हंसने से दिमाग में ‘फील गुड’ हॉर्मोन रिलीज होते हैं:अपनी गलतियों पर हंसना सीखें, मानसिक सेहत बेहतर और घबराहट कम होगी

सोचिए, आप एक भरी मीटिंग में अपनी कुर्सी से फिसल जाएं या किसी नए इंसान को गलत बात बोल दें। ऐसे में हम अक्सर शर्म से लाल हो जाते हैं और उस पल को याद कर-कर के घंटों परेशान होते हैं। लेकिन जर्नल ऑफ पर्सनैलिटी एंड सोशल साइकोलॉजी की नई रिसर्च कहती है कि उस पल में अगर आप खुद पर हंसना सीख लें, तो यह आपके मानसिक स्वास्थ्य और सोशल इमेज दोनों के लिए फायदेमंद है। मनोविज्ञान में इसे ‘सेल्फ-डेप्रेकेटिंग ह्यूमर’ कहा जाता है। इसका मतलब है अपनी छोटी-मोटी गलतियों को हंसी में उड़ा देना। इसके लिए खुद को ट्रेंड करें विशेषज्ञ कहते हैं कि हमारी किसी गलती पर लोग हमें उतना जज नहीं करते, जितना हम दिमाग में सोच लेते हैं। किसी गलती पर दिमाग को कहें कि अगर इससे किसी को नुकसान नहीं हुआ, तो ये कोई बड़ी बात नहीं। ऐसे अभ्यास से खुद पर आत्मविश्वास भी बढ़ेगा। किस स्थिति में न हंसे खुद पर हंसना तभी तक ठीक है जब तक आपकी गलती से किसी का नुकसान न हो। अगर आपकी वजह से किसी को चोट लगती है या किसी का दिल दुखता है, तो वहां हंसना आपको लापरवाह दिखाता है।
घाटमपुर बस स्टैंड पर जल मंदिर शुरू, जल संरक्षण अभियान को मिली गति

सागर | मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के तहत संचालित जल गंगा संवर्धन अभियान के अंतर्गत ग्राम घाटमपुर में बस स्टैंड पर राहगीरों की सुविधा के लिए जल मंदिर (प्याऊ) का शुभारंभ किया गया। यह पहल नवांकुर संस्था विद्या विजय एजुकेशन सोशल वेल्फेयर सोसायटी द्वारा की गई।संभाग समन्वयक दिनेश उमरैया ने ग्राम समितियों से जल संरक्षण के लिए सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। उन्होंने जल स्रोतों की सफाई, गहरीकरण और जनजागरूकता पर जोर दिया। विकासखंड समन्वयक जय सिंह ठाकुर ने बताया कि अभियान के तहत आगे भी विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। कार्यक्रम में सभी ने जल संरक्षण का संकल्प लिया। इस अवसर पर नवांकुर संस्था के कार्यक्रम समन्वयक गौरव सिंह राजपूत, चैन सिंह ठाकुर, नंदलाल पटैल, आशीष गर्ग, एमएस डब्ल्यू छात्र, समिति पदाधिकारी एवं ग्राम के प्रबुद्धजन उपस्थित थे।
13 महीने बाद रिंग में लौट रहीं चैम्पियन लॉरेन प्राइस:कहा- पैसा कमाना, बॉक्सिंग में विरासत बनाना लक्ष्य; ओलिंपिक चैम्पियन शनिवार को स्टेफनी के खिलाफ उतरेंगी

आईबीएफ और डब्ल्यूबीसी वेल्टरवेट चैम्पियन वेल्स की लॉरेन प्राइस 13 महीनों के इंतजार के बाद बॉक्सिंग रिंग में वापसी कर रही हैं। टोक्यो ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली लॉरेन ने पिछले साल मार्च में नताशा जोनस को हराकर अपनी बादशाहत साबित की थी। लेकिन उसके बाद से उन्हें रिंग में उतरने का मौका नहीं मिला। अब शनिवार को वे प्यूर्टो रिको की अजेय बॉक्सर स्टेफनी पिनेइरो एक्विनो के खिलाफ अपने खिताब का बचाव करने उतरेंगी। इतने लंबे समय तक रिंग से दूर रहने के पीछे के कारणों पर लॉरेन ने बॉक्सिंग के अंदरूनी खेल और राजनीति को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, ‘बाहर के लोगों को यह आसानी से समझ नहीं आता। लेकिन अक्सर यह आपके प्रमोटर, पैसों और कॉन्ट्रैक्ट की उलझनों पर निर्भर करता है। जब आप चैम्पियन बन जाते हैं, तो सामने वाले बॉक्सर बहुत ज्यादा पैसों की मांग करते हैं, जिससे मैच तय होने में समय लगता है।’ लॉरेन का सफर उनके प्रमोटर ‘बॉक्सर’ की वित्तीय परेशानियों और कॉन्ट्रैक्ट के मुद्दों के कारण अटका हुआ था। इस दौरान उनके ट्रेनर रॉब मैक्रैकन ने उन्हें संभाला। लॉरेन का साफ कहना है कि वह बॉक्सिंग से जितना हो सके उतना पैसा कमाना चाहती हैं और अपने देश वेल्स में खास विरासत बनाना चाहती हैं। 31 वर्षीय लॉरेन की निजी जिंदगी में भी खुशियां दस्तक देने वाली हैं। 4 अप्रैल के इस मैच के बाद, वे 30 मई को बचपन की दोस्त कार्ला से शादी करेंगी। उन्होंने पिछले साल ही सगाई की थी। कार्ला बुजुर्गों की देखभाल से जुड़ा अपना एक बिजनेस चलाती हैं और बॉक्सिंग की दुनिया से उनका कोई लेना-देना नहीं है। लॉरेन कहती हैं कि इससे उन्हें बहुत सुकून मिलता है क्योंकि घर लौटने पर हर वक्त सिर्फ बॉक्सिंग की बातें नहीं होतीं। लॉरेन की सफलता का सफर आसान नहीं रहा है। जब वह सिर्फ तीन दिन की थीं, तब शराब की लत के शिकार उनके माता-पिता ने उन्हें छोड़ दिया था। उन्हें उनके दादा-दादी ने गोद लिया। लॉरेन कहती हैं, ‘मुझे अपने माता-पिता की याद नहीं आती। मैं बस अपने दादा-दादी की शुक्रगुजार हूं जिन्होंने मुझे हमेशा प्यार दिया और सिखाया कि कोई भी सपना छोटा या अजीब नहीं होता।’
कार्टियर घड़ियों से 300% तक लाभ, रोलेक्स पिछड़ी:निवेश में अब सिर्फ शेयर या सोना ही मुनाफे की गारंटी नहीं; लग्जरी घड़ियां भी एसेट क्लास

क्या आपकी कलाई पर बंधी घड़ी आपके बैंक एफडी, शेयर या रियल एस्टेट से बेहतर रिटर्न दे सकती है? लग्जरी वॉच मार्केट के ताजा आंकड़े कुछ इसी ओर इशारा कर रहे हैं। ऑनलाइन वॉच मार्केटप्लेस ‘क्रोनो24’ की रिपोर्ट से एक दिसचस्प ट्रेंड निकलकर सामने आया है। वो ट्रेंड यह है कि महंगे और हाई-एंड वॉच मॉडल रोलेक्स, पाटेक फिलिप की तुलना में कार्टियर जैसी मिड रेंज के लग्जरी ब्रांड्स ने बेहतर मुनाफा दिया। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018 से लेकर 2026 के दौरान पेरिस स्थित ज्वेलर कंपनी कार्टियर की ‘टैंक वर्मील’ घड़ी की कीमत में करीब 300% की वृद्धि देखी गई। दिलचस्प है कि सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाली टॉप-20 घड़ियों की लिस्ट में रोलेक्स का कोई भी मॉडल जगह नहीं बना पाया। रोलेक्स की सबसे ज्यादा बिकने वाली डेटजस्ट 41 की वैल्यू साल 2018 से अब तक केवल 59 फीसदी ही बढ़ी है। इस लिस्ट में कार्टियर के 10, ओमेगा के 5 और जेगर-लेकोल्ट्रे के 2 मॉडल हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक जिन घड़ियों की कीमत लंबी अवधि (2018-2026) में बढ़ी, वे 2022 के बाद बाजार में आई गिरावट के बावजूद मजबूत बनी रहीं और उनकी वैल्यू में लगातार इजाफा होता रहा। बहरहाल, एक्सपर्ट्स का कहना है कि रोलेक्स के मॉडल्स 2018 तक पहले से ही अपनी पीक वैल्यू पर थे। कोविड महामारी के दौरान कीमतों में जो उछाल आया, उसके बाद अब बाजार स्थिर हो रहा है। वहीं, कार्टियर जैसी घड़ियां, जो कुछ साल पहले तक काफी कम कीमत पर उपलब्ध थीं, अब आइकोनिक डिजाइन की वजह से कलेक्टर्स की पहली पसंद बन गई हैं। मिड रेंज घड़ियों की कीमतों में इजाफे की वजह ‘लो बेस इफेक्ट’ और ‘ऑर्गेनिक डिमांड’ है। यानी कुछ साल पहले की तुलना में कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इसके अलावा, कोरोनाकाल में कुछ लोगों ने घड़ियों को शौक से नहीं, बल्कि सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए खरीदा और महंगे दामों पर बेचना शुरू कर दिया। इसके उलट, किफायती और आइकॉनिक डिजाइन वाली घड़ियों की मांग कलेक्टर्स के बीच बनी रही। इससे उनकी वैल्यू में 200% तक स्थिर इजाफा देखा गया। इस बदलते ट्रेंड पर स्टडी से जुड़े बालाज फेरेन्जी कहते हैं, ‘घड़ियों की खास बात उनके दाम नहीं, बल्कि उनका क्लासिक डिजाइन और स्थायी मांग है, जो किसी वेटिंग लिस्ट नहीं बल्कि वास्तविक कलेक्टर वैल्यू पर आधारित है।’ कार्टियर टैंक वर्मील सबसे सस्ती और सफल निवेश के तौर पर उभरी घड़ी का मॉडल 8 साल में बढ़त खासियत कार्टियर टैंक वर्मील, 299%, सबसे सस्ता व सफल निवेश कार्टियर पैंथेर (गोल्ड), 218% , क्लासिक डिजाइन, भारी डिमांड ओमेगा स्पीडमास्टर, 119% , ओमेगा का भरोसेमंद मॉडल रोलेक्स डेटजस्ट, 41 59%, डिमांड ज्यादा, रिटर्न सीमित
जान जोखिम में पर 45,000 की तनख्वाह छोड़ना मुश्किल:खाड़ी से रेमिटेंस बंद हुआ तो डूब जाएगी 2.4 करोड़ परिवारों की इकोनॉमी

जब सायरन बजता है, तो नॉर्मा टैक्टाकॉन बस दुआ करती हैं। 49 साल की नॉर्मा कतर में घरेलू कामगार हैं। फिलीपींस में उनके पति और तीन बच्चे हैं। अमेरिका-इजराइल से जंग के बीच खाड़ी के देश ईरान के निशाने पर हैं। नॉर्मा उसी आग की लपटों में फंसी हैं। वे कहती हैं, ‘हवा में मिसाइलें देखकर डर लगता है। मुझे जिंदा रहना है- बच्चों के लिए। मैं ही उनका सब कुछ हूं।’ दरअसल फिलीपींस में घरेलू काम से जो मिलता है, उससे 4-5 गुना यानी प्रति माह 500 डॉलर (करीब 45,000 रुपए) खाड़ी में मिलता है। यही वजह है कि जान जोखिम में होने के बावजूद वो घर नहीं लौट पा रहीं। नॉर्मा अकेली नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मुताबिक, खाड़ी देशों में 2.4 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं। इनमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, फिलीपींस और इंडोनेशिया के लोग सबसे ज्यादा हैं। इस युद्ध में अब तक कम से कम 12 दक्षिण एशियाई मजदूर जान गंवा चुके हैं। नेपाल के दिबास श्रेष्ठ (29) अबुधाबी में सिक्योरिटी गार्ड थे। 1 मार्च को ईरान के हमले में उनकी मौत हो गई। उनके चाचा रमेश बताते हैं, ‘मैंने उन्हें नेपाल लौटने को कहा था, पर वे कहते थे- यहां अच्छी जिंदगी है।’ दिबास 2015 के भूकंप में क्षतिग्रस्त हुए माता-पिता का घर बनवाने के लिए पैसे जोड़ रहे थे। दुबई में बांग्लादेश के 55 साल के अहमद अली की मौत मिसाइल के मलबे से हुई। अली हर महीने 45-55 हजार रुपए घर भेजते थे। घर लौटना आसान भी नहीं है। युद्ध ने दुबई, अबुधाबी और कतर की उड़ानें बाधित कर दी हैं। फिलीपींस की आखिरी वापसी फ्लाइट में 234 मजदूरों को कुवैत, कतर और बहरीन से 8 घंटे सड़क मार्ग से सऊदी अरब ले जाया गया, तब जाकर वे फ्लाइट पकड़ पाए। पर ज्यादातर लोग घर जाना ही नहीं चाहते। म्यांमार की सू सू (31) दुबई में रियल एस्टेट कंपनी में काम करती हैं। वह म्यांमार में गृहयुद्ध से भागकर आई थीं। वे घर में काम कर रही हैं, सायरन सुनकर खिड़की से दूर हो जाती हैं। फिर भी कहती हैं, ‘यहां का माहौल शांत लगता है। मुझे भरोसा है कि सब ठीक हो जाएगा।’ खाड़ी से आए पैसे पर कुछ देशों की अर्थव्यवस्था 10% तक निर्भर फिलीपींस के कुल विदेशी मजदूरों में से आधे से ज्यादा करीब 10 लाख खाड़ी देशों में हैं। उनके भेजे पैसे फिलीपींस की अर्थव्यवस्था का 10% हैं। बांग्लादेश के 1.4 करोड़ प्रवासियों में से अधिकांश खाड़ी में काम करते हैं। उनकी रेमिटेंस देश की जीडीपी की जीवनरेखा है। आईएलओ के मुताबिक, खाड़ी में 2.4 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, जो कंस्ट्रक्शन से लेकर घरेलू काम तक हर सेक्टर की रीढ़ हैं। युद्ध ने इस पूरी व्यवस्था को हिला दिया है।
इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड पर गंभीर आरोप:डिसेबिलिटी प्रीमियर लीग के मैचों में दिव्यांग खिलाड़ी तो पानी पिला रहे, जो दिव्यांग नहीं वे खेलने उतरे

इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) पर आरोप है कि वह अपनी शीर्ष घरेलू प्रतियोगिता ‘डिसेबिलिटी प्रीमियर लीग’ में ऐसे खिलाड़ियों को खेलने की अनुमति दे रहा है, जो तय मानकों के अनुसार दिव्यांग नहीं हैं। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का सपना देखने वाले असली दिव्यांग क्रिकेटरों का रास्ता बंद हो रहा है। जय चरण और एलेक्स जर्विस जैसे इंग्लैंड के पूर्व इंटरनेशनल खिलाड़ियों के माता-पिता ने यह मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि लीग में उनके बेटों की जगह ऐसे खिलाड़ियों ने ले ली है, जो ईसीबी की लर्निंग डिसेबिलिटी (एलडी) यानी ‘सीखने की अक्षमता’ के मेडिकल मानदंड को पूरा ही नहीं करते हैं। एक अभिभावक का अनुमान है कि हालिया ड्राफ्ट में चुने गए 64 में से 12 खिलाड़ी बिना किसी दिव्यांगता के हैं। नियमों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस श्रेणी में खेलने के लिए खिलाड़ी का आईक्यू 75 या उससे कम होना चाहिए। लेकिन आरोप है कि ईसीबी ने लीग में ऐसे कई खिलाड़ियों को शामिल कर लिया है, जो इस सख्त पैमाने पर खरे नहीं उतरते। इनमें से कई तो मुख्यधारा का पेशेवर क्रिकेट खेलते हैं। उदाहरण के तौर पर इंग्लैंड की गेंदबाज एम्म अर्लोट, जिन्हें 2023 में ऑटिज्म और एडीएचडी डायग्नोज हुआ था, वो सामान्य क्रिकेट खेलती हैं। इस गड़बड़ी का सीधा असर होनहार खिलाड़ियों पर पड़ रहा है। लीग इतिहास में सर्वश्रेष्ठ बॉलिंग एवरेज और स्ट्राइक रेट वाले जय चरण और एक दशक से खेल रहे एलेक्स जर्विस को सिर्फ ‘ड्रिंक्स कैरियर’ (पानी पिलाने वाले) की भूमिका तक सीमित कर दिया गया। हताश होकर जय ने टूर्नामेंट ही छोड़ दिया। यॉर्कशायर डिसेबिलिटी टीम के मैनेजर ओवेन जर्विस का कहना है कि गलत तरीके से एलडी श्रेणी में रखे गए नए खिलाड़ी ही सारी बैटिंग और बॉलिंग कर रहे हैं। असली खिलाड़ियों को सिर्फ फील्डिंग करने के लिए छोड़ दिया गया है, जिससे उनका मनोबल टूट रहा है। ईसीबी के डिसेबिलिटी क्रिकेट मैनेजर रिचर्ड हिल ने भी एक ईमेल में माना था कि ‘हाई-फंक्शनिंग’ (बेहतर क्षमता वाले) खिलाड़ियों के लीग में आने से चुनौतियां बढ़ रही हैं। हालांकि, ईसीबी के एक प्रवक्ता ने आधिकारिक बयान में कहा है कि लीग में सिर्फ 60 जगहें हैं, जिसके लिए कड़ा मुकाबला होता है। बोर्ड ने माना है कि पात्रता नियमों को लेकर बहस चल रही है और वे 2027 के सीजन तक इन पैमानों की समीक्षा करेंगे।
ब्रिटेन की जेलों में चोरी के फोन से ऑर्डर:जेलों में ड्रोन से ड्रग्स-हथियारों की डिलीवरी; कैदियों के परिवारों से पैसे वसूल रहे गैंग

ब्रिटेन की जेलों में ड्रोन के जरिए प्रतिबंधित सामान पहुंचाने का नया संकट बढ़ रहा है। कैदी जेल के अंदर से मोबाइल, ड्रग्स, चार्जर और चाकू जैसे हथियार तक ऑर्डर कर रहे हैं। ड्रोन ये पैकेट सीधे सेल की खिड़की या जेल के मैदान में गिरा रहे हैं। जज ने इसे उबर ईट्स जैसी डिलीवरी बताया है। 29 साल के शफकत उल्लाह मोहसेनी को 140 से ज्यादा अवैध ड्रोन उड़ानें का दोषी पाया गया है। उसने दिसंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच इंग्लैंड की 9 जेलों में सप्लाई की और कैदियों के परिजनों से करीब 30 लाख रुपए वसूले। मार्च 2025 तक जेलों में ड्रोन देखे जाने की रिकॉर्ड 1,712 घटनाएं दर्ज हुईं। विशेषज्ञों के मुताबिक असली संख्या इससे ज्यादा हो सकती है, क्योंकि ड्रोन अक्सर रात में उड़ाए जाते हैं। पहले तस्करी के लिए दीवार के ऊपर से सामान फेंका जाता था। अब कमर्शियल ड्रोन सबसे आसान तरीका बन गए हैं। कैदी चोरी से रखे फोन से बाहर के गैंग को ऑर्डर देते हैं और भुगतान अक्सर उनके डरे हुए परिवार वाले करते हैं। गैंग द्वारा परिवार को डराया-धमकाया जाता है कि उन्होंने सामान का भुगतान नहीं किया, तो जेल में बंद उनके परिजन को नुकसान पहुंचाया जाएगा। खतरे से निपटने के लिए ब्रिटिश सरकार यूक्रेन में रूसी ड्रोन रोकने वाली तकनीक का अध्ययन कर रही है। जेलों की खिड़कियों पर ग्रिल और इमारतों के ऊपर जालियां लगाई जा रही हैं। साथ ही डिजिटल फॉरेंसिक, फिंगरप्रिंट और मेटाडाटा के जरिए तस्करों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। जेल के अंदर सामानों की कीमत 10 गुना तक जेल में सामानों की कीमत बाजार से 5-10 गुना तक वसूली जा रही है। इससे हिंसा, नशे की लत और वसूली का दबाव बढ़ा है। नेशनल ऑडिट ऑफिस के मुताबिक ड्रोन बड़े पैकेट सटीक तरीके से पहुंचा सकते हैं, इसलिए जेलों में नशा बढ़ने का खतरा भी बढ़ गया है।
जुमानजी 3 पूरी, ड्वेन ने शेयर किए बीटीएस मोमेंट्स:ड्वेन ने लिखा – करियर के सबसे मजेदार और क्रिएटिव अनुभवों में से एक रहा है

हॉलीवुड स्टार ड्वेन जॉनसन, जिन्हें ‘द रॉक’ के नाम से भी जाना जाता है, उनकी अगली फिल्म पूरी हो गई है। ये खुशखबरी उन्होंने अपने फैंस को भी दी है। एडवेंचर फिल्म ‘जुमानजी 3’ के सेट से उन्होंने कुछ बिहाइंड द सीन्स तस्वीरें भी साझा की हैं, जो तेजी से वायरल हो रही हैं। ड्वेन ने तस्वीरें पोस्ट करते हुए लिखा कि यह उनके करियर के सबसे मजेदार और क्रिएटिव अनुभवों में से एक रहा है। उन्होंने पूरी टीम और कास्ट की जमकर तारीफ की और बताया कि पिछले 10 सालों से इस फ्रेंचाइज के साथ काम करना उनके लिए बेहद खास रहा है। फिल्म का निर्देशन जेक कासडन कर रहे हैं, जबकि इसे सोनी पिक्चर्स प्रोड्यूस कर रहा है। ‘जुमानजी’ फ्रेंचाइज की पिछली फिल्मों को दर्शकों से जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला था, जिसके बाद तीसरे पार्ट को लेकर एक्साइटमेंट पहले से ही हाई है। रिलीज की बात करें तो पहले यह फिल्म 11 दिसंबर 2026 को आने वाली थी लेकिन अब इसे क्रिसमस के मौके पर 24 दिसंबर 2026 के लिए शिफ्ट कर दिया गया है। मेकर्स इस फिल्म को बड़े फेस्टिव सीजन में रिलीज कर ज्यादा दर्शकों तक पहुंचाना चाहते हैं। फिल्म में डैनी डेविटो, निक जोनास, मारिन हिंकल, बेबे न्यूविर्थ, लैमोर्न मॉरिस और राइस डार्बी जैसे कलाकार एक बार फिर नजर आएंगे। इससे पहले ‘जुमानजी: वेलकम टू द जंगल’ (2017) और ‘जुमानजी: द नेक्स्ट लेवल’ (2019) ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया था।
विलियम्स ने टीम इंडिया के लिए छोड़ी ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता:कहा- दिल जहां, घर वहां; नाना ने 1956 में बंगाल को हराया था

भारतीय फुटबॉल के लिए एएफसी एशियन कप 2027 क्वालीफायर का हॉन्गकॉन्ग के खिलाफ मैच एक खास पल का गवाह बना। भारत ने मैच 2-1 से जीतकर टूर्नामेंट में अपना सफर खत्म किया। यह भारत की प्रतियोगिता में पहली और कोच्चि के मैदान पर भी पहली जीत रही। भारत की ओर से रयान विलियम्स (4’) और आकाश मिश्रा (50’) ने गोल किए। ऑस्ट्रेलियाई मूल के 32 वर्षीय रयान इस मैच में भारत के लिए डेब्यू कर रहे थे। 2014 में अराता इजुमी के बाद वह भारत के लिए खेलने वाले पहले विदेशी मूल के खिलाड़ी बने। रयान का पोर्ट्समाउथ और फुलहम जैसे इंग्लिश क्लबों से होते हुए कोच्चि तक का सफर अपनी जड़ों की ओर लौटने की कहानी है। रयान का जन्म ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में हुआ था और 2019 में वह ऑस्ट्रेलिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेल चुके थे। भारत से उनका नाता उनकी मां ऑड्रे से जुड़ता है, जो मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) के एक एंग्लो-इंडियन परिवार से ताल्लुक रखती हैं। रयान की रगों में भारतीय फुटबॉल का पुराना इतिहास दौड़ता है। उनके सगे नाना, लिंकी ग्रोस्टेट ने 1956 की प्रतिष्ठित संतोष ट्रॉफी के सेमीफाइनल में बॉम्बे की तरफ से खेलते हुए मजबूत बंगाल के खिलाफ विजयी गोल दागा था। अपनी जड़ों की इसी पुकार ने रयान को 2022 में भारत खींचा, जब वह इंडियन सुपर लीग में बेंगलुरु एफसी से जुड़े। यहीं खेलते हुए भारतीय दिग्गज सुनील छेत्री ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने के लिए प्रेरित किया। चूंकि भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है, इसलिए नीली जर्सी पहनने के लिए रयान को अपना ऑस्ट्रेलियाई पासपोर्ट हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा। यह एक बहुत बड़ा फैसला था। उन्हें भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के इस थका देने वाले सफर में तीन साल का वक्त लग गया। नियमों के मुताबिक, उन्हें लगातार 365 दिनों तक भारत में ही रहना था। इसके लिए उन्होंने अपने ऑफ-सीजन में भी परिवार से दूर भारत में ही रुकने का त्याग किया। एक समय ऐसा भी आया जब कागजी अड़चनों को देखकर कई लोगों ने उन्हें यह विचार छोड़ने की सलाह दी। ऐसे मुश्किल वक्त में उनकी पत्नी ने उनका हौसला बढ़ाया और तय किया कि वे भारत में ही रुकेंगे और इस सपने को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। इस लंबे इंतजार में रयान को निराशा भी झेलनी पड़ी। पिछले साल नवंबर में बांग्लादेश दौरे पर गई टीम के कैंप में वह मौजूद थे। रात 12 बजे की डेडलाइन निकल जाने के बाद, देर रात करीब 2 बजे उन्हें कागजी मंजूरी (एनओसी) मिल पाई, जिसके चलते वह अपना पहला मैच खेलने से चूक गए। भारत को अब अपना स्थायी घर मान चुके रयान का कहना है ‘घर वहीं है, जहां आपका दिल है।’ भविष्य में उनका सपना कोचिंग के जरिए भारत के युवा खिलाड़ियों को तराशना है।
Millions of trees of 800 varieties turn the country pink, a sight that lasts for two weeks.

Hindi News Happylife Millions Of Trees Of 800 Varieties Turn The Country Pink, A Sight That Lasts For Two Weeks. टोक्यो16 मिनट पहले कॉपी लिंक इन फूलों का जीवन मात्र 7 से 14 दिन का ही होता है।- प्रतीकात्मक फोटो जापान में इन दिनों विश्व प्रसिद्ध चेरी ब्लॉसम का सीजन चल रहा है। इससे पूरा देश गुलाबी और सफेद फूलों की चादर से ढक गया है। जापान में चेरी ब्लॉसम की 800 से ज्यादा किस्में पाई जाती हैं, लेकिन यहां के 80 फीसदी पेड़ ‘सोमेई-योषिनो’ प्रजाति के हैं। इनका जीवन मात्र 7 से 14 दिन का ही होता है। इन फूलों को देखने के लिए लाखों लोग देश-विदेश से यहां पहुंचते हैं। इन फूलों को न सिर्फ देखा जाता है, बल्कि इनकी पंखुड़ियों को सुखाकर चाय और मिठाइयों में भी इस्तेमाल किया जाता है। अगले एक हफ्ते तक यह नजारा बना रहेगा, जिसके बाद पंखुड़ियां गिरना शुरू हो जाएंगी। इससे जापान में पर्यटन बढ़ता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा होता है। चेरी ब्लॉसम देखने के लिए जापान जाने का सबसे अच्छा समय जापान में चेरी के फूल खिलने का मौसम वसंत ऋतु में मार्च से मई तक रहता है। देश के चेरी के पेड़ों को पूरी तरह खिलते हुए देखने का सबसे अच्छा समय आमतौर पर मार्च के अंत से अप्रैल तक होता है, हालांकि, यह आपके घूमने के क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। फुकुओका में, पहला फूल आमतौर पर मार्च के मध्य से अंत तक खिलता है, और मार्च के आखिरी कुछ दिनों से अप्रैल के पहले कुछ दिनों तक यह अपने चरम पर होता है। टोक्यो, क्योटो और ओसाका में, चेरी के पेड़ आमतौर पर मार्च के आखिरी सप्ताह में फूलना शुरू करते हैं और अप्रैल के पहले सप्ताह में पूरी तरह खिल जाते हैं। मौसम के आखिरी चेरी के फूल होक्काइडो जैसे उत्तरी क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जो अप्रैल के अंत से मई के शुरुआती दिनों तक खिलते हैं। अंततः, चेरी के फूल कब और कितने समय तक खिलेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है, और पूर्वानुमान तापमान, वर्षा और हवा जैसे कई कारकों से प्रभावित होते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔









