SBI YONO App Message Scam Alert Advisory Explained; How to Spot

Hindi News Lifestyle SBI YONO App Message Scam Alert Advisory Explained; How To Spot | Prevention Tips 17 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक हाल ही में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने एक फिशिंग स्कैम को लेकर अलर्ट जारी किया है। इसमें स्कैमर्स ग्राहकों को फर्जी मैसेज भेजकर डराते हैं कि ‘आधार अपडेट न होने पर’ उनका SBI YONO अकाउंट ब्लाॅक कर दिया जाएगा। ऐसे मैसेज लोगों में घबराहट पैदा करते हैं, जिससे वे बिना सोचे-समझे ठग की बात मान लेते हैं और फ्रॉड का शिकार हो जाते हैं। इस स्कैम से बचने के लिए SBI ने अपने ‘एक्स’ हैंडल पर एडवाइजरी जारी की है। ‘साइबर लिटरेसी’ कॉलम में आज हम SBI ‘YONO’ एप से जुड़े इस स्कैम को समझेंगे। साथ ही जानेंगे कि- स्कैमर SBI ग्राहकों को कैसे निशाना बना रहे हैं? इस स्कैम से बचने के लिए क्या सावधानियां बरतें? एक्सपर्ट: राहुल मिश्रा, साइबर सिक्योरिटी एडवाइजर, उत्तर प्रदेश पुलिस सवाल- एसबीआई के ‘YONO’ एप से जुड़ा स्कैम क्या है? जवाब- यह एक फिशिंग स्कैम है, जिसमें साइबर ठग SBI ग्राहकों को फर्जी मैसेज भेजते हैं। इसमें लिखा होता है- जरूरी सूचना, प्रिय SBI ग्राहक, आपको सूचित किया जाता है कि आपका SBI YONO अकाउंट आज रात ब्लॉक कर दिया जाएगा, क्योंकि आपके अकाउंट में आधार नंबर अपडेट नहीं है।इस असुविधा के लिए हमें खेद है। आपसे अनुरोध है कि कृपया हमारा आधिकारिक SBI आधार अपडेट APK इंस्टॉल करें और तुरंत अपना आधार अपडेट कर आगे की KYC प्रक्रिया पूरी करें। धन्यवाद,SBI बैंक ये मैसेज अंग्रेजी में लिखा होता है। मैसेज के साथ ‘SBI KYC AADHAR UPDATE’ नाम से एक APK फाइल होती है, जिसे डाउनलोड करने को कहा जाता है। जैसे ही यूजर इसे डाउनलोड करता है या जानकारी भरता है, ठग फोन हैक कर लेते हैं और पैसे ऐंठ लेते हैं। सवाल- स्कैमर SBI के ग्राहकों को कैसे निशाना बना रहे हैं? जवाब- साइबर क्रिमिनल्स डर और जल्दबाजी का माहौल बनाकर SBI ग्राहकों को झांसे में लेते हैं। स्कैम का जाल ग्राफिक में देखिए- सवाल- इस स्कैम के जरिए ठग क्या नुकसान पहुंचा सकते हैं? जवाब- ठग ग्राहक की पर्सनल और बैंकिंग डिटेल्स चुराकर कई तरह से नुकसान पहुंचा सकते हैं। जैसेकि- बैंक अकाउंट से पैसा निकाल सकते हैं। फोन का रिमोट एक्सेस ले सकते हैं। OTP, PIN और पासवर्ड चोरी कर सकते हैं। पर्सनल डेटा और डॉक्यूमेंट्स चुरा सकते हैं। नेट बैंकिंग/UPI का मिसयूज कर सकते हैं। यूजर के नाम से फर्जी लोन ले सकते हैं। फोन में सेव कॉन्टैक्ट्स (रिलेटिव्स और दोस्त) को ब्लैकमेल कर सकते हैं। सवाल- लाेग किन गलतियों के कारण स्कैमर्स के जाल में फंस जाते हैं? जवाब- लोग मैसेज देखने के बाद जल्दबाजी और हड़बड़ाहट में कुछ गलतियां करते हैं, जिससे वह स्कैमर्स के जाल में फंस जाते हैं। जैसेकि- बिना सोचे-समझे मैसेज पर भरोसा करना। मैसेज सोर्स वेरिफाई न करना। डर या दबाव में आकर एक्शन लेना। अनजान लिंक पर क्लिक करना। APK फाइल डाउनलोड करना। OTP, PIN और बैंक डिटेल्स शेयर करना। अनजान एप को गैरजरूरी परमिशन देना। सवाल- SBI ने अपने ग्राहकों को सावधान करने के लिए जारी एडवाइजरी में क्या कहा है? जवाब- SBI ने एडवाइजरी में ग्राहकों को फर्जी मैसेज से सावधान रहने की सलाह दी है- ‘आपका YONO एप आधार अपडेट न होने पर बंद हो जाएगा।’ ऐसे फर्जी मैसेज के झांसे में न आएं। अनजान लिंक या ईमेल, SMS, वॉट्सएप से आए APK फाइल डाउनलोड न करें। सतर्क रहें, सुरक्षित रहें। YONO एप सिर्फ ऑफिशियल एप स्टोर या SBI की वेबसाइट से ही डाउनलोड करें। फ्रॉड की स्थिति में तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in पर शिकायत करें। सवाल- इस एडवाइजरी के मुताबिक आपको क्या करना है? जवाब- बैंक से जुड़े कामों के सही और गलत तरीके नीचे पॉइंटर्स से समझिए- मोबाइल बैंकिंग एप डाउनलोड करना गलत- अनजान लिंक या APK से डाउनलोड करना। सही- सिर्फ ऑफिशियल एप स्टोर या वेबसाइट से डाउनलोड करें। अपना अकाउंट लॉगिन करना गलत- फर्जी एप में लॉगिन करना। पिन शेयर करना। पब्लिक वाईफाई से लॉगिन करना। सही- ऑफिशियल एप या वेबसाइट पर ही लॉगिन करें। पिन किसी से शेयर न करें। बैलेंस चेक करना गलत- थर्ड-पार्टी एप या अनजान वेबसाइट पर डिटेल डालना। सही- बैंक एप, ATM या ऑफिशियल USSD/मिस्ड कॉल सर्विस इस्तेमाल करें। पैसे ट्रांसफर करना गलत- जल्दबाजी में बिना जांचे पैसे भेजना। ‘रिवॉर्ड/कैशबैक’ के लालच में पैसे ट्रांसफर करना। सही- पैसे भेजने से पहले रिसीवर का नाम और नंबर वेरिफाई करें। सिर्फ ऑफिशियल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें। UPI लिंक करना गलत- अनजान एप या लिंक पर UPI एक्टिवेट करना। सही- सिर्फ बैंक एप/ऑफिशियल UPI एप में ही लिंक करें। OTP/MPIN इस्तेमाल करना गलत- कॉल/मैसेज पर OTP बताना। स्क्रीन शेयर करके OTP दिखाना। सही- OTP/MPIN पूरी तरह गोपनीय रखें। खुद ही एंटर करें, किसी से शेयर न करें। बैंकिंग रिलेटेड नोटिफिकेशंस चेक करना (SMS/वॉट्सएप/ईमेल) गलत- ‘अकाउंट बंद हो जाएगा’ जैसे डराने वाले मैसेज पर क्लिक करना। सही- मैसेज भेजने वाले का सोर्स चेक करें। संदिग्ध मैसेज को इग्नोर/रिपोर्ट करें। KYC अपडेट करना गलत- कॉल/लिंक के जरिए KYC अपडेट करना। किसी को डॉक्यूमेंट/OTP शेयर करना। सही- सिर्फ बैंक की ऑफिशियल वेबसाइट/ब्रांच पर ही KYC अपडेट करें। बैंक से जुड़ी कॉल रिसीव करना गलत- कॉल पर OTP, PIN, CVV शेयर करना। दबाव में आना। सही- कॉलर की पहचान वेरिफाई करें। शक होने पर रिपोर्ट करें। टिकट बुकिंग, शॉपिंग गलत- फेक ऑफर या बहुत सस्ते डील पर तुरंत पेमेंट करना। अनजान साइट पर कार्ड डिटेल डालना। सही- सिर्फ आधिकारिक वेबसाइट/एप का इस्तेमाल करें। ट्रांजैक्शन अलर्ट देखना गलत- अलर्ट को नजरअंदाज करना। देर से शिकायत करना। सही- हर SMS/ईमेल अलर्ट तुरंत चेक करें। अनजान ट्रांजैक्शन पर बैंक को तुरंत सूचित करें। सवाल- फर्जी मैसेज, एप और लिंक की पहचान कैसे करें? जवाब- फर्जी मैसेज, एप और लिंक आजकल साइबर ठगी का सबसे कॉमन तरीके हैं। इनकी पहचान के लिए कुछ संकेत याद रखें। ग्राफिक में देखिए- सवाल- इस स्कैम से बचने के लिए क्या सावधानियां बरतें? जवाब- इसके लिए कुछ बुनियादी सावधानियां अपनाएं। इन्हें ग्राफिक में देखिए- सवाल- SBI का आधिकाारिक एप क्या है? इसे कैसे डाउनलोड करें? जवाब- SBI का आधिकारिक एप ‘YONO SBI’ है। यह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का ऑफिशियल मोबाइल बैंकिंग एप है, जिससे आप
Mumbai Watermelon Death Mystery; Summer Food Poisoning Symptoms Health Risks Explained

Hindi News Lifestyle Mumbai Watermelon Death Mystery; Summer Food Poisoning Symptoms Health Risks Explained 17 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक 25 अप्रैल को मुंबई में एक परिवार के चार लोगों की डायरिया और उल्टी के कारण मौत हो गई। पूरे परिवार ने डिनर के बाद देर रात तरबूज खाया था। अटॉप्सी रिपोर्ट में फूड पॉइजनिंग की पुष्टि हुई है। एक हफ्ते पहले, गुजरात के दाहोद में एक शादी समारोह में खाने के बाद 400 से ज्यादा लोग बीमार पड़ गए। इन्हें उल्टी- दस्त होने लगे। कई लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ‘अमेरिकन सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ (CDC) के अनुसार, गर्मियों में फूड पॉइजनिंग के मामले ज्यादा सामने आते हैं। इसलिए आज जरूरत की खबर में जानेंगे कि- गर्मियों में फूड पॉइजनिंग क्यों होती है? क्या यह संक्रामक भी हो सकती है? इसके लक्षण क्या हैं? एक्सपर्ट: डॉ. अली शेर, सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, दिल्ली सवाल- फूड पॉइजनिंग क्या होती है? जवाब- यह खराब या संक्रमित भोजन से होने वाली बीमारी है। इसमें उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार जैसे लक्षण दिखते हैं। सवाल- फूड पॉइजनिंग क्यों होती है? जवाब- फूड पॉइजनिंग की मुख्य वजह खराब या दूषित भोजन है। गर्मियों में भोजन में जर्म्स या टॉक्सिन्स जल्दी पैदा हो जाते हैं। यह खराब फूड हैंडलिंग और हाइजीन की कमी के कारण होता है। अधपका या बासी खाना खाने से बैक्टीरिया बढ़ जाते हैं। गंदे हाथ, बर्तन या किचन से खाना दूषित हो सकता है। कच्चे और पके भोजन को साथ रखने (क्रॉस-कंटैमिनेशन) से जर्म्स फैलते हैं। दूषित पानी या खुला स्ट्रीट फूड भी वजह है। आमतौर पर फूड पॉइजनिंग इन कीटाणुओं के कारण होती है– बैक्टीरिया साल्मोनेला (Salmonella) ई. कोलाई (E. coli) वायरस नोरोवायरस (Norovirus) हेपेटाइटिस A पैरासाइट जियार्डिया (Giardia) क्रिप्टोस्पोरिडियम (Cryptosporidium) टॉक्सिन्स स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus) क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम (Clostridium botulinum) सवाल- गर्मी के मौसम में फूड पॉइजनिंग के केस क्यों बढ़ जाते हैं? जवाब- गर्मी के मौसम में तापमान और नमी (ह्यूमिडिटी) बढ़ जाती है, जो बैक्टीरिया पनपने और बढ़ने के लिए एकदम अनुकूल है। 4°C से 60°C के बीच का तापमान ‘डेंजर जोन’ होता है, जिसमें जर्म्स तेजी से बढ़ते हैं। इस दौरान साल्मोनेला, ई. कोलाई और स्टैफिलोकोकस जैसे बैक्टीरिया जल्दी फैलते हैं। इससे गर्मियों में खाना जल्दी खराब हो जाता है। यही कारण है कि इस मौसम में फूड पॉइजनिंग के मामले ज्यादा आते हैं। सवाल- क्या फूड पॉइजनिंग संक्रामक भी हो सकती है? जवाब- फूड पॉइजनिंग सीधे तौर पर संक्रामक बीमारी नहीं है। अगर इसकी वजह टॉक्सिन्स हैं, तो ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता। अगर कारण बैक्टीरिया या वायरस हैं तो ये फैल सकते हैं। गंदे हाथ, संक्रमित भोजन या पानी से बैक्टीरिया दूसरों के शरीर में भी जा सकते हैं। खासकर नोरोवायरस जैसे वायरस तेजी से फैल सकते हैं। इसलिए साफ-सफाई रखना और हाथ धोना जरूरी है। सवाल- फूड पॉइजनिंग और फूड इन्फेक्शन में क्या फर्क है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझते हैं- फूड पॉइजनिंग भोजन में पनपे टॉक्सिन शरीर में जाकर इन्फेक्शन पैदा करते हैं। टॉक्सिन सीधे पाचन तंत्र को प्रभावित करते हैं। आमतौर पर कुछ घंटों के भीतर ही लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसके मुख्य लक्षण उल्टी, मतली, पेट दर्द और दस्त हैं। फूड इन्फेक्शन भोजन के साथ जीवित बैक्टीरिया, वायरस शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। ये जर्म्स शरीर के अंदर बढ़ते हैं और संक्रमण पैदा करते हैं। आमतौर पर 12-48 घंटे या उससे अधिक समय बाद लक्षण दिखाई देते हैं। इसके मुख्य लक्षण दस्त, पेट दर्द, बुखार और कमजोरी है। सवाल- फूड पॉइजनिंग के लक्षण क्या होते हैं? जवाब- फूड पॉइजनिंग होने पर पाचन तंत्र से जुड़े लक्षण दिखते हैं। ग्राफिक में देखिए- सवाल- क्या खाने से फूड पॉइजनिंग का रिस्क सबसे ज्यादा होता है? जवाब- कुछ फूड्स में बैक्टीरिया जल्दी पनपते हैं। इसलिए इनसे फूड पॉइजनिंग का रिस्क ज्यादा होता है। नीचे पॉइंटर्स में देखिए– कच्चे या अधपके मांस और अंडे में बैक्टीरिया हो सकते हैं। अनपॉश्चराइज्ड दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स से भी जोखिम होता है। कटे हुए फल-सब्जियां और स्ट्रीट फूड जल्दी दूषित हो सकते हैं। बासी या लंबे समय तक बाहर रखा खाना भी खतरनाक होता है। दूषित पानी और बर्फ भी बड़ी वजह हैं। ग्राफिक में सभी फूड्स की लिस्ट देखिए- सवाल- अगर फूड पॉइजनिंग हो जाए तो सबसे पहले क्या घरेलू उपाय करने चाहिए? जवाब- फूड पॉइजनिंग होने पर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो सकती है। इसलिए बॉडी को हाइड्रेटेड रखना जरूरी है। साथ ही डाइजेशन को आराम देने वाली चीजें खाएं। सभी उपाय ग्राफिक में देखिए- सवाल- फूड पॉइजनिंग होने पर क्या खाएं और क्या बिल्कुल न खाएं? जवाब- फूड पॉइजनिंग के दौरान ऐसी चीजें खानी चाहिए, जो पेट पर ज्यादा दबाव न डालें और आसानी से पच जाएं। ग्राफिक में देखते हैं, क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए- सवाल- फूड पॉइजनिंग से बचाव के लिए क्या सावधानियां बरतनी चाहिए? जवाब- थोड़ी सी सावधानी और हाइजीन अपनाकर इससे आसानी से बचा जा सकता है। ग्राफिक्स में देखिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए- सवाल– क्या फूड पॉइजनिंग जानलेवा भी हो सकती है? जवाब- ज्यादातर मामलों में फूड पॉइजनिंग कुछ घंटों या कुछ दिनों में ठीक हो जाती है। हालांकि संक्रमण गंभीर होने पर यह खतरनाक भी हो सकती है। सवाल– फूड पॉइजनिंग होने पर कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है? जवाब- अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें या ज्यादा गंभीर हो जाएं, तो तुरंत डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए। पॉइंटर्स से समझते हैं कौन से लक्षण गंभीर हो सकते हैं- लगातार उल्टी या दस्त। तेज बुखार। चक्कर, कमजोरी और मुंह सूखना। मल में खून आना। छोटे बच्चे, बुजुर्ग या गर्भवती महिला में लक्षण गंभीर होने का इंतजार न करें, उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाएं। …………………… ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- फर्मेंटेड फूड खाने से बच्ची की मौत:गर्मियों में ओवर फर्मेंटेशन से इन हेल्थ प्रॉब्लम्स का रिस्क, बरतें 5 सावधानियां ओडिशा के मयूरभंज जिले के एक सरकारी स्कूल में फर्मेंटेड चावल खाने के बाद एक 12 साल की बच्ची की मौत हो गई। वहीं 150 से ज्यादा बच्चे बीमार पड़ गए। बच्चों ने पखाला भात (फर्मेंटेड चावल), आलू भरता और आम की चटनी खाई थी। पूरी खबर पढ़ें…
Mushroom Supplements Explained; Types Benefits & Side Effects

Hindi News Lifestyle Mushroom Supplements Explained; Types Benefits & Side Effects | Lion’s Mane Reishi 12 मिनट पहलेलेखक: गौरव तिवारी कॉपी लिंक हेल्थ और फिटनेस की दुनिया में इन दिनों एक नया ट्रेंड पॉपुलर हो रहा है- ‘मशरूम सप्लीमेंट।’ सोशल मीडिया से लेकर जिम तक, हर जगह इसके फायदों की चर्चा हो रही है। कोई इसे इम्यूनिटी बूस्टर बता रहा है तो कोई ब्रेन फंक्शन और एनर्जी के लिए गेम-चेंजर। सवाल ये है कि क्या ये सच में इतना असरदार है या सिर्फ एक ट्रेंड है? एक्सपर्ट्स इस बारे में क्या कह रहे हैं? ऐसे सभी सवालों के जवाब जानना जरूरी है, ताकि आप सेहत के लिए सही और सुरक्षित फैसला ले सकें। इसलिए ‘जरूरत की खबर’ में आज मशरूम सप्लीमेंट की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- ये खाने वाले मशरूम से कैसे अलग है? इसके हेल्थ बेनिफिट्स क्या हैं? इसके साइड इफेक्ट्स क्या हैं? ये सारे फैक्ट साइंटिफिकली साबित हुए हैं या नहीं। एक्सपर्ट: डॉ. अनु अग्रवाल, सीनियर क्लीनिकल डाइटीशियन, फाउंडर- ‘वनडाइटटुडे’ सवाल- मशरूम सप्लीमेंट क्या है? जवाब- ये एक ऐसा न्यूट्रिशनल प्रोडक्ट है, जो मशरूम की मेडिसिनल प्रॉपर्टीज से बनाया जाता है। इसके कई प्रकार हैं- रीशी (Reishi)- इम्यूनिटी बढ़ाने और तनाव कम करने के लिए। लायन्स मेन (Lion’s Mane)- ब्रेन और याददाश्त के लिए। कॉर्डिसेप्स (Cordyceps)- एनर्जी और स्टैमिना बढ़ाने के लिए। चागा (Chaga)- एंटीऑक्सिडेंट्स के लिए। शिटाके (Shiitake)- हार्ट हेल्थ और इम्यून सिस्टम के लिए। सवाल- ये खाने वाले मशरूम से कैसे अलग है? जवाब- मशरूम सप्लीमेंट और खाने वाले मशरूम (एडिबल मशरूम), दोनों एक ही सोर्स से आते हैं, लेकिन इनका उपयोग, प्रोसेसिंग और असर अलग होते हैं। 1. उद्देश्य खाने वाले मशरूम: जैसे बटन मशरूम। इसकी सब्जी बनती है। मशरूम सप्लीमेंट: इम्यूनिटी, ब्रेन, एनर्जी जैसे हेल्थ बेनिफिट्स के लिए लिया जाता है। 2. बनाने का तरीका खाने वाले मशरूम: सीधे उगाकर-पकाकर खाया जाता है। मशरूम सप्लीमेंट: मशरूम को सुखाकर, पीसकर या उसका एक्सट्रैक्ट निकालकर कैप्सूल/पाउडर में बदला जाता है। 3. न्यूट्रिएंट्स खाने वाले मशरूम: सामान्य न्यूट्रिशन (प्रोटीन, फाइबर, विटामिन) देता है। मशरूम सप्लीमेंट: इसमें बीटा-ग्लूकन्स जैसे खास एक्टिव कंपाउंड्स होते हैं। 4. असर खाने वाले मशरूम: धीरे-धीरे हेल्थ को सपोर्ट करता है। मशरूम सप्लीमेंट: याददाश्त, इम्यूनिटी, एनर्जी जैसे स्पेसिफिक गोल के लिए बनाया जाता है। सवाल- मशरूम सप्लीमेंट अभी ट्रेंड में क्यों है? भारत में इसका मार्केट कितना बड़ा है? जवाब- मशरूम एक ‘सुपरफूड’ है। इसलिए इससे बने सप्लीमेंट्स लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। इसके कई कारण हैं- मशरूम सप्लीमेंट को कॉग्निटिव हेल्थ और स्ट्रेस कंट्रोल से जोड़ा जा रहा है। केमिकल सप्लीमेंट्स की जगह लोग नेचुरल और आयुर्वेदिक विकल्प अपना रहे हैं। मशरूम को ‘एडाप्टोजेन’ माना जाता है। यानी ये शरीर को परिस्थिति के मुताबिक ढलने के लिए तैयार करता है। कोविड के बाद इम्यूनिटी पर फोकस बढ़ा है, जिससे फिटनेस फ्रीक लोगों के बीच मशरूम सप्लीमेंट्स तेजी से पॉपुलर हुए हैं। भारत में मशरूम सप्लीमेंट का मार्केट मार्केट रिसर्च और कंसल्टिंग कंपनी ‘ग्रांड व्यू रिसर्च’ के मुताबिक, भारत में साल 2023 में मशरूम सप्लीमेंट्स का मार्केट लगभग 5,800 करोड़ रुपए था। इसके साल 2030 तक बढ़कर 11,800 करोड़ रुपए होने की संभावना है। यह लगभग हर साल 10-11% ग्रोथ कर रहा है। सवाल- मशरूम सप्लीमेंट्स किस-किस फॉर्म में आते हैं? जवाब- मशरूम सप्लीमेंट्स कई फॉर्म में बाजार में उपलब्ध हैं- कैप्सूल टैबलेट पाउडर लिक्विड एक्सट्रैक्ट/टिंचर मशरूम कॉफी/टी गमीज रेडी-टू-ड्रिंक/शॉट्स प्रोटीन बार्स चॉकलेट स्नैक्स सवाल- मशरूम सप्लीमेंट्स दावा करते हैं कि ये इम्यूनिटी और ब्रेन के लिए अच्छे हैं। क्या ये दावे साइंटिफिकली प्रूवेन हैं? जवाब- आइए देखते हैं साइंस इस बारे में क्या कहता है- ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में साल 2024 में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, कुछ मशरूम में बीटा-ग्लूकन नाम के कंपाउंड होते हैं। ये इम्यून सेल्स को एक्टिवेट कर सकते हैं। लैब और एनिमल स्टडीज में पॉजिटिव असर भी दिखा है। इंसानों पर रिसर्च- क्लिनिकल ट्रायल्स में पता चला है कि- ‘रीशी’ मशरूम इम्यून रिस्पॉन्स को मॉड्यूलेट कर सकता है। ‘शिटाके’ मशरूम इंफ्लेमेशन कम करने में मदद कर सकता है। स्टडी की लिमिटेशंस स्टडीज का सैंपल साइज छोटा है। लॉन्ग-टर्म इंपैक्ट स्पष्ट नहीं है। सभी ब्रांड्स में एक्टिव कंपाउंड एक जैसे नहीं होते हैं। मशरूम सप्लीमेंट्स से इम्यूनिटी बूस्ट हो सकती है, लेकिन इसे स्ट्रॉन्गली प्रूवेन नहीं कहा जा सकता है। ब्रेन हेल्थ और मेमोरी का दावा कितना सच? ‘लायन्स मेन’ में हेरिसेनोन्स, एरिनासिन्स कंपाउंड्स होते हैं। ये नर्व ग्रोथ फैक्टर (NGF) को स्टिमुलेट कर सकते हैं। स्टडी क्या कहती है? इंसानों पर हुई कुछ स्टडीज में हल्का कॉग्निटिव इम्प्रूवमेंट देखा गया है। एनिमल स्टडीज में मेमोरी और न्यूरॉन ग्रोथ बेहतर हुआ। स्टडी की लिमिटेशन स्टडीज बहुत लिमिटेड हैं। अल्जाइमर्स या डिमेंशिया पर स्ट्रॉन्ग एविडेंस नहीं हैं। निष्कर्ष इसके रिजल्ट ब्रेन हेल्थ के लिए प्रॉमिसिंग हैं, लेकिन अभी क्लिनिकली प्रूवेन नहीं हैं। सवाल- अब तक की साइंस स्टडीज के मुताबिक मशरूम सप्लीमेंट्स के हेल्थ बेनिफिट्स क्या हैं? जवाब- न्यूट्रिशन साइंस इसके कई फायदे बताता है। सभी फायदे ग्राफिक में देखें- सवाल- क्या मशरूम सप्लीमेंट्स का कोई साइड इफेक्ट भी है? जवाब- मशरूम सप्लीमेंट्स आमतौर पर नेचुरल होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इनके कोई साइड इफेक्ट नहीं होते। अब तक की स्टडीज में कुछ संभावित साइड इफेक्ट्स देखे गए हैं- सवाल- क्या ये सप्लीमेंट अन्य दवाओं के साथ रिएक्ट करते हैं? जवाब- हां, मशरूम सप्लीमेंट्स कुछ दवाओं के साथ रिएक्ट कर सकते हैं। यह हर व्यक्ति में नहीं होता, लेकिन साइंस और क्लिनिकल रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ कॉम्बिनेशन में सावधानी जरूरी है। जैसेकि- ब्लड थिनर दवाओं के साथ। डायबिटीज की दवाओं के साथ। ब्लड प्रेशर की दवाओं के साथ। इम्यूनोसप्रेसेंट दवाओं के साथ। सेडेटिव और स्लीप मेडिसिन के साथ। कीमोथेरेपी या कैंसर ड्रग के साथ। सवाल- क्या मशरूम सप्लीमेंट्स FDA और FSSAI से रेगुलेटेड हैं? जवाब- हां, मशरूम सप्लीमेंट्स FDA (फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) और FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) दोनों के तहत कुछ हद तक रेगुलेटेड हैं। लेकिन ये फूड सप्लीमेंट्स हैं, इसलिए पूरी तरह टेस्टेड और अप्रूव्ड नहीं होते हैं। इसे खरीदते समय खुद स्मार्ट रहना जरूरी है। सवाल- असली मशरूम खाना ज्यादा फायदेमंद है या उसका सप्लीमेंट लेना? जवाब- खाने वाले मशरूम ज्यादा बेहतर और सुरक्षित विकल्प हैं, लेकिन कुछ खास स्थितियों में सप्लीमेंट भी काम आ
Deepika Padukone Success Story Explained; Om Shanti Om | Movies List

सादगी, स्टाइल और स्टारडम की असली मिसाल दीपिका पादुकोण। दीपिका पादुकोण ने 2007 में फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से डेब्यू कर स्टारडम हासिल किया, लेकिन उन्हें आलोचना और तानों का सामना करना पड़ा। उनकी डायलॉग डिलीवरी और एक्सेंट का मजाक उड़ाया गया, जिससे वह मानसिक रूप से टूटने लगीं। करियर के पीक पर होने के बावजूद 2014 . उन्होंने थैरेपी और आत्मविश्वास के सहारे खुद को संभाला। इस दौर के बाद ‘कॉकटेल’, ‘ये जवानी है दीवानी’, ‘पद्मावत’ और ‘पठान’ से उन्होंने टॉप एक्ट्रेसेस में जगह बनाई। आज दीपिका की नेटवर्थ ₹500 करोड़ से ज्यादा ज्यादा है। आज की सक्सेस स्टोरी में दीपिका पादुकोण के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें जानते हैं। मॉडलिंग करियर के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ दी दीपिका पादुकोण का जन्म 5 जनवरी 1986 को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में हुआ था। उनके पिता प्रकाश पादुकोण मशहूर बैडमिंटन खिलाड़ी हैं। बचपन में उनका परिवार बेंगलुरु शिफ्ट हो गया। उन्होंने स्कूली पढ़ाई सोफिया हाई स्कूल से की और आगे माउंट कार्मेल कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन मॉडलिंग करियर के चलते पढ़ाई छोड़ दी। दीपिका के माता-पिता काम के सिलसिले में कोपेनहेगन में थे, इसलिए उनका जन्म वहीं हुआ। मॉडलिंग में एंट्री और पहला ब्रेक दीपिका शुरुआत में अपने पिता की तरह बैडमिंटन खिलाड़ी बनना चाहती थीं, लेकिन टीनेज में उनका झुकाव मॉडलिंग की ओर हो गया। उन्होंने छोटे प्रोजेक्ट्स से शुरुआत की और पहचान बनाई। उन्हें बड़ा ब्रेक तब मिला जब उन्होंने ज्वेलरी ब्रांड तनिष्क के लिए मॉडलिंग की। इसके बाद लैक्मे फैशन वीक में रैंप वॉक किया, जिससे वह इंडस्ट्री में नोटिस हुईं। सूटकेस साथ कैब में ही सो जाती थीं मॉडलिंग के दौरान मुंबई आने पर दीपिका को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। दीपिका कहती हैं- मैं एक नए शहर में अकेले आई थी। मेरे पास सिर्फ मेरा बैग था, और मैं उसे लेकर इधर-उधर भटकती रहती थी। मैं देर रात तक काम करती थी और सूटकेस लेकर कैब में हर जगह जाती थी। कई बार मैं उसी कैब में सो जाती थी। कन्नड़ फिल्म ऐश्वर्या में दीपिका पादुकोण ने उपेंद्र के ओपॉजित काम किया था। कन्नड़ फिल्म से एक्टिंग डेब्यू मॉडलिंग में सफलता के बाद दीपिका को फिल्म का ऑफर मिला। उन्होंने 2006 में कन्नड़ फिल्म ‘ऐश्वर्या’ से एक्टिंग करियर शुरू किया। यह फिल्म बड़ी हिट नहीं रही, लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ने फिल्ममेकर्स का ध्यान खींचा। बॉलीवुड में एंट्री और चुनौतियां मॉडलिंग के दौरान दीपिका पादुकोण ने हिमेश रेशमिया के म्यूजिक वीडियो ‘नाम है तेरा’ में काम किया था। इसी से उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और कॉन्फिडेंस ने डायरेक्टर फराह खान का ध्यान खींचा। फराह खान नई और फ्रेश फेस की तलाश में थीं। उन्हें लगा कि 70 के दशक की अभिनेत्री शांति प्रिया के किरदार के लिए दीपिका फिट हैं। इसके बाद उनका ऑडिशन हुआ और उन्हें फिल्म के लिए फाइनल किया गया। डायलॉग डिलीवरी और एक्टिंग स्किल्स पर सवाल उठे शाहरुख खान के साथ उनकी बॉलीवुड डेब्यू फिल्म ‘ओम शांति ओम’ बनी, जो 2007 की बड़ी हिट फिल्मों में रही और दीपिका स्टार बन गईं। इस दौरान उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके एक्सेंट और डायलॉग डिलीवरी का मजाक उड़ाया गया, एक्टिंग स्किल्स पर सवाल उठे और आउटसाइडर होने का दबाव बना रहा। दीपिका पादुकोण ने इंडिया टीवी को दिए इंटरव्यू में बताया था- जब मेरी फिल्म ‘ओम शांति ओम’ रिलीज हुई, तो मेरे एक्सेंट और डिक्शन को लेकर लोगों ने काफी मजाक उड़ाया। यह मेरे लिए बहुत हर्टफुल था, और उस वक्त ऐसी बातें सुनना आसान नहीं था। कई रिव्यूज में मेरी एक्टिंग, एक्सेंट और टैलेंट तक पर सवाल उठाए गए। मुझे ट्रोल भी किया गया, और इससे मैं मानसिक रूप से काफी परेशान हो गई थी। निगेटिविटी को खुद पर हावी नहीं होने दिया दीपिका बताती हैं- उस समय मुझे लगा था कि लोग मेरी परफॉर्मेंस से खुश नहीं हैं या मुझे राइट ऑफ कर दिया गया था। मैं टूट सकती थी, निराश हो सकती थी, या कह सकती थी कि अब मैं यह नहीं कर सकती। लेकिन मैंने उस निगेटिविटी को खुद पर हावी नहीं होने दिया। एक खराब रिव्यू ने मुझे खुद पर काम करने के लिए प्रेरित किया। मैं मानती हूं कि निगेटिविटी भी अच्छी हो सकती है- यह इस पर निर्भर करता है कि आप उसे कैसे लेते हैं। मुश्किल दौर से निकलकर इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाई ‘ओम शांति ओम’ के बाद दीपिका पादुकोण ने ‘बचना ऐ हसीनों’, ‘चांदनी चौक टू चाइना’, ‘लव आजकल’, ‘कार्तिक कॉलिंग कार्तिक’, ‘हाउसफुल’, ‘लफंगे परिंदे’, ‘ब्रेक के बाद’, ‘खेले हम जी जान से’, ‘आरक्षण’ और ‘देसी बॉयज’ जैसी फिल्में कीं। इनमें ‘लव आजकल’, ‘हाउसफुल’ और ‘बचना ऐ हसीनों ’हिट रहीं, बाकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रहीं। 2012 में रिलीज फिल्म ‘कॉकटेल’ को उनके करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जाता है। इसमें उनके वेरोनिका डी’कोस्टा किरदार को सराहा गया था और उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामांकन मिला था। इसके बाद ‘ये जवानी है दीवानी’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘गोलियों की रासलीला- रामलीला’ जैसी हिट फिल्में देकर उन्होंने खुद को टॉप एक्ट्रेस के रूप में स्थापित किया। करियर के पीक पर टूटीं, डिप्रेशन ने घेरा करियर के पीक समय पर दीपिका पादुकोण 2014 के आसपास डिप्रेशन से जूझ रही थीं। वो अंदर से टूट चुकी थीं। केबीसी में दीपिका ने कहा था- मैं अपने करियर के पीक पर थी, सब कुछ बाहर से बिल्कुल परफेक्ट लग रहा था, तब एक सुबह मुझे अचानक बहुत अजीब सा एहसास हुआ। कुछ दिनों में मुझे समझ आया कि मैं डिप्रेशन में हूं। अकेलेपन में जंग, किसी से नहीं कही बात मैंने किसी को नहीं बताया। मैं अकेली मुंबई में रहती थी और अंदर ही अंदर टूट रही थी। कई दिनों तक मैं रोती रहती थी, मुझे जीने का मन नहीं करता था और सब कुछ खाली लगने लगा था। मैं किसी से बात नहीं करती थी। मां के सामने टूटा सब्र, शुरू हुई पहचान जब मेरी मां मुंबई आईं और वापस जाने लगीं, तो मैं खुद को रोक नहीं पाई और उनके सामने रो पड़ी। तब उन्हें समझ आया कि कुछ गलत हो रहा है। इसके बाद मुझे पता चला कि यह डिप्रेशन है और मैंने
EHS Sleep Disorder; Exploding Head Syndrome Symptoms Reason Treatment Explained

Hindi News Lifestyle EHS Sleep Disorder; Exploding Head Syndrome Symptoms Reason Treatment Explained 52 मिनट पहलेलेखक: गौरव तिवारी कॉपी लिंक कभी-कभी सोते वक्त या नींद से ठीक पहले अचानक तेज धमाके जैसी आवाज सुनाई देती है। पल भर के लिए ऐसा लगता है, जैसे कोई बम फट गया हो, दरवाजा जोर से बंद हुआ हो या बिजली गिरी हो। डर से नींद टूट जाती है और हार्ट बीट बढ़ जाती है। यह एक ‘स्लीपिंग कंडीशन’ है, जिसे ‘एक्सप्लोडिंग हेड सिंड्रोम’ कहते हैं। इसमें सुनाई देने वाली आवाज असली नहीं होती, बल्कि दिमागी भ्रम होता है। इससे घबराहट और नींद टूटने की समस्या हो सकती है। इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज एक्सप्लोडिंग हेड सिंड्रोम के बारे में बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- किन लोगों को ये दिक्कत ज्यादा होती है? कब डॉक्टर से कंसल्ट करना जरूरी है? इससे बचाव के तरीके क्या हैं? सवाल- नींद में अचानक तेज धमाके जैसी आवाज क्यों सुनाई देती है? जवाब- पल्मोनोलॉजिस्ट डॉक्टर पीयूष गोयल बताते हैं कि सोने और जागने के बीच ब्रेन का कंट्रोल सिस्टम कुछ सेकेंड के लिए इंबैलेंस हो जाता है। उसी समय ब्रेन ऐसे सिग्नल बनाता है, जिससे तेज आवाज का अहसास होता है, जबकि असल में कोई आवाज नहीं होती। सवाल- क्या यह कोई बीमारी है या ब्रेन का नॉर्मल रिएक्शन है? जवाब- डॉक्टर पीयूष कहते हैं कि यह कोई बीमारी नहीं है। यह दिमाग का असामान्य, लेकिन हार्मलेस रिएक्शन है। नींद के दौरान ब्रेन धीरे-धीरे रेस्ट मोड में जाता है। कभी-कभी इसमें रुकावट होती है। ऐसे में ब्रेन अजीब सिग्नल बनाने लगता है। इससे तेज आवाज का भ्रम होता है। मेडिकल टेस्ट में रिपोर्ट नॉर्मल आती है। ब्रेन, नर्व्स या कान में कोई खराबी नहीं मिलती। EEG (इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राम) जैसे टेस्ट भी सामान्य आते हैं। इसलिए डॉक्टर इसे ब्रेन की अस्थायी कंडीशन मानते हैं। ज्यादातर लोगों को यह समस्या जिंदगी में एक-दो बार होती है और अपने आप ठीक हो जाती है। सवाल- क्या इससे ब्रेन या शरीर को कोई नुकसान होता है? जवाब- नहीं, इससे कोई नुकसान नहीं होता। इसके कारण ब्रेन में कोई स्ट्रक्चरल डैमेज नहीं होता। दिमाग की नसें, ब्रेन सेल्स और कान सुरक्षित रहते हैं। इस कंडीशन में दर्द नहीं होता। इसमें सिर्फ डर, घबराहट, तेज हार्ट बीट या पसीना आता है। डर के कारण कुछ लोगों की नींद खराब हो सकती है। इसका असर धीरे-धीरे कम हो जाता है। सवाल- क्या यह हार्ट अटैक, स्ट्रोक या ब्रेन ट्यूमर का संकेत हो सकता है? जवाब- आमतौर पर ऐसा नहीं होता। एक्सप्लोडिंग हेड सिंड्रोम का हार्ट अटैक, स्ट्रोक या ब्रेन ट्यूमर से सीधा संबंध नहीं है। पहली बार होने पर लोग डर जाते हैं। उन्हें लगता है कि ब्रेन में गंभीर रिएक्शन हुआ है। जबकि मेडिकल टेस्ट में यह किसी बीमारी का संकेत नहीं होता। सिर्फ तेज आवाज सुनाई देना आमतौर पर बीमारी का संकेत नहीं है। अगर इसके साथ शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी, बोलने में दिक्कत या दर्द जैसे लक्षण हों तो टेस्ट कराना चाहिए। सवाल- किन लोगों को यह समस्या ज्यादा होती है? जवाब- यह समस्या किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। लेकिन कुछ लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है। ग्राफिक में देखिए- डॉक्टर मानते हैं कि स्ट्रेस और थकान से ब्रेन सोते समय पूरी तरह रेस्ट मोड में नहीं जा पाता। इससे नींद का बैलेंस बिगड़ता है। कुछ मामलों में यह जेनेटिक भी हो सकता है। सवाल- इस कंडीशन में घबराने की बजाय क्या करना चाहिए? जवाब- सबसे पहले यह समझें कि यह खतरनाक कंडीशन नहीं है। इसलिए– खुद को शांत रखें। गहरी सांस लें। डर से दिल की धड़कन तेज हो सकती है। इसके लिए तैयार रहें। रोज एक तय समय पर सोएं। रोज 7-8 घंटे की क्वालिटी स्लीप लें। सोने से पहले मोबाइल और स्क्रीन से दूरी रखें। रिलैक्सेशन एक्सरसाइज करें। डीप ब्रीदिंग, ध्यान या हल्की स्ट्रेचिंग करें। ज्यादा थकान और तनाव से बचें। अगर आवाज के बाद नींद टूट जाए तो खुद को याद दिलाएं कि यह ब्रेन का सिर्फ इंबैलेंस्ड रिएक्शन भर है, असली धमाका नहीं। धीरे-धीरे ब्रेन इस डर से बाहर आ जाता है। सवाल- कब डॉक्टर से कंसल्ट करना जरूरी है? जवाब- अगर यह समस्या बार-बार होने लगे तो डॉक्टर से मिलना जरूरी है। ग्राफिक में देखिए कब डॉक्टर से कंसल्ट करना चाहिए- कुछ कंडीशंस में डॉक्टर EEG, MRI या स्लीप टेस्ट करा सकते हैं। इससे यह पक्का किया जाता है कि कोई दूसरी बीमारी तो नहीं है। ज्यादातर मामलों में जांच सामान्य आती है, जिससे मरीज को मानसिक राहत मिलती है। सवाल- क्या इसमें दवाओं की जरूरत पड़ती है या ये अपने आप ठीक हो जाती है? जवाब- अधिकतर मामलों में यह समस्या बिना दवा के ठीक हो जाती है। इसके अलावा- सिर्फ स्लीप क्वालिटी सुधारने और स्ट्रेस कम करने से भी आराम मिलता है। अगर ये समस्या बार-बार हो और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही हो, तब डॉक्टर दवाएं दे सकते हैं। ये दवाएं आमतौर पर नर्व्स को रिलेैक्स करने के लिए होती हैं। जैसे कुछ एंटीडिप्रेसेंट या एंटी-सीजर दवाएं। ज्यादातर लोगों को सिर्फ सही जानकारी और लाइफस्टाइल सुधार से राहत मिल जाती है। सवाल- इस समस्या से बचने के लिए क्या सावधानियां बरतनी चाहिए? जवाब- इसके लिए पूरी नींद लेना सबसे जरूरी है। साथ ही कुछ और बाताें का ख्याल रखें। जैसेकि- रोज एक ही समय पर सोने और उठने की आदत डालें। सोने से पहले मोबाइल, टीवी और लैपटॉप बंद करें। कैफीन, शराब और स्मोकिंग कम करें। बहुत ज्यादा थकान हो तो तुरंत न सोएं। पहले थोड़ा रिलैक्स करें। तनाव कम करने के लिए योग, ध्यान या वॉक करें। पीठ के बल सोने से कुछ लोगों में समस्या बढ़ती है, इसलिए साइड में सोने की कोशिश करें। अगर दवाएं ले रहे हैं, तो उन्हें बिना डॉक्टर की सलाह के अचानक बंद न करें। ……………… ये खबर भी पढ़िए फिजिकल हेल्थ- वरुण धवन की बेटी को DDH: डॉक्टर से जानें क्या है ये बीमारी, इसके लक्षण, डायग्नोसिस, सही इलाज और जरूरी सावधानियां बॉलीवुड एक्टर वरुण धवन ने कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी बेटी लारा को डेढ़ साल की उम्र में DDH डायग्नोज हुआ था। DDH यानी ‘डेवलपमेंटल डिस्प्लेसिया ऑफ हिप।’ यह
Heat Headache Symptoms Explained; Trigger Points & Treatment

Hindi News Lifestyle Heat Headache Symptoms Explained; Trigger Points & Treatment | Dehydration Sunlight 19 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक गर्मियों में कुछ लोगों को सिरदर्द, भारीपन जैसी समस्याएं होती हैं। कभी अचानक चक्कर आ जाता है। कई बार तो इसकी वजह से डेली रुटीन तक प्रभावित हो जाता है। तेज गर्मी में शरीर से ज्यादा पसीना निकलता है। पसीने के साथ जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स भी निकलते हैं। इससे सिरदर्द, थकान, चक्कर या कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होते हैं। मेडिसिन की भाषा में इसे ‘हीट हेडेक’ कहते हैं। यह कोई अलग बीमारी नहीं है, बल्कि शरीर का एक संकेत है कि वह गर्मी से परेशान है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में जानेंगे कि- हीट हेडेक क्या है? ये क्यों होता है? इससे बचने के लिए क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट- डॉ. अली शेर, सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, दिल्ली सवाल- हीट हेडेक (सिरदर्द) क्या होता है? जवाब- हीट हेडेक गर्म टेम्परेचर की वजह से होने वाला सिरदर्द है। यह तेज गर्मी, धूप या शरीर के ज्यादा गर्म होने की वजह से होता है। इसे ‘हीट-इंड्यूस्ड हेडेक’ भी कहा जाता है। पॉइंटर्स से इसे समझिए- हीट हेडेक शरीर की एक प्रतिक्रिया है। जब शरीर को ज्यादा गर्मी लगती है या पानी की कमी होती है तो सिरदर्द हो सकता है। यह दर्द अक्सर सिर के दोनों तरफ या कनपटियों के पास महसूस होता है। कुछ लोगों को चक्कर, ज्यादा प्यास, कमजोरी या थकान भी महसूस हो सकती है। सवाल- हीट हेडेक क्यों होता है? जवाब- हीट हेडेक आमतौर पर तीन मुख्य कारणों से होता है- डिहाइड्रेशन। इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी। बॉडी टेम्परेचर इंबैलेंस। इसे ऐसे समझिए– मौसम बहुत गर्म होने पर शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए ज्यादा पसीना निकालता है। इससे शरीर से पानी और सोडियम-पोटेशियम जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स कम हो जाते हैं। गर्मी में शरीर को ठंडा रखने के लिए ब्लड फ्लो भी बढ़ जाता है। इससे सिर की नसों पर दबाव बढ़ सकता है और सिरदर्द शुरू हो सकता है। लंबे समय तक धूप में रहने, कम पानी कम पीने या बहुत ज्यादा थकान से हीट हेडेक का रिस्क बढ़ जाता है। सवाल- क्या हीट हेडेक नॉर्मल हेडेक या माइग्रेन से अलग होता है? जवाब- हीट हेडेक सामान्य सिरदर्द या माइग्रेन से अलग है, क्योंकि इसका मुख्य कारण गर्मी और शरीर में पानी की कमी है। सामान्य सिरदर्द अक्सर तनाव, थकान या नींद की कमी से होता है। माइग्रेन में सिर के एक तरफ तेज दर्द के साथ मतली और उल्टी हो सकती है। तेज रोशनी और आवाज से दर्द ट्रिगर हो सकता है। सवाल- किन स्थितियों में हीट हेडेक होने का रिस्क बढ़ जाता हैं? जवाब- कुछ परिस्थितियों में हीट हेडेक का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। ग्राफिक से समझते हैं- सवाल- हीट हेडेक के लक्षण और संकेत क्या होते हैं? जवाब- हीट हेडेक के लक्षण शुरुआत में अमूमन हल्के होते हैं, लेकिन अगर समय पर ध्यान न दिया जाए तो ये बढ़ सकते हैं। सभी लक्षण ग्राफिक में देखिए- सवाल- गर्मियों में कौन-सी आदतें हीट हेडेक को ट्रिगर करती हैं? जवाब- गर्मियों में रोजमर्रा की कुछ आदतें हीट हेडेक बढ़ा सकती हैं। पॉइंटर्स से समझिए- 1. बॉडी सिग्नल इग्नोर करना प्यास लगने पर पानी न पीना। सिर भारी लगने पर भी ब्रेक न लेना। थकान को नजरअंदाज करना। 2. गलत टाइमिंग तेज धूप में बाहर निकलना। गलत टाइम पर वर्कआउट करना। देर रात तक जागना। सुबह डिहाइड्रेटेड उठना। 3. इंस्टेंट एनर्जी पर निर्भरता बार-बार चाय/कॉफी पीना। शुगरी ड्रिंक्स पीना। 4. रेस्ट और रिकवरी की कमी बिना ब्रेक के लगातार काम करना। AC/कूल एरिया में टाइम न बिताना। ट्रैवल के दौरान खुद को कूल न रखना। सवाल- गर्मियों में किन लोगों को हीट हेडेक का रिस्क ज्यादा होता है? जवाब- कुछ लोगों में हीट हेडेक का जोखिम दूसरों की तुलना में ज्यादा होता है। इस ग्राफिक में देखिए- सवाल- हीट हेडेक से बचने के लिए क्या करना चाहिए? जवाब- कुछ आसान आदतें अपनाकर हीट हेडेक से काफी हद तक बचा जा सकता है। सभी हेल्दी आदतें ग्राफिक में देखिए- सवाल- अगर हीट हेडेक हो तो क्या गलतियां नहीं करनी चाहिए? जवाब- कुछ लोग सिरदर्द होने पर कुछ ऐसी गलतियां करते हैं, जिससे समस्या बढ़ सकती है। जैसेकि– ज्यादा चाय-कॉफी पीना। मसालेदार या हैवी डाइट लेना। तेज धूप में काम करना। कम पानी पीना। शरीर के संकेतों को नजरअंदाज करना। सवाल- क्या सनस्ट्रोक और हीट हेडेक में कोई रिलेशन होता है? जवाब- हां, कई बार हीट हेडेक सनस्ट्रोक या हीट-इलनेस का शुरुआती संकेत हो सकता है। पॉइंटर्स से समझते हैं- जब बॉडी का टेम्परेचर बढ़ जाता है और वह खुद को ठंडा नहीं कर पाता तो हीट एग्जॉशन या सनस्ट्रोक जैसी कंडीशन बन सकती है। इन कंडीशंस में सिरदर्द के साथ चक्कर, उल्टी, तेज बुखार या बेहोशी जैसे लक्षण दिख सकते हैं। अगर सिरदर्द के साथ बुखार के लक्षण हों, उल्टी हो या बेहोशी आए तो तुरंत डॉक्टर से कंसल्ट करें। सवाल- क्या बार-बार होने वाला हीट हेडेक किसी बड़ी बीमारी का संकेत हो सकता है? जवाब- हां, कभी-कभी ये गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है। कब चिंता की बात हो सकती है? अचानक बहुत तेज सिरदर्द होना। तेज बुखार। गर्दन अकड़ना। लगातार उल्टी होना। चक्कर या बेहोशी। बार-बार ब्लड प्रेशर बढ़ना। सवाल- किस स्थिति में डॉक्टर को दिखाने की जरूरत होती है? जवाब- ये लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं- दर्द बहुत तेज हो। दर्द लंबे समय तक बना रहे। उल्टी, चक्कर, तेज बुखार या बेहोशी के लक्षण दिखें। कुल मिलाकर, हीट हेडेक के रूप में शरीर हमसे ये कह रहा होता है कि मुझे पानी, आराम और ठंडे माहौल की जरूरत है। गर्मियों में बस थोड़ी–सी सावधानी बरतकर और शरीर को हाइड्रेटेड रखकर इस समस्या से काफी हद तक बचा जा सकता है। …………………………. ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- गर्मियों में ज्यादा आइसक्रीम न खाएं:इसमें हैं खतरनाक इंग्रीडिएंट, जानें 7 हेल्थ रिस्क, डॉक्टर से समझें इसका साइंस गर्मियों में लोग आइसक्रीम को ‘कूलिंग फूड’ मानकर खाते हैं। लेकिन ज्यादा आइसक्रीम खाने से कई हेल्थ रिस्क हो सकते हैं। ‘वर्ल्ड जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल्स एंड लाइफ साइंस’ (WJPLS) में पब्लिश स्टडी के मुताबिक, आइसक्रीम में हाई शुगर और सैचुरेटेड फैट होता
Emotional Loneliness Meaning Signs Explained; How To Overcome

Hindi News Lifestyle Emotional Loneliness Meaning Signs Explained; How To Overcome | Mental Health 21 मिनट पहले कॉपी लिंक सवाल– मेरी उम्र 23 साल है। मैं रांची में रहती हूं और होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर रही हूं। हमारी जॉइंट फैमिली है। कॉलेज में भी ढेर सारे दोस्त हैं। फिर भी मुझे हर वक्त एक अजीब सा अकेलापन महसूस होता है। हर वक्त मेरे चारों ओर लोग होते हैं और मैं उन सबसे भागकर अकेली होना चाहती हूं। मुझे लगता है कि कोई मेरा अपना नहीं है। चाहे दोस्त हों या फैमिली, कोई मुझे समझता नहीं है। मैं बाहर से खुश दिखती हूं, लेकिन अंदर-ही-अंदर दुखी रहती हूं। क्या सब लोग ऐसा ही फील करते हैं? क्या ये फीलिंग नॉर्मल है या मेरे अंदर ही कोई प्रॉब्लम है। एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए बहुत शुक्रिया। इमोशनल लोनलीनेस (भावनात्मक अकेलापन) आज मेंटल हेल्थ डिसकशन का एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। पहली नजर में यह साधारण ‘अकेलेपन’ जैसा लगता है, लेकिन मनोविज्ञान इसे कहीं अधिक गहराई से समझता है। इमोशनल लोनलीनेस क्या है ? आधुनिक मनोविज्ञान में इस विषय पर रॉबर्ट वाइस का काम आधारभूत माना जाता है। उन्होंने 1973 में यह बताया कि लोनलीनेस कोई एक अनुभव नहीं है। इसके अलग-अलग प्रकार होते हैं। हर व्यक्ति के लिए यह अनुभव अलग हो सकता है। वाइस के अनुसार, अकेलेपन का एक रूप वह है, जब व्यक्ति के पास कोई ऐसा घनिष्ठ, भरोसेमंद और भावनात्मक रूप से सुरक्षित रिश्ता नहीं होता, जिसमें वह खुलकर अपनी बात कह सके। इसे ही इमोशनल लोनलीनेस कहते हैं। दूसरा रूप वह है, जब व्यक्ति के पास व्यापक सामाजिक दायरा, जैसे परिवार, दोस्त, परिचित या कम्युनिटी नहीं होती है। इसे सोशल लोनलीनेस कहते हैं। भीड़ में अकेलापन आगे चलकर न्यूजीलैंड के दो प्रसिद्ध समाजशास्त्रियों जेनी डे योंग हीरफेल्ड और थियो वान टिलबुर्ख ने इस अंतर को और साफ किया और इसे मापने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरण विकसित किए। आज इमोशनल लोनलीनेस सिर्फ ‘अकेले रहना’ नहीं है। इमोशनल लोनलीनेस का मतलब है, लोगों से घिरे होने और भीड़ में रहने के बावजूद यह महसूस करना कि- मुझे कोई समझता नहीं। मुझे कोई सुनता नहीं। मुझे कोई प्यार नहीं करता। इसी संदर्भ में इमोशनल लोनलीनेस और सोशल लोनलीनेस के बीच अंतर समझना जरूरी है। कई बार व्यक्ति के पास परिवार होता है, दोस्त होते हैं, और वह सामाजिक रूप से सक्रिय भी रहता है। उदाहरण के तौर पर, कोई व्यक्ति संयुक्त परिवार में रह सकता है, कॉलेज में उसके कई दोस्त हो सकते हैं और वह अक्सर लोगों से घिरा रह सकता है। इसके बावजूद यदि उसके भीतर लगातार खालीपन, दूरी या “कोई मुझे समझता नहीं” जैसी भावना बनी रहती है, तो यह इमोशनल लोनलीनेस का संकेत है। सोशल लोनलीनेस में व्यक्ति की मुख्य शिकायत होती है—“मेरे पास लोग नहीं हैं।” इसके विपरीत, इमोशनल लोनलीनेस में व्यक्ति कहता है—“लोग तो हैं, लेकिन कोई सच में मेरा नहीं है।” यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे समस्या की जड़ साफ होती है। यहां चुनौती लोगों की संख्या नहीं, बल्कि रिश्तों की गुणवत्ता है। ऐसे मामलों में व्यक्ति अक्सर यह भी महसूस करता है कि सामाजिक संपर्क उसे सुकून देने की बजाय थका देता है। वह लोगों के बीच रहते हुए भी भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाता। “कोई मुझे समझता नहीं,” जैसी सोच इस बात की ओर इशारा करती है कि उसके अनुभवों को समझा और स्वीकारा नहीं जा रहा, जिसे मनोविज्ञान में “इमोशनल एट्यूनमेंट” की कमी कहते हैं। कोई ऐसा जो हमें सुने, समझे इस प्रकार, इमोशनल लोनलीनेस हमें यह समझने में मदद करती है कि केवल लोगों से घिरे रहना काफी नहीं है। मानसिक संतुलन और संतुष्टि के लिए जरूरी है कि हमारे जीवन में ऐसे रिश्ते हों, जहां हम बिना झिझक अपने असली भाव व्यक्त कर सकें और खुद को सच में समझा हुआ महसूस करें। क्या आप इमोशनली अकेले हैं? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 10 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग हर दिन’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। अगर आपका टोटल स्कोर 0 से 7 के बीच है तो आप में बहुत मामूली पैटर्न है। ये नॉर्मल है लेकिन अगर आपका स्कोर 24 से 30 के बीच है तो यह बहुत स्ट्रॉन्ग इमोशनल लोनलीनेस का संकेत है। ऐसे में प्रोफेशनल हेल्प के बारे में सोचना चाहिए। डिटेल टेस्ट नीचे ग्राफिक में देखिए। कहीं ये लो मूड/डिप्रेशन तो नहीं इस एसेसमेंट टेस्ट के अलावा यह देखना भी जरूरी है कि कहीं ये लो मूड/डिप्रेशन का केस तो नहीं है। इसलिए खुद से ये दो सवाल भी पूछें– क्या अकेलेपन की यह फीलिंग दो हफ्तों से भी ज्यादा समय से लगातार बनी हुई है? क्या इस फीलिंग के साथ ये चीजें भी प्रभावित हो रही हैं– नींद भूख पढ़ाई एनर्जी लेवल क्या इसके अलावा ये भी हो रहा है– बीच–बीच में खूब रोना आ रहा है। निराशा महसूस हो रही है। खुद को नुकसान पहुंचाने का ख्याल आ रहा है। यदि आपका उत्तर “हां” है, तो यहां पर लो मूड/डिप्रेशन को भी एक बार प्रोफेशनल लेंस से जरूर देखना चाहिए। HSE (हेल्थ एंड सेफ्टी एक्जीक्यूटिव, यूके) और NHS (नेशनल हेल्थ सर्विस, यूके), दोनों सलाह देते हैं कि अगर 2 हफ्ते से अधिक समय तक लगातार लो मूड रहे, कोप करने में कठिनाई हो, या सेल्फ हेल्प से कोई फायदा न हो तो प्रोफेशनल हेल्प लेनी चाहिए. 4 सप्ताह का CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान सप्ताह 1 पहचानना और समझाना लक्ष्य: फीलिंग को नाम देना, दबाना नहीं पहले हफ्ते में आपका लक्ष्य अपनी भावनाओं को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें पहचानना और नाम देना है। दिन में कम-से-कम एक बार एक छोटा-सा मूड लॉग भरें, जिसमें चार चीजें लिखें— सिचुएशन (क्या हुआ) थॉट (दिमाग में
Retirement Funds Investment Options Explained

2 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी कॉपी लिंक भारत में रिटायरमेंट प्लानिंग को लेकर अवेयरनेस बहुत कम है। देश में ऐसे लाखों लोग हैं, जो समय रहते रिटायरमेंट प्लान नहीं करते हैं। इसकी वजह से उन्हें बुढ़ापे में फाइनेंशियल क्राइसिस का सामना करना पड़ता है। भारत की लीडिंग प्रोफेशनल सर्विस फर्म ‘ग्रांट थॉर्नटॉन’ के एक सर्वे के मुताबिक, बड़ी संख्या में लोग रिटायरमेंट के लिए पर्याप्त बचत नहीं कर रहे हैं। साल 2025 में हुए इस सर्वे के मुताबिक, प्राइवेट सेक्टर के करीब 50% कर्मचारी रिटायरमेंट के लिए बहुत कम पैसे निवेश करते हैं, जबकि अधिकांश लोग अपनी आय का सिर्फ 1-10% ही इसके लिए अलग रखते हैं। इसलिए आज ‘आपका पैसा’ कॉलम में जानेंगे कि- बुढ़ापे में फाइनेंशियल फ्रीडम क्यों जरूरी है? खुद का रिटायरमेंट फंड कैसे बनाएं? रिटायरमेंट फंड के लिए कहां और कितना निवेश करें? सवाल- रिटायरमेंट फंड क्या है और यह क्यों जरूरी है? जवाब- रिटायरमेंट फंड भविष्य की आपात स्थितियों से निपटने में मदद करता है। साथ ही रिटायरमेंट के बाद परिवार और रिश्तेदारों पर निर्भरता खत्म करता है। क्यों जरूरी है? पेंशन का अभाव: कुछ सरकारी नौकरियों को छोड़कर बाकी में अब पेंशन की सुविधा नहीं है। महंगाई: 6% वार्षिक महंगाई दर के हिसाब से आज का 50,000 रुपए का मासिक खर्च 20 साल बाद 1.6 लाख रुपए हो सकता है। लाइफ एक्सपेक्टेंसी: अभी औसत जीवन दर 75 साल के करीब है। ऐसे में रिटायर होने के बाद भी 15-20 साल का फंड चाहिए। मेडिकल खर्च: बुढ़ापे में स्वास्थ्य संबंधी खर्चे बढ़ जाते हैं, जिनके लिए पर्याप्त बचत जरूरी है। सवाल- बुढ़ापे में फाइनेंशियल फ्रीडम क्यों जरूरी है? जवाब- फाइनेंशियल फ्रीडम का मतलब है अपने खर्च खुद उठाना। रिटायरमेंट के बाद नियमित इनकम का सोर्स खत्म हो जाता है। बचत न होने पर दूसरों पर निर्भर होना पड़ सकता है। फाइनेंशियल फ्रीडम इसलिए जरूरी है क्योंकि- यह सम्मानजनक जीवन जीने में मदद करती है। मानसिक तनाव कम करती है। आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना बढ़ाती है। सवाल- रिटायरमेंट फंड बनाने की शुरुआत कैसे करें? जवाब- रिटायरमेंट फंड बनाने के लिए एक प्लानिंग की जरूरत होती है। आइए इसे ग्राफिक के जरिए समझते हैं- सवाल- जल्दी निवेश शुरू करने से क्या फायदा होता है? जवाब- सभी फायदे पॉइंटर्स से समझिए- सबसे बड़ा फायदा कंपाउंडिंग का होता है। निवेश पर मिले रिटर्न पर भी रिटर्न मिलता है। कम उम्र में छोटा निवेश भी बड़ा फंड बना सकता है। जल्दी निवेश शुरू करने से कम मेहनत में बड़ा कॉर्पस (फंड) बनता है। देर से शुरूआत करने पर ज्यादा पैसे लगते हैं। सवाल- रिटायरमेंट फंड के लिए कहां निवेश करें? जवाब- निवेश का विकल्प आपकी उम्र, जोखिम क्षमता और रिटायरमेंट तक बचे समय पर निर्भर करता है। इसे ग्राफिक से समझिए- सवाल- रिटायरमेंट प्लानिंग में महंगाई का क्या रोल है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- महंगाई भविष्य के खर्च को कई गुना बढ़ा देती है। आज का खर्च भविष्य में काफी ज्यादा हो सकता है। महंगाई को नजरअंदाज करने से फंड कम पड़ सकता है। 6-7% सालाना महंगाई दर मानकर योजना बनानी चाहिए। इससे सही अनुमान लगाने में मदद मिलती है। सवाल- रिटायरमेंट प्लानिंग के क्या फायदे हैं? जवाब- सही रिटायरमेंट प्लानिंग के कई फायदे हैं। आइए इसे ग्राफिक के जरिए समझते हैं। सवाल- किन लोगों को रिटायरमेंट प्लानिंग पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए? जवाब- रिटायरमेंट प्लानिंग हर किसी के लिए जरूरी है, लेकिन कुछ लोगों को इसे ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिए। जिनकी नौकरी में पेंशन नहीं है। जो लोग फ्रीलांस करते हैं। जिनके पास इमरजेंसी फंड नहीं है। जिनकी अस्थिर और अनियमित इनकम है। युवा प्रोफेशनल्स को जल्दी शुरुआत का फायदा उठाना चाहिए। सवाल- रिटायरमेंट प्लानिंग के दौरान कौन-सी गलतियां नहीं करनी चाहिए? जवाब- रिटायरमेंट फंड के समय कुछ गलतियां नहीं करनी चाहिए। आइए इन्हें ग्राफिक से समझते हैं- सवाल- रिटायरमेंट के लिए कितनी बचत जरूरी है? जवाब- इसका जवाब व्यक्ति की लाइफस्टाइल और उसके खर्च पर निर्भर करता है- आमतौर पर वार्षिक जरूरत का 20-25 गुना फंड होना चाहिए। मासिक खर्च के आधार पर लक्ष्य तय किया जाता है। महंगाई, मेडिकल खर्च और लाइफ एक्सपेक्टेंसी ध्यान में रखें। सही प्लानिंग से पूरी उम्र के लिए पर्याप्त फंड बन सकता है। सवाल- रिटायरमेंट प्लानिंग में हेल्थ इंश्योरेंस कितना जरूरी है? जवाब- हेल्थ इंश्योरेंस रिटायरमेंट प्लानिंग का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि- उम्र बढ़ने के साथ बीमारियों का खतरा और इलाज का खर्च बढ़ता है। बिना इंश्योरेंस के छोटी मेडिकल इमरजेंसी भी बड़ी आर्थिक समस्या बन सकती है। इससे आपकी जमा की हुई बचत जल्दी खत्म हो सकती है। सही और पर्याप्त कवरेज वाला प्लान लेना जरूरी है। कम उम्र में पॉलिसी लेने पर प्रीमियम कम होता है। यह रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा और मानसिक शांति देता है। बेहतर इलाज फाइनेंशियल स्ट्रेस के बिना संभव हो पाता है। सवाल- रिटायरमेंट के बाद इनकम के सोर्स कैसे बनाए जा सकते हैं? जवाब- रिटायरमेंट के बाद रेगुलर इनकम बनाए रखना जरूरी है। पैसिव इनकम के सोर्स तैयार करें। घर किराये पर देना स्थिर आय का विकल्प है। डिविडेंड देने वाले निवेश (शेयर/फंड) मददगार होते हैं। सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम (SCSS) नियमित आय का सोर्स है। स्किल के आधार पर पार्ट-टाइम काम या फ्रीलांसिंग कर सकते हैं। कंसल्टिंग से भी अतिरिक्त इनकम प्राप्त की जा सकती है। ……………… ये खबर भी पढ़िए आपका पैसा- SIP और लंप सम में क्या बेहतर: आपकी जरूरत के मुताबिक क्या सही, एक्सपर्ट से जानें दोनों के जोखिम और फायदे हर व्यक्ति अपने भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाना चाहता है। इसके लिए लोग अपनी कमाई का एक हिस्सा भविष्य के लिए बचाते हैं या निवेश करते हैं। हालांकि, कुछ लोग यह नहीं जानते हैं कि कहां और कैसे निवेश करें। उन्हें यह नहीं पता होता कि बड़ा फंड बनाने के लिए SIP या लंप सम में कौन सा तरीका बेहतर है? आगे पढ़िए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
8th Pay Commission Salary Calculator Scam Explained; APK File

3 घंटे पहले कॉपी लिंक बीते कुछ महीनों से 8वें वेतन आयोग से जुड़े अपडेट्स खबरों में हैं। वेतन आयोग भारत सरकार की एक ‘एडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी’ है, यह लगभग हर 10 साल में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन, भत्तों और पेंशन में बढ़ोत्तरी की सिफारिश करती है। नए अपडेट्स के कारण केंद्रीय कर्मचारी अपनी बढ़ी सैलरी जानने के लिए उत्सुक हैं। साइबर ठग इस मौके का फायदा उठाकर ठगी कर रहे हैं। इंडियन साइबर क्राइम कोऑडिनेशन सेंटर (I4C) ने भी इसे लेकर अलर्ट जारी किया है। आज ‘साइबर लिटरेसी’ कॉलम में ‘8th पे कमीशन सैलरी स्कैम’ की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- ठग इस स्कैम में लोगों को कैसे फंसा रहे हैं? ऐसे किसी भी साइबर स्कैम से बचने के लिए क्या करें? एक्सपर्ट: राहुल मिश्रा, साइबर सिक्योरिटी एडवाइजर, उत्तर प्रदेश पुलिस सवाल- ‘8th पे कमीशन सैलरी कैलकुलेटर स्कैम’ क्या है? जवाब- यह एक साइबर फ्रॉड है, जिसमें ठग सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स को वॉट्सएप पर फर्जी मैसेज भेजते हैं। इसमें सैलरी बढ़ोतरी की जानकारी देने के नाम पर APK फाइल डाउनलोड करने को कहा जाता है। जब यूजर इस फाइल को डाउनलोड और इंस्टॉल करता है, स्कैमर्स उसके मोबाइल का एक्सेस ले लेते हैं और बैंक अकाउंट खाली कर देते हैं। सवाल- इंडियन साइबर क्राइम कोऑडिनेशन सेंटर (I4C) ने लोगों को इस स्कैम से सचेत करने के लिए क्या चेतावनी दी है? जवाब- I4C ने कहा है कि- ‘8th पे कमीशन सैलरी’ के नाम पर फर्जी मैसेज भेजे जा रहे हैं। इन मैसेज में APK फाइल डाउनलोड करने के लिए कहा जाता है, जो खतरनाक है। ऐसी फाइल्स से मोबाइल डेटा और बैंक से जुड़ी सेंसेटिव जानकारी चुराई जा सकती है। इसलिए किसी भी अनजान लिंक या फाइल पर क्लिक न करें। केवल ऑफिशियल सोर्स से ही जानकारी लें। किसी भी संदिग्ध मैसेज को तुरंत रिपोर्ट करें। सवाल- ठग ‘8th पे सैलरी कैलकुलेटर स्कैम’ में लोगों को कैसे फंसा रहे हैं? जवाब- स्कैमर इस ठगी को कैसे अंजाम देते हैं, इसे ग्राफिक में देखिए- सवाल- लोग इतनी आसानी से ठगों के झांसे में क्यों आ जाते हैं? जवाब- दरअसल लोगों के मन में ये जानने को लेकर उत्सुकता होती है कि 8वें वेतन आयोग की सिफारिश के बाद उनके अकाउंट में कितने रुपए बढ़कर आएंगे। ठग इसी उत्सुकता और लालच का फायदा उठाते हैं। सवाल- ठग ‘8th पे सैलरी कैलकुलेटर स्कैम’ में किन लोगों को टारगेट बना रहे हैं? जवाब- ठग इसमें खासतौर पर केंद्रीय कर्मचारी टारगेट कर रहे हैं। साथ ही पेंशनर्स भी ठगों के निशाने पर हैं। पूरी लिस्ट ग्राफिक में देखिए- सवाल- APK फाइल डाउनलोड करने से मोबाइल कैसे हैक हो जाता है? जवाब- APK एंड्रॉयड एप इंस्टॉल करने की फाइल होती है। फर्जी APK में मालवेयर (वायरस) हो सकता है। इंस्टॉल होते ही यह एप कुछ परमिशन मांगता है। परमिशन मिलते ही, एप को मोबाइल का एक्सेस मिल जाता है। बैंकिंग एप और OTP की जानकारी भी चोरी हो सकती है। कुछ मालवेयर स्क्रीन रिकॉर्डिंग कर सकते हैं। पर्सनल डेटा हैकर के सर्वर तक भेजा जाता है और स्कैमर मोबाइल हैक कर लेते हैं। सवाल- ऐसे किसी भी साइबर स्कैम से बचना है तो क्या करें? जवाब- I4C ने इसके लिए कुछ सलाह दी है। सभी टिप्स ग्राफिक में देखिए- सवाल- स्कैमर्स के मैसेज में क्या रेड फ्लैग होते हैं? इन्हें कैसे पहचानें? जवाब- I4C के अनुसार, स्कैमर्स के मैसेज में कई रेड फ्लैग होते हैं, ग्राफिक में देखिए- सवाल- अगर गलती से APK डाउनलोड हो जाए तो क्या करें? जवाब- ऐसा होने पर तुरंत करें ये काम- सबसे पहले इंटरनेट (Wi-Fi/मोबाइल डेटा) तुरंत बंद करें। संदिग्ध APK से इंस्टॉल हुआ एप तुरंत अनइंस्टॉल करें। मोबाइल की सेटिंग में जाकर सभी अनजान एप्स चेक करें। एंटीवायरस से फोन को स्कैन करें और मालवेयर हटाएं। बैंकिंग एप्स और ईमेल के पासवर्ड तुरंत बदलें। अपने बैंक को तुरंत सूचित करें और ट्रांजैक्शन अस्थाई रूप से ब्लॉक कराएं। OTP, PIN या कोई भी सेंसिटिव डिटेल शेयर न करें। जरूरी हो तो फोन को ‘फैक्ट्री रीसेट’ करवाएं। सवाल- ऐसे अनऑथराइज्ड एप्स से बचने के लिए मोबाइल फोन में कौन-सी सिक्योरिटी सेटिंग्स ऑन रखनी चाहिए? जवाब- मोबाइल फोन में ऑन करें ये सेटिंग्स- हमेशा गूगल प्ले प्रोटेक्ट ऑन रखें ताकि संदिग्ध एप्स डाउनलोड न हो। ‘इंस्टॉल फ्रॉम अननोन सोर्सेस’ ऑप्शन बंद कर दें। मोबाइल फोन अपडेटेड रखें। सिर्फ जरूरी एप्स को ही कैमरा, माइक्रोफोन और फाइल का एक्सेस दें। स्ट्रॉन्ग स्क्रीन लॉक और बायोमेट्रिक सिक्योरिटी ऑन रखें। टू-फैक्टर एसोसिएशन (2FA) एक्टिव रखें। एंटीवायरस या मोबाइल सिक्योरिटी एप का इस्तेमाल करें। सवाल- अगर शक है कि स्कैम हो रहा है तो बैंक अकाउंट को तुरंत कैसे सिक्योर करें? जवाब- ऐसा हो तो तुरंत करें ये काम- तुरंत अपने बैंक की हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करके सूचना दें या ब्रांच से संपर्क करें। इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग अस्थाई रूप से ब्लॉक करवाएं। ATM/डेबिट और क्रेडिट कार्ड तुरंत ब्लॉक करें। सभी पासवर्ड और UPI PIN तुरंत बदलें। संदिग्ध ट्रांजैक्शन की तुरंत शिकायत दर्ज करें। SMS/ईमेल अलर्ट एक्टिव रखें। सवाल- इस तरह के साइबर फ्रॉड की शिकायत कहां और कैसे करें? जवाब- ऐसे करें शिकायत- नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल (www.cybercrime.gov.in) पर ऑनलाइन शिकायत करें। साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तुरंत कॉल करें। अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन या साइबर सेल में रिपोर्ट दर्ज कराएं। बैंक से जुड़े फ्रॉड में तुरंत अपने बैंक को सूचित करें। शिकायत करते समय स्क्रीनशॉट, मैसेज, लिंक जैसे सबूत साथ रखें। अपनी पूरी जानकारी सही और स्पष्ट रूप से दें। शिकायत नंबर/रसीद सुरक्षित रखें। जल्दी शिकायत करने से पैसा रिकवरी की संभावना बढ़ती है। ……………… ये खबर भी पढ़िए साइबर लिटरेसी- फास्टैग रिचार्ज स्कैम: जानें कैसे फंसते हैं लोग, सस्ते के लालच में न आएं, रीचार्ज कराते हुए बरतें 10 सावधानियां डिजिटल टोल सिस्टम ने नेशनल हाइवे पर सफर को आसान बनाया है। लेकिन साइबर ठग अब इसका गलत फायदा उठा रहे हैं। इसके चलते बीते कुछ दिनों में FASTag (फास्टैग) रीचार्ज और एनुअल पास के नाम पर ऑनलाइन ठगी के कई मामले सामने आए हैं। आगे पढ़िए… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
PAN-Based CAS Statement Explained; Mutual Funds

6 घंटे पहलेलेखक: गौरव तिवारी कॉपी लिंक आजकल ज्यादातर निवेशक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म या एप के जरिए SIP (सिस्टेमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) करते हैं। निवेशक कुछ SIP जारी रखते हैं, कुछ बीच में ही बंद कर देते हैं, जबकि समय बीतने पर कुछ फंड्स के तो नाम तक भूल जाते हैं। इसके बाद जब टैक्स फाइलिंग या फाइनेंशियल प्लानिंग की जरूरत होती है, तब इन्वेस्टमेंट डॉक्यूमेंट्स, लॉगिन आईडी और स्टेटमेंट ढूंढना मुश्किल हो जाता है। ऐसी कंडीशंस के लिए PAN बेस्ड कंसोलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट (CAS) एक आसान तरीका है। इसके जरिए निवेशक अपने म्यूचुअल फंड्स के सभी निवेश एक ही जगह देख सकते हैं। इससे निवेश की ट्रैकिंग आसान होती है, ओवरलैप का जोखिम भी नहीं होता है। आज ‘आपका पैसा’ कॉलम में हम ‘PAN बेस्ड कंसोलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट’ की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- कैसे इसका इस्तेमाल करें? इसके जरिए क्या-क्या जानकारी मिल सकती है? सवाल- क्या वाकई सिर्फ PAN से सारी SIP की जानकारी मिल सकती है? जवाब- हां, निवेशक PAN नंबर के जरिए SEBI-रजिस्टर्ड RTA (रजिस्ट्रार एंड ट्रांसफर एजेंट) प्लेटफॉर्म से अपने म्यूचुअल फंड निवेश की पूरी जानकारी एक जगह देख सकते हैं। ये एजेंसियां फंड हाउस के निवेश रिकॉर्ड को सुरक्षित तरीके से मेंटेन करती हैं। PAN आधारित CAS में निवेशक को म्यूचुअल फंड्स से जुड़ी सारी जानकारी मिलती है। यह सुविधा निवेश की पारदर्शिता बढ़ाती है और अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बिखरे निवेश को व्यवस्थित तरीके से समझने में मदद करती है। आइए इसे ग्राफिक के जरिए समझते हैं। सवाल- PAN कार्ड के जरिए SIP और म्यूचुअल फंड की सारी जानकारी पाने का सही तरीका क्या है? जवाब- आप CAMS या KFintech जैसी ऑफिशियल RTA की वेबसाइट पर जाकर अपना PAN नंबर और रजिस्टर्ड ईमेल/मोबाइल नंबर डालकर सभी म्यूचुअल फंड SIP की जानकारी पा सकते हैं। आइए इसे ग्राफिक के जरिए समझते हैं। सवाल- यह स्टेटमेंट किन इन्वेस्टमेंट्स और SIP को कवर करता है? जवाब- PAN बेस्ड CAS स्टेटमेंट में सभी एक्टिव और बंद SIP देखी जा सकती हैं। आइए इसे पॉइंटर्स में देखिए- ‘इक्विटी’ म्यूचुअल फंड में किया गया निवेश। ‘डेट’ म्यूचुअल फंड में किया गया निवेश। ‘ELSS’ (इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम) फंड में किया गया निवेश। ‘हाइब्रिड’ फंड में किया गया निवेश। ‘लिक्विड’ फंड में किया गया निवेश। ‘गोल्ड’ में किया गया निवेश। ‘लंप-सम’ (एकमुश्त) निवेश। यह निवेशक को अपने पूरे पोर्टफोलियो का ओवरऑल व्यू देता है। इससे यह समझना आसान हो जाता है कि कुल निवेश किस एसेट क्लास में ज्यादा है और कहां बैलेंस बनाने की जरूरत है। यह जानकारी लॉन्ग टर्म फाइनेंशियल प्लानिंग के लिए बेहद उपयोगी साबित होती है। सवाल- क्या CAS स्टेटमेंट ओवरलैप और डुप्लीकेट SIP से बचा सकता है? जवाब- PAN नंबर के जरिए अपनी SIPs की जानकारी देखकर ओवरलैप और डुप्लीकेट निवेश से बच सकते हैं। अक्सर निवेशक अलग-अलग एप्स से SIP करते हैं और फिर भूल जाते हैं कि उनका पैसा कहां लगा है। इससे कई बार एक ही कैटेगरी के कई फंड्स में निवेश हो जाता है, जिन्हें डुप्लीकेट फंड्स कहते हैं। बहुत ज्यादा फंड्स रखने से रिटर्न कमजोर हो सकता है और पोर्टफोलियो मैनेज करना भी मुश्किल हो सकता है। PAN बेस्ड रिपोर्ट निवेशक को यह समझने में मदद करती है कि किन फंड्स को बनाए रखना है और किन्हें मर्ज या बंद करना बेहतर है। सवाल- टैक्स फाइलिंग और प्लानिंग में यह रिपोर्ट कैसे मददगार है? जवाब- CAS स्टेटमेंट निवेशक को कैपिटल गेन, ELSS डिडक्शन और कुल निवेश की स्पष्ट जानकारी देता है। इससे टैक्स फाइलिंग के दौरान सही आंकड़े दर्ज करना आसान हो जाता है और गलती की आशंका कम हो जाती है। निवेशक यह भी देख सकते हैं कि किस निवेश पर लॉन्ग टर्म या शॉर्ट टर्म टैक्स लागू होगा। इसके अलावा यह रिपोर्ट फाइनेंशियल गोल्स जैसे रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई या घर खरीदने की योजना बनाने में भी मदद करती है। इसके सभी फायदे ग्राफिक में देखिए- सवाल- क्या CAS स्टेटमेंट सर्विस पूरी तरह सुरक्षित है? जवाब- हां, PAN बेस्ड SIP स्टेटमेंट सर्विस SEBI-रजिस्टर्ड एजेंसियां ही देती हैं। इसलिए यह विश्वसनीय है। डेटा ट्रांसमिशन एन्क्रिप्टेड (वॉट्सएप चैट की तरह) होता है और OTP बेस्ड वेरिफिकेशन के बाद ही स्टेटमेंट जारी किया जाता है। रिपोर्ट केवल रजिस्टर्ड ईमेल आईडी पर भेजी जाती है, जिससे अनऑफिशियल एक्सेस का जोखिम नहीं होता है। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे अपने PAN, ईमेल और मोबाइल की जानकारी अपडेट रखें और स्टेटमेंट केवल आधिकारिक वेबसाइट से ही डाउनलोड करें। इससे साइबर फ्रॉड का रिस्क कम होता है। सवाल- क्या मोबाइल पर भी यह स्टेटमेंट देख सकते हैं? जवाब- हां, CAMS और KFintech जैसी वेबसाइट मोबाइल फ्रेंडली हैं। मेल पर आई स्टेटमेंट (PDF फाइल) को स्मार्टफोन में आसानी से खोला जा सकता है। निवेशक इसे सेव, शेयर या प्रिंट भी कर सकते हैं। कुछ फंड हाउस RTA एप्स के जरिए भी पोर्टफोलियो ट्रैकिंग की सुविधा देते हैं। मोबाइल पर स्टेटमेंट मिलने से निवेश की रेगुलर रिव्यू करना आसान हो जाता है। निवेशक जरूरत के अनुसार समय-समय पर अपने पोर्टफोलियो में बदलाव कर सकते हैं। सवाल- क्या PAN बेस्ड रिपोर्ट से इन्वेस्ट स्ट्रेटजी बनाने में मदद मिलती है? जवाब- हां, पूरे पोर्टफोलियो को एक साथ देखकर एसेट एलोकेशन और रिस्क प्रोफाइल समझने में आसानी होती है। इससे यह तय करना आसान होता है कि इक्विटी, डेट या गोल्ड में निवेश का अनुपात सही है या नहीं। PAN रिपोर्ट लॉन्ग टर्म में ‘इन्वेस्टमेंट डिसिप्लिन’ को मजबूत करती है और इमोशनल डिसीजन को कम करने में मदद करती है। रेगुलर रिव्यू से निवेशक खराब परफॉर्मेंस वाले फंड्स को समय रहते बदल सकते हैं और बेहतर अवसरों का फायदा उठा सकते हैं। सवाल- अगर कोई SIP भूल गए हैं या बंद करना चाहते हैं तो क्या करें? जवाब- CAS स्टेटमेंट में इनएक्टिव या लो परफॉर्मेंस वाली SIP का पता चल जाता है। निवेशक उसे बंद या मॉडिफाई कर सकते हैं। हालांकि, SIP बंद करने से पहले यह समझना जरूरी है कि इसके लिए आपको कोई चार्ज तो नहीं देना पड़ेगा, टैक्स कितना लगेगा और आपके फाइनेंशियल गोल्स पर क्या असर होगा। कुछ मामलों में SIP को पूरी तरह बंद करने की बजाय उसकी रकम कम करना या पैसा किसी बेहतर फंड में डालना ज्यादा सही फैसला है। ऐसा








