Saturday, 13 Jun 2026 | 02:52 PM

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In ‘Raaka’, the characters will become the film’s defining feature; the film could be the beginning of a new universe.

In 'Raaka', the characters will become the film's defining feature; the film could be the beginning of a new universe.

Hindi News Entertainment In ‘Raaka’, The Characters Will Become The Film’s Defining Feature; The Film Could Be The Beginning Of A New Universe. मुंबई17 मिनट पहले कॉपी लिंक इस बार भी फिल्म का टाइटल अल्लू अर्जुन के किरदार के नाम पर रखा गया है। अल्लू अर्जुन की फिल्म ‘पुष्पा’ और ‘पुष्पा 2: द रूल’ ने जिस तरह देशभर में रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की, उसके बाद अब उनकी अगली फिल्म ‘राका’ को लेकर भी जबरदस्त चर्चा शुरू हो गई है। खास बात यह है कि इस बार भी फिल्म का टाइटल सीधे अल्लू अर्जुन के किरदार के नाम पर रखा गया है। इंडस्ट्री में इसे एक सोची-समझी रणनीति माना जा रहा है, जहां स्टार की स्क्रीन इमेज को ही फिल्म की सबसे बड़ी ब्रांडिंग बनाया जा रहा है। निर्देशक एटली की इस मेगा बजट फिल्म में दीपिका पादुकोण भी अहम भूमिका में नजर आएंगी। सूत्रों के मुताबिक, ‘पुष्पा’ की सफलता के बाद मेकर्स ने यह समझ लिया कि अल्लू के किरदार सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि खुद एक कल्ट पहचान बन जाते हैं। यही वजह है कि ‘राका’ में भी किरदार के नाम को ही फिल्म का टाइटल बनाया गया है, ताकि दर्शकों के बीच सीधा कनेक्शन तैयार हो सके। ट्रेड एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि ‘राका’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक नई सिनेमैटिक यूनिवर्स की शुरुआत साबित हो सकती है। वहीं एटली और अल्लू की जोड़ी को दक्षिण और हिंदी में बड़े गेम चेंजर साबित होगी। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

कोलकाता की तंग गलियों में हॉकी का मैदान बना उम्मीद:दो भाइयों की एकेडमी, खेल के सहारे गरीब बच्चों की जिंदगी को नई दिशा

कोलकाता की तंग गलियों में हॉकी का मैदान बना उम्मीद:दो भाइयों की एकेडमी, खेल के सहारे गरीब बच्चों की जिंदगी को नई दिशा

कोलकाता की उमस भरी सुबह, घड़ी में सात बज रहे हैं। सियालदह स्टेशन के बाहर रोज की तरह भीड़ भाग रही है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव की वजह से दीवारों से लेकर बिजली के खंभों तक नेताओं के चेहरे रंगे हुए हैं, लेकिन डॉ. सुरेश सरकार रोड से तीसरी गली में मुड़ते ही माहौल अचानक बदल जाता है। यहां सिर्फ हॉकी स्टिक की ‘टक-टक’ सुनाई देती है। छोटे-छोटे कदमों की ताल, बच्चों की दौड़ और एक कोच की सख्त, लेकिन उम्मीद से भरी आवाज। यह है एंटाली हॉकी एकेडमी। कोलकाता के सबसे पुराने हॉकी सेंटर में से एक। बाहर से देखने पर यह जगह किसी छोटे फुटबॉल मैदान से भी छोटी लगती है] लेकिन इस छोटे से मैदान ने न जाने कितने बच्चों के सपनों को जगह दी है। यह एकेडमी इलाके के बच्चों के लिए उम्मीद का ठिकाना है। यहां आने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से हैं। किसी के पिता रिक्शा चलाते हैं, तो किसी की मां सड़क किनारे खाना बेचती हैं। एंटाली की तंग गलियों में जहां कई बार हालात बच्चों का भविष्य निगल लेते हैं, वहां यह मैदान उन्हें हाथ में हॉकी स्टिक देकर लड़ना सिखाता है। यहां के कई बच्चे आगे चलकर कलकत्ता हॉकी लीग के अलग-अलग डिवीजन क्लबों तक पहुंचे हैं। एकेडमी बच्चों को सिर्फ खेल नहीं सिखाती, बल्कि उन्हें अनुशासन, दोस्ती और संघर्ष का मतलब भी समझाती है। पैसों की कमी हमेशा रहती है। बच्चों को बेसिक उपकरण देना भी मुश्किल हो जाता है। फिर भी यहां आने वाले बच्चों के चेहरे पर शिकायत नहीं दिखती। उनके लिए यह मैदान किसी मंदिर जैसा है। चौथी कक्षा में पढ़ने वाली एंजेला की मां पुतुल मंडल बताती हैं, ‘मेरी बेटी यहां पहले ड्रॉइंग प्रतियोगिता में आई थी। फिर उसने जिद पकड़ ली कि हॉकी सीखनी है।’ इसी तरह जुड़वां बहनें तापुर और तुपुर पांच साल से यहां अभ्यास कर रही हैं। अब वे 11 साल की हो चुकी हैं। उनके पिता सुदीप बैद्य कहते हैं, ‘आजकल बच्चों का खुले मैदान में खेलना बहुत कम हो गया है। यह जगह उनके लिए सुरक्षित ठिकाना बन गई है।’ बच्चों को गलत रास्ते से दूर रखने के लिए शुरू हुई थी एकेडमी एकेडमी के संयुक्त सचिव और कोच सुभीर कुमार पान कहते हैं, ‘हमारे लिए हॉकी सिर्फ खेल नहीं, जिंदगी है। इसी खेल ने हमें नौकरी दी, पहचान दी। अब हम इसे बच्चों को लौटाना चाहते हैं।’ सुभीर और उनके भाई प्रबीर दोनों राज्य स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। उनके गुरु असीम गांगुली ने इस एकेडमी की शुरुआत इसलिए की थी, ताकि इलाके के बच्चों को गलत रास्तों से दूर रखा जा सके। उस छोटी सी गली में शायद देश का अगला बड़ा खिलाड़ी तैयार हो रहा हो। लेकिन, वहां सबसे बड़ी जीत यह है कि कुछ बच्चे सपने देखना सीख रहे हैं।

एआई चैटबॉट का झूठा दावा:ब्रिटेन से मेडिकल की पढ़ाई, 7 साल का अनुभव; फर्जी लाइसेंस नंबर भी दिया, पहली बार AI कंपनी पर मुकदमा

एआई चैटबॉट का झूठा दावा:ब्रिटेन से मेडिकल की पढ़ाई, 7 साल का अनुभव; फर्जी लाइसेंस नंबर भी दिया, पहली बार AI कंपनी पर मुकदमा

क्या आप अपनी बीमारी के लक्षण गूगल पर सर्च करते हैं या इलाज के लिए किसी एआई चैटबॉट से सलाह ले रहे हैं? अगर हां, तो संभल जाइए। आप जिसे अपना हमदर्द डॉक्टर समझकर दिल की बात बता रहे हैं, दरअसल वह महज एक कोड और डेटा का पुलिंदा हो सकता है। अमेरिका के पेंसिल्वेनिया प्रांत ने ‘कैरेक्टर.एआई’ नाम की कंपनी पर ऐसे ही मामले को लेकर ऐतिहासिक मुकदमा किया है। आरोप है कि इस कंपनी के चैटबॉट खुद को ‘लाइसेंस प्राप्त डॉक्टर’ बताकर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, क्योंकि चैटबॉट सिर्फ डेटा को दोहराते हैं। कोई नैतिकता नहीं होती है। जांचकर्ता ने पकड़ा झूठ पेंसिल्वेनिया का यह मामला पिछले दिनों तब खुला, जब एक जांच अधिकारी ने इस प्लेटफॉर्म पर ‘साइकियाट्री’ (मनोचिकित्सा) सर्च किया। वहां उसे एक ऐसा ‘कैरेक्टर’ मिला, जिसने दावा किया कि वह एक डॉक्टर है। इस मामले से अचंभित प्रांत के गवर्नर जोश शापिरो ने कहा, ‘पेंसिल्वेनिया के लोग यह जानने के हकदार हैं कि वे इंसान से बात कर रहे हैं या मशीन से। हम एआई को डॉक्टरी के नाम पर लोगों को गुमराह करने की इजाजत नहीं देंगे।’ तकनीक दवा नहीं हो सकती एआई के इस ‘डॉक्टर अवतार’ का काला पक्ष भयावह है। हाल ही में एक महिला ने गूगल और कैरेक्टर एआई पर मुकदमा किया। इसमें आरोप था कि चैटबॉट ने उसके किशोर बेटे को आत्महत्या के लिए उकसाया था। कारनेगी मेलन यूनिवर्सिटी के एथिक्स एक्सपर्ट डेरेक लेबेन कहते हैं, ‘यह मामला पूरी दुनिया के लिए नजीर बनेगा कि क्या एआई को ‘मेडिकल प्रैक्टिस’ का दोषी माना जा सकता है।’ वहीं, कॉमन सेंस मीडिया की अमीना फजलुल्लाह का कहना है कि सोशल मीडिया की तरह एआई की स्व-नियमन प्रणाली भी फेल साबित हो रही है, जिससे बच्चों और मानसिक रूप से कमजोर लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है। असली का भ्रम: जांच में एआई कंपनी का झूठ सामने आया अमेरिका के कैरेक्टर टेक्नोलॉजीज इंक (कैरेक्टर एआई संचालक) पर ‘अवैध चिकित्सा प्रैक्टिस’ का आरोप लगाया गया है। पहली बार किसी एआई कंपनी पर ऐसा केस किया गया है। जांच में पाया गया था कि ‘एमिली’ नामक कैरेक्टर को ‘डॉक्टर ऑफ साइकियाट्री (मनोचिकित्सक) लेबल दिया गया था। एमिली ने झूठे दावे किए। एक लाइसेंस नंबर भी दिया, जो नकली था। इम्पीरियल कॉलेज लंदन से मेडिकल की पढ़ाई करने का दावा करते हुए कहा कि 7 साल का अनुभव है और ब्रिटेन में प्रैक्टिस करती हूं।

बड़ी म्यूजिक कंपनियां क्षेत्रीय गानों पर दांव लगा रहीं:5,900 करोड़ का हुआ घरेलू म्यूजिक बाजार, स्ट्रीमिंग की घटती कमाई से बदली रणनीति

बड़ी म्यूजिक कंपनियां क्षेत्रीय गानों पर दांव लगा रहीं:5,900 करोड़ का हुआ घरेलू म्यूजिक बाजार, स्ट्रीमिंग की घटती कमाई से बदली रणनीति

म्यूजिक इंडस्ट्री में अब बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जिसका सीधा फायदा क्षेत्रीय कलाकारों और संगीत प्रेमियों को होगा। टाइम्स म्यूजिक, वार्नर म्यूजिक और सारेगामा जैसी बड़ी कंपनियां अब स्थानीय गानों के कैटलॉग खरीदने पर भारी निवेश कर रही हैं। दरअसल, हिंदी फिल्म म्यूजिक की बढ़ती लागत और स्ट्रीमिंग से घटती कमाई ने कंपनियों को छोटे लेकिन मजबूत क्षेत्रीय बाजारों की ओर मोड़ा है। इस कन्सॉलिडेशनं से क्षेत्रीय संगीत कंपनियों की पहुंच ग्लोबल प्लेटफॉर्म और बेहतर तकनीक तक होगी। इससे न केवल गानों की क्वालिटी सुधरेगी, बल्कि डिजिटल वितरण प्रणाली भी पारदर्शी बनेगी। फिक्की-ईवाई की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 में भारतीय म्यूजिक सेगमेंट का रेवेन्यू 10% बढ़कर 5,900 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। अब म्यूजिक कंपनियां नए कंटेंट पर पैसा लगाने के बजाय स्थापित क्षेत्रीय कैटलॉग के जरिए अपना रिस्क कम कर रही हैं। बड़ी कंपनियों के आने से क्षेत्रीय स्तर पर रॉयल्टी और अधिकारों का प्रबंधन काफी सरल और व्यवस्थित हो जाएगा। अब तक जिन गानों का सही डिजिटल हिसाब नहीं मिल पाता था, वे भी मुख्यधारा की स्ट्रीमिंग का हिस्सा बनेंगे। इससे छोटे और मध्यम स्तर के म्यूजिक लेबल्स को वैश्विक बुनियादी ढांचे और पूंजी तक पहुंच मिलेगी। साझा मार्केटिंग और डेटा-संचालित रणनीतियों से गानों को सही दर्शकों तक पहुंचाना आसान होगा। म्यूजिक लेबल वर्तमान समय में अपनी कमाई के पुराने तरीकों को बदलने के लिए मजबूर हैं। पिछले एक साल में ऑडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने प्रति स्ट्रीम भुगतान की दरों को करीब आधा कर दिया है। इसकी मुख्य वजह यूट्यूब पर दर्शकों का रुझान संगीत से हटकर स्टैंड-अप कॉमेडी और पॉडकास्ट की ओर बढ़ना है। इसके बावजूद फिल्म निर्माता अपने म्यूजिक राइट्स महंगे बेच रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए रिकवरी करना चुनौतीपूर्ण हो गया है। साल 2025 का ट्रेंड बताता है कि कंपनियां अब केवल गानों के ट्रांजेक्शन के बजाय आईपी (बौद्धिक संपदा) पर नियंत्रण चाहती हैं। वे ऐसे निवेश पर ध्यान दे रही हैं जहां कंटेंट का फ्लो तय हो और वैश्विक स्तर पर कमाई की जा सके। छोटी लेकिन प्रासंगिक क्षेत्रीय कंपनियों का अधिग्रहण जोखिम कम करने का सबसे बेहतर तरीका बन गया है। इससे क्षेत्रीय संगीत की दुनिया में प्रोफेशनल वर्क कल्चर का विस्तार होगा। अगले 3 साल में 50% बढ़ेगी क्षेत्रीय गानों की पहुंच, कलाकारों की मांग बढ़ेगी बड़े कंपनियों के उतरने से कलाकारों के भुगतान में अस्थायी रूप से उछाल आ सकता है। अगले दो-तीन वर्षों में क्षेत्रीय भाषाओं के गानों की पहुंच 50% तक बढ़ने की उम्मीद है। जब ग्लोबल मंच पर भोजपुरी, पंजाबी या मराठी गाने बजेंगे, तो इससे न केवल सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी, बल्कि जमीनी स्तर पर छिपे हुए हुनर को भी अपनी पहचान बनाने के लिए बड़े शहरों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा।

रिपोर्ट- 90% जापानियों ने चीनी कारों का बहिष्कार किया:फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका ईवी से दूर भाग रहे; इंडोनेशिया, भारत जैसे देश अपनाने में आगे

रिपोर्ट- 90% जापानियों ने चीनी कारों का बहिष्कार किया:फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका ईवी से दूर भाग रहे; इंडोनेशिया, भारत जैसे देश अपनाने में आगे

दुनिया के 31 देशों में औसतन 43% लोग कहते हैं कि बिना कार के जीना उनके लिए असंभव है। 22 देशों में लोग कार को पसंदीदा ट्रांसपोर्ट मानते हैं। 65% अमेरिकी बिना कार लिए नहीं रह सकते हैं। लेकिन भारत के लोगों की पहली पसंद पब्लिक ट्रांसपोर्ट है। देश के 62% लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट को चुनना चाहते हैं। इप्सॉस की ग्लोबल मोबिलिटी रिपोर्ट 2026 में यह खुलासा हुआ है। लेकिन ईवी के सबसे बड़े पैरोकार रहे फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों का इससे मोहभंग हो रहा है। जापान में यह आंकड़ा -28% तक गिर चुका है। इसके विपरीत इंडोनेशिया (60%), मेक्सिको (60%) और चिली (57%) सबसे आगे हैं। यह सर्वे 31 देशों में किया गया। 23,722 लोगों ने हिस्सा लिया। सेल्फ-ड्राइविंग कार – भारत डरता नहीं – भारत में ईवी अपील 40% है, जो ग्लोबल औसत 47% से थोड़ा कम है। लेकिन यह यूरोप और नॉर्थ अमेरिका से बेहतर स्थिति में है। – 36% लोग सेल्फ-ड्राइविंग कार को असुरक्षित मानते हैं। सबसे आगे फ्रांस (-37%), नीदरलैंड्स (-35%), अमेरिका (-25%) है। – भारत में करीब 47% लोग इस तकनीक में सुरक्षित महसूस करते हैं, जबकि ग्लोबल औसत 36% है। भारतीय बाजार में हर कंपनी के लिए बड़े मौके भारत में 16% किसी टेक कंपनी से कार खरीदना पसंद करेंगे, 22% की पसंद पारंपरिक ऑटोमेकर हैं। – 62% को कोई प्राथमिकता नहीं है। यानी बाजार किसी के लिए बंद नहीं है। टाटा, महिंद्रा से लेकर गूगल, शाओमी जैसी टेक कंपनियों के लिए दरवाजे खुले हैं। एशिया में चीन विरोध बढ़ रहा, भारत के लिए बड़े मौके – जापान में 90% लोग चीनी कार नहीं लेंगे। दक्षिण कोरिया में भी चीन-विरोधी भावना प्रबल है। – कनाडा में 48% लोग अमेरिकी कार नहीं खरीदेंगे। यानी इस माहौल में भारत के लिए बड़े मौके भी हैं। – चीन के खिलाफ यह अविश्वास भारतीय ब्रांड्स के लिए एशियाई बाजारों में रास्ता खोल सकता है। – 42% लोग किसी न किसी खास देश की कार खरीदने से बच रहे हैं। इस लिस्ट में चीनी सबसे ऊपर है। उसका बॉयकॉट रेट (41%) और अमेरिकी कारों के लिए यह आंकड़ा करीब 24% है।

Players are improving their performance with the ‘Batman Effect’

Players are improving their performance with the 'Batman Effect'

Hindi News Sports Players Are Improving Their Performance With The ‘Batman Effect’ रस्टिन डॉड. द न्यूयॉर्क टाइम्स15 मिनट पहले कॉपी लिंक विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका हमारे दिमाग को नई दिशा देता है। जब हम खुद को किसी मजबूत, आत्मविश्वासी व्यक्ति की तरह देखते हैं, तो हमारा व्यवहार भी वैसा ही होने लगता है। आज की तेज और प्रतिस्पर्धी दुनिया में सफलता सिर्फ प्रतिभा से नहीं मिलती, बल्कि मानसिक मजबूती भी उतनी ही जरूरी है। इसी मानसिक मजबूती के लिए खेल की दुनिया में एक दिलचस्प तरीका सामने आया है- ‘ऑल्टर ईगो’, यानी खुद को कुछ समय के लिए किसी और के रूप में देखना और उसी तरह व्यवहार करना। यह तरीका न सिर्फ खिलाड़ियों, बल्कि आम लोगों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहा है। एनबीए के स्टार खिलाड़ी शाई गिलगेयस-अलेक्जेंडर की कहानी इसका बेहतरीन उदाहरण है। जब वे 13 साल के थे, तब उनकी सबसे बड़ी समस्या थी उनकी कम हाइट। करीब 5 फुट 6 इंच के इस खिलाड़ी को उनके कोच ने एक अनोखी सलाह दी कि खुद को स्टार एलन आइवरसन की तरह सोचो और खेलो। शुरुआत में यह सिर्फ एक खेल जैसा लगा, लेकिन धीरे-धीरे यह उनकी ताकत बन गया। उन्होंने डरना छोड़ दिया और आत्मविश्वास के साथ खेलना शुरू किया। यह सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि विज्ञान भी इसे सही ठहराता है। मनोवैज्ञानिकों ने एक प्रयोग में बच्चों को अलग-अलग तरीकों से काम करने को कहा। कुछ बच्चों ने खुद के बारे में सोचा, कुछ ने अपने नाम से खुद को देखा, और कुछ बच्चों को बैटमैन या डोरा बनने का मौका दिया गया। नतीजा चौंकाने वाला था, जो बच्चे किरदार में थे, उन्होंने सबसे ज्यादा मेहनत की। इस प्रयोग को ‘बैटमैन इफेक्ट’ कहा गया। दरअसल, जब हम खुद से दूरी बनाकर किसी और की तरह सोचते हैं, तो डर और झिझक कम हो जाती है। यही कारण है कि कई बड़े खिलाड़ी इस टेक्निक का इस्तेमाल करते हैं। महान बास्केटबॉल खिलाड़ी कोबे ब्रायंट ने अपने लिए ‘ब्लैक मांबा’ नाम का किरदार बनाया था। इस किरदार में वे खुद को ज्यादा फोकस्ड और आक्रामक महसूस करते थे। इसी तरह पूर्व बास्केटबॉल खिलाड़ी स्टीव केर ने भी खुद को किसी और खिलाड़ी की तरह सोचकर खेला, जिससे आत्मविश्वास बढ़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका हमारे दिमाग को नई दिशा देता है। जब हम खुद को किसी मजबूत, आत्मविश्वासी व्यक्ति की तरह देखते हैं, तो हमारा व्यवहार भी वैसा ही होने लगता है। धीरे-धीरे यह आदत असली जिंदगी में भी असर दिखाने लगती है। परीक्षा और इंटरव्यू में भी काम आता है यह तरीका यह तरीका सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं है। अगर कोई छात्र परीक्षा से डरता है, तो वह खुद को एक आत्मविश्वासी छात्र के रूप में देख सकता है। अगर कोई व्यक्ति इंटरव्यू में घबराता है, तो वह खुद को एक सफल प्रोफेशनल की तरह सोच सकता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

5 दिग्गज बिजनेस लीडर्स से जानें, नौकरी से क्या सीखा:कोई भी काम छोटा नहीं; कभी आइसक्रीम बेचने वाला आज गोल्डमैन सैक्स का सीईओ

5 दिग्गज बिजनेस लीडर्स से जानें, नौकरी से क्या सीखा:कोई भी काम छोटा नहीं; कभी आइसक्रीम बेचने वाला आज गोल्डमैन सैक्स का सीईओ

हर बड़े लीडर की शुरुआत किसी छोटे काम से ही होती है। महत्वपूर्ण बात ये है कि आप अपने शुरुआती कामों से क्या सीख हासिल करते हैं। अगर दुनिया के कुछ सफल बिजनेस लीडर्स की बात करें तो उन्होंने भी अपनी शुरुआत छोटी-मोटी नौकरी से की। इनमें आइसक्रीम बेचने से लेकर गोल्फ कार्ट साफ करने तक के काम शामिल हैं। लेकिन इन्हीं अनुभवों ने उन्हें वो स्किल्स सिखाईं, जो आगे चलकर उनकी लीडरशिप की पहचान बनीं। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 बड़े बॉसेज की पहली नौकरी से मिली सीख.. अपने काम पर फोकस रखें, हमेशा सतर्क रहें डेविड सोलोमन 2018 से दुनिया के कुछ सबसे बड़े निवेश बैंकों में शुमार गोल्डमैन सैक्स ग्रुप इंक. के सीईओ हैं। वे 1999 से वहीं कार्यरत हैं; फिर भी, उन्हें न्यूयॉर्क के वेस्टचेस्टर काउंटी में अपनी पहली नौकरी की यादें आज भी ताजा हैं। डेविड कहते हैं, ‘मैंने 15 साल की उम्र में बास्किन-रॉबिन्स में काम शुरू किया और कॉलेज तक वहीं काम करता रहा।’ डेविड के मुताबिक, ‘जब आप ग्राहक-केंद्रित रिटेल में काम करते हैं, तो आप काम पर फोकस करने और सतर्क रहने का महत्व सीखते हैं। काम के लक्ष्य निर्धारित करें, अनुशासित रहें एंड्रयू मैकडोनाल्ड की पहली नौकरी टोरंटो में एक नौ-होल गोल्फ कोर्स में थी। समय बिताने के लिए उन्होंने अपने दिमाग में छोटे-छोटे खेल बना लिए। इस काम ने उन्हें सिखाया कि लक्ष्य निर्धारित करने से नियमित काम भी सार्थक लगने लगता है। इसने उन्हें अनुशासन भी सिखाया। काम पसंद हो, तो कड़ी मेहनत थकाती नहीं कैटेरिना श्नाइडर की पहली नौकरी लेहमन ब्रदर्स में थी, जो इतिहास का सबसे बड़ा दिवालिया बैंक था। यहां काम करते हुए उन्होंने सीखा कि अगर आप ऐसा काम करते हैं जो आपको रुचिकर और संतुष्टिदायक लगता है, तो आप बिना थके लंबे समय तक कड़ी मेहनत कर सकते हैं। आपके हर खर्च का औचित्य होना चाहिए करियर की शुरुआत में, कैथी ओ’ब्रायन इलेक्ट्रा रिकॉर्ड्स में मार्केटिंग की प्रमुख थीं। एक दिन मुख्य वित्तीय अधिकारी ने उन्हें बुलाया और कहा कि हमेशा अपने खर्च का हिसाब रखना।’ उस नौकरी में उन्होंने जरूरी और गैर-जरूरी खर्च का महत्व और हर खर्च का औचित्य समझना सीखा। टीम के रूप में काम करना महत्वपूर्ण, अपनी छोटी कमाई का भी आनंद लें सिमोज की पहली नौकरी 15 साल की उम्र में एक अकाउंटेंसी फर्म ऑफिस में लगी। यहां उन्हें वित्तीय रिपोर्टों को वर्णमाला क्रम में व्यवस्थित करना होता था। इसने कम उम्र में ही कार्य में नैतिकता का महत्व सिखाया।

33% more expensive, yet advance bookings are available

33% more expensive, yet advance bookings are available

Hindi News Business Indian Mango Craze: 33% More Expensive, Yet Advance Bookings Are Available न्यूयॉर्क8 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिका में भारतीय आमों के प्रति दीवानगी देखी जा रही है। लोग आमों की खेप वाली फ्लाइट्स को ट्रैक कर रहे हैं। अप्रैल में पहली खेप आने से पहले ही सारे प्री-ऑर्डर बिक गए। लोग 10-12 आमों के एक बॉक्स के लिए 5,600 रुपए तक खर्च करने को तैयार हैं। यही बॉक्स पिछले साल करीब 3700- 4200 रु. में मिल जा रहे थे। 33% तक आम महंगे हुए हैं। इसकी बड़ी वजह ईरान युद्ध के बाद तेल के दाम बढ़ना, शिपमेंट महंगा होना है। एक साल में भारतीय आम के दाम 4,200 से 5,600 रु. प्रति बॉक्स हुए फ्लाइट्स कम होने से कुछ शिपमेंट लेट या कैंसिल भी हुए, जिससे खर्च और बढ़ा। अमेरिका के ग्रोसरी स्टोर में सालभर मिलने वाले मेक्सिकन आम जहां करीब 945 में मिल जाते हैं, वहीं भारतीय आमों को लोग स्वाद में अलग और ज्यादा मीठा मानते हैं। महाराष्ट्र का अल्फांसो, गुजरात का केसर, उत्तर भारत का चौसा और लंगड़ा, दक्षिण भारत का बंगनपल्ली वहां सबसे ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं। दशकों तक लगा रहा बैन, 2007 में हटा प्रतिबंध, तब अमेरिका पहुंचा भारतीय स्वाद दुनिया की आधी मैंगो सप्लाई भारत करता है, फिर भी दशकों तक यह अमेरिका में बैन रहा। इसका कारण ‘हॉट-वॉटर ट्रीटमेंट’ (गर्म पानी से कीड़े मारना) था, जिससे भारतीय आम खराब हो जाते थे। साथ ही दक्षिण अमेरिकी लॉबी का भी दबाव था। बाद में ‘गामा रेडिएशन’ (किरणों के जरिए कीटाणु मुक्त करना) तकनीक समाधान बनी। साल 2006 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और पीएम मनमोहन सिंह के बीच समझौते के बाद, 2007 में भारतीय आम आधिकारिक तौर पर अमेरिका पहुंचे। अमेरिकी ग्राहक वफादार, मैंगो पास भी बिक रहा भारतीय आमों के सबसे वफादार ग्राहक अब खुद अमेरिकी नागरिक बन रहे हैं, जबकि भारतीय प्रवासी अक्सर इसकी कीमतों पर नाराजगी जताते हैं। भारी मांग को देखते हुए ‘जीजी मैंगो’ जैसी कंपनियां 1000 डॉलर (करीब 94 हजार रुपए) में पूरे सीजन का ‘मैंगो पास’ ऑफर कर रही हैं। अब वॉलमार्ट और कोस्टको जैसे बड़े रिटेलर्स के जरिए भी इसे बेचने की तैयारी है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

द ओडिसी’ का ट्रेलर जारी:ट्रोजन युद्ध के बाद ओडीसियस की घर लौटने की जर्नी पर है कहानी

द ओडिसी’ का ट्रेलर जारी:ट्रोजन युद्ध के बाद ओडीसियस की घर लौटने की जर्नी पर है कहानी

हॉलीवुड के मशहूर निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ‘द ओडिसी’ का नया ट्रेलर जारी कर दिया गया है। मेकर्स ने 5 मई को ट्रेलर के साथ फिल्म की रिलीज डेट का भी ऐलान किया। यह फिल्म ग्रीक पौराणिक कथा के नायक ओडीसियस की रोमांचक कहानी पर आधारित है। इस किरदार में मैट डेमन नजर आएंगे, जबकि टॉम हॉलैंड उनके बेटे टेलीमाकस की भूमिका निभा रहे हैं। ट्रेलर में भव्य विजुअल्स और नोलन की सिग्नेचर स्टाइल साफ दिखाई दे रही है, जिससे फिल्म को लेकर दर्शकों में उत्साह और बढ़ गया है। ‘द ओडिसी’ तकनीकी रूप से भी खास मानी जा रही है। यह पूरी तरह IMAX कैमरों से शूट की जाने वाली पहली कथात्मक फिल्म होगी, जिससे बड़े पर्दे पर इसका अनुभव और भी शानदार बनने की उम्मीद है। खास बात यह है कि मेकर्स ने फिल्म के प्रमोशन के लिए जुलाई 2025 में ही 70mm स्क्रीनिंग के टिकट जारी कर दिए थे, जो इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। फिल्म की कहानी ट्रोजन युद्ध के बाद ओडीसियस की अपने घर इथाका लौटने की साहसिक यात्रा के इर्द-गिर्द घूमती है। यह फिल्म 17 जुलाई को रिलीज होगी।

2 मिनट वाले एपिसोड का क्रेज:हर महीने 1 हजार शोज बनाने की तैयारी; 2030 तक 42 हजार करोड़ के बाजार का अनुमान

2 मिनट वाले एपिसोड का क्रेज:हर महीने 1 हजार शोज बनाने की तैयारी; 2030 तक 42 हजार करोड़ के बाजार का अनुमान

भारत में मनोरंजन देखने का तरीका तेजी से बदल रहा है। लंबी फिल्में और टीवी सीरियल की जगह अब लोग मोबाइल पर माइक्रो-ड्रामा ज्यादा देख रहे हैं। इन शोज के एपिसोड 2 मिनट से भी कम के होते हैं और लोग इन्हें दिन के छोटे-छोटे ब्रेक में बिंज-वॉच कर रहे हैं। यह मुख्य रूप से मोबाइल फोन के लिए वर्टिकल फॉर्म में डिजाइन किया गया है, जिसे कहीं भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। निवेश फर्म लुमिकाई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में माइक्रो-ड्रामा का बाजार अभी करीब 2,856 करोड़ रुपए का है, जो 2030 तक 42,844 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। 68% ऑडियंस छोटे शहरों से, 40% दर्शक महिलाएं एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत में हर महीने करीब 4 करोड़ यूजर माइक्रो-ड्रामा देखते हैं। करीब 68% ऑडियंस टियर-2/टियर-3 शहरों से आती है, जहां सिनेमाघर कम, टीवी कमजोर और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की पहुंच सीमित रहती है। करीब 40% दर्शक महिलाएं हैं। बड़े प्रोड्यूसर व एआई से बढ़ा निवेश इसमें अब बड़े प्रोड्यूसर भी निवेश कर रहे हैं। मुकेश अंबानी की कंपनी जियोस्टार ने ‘तड़का’ नाम से प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है, जिस पर 100 से ज्यादा शोज हैं। जी एंटरटेनमेंट और बालाजी टेलीफिल्म्स भी इस फॉर्मेट में उतर चुके हैं। कई कंपनियां अब एआई की मदद से इसे 1 हजार प्रति माह तक ले जाने की योजना बना रही हैं। ओटीटी से 90% सस्ता माइक्रो-ड्रामा माइक्रो-ड्रामा फिल्ममेकर के मुताबिक माइक्रो-ड्रामा का पूरा सीजन बनाना ओटीटी सीरीज के मुकाबले 70-90% सस्ता पड़ता है। शूटिंग 3-4 दिन में हो जाती है। लागत करीब 15 हजार से 20 हजार रुपए प्रति मिनट कंटेंट बताई गई है। पूरा सीजन 10-15 लाख रुपए में बन जाता है, जिसे 20 से 50 रुपए महीने की सब्सक्रिप्शन से उठाया जाता है।