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The soul finds eternal peace in Kailash Parikrama, Deepa Anappara, an Indian-origin writer living in Britain

The soul finds eternal peace in Kailash Parikrama, Deepa Anappara, an Indian-origin writer living in Britain
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लंदन2 मिनट पहले

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ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय मूल की लेखिका दीपा अनप्पारा। – फाइल फोटो

‘19 साल साथ रहने के बाद मैं अचानक अपने ही घर में ‘प्रोबेशन’ पर आ गई थी। यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगी, रात 3 बजे उठकर तिब्बत पर उपन्यास लिखती, ताकि कीबोर्ड की आवाज से पति को परेशानी न हो। फिर भी उनकी नाराजगी दूर नहीं हुई…’ ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय मूल की लेखिका दीपा अनप्पारा कहती हैं, पति ने कहा कि वे तलाक चाहते हैं, सात महीने पहले ही बहन को खोया था। मैं किसी नए जख्म के लिए तैयार नहीं थी। बहुत कोशिशों के बाद भी रिश्ता नहीं बच पाया। शांति की तलाश में कैलाश परिक्रमा पर निकल पड़ी। इस सफर ने जिंदगी को नए अर्थ दे दिए, जानिए कैसे…

‘इसी टूटन के बीच… कुछ ही दिन बाद मैं तिब्बत में 18,471 फीट ऊंचे डोल्मा दर्रे की चढ़ाई पर खड़ी थी। हवा में इतनी चुभन थी कि हर सांस जैसे उधार की लग रही थी। अगस्त 2023 के उसी दिन मेरी शादी की 20वीं सालगिरह थी। रह-रहकर पति के शब्द कानों में गूंज रहे थे… ‘बरसों से तुम भी दुखी हो, बरसों से मैं भी, अलग हो जाना ही बेहतर है।’

सहसा गाइड की आवाज ने मुझे झकझोरा… उसने मुस्कुराकर कहा, डोल्मा दर्रा तक पहुंचने के लिए टट्टू किराए पर ले लीजिए। भारतीय ट्रैकिंग में अच्छे नहीं होते,’ मुझे यह स्टीरियोटाइप चुभा। वर्षों पहले मनाली में एक टट्टू पर बैठकर सफर पूरा किया था। इस बार तय किया था, पैदल ही जाऊंगी। चढ़ाई कठिन थी। फेफड़े जल रहे थे, दिल पिंजरे में फड़फड़ाते पक्षी जैसा लग रहा था। हर पांच कदम बाद रुकना पड़ता। पीठ पर छोटे बच्चों को लेकर गुजरतीं तिब्बती महिलाएं, मुस्कराकर ‘ताशी देलेक’ कहतीं- यानी शुभकामनाएं। मैं भी कहती, पर शब्दों के साथ सांस भी बाहर निकल जाती।

रास्ते में तीर्थयात्री अपने दिवंगत प्रियजनों की तस्वीरें पत्थरों पर चिपका रहे थे। मुझे अफसोस हुआ कि मेरे पास बहन की तस्वीर नहीं थी। वह गणेश जी की छोटी मूर्तियां जमा करती थी। नीचे गौरी कुंड चमक रहा था, मान्यता है कि यहीं माता पार्वती ने गणपति को जन्म दिया। पोर्टर ने मेरे लिए वहां से पवित्र जल लाने की बात कही थी, पर मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं जल ले जाकर देती किसे, बहन तो जा चुकी थी। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से मैं लड़खड़ा रही थी। गाइड ने मुझे ऑक्सीजन कैन थमाया और कहा ‘लगभग पहुंच गए।’ मैंने हिम्मत जुटाई और फिर से चढ़ाई शुरू की।

बीच-बीच में गाइड ने मेरी कहानी सुनी। बहन को स्टेज 4 कैंसर, फेफड़ों से दिमाग तक फैलते ट्यूमर, याददाश्त का मिटना और आखिरी दिनों की तकलीफ। चार साल तक जूझती रही। उसके लिए अचानक भारत की उड़ानें, अस्पतालों के चक्कर। फिर हिम्मत हार गई… अंत में आंसुओं के साथ विदा ली। मैंने पहली बार स्वीकार किया कि मैं अब ‘अलग’ हूं, शादी टूट चुकी है।

गाइड ने कहा, ‘आपके पति ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया। उन्हें जाने दें। धन्यवाद दें कि वे 20 साल तक साथ रहे। वह मुक्त हैं, और आप भी। मन्नत की पताकाओं के बीच मुझे पहली बार लगा कि शायद मैं भी सचमुच मुक्त हूं। उसके शब्द सख्त थे, पर कोमल भी- जैसे वह पत्थरों के ढेर पर एक और पत्थर सावधानी से रख रहा हो। अंतिम दिन मैं ज्यादातर अकेली चली। रास्ते में पत्थरों पर खुदी तिब्बती प्रार्थनाएं थीं और चेतावनी के बोर्ड लगे थे।

छोटे पक्षी चट्टानों के बिलों से उड़ते और ओझल हो जाते। इतनी ऊंचाई पर, दैवीय माहौल में मुझे लगा कि छह साल बाद पहली बार मैं सचमुच खुश हूं। मैंने समझा कि अपनी कमियों के बावजूद मैं घृणित नहीं, बस इंसान हूं। मैं खुद को माफ कर सकती थी-एक पत्नी के रूप में, एक बहन के रूप में। तीर्थयात्रियों को आकाश की ओर हाथ उठाकर सबके लिए प्रार्थना करते देख, लगा कि प्रायश्चित असंभव नहीं…।

पहाड़ हमारा नजरिया साफ कर देते हैं…

दीपा कहती हैं, ‘कैलाश की इस यात्रा में तूफान, सैनिकों की चौकियां और ऊंचाई पर सांसें रोक देने वाली ठंड सब बाधा बनते हैं, लेकिन असली परीक्षा इन प्राकृतिक बाधाओं की नहीं, बल्कि भीतर की भावनाओं की है- अहंकार, जुनून, संदेह, शक्ति, अपराधबोध और शोक। उस पतली हवा में, जहां सांस लेना भी तपस्या जैसा था, मैंने समझा- कभी-कभी पहाड़ हमें कुछ नया नहीं देते, बस जो पहले से था उसे साफ दिखा देते हैं… और शायद वही मुक्ति की शुरुआत है।’

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ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय मूल की लेखिका दीपा अनप्पारा। – फाइल फोटो

‘19 साल साथ रहने के बाद मैं अचानक अपने ही घर में ‘प्रोबेशन’ पर आ गई थी। यूनिवर्सिटी में पढ़ाने लगी, रात 3 बजे उठकर तिब्बत पर उपन्यास लिखती, ताकि कीबोर्ड की आवाज से पति को परेशानी न हो। फिर भी उनकी नाराजगी दूर नहीं हुई…’ ब्रिटेन में रह रहीं भारतीय मूल की लेखिका दीपा अनप्पारा कहती हैं, पति ने कहा कि वे तलाक चाहते हैं, सात महीने पहले ही बहन को खोया था। मैं किसी नए जख्म के लिए तैयार नहीं थी। बहुत कोशिशों के बाद भी रिश्ता नहीं बच पाया। शांति की तलाश में कैलाश परिक्रमा पर निकल पड़ी। इस सफर ने जिंदगी को नए अर्थ दे दिए, जानिए कैसे…

‘इसी टूटन के बीच… कुछ ही दिन बाद मैं तिब्बत में 18,471 फीट ऊंचे डोल्मा दर्रे की चढ़ाई पर खड़ी थी। हवा में इतनी चुभन थी कि हर सांस जैसे उधार की लग रही थी। अगस्त 2023 के उसी दिन मेरी शादी की 20वीं सालगिरह थी। रह-रहकर पति के शब्द कानों में गूंज रहे थे… ‘बरसों से तुम भी दुखी हो, बरसों से मैं भी, अलग हो जाना ही बेहतर है।’

सहसा गाइड की आवाज ने मुझे झकझोरा… उसने मुस्कुराकर कहा, डोल्मा दर्रा तक पहुंचने के लिए टट्टू किराए पर ले लीजिए। भारतीय ट्रैकिंग में अच्छे नहीं होते,’ मुझे यह स्टीरियोटाइप चुभा। वर्षों पहले मनाली में एक टट्टू पर बैठकर सफर पूरा किया था। इस बार तय किया था, पैदल ही जाऊंगी। चढ़ाई कठिन थी। फेफड़े जल रहे थे, दिल पिंजरे में फड़फड़ाते पक्षी जैसा लग रहा था। हर पांच कदम बाद रुकना पड़ता। पीठ पर छोटे बच्चों को लेकर गुजरतीं तिब्बती महिलाएं, मुस्कराकर ‘ताशी देलेक’ कहतीं- यानी शुभकामनाएं। मैं भी कहती, पर शब्दों के साथ सांस भी बाहर निकल जाती।

रास्ते में तीर्थयात्री अपने दिवंगत प्रियजनों की तस्वीरें पत्थरों पर चिपका रहे थे। मुझे अफसोस हुआ कि मेरे पास बहन की तस्वीर नहीं थी। वह गणेश जी की छोटी मूर्तियां जमा करती थी। नीचे गौरी कुंड चमक रहा था, मान्यता है कि यहीं माता पार्वती ने गणपति को जन्म दिया। पोर्टर ने मेरे लिए वहां से पवित्र जल लाने की बात कही थी, पर मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं जल ले जाकर देती किसे, बहन तो जा चुकी थी। ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से मैं लड़खड़ा रही थी। गाइड ने मुझे ऑक्सीजन कैन थमाया और कहा ‘लगभग पहुंच गए।’ मैंने हिम्मत जुटाई और फिर से चढ़ाई शुरू की।

बीच-बीच में गाइड ने मेरी कहानी सुनी। बहन को स्टेज 4 कैंसर, फेफड़ों से दिमाग तक फैलते ट्यूमर, याददाश्त का मिटना और आखिरी दिनों की तकलीफ। चार साल तक जूझती रही। उसके लिए अचानक भारत की उड़ानें, अस्पतालों के चक्कर। फिर हिम्मत हार गई… अंत में आंसुओं के साथ विदा ली। मैंने पहली बार स्वीकार किया कि मैं अब ‘अलग’ हूं, शादी टूट चुकी है।

गाइड ने कहा, ‘आपके पति ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया। उन्हें जाने दें। धन्यवाद दें कि वे 20 साल तक साथ रहे। वह मुक्त हैं, और आप भी। मन्नत की पताकाओं के बीच मुझे पहली बार लगा कि शायद मैं भी सचमुच मुक्त हूं। उसके शब्द सख्त थे, पर कोमल भी- जैसे वह पत्थरों के ढेर पर एक और पत्थर सावधानी से रख रहा हो। अंतिम दिन मैं ज्यादातर अकेली चली। रास्ते में पत्थरों पर खुदी तिब्बती प्रार्थनाएं थीं और चेतावनी के बोर्ड लगे थे।

छोटे पक्षी चट्टानों के बिलों से उड़ते और ओझल हो जाते। इतनी ऊंचाई पर, दैवीय माहौल में मुझे लगा कि छह साल बाद पहली बार मैं सचमुच खुश हूं। मैंने समझा कि अपनी कमियों के बावजूद मैं घृणित नहीं, बस इंसान हूं। मैं खुद को माफ कर सकती थी-एक पत्नी के रूप में, एक बहन के रूप में। तीर्थयात्रियों को आकाश की ओर हाथ उठाकर सबके लिए प्रार्थना करते देख, लगा कि प्रायश्चित असंभव नहीं…।

पहाड़ हमारा नजरिया साफ कर देते हैं…

दीपा कहती हैं, ‘कैलाश की इस यात्रा में तूफान, सैनिकों की चौकियां और ऊंचाई पर सांसें रोक देने वाली ठंड सब बाधा बनते हैं, लेकिन असली परीक्षा इन प्राकृतिक बाधाओं की नहीं, बल्कि भीतर की भावनाओं की है- अहंकार, जुनून, संदेह, शक्ति, अपराधबोध और शोक। उस पतली हवा में, जहां सांस लेना भी तपस्या जैसा था, मैंने समझा- कभी-कभी पहाड़ हमें कुछ नया नहीं देते, बस जो पहले से था उसे साफ दिखा देते हैं… और शायद वही मुक्ति की शुरुआत है।’

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