न्यूयॉर्क में सालाना 2 करोड़ या भारत में 60 लाख?:सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस; लोग बोले- जिंदगी को सिर्फ पैसों से नहीं माप सकते

भारतीय युवाओं के बीच विदेश में नौकरी करने का सपना अब सिर्फ बड़ी सैलरी तक सीमित नहीं रह गया है। बेहतर लाइफस्टाइल, ग्लोबल एक्सपोजर और करिअर ग्रोथ के साथ अब लोग यह भी सोचने लगे हैं कि क्या विदेश जाकर वास्तव में जिंदगी बेहतर होती है। इसी सवाल ने सोशल मीडिया पर तब नई बहस छेड़ दी, जब एक भारतीय प्रोफेशनल ने न्यूयॉर्क की हाई-पेइंग जॉब और भारत में आरामदायक जिंदगी के बीच अपनी दुविधा साझा की। रेडिट पर ‘भारत में सालाना 60 लाख बनाम न्यूयॉर्क में 2 करोड़’ शीर्षक से लिखी गई पोस्ट वायरल हो गई। प्रोफेशनल ने बताया कि उन्हें न्यूयॉर्क में 2.2 लाख डॉलर सालाना यानी करीब ₹2 करोड़ का ऑफर मिला है, जो बढ़कर 2.3 लाख डॉलर (2.2 करोड़ रुपए) तक जा सकता है। दूसरी तरफ भारत में रहने पर प्रमोशन के बाद उनकी सालाना सैलरी करीब ₹80 लाख तक पहुंच सकती है। प्रोफेशनल ने बताया कि उनके ऊपर कोई कर्ज नहीं है, अच्छी-खासी बचत है और भारत में हर महीने करीब ₹3.4 लाख की पैसिव इनकम भी आती है, जो विदेश जाने पर भी जारी रह सकती है। यही वजह है कि पहले जो ऑफर ‘ड्रीम मूव’ लग रहा था, अब उसी पर संदेह होने लगा है। इस पर सोशल मीडिया पर लोगों की राय दो हिस्सों में बंटी नजर आई। कई यूजर्स ने कहा कि जिंदगी को सिर्फ पैसों से नहीं मापा जा सकता। कुछ लोगों ने लिखा कि ग्लोबल एक्सपोजर, नेटवर्किंग और करिअर के मौके लंबे समय में भारत की आरामदायक नौकरी से ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकते हैं। हालांकि दूसरी तरफ कई यूजर्स ने न्यूयॉर्क के महंगी जीवनशैली की याद दिलाई। कुछ ने कहा कि 2.3 लाख डॉलर सुनने में बड़ा पैकेज लगता है, लेकिन टैक्स और किराया निकालने के बाद वहां बचत आसान नहीं होती। कई भारतीय न्यू जर्सी में रहकर रोज न्यूयॉर्क आने-जाने को मजबूर होते हैं। इसीलिए यह चर्चा उस नई सोच के केंद्र में आ गई है जिसमें युवा ‘विदेश यानी बेहतर जिंदगी’ के फॉर्मूले पर दोबारा सोचने लगे हैं। करिअर ग्रोथ, बेतहाशा खर्च, वीसा…हर पहलू पर बहस का बाजार गर्म समर्थकों का तर्क – न्यूयॉर्क में काम करने से ग्लोबल एक्सपोजर और करिअर ग्रोथ के बड़े मौके मिलेंगे। विरोध में राय – न्यूयॉर्क दुनिया के सबसे महंगे शहरों में शुमार है। भारी-भरकम टैक्स, ऊंचा घर किराया और रोजाना लंबी दूरी की यात्रा बड़ी चुनौती बन सकते हैं। वीसा को लेकर चिंता – कुछ यूजर्स ने याद दिलाया कि एच1बी या एल1 वीसा पर आय के अतिरिक्त स्रोत चलाना आसान नहीं होता।
The World Cup will be held in July, with 2,000 players expected to participate.

Hindi News Sports The World Cup Will Be Held In July, With 2,000 Players Expected To Participate. चार्ली कैंपबेल. द न्यूयॉर्क टाइम्स13 मिनट पहले कॉपी लिंक रियाद में 6 जुलाई को होने वाले तीसरे ई-स्पोर्ट्स वर्ल्ड कप में 24 अलग-अलग वीडियो गेम्स में 2000 खिलाड़ी हिस्सा लेंगे। सऊदी अरब की राजधानी रियाद 6 जुलाई को दुनिया के सबसे बड़े गेमिंग मंच में बदलने जा रही है। यहां लगातार तीसरे साल ई-स्पोर्ट्स वर्ल्ड कप आयोजित होगा, जिसमें करीब 2000 खिलाड़ी हिस्सा लेंगे। ये खिलाड़ी 24 अलग-अलग वीडियो गेम्स में मुकाबला करेंगे और 75 मिलियन डॉलर यानी करीब 711 करोड़ रुपए की प्राइज मनी के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे। सऊदी पिछले कुछ समय से ई-स्पोर्ट्स को लगातार बढ़ावा दे रहा है और इसमें निवेश कर रहा है। सऊदी अरब के ई-स्पोर्ट्स में निवेश के पीछे तीन मुख्य कारण हैं- 1. पहला कारण युवा आबादी है- सऊदी अरब की करीब दो-तिहाई आबादी 35 साल से कम उम्र की है। यह पीढ़ी डिजिटल दुनिया और गेमिंग से गहराई से जुड़ी हुई है। देश में लगभग 67% लोग गेम खेलते हैं, यानी करीब 2.35 करोड़ लोग। सरकार चाहती है कि इन युवाओं को सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि करियर और रोजगार के नए मौके भी मिलें। ई-स्पोर्ट्स इंडस्ट्री में गेमिंग, स्ट्रीमिंग, कंटेंट क्रिएशन और इवेंट मैनेजमेंट जैसे कई क्षेत्र खुलते हैं। 2. तेल पर निर्भरता कम करना भी इसकी वजह है – सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था अभी भी काफी हद तक तेल और गैस पर टिकी हुई है। लेकिन वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के विकल्प तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में सरकार ‘विजन 2030’ के तहत नई इंडस्ट्रीज को बढ़ावा दे रही है, ताकि भविष्य में अर्थव्यवस्था ज्यादा स्थिर और विविध हो सके। खेल और मनोरंजन, खासकर ई-स्पोर्ट्स, इस बदलाव का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं। 3. तीसरा कारण है भविष्य की टेक्नोलॉजी- ई-स्पोर्ट्स केवल गेम खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े डिजिटल इकोसिस्टम का हिस्सा है। इसमें सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग जैसे कई आधुनिक क्षेत्र शामिल हैं। सऊदी अरब इस पूरे इकोसिस्टम में निवेश कर रहा है, ताकि वह टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी मजबूत पकड़ बना सके। हालांकि, ईरान युद्ध के कारण क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और कई खेल आयोजन प्रभावित हुए हैं, फिर भी वर्ल्ड कप को लेकर तैयारियां जारी हैं। आयोजकों को उम्मीद है कि युद्धविराम के बाद हालात बेहतर होंगे और दर्शकों की भागीदारी भी बढ़ेगी। पिछले साल इस टूर्नामेंट को करीब 30 लाख लोगों ने सीधे देखा था, जबकि 75 करोड़ से ज्यादा दर्शकों ने इसे ऑनलाइन फॉलो किया। इस बार भी इससे बेहतर प्रतिक्रिया की उम्मीद की जा रही है। डिजिटल इकोसिस्टम तैयार कर रहा सऊदी सऊदी अरब अब केवल इवेंट्स आयोजित करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह एक पूरा डिजिटल इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। इसमें गेमिंग सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, स्ट्रीमिंग और टेक्नोलॉजी मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसी दिशा में रियाद में एक बड़ा टेक हब भी विकसित किया जा रहा है, जहां आने वाले समय में ‘मेड इन सऊदी’ डिवाइसेज तैयार किए जाएंगे। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ने किया यूएई का कायाकल्प:शाही पहचान छिपाई, वेटर की नौकरी की; जानें कैसे बने नाहयान गल्फ के गेमचेंजर

संयुक्त राष्ट्र अमीरात (यूएई) ने तेल उत्पादक संगठन ओपेक से दूरी बनाकर संकेत दिया है कि उसका भविष्य तेल पर ही निर्भर नहीं है। राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की रणनीति ग्रीन हाइड्रोजन, एआई और स्पेस मिशन पर है। उन्होंने 2015 में कहा था कि आखिरी तेल के बैरल पर यूएई शोक नहीं, उत्सव मनाएगा। पहले सैन्य कमांडर फिर क्राउन प्रिंस से राष्ट्रपति बनने तक उनके फैसलों ने न केवल यूएई का कायाकल्प किया है, खाड़ी देशों में बदलाव को भी हवा दी है। शेख मोहम्मद की परवरिश ने उनके फैसलों की नींव रखी। जब 14 वर्ष के थे, तब पिता शेख जायद ने उन्हें राजसी पहचान छिपाकर मोरक्को पढ़ने भेजा था। ताकि वे कठोर जीवन देख सकें। सैंडहर्स्ट की ट्रेनिंग और ‘वेटर’ के रूप में काम मोरक्को में पढ़ाई के दौरान उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘हसन’ रखा था, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। वे अपना खाना खुद बनाते और कपड़े खुद धोते थे। वहां एक कैफे में वेटर के तौर पर भी काम किया, ताकि वह आम लोगों के संघर्ष और जीवन को करीब से समझ सकें। शेख मोहम्मद ने ब्रिटेन की प्रतिष्ठित रॉयल मिलिट्री अकादमी सैंडहर्स्ट से ट्रेनिंग ली और पासआउट होकर बाद में यूएई सेना में शामिल हुए। सेना के आधुनिकीकरण और प्रोफेशनल ट्रेनिंग को उन्होंने खुद मॉनिटर किया। शेख मोहम्मद ने खुद को कट्टरपंथी सोच से अलग रखा। छात्र जीवन में जब एक मौलवी ने उन्हें कट्टरपंथ की ओर मोड़ने की कोशिश की, तो वे जल्द समझ गए कि यह विचारधारा खतरनाक है। यमन युद्ध में नाहयान ने मिसाल पेश की। भतीजे को फ्रंट लाइन पर भेजा, जो आज युद्ध के कारण व्हीलचेयर पर हैं। 2004 में क्राउन प्रिंस बनने पर नाहयान ने कानूनों की दशा बदली। संसद में 50% महिला आरक्षण, 100% विदेशी स्वामित्व व गोल्डन वीसा जैसे फैसलों ने यूएई को निवेश हब बनाया। हालांकि, 2004-22 तक उनके भाई शेख खलीफा बिन जायद राष्ट्रपति थे, पर असली ताकत व कूटनीति क्राउन प्रिंस रहते नाहयान के पास थी। यही यूएई को गल्फ का गेमचेंजर बना रहा है। एआई से 50% सरकारी फैसले लेने वाला पहला देश बनेगा 2022 में राष्ट्रपति बनने के बाद शेख मोहम्मद ने पर्सनल लॉ में बदलाव कर तलाक, कस्टडी और विरासत में महिलाओं को अधिकार दिए। श्रम कानून बदलकर ‘निश्चित अवधि’ के अनुबंध अनिवार्य किए गए, जिससे बाहरी मजदूरों को लाभ हुआ। ‘एजेंटिक एआई’ मॉडल के तहत लक्ष्य है कि 2028 तक 50% सरकारी काम एआई संभाले, जो विश्लेषण के साथ फैसले भी ले सके। ऐसा करने वाला यूएई दुनिया का पहला देश होगा। सादगी की बात करें तो कई बार मेहमानों को वे खुद ही कॉफी सर्व करते हैं।
सामंथा ने लॉन्च किया टॉक्सिन फ्री परफ्यूम:रणबीर से रश्मिका तक; परफ्यूम बिजनेस में उतरे सेलेब्स, फैंस से बन रहा नया कनेक्शन

फिल्म स्टार्स लंबे समय से परफ्यूम ब्रांड्स का प्रचार करते रहे हैं, लेकिन अब वे खुद इस बिजनेस में उतर रहे हैं और अपने-अपने तरीके से फैंस से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। रणबीर कपूर ने पिछले साल ‘ARKS’ नाम से परफ्यूम लॉन्च किया। इसमें रणबीर ने ऑनलाइन स्ट्रेटजी अपनाई। कंपनी ने स्विगी इंस्टामार्ट से पार्टनरशिप की और इसे क्विक कॉमर्स पर उपलब्ध कराया। वहीं सामंथा रुथ प्रभु का ‘सीक्रेट एलकेमिस्ट’ खुद को भारत का पहला अरोमाथेरेपी-बेस्ड परफ्यूम ब्रांड बताता है, जिसमें टॉक्सिन-फ्री और वेलनेस-फोकस्ड खुशबुओं पर जोर है। रश्मिका मंदाना ने भी ‘डियर डायरी’ नाम से परफ्यूम ब्रांड शुरू की है। उनकी कंपनी ने 2026 के अंत तक 100 स्टोर्स तक विस्तार करने की योजना बनाई है। इधर, हॉलीवुड में भी रिहाना, सेलेना गोमेज जैसे सेलेब्रिटी इस बिजनेस में हैं। जानते हैं इनके बारे में। ये स्टार्स बना रहे अपने पर्सनलाइज्ड परफ्यूम सामंथा रुथ प्रभुका ‘सीक्रेट एलकेमिस्ट’ सामंथा ने मार्च 2026 में ब्रांड सीक्रेट एलकेमिस्ट के जरिए अरोमाथेरेपी-आधारित नए परफ्यूम्स की रेंज लॉन्च की है। ये उनके क्यूरेटेड परफ्यूम है व टॉक्सिन-फ्री हैं। औसतन 100ml परफ्यूम 999 रु. से शुरू है। रश्मिका मंदाना का डियर डायरी रश्मिका ने जुलाई 2025 में परफ्यूम ब्रांड ‘डियर डायरी’ लॉन्च किया। इसकी खुशबुएं उनकी निजी यादों और कूर्ग में बिताए बचपन से प्रेरित हैं। रश्मिका अपने परफ्यूम से फैंस से कनेक्ट बना रही हैं। औसतन 100ml परफ्यूम 2599 रु. का है। सेलेना गोमेज का रेयर ब्यूटी सेलेना ने रेयर ब्यूटी में फ्रेगरेंस लॉन्च किया है। इसमें कैरामेल, पिस्ता व सैंडलवुड जैसे नोट्स शामिल हैं। यह वीगन फ्रेंडली है। इसे यूं डिजाइन किया गया है कि इसकी खुशबू 12 घंटे तक विकसित होती रहे। औसतन 50ml परफ्यूम 4500 रु. का है। बियोंसे का बियोंसे परफ्यूम्स बियोंसे परफ्यूम्स के तहत दो नए परफ्यूम Cé Noir और Cé Lumière लॉन्च किए हैं। इनमें स्किन मस्क नोट इस्तेमाल किया गया है, जिससे खुशबू त्वचा पर धीरे-धीरे पर्सनल एहसास दे। कीमत 15 हजार रु. से शुरू है। रणबीर कपूर ARKS परफ्यूम रणबीर ने ARKS परफ्यूम लॉन्च किया है। इसकी 65% बिक्री ऑनलाइन हो रही है। हर महीने ₹1 करोड़ से ज्यादा का रेवेन्यू भी आ रहा है। यह ‘जेंडर-इन्क्लूसिव’ परफ्यूम है। इसकी एक 50ml बोतल की कीमत ₹2,999 रु. है।
पॉवेल की विदाई, कहा था-ईमानदारी की कोई कीमत नहीं होती:लेबल चिपकाने वाले युवक से वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे अहम चेहरा बनने तक की कहानी

आठ साल…तीन अमेरिकी राष्ट्रपति… 66 रेट सेटिंग मीटिंग…महामारी, महंगाई, राजनीतिक हमले आपराधिक जांच। इन सबके बीच जेरोम पॉवेल ने अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की कमान संभाली। 29 अप्रैल को उन्होंने फेड चेयर के तौर पर आखिरी पॉलिसी मीटिंग ली। उनकी कहानी भरोसे, दबाव और ईमानदारी की मिसाल बन गई। 15 मई को चेयरमैन के तौर पर कार्यकाल खत्म होने के बाद भी पॉवेल फेड के गवर्नर और रेट-सेटिंग कमेटी के सदस्य बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि न्याय विभाग की जांच पूरी पारदर्शिता और अंतिम नतीजे पर पहुंचने तक उनका बने रहना जरूरी है। यह फैसला असामान्य जरूर है, लेकिन शायद पॉवेल हमेशा से ऐसे ही रहे- नियमों से ज्यादा संस्थान की साख को अहमियत देने वाले। कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों में दुनिया की अर्थव्यवस्था जैसे अचानक थम गई थी। बाजार टूट रहे थे, सप्लाई चेन बिखर रही थी और करोड़ों लोग भविष्य को लेकर डरे हुए थे। मार्च 2020 में पॉवेल ने आपात बैठक बुलाकर ब्याज दरों में कटौती की। कुछ ही दिनों बाद रविवार को दूसरी इमरजेंसी बैठक बुलाई और दरें लगभग शून्य कर दी गईं। महामारी के बाद जब महंगाई 40 साल के ऊंचे स्तर पर पहुंची, तब भी पॉवेल आलोचनाओं के घेरे में रहे। फेड ने आक्रामक तरीके से ब्याज दरें बढ़ाईं। पॉवेल ने चेतावनी दी थी कि लोगों और कॉरपोरेट्स को कुछ दर्द झेलना पड़ेगा, लेकिन कीमतों को काबू में लाना जरूरी है। लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी लड़ाई राजनीति से रही। डोनाल्ड ट्रंप ने कभी उन्हें ‘स्मार्ट’ और मजबूत कहा था, लेकिन बाद में वही ट्रंप उन्हें ‘फूल’, ‘नंबस्कल’ और ‘मेजर लूजर’ जैसे शब्दों से निशाना बनाने लगे। इसके बावजूद पॉवेल ने शायद ही कभी सार्वजनिक जवाब दिया। जब फेड की स्वतंत्रता पर सवाल उठे, तब उन्होंने खुलकर कहा कि यह लड़ाई सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि इस बात की है कि अमेरिका में ब्याज दरें आंकड़ों से तय होंगी या राजनीतिक दबाव से। पॉवेल की निजी कहानी भी उतनी ही मानवीय है। वह शुरुआत में गोदाम में सामान पर लेबल लगाने का काम करते थे। उन्होंने कभी अर्थशास्त्र को उबाऊ समझकर छोड़ दिया था, पर वही व्यक्ति वैश्विक अर्थव्यवस्था का सबसे अहम चेहरा बन गया। सिर्फ एक पद का अंत नहीं, संस्थागत भरोसे की पूरी दास्तान है पावेल का करिअर जेरोम पॉवेल ने 2024 में एक इंटरव्यू में कहा था, ‘ईमानदारी की कोई कीमत नहीं होती। आखिर में आपके पास सिर्फ वही बचती है।’ यही उनके पूरे कार्यकाल का सार बन गया। महामारी हो, महंगाई या राजनीतिक दबाव- पॉवेल ने कई फैसलों पर आलोचना झेली, पर फेड की स्वतंत्रता और अपनी साख से समझौता नहीं किया। उनकी विदाई सिर्फ एक पद का अंत नहीं, बल्कि संस्थागत भरोसे की कहानी बन गई।
2025 में 4.4 करोड़ भारतीयों ने पहली बार लोन लिया:दक्षिण की महिलाएं गोल्ड तो उत्तर भारत की बिजनेस लोन ले रहीं

भारतीय लोन मार्केट का चेहरा बदल रहा है। पहली बार लोन लेने वालों (न्यू टू क्रेडिट) की दौड़ में महिलाएं पुरुषों को टक्कर दे रही हैं। क्रेडिट एजेंसी क्रिफ हाई मार्क की ‘ब्रिजिंग द गैप’ रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 तक 12 माह में महिलाओं की हिस्सेदारी 41% हो गई, जो फरवरी 2022 तक 33% थी। यानी 10 में से 4 नई कर्जदार महिलाएं हैं। खास बात यह है कि टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन बढ़ने के बीच यूपी, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में महिलाएं उद्यमी बनने के लिए बिजनेस लोन ले रही हैं, वहीं, दक्षिण में गोल्ड लोन का दबदबा है। पहले लोन में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का दबदबा पहली बार लोन लेने वालों में से 32% वॉशिंग मशीन, फ्रिज या टीवी खरीदने के लिए लोन लेते हैं। यही एंट्री पॉइंट बनता है। और एक बार जो रिश्ता बनता है, वह आगे भी बना रहता है। गोल्ड लोन लेने वालों में से 84.5% अगला लोन भी गोल्ड पर ही लेते हैं। पहली बार लोन लेन वाले लोगों की प्राथमिकता ? कंज्यूमर लोन – 31.6% गोल्ड लोन – 20.2% दो पहिया – 16.9% पर्सनल लोन -11.0% बिजनेस लोन – 9.5% एनबीएफसी नए लोगों को लोन का बड़ा सहारा आमतौर पर माना जाता है कि वित्तीय समावेशन का बोझ सरकारी बैंकों पर होता है, लेकिन डेटा इसके विपरीत कहानी कह रहा है। बैंक पहली बार कर्ज लेने वालों को लोन देने से बचते हैं। – एनबीएफसी का हिस्सा 50% से बढ़कर 61% हो गया – सरकारी बैंकों का हिस्सा 16% से घटकर 13.6% – निजी बैंकों का 22% से घटकर 15% यूपी, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में महिला कर्जदारों की संख्या सबसे ज्यादा महिलाओं की पसंद अब बदल रही है। वे केवल गहने गिरवी रखकर लोन नहीं ले रहीं, बल्कि अपना काम शुरू करने के लिए बिजनेस लोन भी ले रही हैं। शीर्ष 10 में से 5 राज्यों में महिलाओं के बीच बिजनेस लोन प्रमुख प्रोडक्ट बन गया है। महिलाओं की पहली पसंद 1. कंज्यूमर ड्यूरेबल 25.2% 2. गोल्ड लोन 21.8% 3. बिजनेस लोन 17.9% 4. पर्सनल लोन 8.3% यूपी, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में महिला कर्जदारों की संख्या सबसे ज्यादा है। दक्षिण भारत की महिलाएं गोल्ड लोन ज्यादा ले रही हैं, तो उत्तर और पूर्वी भारत (यूपी, बंगाल, बिहार) की महिलाएं बिजनेस लोन में आगे हैं। नए कर्जदार उम्मीद से ज्यादा सुरक्षित साबित हो रहे। इनकी सफलता दर बेहतर है। 67% ग्राहक एक साल में सुरक्षित रिस्क कैटेगरी में शामिल हुए। युवा – दोपहिया और पर्सनल लोन से शुरुआत 25 साल से कम उम्र के युवाओं के लिए ‘मोबिलिटी’ और ‘लिक्विडिटी’ सबसे अहम है, यही वजह है कि टू-व्हीलर और पर्सनल लोन सेगमेंट में इनका दबदबा है। वहीं, 26 से 35 साल के युवा कंज्यूमर ड्यूरेबल, गोल्ड लोन और बिजनेस लोन में दबदबा रखते हैं। 25 साल से कम के युवा दो पहिया लोग-33.1% पर्सनल लोन 50.3% 26-35 साल के युवा सीडी 35.4% गोल्ड लोन 29.4% बिजनेस लोन 30.7% कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, उस प्रोडक्ट में उस आयु वर्ग (12 माह, फरवरी 26 को खत्म) – कंज्यूमर ड्यूरेबल: 80.4% ग्राहकों का रिस्क प्रोफाइल बेहतर हुआ। – टू-व्हीलर: 75.3% ग्राहकों ने दिखाया बेहतरीन अनुशासन। – दो पहिया लोन में छोटे-मझोले शहरों की हिस्सेदारी 71 फीसदी और कंज्यूमेर ड्यूरेबल लोन में करीब 67 फीसदी है।
2025 में 4.4 करोड़ भारतीयों ने पहली बार लोन लिया:दक्षिण की महिलाएं गोल्ड तो उत्तर भारत की बिजनेस लोन ले रहीं

भारतीय लोन मार्केट का चेहरा बदल रहा है। पहली बार लोन लेने वालों (न्यू टू क्रेडिट) की दौड़ में महिलाएं पुरुषों को टक्कर दे रही हैं। क्रेडिट एजेंसी क्रिफ हाई मार्क की ‘ब्रिजिंग द गैप’ रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2026 तक 12 माह में महिलाओं की हिस्सेदारी 41% हो गई, जो फरवरी 2022 तक 33% थी। यानी 10 में से 4 नई कर्जदार महिलाएं हैं। खास बात यह है कि टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन बढ़ने के बीच यूपी, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में महिलाएं उद्यमी बनने के लिए बिजनेस लोन ले रही हैं, वहीं, दक्षिण में गोल्ड लोन का दबदबा है। पहले लोन में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का दबदबा पहली बार लोन लेने वालों में से 32% वॉशिंग मशीन, फ्रिज या टीवी खरीदने के लिए लोन लेते हैं। यही एंट्री पॉइंट बनता है। और एक बार जो रिश्ता बनता है, वह आगे भी बना रहता है। गोल्ड लोन लेने वालों में से 84.5% अगला लोन भी गोल्ड पर ही लेते हैं। पहली बार लोन लेन वाले लोगों की प्राथमिकता ? कंज्यूमर लोन – 31.6% गोल्ड लोन – 20.2% दो पहिया – 16.9% पर्सनल लोन -11.0% बिजनेस लोन – 9.5% एनबीएफसी नए लोगों को लोन का बड़ा सहारा आमतौर पर माना जाता है कि वित्तीय समावेशन का बोझ सरकारी बैंकों पर होता है, लेकिन डेटा इसके विपरीत कहानी कह रहा है। बैंक पहली बार कर्ज लेने वालों को लोन देने से बचते हैं। – एनबीएफसी का हिस्सा 50% से बढ़कर 61% हो गया – सरकारी बैंकों का हिस्सा 16% से घटकर 13.6% – निजी बैंकों का 22% से घटकर 15% यूपी, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में महिला कर्जदारों की संख्या सबसे ज्यादा महिलाओं की पसंद अब बदल रही है। वे केवल गहने गिरवी रखकर लोन नहीं ले रहीं, बल्कि अपना काम शुरू करने के लिए बिजनेस लोन भी ले रही हैं। शीर्ष 10 में से 5 राज्यों में महिलाओं के बीच बिजनेस लोन प्रमुख प्रोडक्ट बन गया है। महिलाओं की पहली पसंद 1. कंज्यूमर ड्यूरेबल 25.2% 2. गोल्ड लोन 21.8% 3. बिजनेस लोन 17.9% 4. पर्सनल लोन 8.3% यूपी, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में महिला कर्जदारों की संख्या सबसे ज्यादा है। दक्षिण भारत की महिलाएं गोल्ड लोन ज्यादा ले रही हैं, तो उत्तर और पूर्वी भारत (यूपी, बंगाल, बिहार) की महिलाएं बिजनेस लोन में आगे हैं। नए कर्जदार उम्मीद से ज्यादा सुरक्षित साबित हो रहे। इनकी सफलता दर बेहतर है। 67% ग्राहक एक साल में सुरक्षित रिस्क कैटेगरी में शामिल हुए। युवा – दोपहिया और पर्सनल लोन से शुरुआत 25 साल से कम उम्र के युवाओं के लिए ‘मोबिलिटी’ और ‘लिक्विडिटी’ सबसे अहम है, यही वजह है कि टू-व्हीलर और पर्सनल लोन सेगमेंट में इनका दबदबा है। वहीं, 26 से 35 साल के युवा कंज्यूमर ड्यूरेबल, गोल्ड लोन और बिजनेस लोन में दबदबा रखते हैं। 25 साल से कम के युवा दो पहिया लोग-33.1% पर्सनल लोन 50.3% 26-35 साल के युवा सीडी 35.4% गोल्ड लोन 29.4% बिजनेस लोन 30.7% कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, उस प्रोडक्ट में उस आयु वर्ग (12 माह, फरवरी 26 को खत्म) – कंज्यूमर ड्यूरेबल: 80.4% ग्राहकों का रिस्क प्रोफाइल बेहतर हुआ। – टू-व्हीलर: 75.3% ग्राहकों ने दिखाया बेहतरीन अनुशासन। – दो पहिया लोन में छोटे-मझोले शहरों की हिस्सेदारी 71 फीसदी और कंज्यूमेर ड्यूरेबल लोन में करीब 67 फीसदी है।
सीएम हेल्पलाइन शिकायतें लंबित, 14 अधिकारियों को नोटिस

ग्वालियर| सीएम हेल्पलाइन पोर्टल पर दर्ज शिकायतों का समय-सीमा में निराकरण नहीं करने पर कलेक्टर रुचिका चौहान ने 14 अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इनमें 13 अधिकारी एल-1 और एक एल-2 स्तर का है। एल-1 स्तर के उप प्रबंधक बिजली कंपनी प्रिंस वैश्य, सहायक यंत्री सुनील गुप्ता, प्रभारी वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी रविन्द्र सिंह, सहायक आपूर्ति अधिकारी सौरभ जैन, सहायक संपत्ति अधिकारी शैलेन्द्र चौहान व देवेन्द्र बुधौलिया, प्रभारी नायब तहसीलदार शिवदयाल शर्मा, सहायक प्राध्यापक (संगीत विवि) डॉ. श्याम रस्तोगी, सहायक आयुक्त वाणिज्यकर अभिषेक खरे, कोटक महिन्द्रा के आफाक मंसूरी व देवेन्द्र पाल सिंह, इंडियन ओवरसीज बैंक के शंकरानंद झा, भवन निरीक्षक बृजेश राजपूत तथा एल-2 स्तर के निगम के कार्यपालन यंत्री संजीव गुप्ता शामिल हैं।
अखंड भारत के केंद्र बिंदु से है बरसाली पंचायत की पहचान

भास्कर संवाददाता | बैतूल बैतूल ब्लॉक में आने वाली ग्राम पंचायत बरसाली के किसान उन्नत हैं। यहां किसान खेती के साथ- साथ दूध का व्यवसाय भी करते हैं। प्रतिदिन 1500 लीटर से अधिक दूध उत्पादन होने से यहां का मावा भी बैतूल सहित आसपास के जिलों में जाता है। इस पंचायत की खासियत यह है कि यहां अखंड भारत का केंद्र बिंदु होने का दावा किया जाता है। केंद्र बिंदु के नाम पर यहां सेंट्रल पाइंट (सीपी) लिखा पत्थर गड़ा हुआ है। रेलवे पटरी के दूसरी ओर होने के कारण यहां लोग पहुंचते हैं। हालांकि लोगों की सुविधा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। सांसद ने यहां भारत- माता की प्रतिमा लगाने की घोषणा की थी, लेकिन वह आज तक नहीं लगी। पंचायत में बरसाली, काजी जामठी, बागदा गांव आते हैं। ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन है। यादव समाज के अधिकांश लोग पशुपालन करते हैं। ग्राम पंचायत के सरपंच राजेंद्र यादव ने बताया कि यहां किसान गन्ना, सोयाबीन, मक्का, गेहूं के साथ सब्जियों की फसलें भी लगाते हैं। इसके अलावा पशुपालन भी किया जाता है। लगभग हर घर में गाय- भैंस पाली जाती हैं। इससे प्रतिदिन 1500 लीटर के करीब दूध होता है, जिसे किसान डेयरी में बेचते हैं। ग्रामीण दूध के साथ मावा बनाकर जिले में बेचते हैं। केद्र बिंदू के नाम पर केवल सीपी लिखा पत्थर गड़ा है। केंद्र बिंदु पर बरसाली पंचायत में रेलवे स्टेशन भी है। यह स्टेशन वर्षों पुराना है। इस गांव के एक ओर सड़क है। पीछे की ओर रेलवे स्टेशन है। इसके कारण परिवहन की बेहतर सुविधा है। पंचायत के सरपंच राजेंद्र यादव ने बताया कि बरसाली स्टेशन बेहद पुराना है। बरसाली गांव के पीछे पटरी पार कर अखंड भारत के केंद्र बिंदु पर जाना होता है। ग्राम पंचायत के सरपंच राजेंद्र बताते हैं कि अखंड भारत के केंद्र बिंदु के रूप में यहां सेंट्रल पाइंट (सीपी) लिखा पत्थर है। यहां लोगों के बैठने के लिए चेयर लगाई गई हैं। सरपंच ने बताया कि लोगों का दावा है कि यहां सेंट्रल पाइंट है, लेकिन सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं है। इसके कारण पंचायत यहां विकास कार्य नहीं करवा पा रही है। यहां भारत माता की प्रतिमा लगवाकर इसे विकसित करने का प्लान था, लेकिन लगी नहीं।
Schools will teach parents to recognize changing behavior in children

Hindi News Career Schools Will Teach Parents To Recognize Changing Behavior In Children नई दिल्ली9 मिनट पहले कॉपी लिंक स्कूलों में बच्चों के व्यवहार में बदलाव, एंग्जायटी को पहचानने के लिए पैरेंट्स को ट्रेनिंग दी जाएगी। साथ ही सोशल मीडिया के जोखिम, गेमिंग एडिक्शन व स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट पर गाइडेंस दी जाएगी। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने शिक्षा की पारंपरिक परिभाषा को बदलते हुए क्रांतिकारी कदम उठाया है। सत्र 2026-27 के लिए बोर्ड ने अपना नया ‘पैरेंटिंग कैलेंडर’ लॉन्च किया है, जिसका मकसद अभिभावकों को पीटीएम (पैरेंट-टीचर मीटिंग) के महज औपचारिक दर्शक से बदलकर बच्चे के विकास में एक ‘सक्रिय भागीदार’ बनाना है। यह पहल नई शिक्षा नीति के उस विजन का हिस्सा है, जहां पढ़ाई का मतलब सिर्फ रटना और बेहतर अंक लाना नहीं, बल्कि बच्चे का मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास भी है। जानिए महत्वपूर्ण पहलू… सपोर्ट ग्रुप बनाएंगे ताकि पैरेंट्स एक-दूसरे से सीख सकें, बच्चों के लिए इवेंट्स भी कैलेंडर में पहली बार उन मुद्दों को स्कूल सिस्टम का हिस्सा बनाया गया है, जिन्हें अब तक ‘घर का मुद्दा’ माना जाता था। बच्चों के व्यवहार में बदलाव, एंग्जायटी को पहचानने के लिए पैरेंट्स को ट्रेनिंग दी जाएगी। एनसीबी के साथ नशे के खिलाफ जागरूकता के लिए अध्याय जोड़ा गया है। सोशल मीडिया के जोखिम, गेमिंग एडिक्शन व स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट पर गाइडेंस दी जाएगी। नर्सरी से 12वीं तक हर उम्र के लिए अलग नुस्खा ’सीबीएसई ने इस कैलेंडर को बच्चों की उम्र के हिसाब से अलग-अलग श्रेणियों में बांटा है। बाल वाटिका(नर्सरी से छोटी क्लास) – यहां फोकस बच्चे की आदतों, भावनात्मक विकास और स्क्रीन टाइम पर होगा। मिडिल क्लास – दोस्ती के प्रति रुझान, डिजिटल व्यवहार पर चर्चा होगी। सीनियर क्लास – 9वीं से 12वीं तक के छात्रों के लिए कॅरिअर की चिंता, बोर्ड परीक्षा का तनाव और लाइफ स्किल्स को प्राथमिकता दी गई है। पैरेंट्स से व्यवस्थित संवाद – स्कूलों में सिर्फ पीटीएम नहीं बल्कि व्यवस्थित संवाद होगा। नियमित वर्कशॉप में पैरेंट्स बच्चों का व्यवहार व मानसिक स्थिति समझना सीखेंगे। अनुभव साझा करने के लिए सपोर्ट ग्रुप बनेंगे। प्रोजेक्ट्स, ओपन हाउस जैसे इवेंट्स से पैरेंट्स व बच्यों के बीच ‘ऑफलाइन जुड़ाव’ बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। समस्या सुलझाने पर जोर – बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया स्क्रीन एडिक्शन व कॅरिअर का दबाव बच्चों को अकेला कर रहा है। ऐसे में स्कूल, टीचर और पैरेंट्स के बीच तालमेल जरूरी है। कैलेंडर से यह संदेश देने की कोशिश है कि जरूरत पड़ने पर तुरंत पैरेंट्स टोचर मीटिंग बुलाई जाए, ताकि समस्या को गंभीर होने से पहले सुलझाया जा सके। ‘4 आर’ का सिद्धांत – नया कैलेंडर ‘4आर’ के सिद्धांत पर बनाया गया है, जो माता-पिता व बच्चों के रिश्ते को नई गहराई देगा। रिफ्लेक्शन – परवरिश के तरीकों पर विचार करना । रीइंफोर्समेंट – सकारात्मक व्यवहार को बढ़ावा देना । रिलेशनशिप – पैरेंट्स व बच्चे के बीच भरोसे का रिश्ता मजबूत करना। रिजॉइसिंग – बच्चे की छोटी-छोटी उपलब्धियों और साथ बिताए पलों का जश्न मनाना। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔









