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विलियम्स ने टीम इंडिया के लिए छोड़ी ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता:कहा- दिल जहां, घर वहां; नाना ने 1956 में बंगाल को हराया था

विलियम्स ने टीम इंडिया के लिए छोड़ी ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता:कहा- दिल जहां, घर वहां; नाना ने 1956 में बंगाल को हराया था

भारतीय फुटबॉल के लिए एएफसी एशियन कप 2027 क्वालीफायर का हॉन्गकॉन्ग के खिलाफ मैच एक खास पल का गवाह बना। भारत ने मैच 2-1 से जीतकर टूर्नामेंट में अपना सफर खत्म किया। यह भारत की प्रतियोगिता में पहली और कोच्चि के मैदान पर भी पहली जीत रही। भारत की ओर से रयान विलियम्स (4’) और आकाश मिश्रा (50’) ने गोल किए। ऑस्ट्रेलियाई मूल के 32 वर्षीय रयान इस मैच में भारत के लिए डेब्यू कर रहे थे। 2014 में अराता इजुमी के बाद वह भारत के लिए खेलने वाले पहले विदेशी मूल के खिलाड़ी बने। रयान का पोर्ट्समाउथ और फुलहम जैसे इंग्लिश क्लबों से होते हुए कोच्चि तक का सफर अपनी जड़ों की ओर लौटने की कहानी है।
रयान का जन्म ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में हुआ था और 2019 में वह ऑस्ट्रेलिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेल चुके थे। भारत से उनका नाता उनकी मां ऑड्रे से जुड़ता है, जो मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) के एक एंग्लो-इंडियन परिवार से ताल्लुक रखती हैं।
रयान की रगों में भारतीय फुटबॉल का पुराना इतिहास दौड़ता है। उनके सगे नाना, लिंकी ग्रोस्टेट ने 1956 की प्रतिष्ठित संतोष ट्रॉफी के सेमीफाइनल में बॉम्बे की तरफ से खेलते हुए मजबूत बंगाल के खिलाफ विजयी गोल दागा था। अपनी जड़ों की इसी पुकार ने रयान को 2022 में भारत खींचा, जब वह इंडियन सुपर लीग में बेंगलुरु एफसी से जुड़े। यहीं खेलते हुए भारतीय दिग्गज सुनील छेत्री ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने के लिए प्रेरित किया। चूंकि भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है, इसलिए नीली जर्सी पहनने के लिए रयान को अपना ऑस्ट्रेलियाई पासपोर्ट हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा। यह एक बहुत बड़ा फैसला था। उन्हें भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के इस थका देने वाले सफर में तीन साल का वक्त लग गया। नियमों के मुताबिक, उन्हें लगातार 365 दिनों तक भारत में ही रहना था। इसके लिए उन्होंने अपने ऑफ-सीजन में भी परिवार से दूर भारत में ही रुकने का त्याग किया। एक समय ऐसा भी आया जब कागजी अड़चनों को देखकर कई लोगों ने उन्हें यह विचार छोड़ने की सलाह दी। ऐसे मुश्किल वक्त में उनकी पत्नी ने उनका हौसला बढ़ाया और तय किया कि वे भारत में ही रुकेंगे और इस सपने को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे।
इस लंबे इंतजार में रयान को निराशा भी झेलनी पड़ी। पिछले साल नवंबर में बांग्लादेश दौरे पर गई टीम के कैंप में वह मौजूद थे। रात 12 बजे की डेडलाइन निकल जाने के बाद, देर रात करीब 2 बजे उन्हें कागजी मंजूरी (एनओसी) मिल पाई, जिसके चलते वह अपना पहला मैच खेलने से चूक गए। भारत को अब अपना स्थायी घर मान चुके रयान का कहना है ‘घर वहीं है, जहां आपका दिल है।’ भविष्य में उनका सपना कोचिंग के जरिए भारत के युवा खिलाड़ियों को तराशना है।

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विलियम्स ने टीम इंडिया के लिए छोड़ी ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता:कहा- दिल जहां, घर वहां; नाना ने 1956 में बंगाल को हराया था

विलियम्स ने टीम इंडिया के लिए छोड़ी ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता:कहा- दिल जहां, घर वहां; नाना ने 1956 में बंगाल को हराया था

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रयान का जन्म ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में हुआ था और 2019 में वह ऑस्ट्रेलिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मैच भी खेल चुके थे। भारत से उनका नाता उनकी मां ऑड्रे से जुड़ता है, जो मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) के एक एंग्लो-इंडियन परिवार से ताल्लुक रखती हैं।
रयान की रगों में भारतीय फुटबॉल का पुराना इतिहास दौड़ता है। उनके सगे नाना, लिंकी ग्रोस्टेट ने 1956 की प्रतिष्ठित संतोष ट्रॉफी के सेमीफाइनल में बॉम्बे की तरफ से खेलते हुए मजबूत बंगाल के खिलाफ विजयी गोल दागा था। अपनी जड़ों की इसी पुकार ने रयान को 2022 में भारत खींचा, जब वह इंडियन सुपर लीग में बेंगलुरु एफसी से जुड़े। यहीं खेलते हुए भारतीय दिग्गज सुनील छेत्री ने उन्हें भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने के लिए प्रेरित किया। चूंकि भारत में दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है, इसलिए नीली जर्सी पहनने के लिए रयान को अपना ऑस्ट्रेलियाई पासपोर्ट हमेशा के लिए छोड़ना पड़ा। यह एक बहुत बड़ा फैसला था। उन्हें भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के इस थका देने वाले सफर में तीन साल का वक्त लग गया। नियमों के मुताबिक, उन्हें लगातार 365 दिनों तक भारत में ही रहना था। इसके लिए उन्होंने अपने ऑफ-सीजन में भी परिवार से दूर भारत में ही रुकने का त्याग किया। एक समय ऐसा भी आया जब कागजी अड़चनों को देखकर कई लोगों ने उन्हें यह विचार छोड़ने की सलाह दी। ऐसे मुश्किल वक्त में उनकी पत्नी ने उनका हौसला बढ़ाया और तय किया कि वे भारत में ही रुकेंगे और इस सपने को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देंगे।
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