कैसे प्रभावित करता है? कितना और किस तरह का पानी पीना सबसे सही है? एक्सपर्ट: डॉ. रोहित शर्मा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर सवाल- सुबह उठकर सबसे पहले पानी पीने से शरीर पर क्या असर पड़ता है? जवाब- सोते समय हमारा शरीर ‘रिकवरी और रिपेयर मोड’ में चला जाता है। इसके कारण मेटाबॉलिज्म और बॉडी के अन्य ऑर्गन्स स्लो हो जाते हैं। ऐसे में सुबह-सुबह पानी पीने से शरीर धीरे-धीरे इस मोड से बाहर आता है। जिससे- मूड संतुलित रहता है। फोकस में आसानी होती है। याददाश्त बेहतर रहती है। सोचने और फैसला लेने की क्षमता बढ़ती है। सवाल- सुबह-सुबह खाली पेट पानी पीना हमारे डाइजेशन को कैसे प्रभावित करता है? जवाब- जब हम सुबह खाली पेट पानी पीते हैं, तो पानी पेट में पहुंचकर पाचन तंत्र को धीरे-धीरे सक्रिय करता है। इससे पेट और आंतों की मांसपेशियों में मूवमेंट शुरू होती है। सुबह पानी पीने से ऐसे गैस्ट्रिक जूस और एंजाइम्स रिलीज होते हैं, जिससे खाना पचाने की क्षमता बढ़ती है। यह आदत कब्ज, एसिडिटी और ब्लोटिंग जैसी समस्याओं को कम करने में भी मदद करती है। सवाल- सुबह खाली पेट पानी पीने से किन बीमारियों का जोखिम कम होता है? जवाब- रोज सुबह खाली पेट पानी पीने की आदत कई लाइफस्टाइल डिजीज के रिस्क को कम कर सकती है। जब शरीर हाइड्रेटेड रहता है, तो मेटाबॉलिज्म बेहतर होता है और टॉक्सिन्स जमा नहीं होते। रिसर्च और क्लिनिकल ऑब्जर्वेशन के मुताबिक, सुबह पानी पीने की आदत किडनी स्टोन, यूरिन इन्फेक्शन, हाई ब्लड प्रेशर और कब्ज जैसी समस्याओं के खतरे को घटा सकती है। सवाल- क्या खाली पेट पानी पीना वजन कम करने में भी मददगार होता है? जवाब- हां, सुबह पानी पीने से मेटाबॉलिज्म 20–30% तक एक्टिव होता है। ये कैलोरी बर्न करने में मदद करता है। इसके अलावा पानी पेट को थोड़ा भरा हुआ महसूस कराता है, जिससे नाश्ते में ओवरईटिंग की संभावना कम हो जाती है। जो लोग खाने से पहले पानी पीते हैं, उनका कुल कैलोरी इनटेक कम होता है। सिर्फ पानी पीने से वजन कम नहीं होता। यह सिर्फ एक सपोर्टिव हैबिट है। वजह कम करने के लिए हेल्दी लाइफस्टाइल फॉलो करना भी जरूरी है। सवाल- सुबह खाली पेट पानी पीने का मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है? जवाब- मेंटल हेल्थ और हाइड्रेशन के बीच गहरा संबंध है। डिहाइड्रेशन से थकान, चिड़चिड़ापन और फोकस की कमी हो सकती है। सुबह पानी पीने से ब्रेन को पर्याप्त ऑक्सीजन और ब्लड सप्लाई मिलती है, जिससे एकाग्रता और अलर्टनेस बढ़ती है। यह स्ट्रेस हाॅर्मोन को बैलेंस करने में भी मदद करता है। डॉ. रोहित शर्मा बताते हैं कि सुबह पानी पीने से दिन की शुरुआत ज्यादा क्लियर और शांत होती है। सवाल- क्या सुबह उठकर पानी पीने से हमारे एनर्जी लेवल और मूड में फर्क आता है? जवाब- बिल्कुल। रात भर डिहाइड्रेटेड रहने के बाद शरीर सुस्त महसूस करता है। जैसे ही सुबह पानी पीते हैं, सेल्स एक्टिव होने लगती हैं और एनर्जी लेवल धीरे-धीरे बढ़ता है। इससे थकान कम होती है, सिर भारी लगने की समस्या घटती है और मूड बेहतर होता है। यही वजह है कि हेल्थ एक्सपर्ट्स चाय-कॉफी से पहले पानी पीने की सलाह देते हैं। सवाल- सुबह खाली पेट ठंडा पानी पीना चाहिए या गुनगुना पानी? जवाब- डॉ. रोहित शर्मा के मुताबिक, सुबह के समय गुनगुना या नॉर्मल टेम्परेचर का पानी ज्यादा फायदेमंद होता है। ठंडा पानी डाइजेशन को धीमा कर सकता है और कुछ लोगों में गैस या ऐंठन की समस्या पैदा कर सकता है। वहीं गुनगुना पानी डाइजेशन को एक्टिव करता है और टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करता है। सवाल- सुबह खाली पेट कितना पानी पीना चाहिए? जवाब- आमतौर पर 1 से 2 गिलास (250–500 ml) पानी पर्याप्त माना जाता है। शरीर की जरूरत, मौसम और हेल्थ कंडीशन के हिसाब से ये मात्रा अलग हो सकती है। सवाल- सुबह खाली पेट पानी पीते हुए क्या गलतियां नहीं करनी चाहिए? जवाब- अक्सर कुछ लोग सुबह खाली पेट पानी पीते समय कुछ गलतियां करते हैं, जो सेहत को फायदे की बजाय नुकसान पहुंचा सकती हैं। नीचे दिए ग्राफिक में कुछ कॉमन गलतियां बताई गई हैं, इन्हें देखिए- सवाल- किन्हें खाली पेट पानी पीते हुए थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए? जवाब- कुछ लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। जैसकि- जिन्हें किडनी से जुड़ी समस्याएं हैं। जिन्हें हार्ट से जुड़ी समस्याएं हैं। जिनका ब्लड प्रेशर लो रहता है। जिन्हें गंभीर गैस्ट्रिक इश्यू है। सुबह खाली पेट पानी पीना एक छोटी लेकिन असरदार आदत है। यह डाइजेशन, मेटाबॉलिज्म, मेंटल हेल्थ और ओवरऑल वेलबीइंग को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। ………………………… जरूरत की ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- आपके घर के पास है स्ट्रीट फूड:बढ़ सकता है शुगर, मोटापे का रिस्क, स्टडी में खुलासा, फूड हैबिट सुधारने के 11 टिप्स क्या आप भी ऐसी कॉलोनी या मोहल्ले में रहते हैं, जहां आसपास हर गली-नुक्कड़ पर स्ट्रीट फूड की दुकानें हैं। अगर हां, तो यह स्टडी आपके लिए बेहद अहम है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि कभी-कभार स्ट्रीट फूड खाने से क्या ही फर्क पड़ेगा। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Teen Daughter Mature Behavior; Child Psychology Advice

Hindi News Lifestyle Teen Daughter Mature Behavior; Child Psychology Advice | Social Media Screen Time 2 दिन पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक सवाल- मैं लखनऊ से हूं। मेरी 13 साल की बेटी काफी समझदार है। लेकिन कई बार वह ऐसी बातें करती है, जो उसकी उम्र के मुकाबले काफी ज्यादा मैच्योर होती हैं। कभी वह रिश्तों, जिम्मेदारियों या जिंदगी को लेकर ऐसी बात बोल देती है कि लगता है कि इतनी छोटी लड़की के दिमाग में ये बात कैसे आई। कभी उसकी समझदारी पर खुशी होती है तो कभी चिंता। मैं समझ नहीं पा रही कि यह समझदारी का संकेत है या कुछ और। कुछ समय से मैंने एक बात नोटिस की है कि अब वह जरूरत से ज्यादा जिम्मेदार, गंभीर और चुप रहने लगी है। क्या यह नॉर्मल डेवलपमेंट का हिस्सा है या इसके पीछे कोई अन्य कारण हो सकता है। बतौर पेरेंट मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- आपकी चिंता वाजिब है। अक्सर जब कोई बच्चा अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें करता है तो पेरेंट्स इसे ‘सयानापन’ मानकर इग्नोर कर देते हैं। लेकिन आप एक समझदार पेरेंट हैं, जो इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक कारणों को जानना चाहती हैं। सबसे पहले तो यह समझिए कि 13 साल की उम्र बहुत सेंसिटिव होती है। बच्चा ‘किशोरावस्था’ की दहलीज पर कदम रख रहा होता है। इस उम्र में बच्चे का ब्रेन बहुत तेजी से विकसित हो रहा होता है। खासकर वह हिस्सा, जो सोचने-समझने, सवाल करने और भविष्य के बारे में विचार करने से जुड़ा होता है। इसलिए इस उम्र में बच्चे हर विषय पर अपनी राय रखना चाहते हैं। इसमें चिंता की कोई बात नहीं है। हालांकि इसके पीछे के कारणों को आइडेंटिफाई करना जरूरी है। बच्चे उम्र से ज्यादा मैच्योर बातें क्यों करते हैं कई बार ऐसा होता है कि जब बच्चे घर में अक्सर समझदारी और जिम्मेदारी भरी बातें सुनते हैं तो वे सोचते हैं कि उन्हें भी ‘समझदार’ बनना पड़ेगा। इसके अलावा आज की पीढ़ी सोशल मीडिया एक्सपोजर के कारण बहुत जल्दी रिलेशनशिप, जिंदगी, असफलता और तुलना से रूबरू हो जाती है। इससे उनकी बातें बड़ों जैसी लग सकती हैं, लेकिन वे अभी भी बच्चे ही होते हैं। कुछ बच्चे स्वभाव से ही बहुत गहराई से सोचते हैं। वे दूसरों की भावनाएं जल्दी समझ लेते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर मैच्योर लगते हैं, लेकिन उन्हें सपोर्ट की जरूरत होती है। बच्चे के बिहेवियरल मैच्योरिटी के पीछे ऐसे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। बिहेवियरल मैच्योरिटी कब चिंताजनक? हर बच्चा अलग होता है। वह अपनी गति से मानसिक और भावनात्मक रूप से बड़ा होता है। कुछ बच्चों का व्यवहार उम्र से थोड़ा ज्यादा समझदार लग सकता है, जो पूरी तरह नॉर्मल है। लेकिन जब यह मैच्योरिटी बच्चे से उसका बचपन छीनने लगे या वह अपनी भावनाओं को दबाने लगे, तब यह चिंताजनक है। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स नॉर्मल और चिंताजनक बिहेवियर के फर्क को समझें। इन संकेतों से आप समय रहते यह जान सकती हैं कि बच्ची की मैच्योरिटी स्वाभाविक है या किसी प्रेशर का नतीजा। इसके अनुसार कुछ जरूरी कदम उठा सकती हैं। ऐसी स्थिति में पेरेंट्स क्या करें? जब बच्चा अपनी उम्र से ज्यादा मैच्योर व्यवहार दिखाए तो घबराने के बजाय संतुलित रवैया अपनाएं। आपकी प्रतिक्रिया ही तय करती है कि बच्चा खुद को कैसे ढालेगा। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। मैच्योरिटी की तारीफ सोच-समझकर करें बच्चे की समझदारी को सराहें, लेकिन बार-बार ये न कहें कि “तुम तो बहुत समझदार हो।“ इससे बच्चे पर यह दबाव बन सकता है कि उसे हर हाल में मजबूत और समझदार ही बने रहना है। उसे बचपन जीने का मौका दें उसे यह महसूस कराएं कि बच्चा होना, गलती करना, परेशान होना और मदद मांगना बिल्कुल ठीक है। उससे कहें, “तुम बच्ची हो, तुम्हें इतना ज्यादा सीरियस होने की जरूरत नहीं है।” खुली बातचीत का माहौल बनाएं बातचीत के दौरान बच्चे को जज बिल्कुल न करें। ऐसे सवाल पूछें– “बेटा, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?“ “तुमने ये कहां सुना?“ “तुम ऐसा क्यों सोचती हो?“ उसकी बातों को बिना टोके और बिना जजमेंट के सुनें। उसे मौज-मस्ती और खेलने का स्पेस दें बच्चा अगर कभी थोड़ी शैतानी करे, मस्ती करे तो बिल्कुल भी टोकें नहीं। उसकी सराहना करें। खुद भी उसके साथ हंसें-खेलें, हल्की-फुल्की बातें करें, मस्ती-मजाक करें। उसे यह एहसास दिलाएं कि बड़ा बनने की कोई जल्दी नहीं है। बचपन जीना भी बेहद जरूरी है। कोशिश करें कि आप भी उसके साथ बच्चे बन जाएं। खुद भी कभी बचपना करें, छोटी–छोटी शैतानियों को साथ मिलकर इंजॉय करें। सोशल मीडिया एक्सपोजर पर नजर रखें इस बात पर नजर रखें कि वह सोशल मीडिया पर क्या देख रही है, किस तरह का कंटेंट उसकी सोच को प्रभावित कर रहा है। जरूरत हो तो स्क्रीन टाइम और कंटेंट को लेकर बातचीत करें। जरूरत पड़े तो प्रोफेशनल मदद लें अगर बच्ची लगातार चुप रहे, इमोशनली बहुत भारी बातें करने लगे या खुद को ज्यादा दबाकर रखे तो काउंसलर या साइकोलॉजिस्ट से बात करने में बिल्कुल न हिचकें। पेरेंट्स न करें ये गलतियां कई बार माता-पिता अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जो बच्चे पर प्रेशर बढ़ा देती हैं। अच्छे इरादों के बावजूद कुछ प्रतिक्रियाएं बच्चे को गंभीर या इंट्रोवर्ट बना सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स अपनी भूमिका को लेकर सतर्क रहें और कुछ कॉमन गलतियों से बचें। अंत में मैं यही कहूंगी कि आपकी चिंता बताती है कि आप एक सजग और संवेदनशील मां हैं। समझदारी अच्छी बात है, लेकिन बचपन की कीमत पर नहीं। 13 साल की उम्र में मैच्योर बातें करना कई बार सामान्य होता है। लेकिन अगर इसके साथ चुप्पी बढ़ रही हो, जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी का भाव आ रहा है या बिटिया अपनी भावनाएं दबाने लगी है, तो इसे नजरअंदाज न करें। आपका काम उसे जल्दी बड़ा बनाना नहीं, बल्कि उसे सुरक्षित महसूस कराना है। उसे यह भरोसा दिलाएं, “कोई जिम्मेदारी तुम्हें अकेले नहीं उठानी है। हम तुम्हारे साथ हैं।” ………………… पेरेंटिंग से जुड़ी ये स्टोरी भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटी इंस्टा पर अकाउंट बनाना चाहती है: कहती है, ‘सब दोस्तों का है, मेरा क्यों नहीं?’ उसे ऑनलाइन दुनिया के खतरे कैसे
Is Personal Space Demand a Crime? Expert Relationship Advice for Mother Wife

Hindi News Lifestyle Is Personal Space Demand A Crime? Expert Relationship Advice For Mother Wife 2 दिन पहले कॉपी लिंक सवाल- मेरी शादी को 4 साल हो चुके हैं। 2 साल का बच्चा है। बीते कुछ दिनों से मेरे भीतर अजीब सा अलगाव पैदा हो रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे मैंने पिछले कुछ सालों में अपने लिए कुछ किया ही नहीं है। अब मुझे अकेले रहना ज्यादा अच्छा लगता है। जब मैं ये बात हसबैंड से शेयर करती हूं तो उन्हें लगता है कि मैं उनसे दूर जाना चाहती हूं। वो मुझे समझ ही नहीं पा रहे हैं। मुझे डर है कि कहीं हमारी केमिस्ट्री न खराब हो जाए। क्या रिश्ते में स्पेस मांगना गलत है? मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा जवाब- मैं अपने जवाब की शुुरुआत एक फिल्म से करना चाहूंगी। एक जॉर्जियन फिल्म है, “माय हैप्पी फैमिली।” इसमें एक शादीशुदा, भरे–पूरे परिवार वाली महिला आपकी ही तरह पर्सनल स्पेस चाहती है। थोड़ा अकेले रहना, थोड़ा अपने साथ वक्त बिताना, थोड़ा खुद से बातें करना। सोचिए, हिंदुस्तान से लेकर जॉर्जिया तक औरतें ये करना चाहती हैं। लेकिन बहुत कम में यह हिम्मत होती है कि वो आपकी तरह सवाल लिखकर अपने दिल की बात कहें। आपका सवाल ही बता रहा है कि आप एक संजीदा इंसान हैं। आप खुद को जानने-समझने की यात्रा तय करना चाहती हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। भारतीय समाज की मुश्किलें मुश्किल ये है कि हमारे समाज ने खुद के बारे में सोचने को स्वार्थ से जोड़ दिया है। महिलाओं के लिए तो ये और भी मुश्किल है। अगर कोई महिला कहती है कि उसे अकेले रहना अच्छा लगता है या उसे थोड़ा स्पेस चाहिए तो उस पर तुरंत सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। क्या रिश्ता ठीक नहीं है? क्या शादी में प्यार कम हो गया है? क्या पति से दूर जाना चाहती हो? जबकि सच्चाई यह है कि खुद के लिए समय मांगना, खुद को समझना, खुद के साथ रहना, ये सब रिश्ता तोड़ने के लिए नहीं, उसे बचाने के लिए की गई कोशिशें हैं। शादी का मतलब ‘सेल्फ’ का मर जाना नहीं हमारे समाज और संस्कृति में शादी की बुनियादी परिभाषा ही गलत है। हमें लगता है कि शादी होने का मतलब है, अब महिला की अपनी कोई निजता नहीं रह गई है। उसकी पहचान ही यही है कि वो पत्नी है, मां है, बहू है। लेकिन वो एक इंसान नहीं है, जो आजादी और एजेंसी चाह सकती है। शादी और उसमें भी खासतौर पर छोटे बच्चों की जिम्मेदारी बहुत डिमांडिंग जॉब है। अमूमन औरतों को उतनी मदद नहीं मिलती, जिसकी उन्हें जरूरत है। इन और ऐसे ही तमाम कारणों से अक्सर शादी में दूरियां आ जाती हैं। खुद को जानना है जरूरी इस दुनिया में हर इंसान का अपना अस्तित्व होता है। यहां पर अस्तित्व यानी “मैं कौन हूं, मुझे क्या अच्छा लगता है, मुझे किस चीज से खुशी मिलती है।” यह जानना इसलिए जरूरी है, क्योंकि दुनिया का हर रिश्ता इसके बाद ही आता है। भले ही वह रिश्ता पति-पत्नी का हो, माता-पिता का हो या मां-बच्चे का। अगर कोई इंसान अंदर से खुश नहीं है, संतुष्ट नहीं है, तो वह रिश्तों में भी खुशी नहीं बांट सकता है। स्पेस मांगने में गिल्ट क्यों? अपने लिए स्पेस मांगते हुए बिल्कुल भी संकोच या गिल्ट नहीं फील करना चाहिए। यह अकेलेपन की मांग नहीं, खुद के लिए स्पेस की चाहत है। रिश्ते में स्पेस मांगने का मतलब यह नहीं है कि आप अपने पति से दूर जाना चाहती हैं। इसका मतलब यह है कि आप खुद के करीब आना चाहती हैं। यह फर्क समझना बहुत जरूरी है। पर्सनल स्पेस में इंसान अपने इमोशंस को बेहतर ढंग से प्रोसेस करना सीखता है। वह खुशी और दुख को पहचानकर उनसे डील करना सीखता है। नकारात्मकता और एंग्जाइटी से निपटना सीखता है। इसका सकारात्मक असर उसके सभी रिश्तों पर पड़ता है। पर्सनल स्पेस के फायदे ग्राफिक में देखिए- कंपैशन और जिम्मेदारी से कहें अपनी बात बहुत मुमकिन है कि जब आप अपने हसबैंड से ये बात शेयर करेंगी तो उन्हें लगे कि आप उनसे दूर जाना चाहती हैं। यह उनकी गलतफहमी हो सकती है, लेकिन उनकी अपनी भावनाएं भी जायज हैं। इसलिए ऐसे मामले में बातचीत बहुत सोच-समझकर करनी चाहिए। ऐसी बातें भावनाओं में बहकर नहीं, समझदारी और थोड़ी डिप्लोमेसी के साथ करनी चाहिए। डिप्लोमेसी का मतलब चालाकी से नहीं, बल्कि सही भाषा से है। हसबैंड से पूछें ये सवाल क्या आपने कभी खुद के लिए समय निकाला है? क्या आप दोस्तों के साथ बाहर जाते हैं? क्या आप क्रिकेट देखते हैं, अपने शौक पूरे करते हैं? क्या आप यह सब करते हुए खुद को कम पति या कम पिता (पति या पिता का कम दायित्वबोध) महसूस करते हैं? जब वह इन सवालों का जवाब देंगे तो उन्हें धीरे-धीरे समझ आएगा कि जैसे उन्हें अपने तरीके से रिचार्ज होने का हक है, वैसे ही आपको भी हक है। यह तुलना नहीं, जरूरी उदाहरण है। असली समस्या न भूलें बात करते हुए यह न भूलें कि असल समस्या क्या है। उन्हें यह समझाने की कोशिश करें कि अगर आप खुद को नहीं संभालेंगी तो आगे चलकर इसका असर रिश्ते पर पड़ सकता है। बताएं कि आपको इसी बात का डर है। यहां ये समझना भी जरूरी है कि जब आप स्पेस मांगेंगी तो सामने वाला इंसान असहज हो सकता है। कुछ लोग इसे समझते हैं, जबकि कुछ लोग इसे अपने इगो पर ले लेते हैं। यह भी संभव है कि आपके पति साइलेंट ट्रीटमेंट देने लगें, आपसे बात करना कम कर दें, इंटिमेसी से दूरी बनाने लगें। आपको यह जताने लगें कि जैसे उन्हें आपकी जरूरत ही नहीं है। मानसिक रूप से तैयार रहें पति के इस तरह के रिएक्शंस उनकी अपनी असुरक्षा के कारण हो सकते हैं। उन्हें यह डर हो सकता है कि उनका आप पर कोई कंट्रोल नहीं रहेगा। इसलिए जरूरी है कि आप मानसिक रूप से तैयार रहें कि शुरुआत में सब कुछ स्मूद नहीं होगा। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि आप गलत हैं। यहां आपको इमोशनल नहीं, लॉजिकल रहना पड़ेगा। अगर वो आपसे कहें कि तुम ऐसा करोगी









