Emotional Manipulation: Relationship Stress Advice

Hindi News Lifestyle Emotional Manipulation: Relationship Stress Advice | Psychologist Jaya Sukul Tips 41 मिनट पहले कॉपी लिंक सवाल- मैं एक सरकारी बैंक में कैशियर हूं। कुछ महीनों से एक लड़की के साथ रिलेशनशिप में हूं। हमारे बीच सब अच्छा है, लेकिन वो अपनी जरूरतें सीधे बोलने की बजाय इशारों में कहती है। जैसे- ‘मेरे पास बाहर जाने के लिए अच्छे कपड़े नहीं हैं।’ ‘उस लड़की की वॉच कितनी अच्छी है।’ ‘उस लड़की का बैग कितना प्यारा लग रहा है।’ कई बार वो अपने फाइनेंशियल या पर्सनल स्ट्रेस भी ऐसे ही बताती है, ताकि मैं खुद मदद की पेशकश करूं। शुरू में मैंने किया भी, लेकिन अब मैं मेंटली थक गया हूं। क्या वह जानबूझकर ऐसा करती है ताकि मैं गिल्ट महसूस करूं? क्या ये इमोशनल इंफ्लुएंस है? मुझे क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा जवाब- सबसे पहले तो शुक्रिया कि आपने इतने स्पष्ट शब्दों में सवाल पूछा। इसी तरह हेल्दी रिलेशनशिप के लिए भी स्पष्ट संवाद जरूरी है। आपने लिखा कि आपकी पार्टनर हर बात इशारों में कहती है। ऐसी स्थिति में थकान महसूस होना स्वाभाविक है। चलिए आपकी सिचुएशन को समझते हैं और प्रैक्टिकल सॉल्यूशन पर बात करते हैं। पार्टनर बता रहा है या पहेली बुझा रहा है? रिलेशनशिप में अपनी बात रखना हर किसी का हक है, लेकिन उसे कहने का तरीका स्पष्ट होना चाहिए। बार-बार बातों को घुमाना और खुद को ‘बेचारा’ दिखाना इमोशनल मैनिपुलेशन है। यह स्थिति धीरे-धीरे रिश्ते की सहजता को खत्म कर सकती है। ग्राफिक में दिए उदाहरणों से समझें कि ‘मैनिपुलेशन’ और ‘हेल्दी कम्युनिकेशन’ में क्या फर्क है- मैनिपुलेशन की साइकोलॉजी अगर किसी रिलेशनशिप में एक पार्टनर हर बार इशारों में बात कहता है, तो दूसरा ‘डिकोडिंग मोड’ में चला जाता है। इसे ‘डिसीजन फटीग’ भी कहते हैं, जहां व्यक्ति हर वक्त यह सोचकर तनाव में रहता है कि सामने वाले की किस बात का क्या मतलब है। आपने लिखा कि आपकी गर्लफ्रेंड अपनी डिमांड्स इसी तरह रखती है। इसके बावजूद अगर आप सभी डिमांड्स पूरी कर रहे हैं तो आपको सेल्फ-एसेसमेंट करना चाहिए। कहीं आप ‘गिल्ट ट्रिप’ के शिकार तो नहीं, अपना सेल्फ-एसेसमेंट करें रिश्तों में कभी-कभी हम वह सब भी करने लगते हैं, जो नहीं करना चाहते। इसकी वजह ‘गिल्ट’ हो सकती है। नीचे दिए एसेसमेंट टेस्ट से समझिए कि कहीं आप ‘गिल्ट ट्रिप’ में तो नहीं जा रहे हैं। कैसे करें? नीचे ग्राफिक में 7 सवाल दिए गए हैं। हर सवाल को ध्यान से पढ़ें और अपनी स्थिति के अनुसार खुद को 0 से 3 के बीच नंबर दें- 0: बिल्कुल नहीं 1: कभी-कभार 2: अक्सर 3: हमेशा/हर बार फिर स्कोर एनालिसिस करें- सभी सवालों के नंबरों को जोड़ लें और अपना टोटल स्कोर देखें। अगर स्कोर 15 से ऊपर है, तो यह ‘क्रॉनिक गिल्ट ट्रिप’ का संकेत है। इसका मतलब है कि आपको अपनी बाउंड्रीज तय करने और खुद पर काम करने की सख्त जरूरत है। अगर स्कोर 6-14 के बीच है तो सतर्क हो जाएं और सुधार करें। अगर स्कोर 1-5 के बीच है तो कोई समस्या नहीं है। प्रेम का मतलब अटकलें लगाना नहीं है आपने लिखा कि वह अपनी पर्सनल बातें शेयर करते समय भी यही तरीका फॉलो करती है। साइकोलॉजी के मुताबिक, कुछ लोग ऐसा इसलिए करते हैं, ताकि ‘ना’ की गुंजाइश खत्म हो जाए। उन्हें लगता है कि चीजें सीधे मांगने पर मना किया जा सकता है। इसलिए वे अपनी बात कहने के लिए इशारों का सहारा लेते हैं। लेकिन किसी भी रिश्ते में यह तरीका हेल्दी नहीं है। रिलेशनशिप में यह तरीका टॉक्सिक है कभी-कभी लोग अनजाने में भी इस तरह बिहेव करते हैं। ऐसा हो सकता है कि उन्होंने बचपन से इसी तरह अपनी बातें मनवाई हों। इसे ‘लर्न्ड बिहेवियर’ कहते हैं। लेकिन एडल्ट रिलेशनशिप में यह तरीका ‘टॉक्सिक’ है। आपको भी यह समझना होगा कि हेल्दी और टॉक्सिक बिहेवियर में क्या फर्क है- समझदार आदमी को क्या करना चाहिए? नीचे दिए 6 पॉइंट्स से समझें कि इस सिचुशन में क्या करना चाहिए- बाउंड्री सेट करें: अपनी आर्थिक और मानसिक सीमाओं को स्पष्ट करें। बताएं कि आप क्या कर सकते हैं और क्या आपकी क्षमता से बाहर है। खुलकर बातचीत करें: जब वह इशारों में बात करे तो बहुत ही सौम्यता से कहें, “मैं समझ नहीं पा रहा कि तुम क्या कहना चाह रही हो, क्या तुम खुलकर बताओगी?” पार्टनर को अपनी बात सीधे कहने के लिए प्रोत्साहित करें। पैसे का दिखावा न करें: रिश्ते में गिफ्ट्स से ज्यादा अहमियत समय और इमोशनल सपोर्ट को दें। शर्मिंदगी महसूस न करें: अगर आप कोई डिमांड पूरी नहीं कर पाते तो उसे अपनी असफलता न मानें। गर्लफ्रेंड को ‘क्राउन’ न समझें: उसे अपना पार्टनर मानें। एक साथी अपनी जरूरतों के लिए दूसरे पर दबाव नहीं डालता, बल्कि मिलकर समाधान निकालता है। शोशेबाजी न करें: बाहरी चमक-धमक की बजाय रिश्ते की गहराई और सच्चाई पर ध्यान दें। अंतिम सलाह कोई रिश्ता ‘माइंड रीडिंग’ से नहीं, बल्कि ‘स्पष्ट संवाद’ से सुंदर बनता है। अगर पार्टनर की बातें पहेली बन जाएं, तो उन्हें सुलझाने की बजाय खुलकर बात करें। विनम्रता से अपनी बाउंड्रीज बताएं और खुद को भी अनावश्यक गिल्ट से मुक्त रखें। ……………… ये खबर भी पढ़िए रिलेशनशिप एडवाइज- कहीं मुझे प्यार तो नहीं हो गया: हमेशा बस उसका ही ख्याल, न देखूं तो बेचैनी, ये प्यार है या सिर्फ अट्रैक्शन आप जीवन के उस पड़ाव पर हैं, जहां भावनाएं बहुत तीव्र होती हैं। इस उम्र में किसी की तरफ अट्रैक्ट होना, हर वक्त उसके बारे में सोचना, बेचैनी होना बहुत स्वाभाविक है। ये अच्छी बात है कि आप अपनी भावनाओं को लेकर अवेयर हैं और जल्दबाजी में किसी फैसले से पहले इसे समझना चाहते हैं। आगे पढ़िए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
The experts whose advice is not available for referrals are missing, leaving critical patients waiting for precious moments.

Hindi News Local Mp Sagar The Experts Whose Advice Is Not Available For Referrals Are Missing, Leaving Critical Patients Waiting For Precious Moments. सागर17 मिनट पहलेलेखक: मधुर तिवारी कॉपी लिंक जिला अस्पताल प्रबंधन द्वारा जारी एक आदेश ने मरीजों, घायलों की जान संकट में डाल दी है। 6 अप्रैल को जारी इस आदेश में कहा गया है कि इमरजेंसी ड्यूटी करने वाले मेडिकल ऑफिसर किसी भी मरीज को बिना विशेषज्ञ की सहमति के रेफर नहीं करेंगे, यदि रेफर किया तो कार्रवाई होगी। अब ड्यूटी डॉक्टर हेड इंजुरी वाले अति गंभीर मरीजों को भी रेफर करने से बच रहे हैं। मरीजों को न इलाज, न ही विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाहमिल रही है। यहां हर रोज इमरजेंसी के दौरान औसत 60-70 मरीज पहुंचते हैं, इनमें से 15-20 मरीज अति गंभीर होते हैं। इसके बाद भी जिला अस्पताल में दोपहर 2 बजे के बाद एक्स-रे, रात 8 बजे के बाद सीटी स्कैन की सुविधा नहीं है, वहीं रात 9 बजे मेडिकल स्टोर में भी ताला लटक जाता है। सिविल सर्जन डॉ. आरएस जयंत का कहना है कि बेमतलब रेफर रोकने आदेश किया है। मरीज की स्थिति देख डॉक्टर रेफर का निर्णय ले सकते है। सिर में चोट पर भी रेफर नहीं, दोपहर 2 बजे एक्स-रे, रात 9 बजे मेडिकल स्टोर पर ताला इमरजेंसी में सीएस और आरएमओ ने फोन नहीं उठाया शनिवार शाम 5:30 बजे बाघराज वार्ड निवासी कंचन शुक्ला अपने 4 साल के बेटे को लेकर जिला अस्पताल पहुंची। बच्चे की नाक के अंदर साड़ी, सूट आदि में लगने वाला प्लास्टिक का सितारा फंसा हुआ था। ड्यूटी पर मौजूद डॉ. वीरेंद्र ठाकुर ने प्रयास किया, लेकिन वह सितारा नहीं निकला। ओपीडी का समय था, लेकिन ईएनटी ओपीडी में डॉक्टर नहीं थे। महिला ने सिविल सर्जन व आरएमओ को फोन लगाया, लेकिन दोनों के फोन रिसीव नहीं हुए। इसके बाद महिला बच्चे को लेकर बीएमसी चली गईं। जहां डॉक्टर ने बच्चे की नाक में फंसा प्लास्टिक निकाल दिया। विशेषज्ञ फोन के बाद भी नहीं आईं , बोलीं-सुबह आकर देख लूंगी शनिवार शाम करीब 7 बजे मकरोनिया निवासी अभय सेन अपने साढ़े तीन साल के बेटे को लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। बेटे की नाक में खेलते समय कंकड़ फंस गया। ड्यूटी डॉक्टर ने ईएनटी विभाग की डॉ. अंकिता को फोन करने स्थिति बताई और अस्पताल बुलाया तो उनका कहना था कि यह कोई इमरजेंसी नहीं है, आप बच्चे को भर्ती कर लो, सुबह आकर देख लूंगी। इसके बाद अभय भी वहां से बीएमसी चले गए और वहां डॉक्टर ने नाक में फंसा कंकड़ निकाल दिया। चार घंटे सामान्य इलाज, रात 3 बजे बीएमसी रेफर किया सोमवार 13 अप्रैल की रात नरयावली थाना क्षेत्र के मारा इमलिया गांव निवासी अजय अहिरवार सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हुआ, जिसे एम्बुलेंस से जिला अस्पताल भेजा। अजय के सिर में गंभीर चोट थी, कान से खून निकल रहा था। रात 11 बजे ड्यूटी पर केवल मेडिकल ऑफिसर थे, विशेषज्ञ से संपर्क नहीं हुआ तो उसे वार्ड में भर्ती कर दिया। 4 घंटे सामान्य इलाज के बाद रात 3 बजे उसे बीएमसी रेफर किया गया। शाम की ओपीडी में नहीं पहुंच रहे डॉक्टर जिला अस्पताल में शाम 5 से 6 बजे तक ओपीडी चलती है। शनिवार शाम 5:30 बजे देखा तो केवल दो डॉक्टर ड्यूटी पर मिले। इसमें एक मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. संतोष पटेल थे और दूसरे मेडिकल ऑफिसर डॉ. वीरेंद्र ठाकुर। इसके अलावा नाक-कान-गला, हड्डी रोग, सर्जिकल व मेडिसिन विभाग की ओपीडी में एक भी डॉक्टर नहीं मिला। यह स्थिति शनिवार की नहीं, बल्कि रोज ही रहती है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Youtube india unprofessional channels and wrong advice content spread

नई दिल्ली37 मिनट पहले कॉपी लिंक देश में लगभग 2.5 करोड़ एक्टिव यूट्यूब चैनल्स में से महज 30 लाख ही प्रोफेशनल हैं, बाकी करोड़ों चैनलों में से कई बिना नियमन या कमाई के गलत सलाह या कॉपी-पेस्ट वाला कंटेंट फैला रहे हैं। देश में यूट्यूब के हर महीने करीब 50 करोड़ एक्टिव यूजर्स है। अब यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक डॉक्टर, मैकेनिक, जिम ट्रेनर और कानूनी सलाहकार तक बन चुका है। यदि इन चैनलों पर बताई गई किसी सलाह से किसी को नुकसान हो जाए तो न्याय पाने का रास्ता इतना पेचीदा है कि अपराधी साफ बच निकलता है। इन्फ्लुएंसर ट्रस्ट रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर 10 में से 7 लोग यूट्यूब की सलाह पर भरोसा करते हैं, जिनमें से 60% उसे बिना क्रॉस-चेक किए सही मान लेते हैं। 14 फरवरी 2005 को यूट्यूब लॉन्च हुआ था। अक्टूबर 2006 में इसे गूगल ने खरीद लिया था। ऐसे केस जब यूट्यूबर्स की गलत सलाह भारी पड़ी केस-1 : तमिलनाडु के कृष्णगिरी जिले में एक उच्च शिक्षित दंपती यूट्यूब पर ‘होम डिलीवरी’ के वीडियो देखता था। प्रसव के दौरान पति यूट्यूब वीडियो देखकर निर्देश फॉलो कर रहा था। गंभीर रक्तस्राव से स्थिति बिगड़ी, महिला की मौत हो गई। फरवरी 2026 में मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा- ‘कुछ यूट्यूब चैनल केवल ‘व्यूज’ और ‘सब्सक्राइबर्स’ बढ़ाने के लिए कुछ भी सामग्री परोस रहे हैं। ये समाज के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।’ केस-2 : मो. नासिरुद्दीन अंसारी यूट्यूब पर ‘बाप ऑफ चार्ट’ नाम से चैनल चलाते थे। वे इस प्लेटफॉर्म्स से लोगों को शेयर बाजार में निवेश, खासकर ‘ऑप्शंस ट्रेडिंग’ की सलाह देते थे। सेबी की जांच में सामने आया कि अंसारी खुद शेयर बाजार में 2.89 करोड़ रुपए के घाटे में थे। सेबी ने अंसारी को निवेशकों से अवैध तरीके से जुटाए गए 17.2 करोड़ रुपए वापस करने का आदेश दिया। लेकिन इसमें भी यूट्यूब की कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई। केस-3 : साल 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े अजीत मोहन (फेसबुक) बनाम दिल्ली विधानसभा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को केवल ‘बिचौलिया’ नहीं माना जा सकता। उनकी एल्गोरिदम तय करती है कि कौन सी खबर फैलेगी, इसलिए दंगों के दौरान उनकी भूमिका की जांच की जा सकती है। एक्सपर्ट बोले- यूट्यूब चैनल्स को टैक्सपेयर के रूप में रजिस्टर करें डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत बुक के लेखक और वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि यूट्यूब चैनल्स को टैक्सपेयर के रूप में रजिस्टर करना चाहिए, तभी इन पर लगाम संभव है। यूट्यूब/फेसबुक जैसी कंपनियों का तर्क है ‘हम सिर्फ प्लेटफॉर्म दे रहे हैं, कंटेंट तो लोग डाल रहे हैं।’ इंटरमीडिएरी की वजह से उन्हें ‘सेफ हार्बर’ (धारा-79) की सुरक्षा मिलती है यानी यूजर के गलत वीडियो के लिए यूट्यूब को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गुप्ता कहते हैं कि यह गलत है क्योंकि यूट्यूब बिना किसी रजिस्ट्रेशन के चल रहा है। उसे बिचौलिया नहीं, बल्कि मीडिया कंपनी मानना चाहिए। कंपनी कानून व आयकर कानून के मुताबिक, देश में इनकी व्यापारिक उपस्थिति के आधार पर इन पर आयकर लगाने के साथ ही देश का कानून लागू होना चाहिए। डेटा पर जीएसटी: ये कंपनियां भारतीयों के डेटा का इस्तेमाल करके विज्ञापन से मोटा पैसा कमाती हैं। इस डेटा के कारोबार पर जीएसटी लगना चाहिए। यूजर बेस पर टैक्स: टैक्स सिर्फ विज्ञापन आय पर नहीं, ग्लोबल यूजर्स की संख्या के अनुपात में लगाया जाना चाहिए। शिकायत निवारण अफसर: आईटी नियमों के मुताबिक, इन कंपनियों की शिकायत व नामांकित अधिकारियों की डिटेल सार्वजनिक होना चाहिए। ताकि पुलिस और कोर्ट को साइबर क्राइम के समाधान में इनसे आवश्यक मदद मिल सके। यूट्यूब के लिए नियम, जिनमें एक्शन होता है… उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 19: भ्रामक विज्ञापन या गलत दावे पर 10-50 लाख तक का जुर्माना। IT एक्ट की धारा 66D व 69A: गलत जानकारी फैलाने पर वीडियो ब्लॉक व जेल हो सकती है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) : गलत सलाह से जान को खतरा हो तो धारा 318 में एफआईआर। खामियां, जो बचा लेती हैं… डिस्क्लेमर: वीडियो में शैक्षिक उद्देश्य लिखने से ये जानकारी बन जाती है, जवाबदेही खत्म। विशेषज्ञता की परिभाषा: कानून में इन्फ्लुएंसर के लिए कोई न्यूनतम योग्यता तय नहीं। धीमी न्यायिक प्रक्रिया: डिजिटल नुकसान के लिए फास्ट ट्रैक कानून नहीं है। छोटे आर्थिक या शारीरिक नुकसान के लिए पीड़ित कोर्ट नहीं जाता। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
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नई दिल्ली7 घंटे पहले कॉपी लिंक देश में लगभग 2.5 करोड़ एक्टिव यूट्यूब चैनल्स में से महज 30 लाख ही प्रोफेशनल हैं, बाकी करोड़ों चैनलों में से कई बिना नियमन या कमाई के गलत सलाह या कॉपी-पेस्ट वाला कंटेंट फैला रहे हैं। इन्फ्लुएंसर ट्रस्ट रिपोर्ट के मुताबिक देश में यूट्यूब के हर महीने करीब 50 करोड़ एक्टिव यूजर्स है। अब यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक डॉक्टर, मैकेनिक, जिम ट्रेनर और कानूनी सलाहकार तक बन चुका है। यदि इन चैनलों पर बताई गई किसी सलाह से किसी को नुकसान हो जाए तो न्याय पाने का रास्ता इतना पेचीदा है कि अपराधी साफ बच निकलता है। देश में हर 10 में से 7 लोग यूट्यूब की सलाह पर भरोसा करते हैं, जिनमें से 60% उसे बिना क्रॉस-चेक किए सही मान लेते हैं। 14 फरवरी 2005 को यूट्यूब लॉन्च हुआ था। अक्टूबर 2006 में इसे गूगल ने खरीद लिया था। ऐसे केस जब यूट्यूबर्स की गलत सलाह भारी पड़ी केस-1 : तमिलनाडु के कृष्णगिरी जिले में एक उच्च शिक्षित दंपती यूट्यूब पर ‘होम डिलीवरी’ के वीडियो देखता था। प्रसव के दौरान पति यूट्यूब वीडियो देखकर निर्देश फॉलो कर रहा था। गंभीर रक्तस्राव से स्थिति बिगड़ी, महिला की मौत हो गई। फरवरी 2026 में मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में कहा- ‘कुछ यूट्यूब चैनल केवल ‘व्यूज’ और ‘सब्सक्राइबर्स’ बढ़ाने के लिए कुछ भी सामग्री परोस रहे हैं। ये समाज के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।’ केस-2 : मो. नासिरुद्दीन अंसारी यूट्यूब पर ‘बाप ऑफ चार्ट’ नाम से चैनल चलाते थे। वे इस प्लेटफॉर्म्स से लोगों को शेयर बाजार में निवेश, खासकर ‘ऑप्शंस ट्रेडिंग’ की सलाह देते थे। सेबी की जांच में सामने आया कि अंसारी खुद शेयर बाजार में 2.89 करोड़ रुपए के घाटे में थे। सेबी ने अंसारी को निवेशकों से अवैध तरीके से जुटाए गए 17.2 करोड़ रुपए वापस करने का आदेश दिया। लेकिन इसमें भी यूट्यूब की कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई। केस-3 : साल 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े अजीत मोहन (फेसबुक) बनाम दिल्ली विधानसभा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को केवल ‘बिचौलिया’ नहीं माना जा सकता। उनकी एल्गोरिदम तय करती है कि कौन सी खबर फैलेगी, इसलिए दंगों के दौरान उनकी भूमिका की जांच की जा सकती है। एक्सपर्ट बोले- यूट्यूब चैनल्स को टैक्सपेयर के रूप में रजिस्टर करें डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत बुक के लेखक और वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि यूट्यूब चैनल्स को टैक्सपेयर के रूप में रजिस्टर करना चाहिए, तभी इन पर लगाम संभव है। यूट्यूब/फेसबुक जैसी कंपनियों का तर्क है ‘हम सिर्फ प्लेटफॉर्म दे रहे हैं, कंटेंट तो लोग डाल रहे हैं।’ इंटरमीडिएरी की वजह से उन्हें ‘सेफ हार्बर’ (धारा-79) की सुरक्षा मिलती है यानी यूजर के गलत वीडियो के लिए यूट्यूब को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। गुप्ता कहते हैं कि यह गलत है क्योंकि यूट्यूब बिना किसी रजिस्ट्रेशन के चल रहा है। उसे बिचौलिया नहीं, बल्कि मीडिया कंपनी मानना चाहिए। कंपनी कानून व आयकर कानून के मुताबिक, देश में इनकी व्यापारिक उपस्थिति के आधार पर इन पर आयकर लगाने के साथ ही देश का कानून लागू होना चाहिए। डेटा पर जीएसटी: ये कंपनियां भारतीयों के डेटा का इस्तेमाल करके विज्ञापन से मोटा पैसा कमाती हैं। इस डेटा के कारोबार पर जीएसटी लगना चाहिए। यूजर बेस पर टैक्स: टैक्स सिर्फ विज्ञापन आय पर नहीं, ग्लोबल यूजर्स की संख्या के अनुपात में लगाया जाना चाहिए। शिकायत निवारण अफसर: आईटी नियमों के मुताबिक, इन कंपनियों की शिकायत व नामांकित अधिकारियों की डिटेल सार्वजनिक होना चाहिए। ताकि पुलिस और कोर्ट को साइबर क्राइम के समाधान में इनसे आवश्यक मदद मिल सके। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
OTC Medicine Dose Advice; Self Medication Health Risk

12 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक अक्सर सिरदर्द, पेटदर्द, जुकाम-बुखार होने पर लोग डॉक्टर के पास जाने की बजाय सीधे मेडिकल स्टोर से दवा ले लेते हैं। इन्हें ओवर द काउंटर (OTC) मेडिसिन कहा जाता है। ये दवाइयां बिना डॉक्टर की पर्ची के मिल जाती हैं। कई बार इससे तुरंत राहत भी मिल जाती है। लेकिन इन दवाइयों का ज्यादा या गलत इस्तेमाल सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। ‘ब्रिटिश मेडिकल जर्नल’ (BMJ) में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, कुछ नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा 20-50% तक बढ़ा सकती हैं। ये दवाएं दर्द, सूजन और बुखार में ली जाती हैं, जो थोड़े समय तक लेने पर भी जोखिम बढ़ा देती हैं। इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि- OTC दवाइयां क्या होती हैं? OTC दवाइयां कब और कैसे लेनी चाहिए? क्या इन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के लेना सुरक्षित है? एक्सपर्ट- डॉ. प्रशांत सिन्हा, सीनियर कंसल्टेंट, इमरजेंसी मेडिसिन डिपार्टमेंट, पीएसआरआई हॉस्पिटल, नई दिल्ली सवाल- ओवर द काउंटर (OTC) दवाइयों का मतलब क्या है? जवाब- पॉइंटर्स से समझते हैं- OTC दवाइयां खरीदने के लिए डॉक्टर की पर्ची (प्रिस्क्रिप्शन) की जरूरत नहीं होती है। ये आमतौर पर छोटी-मोटी हेल्थ कंडीशन्स (जैसे सर्दी-जुकाम, सिरदर्द, हल्का बुखार, एलर्जी या एसिडिटी) के लिए ली जाती हैं। ये दवाइयां फार्मेसी, मेडिकल स्टोर, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आसानी से मिल जाती हैं। सवाल- OTC और प्रिस्क्रिप्शन वाली दवाइयों में क्या फर्क है? जवाब- ग्राफिक से दोनों के अंतर को समझिए- सवाल– कौन तय करता है कि कौन-सी दवा OTC होगी? जवाब- किसी दवा को OTC के तौर पर उपलब्ध कराने का फैसला स्वास्थ्य नियामक संस्थाएं करती हैं। ये संस्थाएं दवा की सुरक्षा, असर और संभावित साइड इफेक्ट्स की जांच करती हैं। जिन दवाओं को लेते समय डॉक्टर की विशेष निगरानी की जरूरत नहीं होती है, उसे OTC कैटेगरी में रखा जाता है। सवाल– क्या OTC दवाइयां पूरी तरह सुरक्षित होती हैं? जवाब- हां, लेकिन इनका सही और सुरक्षित डोज लेना जरूरी है। OTC दवाएं लेते समय लेबल पर दिए गए निर्देशों का पालन करें। ध्यान रखें, इन्हें लंबे समय तक या रेगुलर लेना सही नहीं है। सवाल– क्या डॉक्टर की सलाह के बिना OTC दवाइयां लेना सही है? जवाब- हां, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बिना सोचे-समझे किसी भी समस्या के लिए हर बार OTC दवाएं लें। अगर समस्या लगातार बनी रहती है तो डॉक्टर की सलाह लें। सवाल– क्या OTC दवाइयों की भी कोई डोज लिमिट होती है? जवाब- हां, हर OTC दवा की एक डोज लिमिट होती है। यह जानकारी दवा के पैकेट या लेबल पर लिखी होती है। सवाल- किन स्थितियों में OTC दवाइयां ली जा सकती हैं? जवाब- OTC दवाइयां छोटी-मोटी हेल्थ प्रॉब्लम्स के लिए ली जाती हैं। इसे ग्राफिक में देखिए- ध्यान रखें, अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें या गंभीर हों तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। सवाल- कौन सी दवाइयां OTC की कैटेगरी में आती हैं और इन्हें कब लेना चाहिए? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- कॉमन OTC दवाइयां दर्द और बुखार (एसिटामिनोफेन (पैरासिटामोल), आईब्रुफेन, एस्पिरिन।) खांसी और जुकाम (अस्थाकाइंड, कफ सिरप, डिकॉन्गेस्टेंट।) एलर्जी (लोराटैडाइन , सेटिरिजिन।) पेट संबंधी समस्याएं (एसिडिटी के लिए एंटासिड, कब्ज के लिए लैक्सेटिव्स, दस्त के लिए दवाएं।) स्किन डिजीज (एंटीबायोटिक क्रीम, एंटीफंगल क्रीम।) अन्य (आई ड्रॉप, ईयर ड्रॉप) इन्हें कब लेना चाहिए? जब लक्षण हल्के हों और आप समस्या को पहचान सकें, जैसे हल्का सिरदर्द, जुकाम या हल्की एसिडिटी। दवा लेते समय हमेशा पैकेट या लेबल पर दिए गए डोज और निर्देशों का पालन करें। अगर 7–10 दिनों तक लक्षण बने रहें, तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। अगर पहले से लिवर, किडनी या हार्ट डिजीज है या आप प्रेग्नेंट हैं तो OTC दवा लेने से पहले डॉक्टर या फार्मासिस्ट से सलाह जरूर लें। सवाल- क्या OTC दवाइयां लेने के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं? जवाब- हां, OTC दवाइयां ज्यादा या लंबे समय तक लेने पर गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। ग्राफिक से इनके नुकसान समझिए- सवाल- क्या खाली पेट OTC दवा खानी चाहिए? जवाब- यह दवा के प्रकार पर निर्भर करता है। कुछ दवाइयां (जैसे थायराइड, एसिड कम करने वाली दवाएं) खाली पेट ली जा सकती हैं, जबकि कुछ दवाइयां (जैसे पेनकिलर्स, स्टेरॉइड दवाएं) खाने के बाद लेना सेफ होता है। सवाल- एक साथ कितनी OTC दवा ली जा सकती है? जवाब- एक साथ कई OTC दवाइयां लेना सुरक्षित नहीं है। एक समय में केवल वही दवा लें, जिसकी जरूरत हो और अलग-अलग दवाइयां लेने से पहले उनके कंपोनेंट्स की जानकारी जरूर देखें। सवाल- OTC दवाइयों के कुछ कॉमन साइड इफेक्ट्स क्या हो सकते हैं? जवाब- OTC दवाओं के साइड इफेक्ट्स दवा के प्रकार और व्यक्ति की फिजिकल कंडीशन पर निर्भर करते हैं। ग्राफिक में इसके साइड इफेक्ट्स देखिए- अगर दवा लेने के बाद गंभीर एलर्जी, सांस लेने में दिक्कत या तेज रिएक्शन जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। सवाल- क्या OTC दवाइयां लेने से एलर्जी भी हो सकती है? जवाब- हां, कुछ लोगों में एलर्जिक रिएक्शन हो सकता है। सवाल- क्या OTC दवाइयां लिवर या किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं? जवाब- गलत डोज, लंबे समय तक इस्तेमाल या कई दवाइयों को एक साथ लेने से लिवर और किडनी पर नेगेटिव असर पड़ता है। सवाल- क्या OTC दवाइयों से हार्ट हेल्थ प्रभावित हो सकती है? जवाब- कुछ OTC दवाइयां जैसे पेन किलर्स शरीर में फ्लूइड रिटेंशन बढ़ाकर ब्लड प्रेशर (BP) बढ़ा सकती हैं। इससे लंबे में हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ सकता है। सवाल- अगर सर्दी–जुकाम के लिए OTC दवाइयां लीं तो इससे ब्लड प्रेशर भी बढ़ सकता है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सर्दी–जुकाम में ली जाने वाली OTC दवाइयों में डिकॉन्गेस्टेंट होते हैं। यह नाक की इंफ्लेमेशन कम करने के लिए नाक की ब्लड वेसेल्स को सिकोड़ते हैं। इससे शरीर के दूसरे ब्लड वेसेल्स भी प्रभावित होते हैं। इससे दिल की धड़कन तेज हो सकती है और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। इसलिए जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या है, उन्हें ऐसी दवाइयां लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। सवाल- क्या ज्यादा बेहतर तरीका ये होगा कि कोई मामूली सी दवा भी डॉक्टर की सलाह पर ही खाई जाए? जवाब-
परीक्षा परिणाम का तनाव और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य | Child Depression Symptoms & Expert Advice

Last Updated:April 03, 2026, 10:05 IST Child Depression Symptoms & Expert Advice: राजस्थान में बोर्ड परीक्षा परिणामों के बाद बच्चों में बढ़ते आत्महत्या के मामलों ने समाज को झकझोर दिया है. पाली की हालिया घटना के संदर्भ में मनोचिकित्सक डॉ. संजय गहलोत ने माता-पिता को विशेष सलाह दी है. उनका कहना है कि बच्चों के साथ दोस्त जैसा व्यवहार करना और उनके साथ समय बिताना बहुत जरूरी है. आज के दौर में माता-पिता की व्यस्तता और बच्चों से संवाद की कमी उन्हें डिप्रेशन की ओर धकेल रही है. बच्चों की तुलना दूसरों से करना और उन पर ऊंचे अंकों का दबाव बनाना उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है. डॉ. गहलोत के अनुसार, माता-पिता को बच्चों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि कोई भी परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं है. ख़बरें फटाफट Child Depression Symptoms & Expert Advice: एक माता-पिता के लिए दुनिया का सबसे खौफनाक मंजर क्या हो सकता है? शायद वह, जब उन्हें अपने जिगर के टुकड़े की ‘खून से सनी देह’ देखनी पड़े या मासूम को ‘फंदे’ से झूलता देखना पड़े. यह सोचने मात्र से दिल दहल जाता है, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि ‘परीक्षा का परिणाम’ अब बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ने लगा है. हाल ही में पाली में 10वीं के रिजल्ट के बाद एक छात्र द्वारा डिप्रेशन में आकर उठाया गया खौफनाक कदम इसी ओर इशारा करता है. सवाल यह है कि क्या इस मासूम को बचाया जा सकता था? जवाब है-हाँ. अगर माता-पिता समय रहते अपने बच्चे के बदलते हाव-भाव और उसकी ‘खामोश चीख’ को सुन लेते, तो शायद आज वह हमारे बीच होता. लोकल-18 से खास बातचीत में राजस्थान के जाने-माने मनोचिकित्सक डॉ. संजय गहलोत ने कहा कि यह ऐसी स्थितियां हैं जिन्हें समय रहते भांप लिया जाए तो अनहोनी को रोका जा सकता है. अक्सर माता-पिता चाहते हैं कि जो वे स्वयं जीवन में नहीं कर पाए, वह उनका बच्चा करे. इसके कारण बच्चे भारी दबाव महसूस करते हैं. डॉ. गहलोत के अनुसार, बच्चों के व्यवहार में बदलाव अचानक नहीं होता. इसके पीछे कई कारण होते हैं. यदि माता-पिता जागरूक हैं और बच्चों के साथ पर्याप्त समय व्यतीत करते हैं, तो बच्चा अपनी हर छोटी-बड़ी परेशानी पहले अपने परिवार को बताता है. आज के व्यस्त दौर में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद कम हो गया है, जिससे बच्चे घर में खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं. इम्तिहान जिंदगी का आखिरी मकसद नहींडॉ. संजय गहलोत सलाह देते हैं कि बच्चों को यह समझाना बेहद जरूरी है कि इम्तिहान जिंदगी का आखिरी मकसद नहीं है. परीक्षाएं और पढ़ाई जीवन का एक हिस्सा मात्र हैं. केवल 10वीं और 12वीं की परीक्षा ही भविष्य तय नहीं करती, यह तो बस शुरुआत है. कई बार परिवार का आपसी कलह और माता-पिता के बीच अनबन भी बच्चे को मानसिक रूप से तोड़ देती है. ऐसी स्थिति में बच्चा अपनी बात कहने से डरता है. उसे लगता है कि यदि नंबर अच्छे नहीं आए या वह फेल हो गया, तो वह माता-पिता को क्या मुंह दिखाएगा. माता-पिता द्वारा बच्चों के सामने बहुत ऊंचे आदर्श रख देना और दूसरे बच्चों से उनकी निरंतर तुलना करना डिप्रेशन का सबसे बड़ा कारण बनता है. स्कूल और शिक्षकों की भी अहम जिम्मेदारीसिर्फ घर ही नहीं, स्कूल का वातावरण भी बच्चों पर गहरा प्रभाव डालता है. अच्छे रिजल्ट और स्कूल की रैंकिंग के लिए बच्चों पर अतिरिक्त दबाव डाला जाता है. डॉ. गहलोत का मानना है कि स्कूलों को भी बच्चों की मनोस्थिति समझते हुए काम करना चाहिए. शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को नोटिस करें. यदि कोई बच्चा अचानक शांत रहने लगे, अकेला महसूस करे या पढ़ाई से कतराने लगे, तो उसे तुरंत सहायता और परामर्श दिया जाना चाहिए. समय रहते पहचान और सहयोग ही बच्चों को मौत के मुंह से बाहर निकाल सकता है. About the Author vicky Rathore Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें Location : Pali,Pali,Rajasthan First Published : April 03, 2026, 10:05 IST
Mumbai Office Colleague Love Relationship Advice

4 घंटे पहले कॉपी लिंक सवाल: मैं एक 31 साल की वर्किंग प्रोफेशनल हूं और मुंबई में रहती हूं। मुझे अपने एक कुलीग से प्यार हो गया है। रिश्ते की शुरुआत से ही हमने तय किया कि ऑफिस में रिश्ते को रिवील नहीं करेंगे, लेकिन लोगों को पता चल गया। अब ऑफिस में कुछ लोग हमें अलग नजर से देखते हैं, जिससे हम दोनों ही कॉन्शियस रहने लगे हैं। हमें ऑफिस में मामूली सी बात के लिए भी सोचना पड़ता है। इसका असर हमारे रिश्ते पर भी पड़ रहा है। कभी ऑफिस की बात घर तक आ जाए तो तनाव भी हो जाता है। हमें इस सिचुएशन को कैसे हैंडल करना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा जवाब: आपको बहुत मुबारक कि आप प्यार में हैं। प्यार एक बेहद खूबसूरत एहसास है और जैसाकि गालिब फरमा गए हैं– इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।। प्यार तो ऐसा ही होता है। कभी भी और कहीं भी हो सकता है। जैसाकि आपने बताया कि आप दोनों ने शुरू से ही काम और निजी जीवन को अलग रखने की कोशिश की, लेकिन फिर भी लोग गॉसिप कर रहे हैं। यूं तो गॉसिप सिर्फ गप्प ही होती है, लेकिन जब होने लगे तो अच्छे-भले समझदार लोग भी दबाव में आ जाते हैं। आप जो महसूस कर रही हैं, वह बहुत स्वाभाविक है। चलिए आपकी सिचुएशन को समझने और उसके लिए कुछ प्रैक्टिकल सॉल्यूशन निकालने पर बात करते हैं। ऑफिस के लोग गॉसिप क्यों करते हैं? दरअसल, हमारा समाज प्रेम और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अमूमन असहज ही रहता है। जब भी दो लोग अपनी मर्जी और पसंद से करीब आते हैं, तो आसपास के लोग उसे ‘मसालेदार खबर’ की तरह देखने लगते हैं। गॉसिप सिर्फ ऑफिस में नहीं होती। वो हर जगह होती है। मोहल्ले की आंटियां भी गॉसिप करती हैं, चौराहे पर बैठे अंकल भी करते हैं, रिश्तेदार भी करते हैं और सच मानिए, कई बार घरवाले भी गॉसिप करते हैं। जब भी कुछ ऐसा होता है, जो समाज के नियम–कायदों को तोड़ता है तो लोग गॉसिप करते ही हैं। इसलिए इसे ज्यादा दिल पर नहीं लेना चाहिए। आपकी भावनाएं सही हैं आप अपनी जगह पर सही हैं। ये समस्या समाज की है। समाज की असहजता के कारण ही आपका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। आपको यह समझना होगा कि ये रिश्ता असामान्य नहीं है। हम अक्सर वहीं अपना जीवनसाथी तलाशते हैं, जहां हम सबसे ज्यादा समय बिताते हैं, फिर चाहे वह कॉलेज हो या ऑफिस। समस्या आपके रिश्ते में नहीं, बल्कि उन लोगों के परसेप्शन और ‘थिंकिंग पैटर्न’ में है, जो अपना काम छोड़कर दूसरों की निजी जिंदगी पर कमेंट करते हैं। लेकिन न चाहते हुए भी ये स्थितियां हमारी मेंटल हेल्थ को प्रभावित करती हैं। इसके कारण मन पर इस तरह के मनोवैज्ञानिक असर पड़ सकते हैं- ऑफिस के डूज और डोंट्स जब आप इन मनोवैज्ञानिक दबावों को पहचान लेते हैं, तो अगला कदम ‘एक्शन’ का है। गॉसिप को रोकना आपके हाथ में नहीं है, लेकिन आप अपने व्यवहार से उसे ईंधन (फ्यूल) देना बंद कर सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि आप पार्टनर के साथ बैठकर ऑफिस ऑवर्स के लिए कुछ बुनियादी नियम यानी ‘डूज और डोंट्स’ तय करें। प्रोफेशनल एथिक्स को बनाएं अपनी ढाल आपस में नियम तय करके उन्हें ऑफिस में सख्ती से लागू करें। वर्कप्लेस पर प्रोफेशनल इमेज बनाए रखना ही आपके करियर को सुरक्षित रखने का एकमात्र तरीका है। कोशिश करें कि वर्किंग ऑवर्स में आप दोनों के बीच सिर्फ प्रोफेशनल बातचीत ही हो। जब लोग यह देखेंगे कि आपके रिश्ते से काम के आउटपुट पर कोई असर नहीं पड़ रहा है, तो धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी खत्म होने लगेगी। याद रखें, अनावश्यक आई-कॉन्टैक्ट या साथ में लंबे ब्रेक गॉसिप को बढ़ावा देते हैं। बाकी आपको ऑफिस में क्या–क्या नहीं करना चाहिए, उसकी डिटेल गाइड के लिए नीचे ग्राफिक देखें। ऑफिस में घर नहीं, घर में ऑफिस नहीं ऑफिस स्पेस में प्रोफेशनल बाउंड्रीज तय करने के बाद दूसरा सबसे जरूरी कदम है, घर के पर्सनल स्पेस में ऑफिस को न घुसने देना। अक्सर ऑफिस का तनाव घर तक आ जाता है, जिससे पार्टनर्स के बीच झगड़े शुरू हो जाते हैं। आपको यह समझना होगा कि ऑफिस में ‘को-वर्कर’ की तरह व्यवहार करना आपकी मजबूरी हो सकती है, लेकिन ऑफिस के बाहर आप दो इंडिपेंडेंट एडल्ट्स हैं। घर लौटते ही काम और गॉसिप की चर्चा बंद करें और एक-दूसरे को वह क्वालिटी समय और प्यार दें, जो किसी भी अच्छे और हेल्दी रिश्ते के लिए जरूरी है। मैच्योर रिश्तों पर गॉसिप का असर नहीं होता मैच्योर और समझदार रिश्तों की बुनियाद इतनी मजबूत होती है कि वे गॉसिप से नहीं डिगते। अगर लोगों की बातें आपको तनाव दे रही हैं, तो कुछ बातें ध्यान रखें– ये एक चुनौती है। रिश्ते में आगे ऐसी चुनौतियां और भी आएंगी। अगर रिश्ता इससे प्रभावित हो रहा है तो इसका मतलब कि वो फ्रेजाइल है। उसे मजबूत बनाने पर काम करें। इस चुनौती को एक-दूसरे के करीब आने के अवसर के रूप में देखें। जो भी बात परेशान करे, उसे दिल में न रखें। उसे लॉजिकली एड्रेस करें, उस पर बात करें। एक-दूसरे का पक्ष ध्यान से सुनें, दूसरे के नजरिए को इग्नोर न करें। आपकी कोशिश दुनिया को जवाब देने की नहीं, बल्कि अपने रिश्ते को मजबूत बनाने की होनी चाहिए। जरूरी लगे तो काउंसिलर की मदद भी ले सकते हैं। आखिरी बात आप दोनों को शायद पता नहीं कि आप अभी अपने जीवन के सबसे खूबसूरत दौर से गुजर रहे हैं। इसके हरेक क्षण को एंजॉय करें और खूब खुश रहें। ऑफिस में जमकर काम करें और ऑफिस के बाहर जमकर जिंदगी जिएं। आपको पता है कि ऑफिस में प्यार होना कोई अपराध नहीं है। आपने कुछ भी ऐसा नहीं किया, जिसके लिए आपको शर्मिंदा होना पड़े। बस प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ के बीच एक मजबूत ‘बाउंड्री’ बनाए रखिए। ये सिर्फ एक फेज है। ये गुजर जाएगा। कुछ दिन बाद ऑफिस के लोगों को नया गॉसिप मिल जाएगा और वो उसमें बिजी हो जाएंगे। आप सिर्फ अपने रिलेशनशिप पर काम करिए। ……………… ये खबर भी
Sweating Pattern Health Signs | Night Sweat Smell Disease; Expert Advice

2 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी कॉपी लिंक गर्मियों में पसीना आना कॉमन है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि तापमान सामान्य है, फिर भी पसीना आ रहा है। पसीने से अजीब सी स्मेल आ रही है। अगर हां, तो ये कॉमन नहीं है। इसका मतलब ये हो सकता है कि हमारा शरीर किसी हेल्थ कंडीशन की ओर इशारा कर रहा है। इंसान के स्वस्थ रहने के लिए पसीना आना जरूरी है, लेकिन कई बार यह सेहत से जुड़े कई अहम संकेत भी देता है। ‘साइंस डेली’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, पसीना सालों पहले ही कुछ हेल्थ कंडीशंस के संकेत देने लगता है। स्वेटिंग पैटर्न (पसीने का पैटर्न) से इसका पता लगा सकते हैं। इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज समझेंगे कि पसीना क्यों आता है। साथ ही जानेंगे कि- इसका हेल्दी पैरामीटर क्या है? इसकी स्मेल किस बात का संकेत है? सवाल- पसीना क्यों आता है? यह शरीर के लिए क्यों जरूरी है? जवाब- पसीना शरीर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम है। जब बॉडी का तापमान बढ़ता है, तो यह पसीने के जरिए खुद को ठंडा करती है। जब पसीना वाष्पित होता है तो शरीर का तापमान कम होता है। ये शरीर से अतिरिक्त गर्मी को कम करता है, जिससे ओवरहीटिंग नहीं होती। एक्सरसाइज, गर्म मौसम, स्ट्रेस या हाॅर्मोनल बदलाव में पसीना ज्यादा आता है, क्योंकि इससे मेटाबॉलिज्म और बॉडी हीट बढ़ती है। अगर पसीने का पैटर्न सामान्य है तो इसका मतलब है कि हार्ट, नर्वस सिस्टम और टेम्परेचर कंट्रोलिंग सिस्टम स्मूदली काम कर रहा है। सवाल- क्या पसीना आने का भी कोई हेल्दी पैरामीटर होता है? क्या ये हेल्थ का मार्कर हो सकता है? जवाब- पसीने की मात्रा हर व्यक्ति में अलग होती है। यह फिटनेस लेवल, जेनेटिक्स और मौसम से प्रभावित होता है। एक्सरसाइज के समय पसीना आना अच्छी कार्डियोवस्कुलर एडाप्टेशन का संकेत हो सकता है। कार्डियोवस्कुलर एडाॅप्टेशन का मतलब है, हार्ट और ब्लड वेसल्स शरीर की जरूरतों के अनुसार खुद को एडजस्ट कर रही हैं। बिल्कुल पसीना न आना या बहुत ज्यादा आना (हाइपरहाइड्रोसिस) कभी-कभी नर्व, हॉर्मोन या स्किन प्रॉब्लम्स से जुड़ा हो सकता है। पसीने की गंध या रंग में बदलाव इन्फेक्शन या डिहाइड्रेशन का संकेत दे सकता है। हेल्दी पैरामीटर यह है कि शरीर की जरूरत के अनुसार तापमान संतुलन बना रहे, थकान या चक्कर जैसे लक्षण न हों। सवाल- क्या ज्यादा या कम पसीना आना किसी हेल्थ प्रॉब्लम का संकेत हो सकता है? जवाब- हां, ज्यादा पसीने का मतलब है कि बॉडी की टेम्परेचर कंट्रोल करने की क्षमता प्रभावित हुई है। अगर बिना मेहनत किए ही पसीना आ रहा है तो हॉर्मोन्स या नर्वस सिस्टम से जुड़ी समस्या हो सकती है। वहीं बहुत कम पसीना डिहाइड्रेशन जैसी किसी समस्या का संकेत हो सकता है। ज्यादा या कम पसीना आने के सभी संभावित कारण ग्राफिक में देखिए- सवाल- स्वेटिंग पैटर्न (कब, कितना और कहां) से सेहत के बारे में क्या पता चलता है? जवाब- पसीने का पैटर्न और उसकी स्मेल कई हेल्थ रिस्क का संकेत दे सकती है। अलग-अलग संकेत क्या बताते हैं, ग्राफिक में देखिए- सवाल- पसीने का पैटर्न कब किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है? जवाब- पसीना आना सामान्य है और स्वस्थ रहने के लिए जरूरी भी है। हालांकि, कुछ मामलों में यह किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है- अचानक ठंडा-चिपचिपा पसीना- लो BP या हार्ट स्ट्रेस संकेत हो सकता है। बहुत तेज बदबू वाला पसीना- इन्फेक्शन या मेटाबॉलिक बदलाव का संकेत हो सकता है। मेहनत के बिना लगातार पसीना- यह हाइपरहाइड्रोसिस का संकेत हो सकता है। चक्कर, कमजोरी के साथ पसीना- शरीर में इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन का संकेत हो सकता है। तेज गर्मी में भी पसीना न होना- कूलिंग फेलियर, अनहाइड्रोसिस का संकेत हो सकता है। रात में अचानक गर्मी के साथ पसीना- क्रॉनिक इन्फेक्शन या हॉर्मोन इश्यू का संकेत हो सकता है। एकदम नया स्वेटिंग पैटर्न- ऐसे में मेडिकल चेकअप जरूरी है। सवाल- क्या हाॅर्मोनल बदलाव, थायरॉइड या डायबिटीज के कारण भी स्वेटिंग पैटर्न बदल सकता है? जवाब- हां, हॉर्मोनल बदलाव, थायरॉइड या डायबिटीज तीनों का स्वेटिंग पैटर्न से सीधा कनेक्शन है- हॉर्मोन शरीर के तापमान और मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करते हैं। थायरॉइड ज्यादा एक्टिव होने पर ज्यादा ब़डी हीट बनती है। इससे पसीना बढ़ सकता है। लो थायरॉइड में पसीना कम और स्किन ड्राई लग सकती है। बीमारी जैसे हाइपर-थायरॉइडिज्म में बार-बार पसीना आ सकता है। ब्लड शुगर लो होने पर अचानक पसीना और कंपकंपी हो सकती है। यह कंडीशन डायबिटीज में भी देखी जाती है। प्यूबर्टी या मेनोपॉज में हॉट फ्लैशेज (अचानक गर्मी लगना) के साथ स्वेटिंग हो सकती है। सवाल- क्या स्ट्रेस और एंग्जाइटी के कारण भी पसीने का पैटर्न बदल सकता है? इसके क्या संकेत होते हैं? जवाब- हां, स्ट्रेस के कारण शरीर की हॉर्मोनल एक्टिविटीज बदलती हैं और इससे पसीने का पैटर्न भी बदल जाता है- स्ट्रेस में सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (शरीर का फाइट या फ्लाइट मोड में जाना) एक्टिव होकर पसीना बढ़ाता है। हथेलियों, तलवों और अंडरआर्म में अचानक पसीना आना कॉमन है। सामान्य तापमान में भी पसीना आना एंग्जाइटी ट्रिगर का संकेत हो सकता है। स्ट्रेस बढ़ने पर तेज हार्ट रेट के साथ पसीना हो सकता है। पब्लिक स्पीकिंग या डर की स्थिति में पसीना बढ़ना सामान्य प्रतिक्रिया है। लगातार स्ट्रेस से स्वेटिंग पैटर्न अनियमित हो सकता है। सवाल- हेल्दी स्वेटिंग और बॉडी टेम्परेचर बैलेंस रखने के लिए लाइफस्टाइल में क्या बदलाव करने चाहिए? जवाब- इसके लिए लाइफस्टाइल में कुछ छोटे-छोटे बदलाव करने चाहिए। इसे ग्रफिक में देखिए- सवाल- पसीने की स्मेल कम करने और स्किन को हेल्दी रखने के लिए क्या करना चाहिए? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- रोज नहाते समय अंडरआर्म, पैर और स्किन फोल्ड्स (शरीर के जॉइंट्स के आसपास की स्किन) अच्छी तरह साफ करें। एंटीबैक्टीरियल और स्किन-फ्रेंडली साबुन इस्तेमाल करें। नहाने के बाद थोड़ी देर बॉडी में हवा लगने दें। ढीले और साफ कपड़े पहनें। पसीना होने पर रोज कपड़े बदलें। डाइट में फाइबर, हरी सब्जियां और प्रोबायोटिक फूड शामिल करें। बहुत मीट, प्रोसेस्ड और जंक-फूड कम खाएं। नींबू पानी या हर्बल ड्रिंक लें। इससे बॉडी ओडर कंपाउंड्स नही बनाती है। सवाल- किस तरह का स्वेटिंग पैटर्न दिखने पर डॉक्टर के पास जाना चाहिए? जवाब- इन सभी कंडीसंस में डॉक्टर से कंसल्ट
Saas Bahu Conflict Advice; Husband Support Relationship Tips

41 मिनट पहले कॉपी लिंक सवाल- मेरी शादी को 2 साल हो चुके हैं। मेरे हसबैंड के पेरेंट्स भी हमारे साथ रहते हैं। यहां बाकी सब तो ठीक है, लेकिन मेरी सास मुझे सख्त नापसंद हैं। वो हर चीज के लिए टोकती हैं। चाहती हैं कि मैं हर काम उनकी मर्जी से, उनसे पूछकर करूं। यहां तक कि उन्हें इस बात से भी समस्या है कि मैं कब-किससे बात करती हूं। ये बातें मेरे हसबैंड को भी पता हैं। अकेले में वो मुझे सपोर्ट करते हैं, लेकिन अपनी मां के सामने चुप रहते हैं। कहते हैं, “मैं मां को नहीं समझा सकता, लेकिन तुम्हें समझा सकता हूं।” मैं समझते-समझते थक गई हूं। क्या करूं? एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा जवाब- अपनी समस्या को इतने साफ शब्दों में लिखने के लिए शुक्रिया। आपने जो समस्या बताई है, ये अक्सर जॉइंट फैमिली में देखने को मिलती है। यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है। बहुत ज्यादा रोक–टोक हो तो परेशानी जायज है। लेकिन पता है, जीवन की और इंसान की सबसे अच्छी बात क्या है। वो ये कि हममें खुद को बदलने की असीमित क्षमता है। आइए आपकी स्थिति को बेहतर बनाने के तरीकों पर बात करते हैं। आपकी फीलिंग्स पूरी तरह वैलिड हैं आप जो महसूस कर रही हैं, वो बिल्कुल सही है। अगर सास हर बात पर टोकती हैं तो इससे आपकी प्राइवेसी और आजादी का दायरा कम हो सकता है। हमारे समाज में सास-बहू के बीच ऐसे कॉन्फ्लिक्ट बहुत कॉमन हैं। सास कंट्रोल करने की कोशिश क्यों करती हैं? सास अकसर बहुओं को कंट्रोल करने की कोशिश इसलिए करती हैं क्योंकि वो सिर्फ बहुओं को ही कंट्रोल कर सकती हैं। अब तक उनकी जिंदगी में जितने भी और रिश्ते थे, उन सब में उनकी स्थिति मातहत की थी। वो अपनी सास को, पति को, बेटे को किसी को कंट्रोल नहीं कर सकती थीं। बहू के रूप में उन्हें जीवन में पहला ऐसा रिश्ता मिला है, जिसके ऊपर उनका पावर है। अपनी सत्ता छिनने का डर इस तरह की स्थितियां अक्सर इनसिक्योरिटी से पैदा होती हैं। अभी सास के हाथ में घर की पावर है। यह सत्ता एक लंबे संघर्ष के बाद उनके पास आई है। इससे पहले ये पावर उनकी सास के हाथ में रही होगी। अब आपके आने से उनके मन में एक अनजाना डर हो सकता है। शायद उन्हें महसूस हो रहा हो कि बहू के आने से घर में उनका हक या उनकी अहमियत कहीं कम न हो जाए। यह भी हो सकता है कि वह जताना चाहती हों कि “इस घर में आज भी मेरी चलती है।” इसलिए वह बार-बार टोककर अपनी जगह सुरक्षित रखने का प्रयास करती हैं। बार-बार टोकने से बढ़ता स्ट्रेस बार-बार टोका-टाकी से किसी भी व्यक्ति के मन पर गहरा असर पड़ता है। इससे तनाव बढ़ सकता है और भावनात्मक संतुलन बिगड़ सकता है। इसके कई साइकोलॉजिकल इफेक्ट हो सकते हैं, सभी ग्राफिक में देखिए- हसबैंड को कैसे समझाएं? आपके हसबैंड अकेले में ही सही, पर आपको सपोर्ट करते हैं। आपने बताया कि वह अपनी मां के सामने चुप रहते हैं। उन्हें बताएं कि ये आपको हर्ट करता है। आप अपने हसबैंड से ये बातें कह सकती हैं- “मैं समझती हूं कि आप मां से प्यार करते हो, लेकिन मुझे भी आपका सपोर्ट चाहिए। मैं खुद को अकेला महसूस करती हूं।” “मां का सम्मान करना अच्छी बात है, लेकिन क्या सम्मान का मतलब हर सही–गलत बात को चुपचाप सिर्फ बर्दाश्त करना होता है?” “क्या आप मां से प्यार से बात नहीं कर सकते। क्या उन्हें प्यार से यह समझाया नहीं जा सकता कि मैं भी तो इस घर की बेटी हूं। मुझे भी थोड़ी आजादी, थोड़ा स्पेस चाहिए।” मेरा बोलना उन्हें बुरा लग सकता है, लेकिन आपकी बात वो सुनेंगी और अमल भी करेंगी। आपको किस बात का डर है कि मां सोचेंगी कि “आप जोरू के गुलाम हो गए हैं।’’ लेकिन आप रोज अपने व्यवहार, अपनी बातों से यह दिखा सकते हैं कि आप अभी भी उन्हें उतना ही प्यार करते हैं। ऊपर मैंने जितने भी उदाहरण पेश किए हैं, उन सबका सार और उनका मकसद एक ही है। अगर प्यार से, संतुलन से और सम्मान से बात की जाए तो दुनिया की कोई ऐसी समस्या नहीं है, जो सुलझ न सके। बिना नाराज हुए, बिना दुखी हुए, बिना आवाज ऊंची किए सिर्फ एक बार अपनी भावनाओं को व्यक्त करके देखिए। अपना पक्ष एक बार तार्किक ढंग से उनके सामने रखकर देखिए। प्यार और कंपैशन से बदल सकते हैं रिश्ते हम ये नहीं कह रहे कि प्यार से पूरी दुनिया बदल जाएगी, लेकिन ये दवा की तरह काम करता है। सास को प्यार दिखाएं। उन्हें महसूस करवाएं कि आप उनकी टीम में ही हैं। इसके लिए छोटी-छोटी चीजें ट्राई करें। जैसे- साथ घूमने जाएं, शॉपिंग करें, टीवी देखें। ह्यूमर से डील करें सिचुएशन आपने सोशल मीडिया पर वो मीम जरूर देखा होगा। एक बहू काम कर रही होती है और सास आकर पूछती है- “तू काम क्यों कर रही है? क्या ये तेरे बाप का घर है?” बहू कहती है, “नहीं।” फिर सास पूछती है, “क्या ये मेरे बाप का घर है?” बहू कहती है, “नहीं।” फिर सास अपने बेटे की तरफ देखती है और कहती है, “ये इसके बाप का घर है। जिसका घर है, वही काम करेगा।” ये ह्यूमर है, लेकिन इसमें सीख ये है कि घर सबका है। सास को ये महसूस करवाएं कि बहू भी फैमिली का हिस्सा है। ह्यूमर से बात कहें, नाराजगी से नहीं। साइकोलॉजिकल हेल्प कब लें? अगर ये तरीके काम न करें तो प्रोफेशनल हेल्प लें। इसके लिए फैमिली थेरेपी ली जा सकती है। इससे आपको प्रोफेशनल टूल्स मिलेंगे, जिससे सिचुएशन को हैंडल करने में मदद मिलेगी। इस दौरान खुद का ख्याल रखें इस बीच खुद को न भूलें। सेल्फ-केयर जरूरी है। जर्नल लिखें, वॉक करें। अपनी हॉबी फॉलो करें। याद रखें, आप अकेली नहीं हैं। लाखों बहुएं ये फेस करती हैं, लेकिन आप मजबूत हैं। दोस्तों से बात करें। जर्नलिंग करें। वॉक और योग करें। हॉबीज ट्राई करें। काउंसलिंग लें। खुद को दोष न दें। एक सच्ची गल्पकथा आखिरी बात से पहले मैं एक कहानी सुनाना चाहती हूं। एक
Navratri Vrat Diet Tips; Working Professionals Advice

Hindi News Lifestyle Navratri Vrat Diet Tips; Working Professionals Advice | Dietitian Poonam Tiwari 5 घंटे पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक व्रत का मतलब है– संयम और अनुशासन। नवरात्रि व्रत में यह संयम और अनुशासन पूरे 9 दिन बरतना होता है। अगर इसके साथ नौकरी या ऑफिस के काम भी करने पड़ें, तो चुनौती बढ़ जाती है। पूरे दिन मीटिंग, काम के दबाव और डेडलाइन के बीच कई बार ऊर्जा की कमी, भूख और थकान महसूस होने लगती है। व्रत में लोग अक्सर ज्यादा तला-भुना फलाहार खाते हैं। लेकिन इससे एनर्जी क्रैश, डिहाइड्रेशन और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है। इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि- वर्किंग प्रोफेशनल्स हेल्दी तरीके से नवरात्रि व्रत कैसे रहें? वर्किंग लोगों के लिए नवरात्रि व्रत की डाइट क्या होनी चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. पूनम तिवारी, सीनियर डाइटीशियन, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ सवाल- नौकरीपेशा लोगों के लिए व्रत रखना क्यों चैलेंजिंग हो सकता है? जवाब- काम के बोझ के साथ व्रत रखना शरीर और दिमाग दोनों पर असर डाल सकता है। इन कारणों से वर्किंग लोगों के लिए लंबा व्रत ज्यादा चैलेंजिंग हो सकता है- घर–जॉब की डबल रिस्पॉन्सिबिलिटी चैलेंजिंग हो सकती है। ऑफिस के काम से स्ट्रेस बढ़ सकता है। फील्ड वर्क में खाली पेट ज्यादा थकान हो सकती है। खाली पेट लंबी मीटिंग मेंटल स्ट्रेस बढ़ा सकती है। देर तक भूखे रहने से ब्रेन जल्दी थकता है। व्रत की हाई कैलोरी, हाई फैट डाइट से सुस्ती हो सकती है। व्रत में स्लीप साइकल बदलने से थकान हो सकती है। लो फाइबर डाइट से बार-बार भूख लगती है। ज्यादा चाय–कॉफी पीने से बॉडी डिहाइड्रेट हो सकती है। गर्मी के मौसम में वैसे भी शरीर जल्दी थकता है। सवाल- क्या पूरा दिन काम और जॉब करने वाले लोगों को व्रत रखने के तरीके बदलने चाहिए? जवाब- हां, पारंपरिक तरीके से लंबे समय तक भूखे रहना या सिर्फ तला-भुना खाना शरीर पर ज्यादा दबाव डाल सकता है। सीनियर डाइटीशियन डॉ. पूनम तिवारी कहती हैं, नौकरीपेशा लोगों को व्रत रखते समय अपनी डाइट, रूटीन और खाने के तरीके में थोड़ा बदलाव करना चाहिए, ताकि ऊर्जा बनी रहे और सेहत पर असर न पड़े। सवाल- वर्किंग लोगों के लिए नवरात्रि व्रत रखने का हेल्दी तरीका क्या है? जवाब- इसके लिए डाइट और रुटीन को संतुलित रखना जरूरी है। डाइट- डाइट बैलेंस्ड रखें। खाने में प्रोटीन, फाइबर और एनर्जी से भरपूर चीजें चुनें। रूटीन- दिनचर्या सामान्य रखें। ज्यादा शारीरिक मेहनत से बचें और काम के दौरान बीच–बीच में ब्रेक लें। खाने का समय- दो मील के बीच लंबे गैप की बजाय कुछ-कुछ देर में हेल्दी स्नैक्स लें। खाने का तरीका- बहुत ज्यादा तली-भुनी या हैवी डाइट न लें। हाइड्रेशन- लगातार पानी पीते रहें। छाछ, नारियल पानी जैसी चीजें लेते रहें। चाय-कॉफी न पिएं। सवाल– वर्किंग लोगों के लिए नवरात्रि व्रत की डाइट क्या होनी चाहिए? जवाब- व्रत के दौरान डाइट ऐसी होनी चाहिए, जो लंबे समय तक एनर्जी दे, पेट भरा रखे और शरीर को जरूरी पोषण भी दे। ग्राफिक से सुबह से लेकर शाम तक का पूरा डाइट प्लान समझिए- तले हुए स्नैक्स की जगह भुने हुए मखाने या शकरकंद की चाट खाएं। कुछ मीठा बनाते समय चीनी की बजाय खजूर या गुड़ का इस्तेमाल करें। सवाल- वर्किंग लोग नवरात्रि व्रत में इंस्टेंट एनर्जी के लिए कौन-से फल और ड्रिंक्स ले सकते हैं? जवाब- फल और कुछ हल्के ड्रिंक्स शरीर को नेचुरल शुगर, इलेक्ट्रोलाइट और पानी देते हैं, जिससे थकान और कमजोरी कम महसूस होती है। पॉइंटर्स से समझते हैं- इंस्टेंट एनर्जी देने वाले फल केला- तुरंत ऊर्जा देता है, पोटेशियम से भरपूर होता है। सेब- इससे धीरे-धीरे ऊर्जा मिलती है, फाइबर और नेचुरल शुगर होता है। पपीता- कंप्लीट एनर्जी मिलती है, हल्का और पचने में आसान होता है। अनार- भरपूर पोषण मिलता है, ऊर्जा और एंटीऑक्सिडेंट देता है। मौसंबी/संतरा- विटामिन-C और हाइड्रेशन में मददगार है। इंस्टेंट एनर्जी देने वाले ड्रिंक्स नारियल पानी- इलेक्ट्रोलाइट्स से भरपूर, तुरंत हाइड्रेशन देता है। नींबू पानी- थकान और डिहाइड्रेशन कम करने में मददगार है। छाछ/मठा- पेट हल्का रखता है और पाचन में मददगार है। दूध- प्रोटीन और ऊर्जा देता है। फ्रूट-योगर्ट स्मूदी- एनर्जी और प्रोटीन दोनों देता है। सवाल- वर्किंग लोगों को व्रत के दौरान अगर ऑफिस में भूख लगे तो उनके लिए हेल्दी स्नैकिंग के ऑप्शन क्या हो सकते हैं? जवाब- ऐसे स्नैक्स चुनना बेहतर है, जो हल्के हों, जल्दी ऊर्जा दें और लंबे समय तक पेट भरा रखें। पॉइंटर्स से समझते हैं हेल्दी स्नैकिंग ऑप्शन्स- भुना हुआ मखाना भीगे हुए बादाम या मिक्स नट्स फल (केला, सेब, पपीता) दही या फ्रूट योगर्ट शकरकंद चाट नारियल पानी मूंगफली या पीनट लड्डू खजूर और नट्स के एनर्जी बाइट्स सवाल- वर्किंग लोगों को नवरात्रि व्रत की डाइट में क्या चीजें नहीं खानी चाहिए? जवाब- नौकरीपेशा लोगों को ऐसी चीजें कम खानी चाहिए, जो भारीपन, सुस्ती या एनर्जी क्रैश पैदा करें। ग्राफिक से समझते हैं क्या चीजें नहीं खानी चाहिए- सवाल– वर्किंग लोगों का खाने का समय और तरीका क्या होना चाहिए? उन्हें क्या गलतियां नहीं करनी चाहिए? जवाब- पॉइंटर्स से समझते हैं- छोटे-छोटे मील लें। दिन की शुरुआत न्यूट्रिशन रिच फूड से करें। हाइड्रेशन बनाए रखें। हल्का डिनर करें। धीरे-धीरे खाएं। अब ग्राफिक में देखिए कि क्या गलतियां नहीं करनी चाहिए- सवाल- व्रत के दौरान ऑफिस में काम करते समय कमजोरी लगे या चक्कर आए तो क्या करें? जवाब- ऐसी स्थिति में ये काम करें- कुछ देर ब्रेक लें। पानी, नारियल पानी पिएं। कोई फल जैसे केला या खजूर लें। अगर बार-बार ऐसा महसूस हो रहा हो, तो व्रत जारी रखने की बजाय हल्का भोजन करना बेहतर है। जरूरत पड़े तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। सवाल- जिन्हें डायबिटीज है, क्या उन्हें नवरात्रि का व्रत रखना चाहिए? जवाब- डायबिटीज से पीड़ित लोगों को नवरात्रि व्रत रखने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए। सवाल- व्रत के दौरान डायबिटिक लोगों को किन बातों का ख्याल रखना चाहिए? जवाब- डायबिटिक लोगों के लिए लंबे समय तक भूखे रहने से ब्लड शुगर अचानक कम (हाइपोग्लाइसीमिया) या ज्यादा (हाइपरग्लाइसीमिया) हो सकता है। पॉइंटर्स से समझते हैं कि किन बातों का ख्याल रखना चाहिए- सवाल- नवरात्रि व्रत में किन लोगों को पूरा दिन उपवास करने से बचना चाहिए? जवाब- पूरे दिन का उपवास हर








