‘Chacha Cricket’ will not be seen holding the Pakistan flag in his hands.

Hindi News Sports ‘Chacha Cricket’ Will Not Be Seen Holding The Pakistan Flag In His Hands. लाहौर47 मिनट पहले कॉपी लिंक अब्दुल जलील(चाचा क्रिकेट) को 1996 में पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया था। – फाइल फोटो लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में अगले हफ्ते जब पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया के बीच तीसरा वनडे खेला जाएगा, तब मैदान में एक चेहरा ऐसा भी होगा जिसे देखकर करोड़ों पाकिस्तानी भावुक हो जाएंगे। हरे रंग का कुर्ता, टोपी, हाथ में पाकिस्तान का झंडा और चेहरे पर वही मुस्कान। यह होंगे ‘चाचा क्रिकेट’। 77 साल के अब्दुल जलील, जिन्हें पूरी दुनिया चाचा क्रिकेट के नाम से जानती है, इस मैच के बाद पाकिस्तान में मैचों में चीयर करना छोड़ देंगे। करीब पांच दशक तक टीम के साथ हर जीत-हार में खड़े रहने वाले चाचा अब रिटायरमेंट की तैयारी कर रहे हैं। 1968-69 में लाहौर में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट देखकर उन्हें क्रिकेट से ऐसा प्यार हुआ कि जिंदगी ही बदल गई। बाद में नौकरी के लिए यूएई गए, लेकिन पाकिस्तान का मैच देखने के लिए अबु धाबी से शारजाह तक तीन-तीन बसें बदलकर पहुंचते थे। धीरे-धीरे उनका हरा पहनावा और जोश भरा अंदाज पाकिस्तान क्रिकेट की पहचान बन गया। 1996 में उन्हें पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने शुभंकर घोषित किया। साल 1998 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और पूरी जिंदगी पाकिस्तान क्रिकेट को समर्पित कर दी। 1999 वर्ल्ड कप में वे इंग्लैंड तक पहुंचे। इसके बाद दुनिया के लगभग हर बड़े क्रिकेट मैदान में पाकिस्तान का झंडा लहराते दिखे। चाचा कहते हैं कि उन्होंने 500 मैचों में टीम को चीयर करने का सपना देखा था, जो पूरा हो चुका है। अब उनका सपना सियालकोट में एक रेस्टोरेंट और क्रिकेट म्यूजियम खोलने का है, जहां वह जुटाए गए अपने यादगार सामान को रखेंगे। हालांकि, टीम के हालिया खराब फॉर्म के कारण वे श्रीलंका में 2026 टी20 वर्ल्ड कप में टीम का समर्थन करने नहीं गए। भले ही हालिया प्रदर्शन खराब हो, लेकिन चाचा क्रिकेट ने पाक के दबदबे का सुनहरा दौर भी करीब से देखा है। उन्हें आज भी 1986 में जावेद मियांदाद का आखिरी गेंद पर छक्का याद है। वहीं, 2011 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल (मोहाली) और 2024 टी20 वर्ल्ड कप (न्यूयॉर्क) में भारत से हार उनके दिल में दर्द छोड़ गई। लेकिन चाचा क्रिकेट अब भी वही बात दोहराते हैं- ‘कभी खुशी, कभी गम… कभी तुम, कभी हम। खेल में ऐसा होता है।’ शायद यही वजह है कि चाचा क्रिकेट सिर्फ एक फैन नहीं, बल्कि पाकिस्तान क्रिकेट की चलती-फिरती याद बन चुके हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
The fatigue of 7,000 extra minutes could shatter Arsenal’s title dreams; PSG stars are refreshed.

Hindi News Sports The Fatigue Of 7,000 Extra Minutes Could Shatter Arsenal’s Title Dreams; PSG Stars Are Refreshed. बुडापेस्ट9 मिनट पहले कॉपी लिंक पीएसजी 14 साल में 12 बार फ्रांस का लीग खिताब जीत चुका है। दूसरी ओर, आर्सनल ने इस बार 22 साल बाद इंग्लैंड की लीग जीती है।- फाइल फोटो बुडापेस्ट में शनिवार को जब आर्सनल और पीएसजी आमने-सामने होंगे, तब मुकाबला सिर्फ यूरोप के सबसे बड़े क्लब खिताब का नहीं होगा। यह लड़ाई दो अलग फुटबॉल संस्कृतियों और दो अलग रास्तों की भी होगी। एक तरफ इंग्लिश क्लब आर्सनल है, जिसने पूरे सीजन संघर्ष करते हुए यहां तक सफर तय किया। दूसरी तरफ डिफेंडिंग चैम्पियन पीएसजी है, जिसके पास इतना बड़ा और मजबूत स्क्वॉड है कि कोच लुइस एनरिक अपने स्टार खिलाड़ियों को आराम देने का जोखिम उठा सकते हैं। दोनों टीमों के बीच सबसे बड़ा फर्क एक आंकड़ा दिखाता है। आर्सनल के खिलाड़ियों ने लीग मैचों में फ्रेंच क्लब पीएसजी के खिलाड़ियों से लगभग 7000 मिनट ज्यादा फुटबॉल खेला है। यानी आर्सनल के खिलाड़ी कहीं ज्यादा थके हुए शरीर के साथ फाइनल में उतरेंगे। टीम ने कुल 63 मैच खेले और अप्रैल तक चार ट्रॉफियों की दौड़ में बनी रही। डेविड राया ने आखिरी लीग मैच तक पूरे सीजन का हर मिनट खेला। डेकलान राइस, विलियम सलीबा, गैब्रियल जैसे खिलाड़ी लगातार मैदान में उतरे। इसके उलट पीएसजी ने खिलाड़ियों को बेहद सोच-समझकर इस्तेमाल किया। कप्तान मार्किन्योस ने चैम्पियंस लीग के 14 मैच खेले, लेकिन घरेलू लीग में सिर्फ 14 बार मैदान पर उतरे। फरवरी से अप्रैल के बीच वे सात घरेलू लीग मैचों में बेंच पर बैठे रहे, ताकि यूरोप के मैचों के लिए फिट रहें। डेम्बेले ने 22 लीग मैच खेले, लेकिन सिर्फ एक बार पूरे 90 मिनट मैदान पर रहे। यही वजह है कि पीएसजी के खिलाड़ी ज्यादा तरोताजा हैं। फाइनल से पहले आराम का अंतर भी बड़ा है। पीएसजी को फाइनल से पहले 13 दिन का आराम मिला। इसके उलट आर्सनल को सिर्फ छह दिन मिले। लेकिन कहानी सिर्फ थकान और आराम की नहीं है। यह खिताबी भूख की भी है। पीएसजी 14 साल में 12 बार फ्रांस का लीग खिताब जीत चुका है। दूसरी ओर, आर्सनल ने इस बार 22 साल बाद इंग्लैंड की लीग जीती है। पिछले साल पीएसजी ने चैम्पियंस लीग के सेमीफाइनल में आर्सनल को हराया था। अब आर्सनल के पास बदला लेने का मौका है। रात 9 बजे से फुटबॉल सिर्फ रणनीति का खेल नहीं होगी। यह सवाल भी होगा कि फाइनल में ज्यादा असर किसका पड़ता है- पीएसजी की ताजगी का या आर्सनल की थकान के बावजूद जीतने की जिद का। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
The ‘Flying Palace’ received from Qatar will be in service for the US President from July 4; modified at a cost of 38 billion rupees.

Hindi News International The ‘Flying Palace’ Received From Qatar Will Be In Service For The US President From July 4; Modified At A Cost Of 38 Billion Rupees. टेक्सास4 मिनट पहले कॉपी लिंक इस विमान का इस्तेमाल घरेलू दौरों के लिए ही होगा। इसमें आपात स्थिति में प्लेन से पूरा देश संभालने वाले कमांड बंकर जैसी सुविधा नहीं है।- फाइल फोटो कतर के शाही परिवार द्वारा अमेरिका को तोहफे में दिया गया बोइंग 747-8 विमान 4 जुलाई (अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस) के आसपास अमेरिकी राष्ट्रपति की सेवा में शामिल होने के लिए तैयार है। वायु सेना ने 3,800 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके इसे मॉडिफाई किया है। वायु सेना ने 3,800 करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके इसे मॉडिफाई किया है। विमान के अंदर का नजारा 7-स्टार लग्जरी होटल जैसा है। इसमें बेहतरीन लेदर और सोने की फिनिशिंग वाले पार्ट्स लगे हैं। बड़े और बेहद आलीशान बेडरूम हैं। इतने बड़े विमान में सिर्फ 76 यात्रियों और 18 क्रू मेंबर्स की जगह है। लेकिन राष्ट्रपति की घरेलू यात्राओं का ही हिस्सा बनेगा| इस विमान का इस्तेमाल घरेलू दौरों के लिए ही होगा। इसमें आपात स्थिति में प्लेन से पूरा देश संभालने वाले कमांड बंकर जैसी सुविधा नहीं है। संभवतः किसी विदेशी सरकार द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका को दिया गया अब तक का सबसे मूल्यवान उपहार है। इसका उपयोग पहले कतर के शाही परिवार के सदस्यों द्वारा किया जाता था और बाद में तुर्की सरकार द्वारा, फिर इसे अमेरिका को सौंप दिया गया। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
चंबल की लोककथाओं पर बेस्ड होगी 'शक्तिशालिनी':असली बीहड़ों में पहुंचे मेकर्स; अनीत पड्डा का रहस्यमयी किरदार, विशाल का खतरनाक अवतार

कभी डकैतों और खूनी संघर्षों की कहानियों के लिए चर्चा में रहने वाले चंबल के बीहड़ इन दिनों एक अलग वजह से सुर्खियों में हैं। इस बार वहां फिल्मों की शूटिंग का माहौल देखने को मिल रहा है। मैडॉक फिल्म्स ने अपनी अगली फिल्म ‘शक्तिशालिनी’ की शूटिंग के लिए मुंबई और हैदराबाद के स्टूडियो सेट्स की बजाय चंबल के असली बीहड़ों को चुना है। ‘स्त्री’, ‘भेड़िया’, ‘मुंज्या’ और ‘थामा’ जैसी फिल्मों के बाद मैडॉक अब एक नई हॉरर-ड्रामा फिल्म पर काम कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘फिल्म में तंत्र-विद्या, लोककथाएं, चंबल की पृष्ठभूमि और एक्शन का मिश्रण देखने को मिल सकता है। इसमें अनीत पड्डा, विशाल जेठवा और विनीत कुमार सिंह नजर आएंगे।’ लोकेशन नहीं फिल्म का किरदार होगा चंबल फिल्म से जुड़े सूत्रों के मुताबिक ‘इसमें चंबल को सिर्फ एक शूटिंग लोकेशन नहीं, बल्कि कहानी के अहम हिस्से के तौर पर दिखाया जाएगा। बीहड़ों की वीरानी, गुफाएं, मिट्टी और रात का सन्नाटा फिल्म के माहौल को और प्रभावी बनाएंगे। विशाल का अब तक का सबसे खतरनाक अवतार ‘मर्दानी 2’ से पहचान बनाने वाले विशाल जेठवा इस फिल्म में बिलकुल नए और इंटेंस अवतार में नजर आने वाले हैं। शुरुआती शूटिंग के दौरान उन्हें स्कूल यूनिफॉर्म में देखा गया था, जिससे माना जा रहा है कि कहानी का एक हिस्सा किरदारों के बचपन या फ्लैशबैक से जुड़ा हो सकता है। हालांकि बाद में उनका लुक पूरी तरह बदलता दिखाई दिया। 15 दिनों में बनीं रहस्यमयी ‘तांत्रिक गुफाएं’ रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘फिल्म के लिए मेकर्स ने स्टूडियो सेट्स का सहारा लेने के बजाय चंबल के असली बीहड़ों के बीच एक बड़ा सेट तैयार किया। बताया जा रहा है कि करीब 15 दिनों की मेहनत के बाद वहां प्राचीन तांत्रिक गुफाओं जैसा माहौल बनाया गया। इन गुफाओं की डिजाइन लोककथाओं, पुराने मंदिरों और मध्य भारत की तांत्रिक परंपराओं से प्रेरित है। सेट के अंदर गुप्त रास्ते, विशाल मूर्तियां, अग्निकुंड और कई रहस्यमयी प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे फिल्म का माहौल और प्रभावी दिखे। जानकारी यह भी सामने आई है कि फिल्म के कुछ अहम ट्विस्ट और क्लाइमैक्स सीन्स इन्हीं गुफाओं में शूट किए गए। शूटिंग के दौरान गोपनीयता बनाए रखने के लिए यूनिट पर मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर भी सख्त निर्देश दिए गए थे। अनीत निभा रहीं रहस्यमयी किरदार फिल्म में अनीत पड्डा, शालिनी के किरदार में नजर आएंगी। बता दें कि कहानी एक साधारण ग्रामीण लड़की से शुरू होती है, जिसकी जिंदगी रहस्यमयी घटनाओं के बाद पूरी तरह बदल जाती है। धीरे-धीरे उसे अपने भीतर ऐसी शक्तियों का एहसास होता है, जो सामान्य इंसानों से अलग हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, फिल्म में शालिनी का किरदार डर और शक्ति दोनों का मिश्रण होगा। मेकर्स ने उनके ट्रांसफॉर्मेशन को विजुअली अलग दिखाने की कोशिश की है।
500 प्रजाति पौधों के बीच फ्रेंच ओपन का अनोखा कोर्ट:पेरिस के रोलां गैरो स्टेडियम में बना कोर्ट सिमोन-मैथ्यू; ग्रैंड स्लैम का सबसे नया कोर्ट

फ्रेंच ओपन के शोर, भीड़ और टेनिस के रोमांच से कुछ कदम दूर एक ऐसी जगह है, जहां पहुंचते ही माहौल बदल जाता है। फ्रेंच ओपन की मेजबानी करने वाले रोलां गैरो स्टेडियम के बीचों-बीच बना ऑटेय बॉटनिकल गार्डन मानो किसी दूसरी दुनिया का हिस्सा लगता है। यहां 500 से ज्यादा पौधों की प्रजातियां हैं, ऊंचे-ऊंचे पेड़ हैं, रंग-बिरंगे फूल हैं और उनके बीच छिपा है एक अनोखा टेनिस कोर्ट- कोर्ट सिमोन-मैथ्यू। इस कोर्ट का नाम दो बार की पूर्व महिला सिंगल्स चैम्पियन सिमोन मैथ्यू के नाम पर रखा गया है। यहां पहुंचने वाले खिलाड़ी और दर्शक पहले हरियाली के बीच से गुजरते हैं। कुछ देर के लिए ऐसा लगता है कि वे किसी बॉटनिकल पार्क में घूम रहे हैं, लेकिन जैसे ही मैच शुरू होता है, वही शांत जगह शोर और जुनून से भर उठती है। खासकर जब कोई फ्रेंच खिलाड़ी कोर्ट पर हो, तब यहां का माहौल किसी फुटबॉल स्टेडियम जैसा हो जाता है। रविवार को फ्रांस के टिटुआं द्रोगे के मुकाबले में यही देखने को मिला। दर्शक लगातार ‘द्रो-गे, अले!’ के नारे लगा रहे थे। हर पॉइंट पर तालियां और शोर गूंज रहा था। लेकिन यह समर्थन द्रोगे के लिए दबाव भी बन गया। दुनिया के 110वें नंबर के खिलाड़ी द्रोगे मैच में अपनी लय नहीं पकड़ सके और सीधे सेटों में हार गए। शाम ढलने के साथ कोर्ट सिमोन-मैथ्यू की खूबसूरती और भी अलग नजर आने लगती है। दर्शक जब सीढ़ियों से नीचे उतरकर अपनी सीटों तक पहुंचते हैं, तो उन्हें ऐसा अहसास होता है मानो वे किसी गुप्त स्टेडियम में प्रवेश कर रहे हों। ऊपर हरियाली और फूलों की खुशबू, नीचे लाल मिट्टी का कोर्ट और बीच में हजारों दर्शकों की आवाजें, यही इस कोर्ट को बाकी से अलग बनाता है। कोर्ट सिमोन-मैथ्यू सिर्फ एक टेनिस कोर्ट नहीं, बल्कि रोलां गैरो की नई पहचान बन चुका है। यहां हरियाली की शांति भी है और खेल का उन्माद भी। दिन में यह जगह किसी बगीचे जैसी लगती है, लेकिन रात होते-होते यही कोर्ट खिलाड़ियों के लिए सबसे कठिन परीक्षा बन जाता है। जमीन से साढ़े चार मीटर नीचे बना है कोर्ट साल 2019 में शुरू हुआ यह कोर्ट फ्रेंच ओपन का तीसरा सबसे बड़ा कोर्ट है। इसकी खासियत सिर्फ इसकी क्षमता या आधुनिक डिजाइन नहीं, बल्कि उसका माहौल है। चार विशाल कांच के ग्रीनहाउस के बीच बना यह कोर्ट ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने खुद टेनिस को अपनी गोद में जगह दी हो। कोर्ट जमीन से करीब साढ़े चार मीटर नीचे बनाया गया है, ताकि वह आसपास के बगीचों के साथ घुल-मिल जाए।
कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

लंदन के कू ब्रिज पर विंटेज इतालवी कॉफी कार्ट के बाहर लंबी कतार है। दौड़ लगाने वाले, पर्यटक और डॉग वॉकर, सभी हाथ में कॉफी लिए दिन शुरू करना चाहते हैं। लेकिन कार्ट चलाने वाले एंथनी डकवर्थ की नजर ग्राहकों से ज्यादा कीमतों पर टिकी है। उनके यहां आइस्ड लाते 4.5 पाउंड (580 रुपए) में मिलती है। उनकी चिंता है कि कीमत 5 पाउंड (644 रुपए) न पहुंच जाए। यह चिंता पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था की है। आज एक कप कॉफी में जलवायु संकट, ट्रेड वॉर और बदलती उपभोक्ता संस्कृति सब दिखाई देने लगे हैं। दुनिया की कॉफी मुख्य रूप से दो बीन्स पर टिकी है- अरेबिका और रोबस्टा। अरेबिका ब्राजील, इथियोपिया और केन्या की ठंडी पहाड़ियों में उगती है, जबकि कैफीन से भरपूर रोबस्टा पर वियतनाम का दबदबा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में मौसम ने दोनों फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन अरेबिका बीन्स की कीमत औसत 1.2 डॉलर प्रति पाउंड से 4 डॉलर (384 रुपए) से ऊपर निकल गई। कॉफी उद्योग के दिग्गज गुइसेप्पे लावाज्जा मानते हैं कि राहत जल्द मिलने वाली नहीं है। इस बीच, अमेरिकी टैरिफ ने संकट और गहरा दिया। ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम पर 46%, इंडोनेशिया पर 32% और ब्राजील पर 50% तक टैरिफ लगा दिया। अमेरिका में पिसी कॉफी की कीमत 17% और इंस्टेंट कॉफी 25% तक महंगी हो गई। आखिरकार बढ़ती नाराजगी के बाद कॉफी को टैरिफ से राहत देनी पड़ी। लेकिन मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। लाल सागर में हूती हमलों के कारण वियतनाम से यूरोप जाने वाले जहाज अब अफ्रीका का लंबा चक्कर लगा रहे हैं। यात्रा 4,000 मील बढ़ गई। ऊपर से यूरोप के नए नियमों के तहत कॉफी किसानों को यह साबित करना होगा कि काफी जंगल काटकर नहीं उगाई गई। कीमत बढ़ने पर भी खरीदारी, इसीलिए दाम नीचे नहीं आते दिलचस्प है महंगी होने के बावजूद कॉफी की मांग कम नहीं हुई। तस्वीर साफ है- सप्लाई चेन संकट में है, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति कीमतें बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुनिया का कॉफी प्रेम अडिग है। अब कॉफी सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि ‘एक्सपीरियंस’ बन चुकी है। चीनी कंपनी कॉफी डेटा और टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारबक्स को चुनौती दे रही है, जबकि ब्रिटेन की ग्रेग्स ऑटोमेशन के जरिए सस्ती कॉफी बेचकर सबसे बड़ा कॉफी विक्रेता बन चुकी है।
कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

लंदन के कू ब्रिज पर विंटेज इतालवी कॉफी कार्ट के बाहर लंबी कतार है। दौड़ लगाने वाले, पर्यटक और डॉग वॉकर, सभी हाथ में कॉफी लिए दिन शुरू करना चाहते हैं। लेकिन कार्ट चलाने वाले एंथनी डकवर्थ की नजर ग्राहकों से ज्यादा कीमतों पर टिकी है। उनके यहां आइस्ड लाते 4.5 पाउंड (580 रुपए) में मिलती है। उनकी चिंता है कि कीमत 5 पाउंड (644 रुपए) न पहुंच जाए। यह चिंता पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था की है। आज एक कप कॉफी में जलवायु संकट, ट्रेड वॉर और बदलती उपभोक्ता संस्कृति सब दिखाई देने लगे हैं। दुनिया की कॉफी मुख्य रूप से दो बीन्स पर टिकी है- अरेबिका और रोबस्टा। अरेबिका ब्राजील, इथियोपिया और केन्या की ठंडी पहाड़ियों में उगती है, जबकि कैफीन से भरपूर रोबस्टा पर वियतनाम का दबदबा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में मौसम ने दोनों फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन अरेबिका बीन्स की कीमत औसत 1.2 डॉलर प्रति पाउंड से 4 डॉलर (384 रुपए) से ऊपर निकल गई। कॉफी उद्योग के दिग्गज गुइसेप्पे लावाज्जा मानते हैं कि राहत जल्द मिलने वाली नहीं है। इस बीच, अमेरिकी टैरिफ ने संकट और गहरा दिया। ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम पर 46%, इंडोनेशिया पर 32% और ब्राजील पर 50% तक टैरिफ लगा दिया। अमेरिका में पिसी कॉफी की कीमत 17% और इंस्टेंट कॉफी 25% तक महंगी हो गई। आखिरकार बढ़ती नाराजगी के बाद कॉफी को टैरिफ से राहत देनी पड़ी। लेकिन मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। लाल सागर में हूती हमलों के कारण वियतनाम से यूरोप जाने वाले जहाज अब अफ्रीका का लंबा चक्कर लगा रहे हैं। यात्रा 4,000 मील बढ़ गई। ऊपर से यूरोप के नए नियमों के तहत कॉफी किसानों को यह साबित करना होगा कि काफी जंगल काटकर नहीं उगाई गई। कीमत बढ़ने पर भी खरीदारी, इसीलिए दाम नीचे नहीं आते दिलचस्प है महंगी होने के बावजूद कॉफी की मांग कम नहीं हुई। तस्वीर साफ है- सप्लाई चेन संकट में है, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति कीमतें बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुनिया का कॉफी प्रेम अडिग है। अब कॉफी सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि ‘एक्सपीरियंस’ बन चुकी है। चीनी कंपनी कॉफी डेटा और टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारबक्स को चुनौती दे रही है, जबकि ब्रिटेन की ग्रेग्स ऑटोमेशन के जरिए सस्ती कॉफी बेचकर सबसे बड़ा कॉफी विक्रेता बन चुकी है।
एनएफएल प्लेयर जैक क्रॉफर्ड का लाइफ लेसन:स्टेडियम के स्टार को 12 लोगों ने डराया, ओपन माइक ने सिखाया- डर का सामना करो

6 फीट 5 इंच लंबा शरीर, एनएफएल के बड़े-बड़े स्टेडियमों का अनुभव और करोड़ों दर्शकों के सामने खेलने का आत्मविश्वास। लेकिन जब अमेरिकी फुटबॉलर जैक क्रॉफर्ड पहली बार न्यूयॉर्क के एक छोटे से कॉमेडी क्लब में ओपन माइक करने पहुंचे, तो उनके हाथ कांप रहे थे। कमरे में मुश्किल से 12 लोग थे। पांच मिनट की परफॉर्मेंस में उनके जोक्स पर कोई नहीं हंसा। इसी असफलता ने उन्हें जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया कि डर से भागने के बजाय उसका सामना करो। 1. डर का सामना करने से बढ़ता है आत्मविश्वास 37 वर्षीय जैक क्रॉफर्ड कई सालों से स्टैंडअप कॉमेडी करना चाहते थे, लेकिन लोगों के जज करने का डर उन्हें रोकता रहा। फिर एक दिन उनका दोस्त उन्हें अचानक ओपन माइक में ले गया। पहली परफॉर्मेंस बुरी रही, लेकिन उसी दिन उन्होंने महसूस किया कि सबसे बड़ा डर असलियत में उतना बड़ा नहीं होता। इसके बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। उन्होंने कहा, ‘जब आप सबसे डरावनी चीज कर लेते हैं, तो बाकी चीजें छोटी लगने लगती हैं। ’2. गलतियां करना हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा नेशनल फुटबॉल लीग (एनएफएल) के करियर में भी क्रॉफर्ड का सबसे बड़ा दुश्मन डर ही था। अभ्यास में वे शानदार खेलते थे, लेकिन मैच में गलती का डर उन्हें रोक देता था। डलास काउबॉयज के कोच रॉड मारिनेली ने उनसे कहा, ‘खूब गलती करो, लेकिन मैच में पूरी ताकत से खेलो।’ इसी सोच से उनकी जिंदगी बदल गई। क्रॉफर्ड ने समझा कि हर गलती शर्मिंदगी नहीं होती, बल्कि सीखने का मौका होती है। यही सोच उन्हें स्टैंडअप कॉमेडी में भी काम आई। 3. असहजता कमजोरी नहीं, बल्कि ग्रोथ का संकेत शिकागो यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में पाया गया कि जो लोग असहज और शर्मिंदगी वाले हालात को सीखने का हिस्सा मानते हैं, वे तेजी से आगे बढ़ते हैं। क्रॉफर्ड के मुताबिक, स्टैंडअप कॉमेडी ‘एक्सपोजर थेरेपी’ की तरह है। जब इंसान बार-बार शर्मिंदगी झेलता है, तो डर खत्म होने लगता है। उन्होंने महसूस किया कि लोग उतना ध्यान नहीं देते जितना हम सोचते हैं। यही सोच मानसिक मजबूती देती है। 4. कभी भी शर्मिंदगी से भागना नहीं चाहिए हाल ही में क्रॉफर्ड ने फिर खराब परफॉर्म किया। दर्शक उनके मजाक से जुड़ नहीं पाए। उन्हें बुरा लगा, लेकिन फर्क यह था कि अब वे उस डर से टूटते नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘अब शर्मिंदगी चुभती जरूर है, लेकिन पहले जितनी नहीं। सबसे जरूरी बात यह है कि अब मैं उससे डरता नहीं हूं।’ क्रॉफर्ड की कहानी यही बताती है कि आत्मविश्वास का मतलब डर खत्म होना नहीं, बल्कि डर के बावजूद आगे बढ़ते रहना है।
कार्तिक आर्यन स्टारर स्पोर्ट्स ड्रामा में 'बजरंगी भाईजान' जैसा इमोशन:नकली बर्फबारी के बाद अब असली कश्मीर में शूटिंग करेंगे कबीर खान

कबीर खान अपनी नई फिल्म में फिर फैमिली-इमोशन और चाइल्ड-कनेक्ट वाले जॉनर में लौट रहे हैं। फिल्म में कार्तिक आर्यन मुख्य भूमिका में हैं और कहानी एक बच्चे व एक मैच्योर किरदार के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती है। सूत्रों के मुताबिक, फिल्म का टोन काफी हद तक सलमान खान स्टारर ‘बजरंगी भाईजान’ जैसी भावनात्मक अपील वाला रखा गया है। मेकर्स इसे भारी वीएफएक्स या बड़े सेट्स की बजाय कंटेंट-ड्रिवन फिल्म के तौर पर तैयार कर रहे हैं। फिल्म का बजट भी नियंत्रित रखा गया है। मड आइलैंड में बना कश्मीर, कृत्रिम बर्फबारी भी की गई फिल्म का पहला बड़ा शेड्यूल मुंबई के मड आइलैंड में पूरा किया गया, जहां करीब 15 दिनों तक कश्मीर जैसा सेट तैयार किया गया था। प्रोडक्शन डिजाइन टीम ने वहां कश्मीरी गलियां, बाजार और लोकल मकानों का सेट लगाया। इसी सेट पर पत्थरबाजी और सुरक्षा बलों से जुड़े कुछ अहम सीक्वेंस शूट किए गए। रात के सीन्स के लिए बड़े कृत्रिम चांद और हाई-इंटेंसिटी लाइट्स का इस्तेमाल किया गया ताकि मूनलाइट जैसा प्रभाव मिल सके। मुंबई की गर्मी के बीच सेट पर कृत्रिम बर्फबारी और ठंडा माहौल तैयार करने के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया। कई सीन्स में लोकल कश्मीरी बैकग्राउंड और तनावपूर्ण माहौल को बेहद रियल तरीके से कैद करने की कोशिश की गई है। रियल लोकेशन को भी पूरी प्राथमिकता दे रहे हैं मेकर्स मुंबई शेड्यूल पूरा होने के बाद अब फिल्म की यूनिट असली कश्मीर में शूटिंग कर रही है। टीम बीती 13 तारीख को मुंबई से रवाना हुई थी और 15 तारीख से वहां मुख्य शूट शुरू हो चुका है। यह आउटडोर शेड्यूल करीब 10 दिनों का रखा गया। इसमें फिल्म के इमोशनल हिस्से, ट्रेनिंग मोंटाज और लोकल लोकेशन वाले सीन्स फिल्माए गए। कहानी में कश्मीर का बैकड्रॉप काफी अहम भूमिका निभाता है, इसलिए मेकर्स ने रियल लोकेशंस पर भी शूट को प्राथमिकता दी है। यूनिट घाटी के कम भीड़भाड़ वाले इलाकों और प्राकृतिक लोकेशंस पर शूट कर रही है ताकि विजुअल्स ज्यादा वास्तविक लगें। कुछ सीन्स स्थानीय कलाकारों और वास्तविक माहौल के बीच शूट हो रहे हैं, जिससे कहानी में ग्राउंडेड फील मिले। एप्लॉज और कबीर के जॉइंट वेंचर में बन रही फिल्म शुरुआती दिनों में इस फिल्म के मेकर्स के नामों को लेकर काफी गोपनीयता बरती जा रही थी। क्लैपबोर्ड और फाइलों पर किसी फाइनल टाइटल के बजाय केवल ‘प्रोजेक्ट नंबर’ या ‘प्रोडक्श नं.’ लिखा हुआ था, लेकिन अब यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि इस फिल्म के पीछे समीर नायर की मशहूर और बड़ी कंपनी एप्लॉज एंटरटेनमेंट खड़ी है। कॉर्पोरेट स्तर पर एप्लॉज एंटरटेनमेंट जैसी बड़ी कंपनी का इस फिल्म को लीड करना फिल्म की मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और पोस्ट-प्रोडक्शन के स्केल को बढ़ा रहा है।
Records remained unbroken even with medication, clean athletes won.

Hindi News Sports Records Remained Unbroken Even With Medication, Clean Athletes Won. लास वेगास16 मिनट पहले कॉपी लिंक एनहेंस्ड गेम्स ने दुनिया को जरूर चौंकाया, लेकिन पहले ही आयोजन में यह साफ हो गया कि सिर्फ डोपिंग की छूट देने से इंसान सुपरह्यूमन नहीं बन जाता।- फाइल फोटो अमेरिका के लास वेगास में चमकती रोशनी, तेज संगीत, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भीड़ और करोड़ों रुपए की इनामी राशि। दावा था कि यहां इंसानी शरीर की सीमाएं टूटेंगी और कई वर्ल्ड रिकॉर्ड बनेंगे। लेकिन ‘एनहेंस्ड गेम्स’ का पहला आयोजन फ्लॉप रहा। करीब पांच घंटे तक चली प्रतियोगिता में आखिर तक कोई बड़ा रिकॉर्ड नहीं टूटा। अंतिम इवेंट में ग्रीस के तैराक क्रिस्टियन गकोलोमेव ने 50 मीटर फ्रीस्टाइल रेस 20.81 सेकंड में पूरी की। यह आधिकारिक विश्व रिकॉर्ड से सिर्फ 0.07 सेकंड बेहतर था। हालांकि, यह रिकॉर्ड मान्य नहीं है, क्योंकि उन्होंने प्रतिबंधित ‘स्किनसूट’ पहना था और डोपिंग भी की थी। फिर भी आयोजकों ने इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताकर जश्न मनाया। इन एनहेंस्ड गेम्स का मकसद ही अलग है। यहां खिलाड़ियों को प्रदर्शन बढ़ाने वाली दवाएं लेने की अनुमति दी गई। टेस्टोस्टेरोन, ईपीओ और एनाबॉलिक स्टेरॉयड जैसी प्रतिबंधित चीजें खुले तौर पर इस्तेमाल हुईं। स्टेडियम की बड़ी स्क्रीन पर यह तक दिखाया जा रहा था कि खिलाड़ी कौन-कौन सी दवाएं ले रहे हैं। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह रही कि तीन ऐसे खिलाड़ी भी विजेता बने, जिन्होंने दावा किया कि वे बिना डोपिंग के उतरे थे। अमेरिका के फ्रेड केरली (पेरिस ओलिंपिक के ब्रॉन्ज मेडलिस्ट) ने 100 मीटर दौड़ जीतने के बाद तंज कसते हुए कहा, ‘बाकियों को और मेहनत करनी चाहिए, शायद थोड़ा और ड्रग्स लेना चाहिए।’ वहीं महिलाओं की 100 मीटर रेस जीतने वाली ट्रिस्टन एवलिन ने कहा, ‘यह साबित करता है कि जीत सिर्फ केमिस्ट्री से नहीं मिलती।’ आयोजकों ने रिकॉर्ड टूटने की बड़ी उम्मीदें लगाई थीं, लेकिन ज्यादातर खिलाड़ी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ सीरीज से मशहूर आइसलैंड के स्ट्रॉन्गमैन थॉर ब्योर्नसन 510 किलो डेडलिफ्ट का अपना रिकॉर्ड भी नहीं तोड़ सके। कई वेटलिफ्टर तीन-तीन कोशिशों के बाद भी रिकॉर्ड से दूर रह गए। यहां तक कि जब कनाडा के वेटलिफ्टर बोएडी सैंटावी असफल हो गए तो आयोजकों ने नियम बदलते हुए उन्हें एक अतिरिक्त मौका दे दिया। माहौल किसी पेशेवर टूर्नामेंट से ज्यादा स्कूल स्पोर्ट्स डे जैसा लगने लगा। हालांकि, खिलाड़ियों के लिए इनाम बेहद बड़ा था। ब्रिटेन के तैराक बेन प्राउड ने 50 मीटर बटरफ्लाई जीतकर और एक अन्य रेस में दूसरा स्थान हासिल कर करीब 3.5 करोड़ रुपए कमाए। उन्होंने कहा, ‘जब मैंने इन गेम्स के बारे में सुना तो लगा जैसे लॉटरी लग गई हो।’ एनहेंस्ड गेम्स ने दुनिया को जरूर चौंकाया, लेकिन पहले ही आयोजन में यह साफ हो गया कि सिर्फ डोपिंग की छूट देने से इंसान सुपरह्यूमन नहीं बन जाता। दुनिया का पहला इस तरह का आयोजन यह दुनिया का पहला ऐसा खेल आयोजन है, जहां खिलाड़ियों को प्रतिबंधित दवाएं लेने की अनुमति दी गई। आयोजकों का दावा है कि इससे इंसानी क्षमता की नई सीमाएं सामने आएंगी। हालांकि अंतरराष्ट्रीय खेल संस्थाएं और कई पूर्व खिलाड़ी इसका विरोध कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह खेल भावना और खिलाड़ियों की सेहत दोनों के लिए खतरनाक प्रयोग है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔








