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Russian Yogini Annapurnas Agni Tapasya in 42°C

Russian Yogini Annapurnas Agni Tapasya in 42°C

हवा में उड़ती गरम राख, गोबर के कंडों (उपलों) से सुलगती 9 धूणी (अग्निकुंड) और उनके ठीक बीचों-बीच, तपते हुए अंगारों के घेरे में शांत मुद्रा में बैठी एक विदेशी महिला।

.

यह कोई आम नजारा नहीं, रूस से आईं योगिनी अन्नपूर्णा नाथ की ‘अग्नि तपस्या’ है। उन्होंने राजस्थान आकर नाथ संप्रदाय की दीक्षा ली थी।

3 मई को शुरू हुई यह तपस्या 25 मई तक चलने वाली है। रोज सुबह 11 से दोपहर 2 बजे तक अन्नपूर्णा नाथ तपस्या करती हैं।

दैनिक भास्कर की टीम इस योगिनी से मिलने पुष्कर (अजमेर) पहुंची। उनसे जाना कि आखिर इस कठोर अग्नि तपस्या को कैसे कर पा रही हैं, इसका मकसद क्या है?

‘पिन-ड्रॉप साइलेंस’ और कंटीले तारों का घेरा

अजमेर से पुष्कर मार्ग पर 12 किलोमीटर आगे बढ़ने पर संत बाबा सीताराम दास का समाधि स्थल आता है। जैसे ही हम मुख्य द्वार से अंदर जाने लगते हैं, एक सेवादार हाथ जोड़कर टोकता है- आगे जाना है तो जुबान पर ताला लगा लीजिए। जरा सी आवाज और पैर की आहट भी उनका (अन्नपूर्णा नाथ) ध्यान भटका सकती है। उनकी तपस्या भंग हो सकती है।

आगे बढ़ने पर हमारी नजरें उस जगह टिक जाती हैं जहां सुरक्षा के लिए चारों तरफ कंटीले तारों की फेंसिंग (तारबंदी) की गई है। भीतर का दृश्य स्तब्ध कर देने वाला था। चारों तरफ से आग की लपटें उठ रही थीं। वहां का तापमान इस वक्त सामान्य से कहीं ज्यादा, करीब 48 डिग्री सेल्सियस महसूस हो रहा था। पूरे शरीर पर भस्म (राख) लपेटे योगिनी अन्नपूर्णा और उनके गुरु योगी दीपक नाथ इस दहकते घेरे के बीच साधना में लीन थे।

अजमेर से पुष्कर मार्ग पर 12 किलोमीटर आगे संत बाबा सीताराम दास का समाधि स्थल है। यहां दीपक नाथ और अन्नपूर्णा नाथ साधना में लीन रहते हैं।

धूणी की परिक्रमा

आस-पास के कुछ श्रद्धालु वहां धूणी की परिक्रमा कर बिना शोर किए लौट रहे थे। वहां सेवा में जुटे एक सेवक रोहित से बात हुई। उनसे पूछा कि तपस्या कितने घंटे चलती है। उन्होंने बताया- 3 घंटे। हमारा अगला सवाल था- इन्हें कैसे पता चलता है कि अब समाप्त करने का समय आ गया है। इस पर सेवक ने कहा कि उन्हें खुद से ही पता चल जाता है। हमने तपस्या पूरी होने का इंतजार किया।

साधना पूर्ण करने के बाद धूणी से उठते समय प्रणाम करती हुई योगिनी अन्नपूर्णा नाथ।

साधना पूर्ण करने के बाद धूणी से उठते समय प्रणाम करती हुई योगिनी अन्नपूर्णा नाथ।

ठीक 2 बजते ही योगियों की आंखें खुलीं

घड़ी में जैसे ही दोपहर के ठीक 2 बजे, चमत्कारिक रूप से दोनों योगियों की आंखें खुलीं। उन्होंने जलती धूणी को प्रणाम किया, योगिनी अन्नपूर्णा ने अपने गुरु के चरण छुए और शरीर से भस्म साफ करने चली गईं।

काफी देर इंतजार के बाद योगिनी हमसे बातचीत करने के लिए तैयार होती हैं।

पढ़िए योगिनी अन्नपूर्णा नाथ से हुई बातचीत के प्रमुख अंश…

सवाल : आप रूस से हैं और हमें पता चला कि आपका नाम अन्नपूर्णा है, ये नाम किसने दिया?

जवाब : मेरा नाम अन्नपूर्णा नहीं, जबकि योगिनी अन्नपूर्णा नाथ है। मुझे ये नाम मेरे गुरु ने दिया था। मेरे गुरु मुझे सोमनाथ में मिले थे।

सवाल : इससे पहले आपका क्या नाम था?

जवाब : मैं नहीं जानती मेरा पहले क्या नाम था। बस यही एक नाम है और ये नाम भगवान के नाम पर है।

सवाल : इतनी भीषण गर्मी में कैसे एक जगह बैठकर तप कर पा रही हैं?

जवाब : ये जानने के लिए तो आपको भी ऐसी साधना में आना होगा। मैं नहीं जानती कि तापमान कितना ज्यादा है और कितनी धूप है। इसके लिए आपको गहराई में जाना पड़ेगा कि ये सब कैसे संभव है। फिलहाल मेरे पास इसका जवाब नहीं है।

सवाल : हमने देखा जब आप साधना में लीन थीं, तब कुछ लोग आपकी धूणी की परिक्रमा करने भी आ रहे थे?

जवाब : हां… जब मैं ध्यान में बैठती हूं तो आसपास के लोग परिक्रमा करने आते हैं। मैंने कुछ महिलाओं की पायल की आवाज सुनी, जिससे मुझे ये आभास हुआ।

तपस्या पूरी करने के बाद योगिनी अन्नपूर्णा नाथ और उनके गुरु दीपक नाथ ने दैनिक भास्कर से बात की।

तपस्या पूरी करने के बाद योगिनी अन्नपूर्णा नाथ और उनके गुरु दीपक नाथ ने दैनिक भास्कर से बात की।

सवाल : आप यहां पर कैसे रहती हैं और तप के लिए दिनचर्या क्या रहती है?

जवाब : ये बताना सही नहीं होगा। हमारी दिनचर्या हर दिन एक जैसी नहीं रहती है। किसी से शेयर नहीं कर सकते। यह गुप्त है। हम तपस्या करते हैं। ये मन और नगर की शांति के लिए होता है तो परिणाम सबके सामने रहता है।

सवाल : इस जगह (समाधि स्थल) के बारे में आप क्या जानती हैं?

जवाब : इस जगह पर हिंदू-मुस्लिम दोनों कम्युनिटी के लोग आते हैं। साधुओं की ये तपोभूमि है। एक हजार साल से भी ज्यादा पुरानी यह जगह है।

सवाल : आप भारत पहली बार कब आई थीं? क्या आपको यहां पर आध्यात्म ने आकर्षित किया?

जवाब : मैं पहली बार भारत जनवरी 2005 में बतौर टूरिस्ट आई थी। पुष्कर आई तो यहां नाथ बाबाओं से मिली। भारत में मुझे यहां की मिट्टी ने सबसे ज्यादा आकर्षित किया। जब यहां पर आकर फ्लाइट से उतरते हैं और सांस लेते हैं तो मिट्टी की खुश्बू के आगे सब कुछ खत्म हो जाता है।

तपस्या के दौरान योगिनी अन्नपूर्णा नाथ। अन्नपूर्णा नाथ ने बताया कि उन्हें नाथ की उपाधि गुरु दीपक नाथ से मिली है।

तपस्या के दौरान योगिनी अन्नपूर्णा नाथ। अन्नपूर्णा नाथ ने बताया कि उन्हें नाथ की उपाधि गुरु दीपक नाथ से मिली है।

सवाल : नाथ संप्रदाय के बारे में क्या जानती हैं और इसके बारे में कैसे पता चला?

जवाब : मैं नाथ संप्रदाय के बारे में कुछ नहीं जानती थी, क्योंकि ये आम दुनिया के लिए सीक्रेट है। यहां आकर नाथ साधुओं से मिली तो संप्रदाय के बारे में पता चला। इसके बाद मैं पुष्कर आने लगी। साल 2016 में अपने गुरु दीपक नाथ से दीक्षा ली। इसके बाद मुझे अन्नपूर्णा नाम और नाथ की उपाधि मिली।

सवाल : भारतीय कल्चर से इतनी गहराई से कैसे कनेक्ट हुईं?

जवाब : मैं भारत में 52 शक्तिपीठ की यात्रा भी कर रही हूं। अब तक 35 शक्तिपीठ पर जा चुकी हूं। मेरे गुरुजी दीपक साधना और भक्ति को लेकर काफी स्ट्रिक्ट हैं। यही वजह है मैं जल्द ही यहां की कल्चर से कनेक्ट हो गई।

सवाल : आपकी नजर में आध्यात्म क्या है?

जवाब : इस बारे में कहना मुश्किल हैं कि वास्तव में ‘स्प्रिचुअलिटी’ क्या है? मैं बस साधना कर रही हूं….ये एक प्रकार की काया (शारीरिक) की साधना है।

सवाल : आप सोशल मीडिया से कनेक्ट हैं?

जवाब : फिलहाल तो नहीं, लेकिन इससे पहले मैं एक जर्नलिस्ट थी। तब कनेक्ट रहती थी। अब जरूरत पड़ने पर सिर्फ टेलीग्राम चलाती हूं।

अग्नि तपस्या के दौरान साधक अपने शरीर पर भस्म का लेप करते हैं।

अग्नि तपस्या के दौरान साधक अपने शरीर पर भस्म का लेप करते हैं।

21 साल पहले पहली बार भारत आईं

30 साल की योगिनी अन्नपूर्णा ने अपनी पुरानी पहचान तो नहीं बताई, लेकिन बातचीत में इतना जरूर बताया कि वे पहले पश्चिमी रूस के ऐतिहासिक हर ट्वेर की रहने वाली हैं। वे 8 महीने की थीं तो अपने पिता के साथ रूस से कजाकिस्तान रहने लगीं। करीब 16 साल वहीं गुजारे। फिर रूस लौटकर एक इंडिपेंडेंट अखबार नोवाया गजेटा में बतौर जर्नलिस्ट काम किया। 21 साल पहले पहली बार भारत आईं और पिछले 10 साल से नाथ संप्रदाय के नियमों को फॉलो कर रही हैं।

गुरु कर रहे 5वीं बार अग्नि तपस्या

योगिनी से बातचीत के बाद हमने उनके गुरु दीपक नाथ से बातचीत की। वे पांचवी बार अग्नि तपस्या कर रहे हैं। उनसे हमने पूछा कि ये तपस्या गर्मी के दिनों में ही क्यों होती है। इस पर उन्होंने कहा- ये आदि-अनादिकाल से चली आ रही परंपरा है। अग्नि तपस्या चैत्र वैशाख में ही की जाती है। गर्मी में अग्नि तपस्या, बारिश में चातुर्मास और ठंडी में जलधारा तपस्या की जाती है। जलधारा तपस्या में मटकों से जलधारा गिरती रहती है। नवरात्रि पर हम खड़ेश्वरी तपस्या करते हैं।

उपलों की संख्या के साथ घटता रहता है समय

दीपक दास के अनुसार, अग्नि तप में धूणी में उपलों की हर दिन संख्या बढ़ती रहती है। जैसे-जैसे उपलों की संख्या बढ़ती हैं, वैसे ही तपस्या का समय घटता रहता है। शुरुआत में 3 घंटे का तप होता है। अंतिम दिन ये समय सबसे कम रह जाता है। योगिनी अन्नपूर्णा चार बार खड़ेश्वरी तपस्या और एक बार जलधारा तपस्या कर चुकी हैं।

नाथ संप्रदाय में महिला को दीक्षा देने पर मिलता है दंड

योगी दीपक दास से हमने पूछा कि एक महिला को योगिनी कैसे बनाते हैं? उन्होंने बताया- पहले चोटी संस्कार किया जाता है। इनकी इच्छा भी संप्रदाय के आध्यात्म से जुड़ने की थी। नाथ संप्रदाय की मर्यादा सख्त है। महिला को दीक्षा देने पर दंड भी देना पड़ता है। 12 साल पहले तक तो 11 हजार रुपए का दंड लगता था। वहीं अब ढाई लाख रुपए का दंड है।

योगी दीपक दास ने बताया कि नाथ संप्रदाय में कभी भी नर-नारी में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। इसमें नर के दीक्षा लेने पर भी ‘नाथ’ कहलाता है। एक महिला दीक्षा लेती है तो उसे भी ‘नाथजी’ ही कहा जाएगा।

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यह खबर भी पढ़िए…

रूसी महिला की पुष्कर में 9 दिनों की खड़ी तपस्या, पैर सूज गए, फिर भी नहीं बैठी

पुष्कर सरोवर के जयपुर घाट पर रूसी नागरिक और नाथ संप्रदाय की साध्वी योगिनी अन्नपूर्णा नाथ ‘खड़ेश्वरी तप’ कर रही हैं। इसमें बिना बैठे और बिना सोए 24 घंटे साधना करना पड़ती है। (पूरी खबर पढ़ें…)

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3 मई को शुरू हुई यह तपस्या 25 मई तक चलने वाली है। रोज सुबह 11 से दोपहर 2 बजे तक अन्नपूर्णा नाथ तपस्या करती हैं।

दैनिक भास्कर की टीम इस योगिनी से मिलने पुष्कर (अजमेर) पहुंची। उनसे जाना कि आखिर इस कठोर अग्नि तपस्या को कैसे कर पा रही हैं, इसका मकसद क्या है?

‘पिन-ड्रॉप साइलेंस’ और कंटीले तारों का घेरा

अजमेर से पुष्कर मार्ग पर 12 किलोमीटर आगे बढ़ने पर संत बाबा सीताराम दास का समाधि स्थल आता है। जैसे ही हम मुख्य द्वार से अंदर जाने लगते हैं, एक सेवादार हाथ जोड़कर टोकता है- आगे जाना है तो जुबान पर ताला लगा लीजिए। जरा सी आवाज और पैर की आहट भी उनका (अन्नपूर्णा नाथ) ध्यान भटका सकती है। उनकी तपस्या भंग हो सकती है।

आगे बढ़ने पर हमारी नजरें उस जगह टिक जाती हैं जहां सुरक्षा के लिए चारों तरफ कंटीले तारों की फेंसिंग (तारबंदी) की गई है। भीतर का दृश्य स्तब्ध कर देने वाला था। चारों तरफ से आग की लपटें उठ रही थीं। वहां का तापमान इस वक्त सामान्य से कहीं ज्यादा, करीब 48 डिग्री सेल्सियस महसूस हो रहा था। पूरे शरीर पर भस्म (राख) लपेटे योगिनी अन्नपूर्णा और उनके गुरु योगी दीपक नाथ इस दहकते घेरे के बीच साधना में लीन थे।

अजमेर से पुष्कर मार्ग पर 12 किलोमीटर आगे संत बाबा सीताराम दास का समाधि स्थल है। यहां दीपक नाथ और अन्नपूर्णा नाथ साधना में लीन रहते हैं।

धूणी की परिक्रमा

आस-पास के कुछ श्रद्धालु वहां धूणी की परिक्रमा कर बिना शोर किए लौट रहे थे। वहां सेवा में जुटे एक सेवक रोहित से बात हुई। उनसे पूछा कि तपस्या कितने घंटे चलती है। उन्होंने बताया- 3 घंटे। हमारा अगला सवाल था- इन्हें कैसे पता चलता है कि अब समाप्त करने का समय आ गया है। इस पर सेवक ने कहा कि उन्हें खुद से ही पता चल जाता है। हमने तपस्या पूरी होने का इंतजार किया।

साधना पूर्ण करने के बाद धूणी से उठते समय प्रणाम करती हुई योगिनी अन्नपूर्णा नाथ।

साधना पूर्ण करने के बाद धूणी से उठते समय प्रणाम करती हुई योगिनी अन्नपूर्णा नाथ।

ठीक 2 बजते ही योगियों की आंखें खुलीं

घड़ी में जैसे ही दोपहर के ठीक 2 बजे, चमत्कारिक रूप से दोनों योगियों की आंखें खुलीं। उन्होंने जलती धूणी को प्रणाम किया, योगिनी अन्नपूर्णा ने अपने गुरु के चरण छुए और शरीर से भस्म साफ करने चली गईं।

काफी देर इंतजार के बाद योगिनी हमसे बातचीत करने के लिए तैयार होती हैं।

पढ़िए योगिनी अन्नपूर्णा नाथ से हुई बातचीत के प्रमुख अंश…

सवाल : आप रूस से हैं और हमें पता चला कि आपका नाम अन्नपूर्णा है, ये नाम किसने दिया?

जवाब : मेरा नाम अन्नपूर्णा नहीं, जबकि योगिनी अन्नपूर्णा नाथ है। मुझे ये नाम मेरे गुरु ने दिया था। मेरे गुरु मुझे सोमनाथ में मिले थे।

सवाल : इससे पहले आपका क्या नाम था?

जवाब : मैं नहीं जानती मेरा पहले क्या नाम था। बस यही एक नाम है और ये नाम भगवान के नाम पर है।

सवाल : इतनी भीषण गर्मी में कैसे एक जगह बैठकर तप कर पा रही हैं?

जवाब : ये जानने के लिए तो आपको भी ऐसी साधना में आना होगा। मैं नहीं जानती कि तापमान कितना ज्यादा है और कितनी धूप है। इसके लिए आपको गहराई में जाना पड़ेगा कि ये सब कैसे संभव है। फिलहाल मेरे पास इसका जवाब नहीं है।

सवाल : हमने देखा जब आप साधना में लीन थीं, तब कुछ लोग आपकी धूणी की परिक्रमा करने भी आ रहे थे?

जवाब : हां… जब मैं ध्यान में बैठती हूं तो आसपास के लोग परिक्रमा करने आते हैं। मैंने कुछ महिलाओं की पायल की आवाज सुनी, जिससे मुझे ये आभास हुआ।

तपस्या पूरी करने के बाद योगिनी अन्नपूर्णा नाथ और उनके गुरु दीपक नाथ ने दैनिक भास्कर से बात की।

तपस्या पूरी करने के बाद योगिनी अन्नपूर्णा नाथ और उनके गुरु दीपक नाथ ने दैनिक भास्कर से बात की।

सवाल : आप यहां पर कैसे रहती हैं और तप के लिए दिनचर्या क्या रहती है?

जवाब : ये बताना सही नहीं होगा। हमारी दिनचर्या हर दिन एक जैसी नहीं रहती है। किसी से शेयर नहीं कर सकते। यह गुप्त है। हम तपस्या करते हैं। ये मन और नगर की शांति के लिए होता है तो परिणाम सबके सामने रहता है।

सवाल : इस जगह (समाधि स्थल) के बारे में आप क्या जानती हैं?

जवाब : इस जगह पर हिंदू-मुस्लिम दोनों कम्युनिटी के लोग आते हैं। साधुओं की ये तपोभूमि है। एक हजार साल से भी ज्यादा पुरानी यह जगह है।

सवाल : आप भारत पहली बार कब आई थीं? क्या आपको यहां पर आध्यात्म ने आकर्षित किया?

जवाब : मैं पहली बार भारत जनवरी 2005 में बतौर टूरिस्ट आई थी। पुष्कर आई तो यहां नाथ बाबाओं से मिली। भारत में मुझे यहां की मिट्टी ने सबसे ज्यादा आकर्षित किया। जब यहां पर आकर फ्लाइट से उतरते हैं और सांस लेते हैं तो मिट्टी की खुश्बू के आगे सब कुछ खत्म हो जाता है।

तपस्या के दौरान योगिनी अन्नपूर्णा नाथ। अन्नपूर्णा नाथ ने बताया कि उन्हें नाथ की उपाधि गुरु दीपक नाथ से मिली है।

तपस्या के दौरान योगिनी अन्नपूर्णा नाथ। अन्नपूर्णा नाथ ने बताया कि उन्हें नाथ की उपाधि गुरु दीपक नाथ से मिली है।

सवाल : नाथ संप्रदाय के बारे में क्या जानती हैं और इसके बारे में कैसे पता चला?

जवाब : मैं नाथ संप्रदाय के बारे में कुछ नहीं जानती थी, क्योंकि ये आम दुनिया के लिए सीक्रेट है। यहां आकर नाथ साधुओं से मिली तो संप्रदाय के बारे में पता चला। इसके बाद मैं पुष्कर आने लगी। साल 2016 में अपने गुरु दीपक नाथ से दीक्षा ली। इसके बाद मुझे अन्नपूर्णा नाम और नाथ की उपाधि मिली।

सवाल : भारतीय कल्चर से इतनी गहराई से कैसे कनेक्ट हुईं?

जवाब : मैं भारत में 52 शक्तिपीठ की यात्रा भी कर रही हूं। अब तक 35 शक्तिपीठ पर जा चुकी हूं। मेरे गुरुजी दीपक साधना और भक्ति को लेकर काफी स्ट्रिक्ट हैं। यही वजह है मैं जल्द ही यहां की कल्चर से कनेक्ट हो गई।

सवाल : आपकी नजर में आध्यात्म क्या है?

जवाब : इस बारे में कहना मुश्किल हैं कि वास्तव में ‘स्प्रिचुअलिटी’ क्या है? मैं बस साधना कर रही हूं….ये एक प्रकार की काया (शारीरिक) की साधना है।

सवाल : आप सोशल मीडिया से कनेक्ट हैं?

जवाब : फिलहाल तो नहीं, लेकिन इससे पहले मैं एक जर्नलिस्ट थी। तब कनेक्ट रहती थी। अब जरूरत पड़ने पर सिर्फ टेलीग्राम चलाती हूं।

अग्नि तपस्या के दौरान साधक अपने शरीर पर भस्म का लेप करते हैं।

अग्नि तपस्या के दौरान साधक अपने शरीर पर भस्म का लेप करते हैं।

21 साल पहले पहली बार भारत आईं

30 साल की योगिनी अन्नपूर्णा ने अपनी पुरानी पहचान तो नहीं बताई, लेकिन बातचीत में इतना जरूर बताया कि वे पहले पश्चिमी रूस के ऐतिहासिक हर ट्वेर की रहने वाली हैं। वे 8 महीने की थीं तो अपने पिता के साथ रूस से कजाकिस्तान रहने लगीं। करीब 16 साल वहीं गुजारे। फिर रूस लौटकर एक इंडिपेंडेंट अखबार नोवाया गजेटा में बतौर जर्नलिस्ट काम किया। 21 साल पहले पहली बार भारत आईं और पिछले 10 साल से नाथ संप्रदाय के नियमों को फॉलो कर रही हैं।

गुरु कर रहे 5वीं बार अग्नि तपस्या

योगिनी से बातचीत के बाद हमने उनके गुरु दीपक नाथ से बातचीत की। वे पांचवी बार अग्नि तपस्या कर रहे हैं। उनसे हमने पूछा कि ये तपस्या गर्मी के दिनों में ही क्यों होती है। इस पर उन्होंने कहा- ये आदि-अनादिकाल से चली आ रही परंपरा है। अग्नि तपस्या चैत्र वैशाख में ही की जाती है। गर्मी में अग्नि तपस्या, बारिश में चातुर्मास और ठंडी में जलधारा तपस्या की जाती है। जलधारा तपस्या में मटकों से जलधारा गिरती रहती है। नवरात्रि पर हम खड़ेश्वरी तपस्या करते हैं।

उपलों की संख्या के साथ घटता रहता है समय

दीपक दास के अनुसार, अग्नि तप में धूणी में उपलों की हर दिन संख्या बढ़ती रहती है। जैसे-जैसे उपलों की संख्या बढ़ती हैं, वैसे ही तपस्या का समय घटता रहता है। शुरुआत में 3 घंटे का तप होता है। अंतिम दिन ये समय सबसे कम रह जाता है। योगिनी अन्नपूर्णा चार बार खड़ेश्वरी तपस्या और एक बार जलधारा तपस्या कर चुकी हैं।

नाथ संप्रदाय में महिला को दीक्षा देने पर मिलता है दंड

योगी दीपक दास से हमने पूछा कि एक महिला को योगिनी कैसे बनाते हैं? उन्होंने बताया- पहले चोटी संस्कार किया जाता है। इनकी इच्छा भी संप्रदाय के आध्यात्म से जुड़ने की थी। नाथ संप्रदाय की मर्यादा सख्त है। महिला को दीक्षा देने पर दंड भी देना पड़ता है। 12 साल पहले तक तो 11 हजार रुपए का दंड लगता था। वहीं अब ढाई लाख रुपए का दंड है।

योगी दीपक दास ने बताया कि नाथ संप्रदाय में कभी भी नर-नारी में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। इसमें नर के दीक्षा लेने पर भी ‘नाथ’ कहलाता है। एक महिला दीक्षा लेती है तो उसे भी ‘नाथजी’ ही कहा जाएगा।

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