The high cost of digital education in the US has had the opposite effect.

Hindi News Career The High Cost Of Digital Education In The US Has Had The Opposite Effect. वॉशिंगटन4 मिनट पहले कॉपी लिंक डिजिटल लत के कारण बच्चों में अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं बढ़ रही हैं। – सिम्बॉलिक इमेज अमेरिका ने स्कूलों में किताबों की जगह लैपटॉप-टैबलेट पर 2024 में 2.72 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर उल्टा पड़ा। न्यूरोसाइंटिस्ट जेरेड कूनी होर्वाथ के मुताबिक, तकनीक तक अभूतपूर्व पहुंच के बावजूद जेन जी पिछली पीढ़ियों के मुकाबले संज्ञानात्मक रूप से कम सक्षम दिख रहे हैं और कॉमन टेस्ट में भी स्कोर गिरे हैं। होर्वाथ ने अमेरिकी सीनेट को बताया कि पिछले दस सालों में बच्चों की सीखने और समझने की क्षमता कम हुई है। दुनियाभर के आंकड़ों के अनुसार, स्कूल में कंप्यूटर और स्क्रीन पर अधिक समय बिताने वाले बच्चों के टेस्ट स्कोर खराब रहे हैं। उनके मुताबिक, पढ़ाई के दौरान तकनीक का बेरोकटोक इस्तेमाल और 2007 में आईफोन आने के बाद यह समस्या और गंभीर हो गई है, जिससे बच्चों की मानसिक एकाग्रता और सीखने की शक्ति पर बुरा असर पड़ा है। होर्वाथ ने कहा, यह बहस तकनीक को खारिज करने की नहीं है, बल्कि यह देखने की है कि शैक्षिक टूल्स को इंसानी सीखने के तरीके के साथ कैसे जोड़ा जाए। सोशल मीडिया और गेमिंग की लत से बच्चों में अवसाद सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जीन ट्वेंगे के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता खत्म कर रहा है, जो सीखने की प्रक्रिया के लिए हानिकारक है। सोशल मीडिया और गेमिंग एप्स को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे उपयोगकर्ताओं को लंबे समय तक बांधे रखें। नवंबर 2025 के एक अध्ययन के मुताबिक, टिकटॉक अपने सहज इस्तेमाल के कारण सबसे ज्यादा लत साबित हुआ है। इस डिजिटल लत के कारण बच्चों में अवसाद और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं बढ़ रही हैं, जिसके चलते मेटा और यूट्यूब जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स पर 1,600 से अधिक परिवारों और स्कूलों ने मुकदमे दर्ज कराए हैं। जेनरेटिव एआई का जेन-जी पर नकारात्मक प्रभाव जेन-जी पर जेनरेटिव एआई और गिरती मानसिक क्षमता का दोहरा दबाव है। स्टैनफोर्ड के अध्ययन के अनुसार, एआई के कारण शुरुआती स्तर की नौकरियों (एंट्री-लेवल) पर सबसे अधिक बुरा असर पड़ा है। न्यूरोसाइंटिस्ट होर्वाथ ने चेतावनी दी है कि सीखने-समझने की क्षमता में कमी केवल करियर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भविष्य की जटिल वैश्विक समस्याओं को सुलझाने की मानवीय शक्ति को भी कमजोर कर देगी। संकट का समाधान होर्वाथ ने सुझाव दिया है कि सरकार को क्लासरूम में केवल उन्हीं डिजिटल टूल्स की अनुमति देनी चाहिए जो वास्तव में प्रभावी साबित हों। रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2025 तक अमेरिका के 17 राज्यों ने स्कूलों में फोन के इस्तेमाल पर सख्ती की है। होर्वाथ इसे बच्चों की नहीं, बल्कि सिस्टम की नीतिगत विफलता मानते हैं। उनका कहना है कि पूरी शिक्षा कंप्यूटर के भरोसे छोड़ना एक गलत प्रयोग था, और अब छात्रों को इस पर सवाल उठाने चाहिए। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
ग्लोबल टूरिज्म 2026, दुनिया को मिलेंगे 4 सबसे भव्य म्यूजियम:लॉस एंजिलिस में 'स्पेसशिप', अबू धाबी में कांच के पुल पर गैलरी के साथ बेल्जियम में दिखेगा कार फैक्ट्री म्यूजियम

वर्ष 2026 वैश्विक संस्कृति और पर्यटन के लिए बेहद खास होने वाला है। अमेरिका के लॉस एंजिलिस से लेकर मध्य एशिया तक दुनिया के चार सबसे प्रतीक्षित म्यूजियम खुलने जा रहे हैं। ये प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र न केवल शहरों की स्काईलाइन बदलेंगे, बल्कि पर्यटन को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। इनमें हॉलीवुड निर्देशक जॉर्ज लुकास का लगभग 9 हजार करोड़ रु. का नैरेटिव आर्ट म्यूजियम और मशहूर आर्किटेक्ट फ्रैंक गेहरी द्वारा डिजाइन किया गया अबू धाबी का गुगेनहाइम प्रमुख है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और बेल्जियम में भी कला केंद्र तैयार हो रहे हैं। 1- अमेरिका- यूएफओ जैसा म्यूजियम लॉस एंजिलिस (अमेरिका) के एक्स पोजिशन पार्क में बन रहा यह म्यूजियम सितंबर तक खुलेगा। 11 एकड़ में फैले परिसर की लागत लगभग 9 हजार करोड़ रु. है। इसका आकार उड़न तश्तरी (यूएफओ-स्पेसशिप) जैसा है। इसमें हॉलीवुड फिल्म ‘स्टार वॉर्स’ के असली प्रॉप्स सहित 40 हजार कलाकृतियां होंगी। 2 – अबू धाबी – धातु की चादरों से बना है यह गुगेनहाइम अबू धाबी म्यूजियम यूएई के सादियात द्वीप पर बन रहा है। यहां कांच के पुलों पर गैलरियां बनाई गई हैं। इसकी लागत लगभग 9 हजार करोड़ रु. है। इसे आर्किटेक्ट फ्रैंक गेहरी ने धातु की चादरों और पाल जैसा डिजाइन किया। यहां जैक्सन पोलक जैसे कलाकारों की कलाकृतियां दिखाई जाएंगी। 3 – शिकागो में ओबामा का वाइट हाउस अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ओबामा का यह ड्रीम प्रोजेक्ट शिकागो के साउथ साइड में बन रहा है, जो जून 2026 में खुलेगा। 6350 करोड़ रु. की लागत है। इसकी बड़ी खासियत वाइट हाउस के ‘ओवल ऑफिस’ (राष्ट्रपति का मुख्य दफ्तर) की हूबहू प्रतिकृति होगी। ये 8 मंजिला इमारत ग्रेनाइट पत्थर से बनी है। 4 – बेल्जियम – कार फैक्ट्री म्यूजियम बनी बेल्जियम के ब्रसल्स में बन रहा यह कनाल-पॉम्पिडू म्यूजियम नवंबर तक खुलेगा। इसे 40 हजार वर्ग मीटर में फैली 1930 के दशक की कार फैक्ट्री को आधुनिक रूप देकर बनाया गया है। यहां पाब्लो पिकासो और हेनरी माटिस जैसे महान चित्रकारों की 350 से ज्यादा कलाकृतियां रखी जाएंगी। यह पुराने औद्योगिक भवनों को नया रूप देगा।
हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर:11वीं सदी के मठों में इस बार बर्फ का सूखा, 47% कम हुई बर्फबारी

इस बार कई पहाड़ी इलाकों में देर से ही सही, पर भारी बर्फबारी के बावजूद हिमाचल में जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिख रहा है। 11वीं शताब्दी से अडिग खड़े ऐतिहासिक बौद्ध मठ हों या 13,596 फीट की ऊंचाई पर बना एशिया का सबसे ऊंचा चिचम ब्रिज-ये सभी आज कम बर्फबारी के कारण अपनी पहचान खो रहे हैं। कभी सर्दियों में 7 फीट तक बर्फ की मोटी चादर में लिपटे रहने वाले देश के पहले मतदाता श्याम शरण नेगी के कल्पा जैसे गांव अब ‘स्नो ड्राउट’ (बर्फ के सूखे) की चपेट में हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 1991-2000 के दशक की तुलना में दिसंबर की बर्फबारी में 86% और जनवरी में 47% तक की रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है। विरासत जो संकट में हैं बौद्ध मठ: 1008-1064 ई. का मठ (गोम्पा) स्पीति घाटी में 13,668 फीट की ऊंचाई पर पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यहां सैकड़ों लामा रहते हैं। चिचम ब्रिज: चिचम ब्रिज 13,596 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसे एशिया में सबसे ऊंचाई पर बने पुल का दर्जा है।
Rajinikanth-Kamal’s ‘KHxRK’ introduction video released, both will be seen together after 47 years, KHxRK

चेन्नई38 मिनट पहले कॉपी लिंक रेड जायंट मूवीज की फिल्म ‘KHxRK’ के जरिए कमल हासन और रजनीकांत 47 साल बाद एक साथ नजर आने वाले हैं। अब फिल्म का एक खास इंट्रोडक्शन वीडियो सामने आया है, जिसने इस जोड़ी के साथ आने को लेकर उत्सुकता और बढ़ा दी है। इस वीडियो में फिल्म की थीम और अंदाज की झलक देखने को मिलती है। वीडियो की शुरुआत एक दिलचस्प कन्फ्यूजन से होती है-पहले किस कमरे में प्रवेश किया जाए। इसके बाद बातचीत में ‘शनमुगा प्रिया’ और ‘कोकिला प्रिया’ जैसे नामों के साथ ‘म्यूजिकल नोट’ का जिक्र आता है। वीडियो में म्यूजिक को लेकर हल्के-फुल्के अंदाज में संवाद होते हैं। एक किरदार कहता है कि उसे संगीत की समझ है, जबकि दूसरा मजाकिया लहजे में ‘दो उंगलियों की तकनीक’ की बात करता है। इस दौरान कमरे के चयन को लेकर समानता दिखाई जाती है। वीडियो के एक हिस्से में कहा जाता है…‘जब बीथोवन की सिम्फनी बप्पी लाहिड़ी के ग्रूव से मिलती है, तब एक लेजेंडरी मिक्स जन्म लेता है।’ इसके बाद होती है रजनीकांत और कमल की दमदार एंट्री। इसके बाद दोनों सूट, बूट, घड़ी और चश्मा पहनते हुए एक-दूसरे की पसंद के विपरीत चीजें चुनते हैं, जिससे मजेदार दृश्य सामने आते हैं। फिर ये दिग्गज अभिनेता एक गैराज में खड़ी कार की ओर बढ़ते हैं, जहां स्टाइलिश मॉडल्स शानदार और विंटेज कारों को धो रही होती हैं। इस फिल्म का निर्देशन नेल्सन दिलीपकुमार के हाथ में है और म्यूजिक अनिरुद्ध रविचंदर दे रहे हैं। फिल्म तमिल, तेलुगु और हिंदी में रिलीज की जाएगी। फिलहाल फिल्म से जुड़ी अन्य जानकारियां साझा नहीं की गई हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
नई वेब सीरीज:दिव्या दत्ता की 'चिरैया' का टीजर आउट, घरों में महिलाओं पर होने वाले अन्याय पर बेस्ड है स्टोरी

दिव्या दत्ता की नई वेब सीरीज ‘चिरैया’ का टीजर आ गया है। यह टीजर भारतीय घरों में होने वाले अन्याय पर सवाल उठाता है। इस टीजर की शुरुआत एक शादी के खुशी भरे मंजर से होती है। एक नई दुल्हन, पूजा, बेहतर जिंदगी की उम्मीद के साथ नया जीवन शुरू करती दिखती है, लेकिन अचानक एक डरावना मोड़ सामने आता है, जिसमें दुल्हन को छत पर उदास और सदमे में दिखाया जाता है। उसके चेहरे पर आंसू हैं और शरीर पर चोट के निशान दिखते हैं। सीरीज की कहानी शादी के जश्न के पीछे एक कड़वी सच्चाई के बारे में है। यह सीरीज सवाल उठाती है कि क्या शादी के बाद अगर पति अपनी पत्नी पर किसी भी तरह का दबाव डाले, तो क्या यह सही है? शादी कोई लाइसेंस नहीं है और हर बार चुप रहना का मतलब हां नहीं होता। 20 सेकेंड का टीजर इतना बताने के लिए काफी है कि इस सीरीज में कितना गंभीर और सेंसिटिव सब्जेक्ट उठाया गया है। ‘चिरैया’ का टीजर इस बात पर विचार करने का आग्रह करता है कि शादी कोई लाइसेंस नहीं है और चुप्पी को सहमति नहीं समझना चाहिए। संजय मिश्रा और टीनू आनंद का भी रोल दिव्या ने ‘चिरैया’ को लेकर कहा, ‘हम अक्सर रिश्ते बचाने या शांति बनाए रखने के नाम पर खुद को चुप कर लेते हैं। शादी को बिना सवाल किए सहमति मान लिया जाता है और त्याग को इतना रोमांटिक बना दिया जाता है कि दर्द गायब हो जाता है।’ वेब सीरीज शशांत शाह के निर्देशन में बनी है। इसमें संजय मिश्रा, सिद्धार्थ शॉ, प्रसन्ना बिष्ट, फैसल राशिद, टीनू आनंद और सरिता जोशी भी हैं।
‘हसीना मान जाएगी’ के सीक्वल की तैयारी शुरू:दो टॉप एक्टर्स की होगी कास्टिंग, फरहाद सामजी करेंगे निर्देशन

हार्डकोर एक्शन फिल्मों के दौर में अब कॉमेडी फिल्मों की वापसी की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसी बीच 90 के दशक की मशहूर कॉमेडी फिल्म ‘हसीना मान जाएगी’ के सीक्वल की तैयारी शुरू हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक‘हसीना मान जाएगी 2’ पर काम चल रहा है। निर्माता स्मिता ठाकरे इस फिल्म का सीक्वल बनाने के लिए उत्सुक हैं और इसकी स्क्रिप्ट पर तेजी से काम किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि फिल्म का दूसरा पार्ट मूल फिल्म की आत्मा को बरकरार रखेगा, लेकिन कहानी को आज के दर्शकों के मुताबिक नए अंदाज में पेश किया जाएगा। फिल्म के लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी फरहाद सामजी को सौंपी गई है। पहले मेकर्स इस सीक्वल को निर्देशक डेविड धवन के साथ बनाना चाहते थे, लेकिन वह ‘जुड़वा’ और ‘कुली नंबर 1’ के बाद अपनी किसी और पुरानी फिल्म को दोबारा नहीं बनाना चाहते थे। ऐसे में फरहाद सामजी ने इस प्रोजेक्ट को जॉइन किया है। मेकर्स की योजना मार्च 2026 तक कास्टिंग शुरू करने की है।’ ओरिजिनल फिल्म जैसा जादू जगाने की उम्मीद सीक्वल के लिए मेकर्स आज की जेनरेशन के दो टॉप एक्टर्स को कास्ट करेंगे और उन्हें उम्मीद है कि ओरिजिनल फिल्म जैसा जादू फिर से बनाएंगे। बता दें कि 1999 में रिलीज हुई ‘हसीना मान जाएगी’ का निर्देशन डेविड धवन ने किया था। इसमें गोविंदा और संजय दत्त ने लीड रोल प्ले किया था। वहीं कादर खान, पूजा बत्रा, करिश्मा कपूर और अनुपम खेर भी इसका हिस्सा थे। ये फिल्म महज 9 करोड़ रुपए के बजट में बनी थी और इसने वर्ल्डवाइड बॉक्स ऑफिस पर 27 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया था।
Married relationships are no longer trustworthy, they rely on surveillance.

Hindi News National Investigation: Married Relationships Are No Longer Trustworthy, They Rely On Surveillance. मनप्रीत कौर. लुधियाना22 मिनट पहले कॉपी लिंक पूरे पंजाब में एक महीने में करीब 300 तक केस एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के एजेंसियों के पास सॉल्व होने के लिए आ रहे हैं। – सिम्बॉलिक इमेज शादीशुदा रिश्तों पर शक अब घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रह गया है। एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की आशंका में कपल प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों तक भी पहुंच रहे हैं। एजेंसियों के मुताबिक, उनके पास आने वाले कुल केसों में करीब 40 प्रतिशत मामले एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से जुड़े होते हैं। एजेंसियों का दावा है कि 90 प्रतिशत केसों में शक सही निकलता है, जबकि कुछ मामलों में शक बेबुनियाद भी साबित होता है यानी हर दस में नौ शक सही निकल रहे हैं। हालांकि डिटेक्टिव एजेंसियों तक पहुंचना कोई तात्कालिक फैसला नहीं होता। ज्यादातर कपल पहले अपने स्तर पर फोन, सोशल मीडिया, व्यवहार और दिनचर्या में आए बदलावों को समझने की कोशिश करते हैं। जब शक गहराता है और रिश्तों में टकराव बढ़ने लगता है, तब सबूत जुटाने के लिए एजेंसी हायर की जाती है। इस प्रक्रिया में वक्त भी लगता है और खर्च भी भारी होता है। एक दिन की फिजिकल सर्विलांस का खर्च 6 से 7 हजार रुपए तक होता है, जबकि एक हफ्ते की जांच 40 से 50 हजार रुपए तक पहुंच जाती है। डिटेक्टिव एजेंसियों के अनुसार, एनआरआई इनक्वायरी तेजी से बढ़ रही हैं। इसी वजह से दिल्ली और दूसरे बड़े शहरों की एजेंसियां भी पंजाब में सक्रिय हो रही हैं। पूरे पंजाब में एक महीने में करीब 300 तक केस एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के एजेंसियों के पास सॉल्व होने के लिए आ रहे हैं। चार केस स्टडी से निकला सच : शक ने बदली दिशा, सबूत ने तय किया अंजाम केस -1: जांच के बाद भी पूरी तरह साफ नहीं हुई तस्वीर यूके से रजिस्टर हुआ यह मामला दसूहा से जुड़ा था। पत्नी विदेश में रहती है और भारत 15 दिन के लिए आई थी। लगातार फोन बिजी, बातचीत में दूरी और बदला हुआ व्यवहार पति की शक की वजह था। एजेंसी ने मूवमेंट और कॉन्टैक्ट्स को ट्रैक किया, लेकिन कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया। यह मामला इस बात का उदाहरण बना कि हर शक सच में नहीं बदलता और कई बार जांच रिश्तों को टूटने से बचा भी लेती है। केस -2: आर्मी ऑफिसर की गैरमौजूदगी में टूटा रिश्ता यह केस आर्मी ऑफिसर से जुड़ा था, जिसकी पोस्टिंग विदेश में थी, जबकि पत्नी जालंधर में रह रही थी। पत्नी का खुद एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चल रहा था, लेकिन वह इसी बीच बच्चों को पिता के खिलाफ भड़काती रही। बच्चों के सामने पिता की छवि खराब की जा रही थी, जिससे वे पिता से बातचीत तक बंद कर चुके थे। पति ने डिटेक्टिव हायर किया। एजेंसी ने फिजिकल सर्विलांस शुरू किया और मूवमेंट के साथ मुलाकातों पर नजर रखी, तब मामले का खुलासा हुआ। केस -3: ऑफिस अफेयर का शक, सड़क पर हुई हाथापाई मोहाली में रियल एस्टेट से जुड़े एक व्यक्ति पर उसकी पत्नी को शक था कि उसका ऑफिस में ही किसी के साथ अफेयर है। ऑफिस के बाहर और रोड पर मुलाकातों के सबूत मिले। जब पत्नी को मौके पर बुलाया गया तो बात बहस से शुरू होकर हाथापाई तक पहुंच गई। सार्वजनिक जगह पर हुआ यह टकराव इस बात का संकेत बना कि जब शक और सच आमने-सामने आते हैं, तो रिश्तों की कड़वाहट खुलकर बाहर आ जाती है। केस -4: विदेश से आई महिला पर पति का शक, सबूत मिले खरड़ का केस एक वर्किंग महिला से जुड़ा था, जो विदेश से भारत आई हुई थी। पति को शक था कि नौकरी के दौरान बने रिश्ते अफेयर में बदल चुके हैं। डिटेक्टिव एजेंसी ने ऑफिस मूवमेंट, कॉल पैटर्न और मुलाकातों पर नजर रखी, जिसमें एक ही व्यक्ति से संपर्क और तयशुदा मुलाकातें सामने आईं। एजेंसी ने फोटो और कई एविडेंस के साथ रिपोर्ट सौंपी, जिसके बाद मामला परिवार और वकीलों तक पहुंच गया। भास्कर एक्सपर्ट: बढ़ती दूरी और कम संवाद रिश्तों को कमजोर बना रहे चीफ इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर विकास सोनकर का कहना है कि जो लोग डिटेक्टिव एजेंसी तक पहुंचते हैं, वे हल्के शक में नहीं आते। यह लंबा मानसिक प्रोसेस होता है। कई घर पहले ही अंदर से टूट चुके होते हैं। जांच का मकसद सिर्फ पकड़ना नहीं, बल्कि सबूतों के साथ सच सामने लाना होता है। हालांकि हर शक सही नहीं होता, लेकिन ज्यादातर मामलों में अफेयर की पुष्टि हो जाती है। बढ़ती दूरी, कम संवाद, लंबी पोस्टिंग, एनआरआई लाइफस्टाइल और सोशल मीडिया की आसान पहुंच ने रिश्तों को ज्यादा कमजोर बना दिया है। इस वजह से ही आजकल रिश्ते कोर्ट और डिटेक्टिव एजेंसियों के बीच फंसते जा रहे हैं। सच जानना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि रिश्तों को वक्त रहते बातचीत से सुलझाया जाए। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
In interviews and meetings, words like ‘Ah… Oom…’ reduce self-confidence, filler words

Hindi News Career In Interviews And Meetings, Words Like ‘Ah… Oom…’ Reduce Self confidence, Filler Words न्यूयॉर्क31 मिनट पहले कॉपी लिंक पेस यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर हीदर हेस के मुताबिक ऑफिस प्रेजेंटेशन जैसे प्रोफेशनल माहौल में फिलर शब्दों का ज्यादा इस्तेमाल बोलने वाले की विश्वसनीयता कम कर सकता है। – सिम्बॉलिक इमेज बातचीत में अ… ऊं…, जैसे फिलर शब्द अक्सर आदत में आ जाते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, ये शब्द हमेशा अनावश्यक नहीं होते। कई बार ये दिमाग को सोचने का वक्त देते हैं और सामने वाले को संकेत देते हैं कि बात अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन इनका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल यह महसूस करा सकता है कि बोलने वाला कम तैयार है, जिससे उसकी विश्वसनीयता घटती है। हम इन्हें फिलर कहकर बेकार मान लेते हैं, क्योंकि फिलर शब्द सुनते ही लगता है कि यह गैर-जरूरी चीज है। फिलर शब्द के इस्तेमाल से बचाव के 4 तरीके 1. खुद को बोलते हुए रिकॉर्ड करें खुद को सुनना/देखना असहज लग सकता है, लेकिन इससे पता चलता है कि आप कौन से फिलर शब्द, कहां और कितनी बार बोलते हैं। जब तक यह साफ नहीं होगा, आप बस अंदाज से सुधार करते रहेंगे। 2. दोस्त से सीधा फीडबैक लें किसी करीबी दोस्त से पूछें कि क्या मेरे बोलते समय कोई खास फिलर शब्द बार-बार इस्तेमाल होता है? जवाब उपयोगी है। एक्सपर्ट हेस कहती हैं, जागरुकता ही आदत बदलने का पहला कदम है। 3. बोलने की गति धीमी करें बहुत तेज बोलना फिलर बढ़ाता है। हेस के मुताबिक, तेज स्पीड में दिमाग और मुंह तालमेल बैठाने में फिलर शब्द निकल जाते हैं। जानबूझकर कम गति से बोलेंगे तो खाली जगह भरने की मजबूरी कम होगी। 4. जोर से बोलकर अभ्यास करें बोलने की तैयारी सिर्फ सोचकर नहीं, बल्कि बोलकर करनी चाहिए। जब जोर से अभ्यास करते हैं, तो दिमाग उस रास्ते का नक्शा तैयार कर लेता है। इससे अटकने ने की संभावना कम हो जाती है। ज्यादा इस्तेमाल से व्यक्तित्व पर असर पेस यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर हीदर हेस के मुताबिक ऑफिस प्रेजेंटेशन जैसी प्रोफेशनल स्थितियों में यह बोलने वाले की विश्वसनीयता कम कर सकता है। उनका कहना है कि ज्यादा फिलर शब्द दर्शकों का ध्यान भी भटकाते हैं। कुछ स्टडीज में नौकरी के इंटरव्यू जैसी स्थितियों में भी इन्हें ‘नकारात्मक’ माना गया है। वहीं वॉइस कोच रोजर लव इन शब्दों के खिलाफ हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Reasons for poor performance of major medal contender athletes, Ilia Malinin, Olympic choking syndrome

Hindi News Sports Reasons For Poor Performance Of Major Medal Contender Athletes, Ilia Malinin, Olympic Choking Syndrome द न्यू यॉर्क टाइम्स. मिलान30 मिनट पहले कॉपी लिंक इलिया मालिनिन इटली विंटर ओलिंपिक के फाइनल में कई बार गिरे। वे आठवें नंबर पर रहे। अमेरिकी फिगर स्केटर इलिया मालिनिन, जिन्हें दुनिया ‘क्वाड गॉड’ कहती है, धरती के इकलौते इंसान हैं जो हवा में 4.5 रोटेशन वाला जंप लगा सकते हैं। दिसंबर में उन्होंने एक प्रोग्राम में 7 क्वाड्रुपल जंप लगाकर इतिहास रचा था। वे लगातार 12 अंतरराष्ट्रीय इवेंट जीत चुके थे, लेकिन इटली विंटर ओलिंपिक के फाइनल में कई बार गिरे और सीधे आठवें नंबर पर आ गए। उन्होंने माना कि यह दबाव किसी भी अन्य टूर्नामेंट से बिल्कुल अलग था और नसें सुन्न पड़ गई थीं। यही हाल अल्पाइन स्कीयर माइकेला शिफ्रिन का है। शिफ्रिन के नाम इतिहास में सबसे ज्यादा 108 वर्ल्ड कप जीत दर्ज हैं, लेकिन 2018 के बाद से वे ओलिंपिक रेस में एक भी मेडल नहीं जीत पाई हैं। फ्रीस्कीइंग के आंद्री रगेट्ली भी 57 प्रतिशत पोडियम रेट के बावजूद लगातार तीसरे ओलिंपिक में बिना मेडल के लौट गए। इन एथलीट्स में न टैलेंट की कमी है न तैयारी की, वे दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं, फिर भी हार गए। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह इन दिग्गजों की कोई शारीरिक कमजोरी नहीं है, बल्कि नर्वस सिस्टम की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। जब इंसान अत्यधिक सामाजिक दबाव का सामना करता है, तो शरीर इसे बड़े ‘खतरे’ के रूप में देखता है। आम टूर्नामेंट्स में दिमाग जीतने पर फोकस करता है। लेकिन ओलिंपिक में, जहां दांव पर ‘सार्वजनिक अपमान’ होता है, शरीर में कोर्टिसोल का स्तर अचानक बढ़ जाता है। एथलीट का दिमाग जीतने के बजाय हार से बचने की मोड में चला जाता है। विज्ञान की भाषा में ‘वेगस नर्व’, जो हार्ट रेट कंट्रोल करके शरीर को शांत रखती है, दबाव में काम करना कम कर देती है। इससे नियंत्रण बिगड़ जाता है और सटीक मोटर कंट्रोल छिन जाता है। जो तकनीक खिलाड़ियों ने हजारों बार सफलतापूर्वक की है, दबाव में वे उसके हर स्टेप के बारे में सोचने लगते हैं। इसे ‘एक्सप्लिसिट मॉनिटरिंग’ कहा जाता है। दिमाग का यह कंट्रोल्ड प्रोसेसिंग उनके नैचुरल फ्लो को पूरी तरह से रोक देता है। ये चीजें दिखाने के लिए काफी हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा मंच ओलिंपिक सिर्फ शारीरिक ताकत का खेल नहीं है, बल्कि दुनिया की नजरों के सामने प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र को हराने की कला भी है। दिमागी ‘ऑपरेटिंग सिस्टम’ की ट्रेनिंग है जरूरी भारी दबाव से निपटने के लिए एथलीट्स को मानसिक ट्रेनिंग चाहिए। इसके लिए धीमी सांसों और बायोफीडबैक तकनीकों से ‘वेगस नर्व’ को मजबूत करना पहला कदम है। इसके अलावा, प्रैक्टिस के दौरान लाइव स्ट्रीमिंग कर अनजान दर्शकों के रियल-टाइम कमेंट्स का सामना करने वाली ‘सिमुलेशन ट्रेनिंग’ काफी मददगार होती है। सबसे अहम यह है कि दुनिया की नजरों को ‘खतरे’ के बजाय ‘चुनौती’ मानने की मानसिक आदत डाली जाए। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
The soul finds eternal peace in Kailash Parikrama, Deepa Anappara, an Indian-origin writer living in Britain

Hindi News Happylife The Soul Finds Eternal Peace In Kailash Parikrama, Deepa Anappara, An Indian origin Writer Living In Britain लंदन2 मिनट पहले कॉपी लिंक ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय मूल की लेखिका दीपा अनप्पारा। – फाइल फोटो ‘19 साल साथ रहने के बाद मैं अचानक अपने ही घर में ‘प्रोबेशन’ पर आ गई थी। यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगी, रात 3 बजे उठकर तिब्बत पर उपन्यास लिखती, ताकि कीबोर्ड की आवाज से पति को परेशानी न हो। फिर भी उनकी नाराजगी दूर नहीं हुई…’ ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय मूल की लेखिका दीपा अनप्पारा कहती हैं, पति ने कहा कि वे तलाक चाहते हैं, सात महीने पहले ही बहन को खोया था। मैं किसी नए जख्म के लिए तैयार नहीं थी। बहुत कोशिशों के बाद भी रिश्ता नहीं बच पाया। शांति की तलाश में कैलाश परिक्रमा पर निकल पड़ी। इस सफर ने जिंदगी को नए अर्थ दे दिए, जानिए कैसे… ‘इसी टूटन के बीच… कुछ ही दिन बाद मैं तिब्बत में 18,471 फीट ऊंचे डोल्मा दर्रे की चढ़ाई पर खड़ी थी। हवा में इतनी चुभन थी कि हर सांस जैसे उधार की लग रही थी। अगस्त 2023 के उसी दिन मेरी शादी की 20वीं सालगिरह थी। रह-रहकर पति के शब्द कानों में गूंज रहे थे… ‘बरसों से तुम भी दुखी हो, बरसों से मैं भी, अलग हो जाना ही बेहतर है।’ सहसा गाइड की आवाज ने मुझे झकझोरा… उसने मुस्कुराकर कहा, डोल्मा दर्रा तक पहुंचने के लिए टट्टू किराए पर ले लीजिए। भारतीय ट्रैकिंग में अच्छे नहीं होते,’ मुझे यह स्टीरियोटाइप चुभा। वर्षों पहले मनाली में एक टट्टू पर बैठकर सफर पूरा किया था। इस बार तय किया था, पैदल ही जाऊंगी। चढ़ाई कठिन थी। फेफड़े जल रहे थे, दिल पिंजरे में फड़फड़ाते पक्षी जैसा लग रहा था। हर पांच कदम बाद रुकना पड़ता। पीठ पर छोटे बच्चों को लेकर गुजरतीं तिब्बती महिलाएं, मुस्कराकर ‘ताशी देलेक’ कहतीं- यानी शुभकामनाएं। मैं भी कहती, पर शब्दों के साथ सांस भी बाहर निकल जाती। रास्ते में तीर्थयात्री अपने दिवंगत प्रियजनों की तस्वीरें पत्थरों पर चिपका रहे थे। मुझे अफसोस हुआ कि मेरे पास बहन की तस्वीर नहीं थी। वह गणेश जी की छोटी मूर्तियां जमा करती थी। नीचे गौरी कुंड चमक रहा था, मान्यता है कि यहीं माता पार्वती ने गणपति को जन्म दिया। पोर्टर ने मेरे लिए वहां से पवित्र जल लाने की बात कही थी, पर मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं जल ले जाकर देती किसे, बहन तो जा चुकी थी। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से मैं लड़खड़ा रही थी। गाइड ने मुझे ऑक्सीजन कैन थमाया और कहा ‘लगभग पहुंच गए।’ मैंने हिम्मत जुटाई और फिर से चढ़ाई शुरू की। बीच-बीच में गाइड ने मेरी कहानी सुनी। बहन को स्टेज 4 कैंसर, फेफड़ों से दिमाग तक फैलते ट्यूमर, याददाश्त का मिटना और आखिरी दिनों की तकलीफ। चार साल तक जूझती रही। उसके लिए अचानक भारत की उड़ानें, अस्पतालों के चक्कर। फिर हिम्मत हार गई… अंत में आंसुओं के साथ विदा ली। मैंने पहली बार स्वीकार किया कि मैं अब ‘अलग’ हूं, शादी टूट चुकी है। गाइड ने कहा, ‘आपके पति ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया। उन्हें जाने दें। धन्यवाद दें कि वे 20 साल तक साथ रहे। वह मुक्त हैं, और आप भी। मन्नत की पताकाओं के बीच मुझे पहली बार लगा कि शायद मैं भी सचमुच मुक्त हूं। उसके शब्द सख्त थे, पर कोमल भी- जैसे वह पत्थरों के ढेर पर एक और पत्थर सावधानी से रख रहा हो। अंतिम दिन मैं ज्यादातर अकेली चली। रास्ते में पत्थरों पर खुदी तिब्बती प्रार्थनाएं थीं और चेतावनी के बोर्ड लगे थे। छोटे पक्षी चट्टानों के बिलों से उड़ते और ओझल हो जाते। इतनी ऊंचाई पर, दैवीय माहौल में मुझे लगा कि छह साल बाद पहली बार मैं सचमुच खुश हूं। मैंने समझा कि अपनी कमियों के बावजूद मैं घृणित नहीं, बस इंसान हूं। मैं खुद को माफ कर सकती थी-एक पत्नी के रूप में, एक बहन के रूप में। तीर्थयात्रियों को आकाश की ओर हाथ उठाकर सबके लिए प्रार्थना करते देख, लगा कि प्रायश्चित असंभव नहीं…। पहाड़ हमारा नजरिया साफ कर देते हैं… दीपा कहती हैं, ‘कैलाश की इस यात्रा में तूफान, सैनिकों की चौकियां और ऊंचाई पर सांसें रोक देने वाली ठंड सब बाधा बनते हैं, लेकिन असली परीक्षा इन प्राकृतिक बाधाओं की नहीं, बल्कि भीतर की भावनाओं की है- अहंकार, जुनून, संदेह, शक्ति, अपराधबोध और शोक। उस पतली हवा में, जहां सांस लेना भी तपस्या जैसा था, मैंने समझा- कभी-कभी पहाड़ हमें कुछ नया नहीं देते, बस जो पहले से था उसे साफ दिखा देते हैं… और शायद वही मुक्ति की शुरुआत है।’ दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔









