Millions of trees of 800 varieties turn the country pink, a sight that lasts for two weeks.

Hindi News Happylife Millions Of Trees Of 800 Varieties Turn The Country Pink, A Sight That Lasts For Two Weeks. टोक्यो16 मिनट पहले कॉपी लिंक इन फूलों का जीवन मात्र 7 से 14 दिन का ही होता है।- प्रतीकात्मक फोटो जापान में इन दिनों विश्व प्रसिद्ध चेरी ब्लॉसम का सीजन चल रहा है। इससे पूरा देश गुलाबी और सफेद फूलों की चादर से ढक गया है। जापान में चेरी ब्लॉसम की 800 से ज्यादा किस्में पाई जाती हैं, लेकिन यहां के 80 फीसदी पेड़ ‘सोमेई-योषिनो’ प्रजाति के हैं। इनका जीवन मात्र 7 से 14 दिन का ही होता है। इन फूलों को देखने के लिए लाखों लोग देश-विदेश से यहां पहुंचते हैं। इन फूलों को न सिर्फ देखा जाता है, बल्कि इनकी पंखुड़ियों को सुखाकर चाय और मिठाइयों में भी इस्तेमाल किया जाता है। अगले एक हफ्ते तक यह नजारा बना रहेगा, जिसके बाद पंखुड़ियां गिरना शुरू हो जाएंगी। इससे जापान में पर्यटन बढ़ता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को फायदा होता है। चेरी ब्लॉसम देखने के लिए जापान जाने का सबसे अच्छा समय जापान में चेरी के फूल खिलने का मौसम वसंत ऋतु में मार्च से मई तक रहता है। देश के चेरी के पेड़ों को पूरी तरह खिलते हुए देखने का सबसे अच्छा समय आमतौर पर मार्च के अंत से अप्रैल तक होता है, हालांकि, यह आपके घूमने के क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। फुकुओका में, पहला फूल आमतौर पर मार्च के मध्य से अंत तक खिलता है, और मार्च के आखिरी कुछ दिनों से अप्रैल के पहले कुछ दिनों तक यह अपने चरम पर होता है। टोक्यो, क्योटो और ओसाका में, चेरी के पेड़ आमतौर पर मार्च के आखिरी सप्ताह में फूलना शुरू करते हैं और अप्रैल के पहले सप्ताह में पूरी तरह खिल जाते हैं। मौसम के आखिरी चेरी के फूल होक्काइडो जैसे उत्तरी क्षेत्रों में पाए जाते हैं, जो अप्रैल के अंत से मई के शुरुआती दिनों तक खिलते हैं। अंततः, चेरी के फूल कब और कितने समय तक खिलेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है, और पूर्वानुमान तापमान, वर्षा और हवा जैसे कई कारकों से प्रभावित होते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
जापान में क्रिकेट लीग, इंटरनेशनल स्टार्स बिना पैसे लिए खेलेंगे:2 मई से तीन दिन की लीग में खेलेंगे दिमुथ करुणारत्ने, करण केसी और जोश ब्राउन

क्रिकेट का क्रेज अब सिर्फ भारत, ऑस्ट्रेलिया या इंग्लैंड तक सीमित नहीं है। अब ‘उगते सूरज का देश’ यानी जापान भी इस खेल में तेजी से पहचान बना रहा है। जापान प्रीमियर लीग (जेपीएल) नाम का टी20 टूर्नामेंट धीरे-धीरे दुनिया भर के क्रिकेट फैंस और खिलाड़ियों का ध्यान खींच रहा है। इस साल लीग में श्रीलंका के पूर्व कप्तान दिमुथ करुणारत्ने, ऑस्ट्रेलिया के बिग बैश लीग स्टार जोश ब्राउन और नेपाल के ऑलराउंडर करण केसी जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी खेलते नजर आएंगे। आखिर जापान में क्रिकेट का क्या माहौल है और यह लीग कैसे काम करती है? जानते हैं… जापान प्रीमियर लीग के बारे में वो सबकुछ, जो आपके लिए जानना जरूरी है 1. जापान प्रीमियर लीग क्या है और यह कब शुरू हुई? इसकी शुरुआत 2015 में हुई थी। इसमें 4 टीमें (नॉर्थ, साउथ, ईस्ट, वेस्ट कांटो) थीं, जो घरेलू मैदानों पर खेलती थीं। लेकिन दर्शकों की कमी के कारण वह फ्लॉप हो गया। अब मैच सानो इंटरनेशनल ग्राउंड पर होंगे। इसमें पांचवीं टीम ‘कंसाई’ भी जुड़ गई है। टूर्नामेंट 2 से 4 मई तक चलेगा, जिसमें 12 मैच खेले जाएंगे। 2. क्या जापान में क्रिकेट का कोई पुराना इतिहास है? जापान में क्रिकेट 1863 से खेला जा रहा है। 80 के दशक में जापान क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना भी हो गई थी। हालांकि, लंबे इतिहास के बावजूद क्रिकेट वहां मुख्यधारा का खेल नहीं बन पाया है। जापान की अंडर-19 पुरुष टीम ने 2020 और 2026 के वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई किया था। 3. इस लीग में खेलने वाले स्थानीय खिलाड़ी कौन हैं? जापान में क्रिकेटर्स पेशेवर नहीं हैं। वे या तो छात्र हैं या फिर कहीं नौकरी करते हैं। ये खिलाड़ी मैच खेलने के लिए दफ्तरों से सालाना छुट्टियां लेते हैं। उनके लिए क्रिकेट पेशे से ज्यादा एक शौक है। साल की शुरुआत में ट्रायल्स और घरेलू प्रदर्शन के आधार पर इन खिलाड़ियों को 14-सदस्यीय टीम में ड्रॉफ्ट के जरिए चुना जाता है। 4. जब पैसा नहीं मिलता, तो विदेशी क्यों खेलने जाते हैं? फैंस को हाई-क्वालिटी क्रिकेट दिखाने व स्थानीय खिलाड़ियों को एक्सपोजर देने हर टीम में एक विदेशी खिलाड़ी रखा जाता है। इस लीग में विदेशी खिलाड़ियों को खेलने की कोई सैलरी नहीं मिलती। ये खिलाड़ी क्रिकेट के विकास में मदद करने और सद्भावना के तहत यहां खेलने आते हैं। 5. आयोजक दर्शकों को आकर्षित करने के लिए क्या कर रहे हैं? इसका भविष्य क्या है? जापान में सिर्फ क्रिकेट दर्शकों को मैदान तक लाने के लिए काफी नहीं है। इसलिए आयोजक डांस, म्यूजिक, फूड स्टॉल्स, जापानी भाषा में कमेंट्री का सहारा लेते हैं। एसोसिएशन के चीफ ऑपरेशंस ऑफिसर एलन का मानना है कि बिना सैलरी के खिलाड़ियों को बुलाना लंबे समय तक मुमकिन नहीं है। अच्छे स्पॉन्सर और तगड़ी फंडिंग की जरूरत है।
मुनाफे के चक्कर में ग्राहकों को भूली कंपनी:क्राफ्ट हाइंज को तोड़ने के बजाय सुधारेंगे नए सीईओ कैहिलेन; ग्राहकों की सेहत पर जोर

जब स्टीव कैहिलेन को क्राफ्ट हाइंज का सीईओ बनाया गया, तो काम साफ था- कंपनी को दो हिस्सों में तोड़ना। लेकिन महज छह हफ्ते के भीतर उन्होंने वह फैसला पलट दिया। उन्होंने बोर्ड को समझाया, वॉरेन बफे के उत्तराधिकारी ग्रेग एबेल को फोन किया और कहा, ‘यह कंपनी ठीक हो सकती है, तोड़ने की जरूरत नहीं है।’ यह कोई छोटा फैसला नहीं था। लगातार 9 तिमाहियों से घटती बिक्री, शेयर में गिरावट और उपभोक्ताओं का सस्ते ब्रांड्स की तरफ जाना, सब कुछ क्राफ्ट हाइंज के खिलाफ था। ऑस्कर मेयर, फिलाडेल्फिया क्रीच चीज, जेल-ओ, कूल-एड जैसे दशकों पुराने ब्रांड्स की पहचान तो है, लेकिन जैसा कैहिलेन खुद कहते हैं, ‘लोग टी-शर्ट खरीदना चाहते हैं, प्रोडक्ट नहीं। हमें दोनों बिकवाने हैं।’ 60 साल के कैहिलेन फूड इंडस्ट्री के पुराने खिलाड़ी हैं। इससे पहले वो केलॉग कंपनी को दो हिस्सों में बांट चुके थे। स्नैक्स वाला हिस्सा केलानोवा बना और मार्स ने उसे 36 अरब डॉलर (अभी के हिसाब से 3.4 लाख करोड़ रुपए) में खरीद लिया। यानी कंपनी तोड़ने का अनुभव उनके पास था, लेकिन इस बार उन्होंने वो नहीं किया जो उनसे उम्मीद थी। उनका तर्क सीधा था- अगर अभी तोड़ा, तो दोनों हिस्से कमजोर निकलेंगे। पहले कंपनी को मजबूत करो, फिर विकल्प खुले रहेंगे। चुनौतियां कम नहीं हैं। वजन घटाने वाली दवाओं ने लोगों की खाने की आदतें बदल दी हैं। अमेरिका में ‘अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड’ पर राजनैतिक बहस छिड़ी है। ईरान युद्ध से तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जो सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकती हैं। कैहिलेन मानते हैं कि बीते 10 वर्षों में कंपनी ने उपभोक्ताओं को नजरअंदाज किया और सिर्फ मुनाफे पर ध्यान दिया। यही सबसे बड़ी गलती थी। लेकिन कैहिलेन आश्वस्त नजर आते हैं।35,000 कर्मचारियों को नई दिशा दी गई है। रिसर्च टीमें प्रोटीन-रिच विकल्पों पर काम कर रही हैं। आर्टिफिशियल कलर और सामग्री हटाने की प्रक्रिया पहले से चल रही थी। कैहिलेन की मां आयरलैंड से थीं और चार बच्चे पालते हुए कॉलेज की डिग्री ली थी। संभवत: यही जिद्द उन्हें विरासत में मिली है। वॉरेन बफे ने 2015 में हाइंज और क्राफ्ट फूड्स का विलय कराया था क्राफ्ट हाइंज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी फूड एंड बेवरेज कंपनी है। वॉरेन बफे की फर्म बर्कशयर हैथवे और निवेश फर्म 3जी कैपिटल ने 2015 में हाइंज और क्राफ्ट फूड्स का विलय कराया था। कंपनी के पोर्टफोलियो में ऑस्कर मेयर, फिलाडेल्फिया क्रीच चीज, जेल-ओ, कूल-एड, कैप्री सन और हाइंज केचअप समेत दर्जनों ब्रांड हैं। कंपनी के दुनियाभर में 35,000 कर्मचारी हैं और इसका मुख्यालय शिकागो में है। ग्रेज एबेल जो अब बर्कशयर हैथवे के सीईओ हैं, उन्होंने भी कैहिलेन के साथ ही 1 जनवरी को ही नई जिम्मेदारी संभाली है।
तेलंगाना में ‘पैरेंटल सपोर्ट बिल’ पास:मां-बाप को बेसहारा छोड़ा तो कटेगी 15 फीसदी सैलरी; पहली बार विधायक-सांसद भी कानून की जद में

तेलंगाना सरकार बुढ़ापे में माता-पिता को ‘बोझ’ समझने वाले बच्चों पर अब तक की सबसे बड़ी सख्ती करने जा रही है। राज्य विधानसभा ने रविवार को ‘पैरेंटल सपोर्ट बिल, 2026’ सर्वसम्मति से पास कर दिया। इसके तहत, यदि कोई कर्मचारी अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करता, तो उसकी कुल सैलरी में से 15% या ₹10,000 (जो भी कम हो) की कटौती की जाएगी। देश में पहली बार ऐसा कानून बना है जिसमें सरकारी के साथ ही प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों, विधायकों, सांसदों और सरपंचों तक को जवाबदेह बनाया गया है। खास बात यह है कि माता-पिता को इसके लिए कोर्ट नहीं जाना होगा, वे सीधे जिला कलेक्टर के पास आवेदन कर सकेंगे। जांच में शिकायत सही मिलने पर कलेक्टर सीधे कंपनी या विभाग को सैलरी काटकर माता-पिता के खाते में भेजने का आदेश देंगे। विधेयक पेश करते हुए मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी भावुक हो गए। उन्होंने बताया, “मैं एक ऐसे जनप्रतिनिधि को जानता हूं जिसके पिता की कैंसर से मौत हो गई, लेकिन बेटे ने सुध तक नहीं ली। जब माता-पिता की आंखों में आंसू होते हैं, तो वह समाज के पतन का संकेत है। समाज को ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए जो सक्षम होकर भी अपनों को छोड़ देते हैं।” केरल और असम में भी हैं ऐसे कानून केरल (2023) – यहां 25% तक कटौती का प्रावधान है। मुख्य रूप से उन लोगों पर लागू होता है जिन्हें ‘’अनुकंपा नियुक्ति’’ मिली है। असम (2017) – पहला राज्य जिसने ‘’प्रणाम एक्ट’’ लागू किया। सरकारी कर्मचारियों के वेतन से 10 से 15% कटौती का नियम है।
50 साल बाद नासा का चंद्र मिशन:आर्टेमिस-2 मिशन की पहली महिला होंगी क्रिस्टीना; टीम में 4 अंतरिक्ष यात्री

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का आर्टेमिस-2 मिशन चांद की ओर 50 साल बाद पहली मानव यात्रा की तैयारी के अंतिम चरण में पहुंच गया है। चार अंतरिक्ष यात्री फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर पहुंच चुके हैं, जहां से उनका लगभग 10 दिन का मिशन लॉन्च होगा। यह मिशन चांद के चारों ओर उड़ान भरकर पृथ्वी पर लौटेगा और ओरियन यान की क्षमता का परीक्षण करेगा। बता दें कि आर्टेमिस-2 मिशन की लॉन्चिंग 1 अप्रैल के आसपास निर्धारित है, हालांकि अंतिम तारीख तकनीकी तैयारियों पर निर्भर करेगी। रीड वाइजमैन (कमांडर) – 50 वर्षीय पूर्व नेवी पायलट, 165 दिन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर बिता चुके हैं। दो बेटियों के पिता वाइजमैन इस मिशन का नेतृत्व कर रहे हैं। विक्टर ग्लोवर (पायलट) – 49 वर्षीय ग्लोवर पहले ब्लैक अंतरिक्ष यात्री होंगे जो चांद के पास जाएंगे। नेवी के अनुभवी पायलट हैं। क्रिस्टीना कोच (मिशन विशेषज्ञ) – 47 वर्षीय इंजीनियर, 328 दिन अंतरिक्ष में रहने का रिकॉर्ड। चांद के पास जाने वाली पहली महिला होंगी। जेरमी हैनसेन (कनाडा) – 50 वर्षीय फाइटर पायलट, पहली बार अंतरिक्ष यात्रा करेंगे और चांद के लिए जाने वाले पहले गैर-अमेरिकी होंगे।
The return of football’s ‘lost’ generation

Hindi News Sports Veteran Women’s Club: The Return Of Football’s ‘lost’ Generation लंदन29 मिनट पहले कॉपी लिंक फीफा की रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 के बाद से संगठित रूप से फुटबॉल खेलने वाली महिलाओं और लड़कियों की संख्या 24% बढ़कर 1.66 करोड़ के पार पहुंच गई है।- प्रतीकात्मक फोटो मौजूदा दौर में जब लड़कियां टीवी पर महिला वर्ल्ड कप और यूरोपियन चैम्पियनशिप जैसे बड़े फुटबॉल टूर्नामेंट देख रही हैं, तब एक पीढ़ी ऐसी भी है जिसके दिल में एक गहरी टीस है। यह उन महिलाओं की ‘खोई हुई’ पीढ़ी है जो 70, 80 और 90 के दशक में फुटबॉल के जुनून के साथ बड़ी तो हुईं, लेकिन उन्हें खेलने का कोई मंच नहीं मिला। अब जब यही महिलाएं 40 या 50 की उम्र पार कर चुकी हैं, तो वे अपने उस छूटे हुए ख्वाब को फिर से जी रही हैं। भावनाएं इस कदर जुड़ी हैं कि जब एक 46 साल की महिला ने जिंदगी में पहली बार पूरी किट (बूट्स, शिन पैड्स और जर्सी) पहनकर मैदान पर कदम रखा, तो आंखों से आंसू छलक पड़े। फीफा की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2019 के बाद से संगठित रूप से फुटबॉल खेलने वाली महिलाओं और लड़कियों की संख्या 24% बढ़कर 1.66 करोड़ के पार पहुंच गई है। 2027 तक इसे 6 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य है। लेकिन, ग्रासरूट लेवल पर उन महिलाओं की एक बड़ी तादाद है, जिन्हें उनके दौर में सुविधाओं और सामाजिक नजरिए के अभाव में पीछे छोड़ दिया गया था। करीब 40-50 साल पहले, लड़कियों के लिए शौक के तौर पर भी फुटबॉल खेलना एक बड़ा संघर्ष था। जो लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं, उन्हें अक्सर ‘टॉमबॉय’ कहकर चिढ़ाया जाता था। स्कूलों में भी खेल बंटे हुए थे। लड़कियों को नेटबॉल और हॉकी की तरफ भेज दिया जाता था, जबकि फुटबॉल और रग्बी लड़कों के लिए आरक्षित माने जाते थे। महिलाओं की कोई स्थानीय टीम या क्लब नहीं होते थे। ऐसे में लड़कियों को ऊबड़-खाबड़ मैदानों पर लड़कों की टीमों के बीच अपना खेल साबित करना पड़ता था। वर्षों बाद अब यह पीढ़ी अपने उस छूटे हुए खेल को दोबारा गले लगा रही है। इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ‘वेटरन विमंस क्लब’ बन रहे हैं, जहां उम्रदराज महिलाएं प्रतिस्पर्धी फुटबॉल खेल रही हैं। 2015 में कैरल बेट्स ने 25 से 80 साल की महिलाओं के लिए ‘क्रॉली ओल्ड गर्ल्स’ नाम से एक क्लब बनाया। बेट्स खुद उसी पीढ़ी से आती हैं, जिनसे उनका खेल छिन गया था। इसी तर्ज पर जो ट्रेहर्न ने उन महिलाओं के लिए ‘कैंटरबरी ओल्ड बैग्स’ की शुरुआत की, जो जिंदगी के इस पड़ाव पर खेल का हिस्सा बनना चाहती हैं। 35 से 50 साल की उम्र में मैदान पर लौट रहीं इन महिलाओं की कहानियां भावुक करने वाली हैं। इनमें से कई ने बचपन में बिना गोलपोस्ट या बुनियादी सुविधाओं के खेला था। अब जब ये महिलाएं पूरी किट पहनकर मैदान पर उतरती हैं, तो यह उनके लिए सिर्फ एक खेल नहीं रह जाता, बल्कि एक तरह का सशक्तिकरण बन जाता है। जो महिलाएं खेल नहीं पा रही हैं, वे अब लड़कियों की टीमों को कोचिंग देकर अपना सपना पूरा कर रही हैं। यह केवल फुटबॉल की वापसी नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी की जीत है जिसने अपने खेल से कभी हार नहीं मानी। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
150 वर्ष पूर्ण होने पर गौराबाई जैन मंदिर में स्वास्थ्य शिविर

भास्कर संवाददाता | सागर गौराबाई दिगंबर जैन मंदिर के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित त्रिदिवसीय कार्यक्रम के अंतर्गत रविवार को कटरा नमक मंडी स्थित मंदिर परिसर में निशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण एवं परामर्श शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और शहरवासियों ने पहुंचकर स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाया। भाग्योदय तीर्थ चिकित्सालय की विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने विभिन्न रोगों से पीड़ित मरीजों का परीक्षण कर आवश्यक परामर्श प्रदान किया। शिविर में हृदय रोग, डायबिटीज, हड्डी, मुख एवं दंत रोगों से संबंधित मरीजों की जांच और उपचार किया गया। इस दौरान डॉ. मधुर जैन, डॉ. ऋचा गोयल, डॉ. सौरभ जैन चौधरी, डॉ. प्रमोद सिजारिया, डॉ. नितिन जैन, डॉ. अंजली और डॉ. कांची जैन ने अपनी सेवाएं दीं।कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान महावीर स्वामी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ। मुख्य अतिथि विधायक शैलेन्द्र जैन ने शिविर का शुभारंभ करते हुए कहा कि जरूरतमंदों को निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना समाजसेवा का सर्वोत्तम उदाहरण है। जैन समाज सदैव सेवा, त्याग और मानव कल्याण की भावना से प्रेरित होकर कार्य करता रहा है। कार्यक्रम में मंदिर समिति के संतोष जैन घड़ी, राकेश जैन, दिलीप रांधेलीय, डॉ. महेंद्र जैन, डॉ. राजेश जैन, डॉ. ऋषभ जैन, श्रेयांश जैन, देवेंद्र फुसकेले, संजीव जैन, मुकेश जैन सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। संचालन अशोक पिड़रुआ ने किया।
7 अप्रैल से गेहूं की खरीदी, 77337 ने कराया पंजीयन

सागर | जिले में समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी के लिए स्थापित किए गए 176 केंद्रों पर 7 अप्रैल से उपार्जन का काम शुरू हो जाएगा। जिला खाद्य नियंत्रक अधिकारी ज्योति बघेल ने बताया कि गेहूं उपार्जन के लिए जिले के 77 हजार 337 किसानों ने पंजीयन कराया है। इस बार 3 लाख 55 हजार मीट्रिक टन गेहूं खरीदी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह लक्ष्य पिछले वर्ष की अपेक्षा 11 हजार टन अधिक है। किसानों से राज्य सरकार इस बार 2625 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूं खरीदेगी।
गुरकीरत का पार्थिव शरीर 2 को कनाडा से यहां आएगा

उज्जैन | उज्जैन निवासी छात्र गुरकीरत सिंह मनोचा पिता गुरजीत सिंह की कनाडा में 14 मार्च को हत्या के बाद अब पार्थिव शरीर को भारत लाने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जानकारी के अनुसार पार्थिव शरीर 1 अप्रैल 2026 को कनाडा से दिल्ली के लिए रवाना होगा। 2 अप्रैल को अहमदाबाद पहुंचेगा। इसके पश्चात आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर पार्थिव शरीर को उज्जैन लाया जाएगा। गुरकीरत के पिता गुरजीतसिंह मनोचा ने इस कठिन समय में सहयोग प्रदान करने पर कहा है कि सभी के सहयोग से उन्हें अपने पुत्र के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन का अवसर प्राप्त हो सकेगा। कॉलोनी निवासी अभिलाष जैन ने बताया कि सारी प्रक्रिया पूरी हो गई है और 2 अप्रैल को पार्थिव शरीर यहां आने के बाद परिजन, रिश्तेदार अरदास के बाद विधिविधान से अंतिम रस्म पूरी करेंगे।
जेएएच:नई डीआर मशीन आई, अब घंटों नहीं, मिनटों में मिलेगी एक्सरे रिपोर्ट

अंचल के सबसे बड़े अस्पताल जयारोग्य चिकित्सालय में इलाज कराने आने वाले हजारों मरीजों के लिए राहत भरी खबर है। अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग में अत्याधुनिक डीआर (डिजिटल रेडियोग्राफी) एक्सरे मशीन आ गई है।इस मशीन के लिए रूम तैयार होने लगा है। रूम तैयार होते ही ये नहीं डीआर एक्सरे मशीन इंस्टॉल कर दी जाएगी। इस मशीन को मिलाकर अब जेएएच में दो डीआर एक्सरे मशीन हो गई हैं। इस नई मशीन के चालू हो जाने के बाद मरीजों को एक्सरे कराने के लिए घंटों लंबी लाइनों में नहीं लगना पड़ेगा। पुरानी तकनीक की तुलना में यह मशीन न केवल तेज है, बल्कि इसकी इमेज क्वालिटी भी बेहद सटीक है। रोजाना 500 मरीजों का लोड जेएएच से होगा कम वर्तमान में जयारोग्य अस्पताल में रोजाना औसतन 400 से 500 मरीज एक्सरे के लिए पहुंचते हैं। अब तक पुरानी एक्सरे मशीन के साथ एक ही डीआर मशीन होने के कारण मरीजों को घंटों लाइन में लगना पड़ता था। कई बार तकनीकी खराबी के चलते रिपोर्ट मिलने में दो दिन तक का इंतजार करना पड़ता था। इस नई मशीन के बाद जेएएच का लोड आधा हो जाएगा। अब मरीजों को एक्सरे की रिपोर्ट के लाइन में नहीं लगना पड़ेगा। इन मशीन से एक्सरे होने के अगले दो मिनट बाद ही रिपोर्ट मिल जाएगी। सूक्ष्म फ्रैक्चर भी पकड़ सकेगी मशीन: रेडियोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार, इस मशीन की सबसे बड़ी खूबी इसकी सटीक इमेजिंग है। यह इतनी एडवांस है कि हड्डियों में मौजूद बेहद सूक्ष्म फ्रैक्चर भी आसानी से देखे जा सकेंगे। इससे डॉक्टरों को सटीक डायग्नोसिस (निदान) करने में बड़ी मदद मिलेगी। कम रेडिएशन का खतरा, माइनर फ्रैक्चर भी दिखेगा विशेषज्ञों के अनुसार, नई मशीन कम रेडिएशन उत्सर्जित करती है। यह मरीजों के लिए अधिक सुरक्षित है। इसकी इमेज इतनी साफ होती है कि हड्डियों के सूक्ष्म फ्रैक्चर भी पकड़े जा सकेंगे, जिससे डॉक्टरों को सटीक डायग्नोसिस (निदान) करने में मदद मिलेगी। दो मशीनें आई, एक्सरे के लिए वेटिंग भी घट जाएगी जेएएच के लिए अत्याधुनिक डीआर मशीन आ गई है। इस मशीन को लगाने के लिए रूम तैयार हो रहा है। रूम तैयार होते ही मशीन इंस्टॉल कर दी जाएगी। दो मशीन आने से मरीजों को अब एक्सरे के लिए वेट नहीं करना होगा। -डॉ. आरकेएस धाकड़, डीन, जीआरएमसी








