Yorkshire boy Martin drives 1280 km to play cricket

द न्यूयॉर्क टाइम्स8 मिनट पहले कॉपी लिंक मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’- फाइल फोटो कभी इंग्लैंड के लिए फुटबॉल वर्ल्ड कप खेलने वाला एक गोलकीपर अब 59 साल की उम्र में फिर से देश की जर्सी पहनने जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के सामने नहीं, बल्कि क्रिकेट की विकेट के पीछे नजर आएगा। इंग्लैंड के पूर्व गोलकीपर नाइजल मार्टिन की यह कहानी बताती है कि खेल के प्रति जुनून उम्र का मोहताज नहीं होता। मार्टिन ने इंग्लैंड के क्रिस्टल पैलेस, लीड्स यूनाइटेड, एवर्टन जैसे बड़े क्लबों के लिए 666 मैच खेले। 1998 और 2002 फीफा वर्ल्ड कप में इंग्लैंड टीम का हिस्सा रहे और अपने दौर के पहले गोलकीपर बने, जिनकी ट्रांसफर फीस एक मिलियन पाउंड थी। लेकिन फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट उनका पहला प्यार रहा है। कॉर्नवाल के छोटे से शहर सेंट ऑस्टेल में बड़े हुए मार्टिन बचपन से विकेटकीपर बनना चाहते थे। स्कूल में वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के बजाय क्रिकेट की विकेट के पीछे ज्यादा खुश रहते थे। हालांकि फुटबॉल में उनका करियर तेजी से आगे बढ़ा और क्रिकेट पीछे छूट गया। उस समय प्रोफेशनल फुटबॉल क्लब उन्हें क्रिकेट खेलने की इजाजत नहीं देते थे, क्योंकि चोट का खतरा रहता था। 2006 में फुटबॉल से रिटायर होने के बाद मार्टिन की जिंदगी में खालीपन आ गया। टखने में स्ट्रेस फ्रैक्चर के कारण उन्हें लगा था कि शायद अब कभी खेल नहीं पाएंगे। लेकिन कुछ साल बाद जब डॉक्टरों ने फिटनेस की अनुमति दी, तो उन्होंने फिर क्रिकेट का बल्ला और ग्लव्स उठा लिए। धीरे-धीरे वे यॉर्कशायर काउंटी टीम का बड़ा नाम बन गए। अब भी मार्टिन हर हफ्ते सैकड़ों किलोमीटर का सफर सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए करते हैं। वे यॉर्कशायर में क्लब मैच खेलते हैं और फिर करीब 1280 किमी ड्राइव कर कॉर्नवाल की ओवर-50 टीम में खेलने जाते हैं। उनकी मेहनत रंग लाई और अब इंग्लैंड की 60+ क्रिकेट टीम ‘लायंस’ में उनका चयन हो गया है। अगले हफ्ते वे स्कॉटलैंड के खिलाफ डेब्यू कर सकते हैं। उनकी फिटनेस के पीछे बेटी का भी बड़ा हाथ है, जो पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट हैं। क्रिकेट सीजन खत्म होने के बाद जब मार्टिन जिम छोड़ने की बात करते हैं, तो बेटी उन्हें फिर ट्रेनिंग पर भेज देती है। मार्टिन का सपना अब एक और वर्ल्ड कप खेलने का है। इस बार फुटबॉल नहीं, बल्कि सीनियर क्रिकेट वर्ल्ड कप। वे कहते हैं, ‘अगर मौका मिला तो इंग्लैंड के लिए फिर खेलना मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।’ नाइजल मार्टिन की कहानी सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि जुनून, फिटनेस और कभी हार न मानने की मिसाल है। उन्होंने साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान बूढ़ा नहीं होता मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’ वे मानते हैं कि गोलकीपिंग और विकेटकीपिंग में काफी समानता है। दोनों में तेज नजर, हाथों का तालमेल और डाइव लगाने की कला जरूरी होती है। यही वजह है कि फुटबॉल के अनुभव ने उन्हें क्रिकेट में भी मदद की। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
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द न्यूयॉर्क टाइम्स39 मिनट पहले कॉपी लिंक मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’- फाइल फोटो कभी इंग्लैंड के लिए फुटबॉल वर्ल्ड कप खेलने वाला एक गोलकीपर अब 59 साल की उम्र में फिर से देश की जर्सी पहनने जा रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के सामने नहीं, बल्कि क्रिकेट की विकेट के पीछे नजर आएगा। इंग्लैंड के पूर्व गोलकीपर नाइजल मार्टिन की यह कहानी बताती है कि खेल के प्रति जुनून उम्र का मोहताज नहीं होता। मार्टिन ने इंग्लैंड के क्रिस्टल पैलेस, लीड्स यूनाइटेड, एवर्टन जैसे बड़े क्लबों के लिए 666 मैच खेले। 1998 और 2002 फीफा वर्ल्ड कप में इंग्लैंड टीम का हिस्सा रहे और अपने दौर के पहले गोलकीपर बने, जिनकी ट्रांसफर फीस एक मिलियन पाउंड थी। लेकिन फुटबॉल के साथ-साथ क्रिकेट उनका पहला प्यार रहा है। कॉर्नवाल के छोटे से शहर सेंट ऑस्टेल में बड़े हुए मार्टिन बचपन से विकेटकीपर बनना चाहते थे। स्कूल में वह फुटबॉल के गोलपोस्ट के बजाय क्रिकेट की विकेट के पीछे ज्यादा खुश रहते थे। हालांकि फुटबॉल में उनका करियर तेजी से आगे बढ़ा और क्रिकेट पीछे छूट गया। उस समय प्रोफेशनल फुटबॉल क्लब उन्हें क्रिकेट खेलने की इजाजत नहीं देते थे, क्योंकि चोट का खतरा रहता था। 2006 में फुटबॉल से रिटायर होने के बाद मार्टिन की जिंदगी में खालीपन आ गया। टखने में स्ट्रेस फ्रैक्चर के कारण उन्हें लगा था कि शायद अब कभी खेल नहीं पाएंगे। लेकिन कुछ साल बाद जब डॉक्टरों ने फिटनेस की अनुमति दी, तो उन्होंने फिर क्रिकेट का बल्ला और ग्लव्स उठा लिए। धीरे-धीरे वे यॉर्कशायर काउंटी टीम का बड़ा नाम बन गए। अब भी मार्टिन हर हफ्ते सैकड़ों किलोमीटर का सफर सिर्फ क्रिकेट खेलने के लिए करते हैं। वे यॉर्कशायर में क्लब मैच खेलते हैं और फिर करीब 1280 किमी ड्राइव कर कॉर्नवाल की ओवर-50 टीम में खेलने जाते हैं। उनकी मेहनत रंग लाई और अब इंग्लैंड की 60+ क्रिकेट टीम ‘लायंस’ में उनका चयन हो गया है। अगले हफ्ते वे स्कॉटलैंड के खिलाफ डेब्यू कर सकते हैं। उनकी फिटनेस के पीछे बेटी का भी बड़ा हाथ है, जो पेशे से फिजियोथेरेपिस्ट हैं। क्रिकेट सीजन खत्म होने के बाद जब मार्टिन जिम छोड़ने की बात करते हैं, तो बेटी उन्हें फिर ट्रेनिंग पर भेज देती है। मार्टिन का सपना अब एक और वर्ल्ड कप खेलने का है। इस बार फुटबॉल नहीं, बल्कि सीनियर क्रिकेट वर्ल्ड कप। वे कहते हैं, ‘अगर मौका मिला तो इंग्लैंड के लिए फिर खेलना मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।’ नाइजल मार्टिन की कहानी सिर्फ खेल की नहीं, बल्कि जुनून, फिटनेस और कभी हार न मानने की मिसाल है। उन्होंने साबित कर दिया कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान बूढ़ा नहीं होता मार्टिन कहते हैं, ‘उम्र सिर्फ एक नंबर है। खेल के लिए जुनून हो तो इंसान कभी बूढ़ा नहीं होता।’ वे मानते हैं कि गोलकीपिंग और विकेटकीपिंग में काफी समानता है। दोनों में तेज नजर, हाथों का तालमेल और डाइव लगाने की कला जरूरी होती है। यही वजह है कि फुटबॉल के अनुभव ने उन्हें क्रिकेट में भी मदद की। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
मस्क बेच रहे पृथ्वी के बाद की दुनिया का ब्लूप्रिंट:मंगल पर 10 लाख लोगों की बस्ती, चांद पर फैक्ट्री, अंतरिक्ष में डेटासेंटर का प्लान

‘हम नहीं चाहते कि इंसानों का भी वही हश्र हो जो डायनासोर का हुआ था।’ ये किसी साइंस फिक्शन फिल्म का डायलॉग नहीं है। इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने आईपीओ फाइलिंग में ये लिखा है। कंपनी अगले माह अमेरिकी शेयर बाजार में अब तक के सबसे बड़े डेब्यू की तैयारी में है। अमूमन आईपीओ दस्तावेज वित्तीय आंकड़ों से भरे होते हैं। पर, स्पेसएक्स का 300 से ज्यादा पन्नों का दस्तावेज कारोबारी रिपोर्ट से ज्यादा भविष्य की पटकथा जैसा है। यह खुद को ऐसी संस्था के रूप में पेश कर रही है, जो मानव चेतना को सितारों तक पहुंचाना चाहती है। यानी मस्क सिर्फ रॉकेट नहीं, पृथ्वी के बाद की दुनिया का ब्लूप्रिंट बेच रहे हैं। जानें कुछ ऐसे दावे, जिनसे टेक और वित्तीय जगत में हलचल है… – मंगल पर बस्ती कंपनी का सबसे बड़ा सपना मंगल को इंसानों का दूसरा घर बनाना है। फाइलिंग में 63 बार मंगल का जिक्र है। इसे सिर्फ रिसर्च स्टेशन या छोटी कॉलोनी नहीं, बल्कि मानव प्रजाति के बैकअप की तरह तैयार करने का विचार है। ताकि पृथ्वी पर आपदा से सभ्यता खत्म न हो। वहां 10 लाख लोगों को बसाने का लक्ष्य है। फाइलिंग में गुंबदनुमा शहरों, सोलर पैनलों और वहां रहते परिवारों के विजुअल्स भी दिए हैं। मस्क का सपना है कि मंगल पर ऊर्जा जरूरतें वहीं से पूरी हों और बाकी सामान स्टारशिप से पहुंचे। – चांद पर नई अर्थव्यवस्था फाइलिंग में चांद पर मैन्युफैक्चरिंग हब, चांद की अर्थव्यवस्था और क्षुद्रग्रहों पर खनन योजनाओं का जिक्र है। यानी भविष्य में चांद सिर्फ वैज्ञानिक मिशन का ठिकाना नहीं, बल्कि निर्माण, ऊर्जा, खनन और सप्लाई-चेन का केंद्र बन सकता है। – अंतरिक्ष में एआई डेटा सेंटर विज्ञान-कथा जैसा ही सपना है एआई डेटा सेंटर धरती से बाहर ले जाना। कंपनी ने 2028 तक सौर-ऊर्जा संचालित कक्षीय एआई कंप्यूट उपग्रह तैनात करने की बात कही है। अंतरिक्ष की ठंड में बड़े-बड़े डेटा सेंटर सौर ऊर्जा से चलेंगे। धरती पर बिजली-पानी बचेंगे। लक्ष्य 10 लाख तक उपग्रहों वाले डेटा सेंटर सिस्टम का है, जो 500 से 2,000 किमी ऊंचाई पर तैनात होंगे। हर साल 100 गीगावॉट एआई कम्प्यूट क्षमता तैनात करने की योजना है। – पूरा दाव स्टारशिप पर है इन तीनों सपनों की चाबी स्टारशिप है। मंगल पर इंसान भेजना हो, चांद पर कार्गो उतारना हो या अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाना, सबके लिए भारी सामान को बार-बार कम लागत में कक्षा तक पहुंचाना जरूरी है। स्पेसएक्स ने कहा है कि स्टारशिप 2026 की दूसरी छमाही में पेलोड डिलीवरी शुरू कर सकता है। लेकिन यही सबसे बड़ा जोखिम है। अगर स्टारशिप बार-बार प्रयोग लायक और सस्ता नहीं बना तो ये सपने महंगे पोस्टर बनकर रह सकते हैं। एआई से अश्लील सामग्री का खतरा, बढ़ सकते हैं मुकदमे फाइलिंग में कंपनी ने स्वीकार किया कि ग्रोक के स्पाइसी और अनहिंज्ड मोड्स अश्लील सामग्री, गलत सूचना, गैर-सहमति वाली तस्वीरें और भेदभावपूर्ण कंटेंट पैदा कर सकते हैं। इससे नियामकीय जांच और मुकदमों का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही कंपनी ने स्वीकार किया कि ट्विटर का नाम बदलकर एक्स (X) करना बेहद महंगा साबित हुआ। फाइलिंग के अनुसार, नाम बदलने के बाद कंपनी की वैल्यू में 3.71 अरब डॉलर (35,516 करोड़ रुपए) की गिरावट आई।
अमेरिकी हाउसिंग मार्केट में दिलचस्प ट्रेंड:लाइफस्टाइल इकोसिस्टम और जेनरेशनल वेल्थ के लिए प्रॉपर्टी में निवेश कर रहीं महिलाएं

मियामी में 50 करोड़ रुपए का वॉटरफ्रंट अपार्टमेंट हो, न्यूयॉर्क में पेंटहाउस हो या नैशविले में इन्वेस्टमेंट प्रॉपर्टी। अमेरिका के इन टॉप-एंड रियल एस्टेट बाजार में अब एक नया चेहरा दिख रहा है। और यह चेहरा युवा महिलाओं का है। नेशनल एसोसिएशन ऑफ रियल्टर्स के मुताबिक अमेरिका में सिंगल महिला होमबायर्स की हिस्सेदारी 21% है, जबकि सिंगल पुरुष खरीदार महज 9% ही हैं। इतना ही नहीं, सिंगल महिला होमबायर्स में 29 वर्ष की युवतियों की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 35% पहुंच गई है। 2 करोड़ से ज्यादा सिंगल महिलाएं अमेरिका में घर की मालकिन हैं। पुरुषों के मामले में यह संख्या 1.4 करोड़ है। जहां बात 40 करोड़ से ऊपर की प्रॉपर्टी की हो, वहां तस्वीर और भी दिलचस्प है। कोल्डवेल बैंकर की रिपोर्ट कहती है कि 50 लाख डॉलर (करीब ~ 48 करोड़) नेटवर्थ वाली महिलाएं 15% लग्जरी घरों की मालकिन हैं। सिर्फ घर नहीं, पूरे ‘लाइफस्टाइल इकोसिस्टम’ पर बढ़ा फोकस मैनहट्टन में प्राइवेट इक्विटी बैकग्राउंड की जेन शी ने अपनी बिल्डिंग पांच बार विजिट करने के बाद खरीदारी का फैसला किया और वह भी फिनिशिंग देखने नहीं, बल्कि यह जांचने कि रोज की जिंदगी कैसे चलती है। महिलाएं उस ‘इनविजिबल वैल्यू’ को ज्यादा समझती हैं जो अच्छे सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर से आती है। मियामी के फोर सीजन्स प्राइवेट रेसिडेंस (कीमत 50 करोड़ से शुरू) में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर क्रिस्टीन मार्टिनेज डे कास्त्रो कहती हैं, ‘अगर वाइफ को फोर सीजन्स पसंद आ गया, तो बस। फिर कोई बातचीत नहीं होती। ’नंबरों में देखिए महिलाओं की बढ़ती ताकत कैटेगरी – आंकड़ा अमेरिका में सिंगल महिला होमबायर्स – 21% सिंगल पुरुष होमबायर्स – 9% घर की मालकिन सिंगल महिलाएं – 2 करोड़+ घर के मालिक सिंगल पुरुष – 1.4 करोड़ 42 करोड़+नेटवर्थ महिलाओं का लग्जरी होम शेयर – 15% अमीर महिला खरीदार क्या चाहती हैं ? फुल-सर्विस बिल्डिंग – बटलर, कंसियर्ज, हाउसकीपिंग वेलनेस अमेनिटी – स्पा, पूल, योगा सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर – कम्युनिटी स्पेस, एंटरटेनिंग एरिया लॉन्ग-टर्म वैल्यू – जेनरेशनल वेल्थ की सोच प्राइवेसी, सिक्योरिटी – 24/7 सुरक्षा, मैनेज्ड इकोसिस्टम
अमेरिकी हाउसिंग मार्केट में दिलचस्प ट्रेंड:लाइफस्टाइल इकोसिस्टम और जेनरेशनल वेल्थ के लिए प्रॉपर्टी में निवेश कर रहीं महिलाएं

मियामी में 50 करोड़ रुपए का वॉटरफ्रंट अपार्टमेंट हो, न्यूयॉर्क में पेंटहाउस हो या नैशविले में इन्वेस्टमेंट प्रॉपर्टी। अमेरिका के इन टॉप-एंड रियल एस्टेट बाजार में अब एक नया चेहरा दिख रहा है। और यह चेहरा युवा महिलाओं का है। नेशनल एसोसिएशन ऑफ रियल्टर्स के मुताबिक अमेरिका में सिंगल महिला होमबायर्स की हिस्सेदारी 21% है, जबकि सिंगल पुरुष खरीदार महज 9% ही हैं। इतना ही नहीं, सिंगल महिला होमबायर्स में 29 वर्ष की युवतियों की हिस्सेदारी रिकॉर्ड 35% पहुंच गई है। 2 करोड़ से ज्यादा सिंगल महिलाएं अमेरिका में घर की मालकिन हैं। पुरुषों के मामले में यह संख्या 1.4 करोड़ है। जहां बात 40 करोड़ से ऊपर की प्रॉपर्टी की हो, वहां तस्वीर और भी दिलचस्प है। कोल्डवेल बैंकर की रिपोर्ट कहती है कि 50 लाख डॉलर (करीब ~ 48 करोड़) नेटवर्थ वाली महिलाएं 15% लग्जरी घरों की मालकिन हैं। सिर्फ घर नहीं, पूरे ‘लाइफस्टाइल इकोसिस्टम’ पर बढ़ा फोकस मैनहट्टन में प्राइवेट इक्विटी बैकग्राउंड की जेन शी ने अपनी बिल्डिंग पांच बार विजिट करने के बाद खरीदारी का फैसला किया और वह भी फिनिशिंग देखने नहीं, बल्कि यह जांचने कि रोज की जिंदगी कैसे चलती है। महिलाएं उस ‘इनविजिबल वैल्यू’ को ज्यादा समझती हैं जो अच्छे सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर से आती है। मियामी के फोर सीजन्स प्राइवेट रेसिडेंस (कीमत 50 करोड़ से शुरू) में चीफ मार्केटिंग ऑफिसर क्रिस्टीन मार्टिनेज डे कास्त्रो कहती हैं, ‘अगर वाइफ को फोर सीजन्स पसंद आ गया, तो बस। फिर कोई बातचीत नहीं होती। ’नंबरों में देखिए महिलाओं की बढ़ती ताकत कैटेगरी – आंकड़ा अमेरिका में सिंगल महिला होमबायर्स – 21% सिंगल पुरुष होमबायर्स – 9% घर की मालकिन सिंगल महिलाएं – 2 करोड़+ घर के मालिक सिंगल पुरुष – 1.4 करोड़ 42 करोड़+नेटवर्थ महिलाओं का लग्जरी होम शेयर – 15% अमीर महिला खरीदार क्या चाहती हैं ? फुल-सर्विस बिल्डिंग – बटलर, कंसियर्ज, हाउसकीपिंग वेलनेस अमेनिटी – स्पा, पूल, योगा सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर – कम्युनिटी स्पेस, एंटरटेनिंग एरिया लॉन्ग-टर्म वैल्यू – जेनरेशनल वेल्थ की सोच प्राइवेसी, सिक्योरिटी – 24/7 सुरक्षा, मैनेज्ड इकोसिस्टम
Break down big goals into smaller parts to achieve success.

रस्टिन डॉड. द न्यूयॉर्क टाइम्स4 मिनट पहले कॉपी लिंक बास्केटबॉल टीम के कोच डस्टी मे मानते हैं कि जब आप खुद अपनी छोटी-छोटी प्रोग्रेस को स्वीकार करते हैं, तो सेल्फ बिलीफ मजबूत होता है।- फाइल फोटो खिलाड़ी अक्सर किसी बड़े टूर्नामेंट की तैयारी या मुश्किल ट्रेनिंग सेशन शुरू करने से पहले मोटिवेशन का इंतजार करते हैं। लेकिन, खेल और मनोविज्ञान के शोधकर्ता कार्ल हेंड्रिक का शोध इस पारंपरिक सोच को खारिज करता है। हेंड्रिक के अनुसार, किसी खिलाड़ी को सफल होने के लिए काम शुरू करने से पहले मोटिवेट होना बिल्कुल जरूरी नहीं है। इसके उलट, जब आप मैदान पर उतरकर पसीना बहाते हैं और कोई छोटी सी सफलता हासिल करते हैं, तो असली मोटिवेशन वहीं से जन्म लेता है। 1. छोटे लक्ष्य पाने से दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है एक खिलाड़ी के तौर पर यह सोचना कि ‘मुझे सीधे चैम्पियनशिप जीतनी है’, कई बार मानसिक दबाव बढ़ा देता है। इस विशाल लक्ष्य को हफ्तों, दिनों और घंटों के छोटे-छोटे ट्रेनिंग सेशन में बांट लें। जब आप दिनभर की कड़ी ट्रेनिंग के बाद एक छोटा सा टारगेट हासिल कर लेते हैं, तो आपके दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। यही आपको अगले दिन वापसी करने की ऊर्जा देता है। 2. कंफर्ट जोन से बाहर आएं, इससे आत्मविश्वास बढ़ेगा प्रैक्टिस का स्तर हमेशा ऐसा होना चाहिए, जो कंफर्ट जोन से बाहर धकेले। चुनौती ऐसी हो जिससे गेम में कुछ नया जोड़ सकें, लेकिन यह इतनी भी कठिन न हो कि आप चोटिल हो जाएं। जब आप अपनी क्षमता से थोड़ा ऊपर उठकर किसी चुनौती को पार करते हैं, तो आत्मविश्वास कई गुना बढ़ जाता है। बड़े मैचों में दबाव झेलने की मानसिक मजबूती इसी प्रोसेस से आती है। 3. सिर्फ स्कोर बोर्ड या मेडल टैली पर फोकस नहीं हो पूरा फोकस सिर्फ स्कोरबोर्ड या मेडल टैली पर नहीं होना चाहिए। कई बार नतीजे तुरंत नहीं मिलते। ऐसे में अगर किसी बड़ी कमजोरी को सुधारने के लिए पसीना बहा रहे हैं, तो उस प्रयास पर गर्व करना सीखें। अमेरिका की मशहूर मिशिगन बास्केटबॉल टीम के कोच डस्टी मे मानते हैं कि जब आप खुद अपनी छोटी-छोटी प्रोग्रेस को स्वीकार करते हैं, तो सेल्फ बिलीफ मजबूत होता है। 4. अपने प्रदर्शन का खुद फीडबैक लें, आकलन करें ट्रेनिंग पूरी होने पर खिलाड़ी को खुद का आकलन करना चाहिए। आपको यह समझना होगा कि आपने जो नया शॉट या टेक्निक सीखी है, वह मैच के दौरान पूरे गेम को किस तरह से फायदा पहुंचाएगी। जब आपको यह स्पष्ट हो जाता है कि नेट पर बिताया गया एक घंटा आपके मौजूदा खेल को कितना अच्छा बना रहा है, तो आपके अंदर और बेहतर करने की भूख जागती है। 5. ‘परफेक्ट डे’ की प्रतीक्षा न करें, तुरंत मैदान पर उतरें यदि आप प्रैक्टिस शुरू करने के लिए मोटिवेशन या किसी ‘परफेक्ट डे’ का इंतजार कर रहे हैं, तो आप केवल अपना समय और टैलेंट बर्बाद कर रहे हैं। एक्शन हमेशा मोटिवेशन से पहले आता है। जैसे ही आप पहला कदम उठाएंगे, आपके शरीर और दिमाग की वही लय आपके अंदर आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति को अपने-आप जगा देगी। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल फिर चर्चा में:बिना सुनवाई के 600 लोगों को मौत की सजा दी, गोली मारते खुद ही देखते थे

अमेरिकी कोर्ट में हत्या और अमेरिकी नागरिकों की जान लेने की साजिश रचने का गंभीर मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो फिर चर्चा में हैं। जुलाई 1953 से जनवरी 1959 तक चले क्यूबा में क्रांतिकारी आंदोलन में तीसरा सबसे बड़ा चेहरा रहे राउल बड़े भाई फिदेल कास्त्रो की योजनाओं के मुख्य शिल्पकार माने जाते हैं। 1959 में जैसे ही कास्त्रो भाइयों ने क्यूबा की सत्ता संभाली, उन्होंने बतिस्ता सरकार के पूर्व अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और जासूसों पर मुकदमे चलाए। ‘ला काबाना’ किले के प्रभारी के रूप में राउल ने बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के, 500-600 लोगों को मौत के घाट उतारने के आदेश दिए। वे फायरिंग स्क्वॉड द्वारा लोगों को गोली मारते देखते थे। 2008 से 2018 तक क्यूबा के राष्ट्रपति रहे राउल की पहचान क्रूर नेता की है। रक्षा मंत्री के रूप में विरोधियों का सफाया किया 1960 के दशक में जब क्यूबा में क्रांति के बाद विरोधियों पर कार्रवाई शुरू हुई, तब फायरिंग स्क्वॉड और सैन्य ट्रायल की पूरी व्यवस्था रक्षा मंत्री के रूप में राउल ने ही की थी। जून 1958 में बतिस्ता की सेना को रोकने के लिए अमेरिकी नौसेना के जवानों समेत 50 नागरिकों को बंधक बना लिया था। 1960-70 के दशक में हजारों लोगों को बिना निष्पक्ष सुनवाई जेलों और श्रम शिविरों में भेजा गया। पूर्व सीआईए विश्लेषक ब्रायन कहते हैं कि फिदेल सार्वजनिक मंच से भाषण देते थे, लेकिन आदेशों को लागू कराने वाला दिमाग राउल का था। बचपन में राउल को स्कूल में शिक्षक ने किसी बात पर थप्पड़ मार दिया, तो उसे धक्का देकर गिरा दिया और बच्चों को उस शिक्षक के खिलाफ इकट्ठा कर लिया। इसके लिए उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल से पिता को नोटिस भेजा गया कि ये लड़का नहीं सुधरेगा। 6 की उम्र में तानाशाह को अपनी शर्त पर झुकाया था 1938 में क्यूबा के तानाशाह बतिस्ता ने एक सैनिक स्कूल का दौरा किया। तब 6 वर्षीय राउल को स्वागत भाषण देना था। राउल ने भाषण पढ़ने के बजाय निडरता से शर्त रखी कि पहले उसके शिक्षक को पदोन्नत कर ‘लेफ्टिनेंट’ बनाया जाए। इसके 20 साल बाद (1959 में) राउल ने अपने भाई फिदेल के साथ मिलकर उसी बतिस्ता को सत्ता से बेदखल कर दिया। दुनिया के किसी भी देश के सबसे लंबे समय (लगभग 49 साल) तक रक्षा मंत्री रहे राउल ने होटल, पर्यटन, बंदरगाह और विदेशी मुद्रा से जुड़ा 60% से अधिक कारोबार सैन्य कंपनियों को सौंप दिया था।
क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल फिर चर्चा में:बिना सुनवाई के 600 लोगों को मौत की सजा दी, गोली मारते खुद ही देखते थे

अमेरिकी कोर्ट में हत्या और अमेरिकी नागरिकों की जान लेने की साजिश रचने का गंभीर मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो फिर चर्चा में हैं। जुलाई 1953 से जनवरी 1959 तक चले क्यूबा में क्रांतिकारी आंदोलन में तीसरा सबसे बड़ा चेहरा रहे राउल बड़े भाई फिदेल कास्त्रो की योजनाओं के मुख्य शिल्पकार माने जाते हैं। 1959 में जैसे ही कास्त्रो भाइयों ने क्यूबा की सत्ता संभाली, उन्होंने बतिस्ता सरकार के पूर्व अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और जासूसों पर मुकदमे चलाए। ‘ला काबाना’ किले के प्रभारी के रूप में राउल ने बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के, 500-600 लोगों को मौत के घाट उतारने के आदेश दिए। वे फायरिंग स्क्वॉड द्वारा लोगों को गोली मारते देखते थे। 2008 से 2018 तक क्यूबा के राष्ट्रपति रहे राउल की पहचान क्रूर नेता की है। रक्षा मंत्री के रूप में विरोधियों का सफाया किया 1960 के दशक में जब क्यूबा में क्रांति के बाद विरोधियों पर कार्रवाई शुरू हुई, तब फायरिंग स्क्वॉड और सैन्य ट्रायल की पूरी व्यवस्था रक्षा मंत्री के रूप में राउल ने ही की थी। जून 1958 में बतिस्ता की सेना को रोकने के लिए अमेरिकी नौसेना के जवानों समेत 50 नागरिकों को बंधक बना लिया था। 1960-70 के दशक में हजारों लोगों को बिना निष्पक्ष सुनवाई जेलों और श्रम शिविरों में भेजा गया। पूर्व सीआईए विश्लेषक ब्रायन कहते हैं कि फिदेल सार्वजनिक मंच से भाषण देते थे, लेकिन आदेशों को लागू कराने वाला दिमाग राउल का था। बचपन में राउल को स्कूल में शिक्षक ने किसी बात पर थप्पड़ मार दिया, तो उसे धक्का देकर गिरा दिया और बच्चों को उस शिक्षक के खिलाफ इकट्ठा कर लिया। इसके लिए उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। स्कूल से पिता को नोटिस भेजा गया कि ये लड़का नहीं सुधरेगा। 6 की उम्र में तानाशाह को अपनी शर्त पर झुकाया था 1938 में क्यूबा के तानाशाह बतिस्ता ने एक सैनिक स्कूल का दौरा किया। तब 6 वर्षीय राउल को स्वागत भाषण देना था। राउल ने भाषण पढ़ने के बजाय निडरता से शर्त रखी कि पहले उसके शिक्षक को पदोन्नत कर ‘लेफ्टिनेंट’ बनाया जाए। इसके 20 साल बाद (1959 में) राउल ने अपने भाई फिदेल के साथ मिलकर उसी बतिस्ता को सत्ता से बेदखल कर दिया। दुनिया के किसी भी देश के सबसे लंबे समय (लगभग 49 साल) तक रक्षा मंत्री रहे राउल ने होटल, पर्यटन, बंदरगाह और विदेशी मुद्रा से जुड़ा 60% से अधिक कारोबार सैन्य कंपनियों को सौंप दिया था।
अमेरिकी विश्वविद्यालय मानक कड़े करेगा, 3 साल बाद समीक्षा:हार्वर्ड में 20% छात्रों को ही ‘ए’ ग्रेड; तर्क- सब टॉपर तो असाधारण प्रतिभा पहचानना मुश्किल

हर माता-पिता और छात्र का सपना होता है- परीक्षा में अच्छे अंक। लेकिन, दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने एक ऐतिहासिक फैसले में अंडरग्रेजुएट कोर्सों में ‘ए’ ग्रेड सीमित कर दिए हैं। 2027 से किसी भी क्लास में 20% छात्रों को ही ‘ए’ ग्रेड मिलेगा। इसके पक्ष में 458 फैकल्टी मेंबर्स ने वोट दिया, जबकि 201 विरोध में थे। तर्क है कि ग्रेड इन्फ्लेशन के कारण अंक असली क्षमता की पहचान का भरोसेमंद पैमाना नहीं रहे। सबका ‘ए’ ग्रेड होगा तो असाधारण प्रतिभा कैसे पहचानेंगे? दरअसल, हार्वर्ड में 2005 में करीब 24% छात्र ग्रेड ‘ए’ कैटेगरी में थे। 2025 में ये आंकड़ा 60% से ऊपर चला गया। पिछले अकादमिक सत्र में उच्चतम जीपीए पुरस्कार के लिए 55 छात्र बराबरी पर थे। यानी इतने ‘टॉपर’ थे कि ‘असली टॉपर’ की पहचान मुश्किल हो गई। येल में ‘ए’ और ‘ए माइनस’ ग्रेड 80% तक पहुंच गए। ब्राउन यूनिवर्सिटी में दो तिहाई छात्र ‘ए’ ग्रेड में थे। यानी ‘असाधारण’ धीरे-धीरे सामान्य होता गया। पिछले दो दशकों में विश्वविद्यालयों पर दबाव बढ़ा है कि छात्र खुश रहें, ताकि कोर्स इवैल्यूएशन अच्छे आएं और संस्थान प्रतियोगिता में न पिछड़े। ऐसे में, ग्रेडिंग लगातार नरम होती गई। हार्वर्ड के मनोवैज्ञानिक स्टीवन पिंकर कहते हैं कि ग्रेड इन्फ्लेशन ने विश्वविद्यालयों को मजाक बना दिया। प्रोफेसर दबाव में थे कि मानक ढीले नहीं रखे तो छात्र उनके कोर्सों से दूर हो जाएंगे। वहीं, हार्वर्ड के अर्थशास्त्री जेसन फर्मन और डेविड लैब्सन कहते हैं, ‘ज्यादातर शिक्षक सख्त ग्रेडिंग चाहते थे, पर अकेले ऐसा करने से डरते थे। छात्रों के खराब फीडबैक, कम नामांकन से उनके कॅरिअर पर असर पड़ सकता था। इसलिए पूरी फैकल्टी ने नियम बनाया।’ उनके मुताबिक, आसान ‘ए’ ग्रेड्स सीखने की प्रेरणा घटाते हैं। जब अंक तालिका छात्रों की मेधावी क्षमता में फर्क बताना बंद कर दे तो नियोक्ता रसूख और इंटर्नशिप जैसे कारकों पर ध्यान देते हैं। इससे मेरिट के बजाय विशेषाधिकार को लाभ मिलता है। एआई से औसत काम भी ‘परफेक्ट’ लग सकता है। शिक्षकों का तर्क है कि अगर विश्वविद्यालय असली प्रवीणता, मौलिकता और विश्लेषणात्मक सोच की पहचान नहीं कर पाएगा तो उसकी डिग्री पर भरोसा कमजोर होगा। दिलचस्प ये है कि प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी ने 2000 के दशक में ऐसी ही पॉलिसी लागू की थी, लेकिन छात्रों और फैकल्टी के दबाव में 2014 में हटानी पड़ी थी। हार्वर्ड में भी छात्र इस फैसले से खुश नहीं हैं। एक सर्वे में 94% छात्रों ने विरोध जताया। छात्रों की दलील है कि सीमित ‘ए’ ग्रेड्स प्रतिस्पर्धा को जहरीला बना देंगे। कम ग्रेड के जोखिम के बीच छात्र कठिन विषय लेने से बचेंगे। हार्वर्ड तीन साल बाद इस नीति की समीक्षा करेगा। ग्रेड इन्फ्लेशन, नौकरी में मार्कशीट को तवज्जो नहीं जॉब मार्केट में ग्रेड इन्फ्लेशन का असर दिख रहा है। प्लॉस वन के अध्ययन के मुताबिक ऊंचे ग्रेड से जीपीए की ‘सिग्नलिंग वैल्यू’ कमजोर हो रही है। नियोक्ता समझ नहीं पाते कि छात्र ने वाकई महारत हासिल की है या आसान ग्रेडिंग का लाभ मिला है। कंपनियां मार्कशीट से आगे स्किल देख रही हैं। एनएसीई के सर्वे के मुताबिक, 90% नियोक्ता समस्या समाधान की योग्यता और 80% टीमवर्क के प्रमाण चाहते हैं।
अमेरिकी विश्वविद्यालय मानक कड़े करेगा, 3 साल बाद समीक्षा:हार्वर्ड में 20% छात्रों को ही ‘ए’ ग्रेड; तर्क- सब टॉपर तो असाधारण प्रतिभा पहचानना मुश्किल

हर माता-पिता और छात्र का सपना होता है- परीक्षा में अच्छे अंक। लेकिन, दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने एक ऐतिहासिक फैसले में अंडरग्रेजुएट कोर्सों में ‘ए’ ग्रेड सीमित कर दिए हैं। 2027 से किसी भी क्लास में 20% छात्रों को ही ‘ए’ ग्रेड मिलेगा। इसके पक्ष में 458 फैकल्टी मेंबर्स ने वोट दिया, जबकि 201 विरोध में थे। तर्क है कि ग्रेड इन्फ्लेशन के कारण अंक असली क्षमता की पहचान का भरोसेमंद पैमाना नहीं रहे। सबका ‘ए’ ग्रेड होगा तो असाधारण प्रतिभा कैसे पहचानेंगे? दरअसल, हार्वर्ड में 2005 में करीब 24% छात्र ग्रेड ‘ए’ कैटेगरी में थे। 2025 में ये आंकड़ा 60% से ऊपर चला गया। पिछले अकादमिक सत्र में उच्चतम जीपीए पुरस्कार के लिए 55 छात्र बराबरी पर थे। यानी इतने ‘टॉपर’ थे कि ‘असली टॉपर’ की पहचान मुश्किल हो गई। येल में ‘ए’ और ‘ए माइनस’ ग्रेड 80% तक पहुंच गए। ब्राउन यूनिवर्सिटी में दो तिहाई छात्र ‘ए’ ग्रेड में थे। यानी ‘असाधारण’ धीरे-धीरे सामान्य होता गया। पिछले दो दशकों में विश्वविद्यालयों पर दबाव बढ़ा है कि छात्र खुश रहें, ताकि कोर्स इवैल्यूएशन अच्छे आएं और संस्थान प्रतियोगिता में न पिछड़े। ऐसे में, ग्रेडिंग लगातार नरम होती गई। हार्वर्ड के मनोवैज्ञानिक स्टीवन पिंकर कहते हैं कि ग्रेड इन्फ्लेशन ने विश्वविद्यालयों को मजाक बना दिया। प्रोफेसर दबाव में थे कि मानक ढीले नहीं रखे तो छात्र उनके कोर्सों से दूर हो जाएंगे। वहीं, हार्वर्ड के अर्थशास्त्री जेसन फर्मन और डेविड लैब्सन कहते हैं, ‘ज्यादातर शिक्षक सख्त ग्रेडिंग चाहते थे, पर अकेले ऐसा करने से डरते थे। छात्रों के खराब फीडबैक, कम नामांकन से उनके कॅरिअर पर असर पड़ सकता था। इसलिए पूरी फैकल्टी ने नियम बनाया।’ उनके मुताबिक, आसान ‘ए’ ग्रेड्स सीखने की प्रेरणा घटाते हैं। जब अंक तालिका छात्रों की मेधावी क्षमता में फर्क बताना बंद कर दे तो नियोक्ता रसूख और इंटर्नशिप जैसे कारकों पर ध्यान देते हैं। इससे मेरिट के बजाय विशेषाधिकार को लाभ मिलता है। एआई से औसत काम भी ‘परफेक्ट’ लग सकता है। शिक्षकों का तर्क है कि अगर विश्वविद्यालय असली प्रवीणता, मौलिकता और विश्लेषणात्मक सोच की पहचान नहीं कर पाएगा तो उसकी डिग्री पर भरोसा कमजोर होगा। दिलचस्प ये है कि प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी ने 2000 के दशक में ऐसी ही पॉलिसी लागू की थी, लेकिन छात्रों और फैकल्टी के दबाव में 2014 में हटानी पड़ी थी। हार्वर्ड में भी छात्र इस फैसले से खुश नहीं हैं। एक सर्वे में 94% छात्रों ने विरोध जताया। छात्रों की दलील है कि सीमित ‘ए’ ग्रेड्स प्रतिस्पर्धा को जहरीला बना देंगे। कम ग्रेड के जोखिम के बीच छात्र कठिन विषय लेने से बचेंगे। हार्वर्ड तीन साल बाद इस नीति की समीक्षा करेगा। ग्रेड इन्फ्लेशन, नौकरी में मार्कशीट को तवज्जो नहीं जॉब मार्केट में ग्रेड इन्फ्लेशन का असर दिख रहा है। प्लॉस वन के अध्ययन के मुताबिक ऊंचे ग्रेड से जीपीए की ‘सिग्नलिंग वैल्यू’ कमजोर हो रही है। नियोक्ता समझ नहीं पाते कि छात्र ने वाकई महारत हासिल की है या आसान ग्रेडिंग का लाभ मिला है। कंपनियां मार्कशीट से आगे स्किल देख रही हैं। एनएसीई के सर्वे के मुताबिक, 90% नियोक्ता समस्या समाधान की योग्यता और 80% टीमवर्क के प्रमाण चाहते हैं।








