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Nana Patekar Death Reason; Cardiac Arrest Vs Heart Attack Symptoms & Treatment Explained

Nana Patekar Death Reason; Cardiac Arrest Vs Heart Attack Symptoms & Treatment Explained

8 अक्टूबर की रात करीब 2:30 बजे, नाना पाटेकर ने अपने दोस्त को मैसेज करके कहा कि उनकी तबीयत बिगड़ रही है। दोस्त ने वक्त पर मैसेज नहीं देखा। करीब दो घंटे बाद नाना को अस्पताल पहुंचाया गया, तो वो पूरी तरह बेहोश हो चुके थे। सुबह 5.20 बजे उन्हें मृत घोषित कर . क्या समय पर इलाज मिलता तो नाना बच सकते थे, दिल का दौरा पड़ने के बाद एक-एक मिनट भी कितना अहम होता है और कैसे पहचानें कि बेचैनी या घबराहट दिल का दौरा है या नहीं; एक्सपर्ट्स से समझेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: नाना के आखिरी दो घंटों में क्या-क्या हुआ? जवाब: 4 अक्टूबर को नाना पाटेकर गोवा के डोना पाउला में एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वो इस दौरान स्वस्थ दिखाई दिए। उन्होंने कार्यक्रम में कहा था, ‘हम सभी को एक दिन जाना है, पता नहीं मैं कल यहां रहूंगा या नहीं। सबकी जिंदगी में एक मोड़ जरूर आता है, लेकिन इससे पहले खुद से पूछना होगा- क्या मैं वो कर पाऊंगा, जो मैं करना चाहता हूं?’ 4 अक्टूबर को नाना आखिरी बार सार्वजानिक तौर पर नजर आए। 8 अक्टूबर की रात गोवा के अपने घर में नाना अकेले थे। देर रात उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। मणिपाल हॉस्पिटल के डॉ. शेखर सालकर ने मीडिया को नाना के आखिरी समय की जानकारी दी… रात करीब 2:30 बजे नाना ने अपने दोस्त को मैसेज भेजा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। रात होने के चलते दोस्त तब उनका मैसेज नहीं देख पाया। फिर उन्होंने अपने दोस्त को कॉल की। तड़के करीब 4 बजे दोस्त उनके घर पहुंचा। तब नाना को बहुत पसीना आ रहा था और वो धीरे-धीरे बेहोश होते जा रहे थे। उन्होंने नाना को होश में लाने की कोशिश की और उनके केयरटेकर को अस्पताल भेजा। अस्पताल की एंबुलेंस और इमरजेंसी टीम नाना के घर पहुंची। इस समय तक नाना पूरी तरह बेसुध हो चुके थे। डॉक्टर्स ने उन्हें उठाकर सीधा किया और उनकी कार्डियक मसाज और CPR देना शुरू किया। घर से लेकर अस्पताल ले जाते समय भी CPR देना जारी रखा गया। करीब 4:20 बजे नाना मणिपाल हॉस्पिटल पहुंचे। यहां डॉक्टर्स ने करीब 45 मिनट तक कार्डियक मसाज, CPR और बाकी कोशिशें कीं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। सुबह करीब 5:20 बजे नाना को मृत घोषित कर दिया गया। डॉ. शेखर ने कहा कि नाना को अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया था। शव को पोस्टमार्टम के लिए गोवा मेडिकल कॉलेज भेजा गया। सवाल-2: नाना को कैसा कार्डियक अरेस्ट आया और क्या जान बचाई जा सकती थी? जवाब: आम तौर पर दिल की दिक्कत से होने वाली मौतों के मामले में कई शब्द सुनते हैं- दिल का दौरा, कार्डियक अरेस्ट, हार्ट अटैक। असल में दिल का दौरा या कार्डियक अरेस्ट एक ही बात है, जबकी हार्ट अटैक अलग है। हार्ट अटैक: दिल तक जाने वाली नसों में थक्का जमना हार्ट अटैक का मतलब है- दिल तक आने वाली एक या ज्यादा नसों में खून का थक्का जमना, जिसके चलते खून दिल तक नहीं पहुंच पाता। इससे दिल की मांसपेशियां खराब होने लगती हैं और दिल काम करना बंद कर सकता है। हालांकि इसमें मरीज को कई घंटों से कुछ दिनों तक का समय भी मिल सकता है। हार्ट अटैक में सीने में तेज दर्द होता है। शरीर के ऊपरी हिस्सों में भी तकलीफ हो सकती है। व्यक्ति हांफने लगता है। पसीना आता है। ऐसा भी महसूस हो सकता है कि पेट में कोई दिक्कत है। कई बार लोग कब्ज की दिक्कत को भी हार्ट अटैक समझ लेते हैं। इसका उल्टा भी हो सकता है। कार्डियक अरेस्ट: दिल का अचानक काम करना बंद कर देना दिल, दिमाग के भेजे गए इलेक्ट्रिकल सिग्नल की वजह से धड़कता है। अगर इन इलेक्ट्रिकल सिग्नल में कोई दिक्कत हो जाए, तो दिल अचानक धड़कना बंद कर देता है। इसे कार्डियक अरेस्ट कहते हैं। इसमें दिल से शरीर के बाकी हिस्सों में खून नहीं पहुंच पाता और वो अंग काम करना बंद कर देते हैं। कार्डियक अरेस्ट होते ही व्यक्ति बहुत कम समय में बेहोश हो सकता है और कुछ ही मिनटों में मौत हो सकती है। कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अमित शर्मा बताते हैं कि, ‘ज्यादातर मामलों में हार्ट अटैक के चलते ही कार्डियक अरेस्ट आता है। हालांकि कुछ मामलों में दिल की पुरानी बीमारी या नसों में थक्का जमने की दिक्कत के बिना भी अचानक कार्डियक अरेस्ट हो सकता है। इसे ‘सडेन कार्डियक अरेस्ट’ (CSA) कहते हैं।’ डॉ. अमित शर्मा के मुताबिक, ‘ये कहना मुश्किल है कि नाना को हार्ट अटैक से कार्डियक अरेस्ट हुआ, या अचानक सीधे कार्डियक अरेस्ट हुआ। उन्हें दो घंटे मिले, अगर जल्द से जल्द CPR शुरू हो जाता और फिर बाकी इलाज मिलता, तो उनकी जान बच सकती थी।’ डॉ. शेखर ने कहा है, ‘नाना को कार्डियक अरेस्ट आया, लेकिन इसकी वजह नहीं पता है। अस्पताल को ये भी नहीं पता था कि उनको दिल की कोई बीमारी थी या नहीं, या वो पहले से दिल की कोई दवाई ले रहे थे।’ हालांकि कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नाना पाटेकर को लंबे समय से दिल से जुड़ी दिक्कतें थीं।’ दिल की पुरानी बीमारियों से पीड़ित लोगों में कार्डियक अरेस्ट का खतरा ज्यादा होता है। पहले कभी हार्ट अटैक आया हो, तो उसका असर बना रह सकता है और इससे इलेक्ट्रिकल सिग्नल या हार्ट-बीट असामान्य हो सकती है। सवाल-3: CPR देने के बावजूद जान नहीं बच पाई, इसमें टाइम का कितना रोल? जवाब: CPR, यानी कार्डियो-पल्मोनरी रिसैसिटेशन’ की प्रक्रिया हाथों से की जा सकती है। छाती के बीचोबीच मुट्ठी बनाकर एक मिनट में 100 से 120 बार तक तेजी से छाती दबाना ही CPR देना है। हालांकि कार्डियक अरेस्ट होने पर CPR की टाइमिंग सबसे जरूरी है… कार्डियक अरेस्ट होने पर दिमाग और शरीर के बाकी अंगों में खून का फ्लो रुक जाता है। व्यक्ति तेजी से बेहोश होने लगता है। CPR एक मैन्युअल पंप की तरह काम करता है। छाती पर बार-बार दबाव पड़ने से शरीर के बाकी हिस्सों में ब्लड का फ्लो बनाए रखने में मदद मिलती है। अगर कार्डियक अरेस्ट के शुरुआती 2 मिनट के अंदर मरीज के आसपास मौजूद कोई व्यक्ति CPR की प्रक्रिया शुरू कर दे,

China India Relations; Xi Jinping BRICS 2026 Diplomacy Explained | Delhi Beijing Trade

China India Relations; Xi Jinping BRICS 2026 Diplomacy Explained | Delhi Beijing Trade

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत पहुंचे हैं। वो BRICS समिट के अलावा पीएम मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक भी करेंगे। जिनपिंग आखिरी बार अक्टूबर 2019 में अनौपचारिक बैठक के लिए भारत आए थे। . 1. डिप्लोमेसी: कारोबारी मजबूरी में भारत-चीन का सियासी तनाव कम होगा जून 2020 में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच खूनी झड़प हुई। भारत के कैप्टन संतोष बाबू समेत 20 जवान शहीद हुए। हालात इतने बिगड़े कि दोनों ओर से फॉरवर्ड पोस्ट पर जवानों और हथियारों की भारी तैनाती की गई। 4 साल बाद अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ नरमी आई। सीमा पर डिसइंगेजमेंट हुआ। रूस के कजान में मोदी-जिनपिंग की बातचीत हुई। अगस्त 2025 में मोदी SCO समिट के लिए चीन गए और जिनपिंग से मिले। हाल ही में किर्गिस्तान में भी दोनों नेताओं ने हैंडशेक किया। अब जिनपिंग भारत आ रहे हैं और मोदी के साथ बातचीत की मेज पर बैठेंगे। ये लगातार तीसरा साल है जब दोनों नेता मिल रहे हैं। अगस्त 2025 में चीन के तियानजिन पीएम मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग ने बातचीत की थी। तब जिनपिंग ने कहा था कि हमें प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझेदार बनना चाहिए। ब्रिटिश थिंकटैंक चैथम हाउस के एशिया-पैसेफिक प्रोग्राम के सीनियर रिसर्च फेलो डॉ. चिएतिज बाजपेयी मानते हैं कि भारत-चीन के बीच यह स्ट्रैटेजिक रीसेट नहीं, बल्कि टैक्टिकल थॉ है। यानी रिश्तों में जमा बर्फ भले कुछ पिघली है, लेकिन सीमा विवाद और पाकिस्तान-चीन के रिश्ते को लेकर तनाव बना हुआ है। डिप्लोमेसी में टैक्टिकल थॉ का मतलब होता है- आर्थिक जरूरतों के चलते 2 प्रतिद्वंद्वी देशों में राजनीतिक और सैन्य तनाव का अस्थायी तौर पर कम होना। 2. ऑप्टिक्स: जिनपिंग, पुतिन और मोदी एक साथ दिखना भी बड़ी बात पिछले डेढ़ साल में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की पॉलिसी का सीधा असर भारत, रूस और चीन पर पड़ा है। ट्रम्प ने भारत पर कुल 50% टैरिफ लगाया, जो सीरिया और म्यांमार जैसे देशों के बराबर था। वहीं चीन पर 145% तक टैरिफ और रूस पर कई तरह की आर्थिक और सैन्य पाबंदियां लगाईं। 1 सितंबर 2025 को चीन के तियानजिन में हुई SCO समिट के दौरान पीएम मोदी, पुतिन और जिनपिंग की साथ वाली तस्वीरें वायरल हुईं। पूरी दुनिया में चर्चा शुरू हुई कि क्या भारत-रूस-चीन एक मेज पर आ गए हैं। ट्रम्प की सोशल मीडिया पोस्ट से उनकी नाराजगी भी दिखी। उन्होंने ट्रुथ सोशल पर तीनों नेताओं की फोटो शेयर करते हुए लिखा, ‘ऐसा लगता है कि हमने भारत और रूस को चीन के हाथों खो दिया। उम्मीद करता हूं कि उनकी साझेदारी लंबी और समृद्ध हो।’ पिछले महीने किर्गिस्तान के बिश्केक में हुई SCO समिट के दौरान दोबारा ऐसी तस्वीरें आईं, जिन्हें फिर से अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ देखा गया। ऐसे में फिर से तीनों नेताओं का साथ आना, ऑप्टिक्स के लिहाज से काफी अहम होगा। इससे वॉशिंगटन को मैसेज जाएगा कि भारत के पास अमेरिका ही इकलौता विकल्प नहीं है। वहीं बीजिंग भी दिखाएगा कि पश्चिमी दुनिया ने भले ही उसे अलग-थलग करने की कोशिश की, लेकिन वो ग्लोबल स्टेज पर अकेला नहीं है, खासकर उस मंच पर है, जहां भारत और रूस भी हैं। दिल्ली में हो रही BRICS समिट के दौरान राष्ट्रपति पुतिन, पीएम मोदी और और राष्ट्रपति जिनपिंग। 3. मैसेजिंग: BRICS कोई दिखावे का मंच नहीं, सभी देश एकजुट BRICS अब सिर्फ 5 देशों- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और साउथ अफ्रीका का ग्रुप नहीं रहा। इसमें ईरान, UAE, सऊदी अरब जैसे 6 और देश जुड़ चुके हैं, यानी कुल 11 ताकतें। इन देशों में दुनिया की आधी आबादी रहती है और ग्लोबल GDP में इनकी 40% हिस्सेदारी है। दूसरी तरफ ग्लोबल ऑर्डर में उठापटक मची है। ट्रम्प मनमाने फैसले ले रहे हैं। दुनिया 25 युद्धों की मार झेल रही है। तेल-गैस, अनाज, कच्चे माल जैसी जरूरी चीजों की ग्लोबल सप्लाई चेन प्रभावित रही है। 2006 में BRICS की शुरुआती मीटिंग हुई, जिसमें भारत, चीन, रूस और ब्राजील के नेता शामिल हुए। बाद में इसमें साउथ अफ्रीका जुड़ा। तस्वीर- 2016 में भारत में हुए BRICS समिट की है। BRICS की अहमियत तब और बढ़ जाती है, जब 100 से ज्यादा देशों वाले ग्लोबल साउथ के ज्यादातर देश इससे उम्मीदें रखते हैं और मानते हैं कि BRICS पश्चिमी देशों के मुकाबले एक मजबूत मंच साबित होगा। हालांकि अलग-अलग सोच वाले BRICS के सभी 11 सदस्य देशों को एकजुट बनाए रखना आसान नहीं है। इनमें लोकतांत्रिक भारत है, तो सत्तावादी चीन-रूस भी हैं। ईरान का UAE और सऊदी अरब से संघर्ष जारी है। इथियोपिया और इजिप्ट भी आपस में विरोधी हैं। BRICS को एकजुट और कामयाब बनाए रखने की सबसे बड़ी शर्त है कि भारत और चीन आपस में खुले टकराव से बचें। भारतीय थिंकटैंक ऑर्गनाइजेशन फॉर रिसर्च ऑन चाइना एंड एशिया की डायरेक्टर ईरिशिका पंकज मानती हैं कि इस बार की BRICS समिट जितनी नई दिल्ली के लिए अहम है, उतनी ही बीजिंग के लिए। क्योंकि अगले साल वो BRICS का मेजबान है। अगर जिनपिंग मौजूदा चेयर, यानी भारत नहीं आते, तो चीन की ही साख को नुकसान पहुंचता। भारत और चीन के रिश्ते करवट ले रहे हैं, लेकिन 2 वजहों से फिलहाल दोनों देश एक पाले में नहीं आ सकते। पहला- ट्रस्ट डेफिसिट, यानी भरोसे की कमी और दूसरा- ट्रेड डेफिसिट, यानी व्यापार घाटा। पहली चुनौती: भारत-चीन के बीच भरोसे की कमी 1962 में दोनों देश जंग लड़ चुके हैं। सीमा विवाद के चलते 2013 में लद्दाख के देपसांग, 2014 में चुमार, 2017 में डोकलाम और 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में दोनों सेनाओं के बीच झड़पें हो चुकी हैं। अभी भी LAC पर करीब 50,000 भारतीय जवान तैनात हैं। जून 2026 में अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों ने दावा किया है कि चीनी सेना उनकी पुश्तैनी जमीन पर कब्जा कर रही है। हालांकि भारत ने इसका खंडन किया। चीन ने माना कि मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए टकराव में उसने पाकिस्तान की मदद की। चीन-पाकिस्तान लगातार स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप भी बढ़ा रहे हैं। भारत का एक और पड़ोसी बांग्लादेश भी चीनी खेमे में जा रहा है। ग्लोबल अफेयर्स के एक्सपर्ट डॉ. डायलन लोह मानते हैं कि भारत-चीन का बातचीत की मेज पर आना रिस्क मैनेजमेंट

Pakistan Terrorist Vs India; Hafiz Talha Saeed Jihadist Speech Explained

Pakistan Terrorist Vs India; Hafiz Talha Saeed Jihadist Speech Explained

‘भूल गए दिल्ली किसकी थी। हिंद में 500 साल मुसलमान हुक्मरान रहे।’ . ये बयान है आतंकी हाफिज सईद के बेटे तल्हा सईद का। उसने पाकिस्तान के शेखपुरा में सरेआम भारत के खिलाफ जिहाद जारी रखने की बात कही। इसी भाषण में उसने पाकिस्तानी आर्मी चीफ आसिम मुनीर को ‘ईमान और तकवा’ वाला जनरल बताया। आखिर कौन है तल्हा सईद, आसिम मुनीर की इतनी तारीफ क्यों कर रहा और इस वक्त ऐसे बड़बोलेपन के पीछे की पूरी कहानी, आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: तल्हा सईद ने ऐसा क्या बोला, जो सुर्खियों में है? जवाबः सोशल मीडिया पर तल्हा सईद का 2 मिनट 5 सेकेंड का एक वीडियो वायरल है। उसमें कही 3 बातें चर्चा में हैं… दिल्ली में 500 साल मुसलमानों का राजः तल्हा ने कहा, ‘जिस हिंद में मुसलमान 500 साल हुक्मरान रहे। आज वहां किस बुनियाद पर दिल्ली में बैठकर पाकिस्तान के दुश्मन बात करते हैं? क्या वो तारीख भूल गए कि दिल्ली किसका था? ये सारे हिंद के इलाके किसके थे?’ जिहाद करते रहेंगेः तल्हा ने कहा, ‘जब तक हम जिंदा हैं, जब तक दम और खम है। हम ये जिहाद करते रहेंगे। हम ये कुर्बानियां पेश करते रहेंगे।’ आसिम मुनीर की तारीफः तल्हा ने कहा, ‘मैं अल्लाह का शुक्र भी अदा करता हूं कि पाकिस्तान को ऐसा आर्मी चीफ दिया। ऐसा फील्ड मार्शल दिया, जो कुरान के हाफिज हैं और जिहाद को फिर से सजाया। वो जब भी मीटिंग करते हैं, लफ्जो की आग ‘ईमान, तकवा, जिहाद फी सबीलिल्लाह’ (ईमान, धर्मपरायणता और अल्लाह के रास्ते में जिहाद) की याद दिलाते हैं।’ तल्हा सईद पाकिस्तान में सभाएं करके लोगों को लश्कर-ए-तैयबा के मकसद से जोड़ता है। तल्हा की ये तस्वीर भड़काऊ भाषण के वायरल वीडियो से ली गई है। इससे पहले सिंधु जल संधि पर रोक लगाने की वजह से पीएम मोदी को धमकी देते हुए तल्हा ने कहा था, ‘अगर तू पानी बंद करेगा, तो हम तेरी सांस बंद कर देंगे।’ सवाल-2: तल्हा सईद है कौन? जवाबः 26/11 मुंबई आंतकी हमले के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का बेटा है तल्हा सईद। फिलहाल लाहौर में रहता है। हाफिज के बाद उसे आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की कमान मिल सकती है। फिलहाल वो नंबर-2 माना जाता है। 12 साल की उम्र में लश्कर से जुड़ाः तल्हा की पैदाइश 25 अक्टूबर, 1975 की है। 1987 में लश्कर-ए-तैयबा की शुरुआत के साथ आतंकी अब्दुर रहमान मक्की की देखरेख में तल्हा की ट्रेनिंग शुरू हो गई। 2000 के दशक में हाफिज सईद खुद को समाजसेवा और राजनीतिक नरैटिव बनाने लगे, तब लश्कर में तल्हा की जिम्मेदारी बढ़ी। मुंबई आतंकी हमले में भी नामः 2008 के मुंबई आतंकी हमले के बाद, हाफिज सईद ने पाकिस्तान की आवाम के सामने दिखाया कि हमले की साजिश उसकी नहीं थी। तब तल्हा ने ही मीडिया में लश्कर का पूरा प्रोपेगैंडा कैंपेन चलाया था। वह सोशल मीडिया का भी एक्सपर्ट है। तल्हा सईद अप्रैल 2026 में पाक पीएम शहबाज शरीफ के राजनीतिक सलाहकार राणा सनाउल्लाह से मिला था। भारत-अमेरिका में आतंकी घोषितः भारतीय गृह मंत्रालय के मुताबिक, PoK से भारत के खिलाफ आतंकी साजिशें करना, आतंकियों की भर्ती, फंड जमा करना, हमलों की प्लानिंग, भारत और अफगानिस्तान में आतंकी गतिविधियां, यह सब तल्हा संभालता है। भारत सरकार ने 2022 में उसे आतंकी घोषित किया था। अमेरिका ने भी उसे टेररिस्ट घोषित किया है। हालांकि चीन के वीटो की वजह से UN में ग्लोबल टेररिस्ट घोषित नहीं हो सका। पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में भी सक्रियः 2019 में हाफिज सईद के कैद में जाने के बाद तल्हा लाइमलाइट में आया। इसी साल बम ब्लास्ट उसकी जान बची। 2024 में पाकिस्तान चुनाव के दौरान हाफिज सईद ने ‘पाकिस्तान मरकज़ी मुस्लिम लीग’ (PMML) बनाई थी। तब तल्हा लाहौर की NA-127 सीट से उतरा लेकिन पाकिस्तान मुस्लिग लीग- नावज (PML-N) के कैंडिडेट से हार गया। चुनाव में तल्हा को सिर्फ 2024 वोट मिले थे। चुनाव जीतने वाले लतीख खोसा को 1 लाख से ज्यादा वोट मिले थे। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पढ़े-लिखे लड़ाकों की भर्ती शुरू की: रिपोर्ट्स के मुताबिक, तल्हा ने लश्कर में पढ़े-लिखे और कम उम्र के लड़ाकों की भर्ती का हुक्म दिया है। वो पाकिस्तान के मस्जिदों, मदरसों, सभाओं और सोशल मीडिया के जरिए जिहादी प्रोपेगैंडा फैलाता है। ऑनलाइन क्लासेस लेता है और आतंक के साथ-साथ राजनीति के लिए भी लड़के तैयार करता है। जून 2026 में तल्हा PoK के प्रधानमंत्री सरदार अतीक अहमद खान से भी मिला था। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस दौरान कश्मीर के मुद्दे पर ही बात हुई थी। सवाल-3: आसिम मुनीर की इतनी तारीफ क्यों कर रहा है तल्हा सईद? जवाबः इसकी 3 बड़ी वजहें हैं… मुनीर की ‘मौलाना जनरल’ वाली इमेज आसिम मुनीर की तालीम किसी मौलाना की तरह हुई है। 7वीं तक मदरसे में पढ़े और कुरान याद की। आर्मी जॉइन करने के बाद भी कुरान दोहराई। भाषणों में वे बार-बार कुरान की आयतों का जिक्र करते हैं। पहलगाम हमले से पहले 16 अप्रैल 2025 को दिए भाषण में उन्होंने मजहबी तौर पर भारत-पाकिस्तान की तुलना की थी, ‘हम हिंदुओं से हर मायने में अलग हैं, चाहे वह मजहब हो या मकसद हो।’ पाकिस्तान में भारत के राजदूत रहे अजय बिसारिया के मुताबिक, ‘मुनीर की लीडरशिप में पाक आर्मी सिर्फ सीमाओं की नहीं, मजहबी सोच की भी हिफाजत कर रही है। वे धार्मिक राष्ट्रवाद को दोहराते हैं। उन्हें मौलानाओं का सपोर्ट है।’ भारत विरोधी और कश्मीर पर कट्टर रुख जब 2019 का पुलवामा आतंकी हमला हुआ, आसिम मुनीर पाकिस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसी ISI के चीफ थे। अप्रैल 2025 के भाषण में भी मुनीर ने कहा था, ‘कश्मीर हमारी जुगुलर वेन यानी गले की नस था, है और रहेगा।’ इसके 6 दिन बाद ही पहलगाम हमला हुआ। मुनीर कश्मीर की आजादी, जंग और भारत को मुंह तोड़ जवाब देने की बात कहते हैं। भारत के साथ सुलह करने के सवाल पर मुनीर कहते हैं, ‘जब भारत पाकिस्तान के कॉन्सेप्ट को ही नहीं मानता, तो हम उनके साथ सुलह कैसे कर सकते हैं।’ 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के हमलों में 100 से ज्यादा आतंकी मारे गए थे। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर मसूद इल्यास कश्मिरी ने सितंबर 2025 में बताया था कि आसिम मुनीर ने पाक आर्मी के जनरलों से कहा था

Asim Munir Military Powers; Pakistan Army Chief Dictatorship Strategy Explained

Asim Munir Military Powers; Pakistan Army Chief Dictatorship Strategy Explained

पाकिस्तान में 5वीं बार सेना के जनरल ने ‘तख्तापलट’ कर दिया है। फर्क बस इतना है कि इस बार ये टैकों के जरिए नहीं, संसद के रास्ते हुआ है। नए कानून से फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पाकिस्तान के सबसे ताकतवर शख्स बन गए हैं। . इससे जुड़े 5 जरूरी सवालों के जवाब, आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: आसिम मुनीर को कौन-सी नई ताकतें मिल गई हैं? जवाब: नवंबर 2022 में आसिम मुनीर पाकिस्तान के 17वें आर्मी चीफ बने थे। उनका कार्यकाल खत्म होने से 6 महीने पहले, यानी मई 2025 में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च कर दिया। पाकिस्तान ने जीत का झूठा दावा किया और आसिम मुनीर को ‘हीरो’ बताया। इसके बाद आसिम मुनीर की ताकत बढ़ती चली गई… 20 मई 2025 को मुनीर फील्ड मार्शल बने। ये पाकिस्तानी सेना की सबसे ऊंची रैंक होती है। आम बोलचाल में इसे ‘फाइव स्टार जनरल’ कहते हैं। इससे पहले पाकिस्तान में सिर्फ जनरल अयूब खान इस रैंक तक पहुंचे थे। नवंबर 2025 को पाकिस्तानी संविधान के आर्टिकल 243 में 27वां संशोधन करके सेना में नया चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज, CDF का पद बनाया गया। मुनीर देश के पहले CDF बने। वो 2030 तक इस पद पर रहेंगे। संशोधन के जरिए इसे बढ़ाया भी जा सकता है। 20 अगस्त 2026 को पाकिस्तानी संसद में 2 नए कानून पारित हुए, जिससे CDF को 5 बड़ी शक्तियां मिल गई हैं। डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026 के तहत 3 ताकतें… CDF मुनीर की अगुवाई में एक ‘डिफेंस फोर्सेज हेडक्वार्टर’ बनेगा, जो तीनों सेनाओं के कामकाज और जंग से जुड़े फैसले लेगा। CDF के पास सेना प्रमुखों को छोड़कर तीनों सेनाओं के बाकी सारे ऑफिसर्स को रिटायर करने, हटाने, सर्विस खत्म करने या बनाए रखने या रिटायरमेंट में छूट देने का हक होगा। CDF नेशनल सिक्योरिटी और डिफेंस के मामलों में पीएम के प्रमुख सलाहकार होंगे। सरकार और CDF सेना से जुड़े कानूनों में बदलाव भी कर सकते हैं। नेशनल कमांड अथॉरिटी एक्ट, 2026 के तहत 2 ताकतें… CDF मुनीर के पास परमाणु हथियारों का कंट्रोल बढ़ जाएगा। इससे पहले पाकिस्तानी आर्मी चीफ न्यूक्लियर हथियारों की नेशनल कमांड अथॉरिटी के मेंबर होते थे। इसकी अध्यक्षता पीएम के जिम्मे होती है। CDF को राष्ट्रपति के बराबर कानूनी सुरक्षा मिलेगी, यानी पूरी जिंदगी कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। यानी आसिम मुनीर तीनों सेनाओं के प्रमुख हैं, न्यूक्लियर हथियारों से जुड़े फैसले लेने की भी ताकत है। सैन्य अफसरों से जुड़ा हर फैसला भी निर्णायक रूप से वही लेंगे और सबसे बड़ी बात- मुनीर पर कोई मुकदमा नहीं चल सकता। सवाल-2: मदरसे में पढ़े मुनीर पाकिस्तान के सबसे ताकतवर शख्स कैसे बन गए? जवाब: मुनीर के पिता सैयद सरवर मुनीर 1947 में पंजाब के जालंधर से पलायन कर पाकिस्तान पहुंचे थे। वो रावलपिंडी के मशहूर एफजी टेक्निकल स्कूल के हेडमास्टर बने। साथ ही मस्जिद में इमामत करते और इस्लामिक उपदेश देते। गहरे धार्मिक झुकाव वाले इस घर में 1968 में आसिम मुनीर का जन्म हुआ। पाकिस्तानी जर्नलिस्ट एजाज सैयद के मुताबिक, घर वाले चाहते थे कि आसिम कुरआन हिफ्ज करे। मुनीर सातवीं तक मदरसे में पढ़े और कुरआन रटी। फिर कुछ दिन एफजी टेक्निकल स्कूल पढ़ने गए। इसके बाद रावलपिंडी के सर सैयद कॉलेज गए, जहां से पूर्व आर्मी चीफ कमर जावेद बाजवा ने पढ़ाई की थी। क्रिकेट के शौकीन मुनीर कॉलेज के दिनों में तेज गेंदबाज थे। स्कूल के बाद मुनीर ने जापान के फूजी स्कूल, क्वेटा के कमांड एंड स्टाफ कॉलेज और मलेशिया के आर्म्ड फोर्सेज कॉलेज से पढ़ाई की। उसके बाद इस्लामाबाद की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी से पब्लिक पॉलिसी और स्ट्रेटेजिक सिक्योरिटी मैनेजमेंट में मास्टर्स किया। ऑफिसर्स ट्रेनिंग स्कूल के दिनों आसिम मुनीर की तस्वीर। 1986 में मिलिट्री करियर शुरू हुआ, सऊदी में दोबारा कुरआन रटी 25 अप्रैल 1986 को मुनीर को पाकिस्तान आर्मी में के फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट की 23वीं बटालियन में पहली तैनाती मिली। जब मुनीर लेफ्टिनेंट कर्नल बने, तो उन्हें सऊदी अरब में पाकिस्तानी दूतावास में तैनाती मिली। वहां मुनीर को महसूस हुआ कि वे कुरआन भूल रहे हैं। ऐसे में लगातार 3 साल वह छुट्टियों में घर नहीं गए और इस दौरान दोबारा कुरआन रटी। इसके बाद आसिम सियाचिन ग्लेशियर में भी रहे। आसिम का काफी वक्त पाकिस्तान के कब्जाए कश्मीर यानी PoK में भी गुजरा। फिर 2014 में मेजर जनरल, 2016 में पाकिस्तान के मिलिट्री इंटेलिजेंस के डायरेक्टर जनरल और सितंबर 2018 में लेफ्टिनेंट जनरल की पोस्ट तक पहुंचे। PoK में सीमा के पास सिंगल बैरल रॉकेट लॉन्चर का इंस्पेक्शन करते आर्मी चीफ मुनीर (दाएं)। सिर्फ 8 महीने ISI चीफ रहे मुनीर, पीएम इमरान से झगड़ा भारी पड़ा 25 अक्टूबर 2018 को मुनीर ISI के डीजी बने। 8 ही महीने बाद जून 2019 में उन्हें हटाकर लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद को नया ISI डीजी बनाया गया। इसकी वजह थी- मुनीर का इमरान खान से झगड़ा। मुनीर ने इमरान खान की पत्नी बुशरा बीबी के करप्शन के एक मामले को उजागर कर दिया था। इसलिए इमरान खान के कहने पर तब के आर्मी चीफ बाजवा ने मुनीर को ISI से बाहर का रास्ता दिखाया था। 30 अगस्त 2018 को मुनीर से हाथ मिलाते तब के पाक पीएम इमरान खान। इमरान पीएम पद से हटाए गए, तो मुनीर नए आर्मी चीफ बने मुनीर नवंबर 2022 तक करीब एक साल क्वार्टरमास्टर जनरल रहे। ये भी ISI चीफ के मुकाबले काफी छोटा पद होता है। हालांकि 2022 की शुरुआत में इस्लामाबाद का सियासी माहौल बदलने लगा। 10 अप्रैल को इमरान अविश्वास प्रस्ताव लाकर पीएम पद से हटाए गए। अगले ही दिन नवाज शरीफ के गुट वाली मुस्लिम लीग के नेता और नवाज के छोटे भाई शहबाज शरीफ पीएम बन गए। मुनीर शहबाज के करीबी थे। माना जाता है कि इमरान को सत्ता से हटाने के हथकंडों में मुनीर ने अंदरखाने साथ दिया। मुनीर को भी इसका ‘रिटर्न गिफ्ट’ मिला। 29 नवंबर को बाजवा को हटाकर मुनीर को नया आर्मी चीफ बना दिया गया। मुनीर पहले आर्मी चीफ बने, जो पाकिस्तान की दोनों खुफिया एजेंसियों- ISI और मिलिट्री इंटेलिजेंस के चीफ रहे थे। मुनीर के आर्मी चीफ बनने के बाद इमरान ने पाक सेना पर उनकी सरकार गिराने का आरोप लगाया था। ट्रक पर मुनीर की ये तस्वीर अगस्त 2023 की है, जब

Nepal Flood Warning Vs China; Tibet Border Disaster Alert System Explained

Nepal Flood Warning Vs China; Tibet Border Disaster Alert System Explained

26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर आई बाढ़ में 200 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो गई है। करीब 1,500 लोग अब भी लापता हैं। दावा किया जा रहा कि काफी जानें बचाई जा सकती थीं, अगर चीन ने समय पर चेता दिया होता। . तो क्या वाकई नेपाल में हुई भीषण तबाही के पीछे चीन जिम्मेदार है; दोनों देशों के बीच आपदाओं की वार्निंग देने का क्या सिस्टम है, इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: नेपाल में आई बाढ़ के पीछे चीन पर क्या आरोप लग रहे? जवाब: नेपाली पत्रकार परशुराम काफ्ले ने X पर लिखा, ‘चीन ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। अगर बीजिंग के डिजास्टर डिटेक्शन सिस्टम से अर्ली वार्निंग मिल जाती, तो नेपाल में ज्यादा जानें बचाई जा सकती थीं। नेपाल हमेशा चीन की चिंताओं का ध्यान रखता है। इस एकतरफा प्यार की कीमत चुकानी पड़ रही है।’ नेपाल के मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, नेपाल और चीन के बीच मौसम से जुड़ी जानकारियां शेयर करने की व्यवस्था है, लेकिन इस घटना के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं दी गई। नेपाल के मौसम विभाग की सीनियर साइंटिस्ट विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अभी तक वे नहीं बता पाए हैं कि बाढ़ की वजह क्या है।’ 2016 में भी नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर रसुवागढ़ी इलाके में भीषण बाढ़ आई थी। तब भी एक्सपर्ट्स ने कहा था कि दोनों देशों के बीच समय रहते इन्फॉर्मेशन शेयर की गई होती, तो नुकसान कम किया जा सकता था। बाढ़ की वजह से नेपाल-चीन को जोड़ने वाला रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग क्रॉस-बॉर्डर लैंड पोर्ट डैमेज हो गया। तिब्बत के इमिग्रेशन कॉम्पलेक्स के ऊपर से सैलाब आता हुआ दिख रहा है। सवाल-2: दोनों देशों के बीच ऐसे हादसों की जानकारी देने का नियम है या नहीं? जवाब: नेपाल और चीन के बीच मौसम और आपदा से जुड़ी जानकारियां साझा करने की बात तय हुई थी, लेकिन इस पर कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया है। दरअसल, 8 जुलाई 2025 को रसुवागढ़ी बॉर्डर पॉइंट से 35 किलोमीटर ऊपर चीन के इलाके में तिब्बत के पहाड़ों पर ‘पुरेपु’ नाम की ग्लेशियर झील फटी। इससे भोटेकोशी नदी के आसपास करीब 100 किमी तक के इलाके में बाढ़ का मलबा पहुंचा। एक दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। पिछले साल भोटेकोशी नदी पर आई बाढ़ में 9 लोगों की मौत हुई थी। कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट डैमेज हुए थे। इसके बाद नेपाल और चीन ने तीन बातें तय की थीं… दोनों देश आपस में बाढ़ वगैरह से जुड़ी रियल-टाइम जानकारी साझा करेंगे। इसके लिए एक अर्ली वार्निंग सिस्टम बनाया जाएगा। अगर पहाड़ों पर ग्लेशियर की झील फटने, यानी ‘ग्लेशियल आउटबर्स्ट फ्लड, GLOF का खतरा होगा, तो उसे भी फ्लैग करेंगे। नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में एनवायरनमेंट स्टडीज के प्रोफेसर सुदीप ठाकुर बताते हैं, ‘तिब्बत में मौसम से जुड़ी इन्फॉर्मेशन इकठ्ठा करने की व्यवस्था है, लेकिन उसे नेपाल के साथ साझा नहीं किया जाता है। चीन को वैज्ञानिक जानकारी देने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन शायद नेपाल सरकार ही मजबूती से अपनी मांग उनके सामने रख ही नहीं पाई है।’ नेपाल की डिजास्टर स्टडी सेंटर के डायरेक्टर वसंत अधिकारी भी कहते हैं कि अब तक जानकारी शेयर करने की कोई व्यवस्था नहीं है। सवाल-3: जानकारी शेयर न करने के आरोप पर चीन ने क्या कहा है? जवाब: चीन ने सीधे तौर पर इसका कोई जवाब नहीं दिया है, हालांकि चीनी दूतावास ने अपने बयान में कहा है कि भूकंप के चलते बाढ़ आई है और ये भूकंप नेपाल की तरफ आया था। बयान में कहा गया, ‘रसुवा-ग्यिरोंग बॉर्डर इलाके में आई बाढ़ से चीन बेहद दुखी है। नेपाल की तरफ आए भूकंप के चलते हिमस्खलन हुआ और फिर मलबा बहा। इससे सीमा के दोनों तरफ लोगों की मौत हुई।’ दरअसल, पहले कहा गया था कि रिक्टर स्केल पर करीब 5 की तीव्रता के भूकंप के चलते बर्फ का ग्लेशियर टूटा, हालांकि बाद में अमेरिकी जियोलॉजिकल सर्वे ने साफ किया कि भूकंप जैसा झटका बर्फ और चट्टान के टूटने से पैदा हुआ था। हालांकि चीनी दूतावास ने ये जरूर कहा है, ‘भविष्य में सीमा पार मौसम और आपदाओं से जुड़ी जानकारियां साझा करने के लिए बेहतर तरीके से काम करेंगे।’ सवाल-4: बर्फ का पहाड़ चीन में गिरा या नेपाल में? जवाब: नेपाल की डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, NDRRMA के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने की जगह नेपाल-चीन सीमा चौकी से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। अथॉरिटी के वैज्ञानिक प्रकाश पोखरेल के मुताबिक, ‘ये इलाका नेपाली हिस्से में आता है, न कि चीन की तरफ।’ हालांकि, नेपाली मौसम वैज्ञानिक विभूति पोखरेल कहती हैं, ‘हम चीनी अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अब तक ये पता नहीं है कि घटना नेपाल में हुई या चीन की तरफ हुई है।’ दरअसल, मानसून सीजन के चलते उस इलाके में काफी बादल हैं। इसलिए सेटेलाइट तस्वीरों से ये साफ नहीं हो पा रहा है कि ग्लेशियर टूटने की सटीक लोकेशन क्या है। मोटे तौर पर जहां ग्लेशियर टूटा, वो इलाका सेंट्रल हिमालयन रेंज की क्रेस्टलाइन पर है। यानी अगर पहाड़ की एक तरफ की ढलान नेपाल में है, तो उसी पहाड़ की दूसरी तरफ की ढलान तिब्बत में है, जिस पर चीन का कंट्रोल है। करीब 8000 मीटर की ऊंचाई पर बर्फ और ग्लेशियर जमा रहते हैं, जो पिघलकर दोनों तरफ की नदियों के लिए पानी का सोर्स बनते हैं। तकनीकी तौर पर अगर ऊंचाई पर कोई ग्लेशियर टूटे, तो उसका असर नीचे दोनों देशों के तरफ की नदियों पर पड़ सकता है। पोइकू नदी तिब्बत के ग्लेशियर से निकलती है। फिर सीमा पार करके नेपाल में दाखिल होती है और वहां भोटेकोशी कही जाती है, इसी की सहायक नदी ल्हेंदे में बाढ़ आई। एक बात और है- चीन के मुताबिक, पहले भूकंप आया और फिर ग्लेशियर टूटा। जबकि नेपाल सहित दुनियाभर के मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि पहले ग्लेशियर टूटा, जिससे भूकंप जैसा झटका महसूस हुआ। सवाल-5: ग्लेशियर टूटने से नेपाल में इतनी भीषण तबाही कैसे आई? जवाबः पूरी घटना 3 स्टेप में समझिए…. 1. ग्लेशियर टूटा: 26 अगस्त की सुबह करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर करीब 2000 फीट का ग्लेशियर टूटा और 4 हजार फीट नीचे गिर गया। 2: नदी में पानी

US-Iran Tension | Why Trump Avoided Military Attack Strategy Explained

US-Iran Tension | Why Trump Avoided Military Attack Strategy Explained

वॉशिंगटन डीसी6 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 14 अगस्त को न्यूयॉर्क के गार्डन सिटी में भाषण देते हुए। अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 60 दिन का समझौता सोमवार को खत्म हो गया। इसका मकसद दोनों देशों के बीच चल रहे युद्ध को रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद का समाधान निकालना था। समयसीमा खत्म होने के बाद भी न तो कोई अंतिम समझौता हुआ और न ही अमेरिका ने ईरान पर नया बड़ा हमला शुरू किया। 60 दिनों के दौरान ट्रम्प ने कई बार कहा कि अगर बातचीत नाकाम रही तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। इसलिए माना जा रहा था कि डेडलाइन खत्म होते ही अमेरिका ईरान पर फिर बड़ा हमला कर सकता है। समयसीमा खत्म होने से ठीक पहले ट्रम्प का रुख बदलता दिख रहा है। एक्सियोस को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा, “हम इसे लो-की कर रहे हैं।” वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक अमेरिका, ईरान को तीन तरीके से घेर रहा है। 1. आर्थिक दबाव- ईरान की कमाई और अर्थव्यवस्था को कमजोर करना। 2. नौसैनिक नाकाबंदी- ईरान के लिए समुद्र के रास्ते व्यापार मुश्किल करना। 3. बातचीत- सीधे या दूसरे देशों के जरिए ईरान से समझौते की कोशिश करना। यानी अभी अमेरिका सीधे बड़ा हमला करने की बजाय ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहा है, समुद्र के रास्ते उसका व्यापार रोक रहा है और बातचीत के जरिए समझौते की कोशिश भी कर रहा है। बजाय इसके कि अमेरिका तुरंत फिर से बड़े युद्ध में उतर जाए। ट्रम्प हमला रोककर क्या हासिल करना चाहते हैं? ट्रम्प की मौजूदा रणनीति को समझने के लिए सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका युद्ध को खत्म नहीं मान रहा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने शनिवार को कहा कि संघर्ष खत्म नहीं हुआ है और अमेरिका कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य तीनों तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि ट्रम्प को लगता है कि फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना सैन्य हमले से ज्यादा असरदार हो सकता है। अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी ने ईरान की आर्थिक मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। ट्रम्प का मानना है कि अगर ईरान युद्ध में नहीं उलझा रहेगा तो उसे अपनी असली आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। जैसे कि बर्बाद बुनियादी ढांचा, कमजोर अर्थव्यवस्था, महंगाई और पैसों की कमी। यानी अमेरिका का दांव यह है कि युद्ध रोककर ईरान को कमजोर होने दिया जाए। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि युद्ध जारी रहने पर ईरानी सरकार संघर्ष को अपनी आर्थिक परेशानियों के लिए जिम्मेदार ठहरा सकती है। लेकिन जब युद्ध नहीं होगा, तब जनता और सरकार को आर्थिक संकट का सामना सीधे करना पड़ेगा। इसीलिए ट्रम्प फिलहाल सैन्य हमले की जगह आर्थिक दबाव को समय देना चाहते हैं। ईरान में गरीबी दर इस साल 40% से ज्यादा होने का अनुमान है। ट्रम्प को ईरान के खिलाफ रणनीति क्यों बदलनी पड़ी? ट्रम्प ने फरवरी में इजराइल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया था। शुरुआत में उम्मीद थी कि संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा, लेकिन यह कई महीनों तक खिंच गया। अब अमेरिका के सामने दो तरह का दबाव है। एक तरफ वह ईरान के खिलाफ अपने सैन्य लक्ष्य हासिल करना चाहता है, दूसरी तरफ लंबे युद्ध की बढ़ती लागत भी उसके लिए चिंता बन रही है। ट्रम्प लगातार कहते रहे हैं कि ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत है। एक इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा था कि अमेरिका के सामने दो रास्ते हैं- या तो ईरान को आर्थिक रूप से टूटने दिया जाए या फिर उस पर बहुत बड़ा सैन्य हमला किया जाए। फिलहाल ट्रम्प पहला रास्ता आजमाते दिख रहे हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिका ने टकराव खत्म कर दिया है। रॉयटर्स के मुताबिक, ट्रम्प सरकार चीन की उन रिफाइनरियों पर नए प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है जो ईरानी तेल खरीदती हैं। इसके अलावा ईरान के साथ लेन-देन करने वाले चीनी बैंकों और उन संस्थाओं पर भी कार्रवाई की तैयारी है, जिन पर प्रतिबंधों से बचने में ईरान की मदद करने का आरोप है। यानी हमला भले ही रुका हुआ है, लेकिन दबाव कम नहीं हुआ है। होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा सौदेबाजी का मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा टकराव में होर्मुज स्ट्रेट सबसे बड़ा दांव बन गया है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। इसलिए होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किसी भी तरह की रुकावट का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। ईरान इस मुद्दे पर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है। 9 अगस्त को ईरानी अधिकारियों ने कहा था कि ओमान के साथ समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है। लेकिन तेहरान ने यह भी साफ कर दिया कि ओमान के साथ समझौता होने का मतलब यह नहीं है कि होर्मुज स्ट्रेट तुरंत अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खोल दिया जाएगा। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले नौसैनिक नाकाबंदी खत्म करे, प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा दे। यानी अमेरिका चाहता है कि समुद्री रास्ते और जहाजों की आवाजाही सामान्य हो, जबकि ईरान इसे अमेरिकी रियायतों से जोड़कर देख रहा है। इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं रह गया है। यह दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा सौदेबाजी का हथियार बन चुका है। युद्ध की बड़ी कीमत चुका रहा अमेरिका सूत्रों के मुताबिक, ईरान के साथ पांच महीने चले युद्ध में अमेरिका ने लंबी दूरी तक मार करने वाली बड़ी संख्या में मिसाइलें इस्तेमाल की हैं। इनमें ATACMS और प्रिसीजन स्ट्राइक मिसाइल शामिल हैं। दो सूत्रों ने दावा किया कि अमेरिका ने इन हथियारों का लगभग पूरा भंडार इस्तेमाल कर लिया है, हालांकि उन्होंने सटीक संख्या नहीं बताई। अमेरिका युद्ध के दौरान कम से कम 45 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन भी गंवा चुका है। यह उसके कुल बेड़े का करीब 25% है। अमेरिकी वायुसेना के मुताबिक, एक रीपर ड्रोन की कीमत उसके उपकरणों के आधार पर 3 से 5 करोड़ डॉलर तक हो सकती है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, इन नुकसानों की कुल कीमत 1.3 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती

Arshad Warsi Success Story Explained; Munna Bhai Circuit

Arshad Warsi Success Story Explained; Munna Bhai Circuit

11 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र कॉपी लिंक बचपन के संघर्षों ने ही अरशद वारसी को बॉलीवुड का सफल अभिनेता बनाया। 14 साल की उम्र में अरशद वारसी ने ऐसा दर्द देखा, जिसने उन्हें वक्त से पहले बड़ा बना दिया। डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने मां को पानी नहीं दिया था और कुछ घंटों बाद उनका निधन हो गया। इस बात का मलाल उन्हें आज भी है। माता-पिता के निधन के बाद घर की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई और उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। उन्होंने बसों और घर-घर जाकर लिपस्टिक बेची, फोटो लैब में नौकरी की और छोटे-छोटे काम करके गुजारा किया। हालात इतने मुश्किल थे कि कई बार भविष्य अंधेरे में नजर आता था। लेकिन इसी संघर्ष ने उन्हें ऐसा कलाकार बनाया, जिसने ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ के ‘सर्किट’ बनकर करोड़ों लोगों का दिल जीता। उन्हें भी इस किरदार की इतनी बड़ी सफलता की उम्मीद नहीं थी। आज की सक्सेस स्टोरी में जानते हैं अरशद वारसी के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें। माता-पिता के निधन के बाद कम उम्र में ही अरशद वारसी ने जिम्मेदारियां संभाल ली थीं। बचपन में खुशहाल जिंदगी, फिर सब कुछ बदल गया 19 अप्रैल 1968 को मुंबई में जन्मे अरशद वारसी का शुरुआती बचपन आर्थिक रूप से अच्छा था। उनके पिता अहमद अली खान वारसी शायर और गायक थे। परिवार का जीवन आरामदायक था, लेकिन समय के साथ हालात बिगड़ने लगे। कानूनी विवादों और आर्थिक नुकसान के कारण परिवार की संपत्ति चली गई। बड़ा घर छोड़कर उन्हें छोटे घरों में रहना पड़ा। 14 साल की उम्र में अनाथ हो गए अरशद की जिंदगी का सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब उन्होंने कम उम्र में अपने माता-पिता को खो दिया। राज शमानी के पॉडकास्ट में उन्होंने बताया कि वह सिर्फ 14 साल के थे, जब उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया। इस घटना ने उन्हें उम्र से पहले जिम्मेदार बना दिया। अरशद ने कहा था- “मैं अपनी उम्र के हिसाब से काफी मैच्योर हो गया था। पिताजी के जाने के बाद हालात लगातार खराब होते गए। मां के निधन के बाद मैं तुरंत रो भी नहीं पाया, क्योंकि मुझे लगा कि अब सब कुछ मुझे ही संभालना है। कई हफ्तों बाद मैं टूटकर रोया।” मां की आखिरी याद आज भी नहीं भूले अरशद ने बताया कि उनकी मां साधारण गृहिणी थीं और बहुत अच्छा खाना बनाती थीं। उन्हें किडनी फेल होने की बीमारी हो गई थी, इसलिए नियमित डायलिसिस कराना पड़ता था। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने सख्त हिदायत दी थी कि उन्हें पानी नहीं देना है। लेकिन उनकी मां बार-बार पानी मांगती थीं और अरशद ने डॉक्टरों की सलाह मानते हुए हर बार मना कर दिया। उन्होंने कहा कि निधन से ठीक पहले वाली रात मां ने उन्हें बुलाकर पानी मांगा था, लेकिन उन्होंने पानी नहीं दिया। उसी रात उनकी मां का निधन हो गया। अरशद के मुताबिक, यह घटना आज भी उन्हें अंदर तक झकझोर देती है। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें लगता था कि अगर उन्होंने मां को पानी पिला दिया और उसके बाद उनका निधन हो गया, तो पूरी जिंदगी खुद को जिम्मेदार मानते। अब उन्हें लगता है कि शायद मां की आखिरी इच्छा पूरी कर देनी चाहिए थी। उनका मानना है कि कई बार परिवार वाले मरीज की इच्छा से ज्यादा अपने अपराधबोध के आधार पर फैसले लेते हैं। आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी, बेची लिपस्टिक माता-पिता के निधन के बाद घर चलाने की जिम्मेदारी अरशद के कंधों पर आ गई। आर्थिक संकट इतना गहरा था कि उन्हें दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। गुजारा करने के लिए उन्होंने कई छोटे-मोटे काम किए। उन्होंने कॉस्मेटिक्स कंपनी में डोर-टू-डोर सेल्समैन के तौर पर काम किया। कई रिपोर्टों के मुताबिक वे मुंबई की बसों में लिपस्टिक और कॉस्मेटिक उत्पाद भी बेचते थे। अरशद वारसी कहते हैं, “मैं घर-घर जाकर लिपस्टिक बेचता था। कई लोग दरवाजा बंद कर देते थे, लेकिन उसी दौर ने मुझे लोगों से बात करना और जिंदगी का सामना करना सिखाया।” उन्होंने बताया कि उस दौर में वह सप्ताहभर मेहनत करके कुछ सौ रुपए ही कमा पाते थे, जबकि मां के इलाज पर हर सप्ताह लगभग 800 रुपए खर्च हो जाते थे। उन्होंने कहा, “मैं वीकेंड पर म्यूजिकल शो करता था, जिसके 175 रुपए मिलते थे। तभी मुझे समझ आया कि जिंदगी में आर्थिक रूप से मजबूत होना कितना जरूरी है।” डांस ने बदली जिंदगी संघर्ष के बीच अरशद का डांस का शौक कभी नहीं छूटा। उन्हें बचपन से नृत्य में रुचि थी। धीरे-धीरे उन्होंने डांस को ही करियर बनाने का फैसला किया। डांस के प्रति जुनून ने उनकी जिंदगी बदल दी। वे अकबर सामी के डांस ग्रुप से जुड़े। 1991 में ऑल इंडिया डांस प्रतियोगिता जीती और 1992 में लंदन में आयोजित वर्ल्ड डांस चैंपियनशिप के मॉडर्न जैज वर्ग में चौथा स्थान हासिल किया। इसके बाद उन्होंने डांस स्टूडियो शुरू किया और फिल्मों में कोरियोग्राफी करने लगे। उन्होंने ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ के टाइटल ट्रैक के अलावा ‘ठिकाना’ और ‘काश’ जैसी फिल्मों में भी कोरियोग्राफी की। यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। जया बच्चन की नजर पड़ी, मिल गया पहला मौका कोरियोग्राफर के रूप में काम करते समय उनकी मुलाकात कई फिल्मी हस्तियों से हुई। इसी दौरान जया बच्चन ने उनकी प्रतिभा देखकर अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (ABCL) की फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ में अभिनय का मौका दिया। 1996 में रिलीज हुई ‘तेरे मेरे सपने’ से अरशद वारसी ने बतौर अभिनेता बॉलीवुड में कदम रखा। फिल्म अमिताभ बच्चन कॉरपोरेशन लिमिटेड (ABCL) के बैनर तले बनी थी और निर्देशक जॉय ऑगस्टीन थे। इससे पहले वह बतौर कोरियोग्राफर पहचान बना चुके थे। उनकी एंट्री किसी फिल्मी परिवार की वजह से नहीं, बल्कि प्रतिभा के दम पर हुई। अरशद ने कहा था कि वह अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और जॉय ऑगस्टीन के आभारी रहेंगे, जिन्होंने उन पर भरोसा किया। पहली फिल्म के बाद नहीं मिला मनचाहा काम ‘तेरे मेरे सपने’ के बाद अरशद को लगा था कि उनके करियर की रफ्तार तेज होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगले कुछ वर्षों में उन्होंने ‘हीरो हिंदुस्तानी’, ‘होगी प्यार की जीत’, ‘मुझे मेरी बीवी से बचाओ’, ‘जानी दुश्मन: एक अनोखी कहानी’ समेत कई

PF Withdrawal Rule Change: 75% Limit Explained

PF Withdrawal Rule Change: 75% Limit Explained

नई दिल्ली10 मिनट पहले कॉपी लिंक अब नौकरीपेशा लोग बीमारी, शिक्षा, शादी और घर जैसी जरूरतों के लिए अपने PF अकाउंट से पात्र 75% राशि का 100% तक पैसा निकाल सकेंगे। केंद्र सरकार ने पुरानी 1952 की व्यवस्था को बदलकर अब सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत 29 जून से देश में नई EPF स्कीम लागू की है। आसान भाषा में समझिए इस बदलाव का आपके पीएफ बैलेंस और विड्रॉल पर क्या असर पड़ेगा। सवाल 1: सरकार ने PF से जुड़ा कौन सा नया नियम लागू किया है? जवाब: केंद्र सरकार पुरानी ‘ईपीएफ स्कीम 1952’ की जगह अब ‘EPF स्कीम 2026’ को नोटिफाई कर दिया है। इसके तहत PF सब्सक्राइबर्स के लिए आंशिक निकासी की शर्तों में बदलाव किए गए हैं। सवाल 2: आंशिक निकासी को लेकर सबसे मुख्य बदलाव क्या है? जवाब: नए नियमों के तहत अब कोई भी EPFO मेंबर अपने PF अकाउंट से पूरा पैसा आंशिक निकासी के रूप में नहीं निकाल सकेगा। अब ग्राहकों को अपने पीएफ अकाउंट में कुल ‘एलिजिबल मेंबर बैलेंस’ का कम से कम 25% हिस्सा PF अकाउंट में रखना होगा। सवाल 3: इस 25% मिनिमम बैलेंस के नियम को गणित के हिसाब से कैसे समझें? जवाब: इसे एक सीधे उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर किसी कर्मचारी के पीएफ खाते में कुल एलिजिबल मेंबर बैलेंस 1 लाख रुपए हैं, तो नए नियम के मुताबिक 25 हजार (25%) को खाते में ही छोड़ना अनिवार्य होगा। इस राशि को निकालने की अनुमति नहीं होगी। इसके बाद जो शेष 75 हजार (75%) बचेंगे, उसे ही निकाल सकेंगे। इन आसान स्टेप्स के जरिए निकाल सकते हैं पीएफ पीएफ निकालने के लिए कर्मचारी को सबसे पहले EPFO की आधिकारिक वेबसाइट https://unifiedportal-mem.epfindia.gov.in/memberinterface/ पर लॉगइन करना पड़ेगा। वेबसाइट खुलते ही आपको राइट साइड पर यूएएन और पासवर्ड और कैप्चा डालना होगा। जिसके बाद आपके पास OTP आएगा इस भरकर सबमिट करें। अगले पेज पर Online Services के टैब पर क्लिक करें और ड्रॉप-डाउन सूची से Form (फॉर्म -31,19 और 10C) का चयन करें। यहां आपको अपना बैंक अकाउंट नंबर भरकर इसे वेरिफाइ करके आगे सबमिट करना होगा। अगले पेज पर फॉर्म नंबर 31 का चयन करें। इसके बाद अगले पेज पर कितना पैसा निकालना है, क्यों निकालना है और अपना पता जैसी डिटेल्स भरना होंगी। इसके बाद इन डिटेल्स को सत्यापित करके Get Aadhaar OTP पर क्लिक करते ही आपका क्लेम सबमिट हो जाएगा। सवाल 4: क्या यह मिनिमम बैलेंस का नियम सिर्फ कर्मचारी के हिस्से पर लागू होगा या एम्प्लॉयर के हिस्से पर भी? जवाब: यह नियम दोनों पर समान रूप से लागू होगा। योजना की परिभाषा के अनुसार, ‘एलिजिबल मेंबर बैलेंस’ की गणना कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के योगदान को मिलाकर की जाती है। दोनों ही फंड्स के कुल योग में से 25% की अनिवार्य कटौती करने के बाद बची हुई राशि ही निकासी के योग्य मानी जाएगी। सवाल 5: नई स्कीम के तहत किन जरूरी कामों के लिए पीएफ से आंशिक निकासी की जा सकती है? जवाब: ईपीएफ स्कीम 2026 में सदस्यों को कई जरूरतों के लिए आंशिक निकासी की अनुमति दी गई है। इसमें घर बनाने या खरीदने से जुड़े काम हैं। सदस्य घर या फ्लैट खरीदने, मकान निर्माण के लिए प्लॉट खरीदने, नया घर बनवाने, होम लोन की रीपेमेंट और मकान की मरम्मत या सुधार के लिए पैसा निकाल सकते हैं। इसके अलावा बीमारी, शिक्षा और शादी जैसी जरूरतों के लिए भी पैसा निकाल सकेंगे। सवाल 6: अगर किसी कर्मचारी ने 12 महीने (1 साल) की नौकरी भी पूरी नहीं की है, तो क्या वह पैसे निकाल सकता है? जवाब: हां, संशोधित नियमों में इस स्थिति के लिए भी विशेष प्रावधान किया गया है। यदि कोई कर्मचारी 12 महीने से कम की सेवा के बाद नौकरी छोड़ देता है, तो वह भी निर्दिष्ट शर्तों और नियमों के अधीन अपने पीएफ खाते से आंशिक निकासी का दावा कर सकता है। पहले के मुकाबले इसमें नियमों को थोड़ा ज्यादा फ्लेक्सिबल बनाया गया है। सवाल 7: सरकार का इस नई योजना ‘ईपीएफ स्कीम 2026’ को लाने के पीछे क्या मुख्य उद्देश्य है? जवाब: इस नई योजना का दोहरा उद्देश्य है। पहला उद्देश्य कर्मचारियों को नौकरी के दौरान जरूरत पड़ने पर आसानी से पैसा मिल सके। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी अपनी पूरी रकम समय से पहले न निकाल लें, जिससे उनके रिटायरमेंट के बाद के लिए बचत सुरक्षित रहे। सवाल 8: क्या इस बदलाव से नौकरीपेशा लोगों की इन-हैंड सैलरी या मासिक योगदान पर कोई असर पड़ेगा? जवाब: नहीं, इस बदलाव का आपकी हर महीने कटने वाली पीएफ राशि या इन-हैंड सैलरी पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा। आपके वेतन से पीएफ का योगदान पहले की तरह ही जारी रहेगा। यह नया नियम केवल उस स्थिति में प्रभावी होता है जब आप अपने जमा फंड से एडवांस या आंशिक रूप से पैसा निकालने के लिए आवेदन करते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

PF Withdrawal Rule Change: 75% Limit Explained

PF Withdrawal Rule Change: 75% Limit Explained

नई दिल्ली29 मिनट पहले कॉपी लिंक अब नौकरीपेशा लोग बीमारी, शिक्षा, शादी और घर जैसी जरूरतों के लिए अपने PF अकाउंट से पात्र 75% राशि का 100% तक पैसा निकाल सकेंगे। केंद्र सरकार ने पुरानी 1952 की व्यवस्था को बदलकर अब सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत 29 जून से देश में नई EPF स्कीम लागू की है। आसान भाषा में समझिए इस बदलाव का आपके पीएफ बैलेंस और विड्रॉल पर क्या असर पड़ेगा। सवाल 1: सरकार ने PF से जुड़ा कौन सा नया नियम लागू किया है? जवाब: केंद्र सरकार पुरानी ‘ईपीएफ स्कीम 1952’ की जगह अब ‘EPF स्कीम 2026’ को नोटिफाई कर दिया है। इसके तहत PF सब्सक्राइबर्स के लिए आंशिक निकासी की शर्तों में बदलाव किए गए हैं। सवाल 2: आंशिक निकासी को लेकर सबसे मुख्य बदलाव क्या है? जवाब: नए नियमों के तहत अब कोई भी EPFO मेंबर अपने PF अकाउंट से पूरा पैसा आंशिक निकासी के रूप में नहीं निकाल सकेगा। अब ग्राहकों को अपने पीएफ अकाउंट में कुल ‘एलिजिबल मेंबर बैलेंस’ का कम से कम 25% हिस्सा PF अकाउंट में रखना होगा। सवाल 3: इस 25% मिनिमम बैलेंस के नियम को गणित के हिसाब से कैसे समझें? जवाब: इसे एक सीधे उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर किसी कर्मचारी के पीएफ खाते में कुल एलिजिबल मेंबर बैलेंस 1 लाख रुपए हैं, तो नए नियम के मुताबिक 25 हजार (25%) को खाते में ही छोड़ना अनिवार्य होगा। इस राशि को निकालने की अनुमति नहीं होगी। इसके बाद जो शेष 75 हजार (75%) बचेंगे, उसे ही निकाल सकेंगे। इन आसान स्टेप्स के जरिए निकाल सकते हैं पीएफ पीएफ निकालने के लिए कर्मचारी को सबसे पहले EPFO की आधिकारिक वेबसाइट https://unifiedportal-mem.epfindia.gov.in/memberinterface/ पर लॉगइन करना पड़ेगा। वेबसाइट खुलते ही आपको राइट साइड पर यूएएन और पासवर्ड और कैप्चा डालना होगा। जिसके बाद आपके पास OTP आएगा इस भरकर सबमिट करें। अगले पेज पर Online Services के टैब पर क्लिक करें और ड्रॉप-डाउन सूची से Form (फॉर्म -31,19 और 10C) का चयन करें। यहां आपको अपना बैंक अकाउंट नंबर भरकर इसे वेरिफाइ करके आगे सबमिट करना होगा। अगले पेज पर फॉर्म नंबर 31 का चयन करें। इसके बाद अगले पेज पर कितना पैसा निकालना है, क्यों निकालना है और अपना पता जैसी डिटेल्स भरना होंगी। इसके बाद इन डिटेल्स को सत्यापित करके Get Aadhaar OTP पर क्लिक करते ही आपका क्लेम सबमिट हो जाएगा। सवाल 4: क्या यह मिनिमम बैलेंस का नियम सिर्फ कर्मचारी के हिस्से पर लागू होगा या एम्प्लॉयर के हिस्से पर भी? जवाब: यह नियम दोनों पर समान रूप से लागू होगा। योजना की परिभाषा के अनुसार, ‘एलिजिबल मेंबर बैलेंस’ की गणना कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के योगदान को मिलाकर की जाती है। दोनों ही फंड्स के कुल योग में से 25% की अनिवार्य कटौती करने के बाद बची हुई राशि ही निकासी के योग्य मानी जाएगी। सवाल 5: नई स्कीम के तहत किन जरूरी कामों के लिए पीएफ से आंशिक निकासी की जा सकती है? जवाब: ईपीएफ स्कीम 2026 में सदस्यों को कई जरूरतों के लिए आंशिक निकासी की अनुमति दी गई है। इसमें घर बनाने या खरीदने से जुड़े काम हैं। सदस्य घर या फ्लैट खरीदने, मकान निर्माण के लिए प्लॉट खरीदने, नया घर बनवाने, होम लोन की रीपेमेंट और मकान की मरम्मत या सुधार के लिए पैसा निकाल सकते हैं। इसके अलावा बीमारी, शिक्षा और शादी जैसी जरूरतों के लिए भी पैसा निकाल सकेंगे। सवाल 6: अगर किसी कर्मचारी ने 12 महीने (1 साल) की नौकरी भी पूरी नहीं की है, तो क्या वह पैसे निकाल सकता है? जवाब: हां, संशोधित नियमों में इस स्थिति के लिए भी विशेष प्रावधान किया गया है। यदि कोई कर्मचारी 12 महीने से कम की सेवा के बाद नौकरी छोड़ देता है, तो वह भी निर्दिष्ट शर्तों और नियमों के अधीन अपने पीएफ खाते से आंशिक निकासी का दावा कर सकता है। पहले के मुकाबले इसमें नियमों को थोड़ा ज्यादा फ्लेक्सिबल बनाया गया है। सवाल 7: सरकार का इस नई योजना ‘ईपीएफ स्कीम 2026’ को लाने के पीछे क्या मुख्य उद्देश्य है? जवाब: इस नई योजना का दोहरा उद्देश्य है। पहला उद्देश्य कर्मचारियों को नौकरी के दौरान जरूरत पड़ने पर आसानी से पैसा मिल सके। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी अपनी पूरी रकम समय से पहले न निकाल लें, जिससे उनके रिटायरमेंट के बाद के लिए बचत सुरक्षित रहे। सवाल 8: क्या इस बदलाव से नौकरीपेशा लोगों की इन-हैंड सैलरी या मासिक योगदान पर कोई असर पड़ेगा? जवाब: नहीं, इस बदलाव का आपकी हर महीने कटने वाली पीएफ राशि या इन-हैंड सैलरी पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा। आपके वेतन से पीएफ का योगदान पहले की तरह ही जारी रहेगा। यह नया नियम केवल उस स्थिति में प्रभावी होता है जब आप अपने जमा फंड से एडवांस या आंशिक रूप से पैसा निकालने के लिए आवेदन करते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

Ceasefire, Sanctions Relief, Hormuz Reopening and Nuclear Commitments Explained

Ceasefire, Sanctions Relief, Hormuz Reopening and Nuclear Commitments Explained

Hindi News International US Iran Interim MoU Signed: Ceasefire, Sanctions Relief, Hormuz Reopening And Nuclear Commitments Explained वॉशिंगटन डीसी7 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिका और ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए तैयार किए गए समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने बुधवार देर रात डिजिटल हस्ताक्षर किए, जिसके साथ ही यह समझौता लागू हो गया। इस डील से जुड़े एक अमेरिकी अधिकारी ने बुधवार को रिपोर्टरों के साथ हुई एक कॉन्फ्रेंस कॉल में 14 पॉइंट्स वाले डील की पूरी जानकारी दी है। इसके मुताबिक होर्मुज को सिर्फ 60 दिनों के लिए मुफ्त खोले जाने की बात कही गई है। वही, ईरान ने परमाणु हथियार नहीं बनाने का भरोसा दिया है। इसके बदले में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर (28 लाख करोड़ रुपए) का फंड बनाया जाएगा। अधिकारी ने अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर यह जानकारी दी। ट्रम्प ने बुधवार को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बैठक के दौरान पेरिस के वर्साय पैलेस में इस दस्तावेज पर साइन किए। पॉइंट-1: सभी मोर्चों पर संघर्ष खत्म होगा समझौते के पहले पॅाइंट में कहा गया है कि अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी देशों के बीच सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत और स्थायी रूप से बंद की जाएगी। इसमें लेबनान भी शामिल है। अमेरिका की नजर में यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को चिंता थी कि हिजबुल्लाह के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई ईरान के साथ हुए इस समझौते को कमजोर कर सकती है। इसे इजराइल की चिंताओं को नजरअंदाज करने के रूप में देखा जा रहा है। इजराइल का कहना है कि लेबनान में मौजूद ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्लाह बहुत बड़ा खतरा है। इजराइल पहले ही कह चुका है कि वह अमेरिका-ईरान बातचीत में लेबनान को लेकर हुई किसी भी सहमति को नहीं मानेगा। पॉइंट-2: एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देंगे समझौते में कहा गया है कि अमेरिका और ईरान एक-दूसरे की आजादी, सीमाओं और संप्रभुता का सम्मान करेंगे। दोनों देश एक-दूसरे के घरेलू मामलों में दखल भी नहीं देंगे। अमेरिकी अधिकारियों ने पत्रकारों को समझौते का जो हिस्सा पढ़कर सुनाया, उसमें यह बात साफ तौर पर शामिल थी। समझौते का यह हिस्सा ईरान के सरकार विरोधी गुटों को पसंद नहीं आ सकता। इन्हें उम्मीद थी कि अमेरिका भविष्य में भी ईरान में राजनीतिक बदलाव या लोकतंत्र समर्थक आंदोलनों का खुलकर समर्थन करेगा। दरअसल, इसी साल ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए कहा था कि उनकी मदद की जाएगी। लेकिन नए समझौते में एक-दूसरे के आंतरिक मामलों से दूर रहने की बात कही गई है। ऐसे में माना जा रहा है कि ईरान के अंदरूनी मुद्दों को लेकर अमेरिका का रुख पहले की तुलना में नरम हुआ है। पॉइंट-3: 60 दिनों में अंतिम समझौते का लक्ष्य अमेरिका और ईरान ने अधिकतम 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते पर बातचीत पूरी करने और उसे लागू करने का लक्ष्य तय किया है। हालांकि, दोनों देशों की सहमति होने पर इस समयसीमा को आगे भी बढ़ाया जा सकता है। दोनों देशों के नेताओं द्वारा समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए जाने के साथ ही 60 दिनों की यह समयसीमा शुरू हो गई है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक 60 दिनों की यह समयसीमा काफी छोटी मानी जा रही है। अमेरिकी अधिकारी भी निजी तौर पर मानते हैं कि इतने कम समय में अंतिम समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा, खासकर इसलिए क्योंकि ईरान के साथ पहले हुई परमाणु वार्ताओं में कई साल लग चुके हैं। हालांकि ट्रम्प प्रशासन ने जानबूझकर यह महत्वाकांक्षी समयसीमा तय की है। अगर 60 दिनों के भीतर कोई अंतिम समझौता हो जाता है, तो यह अमेरिका के मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों से पहले राष्ट्रपति ट्रम्प के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि साबित हो सकता है। ऐसे समय में जब उनकी घरेलू लोकप्रियता में गिरावट देखी जा रही है, यह समझौता उन्हें राजनीतिक फायदा भी पहुंचा सकता है। पॉइंट-4: अमेरिका समुद्री नाकाबंदी हटाएगा अमेरिका दस्तखत के बाद ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकेबंदी और अन्य बाधाओं को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर देगा। यह नाकेबंदी 30 दिनों के भीतर पूरी तरह खत्म कर दी जाएगी। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी हटने के बाद ईरान फिर से अपने बंदरगाहों से तेल और अन्य सामान निर्यात कर सकेगा। साथ ही दूसरे देशों से आने वाला माल भी बिना बड़ी रुकावट के ईरान पहुंच सकेगा। यह ईरान के लिए बहुत बड़ी और तत्काल राहत होगी, क्योंकि उसके ज्यादातर निर्यात चीन को जाते हैं। जैसे ही निर्यात दोबारा शुरू होगा, ईरान के पास विदेशी मुद्रा और राजस्व आना शुरू हो जाएगा, जिससे उसकी मौजूदा आर्थिक मुश्किलें काफी हद तक कम हो सकती हैं। लेकिन इस फैसले का एक दूसरा पहलू भी है। नाकेबंदी हटने से अमेरिका अपने सबसे प्रभावी दबाव के साधनों में से एक खो देगा। पॉइंट-5: होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा समझौते पर हस्ताक्षर होते ही ईरान ने वादा किया है कि वह अपनी पूरी कोशिश करके फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच आने-जाने वाले व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेगा। यह व्यवस्था 60 दिनों तक लागू रहेगी और इस दौरान जहाजों से कोई एक्स्ट्रा टैक्स नहीं लिया जाएगा। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक इस समझौते की सबसे अहम लाइन है- सिर्फ 60 दिनों तक बिना किसी फीस के इसका मतलब है कि अगले 60 दिनों तक ईरान होर्मुज से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों से कोई पैसा नहीं लेगा। लेकिन 60 दिन पूरे होने के बाद ईरान जहाजों पर शुल्क या फीस लगा सकता है। युद्ध से पहले ईरान आमतौर पर अंतरराष्ट्रीय जहाजों से इस तरह का पैसा नहीं लेता था। इसलिए अगर भविष्य में फीस लगाई जाती है, तो यह एक बड़ा बदलाव होगा और होर्मुज से गुजरने वाली वैश्विक समुद्री व्यापार लागत बढ़ सकती है। पॉइंट-6: ईरान को ₹28 लाख करोड़ का हर्जाना समझौते के तहत अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर (28 लाख करोड़ रुपए) की योजना तैयार करने का वादा किया